किसे addressकरूँ?

कल मुझे साक्षात्‌ भगवान के दर्शन हो गये। आप माने या न मानें, दर्शन देने वाले ने यही बताया। यह कि दुनिया के नासमझ लोग असली रूप को जान नहीं पाये और बेकार के प्रपंच मे उलझे रहे। “मेरे स्वामी की अलौकिक कृपा का दिव्य प्रसाद जो मुझे मिला है वह इस कलियुग में अद्वितीय है। मुझसे पहले द्वापर युग में मेरे स्वामी ने ऐसी कृपा एक गोपी पर की थी जिसका नाम राधा था।” जी हाँ, ऐसा ही बताया ‘दूसरी राधा’ ने।

कल जब डी.के.पण्डा साहब अपने आयकर-कटौती की चिन्ता लिए मेरे ऑफिस में दाखिल हुए तो उनके पीछे कौतूहल से भरी अनेक आँखें मेरे कमरे में आ गयीं। प्रियतम (भगवान श्रीकृष्ण) का दिया हुआ पीताम्बर, सिर के चारो ओर लिपटा हुआ ‘उनके ही’ रंग का दुपट्टा, मांग में सिंदूर, माथे पर लाल टीका व बिन्दी, नाक में नथ, कान में झुमका, होंठ पर लाल लिप्स्टिक, गले में मंगल-सूत्र, लाल नेलपॉलिश, चूड़ियों से भरी कलाइयाँ, कंगन, पाँव में छमछम करती पायल, बिछुआ और आल्ता से रंगी एड़ियाँ। सबकुछ अपने स्वामी की पसंद के अनुसार।( …स्वामी मुझे चौबीस घंटे ऐसे ही देखना पसंद करते हैं…)



वे इसी सिलसिले में एक-दो बार पहले भी दर्शन दे चुके थे इसलिए मुझे अपने को संयत रखकर कुछ साहसी सवाल करने की इच्छा हो गयी।

अपने अदने से मोबाइल को चालू करके मैने उनकी अनुमति मांगी तो उन्होने सहर्ष बताना शुरू कर दिया

“… मेरे स्वामी ने मुझे कहा है कि दिव्य प्रेम का संदेश चारो ओर फैलाओ। सभी यह जानें कि सगुण भक्ति की प्रेम परंपरा में कैसे आराध्य और आराधक

> मुख्य कोषाधिकारी के साथ आशीर्वाद मुद्रा में

का भेद मिट जाता है। भक्त अपने स्वामी के साथ एकाकार हो उसीमें विलीन हो जाता है । यह तो भगवान की विशेष कृपा है जो हम जैसे भक्त के साथ प्रेम क्रीड़ा करने के लिए हमें स्त्री रूप धारण करने का आदेश देते हैं।”

“मूलतः तो मै श्रीकृष्ण का ही अद्वितीय रूप हूँ जो बाद में स्वामी के आनंद के लिए उनकी इच्छा पर सखी रूप धरकर उनकी अंकशायिनी बन गयी हूँ।…” दूसरी राधा का पूरा दर्शन ‘लिखकर’ बताना कठिन हो रहा है। आइये, आपको इन्ही के श्रीमुख से पूरी बात सुनवाता हूँ। (मोबाइल रिकार्डिंग की क्वालिटी के साथ थोड़ा ‘एड्‌जेस्ट’ करना पड़े तो … क्षमा करें)

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