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हे अमरनाथ के बाबा!
तू क्यों बर्फ़ की तरह जम गया है?
तेरे सामने, देखते ही देखते,
धर्म के नाम पर,
मानवता का रास्ता थम गया है।

तुम्ही ब्रह्मा, तुम्ही विष्णु
तुम्ही हो अल्लाह भी;
और तेरी ही है मसीहाई,
तुम्हारी इस बात पर
सबको है भरोसा,
कि यह धरती तुमने ही बनायी।

जंगल, जानवर और वहाँ का कानून
सब तुम्हारी ही करनी है।
तो क्या इस ख़ौफनाक ख़ता की सजा,
हम इन्सानों को भरनी है?

तुमने तो,
इन्सान के भीतर अपना अंश
डाला था!
तेरी किताबें कहती हैं,
इन्सान को
तूने बनाके अपना वंश
पाला था!

हे परम पिता परमेश्वर, तारणहार,
ऐ रसूल अल्लाह, परवरदिग़ार!
तेरी फितरत हम समझ क्यों नहीं पाते?
क्या है तेरा दीन-धरम,
खुलकर क्यों नहीं बताते?

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ये तसद्दुद, ये खूँरेज़ी,
ये रंज़ो-ग़म।
ये ज़मीन की लड़ाई, ये बलवा
क्या यही है धरम?

रोक ले इसे,
सम्हाल ले, अभी-इसी वक्त!
नहीं तो देख ले समय,
निकला जा रहा है कमबख़्त।

डरता हूँ,
कहीँ तेरा दामन,
उसकी पाक़ीज़गी
दागदार न हो जाये।
करने को तुझे सज़दा,
तेरी पूजा, तेरी अर्चना,
कोई
तमीज़दार न रह जाये।
(सिद्धार्थ)

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