आम बोलचाल की भाषा में गालियों के प्रयोग के बहाने एक चर्चा चोखेर बाली पर छिड़ी। दीप्ति ने लूज शंटिंग नामक ब्लॉग पर दिल्ली के माहौल में तैरती गालियों को लक्ष्य करके एक पोस्ट लिखी थी। इसपर किसी की मौज लेती प्रतिक्रिया पर सुजाता जी ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि,

“ जब आप भाषा के इस भदेसपने पर गर्व करते हैं तो यह गर्व स्त्री के हिस्से भी आना चाहिए। और सभ्यता की नदी के उस किनारे रेत मे लिपटी दुर्गन्ध उठाती भदेस को अपने लिए चुनते हुए आप तैयार रहें कि आपकी पत्नी और आपकी बेटी भी अपनी अभिव्यक्तियों के लिए उसी रेत मे लिथड़ी हिन्दी का प्रयोग करे और आप उसे जेंडर ,तमीज़ , समाज आदि बहाने से सभ्य भाषा और व्यवहार का पाठ न पढाएँ। आफ्टर ऑल क्या भाषा और व्यवहार की सारी तमीज़ का ठेका स्त्रियों ,बेटियों ने लिया हुआ है?”

इस प्रतिक्रियात्मक पोस्ट में जो भाषा प्रयुक्त हुई उससे यह लगा कि जैसे पुरुषों ने किसी कीमती चीज पर एकाधिपत्य करके महिलाओं के साथ बेईमानी कर ली हो। जैसे इन्होंने गाली के प्रयोग का विशेषाधिकार लेकर लड़कियों और महिलाओं को किसी बड़े सुख से वंचित कर दिया हो। …यह भी कि अब आधुनिक नारियाँ अपने इस लुटे हुए अधिकार के लिए ताल ठोंककर खड़ी होने वाली हैं।

उम्मीद के मुताबिक जो प्रतिक्रियाएं आयीं उनमें लड़कियों को यह अवगुण अपनाने से मना करने के स्वर ही बहुतायत थे। प्रायः सबने यही कहा कि यह बुराई जहाँ है वहाँ से खत्म करने की बात होनी चाहिए न कि समाज का जो हिस्सा इससे बचा हुआ है उसे भी इसमें रस लेना प्रारम्भ कर देना चाहिए।

लेकिन सुजाता जी ने अपनी यह टेक कायम रखी कि यदि मात्र स्त्री होने के कारण हमें उन कार्यों से वर्जित रखा जाता है जिन्हें पुरुषों को करने की छूट प्राप्त है तो यह सोच का दोगलापन है। इसी दोगलेपन को दूर भगाने के लिए गाली का प्रयोग स्त्री-पुरुष दोनों के लिए समान रूप से स्वीकार्य या अस्वीकार्य होना चाहिए। यानि जबतक पुरुष इसका प्रयोग बन्द नहीं करते तबतक स्त्रियों को भी इसका प्रयोग सहज रूप से करने का हक बनता है।

इसे जब मैने एक मित्र को बताया तो वह तपाक से बोला कि मैं तो जाड़े की धूप में नंगे बदन सरसो का तेल लगाकर बाहर लान में बैठता हूँ, और कभीकभार शहर की अमुक बदनाम गलियों में होने वाले इशारों को देखकर मुस्कराता हुआ उस बाजार का साइकिल से चक्कर लगा आता हूँ। तो क्या ये लड़कियाँ भी यह छूट लेना चाहेंगी।

सुजाता जी के इस दृष्टिकोण में वास्तविक समाधान के बजाय मात्र नकारात्मक उग्र प्रतिक्रिया की प्रधानता से असहमत होते हुए तथा घुघूती बासूती जी की अर्थपूर्ण टिप्पणी से सहमत होते हुए इस ब्लॉग पोस्ट पर मैने यह टिप्पणी कर दी –

@वैसे बेहतर तो यह होगा कि हम पुरुषों के रंग में रंगने की बजाए पुरुषों को अपने रंग मे रंग दें। बात अति आशावादी तो है परन्तु असम्भव भी नहीं।
घुघूती बासूती
इस चर्चा की सबसे सार्थक बात यही है।
सुजाता जी,
आपसे यह विनती है कि सभ्यता और संस्कृति के मामले में यदि महिलाओं को पुरुषों से आगे दिखाने वाली कुछ बातें स्वाभाविक रूप से सबके मन में बैठी हुई हैं तो उन्हें ‘दोगलापन’ कहकर गाली की वस्तु न बनाइये।
वस्तुतः यह सच्चाई है कि अश्लील शब्द पुरुष की अपेक्षा महिला के मुँह से निकलने पर अधिक खटकते हैं। केवल हम पुरुषों को नहीं बल्कि असंख्य नारियों को भी। लेकिन मैं इसे दोगलापन कहने के बजाय महिलाओं की ‘श्रेष्ठता’ या पतन की राह में न जाने का सूचक कहूंगा।
स्त्री सशक्तीकरण के जोश में पुरुषों से गन्दी आदतों की होड़ लगाना कहीं से भी नारी समाज को महिमा मण्डित नहीं करेगा। गाली तो त्याज्य वस्तु है। इसमें कैसी प्रतिद्वन्द्विता?

गाली देनी ही है तो गाली को ही गाली दीजिए। 🙂

लेकिन इसकी प्रतिक्रिया में सुजाता जी ने मेरी सोच को ही दोगला बता दिया क्योंकि उन्हें यह बात मानने के लिए वैज्ञानिक तर्क की दरकार है कि अश्लील शब्द पुरुष की अपेक्षा महिला के मुँह से निकलने पर अधिक खटकते हैं।

मैने यह तो कहा नहीं था कि पुरुष के मुँह से निकलकर गालियाँ अमृतवर्षा करती हैं और केवल लड़कियों और महिलाओं के मुँह से निकलकर ही आपत्तिजनक होती हैं। मात्र अपेक्षया अधिक खटकने की बात कहा था मैने जिसके लिए मुझे दोगलेपन के अलंकार से विभूषित होना पड़ा।

मैं ठहरा एक सामान्य बुद्धि का विद्यार्थी। हिन्दी शब्दों और वाक्यों का वही अर्थ समझता हूँ जो स्कूल कॉलेज की किताबों में पढ़ पाया हूँ। लेकिन निम्न सूचनाएं मुझे अपनी अल्पज्ञता का स्मरण दिला रही हैं।

बकौल सुजाता जी-

…“भाषिक व्यंजना को समझने मे आपसे भूल हो रही है ।”…

…“आप अपनी बेटी को जो चाहे वह शिक्षा दें , जब वह बाहर निकलेगी तो बहुत सी बातें स्वयम सीख लेगी, जीना तो उसी ने है दुनिया में”…

…“आप पोस्ट का तात्पर्य सिरे से ही गलत समझ रहे हैं और मै आपसे किसी तरह सहमत नही हो पा रही हूँ ।”…

…“हमारी दिक्कत यह है कि जब तक आप चोखेर बाली को देखने समझने के लिए एक वैकल्पिक सौन्दर्य दृष्टि या आलोचना दृष्टि नही लायेंगे तब तक आप यही सोचते रहेंगे कि सुजाता या अनुराधा या वन्दना या कोई भी चोखेर बाली समाज को तोड़ने और स्त्री के निरंकुश ,बदतमीज़,असभ्य हो जाने की पक्षधर हैं।”…

चलिए गनीमत है कि आधुनिक समाज में नारी सशक्तिकरण, लैंगिक समानता, और महिला अधिकारों का झण्डा उठाए रखने का दायित्व मुझ नासमझ के अनाड़ी हाथों में नहीं है। बल्कि तेज तर्रार और विदुषी चोखेर बालियों के आत्मनिर्भर और सक्षम हाथों में है जिनके पास एक वैकल्पिक सौन्दर्य दृष्टि और आलोचना दृष्टि है।

लेकिन सुजाता जी की यह बात मुझे भ्रम में डाल देती है-

“यह वाकई दयनीय है कि मैने यहाँ जो कुछ भी कहा उसके केन्द्रीय भाव तक काफी कम लोग पहुँच पाए।”

“मान लीजिए आपके सामने लड़कियाँ फटना-फाड़ना जैसे प्रयोग सहज हो कर कर रही हैं तो आप क्या केवल दुखी होकर ,क्या ज़माना आ गया है कहते हुए निकल जायेंगे ? या कान मूंद लेंगे? …मै चाह रही हूँ आप न कान बन्द करें , न दुखी हों , न दिल पर हाथ रखे ज़माने को कोसें …आप इसके कारणों को समझने का प्रयास करें और उन्हें दूर करने का प्रयास करें ।”

अरे भाई (क्षमा… बहन!) जब यही कहना था तो इतना लाल-पीला होने की क्या जरूरत थी? यह तो सभी पंचों की राय है:)

(सिद्धार्थ)