आज बिस्तर पर पहली बार
तकिये को खड़ा पाया ,
तो घबरा गया,
सोचा यह कैसा जमाना आ गया

तकिये ने मेरी बात समझ ली
और बोली -“आज तक तुने मुझे बहुत सताया है
कभी पैरो से उछाला है,
तो कभी सीने से लगाया है,
पैरों के बीच फंसा तूने,
मुझे अपनी वासना का शिकार भी बनाया है.

अपने जीवन की अनगिनत लम्हों को
मेरे सानिध्य में बिताया है,
फ़िर भी तुम्हे मेरी फिक्र नही है?
मेरे बिगड़ते हालात का,
तेरी देश-भर की चर्चाओं में कोई जिक्र नहीं है?

मेरे तन के कपड़े फटे जा रहे हैं,
मेरे अन्दर की रूई अब दबकर,
हाड़ हो गई है,
मोड़ते मोड़ते
यह कई फाड़ हो गई है।

तूने क्या मुझे अपनी बीबी समझ रखा है?
जैसे चाहेगा वैसे रख लेगा?
और जब चाहे, जैसे चाहे,
साथ का मजा चख लेगा।

होशियार किए देती हूँ,
कल ही मेरे लिए नए कपड़े लाओ,
मेरे अन्दर कुछ बढ़िया रूई डलाओ,
वरना अब सोने नहीं दूँगी,
लोकतंत्र का जमाना है,
मैं भी आन्दोलन करूंगी।”

आन्दोलन के नाम से मैं घबरा गया,
बिस्तर से लुढ़क कर जमीन पर आ गया,
उठ कर देखा तो मैं पसीने से नहा गया था,
नींद टूट गई थी और मैं होश में आ गया था।

पर एक बात का
कन्फ्यूजन अभी भी जारी है,
कि सपने की बातें तकिये ने सुनाई थी,
या तकिये में छुपी
कोई भारतीय नारी है।

दोनों की दशा एक सी है ,
दोनों की व्यथा एक सी है,
पर दोनों में एक ही अन्तर है,
एक बिस्तर पर है,
और एक स्वयं बिस्तर है ।

पाठकों की प्रतिक्रिया के बाद बालमन द्वारा एक भूल सुधार किया गया। आखिरी पद निम्नवत है:

दोनों की दशा एक सी है,
दोनों की व्यथा एक सी है ,
पर क्या दोनों में एक ही अन्तर है?
कि एक बिस्तर पर है और
एक स्वयं बिस्तर है ?

बालमन