मेरी पिछली पोस्ट पर टिप्पणी देते हुए कार्तिकेय ने सत्यार्थ को जन्मदिन की शुभकामना दी है। जी हाँ, पिछले छः दिसम्बर को सत्यार्थ (मेरा बेटा) दो साल का हो गया। इस बार पारिवारिक रीति से सादगी पूर्वक जन्मदिन याद किया गया। हाँलाकि दिनभर ‘हैप्पी बर्डे’ और ‘थेंकू’ की रटंत होती रही, लेकिन नये कपड़े, खिलौने और चाकलेट की खुशी छोड़ दें तो उस मासूम को इस दिन में नया कुछ भी नहीं लगा होगा। रोज ही कुछ नये शब्द सीख रहा है। उसी कड़ी में ये शब्द भी उसके शब्दकोश में जुड़ गये होंगे।

अलबत्ता उसकी बड़ी बहन वागीशा अधिक उत्साहित थी। साढ़े आठ साल की उम्र में उसे यह बताना कि यह वक्त पार्टी लायक नहीं है, मुझे गैर-जरूरी लगा। उसकी अपेक्षा के अनुरुप घर में ही कुछ पारिवारिक मित्रों व उनके बच्चों को बुला लिया गया, और पार्टी भी हो ली। सत्यार्थ को टीका लगाने की औपचारिकता और भगवान की पूजा भी घर के मन्दिर में ही की गयी। कहीं बाहर जाकर घूमने का मन नहीं हुआ।

सत्यार्थमित्र पर भी इसकी तत्समय चर्चा करने का मन नहीं हुआ। उस दिन मुम्बई के आतंकी हमलों के बाद बने राष्ट्रीय परिदृश्य में बाबरी मस्जिद की बरसी पर सारा देश सहमा हुआ सा किसी बुरी घटना की आहट पर कान लगाए बैठा था। मेरे मन में भी यही कुछ चल रहा था। मेरी धर्मपत्नी ने भी इसे भाँपकर चुप्पी लगा ली थी।

मेरे गुरुदेव ज्ञान जी भी एक मालगाड़ी के पटरी से उतर जाने पर अचानक व्यस्त हो गये और नहीं आ सके।

मेरे मन में भारतवर्ष की बेचारगी टीस रही थी। कुछ विक्षिप्त नौजवानों द्वारा धर्म की अफीम खाकर मानवता को जार-जार करते हुए कथित तौर पर चन्द रूपयों से अपने परिवार की दरिद्रता मिटाने के लिए जो आपराधिक कुकृत्य किया गया था, उसका असर दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र और एक सम्प्रभु राष्ट्र की अस्मिता पर प्रश्नचिह्न लगाने वाला हो चुका था। साठ साल पहले जो हमें छोड़कर धर्म के आधार पर अलग हो गये वही आज फिर से हमारी छाती चीरने के लिए गोलबन्द होकर हमले कर रहे हैं, और हम कातर होकर दुनिया के चौकीदारों से गुहार कर रहे हैं।

इसी मनःस्थिति में मैने पिछली पोस्ट में यह बात रखी कि “हम अक्षम हैं… इसलिए बेचैन हैं…।” इसपर प्राप्त टिप्पणियों से यह बात और पुष्ट होती गयी। आदरणीय ज्ञानजी, समीर जी, अभिषेक जी, और राजभाटिया जी भी इसी मत के मिले। श्रद्धेय डॉ. अमर कुमार ने एक एतराज दर्ज तो किया लेकिन वह भी केवल सही शब्द के चयन को लेकर था। वस्तुतः वह भी अक्षमता को स्वीकार करते हैं।

मेरे प्रिय कार्तिकेय भारतीय संविधान में अपनी श्रद्धा को अभी भी अक्षुण्ण रखने के पक्षधर लगे। उन्हें इसमें कोई कमी नजर नहीं आती। वे लिखते हैं कि-

…इस निष्क्रियता के लिए संविधान को जिम्मेदार ठहराना अनुचित होगा.गलती संविधान की धाराओं में नही, बल्कि उनके स्वयंसिद्ध इंटरप्रेटशंस की है. ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार हमारी धर्मान्धता और कट्टरता के लिए उदारवादी वेदों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.

मेरे विचार से आवश्यकता संविधान में परिवर्तन की नहीं, अपितु उसको क्लेअर -कट परिभाषित करने की है….

यानि कि सुस्पष्ट परिभाषा की आवश्यकता अभी बनी हुई है। मेरा मानना है कि जिस चुनावी प्रणाली से जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा, लिंग और अगड़े – पिछड़े की संकुचित राजनीति करने वाले, भ्रष्ट, माफिया और लम्पट किस्म के जनप्रतिनिधि चुनकर सत्ता के गलियारों को दूषित करने पहुँच जा रहे हैं; और फिर भी इस प्रणाली को संविधान सम्मत मानना हमारी मजबूरी है, तो कुछ तो सुधार करना ही पड़ेगा।

चुनावों में मोटे तौर पर १०० मतदाताओं में से १०-१२ का वोट पाने वाला प्रत्याशी सत्ता की कुर्सी पर काबिज हो जाता है। क्योंकि ५०-५५ लोग तो वोट डालने जाते ही नहीं और ३०-३५ लोगों के वोट दर्जनों अन्य प्रत्याशी आपस में बाँट कर हार जाते हैं। इसी कारण से नेता जी लोग एक खास सीमित वर्ग के वोट जुटाने लायक नीतियों की खुलेआम अभ्यर्थना उन्हें खुश करने के लिए करते हैं, और साथ ही अन्य वर्गों के बीच आपसी कटुता और वैमनस्य के बीज बोते जाते हैं। आज के एक अत्यन्त लोकप्रिय और सफल केन्द्रीय मन्त्री जो पहले मुख्यमन्त्री रह चुके हैं, उन्होंने तो अपने वोटरों को निरन्तर पिछड़ेपन और अशिक्षा के दलदल में फँसाये रखने की नीति की लगभग घोषणा ही कर रखी थी। उन्हें बिजली, सड़क, पानी, शिक्षा और अखबार की पहुँच से सायास दूर रखने की मानो नीति ही लागू थी।

दुनिया में ऐसी चुनाव प्रणालियाँ भी हैं जहाँ जीतने के लिए कम से कम ५० प्रतिशत वोट पाना आवश्यक है। सभी मतदाताओं के लिए अपना मत डालना अनिवार्य है, न डालने पर जुर्माना है। कदाचित्‌ मतपत्र में एक विकल्प सभी प्रत्याशियों को नकारने का भी है। क्या भारत में ऐसा हो जाने के बाद भी राजनेता अपनी छवि संकुचित दायरे में बना कर सफल हो पाएंगे? आज विडम्बना यह है कि देश में एक सच्चे जननायक और सर्वप्रिय नेता का अकाल पड़ा हुआ है। बहुत से माननीय सांसदों और विधायकों की प्रोफाइल देखकर सिर शर्म से झुक जाता है।

एक बार जैसे-तैसे चुन लिए जाने के बाद बड़े से बड़ा अपकृत्य करने का और बच निकलने का लाइसेन्स इनके हाथ लग जाता है। संविधान में जो दायित्व दिये गये हैं उनके प्रति इनमें कोई जवाबदेही नहीं दिखायी देती। यह देश के भाग्य भरोसे है कि माननीय इसे किस रसातल तक ले जाकर छोड़ने को तैयार हैं। इश्कबाजी में उपमुख्यमन्त्री बरखास्त होते हैं। नौबत ये है कि संसद भवन से तिहाड़ आने-जाने का ट्रैफिक बढ़ता जा रहा है। कुछेक जो पढ़े-लिखे और जिम्मेदार वहाँ पहुँच भी जा रहे हैं उनके हाथ किसी अयोग्य मालिक के आगे जुड़े ही रहते हैं, और बँधे भी।

स्कन्द शुक्ला अपनी अंग्रेजी टिप्पणी में सवाल करते है कि यदि यह हमला किसी निम्नवर्गीय स्थल पर हुआ होता तो भी क्या ऐसी ही प्रतिक्रिया देखने को मिलती। रेलवे स्टेशन और कामा हॉस्पिटल पर भी हमले हुए लेकिन जितने टीवी कैमरे पंचसितारा होटलों पर फोकस किए गये उतने बाकी जगहों पर नहीं थे। इस बार शायद मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग को आतंकी खतरे का अनुभव कुछ ज्यादा ही हो गया है। आशा की जानी चाहिए कि उनके इस गुस्से का प्रस्फुटन चुनावों के समय अधिक मतदान के रूप में सामने आयेगा। उनका प्रश्न यह भी है कि हम अपनी ही चुनी हुई सरकार की आलोचना क्यों कर रहे हैं। इन्हें हमलों के बाद हुए मतदान के आँकड़े कुछ आशा बँधाते हैं कि शायद मध्यम वर्ग अपनी दोपहर की मीठी नींद से जाग रहा है।

लेकिन मुझे फिलहाल कोई आशा नहीं नजर आती। क्योंकि इस प्रकार के संकट से निपटने में हमारी कमजोरी सिर्फ एक मोर्चे पर नहीं है। इसका प्रसार चारो ओर है। कार्यपालिका की मानसिक दृढ़ता में कमजोरी, न्यायपालिका की जायज-नाजायज सीमाएं, विधायिका की अयोग्यता, भू-राजनैतिक परिस्थितियाँ, भौगोलिक स्थिति, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, राजनैतिक शासन प्रणाली, धार्मिक विश्वास और परम्परा, सामाजिक संघटन (composition of society ), निकम्मा राष्ट्रीय नेतृत्व, क्षीण इच्छा शक्ति, सर्वव्यापी भ्रष्टाचार, चारण-संस्कृति… दुष्ट, लापरवाह और पतनशील पड़ोसी। कहाँ तक गिनाऊँ… सूची अनन्त है।

फिर तो हमें बड़े परिवर्तन के लिए कमर कसना होगा। चलते-चलते ये पंक्तियाँ मन में मचल रही हैं, सो लिख ही देता हूँ।

सबने मिलबैठकर ये जान लिया,
मर्ज़ क्या है इसे पहचान लिया।
अब तो बस खोजनी दवाई है;
वो भी मिल जाएगी जो ठान लिया॥

(सिद्धार्थ)

पुनश्च :
कुछ टिप्पणियों के स्नेह और आशीष से प्रेरित होकर वागीशा और सत्यार्थ की एक तस्वीर लगा रहा हूँ। आप सबके स्नेह का शुक्रिया।