यूँ तो मैं पिछले सोलह वर्षों से मंगल व्रत प्रायः अनवरत रहता आया हूँ, लेकिन कभी भी इसका उद्देश्य भूखा रहकर हनुमान जी की उपासना करना नहीं रहा। बस बजरंग बली के बहाने रुटीन से थोड़ा अलग, हल्का और नमक रहित मीठा भोजन करने और कम से कम एक दिन मनसा, वाचा, कर्मणा सात्विक व्यवहार का अभ्यास हो जाता है। किसी खास पर्व, त्यौहार, या पारिवारिक आयोजन में आवश्यक होने पर व्रत भंग करने की अनुमति भक्तशिरोमणि अंजनीकुमार से ले ही लेता हूँ।

कल मंगलवार को भी सुबह-सुबह अपने पिछवाड़े से तोड़े हुए पपीते और अमरूद का भरपेट नाश्ता करने के बाद मेयो हाल (स्पोर्ट्स स्टेडियम) गया था। वहाँ से लौटकर आने के बाद इतना ही समय बचता है कि जल्दी-जल्दी नहा-धोकर ऑफिस चला जाऊँ। लेकिन अखबारों में भारत की आस्ट्रेलिया पर टेस्ट श्रृंखला की विजय के समाचार, लेख और विशेषज्ञों की राय पढ़ने में उलझ गया। क्रिकेट की खबरें पढ़ना मेरी कमजोरी रही है। उसपर भी, यदि मामला भारतीय जीत का हो तो क्या कहना…!

श्रीमती जी ने दर्जनों बार याद दिलाया; “जल्दी तैयार होकर ऑफ़िस जाइए… आपके बुजुर्ग (पेंशनर) इन्तजार कर रहे होंगे। …लगता है, आज ‘सुन्दरकाण्ड’ फिर छोड़ देंगे”

अन्ततः हड़बड़ाकर उठता हूँ… जल्दी-जल्दी शरीर पर गुनगुना पानी उड़ेलता हूँ… नहाने की रस्म पूरी करके तौलिया लपेटे मन्त्र बुदबुदाते हुए पूजा स्थल पर जाकर हाथ जोड़ लेता हूँ…

क्लीं मर्कटेश महोत्साह सर्व व्याधि विनाशन।
शत्रून् संहर माम् रक्ष श्रियंदापय देहिमे क्लीं ॐ॥

पूजा का ‘मीनू’ एडिट हो लेता है… पवनसुत से ‘सुन्दरकाण्ड’ न पढ़ पाने के लिए क्षमा मांगते हुए ‘हनुमान-चालीसा’ से काम चलाने की विनती कर लेता हूँ। …खूँटी पर से जो कपड़ा पहले प्रयास में हाथ लग जाता है उसे ही देह पर चढ़ाते हुए पत्नी को पुकार लगाता हूँ-

“सुनती हो जी, मुझे एक रुमाल दे दो, बहुत देर हो गयी है।”

“सुन रही हूँ जी, …लेकिन पहले फलाहार तो ले लीजिए …मेज पर लग गया है।”

मेज पर रखी प्लेट में छितराये हुए सिंघाड़े के हलवे से उठती भाप देखता हूँ…। उई… इतना गर्म है कि मुँह जल जाय, और ठण्डा करके खाने में तो पन्द्रह मिनट लग जाएंगे…। तबतक तो वहाँ ऑफिस में घमासान हो जाएगा… दादाजी लोग मेरे चैम्बर को अपनी छड़ियों पर उठा लेंगे। …और इधर आजका ये हलवा भी कितना बेस्वाद और गीला दिख रहा है।

…जबसे मैने श्रीमती जी को आराम देने के लिहाज से एक भोजन बनाने वाली रख लिया है, तबसे उनके हाथ की ‘स्पेशल डिशेज’ खाने के लिए तरसना पड़ता है। खाना तो यह भी ठीक ही बनाती है, लेकिन उनके हाथ का जायका फिर भी नहीं मिलता है। और व्रत के लिए स्पेशल वैसा हलवा तो दूसरा कोई बना ही नहीं सकता। अच्छी तरह भुना हुआ, ब्राउनिश कलर का शुष्क, मीठा और सुगन्धित… देखते ही खाने को जी ललचाए।

…एकाएक मेरा मन चिढ़ गया। क्या एक दिन के लिए भी ‘किचेन’ में नहीं जाना चाहिए इन्हें? मैने तुनककर कहा-
“ये हलवा तो मैं नहीं खाऊंगा। कितना गीला और बदरंग लग रहा है… छिः”

मैं जल्दी-जल्दी जूते का फीता बाँधने लगा। श्रीमती जी के चेहरे पर परेशानी के भाव स्पष्ट उग आये थे, करें तो क्या करें…। नन्हे ‘सत्यार्थ’ ने इतना समय ही नहीं दिया था कि ‘किचेन’ में जाकर देख लें कि हलवा ठीक बन रहा है कि नहीं। मैं उठकर चलने को हुआ तो रास्ता रोककर खड़ी हो गयीं-

“हटो,… मुझे जाने दो, देर हो चुकी है।”

“खाकर जाना पड़ेगा… मेरे हाथ से”

नहीं-नहीं, मैं ये नहीं खा पाऊंगा… देर हो रही है”

“देर हो रही है, या हलवा खराब है?”

“…जो भी समझ लो”

“नहीं, आप खा लीजिए… आपको भूख लग जाती है।”

“नहीं लगेगी, पपीता खाया था सबेरे नाश्ते में”

“ना…, खाना ही पड़ेगा… बस दो चम्मच”

“छोड़ो भी, …मुँह का स्वाद खराब हो जाएगा…”

“प्लीज, बस दो चम्मच…”

अब लगता है, छुटकारा नहीं मिलेगा। बेबस होकर दो बार मुँह से हलवे का चम्मच लगा लेता हूँ…। मन में सन्तुष्टि नहीं आ पाती है… हम दोनो के ही…।

मैं लगभग भागता हुआ दफ़्तर में दाखिल होता हूँ। घर से मात्र दो सौ मीटर की दूरी पर ऑफिस है। …मुझे अपने ही कक्ष में घुसने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है। पूरा कमरा पेंशनरों से भरा हुआ है। सभी के हाथ में जीवित होने का प्रमाण-पत्र है। सबको मेरी प्रतीक्षा है। कुछ ऐसे भी हैं जो खड़े नहीं रह सकते, इसलिए फर्श पर ही बैठ गये हैं। अर्दली उन्हें पंक्तिबद्ध खड़ा करने में असफल हो चुका है।

मुश्किल से रास्ता बनाकर अपनी कुर्सी तक पहुँचता हूँ… बैठकर कलम खोलता हूँ… सबको लाईन से आने के लिए कहता हूँ… सभी एक साथ अपना-अपना पर्चा मुझे पकड़ाने के लिए उमड़ प्ड़ते हैं… मैं कलम बन्द कर लेता हूँ।

“जबतक आपलोग लाईन नही बना लेंगे, तबतक मैं किसी का कागज नहीं लूंगा।”

दो मिनट के भीतर मेरी दाहिनी ओर दो पंक्तिया आकार ले लेती हैं- एक महिलाओं की, और दूसरी पुरुषों की। तेजी से काम शुरु होता है। एक वरिष्ठ कर्मचारी मेरे सहयोग में आ चुका है। लाईन अनुशासित होकर सरक रही है।


तभी मेरे पीछे से चक्कर काटकर मेरी बायीं ओर आयी एक महिला का स्वर उभरता है-
“सर! … …”

मुझे सिर उठाने की फुरसत नहीं है। मन में झुझलाहट होती है। थोड़ी देर बाद फिर वही आवाज…
“अरे साहब, इधर भी देख लीजिए…”

मैं अचकचा कर उधर देखता हूँ। “अरे! …तुम यहाँ?”

मेरी निगाह झेंप जाती है। अपनी पत्नी को इस रूप में दफ़्तर में सबके सामने देखकर समझ नहीं पाता कि क्या करूँ। लेकिन पलक झपकते ही वे एक डिब्बा मेज पर रखकर कमरे से ओझल हो जाती हैं। मेरा अर्दली भी माजरा समझ नहीं पाता है।

मेरे आगे कई परचे बूढ़े हाथों में लटके दिख रहे हैं। मेरी कलम फिर अपना काम आगे बढ़ाने लगती है।

हाथ यन्त्रवत् अपना काम कर रहे हैं… लेकिन मन में पुरानी फिल्मों का ग्रामीण दृश्य घूम जाता है…। खेतों में हल चला रहे किसान की पत्नी दोपहर में ‘नहारी’ लेकर खेत में आती है। कपड़े में बँधी रोटियों की थाली और घड़े का पानी…। …गोबर और धनिया। …यहाँ परिवेश आधुनिक है …पर सोचने में अच्छा लगता है तो हर्ज ही क्या है?

लाईन धीरे-धीरे छोटी होती जाती है। आखिरी बुजुर्ग को निपटाने के बाद डिब्बे पर हाथ रखता हूँ। अभी भी गरम है…। शायद ‘एल्यूमिनियम फ़ॉएल का प्रयोग हुआ है। अर्दली इशारा पाकर पीछे वाले कमरे (retiring room) में पानी लगा देता है।

डिब्बे का ढक्कन खोलने पर वहाँ फैलने वाली सुगन्ध बता देती है कि इसे रचना ने जरूर अपने हाथों से बनाया होगा…।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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