शिक्षा विभाग में तैनात अधिकारी स्कन्द शुक्ला जो मेरे मित्र हैं, के मन की परेशानी एक अंग्रेजी के प्रतिष्ठित अखबार ने उन्ही के शब्दों में यहाँ छापी है। स्कन्द का मन अभी तक उलझन में है; क्योंकि सरकारी महकमें में काम करते हुए भी उन्होंने अपनी सामाजिक संवेदनाएं बचा कर रखी हुई हैं। नहीं तो, ग्रामीण भारत के पिछड़े समाज में सरकारी विकास योजनाओं के क्रियान्वयन के स्तर पर ऐसे विद्रूप तो कदम-कदम पर दिख जाते हैं।

कहानी कुछ यूँ है कि कुछ वर्ष पहले एक जिले की प्राथमिक शिक्षा को सवाँरने का जिम्मा देकर इन्हें वहाँ का आला हाकिम बना भेजा गया था। देश के विकास का मूल आधार शिक्षा है, तथा शिक्षा के विकास का मूल आधार प्राथमिक शिक्षा है; यह सोचकर देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान का अवसर जान स्कन्द ने जिले में जाकर खूब मेहनत की। सरकारी योजनाओं को पूरे नियम से लागू करने का बेड़ा जो उठा लिया था।

गाँव-गाँव में खुले प्राइमरी स्कूलों की अवस्थापना सुविधाओं को सुदृढ़ करने, स्कूलों में प्राथमिक शिक्षकों की उपस्थिति सुनिश्चित करने, गरीब छात्रों को निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें व यूनीफॉर्म तथा दोपहर का भोजन उपलब्ध कराने, विद्यालय भवनों की मरम्मत व नवनिर्माण कराने, स्कूल छोड़ चुके छोटे बच्चों का दुबारा नाम लिखाने, फिर भी छूटे रह गये बच्चों को अलग से पढ़ाने की व्यवस्था कराने, उनका स्वास्थ्य परीक्षण कराने आदि जैसी अनेक कल्याणकारी योजनाएं देशी और विदेशी आर्थिक अनुदान से चलायी जा रही हैं। प्रत्येक जिले में करोड़ों का बजट।

आप जानते ही हैं प्राथमिक शिक्षा को संवैधानिक अधिकार का दर्जा मिला हुआ है। यहाँ जमीनी हकीकत का व्यौरा देने कि कोई आवश्यकता नहीं है। आप जरूर जानते होंगे। स्कन्द की उलझन को स्पष्ट करने के लिए मैं यहा चर्चा करूंगा इन्हीं योजनाओं में से एक अति महत्वाकांक्षी और ‘सफल’ योजना का जिसे शिक्षामित्र योजना कहते हैं-

ग्राम पंचायतों में खोले गये प्राथमिक विद्यालयों में छोटे बच्चों को पढ़ाने के लिए उसी गाँव के निवासी तथा इण्टरमीडिएट तक की शिक्षा प्राप्त अभ्यर्थियों में से सर्वोच्च मेरिट वाले अभ्यर्थी को शिक्षामित्र के रूप में चयनित किया जाता है; जो संविदा के माध्यम से ग्यारह माह के मानदेय भुगतान के बदले अपनी सेवाएं विद्यालय में देता है।

शिक्षामित्र योजना का उद्देश्य यह है कि स्थानीय स्तर पर कम लागत में बच्चों को क, ख, ग,… पढ़ाने के लिए पर्याप्त संख्या में मानव संसाधन जुटाए जा सकें। सरकारी प्रशिक्षित अध्यापकों की भारी कमी और उनकी नियुक्ति पर आने वाले भारी व्यय की तुलना में राजकोष की पतली हालत को देखते हुए यह कामचलाऊ योजना अत्यन्त उपयोगी साबित हुई है। बल्कि आज आलम यह है कि प्राथमिक शिक्षा का सारा दारोमदार इन्हीं शिक्षामित्रों के कंधों पर टिका हुआ है।

सरकारी विभागों में कार्यरत एक चपरासी से भी कम पारिश्रमिक पाने वाला शिक्षामित्र ग्रामीण भारत के गरीब बच्चों के भविष्य की एकमात्र आशा की किरण बना हुआ है। विभाग से मोटी तनख़्वाह पाने वाले अन्य सरकारी प्राथमिक शिक्षकों के ऊपर सरकार ने शिक्षण कार्य से इतर अनेक जिम्मेदारियाँ डाल रखी हैं। नये स्कूल भवनों का निर्माण कार्य, शिक्षा सम्बन्धी योजनाओं का प्रचार-प्रसार, सूचना संकलन, सर्वे, पल्स पोलियो, मीटिंग, गोष्ठी, अधिकारियों का दौरा, आवभगत, वेतन बिल का भुगतान और नेतागीरी। उन्हें इन सभी जिम्मेदारियों को पूरा करने का ही समय नहीं मिल पाता। बेचारे क्या करें…? शिक्षामित्र को स्कूल की चाभी देकर निकल लेते हैं।:)

…तो शिक्षामित्र के रूप में चयन के लिए बेरोजगारों की लम्बी फौज एकदम से टूट पड़ी। गाँव में अपने घर पर रहते हुए जो हार मान कर छिपी हुई बेरोजगारी से तालमेल बिठा चुके थे; उन्हें भी घर बैठे एक अवसर मिल गया। इण्टर तक पढ़ाई कर चुके वे नौजवान हों जो श्रम आधारित रोजगार की तलाश में बाहर भटक रहे थे, अथवा घरों के भीतर चूल्हे-चौके में अपनी नियति तलाश चुकी बहुएं हों या शादी की प्रतीक्षा में दिन काट रही बेटियाँ; सबको इस लम्बी कतार में देखा जा सकता था। सबने बक्से और आलमारी में छिपा कर रखे अपने अंकपत्र बाहर निकाल कर छाड़-पोंछ लिए और आवेदन ग्राम-प्रधान जी को प्रस्तुत कर दिया।

शुरुआती दौर में तो हाई स्कूल और इण्टर के अंकों को मेरिट में शामिल किया गया। बाद मे कुछ अधिमानी (preferential) योग्यताएँ निर्धारित की गयी। आरक्षण के नियम भी लागू हुए। ग्राम शिक्षा समितियों ने चयन में धाँधली शुरू की तो इसे जिला स्तर पर समिति गठित करके जिलाधिकारी के सर्वोच्च नियन्त्रण में सौंप दिया गया।

लेकिन मूल बात यह है कि यह नौकरी गाँव के ही अभ्यर्थी को उसके गाँव में ही मिलनी है। इसकी चयन प्रक्रिया की शुरुआत गाँव स्तर से ही होनी है। वहीं से सभी आवेदकों की सम्मिलित वरीयता सूची (merit list) शीर्षस्थ अभ्यर्थी के चयन के प्रस्ताव के साथ जनपदीय समिति के अनुमोदन के लिए भेजी जाती है।

यह प्रक्रिया देखने में जितनी सरल लगती है, व्यवहार में उतनी ही कठिनाई पैदा करने वाली है। हर कदम पर धाँधली और बेईमानी का प्रयास होता है। इसीलिए सम्बन्धित अधिकारी को उसी अनुपात में सजग और सतर्क रहना पड़ता है। क्रमशः सारी प्रक्रिया को इतना पारदर्शी बनाने की कोशिश की गयी है कि धाँधली और फर्जीवाड़ा करना बहुत मुश्किल हो गया है। लेकिन तू डालडाल मैं पातपात वाला खेल यहाँ खूब चलता है।

चित्रकृति : The Times of India से साभार

इस प्रकरण में जिस लड़की का जिक्र किया गया है, वह ग्राम पंचायत की मेरिट सूची में प्रथम स्थान पर थी। लेकिन उसके चयन का प्रस्ताव गाँव से भेजा नहीं जा रहा था। मेरिट सूची में दूसरे स्थान पर जो लड़का था, उसे अपना चयन कराने के लिए किसी भी तरीके से उस लड़की को अनर्ह (disqualified) घोषित कराना था।

उसे नियमों में सेंध लगाने का एक रास्ता हमारी उस सामाजिक व्यवस्था में मिला जिसके अनुसार लड़की का विवाह हो जाने के बाद वह हमेशा के लिए अपने पति के घर की हो जाती है। मायके में उसका अपना कोई अधिकार नहीं बचता। अपने ही माँ-बाप के पास वह केवल मेहमान बनकर आती है। वह तब वहाँ की निवासिनी नहीं रह जाती।

शिक्षामित्र की पहली शर्त है कि अभ्यर्थी उसी ग्राम-सभा का स्थाई निवासी हो। उस लड़की ने जब आवेदन किया था तो उसी गाँव की निवासी थी; लेकिन जब मेरिट लिस्ट बनायी जा रही थी तभी उसका विवाह हो गया। विवाह से एक साल के भीतर उसका गवना होना था; अर्थात् उसे अपनी ससुराल चला जाना था। ( ग्रामीण समाज में अभी भी विवाह के तत्काल बाद विदाई का रिवाज नहीं है।)

वह लड़की जनपदीय कार्यालय में यह शिकायत करने गयी थी कि भ्रष्ट SDI (Sub-deputy Inspector of School) जिसे डिप्टी साहब कहा जाता है, द्वारा उसके चयन का प्रस्ताव जानबूझकर जिले पर अनुमोदन के लिए नहीं भेजा जा रहा था। यह इसलिए कि उसका गवना हो जाने पर वह दूसरे स्थान वाले को चयनित करा सके। जबकि वह इस अवसर का लाभ उठाकर अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी। इस संवेदनशील अधिकारी ने उस SDI को पत्रावली और चयन प्रस्ताव के साथ अगले दिन कार्यालय तलब कर लिया। लड़की की उम्मीदें बलवती हुईं। वह प्रसन्न होकर घर लौट आयी।

शाम को ऑफिस से घर आने पर इस अधिकारी को अपने दरवाजे पर उसी लड़की का बाप हाथ जोड़े प्रतीक्षा करता मिला। असमय निवास पर आने का कारण पूछने पर उसने विनय पूर्वक बताया कि अपनी बेटी का चयन रोकने का प्रयास वह स्वयं कर रहा है, डिप्टी साहब नहीं। उसी ने उसके विवाहित होने की सूचना लिखकर उन्हें भेंजी है ताकि उसका नाम मेरिट सूची से हटा लिया जाय।

विस्मित होकर स्कन्द ने जब इस अप्रत्याशित फैसले का कारण पूछा तो उस गरीब ने अभयदान का आश्वासन पाने के बाद जो रहस्य खोला वह विचलित कर देने वाला था-

“साहब, …मुझ गरीब के लिए बेटी की नौकरी से अधिक जरूरी उसका गवना कराना है, जिससे मेरी इज्जत पर दाग न लगे। गवना का खर्चा मुझे उसी लड़के ने दिया है जो दूसरे नम्बर पर आया है…।”

स्कन्द के लिए अब फैसला लेना अत्यन्त कठिन हो गया; लेकिन अगले दिन सुबह-सुबह ऑफिस पहुँचने पर उन्हें अपने ट्रान्सफर का आदेश सबसे पहले मिला और कोई निर्णय लिए बिना उन्हें वहाँ से छुट्टी मिल गयी। (अकस्मात्‌ स्थानान्तरण की कहानी फिर कभी…)

स्कन्द के मन में अनिर्णय की स्थिति अभी भी बनी हुई है, और उलझन भी…। आप बताइए, आप क्या निर्णय लेते?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)