भारतवर्ष की हिन्दीभाषी गंगापट्टी जिसे कुछ विद्वान लोग गोबरपट्टी कहने में यथार्थवादी होने का सुख प्राप्त करते हैं; इसके दूरस्थ ग्रामीण इलाके शैक्षिक रूप से काफी पिछड़े हुए रहे हैं।

बनारस, इलाहाबाद, फैजाबाद, गोरखपुर और जौनपुर के विश्वविद्यालयों से सम्बद्ध अनेक महाविद्यालयों की स्थापना पूर्वी उत्तरप्रदेश के देहाती इलाकों में उच्च शिक्षा के लिए हुई है। इनमें नये-नये व्यावसायिक पाठ्यक्रम चलाकर नौकरी लायक शिक्षा को स्थानीय स्तर पर सुलभ कराने की कोशिश की जा रही है। इसमें आजकल बी.एड. का पाठ्यक्रम खासा लोकप्रिय हो चला है।

सर्वप्रथम स्नातक की उपाधि प्राप्त कर चुके विद्यार्थियों को कक्षा-०६ से कक्षा-१० तक के लिए शिक्षक बनने का कैरियर चुनने के लिए इस पाठ्यक्रम को बनाया गया था। लेकिन परवर्ती सरकारों ने इस उपाधि के धारकों को प्राइमरी स्कूल से लेकर महाविद्यालयों (digree colleges) तक में पढ़ाने का अवसर देने के निर्णय लिए हैं। इसका असर ये हुआ है कि सर्वाधिक नौकरी के अवसर खोलने वाली इस उपाधि के लिए भारी भीड़ लग रही है। लड़के-लड़कियाँ, आदमी-औरत, युवा-प्रौढ़ आदि सभी बी.एड. करने को प्रयासरत हैं।

अतः इसके लिए राज्यस्तरीय प्रवेश परीक्षा आयोजित होती है जिसमें कई लाख स्नातक भाग लेते हैं, इसमें जो अभ्यर्थी सफल होता है वह इस प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में जब पढ़ने जाता है तो वहाँ का माहौल कुछ ऐसा पाता है- 🙂

[चित्र http://www.usc.edu.ph से साभार ]

(यह एक सच्ची घटना पर आधारित उदाहरण है जो योगेन्द्र कुमार त्रिपाठीप्रशिक्षु शिक्षक ने अपने निजी अनुभव के आधार पर बतायी है।)

एक कक्षा बी.एड. की जिसमें हैं प्रशिक्षु
कुल ९८
महिलाएं १४
शादीशुदा १२
कुआँरी लड़कियाँ ०२
पुरुष ८४
शादीशुदा ४५
कुआँरे लड़के ३९
सबसे छोटी उम्र२४ वर्ष
सबसे बड़ी उम्र४२ वर्ष

कक्षा में एक चुटकुला जो एक उत्साही नौजवान छात्र ने सुना दिया

एक सरदार के तेरह बच्चे थे। उससे एक व्यक्ति ने पूछा- इस जमाने में भी इतने बच्चे? सरदार जी बोले- इसमें मेरा कोई कसूर नहीं, गलती सब मेरे ससुर की है। व्यक्ति चकराया, “वो कैसे?” सरदार ने साफ किया- “क्यूँ कि शादी के समय ससुर जी ने मुझसे जुबान लिया था कि मै उनकी बेटी को कभी खाली पेट न रखूँ।” 🙂
हा,हा,हा,हा…

इस पर बवाल हो गया। महिला प्रशिक्षुओं द्वारा आपत्ति 😦

सभ्यता संस्कृति की दुहाई
हूटिंग, हाय तौबा

पीड़ित चुटकुलेबाज द्वारा दुःखी होकर अपनी व्यथा एक कविता में डाल दी गयी
ये रही वो कविता 🙂

कल कक्षा में मुझसे एक छोटी सी बात हो गयी,
मैने यूँ ही कुछ कह दिया और इतनी बड़ी बात हो गयी
किसी ने सिखाया, किसी ने नैतिकता का पाठ पढ़ाया
किसी ने तो हद कर दी भाई
सभ्यता और संस्कृति का ऊँचाऊँचा पहाड़ दिखाया
लोगों की संवेदना जाग गयी
मैने सोचा चलो अच्छा हुआ भाई।
कम से कम लोगों में संवेदना तो आयी
किसी ने केवल प्रश्नचिह्न लगाया।
तो किसी की नाकनक्श और भौवें चढ़ आयीं
मैने तो केवल चुटकुला सुनाया था
लोगों को हँसाने का काल्पनिक बहाना बनाया था।
लेकिन ये लोगों की संस्कृति पर बन आयी।
मैने सोचा क्या इतनी बड़ी बात हो गयी
कल कक्षा में मुझसे एक छोटी सी बात हो गयी।

फिर आया महिलाओं का खेद प्रकाश

उन्हें अपने द्वारा की गयी हूटिंग पर सच में पछतावा हो गया -:(

फिर क्या था ?
उत्साह में फिर एक और कविता। ये रही:-

मेरी छोटी सी बात पर क्यूँ प्रश्न चिह्न लगाते हो
घर में क्या छुपछुप कर अश्लीलता में लजाते हो
कभी धर्म के नाम पर, कभी समाज के नाम पर
तुम तो हमेशा संस्कृति और सभ्यता चिल्लाते हो
मेरी छोटी सी बात पर क्यूँ प्रश्न चिह्न लगाते हो

तो तुमसे एक प्रश्न है मेरा
क्यूँ नहीं लोगों में मानवता फैलाते हो
जब चौराहे पर लुट रही किसी की मर्यादा तो
क्यूँ नहीं सब मिलकर होहल्ला मचाते हो?
तब तो अपने दामन को पाक साफ बचाते हो
मेरी छोटी सी बात पर क्यूँ प्रश्न चिह्न लगाते हो

माना कि मैने कुछ गलत कहा
तो क्यूँ नहीं तुम्ही सब सचसच बताते हो
बातों ही बातों में समता की बात चलाते हो
दुनिया भर की बातें हैं सोचने समझने को
तो फिर इस छोटी सी बात पर क्यूँ अटक जाते हो?
मेरी छोटी सी बात पर क्यूँ प्रश्न चिह्न लगाते हो?

अब तो हद ही हो गयी।

लेकिन महिलाओं ने बात बढ़ाना उचित नहीं समझा
बस माफी मांग ली।
माफ़ी दे दो भाई!
हमने आपत्ति ग़लत उठाई!
🙂 (।) ):
(प्रकरण समाप्त)

क्या कहेंगे इसे?

नारी की हार, शान्ति की चाह, वादविवाद से पलायन, या और कुछ??

अभी नारीवाद को लम्बा रास्ता तय करना है।?

(सिद्धार्थ)