हिन्दी भाषा सीखने का विज्ञापन उत्तरी भारत के शिक्षा केन्द्र इलाहाबाद से निकलने वाली पत्रिका में देखकर आप क्या सोचेंगे? मुझे तो थोड़ी हैरत हो रही है। …लेकिन रोमांच कहीं ज्यादा हो रहा है। क्योंकि आम बोल-चाल और चिठ्ठी-पत्री लिखने, अदालतों में प्रार्थना-पत्र आदि लिखने भर की हिन्दी तो हम यूँ ही जान लेते हैं। फिर ऐसा विज्ञापन क्यों…?

आजादी से पहले २०वीं सदी की शुरुआत में ऐसी स्थिति कतई नहीं थी। उसी समय हिन्दी भाषा में सरस्वती पत्रिका का प्रकाशन देश की साहित्यिक गतिविधियों का निरूपण करते हुए हिन्दी भाषा के विकास का साक्षी बन रहा था। इस प्रतिष्ठित पत्रिका के फरवरी-१९०१ के अंक के पृष्ठ आवरण पर छपा यह रोचक विज्ञापन देखिए। इस समय बाबू श्याम सुन्दर दास, बी.ए. इस पत्रिका के सम्पादक हुआ करते थे:

(स्पष्ट देखने के लिए चित्र पर चटका लगाएं)

विज्ञापन का मजमून इस प्रकार है:

सरकारी हुक्म है

कि पश्चिमोत्तर प्रदेश व अवध की सब अदालतों में हिन्दी जारी हो और सब अमले, वकील, मुख़तार, उम्मीदवार और अदालती लोग उर्दू के साथ-साथ हिन्दी पढ़ना लिखना भी सीखें।

आप हिन्दी जानते हैं?

जो न जानते हों तो सीखनी जरूर चाहिए। और जब सीखना ही है तो बाबू नन्दमल, एकस्ट्रा असिस्टन्ट कनसरवेटर, महकमें जंगलात, नैनीताल, की बनाई हुई

मुअल्लिम नागरी

से बढ़कर घर बैठे हिन्दी सिखाने वाली किताब दूसरी और पैदा नहीं हुई है। आप ही के लिए यह किताब छापी जा रही है। पहिली मार्च तक छप कर तैयार हो जाएगी। इसमें उर्दू और नागरी के हरूफ़ों में सरकारी अदालत और दफतरों की सब जरूरी बातें बहुत उमूदः तौर पर समझाई गई है । यह किताब घर बैठे बिना गुरूजी के आपको पण्डित बना देगी।

दाम सिर्फ आठ आने।

डाक महसूल अलग।

कुतुब फ़रोशों और दस जिल्द इकठ्ठा लेने वालों को कमीशन दिया जाएगा।

मिलने का पता-
मैनेजर इण्डियन प्रेस, इलाहाबाद