वैसे तो जबसे खबरिया चैनेलों ने समाचार दिखाने के बजाय विज्ञापन बटोरने की होड़ में घटिया तमाशा, भूत-प्रेत, जादू-टोना, ग्रह-नक्षत्र, और बेडरूम के झगड़े इत्यादि पर कंसेण्ट्रेट करना शुरू कर दिया है तबसे मैने टी.वी. पर समाचार देखना लगभग बन्द सा कर दिया है, लेकिन शनिवार की शाम को भोजन के समय एक न्यूज चैनेल पर मेरी निगाह अटक ही गयी।

आइटम तो वही ‘स्टिंग ऑपरेशन’ वाला ही था; लेकिन यहाँ इस औंजार का शिकार किसी राजनेता, अभिनेता अथवा किसी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी को नहीं बनाया गया था। बल्कि इसके केन्द्र में एक आठ-नौ महीने की बच्ची की देखभाल कर रही नौकरानी थी। इस ऑपरेशन को अन्जाम देने वालों में भी कोई मीडिया वाला नहीं था। बल्कि, उस बच्ची की अपनी माँ थी, जो नौकरीशुदा होने के कारण अपनी दूधमुँही बच्ची को घर पर उस नौकरानी के भरोसे छोड़ कर जाती थीं। पतिदेव भी कहीं बड़े नौकर थे।

उस वयस्क उम्र की नौकरानी को दिखाया गया कि वह सारी ममता और दया को शर्मसार करती हुई किस प्रकार उस मासूम को चुप कराने के लिए थप्पड़ पर थप्पड़ रसीद करती जाती है, बिलख कर रोती हुई बच्ची की आवाज बन्द करने के लिए उसके मुँह में रबर की निप्पल जबरिया घुसेड़ देती है, और उसको एक मोटी सी चादर से पूरी तरह ढंक देती है। रोती हुई बच्ची उफ़नाकर चादर हटाती है तो फिर मार पड़ती है। प्रतिकार में वह अपने दम भर रोती है लेकिन अन्ततः थक कर सो जाती है। वह क्रूर औरत बच्ची को चुप कराने के बजाय मोबाइल पर बात करने को ज्यादा तरज़ीह देती है…। उस बच्ची की माँ का ये भी कहना था कि इस नौकरानी को घरेलू शिष्टाचार का अच्छा ज्ञान था। वह सबके सामने इसका प्रदर्शन करके विश्वासपात्र भी बन गयी थी। लेकिन माँ तो बस “माँ” होती है। उन्हें जाने कैसे शक हुआ और उन्होने यह हृदय विदारक ऑपरेशन कर डाला। अब उनके पास अफ़सोस है, और आँसू हैं…

यह सब देख-सुनकर मेरी पत्नी तो जैसे थर-थर काँपने लगीं। मेरी आठ वर्षीया बेटी भी उद्विग्न हो उठी। डेढ़ साल का बेटा तो मस्ती से सो रहा था, लेकिन उसकी माँ और दीदी के मन में उसके लिए जो एक डर बैठ गया उसे दूर करने के लिए मुझे काफ़ी परिचर्चा करनी पड़ी। याद दिलाना पड़ा कि मेरे बच्चे इस मामले में सौभाग्यशाली हैं कि उन्हें माँ-बाप, भाई-बहन, दादा-दादी, चाचा-चाची, ताऊ-ताई, मामा-मौसी आदि से युक्त संयुक्त परिवार का अपार स्नेह मिलता रहा है। घर छोड़कर नौकरी करने से थोड़ी अड़चन जरूर है। लेकिन वेतनभोगी नौकर के हाथ में उन्हे सौंपने की जरूरत नहीं आने वाली है। खैर…

अब, जब वे तीनों सो चुके हैं तो मेरे मन में कुछ सवाल उठ खड़े हुए हैं जिनका जवाब सीधा नहीं आ रहा है। एक सवाल मेरी पत्नी ने भी उठा दिया इसलिए शुरुआत उसी से करता हूँ।

उनका सवाल था कि उस महिला के स्थान पर यदि कोई पुरुष होता तो क्या वह भी उस अबोध के साथ ऐसा ही दुर्व्यवहार करता? मेरा जवाब था ‘पता नहीं’ लेकिन उनका मानना था कि कोई पुरुष शायद उस बच्ची को भले ही चुप नहीं करा पाता लेकिन वह ऐसा भी नहीं करता जैसा उस दुष्ट महिला ने किया।

यह विचार थोड़ा सब्जेक्टिव टाइप का है, इसलिए छोड़ते हैं। आप अपना विचार इसपर भी दे सकते हैं। लेकिन जो सवाल मुझे कचोट रहे हैं उनका यहाँ केवल जिक्र कर रहा हूँ। इनका जवाब हम मिलकर ढूँढेंगे:-

१.क्या एक सभ्य समाज के नाते हमें ऐसी व्यवस्था नहीं बनानी चाहिए कि एक मासूम को उसकी जीती-जागती माँ का वात्सल्य भरपूर मात्रा में मिल सके?

२.क्या पति-पत्नी दोनो का नौकरी करना इतना आवश्यक और अपरिहार्य हो गया है कि उसकी कीमत एक बच्चे को माँ की ममता से हाथ धोकर चुकानी पड़े?

३.जिस औरत को ममतामयी और दयालु कहकर महिमा-मण्डित किया जाता है क्या वह प्यार और ममत्व की सेवा (नौकरी) के बदले मजदूरी (वेतन) लेकर भी अपनी ड्यूटी न निभाते हुए इतनी क्रूर हो सकती है?

४.क्या वह पारम्परिक व्यवस्था जिसमें पति-पत्नी परिवार की गाड़ी के दो पहिए होते थे, जहाँ घर का पुरुष जीविका कमाकर बाहर से लाता था, और पत्नी घर के भीतर का प्रबन्ध संभालती थी; इतनी अनुपयुक्त और अधोगामी हो गयी है कि उसे पूरी तरह से त्याग कर काम के बंटवारे के बजाय काम में प्रतिस्पर्धा का वरण किया जाना अपरिहार्य हो गया है?

५.आज के उपभोक्तावादी समाज में कहा जाता है कि धनोपार्जन से ही सुख के साधन जुटाये जा सकते हैं। लेकिन क्या इस धन को ही सुख का एकमात्र साधन मान लेना हमें हमारे ‘साध्य’ से भटका तो नहीं रहा है? क्या इस आपा-धापी में धन ही हमारा साध्य नहीं होता जा रहा है?

६.नारी स्वतंत्रता और सशक्तिकरण के लिए उसका धनोपार्जन करना कितना जरूरी है? नारी की बौद्धिक जागृति के लिए नैतिक और मूल्यपरक शिक्षा अधिक महत्वपूर्ण और आवश्यक है कि उसकी आर्थिक सम्पन्नता के लिए तकनीकी शिक्षा?

७.स्त्री और पुरुष के बीच अन्योन्याश्रित सम्बन्ध ठीक हैं कि उनके बीच हर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा होना ठीक है। क्या स्त्री और पुरुष का आपस में प्रतिस्पर्धा करना प्रकृति-सम्मत भी है? ताजे ओलम्पिक खेलों में कुछ संकेत खोजे जा सकते हैं क्या?

८.परिवार का गठन कैसे हो? या, यही कि पारिवारिक जीवन कितना जरूरी है?

प्रश्न तो बहुत से बेतरतीब उमड़-घुमड़ रहे हैं, लेकिन अभी बस इतना ही। मैं इनपर आपके जवाब और टिप्पणियों की प्रतीक्षा करूंगा। इस संबंध में अपने मन की धारणाओं से भी आपको जरूर अवगत कराउंगा, अपनी अगली पोस्ट में।
(सिद्धार्थ)