मेरी पिछली पोस्ट में टिप्पणी देते हुये डा.अनुराग ने अपने बेटे के जन्मदिन पर हवन कराने , एक आश्रम में सपरिवार जाकर कुछ समय बिताने और फ़िर शाम को आधुनिक तरीके से “birthday” मनाने का जिक्र किया था । यह पढ़कर मुझे भी प्रेरणा मिली। मंदिर जाकर माथा टेकने , प्रसाद बाँटने तथा घर में परिजनों के साथ बैठकर केक कटवाने, मोमबत्तियाँ बुझाने, happy birthday कहकर तालियाँ बजाने और विशेष दावत कराने का इन्तजाम तो हर साल के ‘मीनू’ में शामिल ही रहता था लेकिन इसबार मैने आश्रम जाने का मन भी बनाया।

तत्काल प्रेरित हो जाने के दो कारण थे – पहला यह कि 20 जुलाई को छुट्टी का दिन रविवार था, तथा दूसरा यह कि इलाहाबाद के त्रेतायुगीन भारद्वाज मुनि के आश्रम की दूरी मेरे घर से मात्र 1.5 किमी. होने के बावज़ूद मैं पहले कभी वहाँ जा नहीं सका था।

भारद्वाज आश्रम, इलाहाबाद

छात्र जीवन में भी इस आश्रम के पड़ोस में ही यूनिवर्सिटी हॉस्टल में रहता था तथा गाहे-बगाहे ‘आनन्द-भवन’ की नक्षत्रशाला तक जाया करता था। उसके पास ही स्थित ‘भारद्वाज पार्क’ में भी घूम लिया करता था… और इसी के एक सिरे पर स्थित ‘स्विमिंग पूल’ में ही मैने तैराकी का क,ख,ग… सीखा था। किन्तु पास ही मौज़ूद आश्रम में जाने की कभी उत्कंठा नहीं हुई। कोई कारण नहीं… बस यूँ ही नहीं जा पाया था। बेटी के जन्मदिन पर आये अवसर का सदुपयोग करने की मंशा लिये मैं भारद्वाज आश्रम चल पड़ा।

अपनी माँ, पत्नी, बेटी वागीशा, पुत्र सत्यार्थ, दो भाइयों व एक भतीजे के साथ जब मैं वहा गाड़ी से उतरा तो आश्रम के मुहाने पर फैली गंदगी और कूड़े की बदबू ने स्वागत किया। हम अभी पैदल आगे बढ़ने को सोच ही रहे थे कि हमारी ओर दर्जनो जोड़ी आँखें इस उम्मीद में निहारने लगीं कि हम उनकी चादर पर सजाकर रखे हुए कुछ सिक्के खरीद लें। दस रूपए में आठ सिक्के… …ये दुकानें अधिकांशतः बूढ़ी औरतों ने बिछा रखी थी। ..हमें सिक्कों की जरूरत नहीं थी सो हम आगे बढ़ लिये। हमारे आगे-पीछे सभी दुकानों से सिक्के खरीद लेने की पुकार तेज होती गयी।

वहाँ मेरी आँखें कोई आश्रम जैसा स्थल ढूँढ रहीं थीं जहाँ कोई ज्ञानी, संत, महात्मा या साधु- सन्यासी मिल जाय, लेकिन हमें मिला बिलकुल उल्टा।

हम तेजी से चलते हुए सीढ़ियों तक पहुँचे। हम ऊपर चढ़ने का उपक्रम करते इससे पहले ही एक औघड़नुमा पुजारी जी हमें सड़क किनारे के मंदिर की ओर आकर्षित करने के लिए ऐसे बोल पड़े जैसे कोई दुकानदार अपने शो-रूम का सामान दिखाने का आग्रह करता है। हमने उनके देवता की ओर दूर से ही सिर नवाया और सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आ गये।

ऊपर बड़े से प्लेटफॉर्म पर गेरुए रंग का प्राचीन मुख्य मंदिर है जिसमें पुरातन शिवलिंग स्थापित है। इसके चारो ओर अनेक छोटे-छोटे दूसरे देवी-देवताओं व ऋषि-मुनियों के मंदिर हैं। इनके बीच-बीच में वहाँ के पंडों और पुजारियों के परिवार निवास करते हैं। घरेलू कूड़ा और प्रयुक्त जल की गंदगी यत्र-तत्र बिखरी हुई मिली।

वहाँ मेरी आँखें कोई आश्रम जैसा स्थल ढूँढ रहीं थीं जहाँ कोई ज्ञानी, संत, महात्मा या साधु- सन्यासी मिल जाय, लेकिन हमें मिला बिलकुल उल्टा।

वहाँ सभी छोटे बड़े मंदिरों के दरवाजों पर चादर बिछाये या दानपात्र पर टुच्चा सा ताला लटकाये दर्शनार्थियों की बाट जोहती प्रौढ़ा स्त्रियाँ बैठी थीं जो अपने स्थान से ही एक साथ अपने-अपने मंदिर का दर्शन करने के लिए बुलाने लगीं। मैले-कुचैले कपड़ों में दो अनाहूत अधेड़ उम्र के पुरुष प्रकट होकर ये बताने लगे कि किधर जाएं और किधर न जाएं। कहाँ-कहाँ माथा नवाएं, कहाँ दक्षिणा चढ़ाकर पुन्य कमाएं और कहाँ माथे पर टीका लगवाएं। उनकी काँव-काँव के शोर में हमारी शान्ति की कामना दम तोड़ने लगी।

मंदिरों के भीतर रखी देवी-देवताओं और पौराणिक पात्रों की मूर्तियाँ मानो सरकारी अव्यवस्था और अपने रखवालों के हाथों घोर उपेक्षा और गंदगी का दंश झेलते हुए उनकी लोलुप वृत्ति पर कुपित थीं। एक कक्ष में तो अनेक पुराने शिवलिंग लावारिस और अस्त-व्यस्त हालत में ढेर बनाकर रखे मिले।

हम जिधर कदम बढ़ाते उधर ही कुछ ऐसा सत्संग सुनने को मिलता- “आय हौ तौ कुछ धरम करि जाव… ई बत्ती क खर्चा कहाँ से आई? हम गरीबन क पेट कइसे भरी… ?” “आवऽ–आवऽ, ईहाँ भी आजाऽ, बड़का सेठ-साहुकार लागऽथ्हा, तोहार बएपार बढ़ी राजाऽ… मालिक तौहें अउरी दीहेंऽ, …कुछ ‘धरम’ करि जाव… … ऐ मल्किन! ई महासती अन्सुइया आ अत्री मुनी क अस्थान हौ, कुछ ‘धरम’ करि जाव… तोहार सोहाग बढ़िन् जाई…”

कान पर चोट कर रहे ये याचना के शब्द मेरी पत्नी को उद्वेलित कर रहे थे। हमने यथा सामर्थ्य कुछ दान-पात्रों में ‘धरम’ किया, लेकिन सबके साथ नहीं कर पाये। संख्या बड़ी थी… उनकी प्रतिस्पर्धा में सबको जिता पाना संभव नहीं हुआ। …हम कहीं बैठ नहीं पाये। घबराकर नीचे आ गये। मन में यही चल रहा था कि अब इस जगह दुबारा आने लायक नहीं है।


गाड़ी पर वापस पहुँचने तक वही आवाजें हमारा पीछा करती रहीं।… एक औरत पीछे-पीछे हमारी गाड़ी तक आ गयी। करुण आवाज़ में अपने अकेलेपन और निराश्रित होने का दुखड़ा रोने लगी तो पत्नी ने पूछा- “मेरे घर चलोगी? …वहाँ काम करोगी तो खाना कपड़ा और पैसा भी मिलेगा…” इतना सुनते ही उसका स्वर बदल गया- “असल में मुझे बीमारी है। पेट में…। काम नहीं कर पाती हूँ। ऐसे ही माँग कर काम चल जाता है।”

बच्चे तबतक गाड़ी में बैठ चुके थे। रेस्तराँ में जाने को देर हो रही थी…। वहाँ मेरी बेटी सबको अपने जन्मदिन की मिठाई खिलाने वाली थी। गाड़ी के भीतर से शोर होने लगा। हमने जल्दी से बची हुई रेज़गारी उस औरत के हवाले किया और गाड़ी में बैठकर चल दिए। मन में नैराश्य-भाव उग आया था।