दुलारी के बहाने एक अतिथि पोस्ट…!

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सत्यार्थमित्र की अकिंचन शुरुआत करते समय मैने यह तो जरूर सोचा था कि अपने मन के भीतर उठने वाले विचारों को शब्दों में ढालकर यहाँ पिरोता रहूंगा लेकिन तब मैने यह कल्पना भी नहीं की थी कि मेरा यह अहर्निश अनुष्ठान मेरे आसपास की प्रतिभाओं के उनकी घर गृहस्थी में पूरी तरह से रमे हुए मन को भी इधर खींच लाएगा और इस हल्की सी डोर को पकड़कर वे नयी ऊँचाई छूने की ओर बढ़ चलेंगी। इन पन्नों पर श्रीमती रचना त्रिपाठी ने जो लिखा उसे आपकी सराहना मिली। बालमन की कविताओं ने भी आपका ध्यान खींचा। उनकी लिखी सत्यकथा ‘एक है हिरमतिया’ को बार-बार पढ़कर भी मैं नहीं अघाता। इन पोस्टों की मौलिकता को अक्षुण्ण रखते हुए हल्के-फुल्के संपादन से इन्हें आपके समक्ष प्रस्तुत करते हुए मुझे एक अलग तरह का सन्तोष मिलता है।

इसी क्रम में आज एक और विशुद्ध गृहिणी की कलम से निकली रचना आपको पढ़वा रहा हूँ। इस सत्यकथा की पात्र से भी मैं स्वयं मिल चुका हूँ। अपनी ससुराल में।  यह कथा पढ़कर मेरे सामने ताजा हो गयी हैं उसके चेहरे पर मकड़ी का जाल बन चुकी असंख्य झुर्रियाँ, फिर भी उम्र का सही अनुमान लगाना मुश्किल…। किसी वामन महिला को मैने इससे पहले देखा जो नहीं था। उसके मुँह से कभी कोई शब्द मैंने सुना ही नहीं। बिल्कुल शान्त और स्थिर…। …अरे दुलारी की कथा तो मैंने ही सुनाना शुरू कर दिया।

लीजिए, मूल लेखिका श्रीमती रागिनी शुक्ला की कलम से निसृत यह कथा पेश है मूल रूप में-

दुलारी

बैशाख मास की दोपहर की धूप…। ऐसा लग रहा था जैसे सूखी लकड़ियों की आग जल रही हो, हवा भी आग की लपट लेकर आ रही हो, जरा सा बाहर निकलने पर पूरा शरीर झुलस जाता था, इस मास की गर्मी से सभी त्रस्त हैं, सुबह से ही तेज हवाएं चलनी शुरू हो जाती , ऐसा लगता कि पत्तों के आपस में टकराने पर आग लग जाएगी।

गाँव के सभी बच्चे-जवान-बूढे घर छोड़कर सुबह से ही बागीचे में चले जाते, शायद पेड़ के साये में थोड़ी राहत मिलती है, गाँव में एक घर है जिसे बाबा के घर के नाम से जाना जाता है, वहां पर घर की ‘दादी’ गाँव के हर घर के सुख-दुःख का ध्यान रखती। आज दोपहर के एक बज गये थे। दादी की आखों में नींद नही आ रही, वह परेशान थीं क्योंकि दुलारी खाना लेने नहीं आई थी, बहादुर से दुलारी को बुलाने के लिये कहती हैं, बहादुर बताता है, “मैं वहीं से आ रहा हूँ, दुलारी घर पर नहीं है, दादी परेशान हो जाती है, इतनी गर्मी है, दुलारी कहाँ गयी होगी ?

दुलारी को कोई न कोई हमेशा परेशान करता रहता है, हर कोई उससे मजाक करता रहता है, प्रकृति के आगे सभी नतमस्तक हैं। किसी को बौना बना दे तो क्या कर सकते हैं। लेकिन दुलारी के साथ यह एक क्रूर मजाक से कम नहीं। आज भी महिलाएं उसके सिन्दूर और बिन्दी को देखकर हँसी करती हैं, “का दुलारी फ़ुआ, आज फ़ूफ़ा आवताने का?” दुलारी मन ही मन बुदबुदाती हुई आगे बढ जाती।

फिर भी उसका मन हार मानने को तैयार नहीं। आज अस्सी साल की उम्र में भी दुलारी की मांग का सिन्दूर और माथे की बिन्दिया कभी हल्की नहीं हुई। दो भाइयों के बीच अकेली बहन थी …दुलारी। माँ-बाप ने उसकी शादी बचपन में ही बड़े अरमानों से की थी, सात साल पर गौना तय हुआ था। लेकिन ईश्वर के आगे किसी की नहीं चलती। गौना होने से पहले ही दुलारी के सिर से उसके माँ-बाप का साया उठ गया, और भगवान भी जैसे दुलारी को भूल ही गया था। प्रकृति के पोषण का अजस्र श्रोत जैसे दुलारी के लिए सूख सा गया। उसका कद छःसाल के बच्चे के बराबर ही रह गया। लड़के वाले उस वामन बालिका को विदा कराने ही नहीं आए।

आज सत्तर साल की दुलारी अपने दोनो भाईयों की अपेक्षा बहुत ही स्वाभिमानी है, आज भी गरीब होने के बावजूद अपनी मेहनत से अपना पेट पाल रही है। जबकि उसके दोनों भाई खेती-बारी बेंचकर दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। दुलारी अपने छ्प्पर के घर में संतुष्ट रहती। उसने बकरी पाल रखी थी। अक्सर देखा जाता कि दुलारी अपनी बकरी से कुछ-कुछ बातें करती रहती, शायद अपने दु:ख-सुख कहती। वह बकरी उसकी सबसे अच्छी दोस्त थी। क्योंकि वह कभी भी उसकी हँसी नहीं उड़ाती, और दुलारी की एक आवाज पाकर वह दौड़ी उसके पास चली आती थी। दुलारी अपनी बकरी की देखभाल बिल्कुल अपने बच्चों की तरह करती रहती, गर्मियों में नियमित स्नान कराती। जाड़े के दिनों मे उसके लिये कपड़े और बिस्तर बनाती।

रोज सुबह पाँच बजते ही दुलारी बाबा के घर जाती और बिना कहे ही, झाड़ू उठाती और धीरे-धीरे पूरे घर में झाड़ू लगाती। बाबा के घर का हर सदस्य दुलारी का बड़ा ही सम्मान करता, किसी दिन अगर दुलारी नहीं आती तो उसका हाल-चाल लेने दादी किसी को जरूर भेज देती। सुबह का खाना दुलारी बाबा के घर से ले जाती, और अपनी बकरी के साथ मिलकर खाती। शाम का खाना दादी उसके घर भेंज देती।

दुलारी को भी बाबा के घर से बहुत ही प्रेम था, जब भी बाबा के घर में कोई नन्हा मेहमान आता तो दुलारी अपने हाथों से बनी हुई मूँज की छोटी सी टोकरी लाना नहीं भूलती। दर्जी की दुकान से बेकार कपड़ों की कतरन लाती, घोड़ा-हाथी-बन्दर बनाती और बच्चे को उपहार देती। दुलारी का यह उपहार बाबा के घर के हर शिशु को मिलता रहा।

…लेकिन ग्रामीण समाज दुलारी के साथ उतना उदार नहीं था। उस दिन दादी दुलारी का काफ़ी देर तक इंतजार करती रहीं। दादी ने बहादुर को उसकी झोपड़ी पर भेजा तो पता चला कि वह कुछ विशेष तैयारियों में जुटी है। अपने घर को गाय के गोबर से लीप-पोत कर साफ कर रही थी। कुछ औरतें दुलारी को मेंहदी लगाने की तैयारी में जुटी थीं। उसकी बकरी भी आज बेच दी गई थी। लेकिन अपनी प्यारी बकरी को बेंचकर भी दुलारी बहुत प्रसन्न नजर आ रही थी। बकरी को बेचनें से जो पैसे मिले थे उससे दुलारी के लिये धोती और पायल मंगाई गई थी। उसके दरवाजे पर पीली धोती सुखाई जा रही थी और दुलारी मन ही मन बहुत खुश थी कि इस बार की ‘लगन’ में हमारी भी विदाई होने वाली है। ससुराल जाने का उत्साह हिलोरें ले रहा था।

दिन भर गांव की औरतें भोली-भाली दुलारी को सजा-सवाँर कर शादी-विवाह का गीत गाती रहीं और अपना मनोरंजन करती रहीं। शाम होते ही हंसी का ठहाका लगाकर सभी अपने-अपने घर चलती बनीं। आज दुलारी को भूख प्यास तो लग ही नहीं रही थी। शाम से ही ‘पियरी’ पहने, हाथों में चूड़ियाँ डाले, माथे पर बिन्दी लगाए, मांग मे सिन्दूर भरकर, रंगे हुए पैरो में छम-छम करते घुँघरू वाली पायल पहने, रात भर अपनी झोपड़ी में बैठी रही। नए घर में जाने के इंतजार में सुबह होने तक दरवाजे पर दीपक जलाये किसी का इंतजार करती रही। सुबह होने तक उसे यह भान नही था कि उसके साथ मजाक किया गया है।

तब से दुलारी पूरे गाँव में चर्चा का विषय बन गयी। हर कोई उसकी झोपड़ी में जरूर झाँक आता। कुछ मनबढ़ किस्म की औरतों के नाते उसकी बकरी भी चली गई, जिससे वह अपना सुख-दुख बाँटती थी। अब दुलारी किसी के घर नहीं आती-जाती थी। दादी उसके लिये सुबह-शाम खाना भिंजवा देतीं। दुलारी सुबह होते ही बागीचे में निकल जाती। तिराहे से बागीचे की ओर आने वाली सड़क पर बैठकर टकटकी लगाये देखती रहती, ऐसा लगता जैसे उसके सपनों का राजकुमार आनेवाला हो। रोज का यही क्रम है…।

आज दुलारी ८० साल की हो चुकी है। उसको अभी भी चार कंधों की डोली का इंतजार है। …दुलारी के लिए डोली तो एक दिन जरूर आएगी। लेकिन शायद दुलारी उसे अपनी आँखों से देख न पाये। …वह डोली चढ़कर ही सबसे विदा लेगी लेकिन उसे कन्धा देने वाले कोई और ही होंगे। शायद यहाँ से विदा होकर ही उसके सपनों का साथी उसे मिल सकेगा।

-(श्रीमती) रागिनी शुक्ला

यह सप्ताह बहुत व्यस्त रहा। ब्लॉगरी की आभासी दुनिया मेरे लिए सजीव हो उठी थी। हिन्दुस्तानी एकेडेमी ने कविता वाचक्नवी जी की पुस्तक प्रकाशित कर उसका लोकार्पण कराया। इलाहाबाद में उन्हें पाकर मैने लगे हाथों गुरुदेव ज्ञानदत्त जी के घर का दरवाजा खटखटा लिया। आन्ध्र प्रदेश से कई डिब्बों में भर कर लायी गयी स्वादिष्ट चन्द्रकला के साथ रीता भाभीजी के हाथ के बने ढोकले और फोन पर उपस्थित अनूप जी फुरसतिया के चटाखेदार गोलगप्पों का आनन्द लिया गया। स्त्री-विमर्श की चर्चा भी हुई…। लेकिन जो ‘घाघ’ था उसने अपने पत्ते नहीं खोले। 🙂

मेरे मोबाइल का कैमरा यहाँ भी ड्यूटी पर था-

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(१)नन्हे सत्यार्थ को फोटू खिंचाना खूब भाता है। सो सबसे पहले दीदी के साथ ऑण्टी के बगल में। (२) रचना और रीता भाभीजी के बीच में कविता जी (३) गुरुदेव के साथ

मैं इधर हूँ- कैमरे के पीछे।

(सिद्धार्थ)

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मौनी अमावस्या से एक दिन पूर्व… संगम पर

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इस बार गणतन्त्र दिवस के दिन ही प्रयाग के माघ मेले का मुख्य स्नान पर्व (मौनी अमावस्या) भी पड़ गया। इसके साथ ही सोमवती अमावस्या तथा सूर्य ग्रहण के संयोग के कारण इस बार श्रद्धालु स्नानार्थियों की ज्यादा भीड़ बढ़ने की सम्भावना भी रही है। करीब एक करोड़ लोगों द्वारा यहाँ डुबकी लगाने का अनुमान किया गया है।

कल २५ जनवरी को इसी की तैयारी के सिलसिले में मुझे भी प्रातःकाल संगम तट पर जाना हुआ। सूर्योदय की प्रथम बेला में गंगा यमुना के तट साफ-सु्थरे होकर अपार जनसमूह की प्रतीक्षा कर रहे थे। यमुना के तट से मैने मोबाइल कैमरे से कुछ तस्वीरें लीं:

 

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यमुना का शान्त किनारा जहाँ २६ को खूब चहल पहल होगी।

 

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प्रतीक्षा में नाविक जो कल कुछ ज्यादा कमा सकेंगे।

 

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काश सूर्यदेव २६ को भी ऐसी ही धूप खिलाते!

 

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चादरें भी बिछ चुकी हैं। अमावस की प्रतीक्षा …

इधर घर के लॉन में गुलाब खिलने लगे हैं, जिन्हें कभी सबसे अधिक खतरा मेरे दो साल के बेटे सत्यार्थ से होता था। लेकिन जब उसे बताया गया कि तोड़ने पर फूल रोते हैं, तबसे उनका सबसे बड़ा रक्षक भी सत्यार्थ ही है। अब हवा से पंखुड़ियों का झड़ना भी उसे गवाँरा नहीं।

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 (सिद्धार्थ)

मायके का दर्द…

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अन्ततः आज वो रो पड़ी…। पिछ्ले सात-आठ दिन से इसकी भूमिका बन रही थी। मायके वालों से रोज बातें हो रही थीं। पापा, मम्मी, छोटे भाई, और अपने ससुराल में बैठी बड़ी बहन से लगातार घण्टों चर्चा का एक ही विषय। पतिदेव अपने काम में इतने मशरूफ़ दिखते कि कभी उनके साथ बैठकर विस्तार से विचार-विमर्श नहीं कर सकी। हाँलाकि उनके हूँ-हाँ के बीच उनसे भी सारी बात कई बार बतायी जा चुकी थी। लेकिन जितनी बेचैनी उसके मन में थी उसका अनुमान उसके पति महोदय नहीं कर पाये थे। लेकिन जब मन की व्यथा फफ़क कर आँखों से बाहर आने लगी तो इसकी गम्भीरता के बारे में सोचने को मजबूर हो गए।

यूँ तो अर्चना अपने पिता की पाँच सन्तानों में चौथे नम्बर पर थी लेकिन बचपन में एक बड़े भाई की १०-१२ साल की उम्र में ही अकाल मृत्यु हो जाने से अपने पिता की आँखों में पहली बार आँसू देखकर इतना कातर हुई थी कि सबकी निगाहों में घर की सबसे संवेदनशील सन्तान बन गयी। यह संवेदना एक लड़की होने की प्रास्थिति से उपजी भेद-भाव की कथित ‘दुनियादारी’ के प्रति विरोध के रूप में भी प्रस्फुटित हुई और ग्रामीण वातावरण में भी शहरी लड़कों की तरह शिक्षा-दीक्षा पाने की ललक और जिद के रूप में भी। बाद में जब पिता के ऊपर आने वाली एक से एक कठिन चुनैतियों और उनके द्वारा अथक परिश्रम, धैर्य, और बुद्धिमतापूर्ण ढंग से उनका मुकाबला करते देखती हुई बड़ी होने लगी तो धीरे-धीरे पिता द्वारा परम्परा और आधुनिकता के मिश्रण से पगी परवरिश को स्वीकार भी करने लगी।

mother imagesपापा ने बड़ी दीदी का विवाह एम.ए. पास करते ही एक समृद्ध परिवार में कर दिया था। बड़े भाई को बनारस के बोर्डिंग स्कूल में डाल दिया लेकिन इन्सेफ़्लाइटिस के कहर ने उस होनहार को असमय ही काल के गाल में झोंक दिया था। इसके बाद बच्चों को बाहर भेंजकर पढ़ाने का फैसला लेना कठिन हो गया था। लेकिन गाँव में शिक्षा का कोई भविष्य भी नहीं था। इसलिए पापा ने दोनो बेटों को अच्छी स्कूली शिक्षा के लिए निकट के महानगर में भेज दिया। मम्मी-पापा बीच-बीच में गाँव से शहर जाते, बेटों को देख-सुनकर लौट आते। लेकिन बेटियों को गाँव से बाहर भेंजने की हिम्मत नहीं पड़ी थी। वे वहीं से रोज पढ़ने के लिए पास के कस्बे तक जातीं और शाम ढलने से पहले लौट आतीं। …पापा की दुलारी बेटियाँ।

जल्दी ही बड़ा भाई इन्जिनियरिंग में और छोटा भाई मेडिकल में प्रवेश पाकर अपना-अपना प्रोफेशनल कैरियर चुनने में सफल हो गए। पूरी पढ़ाई घर से दूर रहकर हुई। लेकिन बेटियों के लिए पापा की सोच अच्छे घर में शादी कर देने से आगे नहीं बढ़ सकी। पढ़ाई भी उसी के अनुसार ऐसी ताकि अच्छे रिश्ते  मिल सकें। इस छोटी बिटिया ने फिरभी अपनी जिद से बी.ए. के बजाय बी.एस.सी. और फिर बड़े शहर जाकर एम.एस.सी. में भी दाखिला ले लिया। लेकिन पापा को जाने क्या जल्दी थी कि एम.एस.सी. (फाइनल) की परीक्षा पर शादी को तरज़ीह देते हुए बिटिया के हाथ पीले कर दिए। रेग्यूलर परीक्षा छोड़नी पड़ी। अगले साल दुबारा परीक्षा हुई तो पाँच छः माह के गर्भ का बोझ ढोकर भी ६८ प्रतिशत अंकों के साथ एम.एस.सी. की उपाधि प्राप्त कर लिया। लेकिन माँ-बाप की इच्छा तो जैसे बेटी को ससुराल भेंजकर ही पूरी हो गयी।

इधर भाई जब डॉक्टर (एम.डी.-मेडिसिन) बनकर ‘गोल्ड मेडल’ के साथ गाँव लौटा तो पापा को अपनी तपस्या पूरी होती नजर आयी। झटपट पास के कस्बे में क्लिनिक खुलवा दिया। एक अच्छे डॉक्टर के सभी गुण होने के साथ-साथ समाज में अत्यन्त प्रतिष्ठित पिता के दिए संस्कारों ने अपना रंग दिखाना शुरू किया। मरीजों की बाढ़ आने लगी। सप्ताह में एक दिन निःशुल्क सेवा के संकल्प ने इसमें चार-चाँद लगा दिए। पापा ने बेटे की सफलता के उत्साह में अपनी बढ़ती उम्र को धता बताकर स्वयं खड़ा रहते हुए उसी कस्बे में जो अबतक जिला बन गया था, एक बड़ा सा अस्पताल बनवाना प्रारम्भ कर दिया। family_sketch

भाई की प्रगति को आँखों से देखने के लिए दोनो बहनों ने समय-समय पर मायके की यात्राएं कीं। प्रायः प्रतिदिन क्लिनिक में जुटने वाले मरीजों की संख्या, उनकी प्रतिक्रिया और आम जनश्रुति के किस्सों पर कान लगाये रहतीं। मम्मी को तो जैसे जीवन की अमूल्य निधि मिल गयी। जिन बेटों को उनकी दस साल की उम्र से ही सिर्फ़ छुट्टियों में देखने और अपने हाथ से खाना खिलाने का मौका मिलता था वे अब घर पर रहकर आँखों के सामने सफलता की बुलन्दियाँ छू रहे थे। जिनका अधिकांश समय बेटों की राह तकते बीता था, वह अब उनके सिर पर रोज स्नेहसिक्त हाथ फेरने का सुख पाने लगी थी।

यह बहुत आह्लादकारी समय था। क्लिनिक चलते हुए एक साल कैसे बीत गया पता ही नहीं चला। इस दौरान अपना हॉस्पिटल भी बन कर लगभग तैयार हो गया। मार्बल और पी.ओ.पी. निबटाकर अब पेंटिंग का काम शुरू हो गया था। दो-तीन डॉक्टर्स चैम्बर, ओ.टी., लेबर रूम, जच्चा-बच्चा वार्ड, दवाघर, मरीजों और तीमारदारों के लिए प्रतीक्षा कक्ष, टॉयलेट व स्नानघर, किचेन शेड, पार्किंग।

डॉक्टर की शादी चार-पाँच साल पहले एक डॉक्टरनी से ही हो चुकी थी जो उसी के कॉलेज में जूनियर थी। उसका भी ‘गाइनी’ में पीजी (DNB) का दूसरा साल है। इसे कम्प्लीट करके जब आएगी तो उसे सीधे अपने बने-बनाए हॉस्पिटल के चैम्बर में बैठना होगा। क्षेत्र के लोग तो अभी से मुग्ध और प्रसन्न रहने लगे हैं कि अब बड़े शहरों वाली सुविधा यहीं अपने पिछड़े से शहर में ही मिलने लगेगी। वह भी सभी जरूरतें एक ही छत के नीचे पूरी होने वाली थीं। लेकिन…

पिछले एक सप्ताह में जो घटनाक्रम चला है उसे जानकर तो दिमाग सुन्न हो गया है। डॉक्टर ने अचानक यह निर्णय ले लिया कि वह इस कस्बे की डॉक्टरी छोड़ रहा है। वापस दिल्ली जाएगा जहाँ उसकी पत्नी तीन साल के बेटे के साथ अकेली रहकर पढ़ाई (DNB-OG) कर रही है। अभी दो-तीन साल उसे वहीं लगेंगे। पत्नी और बेटे को छोड़कर अपने पैतृक गाँव में आया तो था अपने क्षेत्र की सेवा करने लेकिन पिछले एक साल के व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर उसे यह कठिन निर्णय लेना पड़ा है।

क्षेत्र के लोग सन्न हैं। जिसने भी सुना दौड़ पड़ा। आखिर क्या बात है? कुछ मरीज तो फूट-फूटकर रो पड़े जिन्हें उसने भगवान बनकर बचाया था। पापा के इष्ट-मित्र, दूर-दूर के रिश्तेदार, और क्लिनिक में साथ रहने वाला सपोर्टिंग स्टाफ, सबको आघात पहुँचा है। लगता है जैसे अपनी कोई अमूल्य सम्पत्ति छीन ली गयी हो। सभी यह जान लेना चाहते हैं कि आखिर किसकी गलती की सजा उन्हें मिल रही है।sketch of family

इस सारी चुभन को अर्चना ने पिछले सात-आठ दिन में फोन से बात कर-करके महसूस किया है। भाई, बड़ी बहन, माँ और बाप से लगातार मोबाइल पर एक-एक बात पर विचार-विमर्श होता रहा। दिल्ली में बैठी अनुजवधू जरूर अपने पति के लौट आने से प्रसन्न है। तीन साल के बेटे को भी अपने पापा का स्नेह मिलने लगेगा। वहाँ जाकर डॉक्टर एक और उच्च स्तरीय उपाधि (DM) पाने की कोशिश करेगा। शायद किसी बड़े अस्पताल का बड़ा डॉक्टर बन जाय। विदेश जाने के रास्ते भी खुल सकते हैं।

लेकिन गाँव पर फिर राह तकते मम्मी पापा…?

आखिर कल प्रस्थान का वह दिन आ ही गया जब मम्मी-पापा से विदा लेकर वह दिल्ली जा बसने के लिए निकल पड़ा। बेटे से बिछुड़ते हुए माँ का धैर्य टूट गया। वह उससे लिपटकर फूट-फूट्कर रो पड़ी। पापा ने कलेजा मजबूत करके उन्हें चुप कराया। हाँलाकि उन्हें खुद ही ढाँढस बधाने वाले की दरकार थी। यह सब मोबाइल पर सुनसुनकर अर्चना का भी बुरा हाल था। पति ने टोका तो आँसू छलक पड़े।

हम बेटियों से मायके का सुख नसीब न हो तो न सही लेकिन अपने माँ-बाप, भाई-बहन के दुःख में दुःखी होने का हक तो न छीना जाय…।

(सिद्धार्थ)

श्रीमन्‌! यूँ ही घिसटने दें…?

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red tape कार्यालय में रोज की ही तरह सामान्य काम-काज चल रहा था। मैं कुछ देयकों (bills) का परीक्षण करके उन्हें नियमानुसार भुगतान हेतु पारित कर रहा था। बीच-बीच मे अपनी समस्या लेकर आने वाले बुजुर्ग पेंशनर्स की सुनवायी और उनका निपटारा करता जा रहा था। किसी की पेंशन बैंकखाते में नहीं पहुँची तो लाल-पीला होता पहुँच गया। दरियाफ़्त करने पर पता चला कि एक बैंक-स्टाफ के छुट्टी पर जाने से पोस्टिंग में एक दिन विलम्ब हो गया है।

किसी ने जीवित होने का प्रमाणपत्र समय से जमा नहीं किया तो पेंशन रुक गयी। इसकी नाराजगी भी ट्रेजरी पर ही उतारने आ गये। उन्हें हाथ जोड़कर समझाना है कि आपने ‘जिन्दा होने का सबूत’ नहीं दिया इसलिए पेन्शन रोकनी पड़ी। किसी पेन्शनर की मृत्यु हो जाने की सूचना लेकर आने वाले सिर मुड़ाये उनके पुत्र या उदास आँखों में आँसू लिए आकर खड़ी हुई उनकी विधवा जिन्हें ढाढस बँधाते हुए सरकारी कायदे के अनुसार अग्रिम कार्यवाही के बारे में समझाना है,

…वेतन आयोग द्वारा बढ़ायी गयी पेन्शन अब कितनी हो गयी यह जानने कि उत्सुकता लिए भी बहुत लोग आ रहे हैं। इन्हें एक ही जवाब देना था कि ‘अपने बैंक खाते से जाँच लें’। …लेकिन ऑफिस तक मेहनत करके आ ही गये तो यहीं से जान कर जाएंगे जी। भले ही हमारे लिए पच्चीस हजार की लिस्ट से देखकर बताना कितना भी कठिन हो। कोर बैंकिंग स्कीम (CBS) और कम्प्यूटरीकरण का लाभ उठाने के लिए कोई तैयार ही नहीं दिखता यहाँ। बहुत से बुजुर्ग ट्रेजरी स्टाफ की शिकायत लेकर भी आते हैं ताकि साहब उन्हें समझाकर, निर्देश देकर या डाँट-फटकार कर काम जल्दी करा दें।

…यह सब रुटीन में रोज ही होता रहता है।

लेकिन पिछले दिन एक ऐसे सज्जन आये जिनकी समस्या थोड़ी अलग थी। एक प्रदेश सरकार में चीफ इन्जीनियर के पद से अठारह साल पहले सेवानिवृत्त हो चुके थे। देखने में प्रभावशाली व्यक्तित्व था। मुख मुद्रा से सम्पन्नता और सन्तुष्टि का भाव झलक रहा था। कमरे में दाखिल होकर अभिवादन के बाद कुर्सी खींचकर शान्तिपूर्वक बैठ गये। कदाचित्‌ मेरी व्यस्तता को देखकर कुछ कहे बगैर बैठे रहे और मैं अपना कागजी काम निपटाता हुआ बीच-बीच मे ‘घोड़े पर सवार होकर आने वालो’ की सुनवायी कर यथोचित निस्तारण करता रहा।

…उनके पन्द्रह-बीस मिनट के मौन के दौरान मुझे यह याद आ गया कि ये कुछ दिन पहले भी आए थे। किसी महिला पेन्शनर की आयु के सम्बन्ध में कोई कागज दिखा रहे थे जिसे ट्रेजरी के लेखाकार महोदय मानने को तैयार नहीं थे। मैने तब सम्बन्धित पटल सहायक (लेखाकार) को बुलाकर ‘नियमानुसार कार्यवाही’ करने का निर्देश दे दिया था…।

मैने कागजों में से सिर उठाकर उनसे अपनी बात कहने का संकेत किया तो इत्मीनान दिखाते हुए उन्होंने मुझसे अपने हाथ का काम निपटा लेने का इशारा किया और बैठे रहे। इस भाव से कि वे एक छोटी सी बात व्यक्तिगत अनुरोध के रूप में मेरे खाली हो जाने के बाद कहना चाहेंगे। मैने मेज पर रखी सभी फाइलों और देयकों  को निस्तारित किया और फिर उनकी ओर उन्मुख हुआ। मैने पूछा – “आपकी माता जी का प्रकरण सुलझ गया कि नहीं?”

उन्होंने लगभग झेंपते हुए से कहा – “मैं कोई शिकायत लेकर नहीं आया हूँ। बल्कि मैं तो यह अनुरोध करने आया हूँ कि उस मुद्दे पर उस बाबू को आप कुछ भी मत कहिएगा। रुटीन में जैसा भी होगा उसे उसी तरह होने दीजिएगा। …प्रकरण मेरी माता जी का नहीं बल्कि मेरी भाभी जी का है जिनके लिए दौड़-धूप कर मदद करने वाला कोई नहीं है।”

मैंने इस बात के निहितार्थ को समझ पाने में असमर्थता जतायी तो बोले-“आपने उस दिन उस बाबू की बात काट दी थी और हमारे पक्ष में अपनी सहमति देते हुए उसे कुछ निर्देश दिये थे। …”

हाँ तो? आपकी बात ठीक रही होगी तो मैने मान लिया होगा।”

“जी हाँ, बात तो यही है लेकिन मैं चाहता हूँ कि आप उसे अब अलग से ‘प्रेस’ न करें।”

“क्यों?” मैं सचमुच भ्रमित हो गया था।

इसपर वे चुप लगा गये। …मैं विस्मय से उन्हें देखने लगा। …इन्हें सिफारिश को वापस लेने की जरूरत क्यों आ पड़ी? इन्हें तो खुश होना चाहिए कि इनका काम ‘असरकारी’ तरीके से होने जा रहा है। लेकिन ये तो उल्टी रीति अपना रहे हैं?

दरअसल छठे वेतन आयोग की संस्तुतियों में अधिक उम्र के पेन्शनर्स को कुछ अतिरिक्त पेन्शन देने की बात कही गयी है। अस्सी वर्ष से ऊपर की आयु होने पर पेंशन में कुछ प्रतिशत की वृद्धि करने का प्रस्ताव है। इस नये प्राविधान से अब पेन्शनर की जन्मतिथि बहुत महत्वपूर्ण हो गयी है। यहाँ एक दिक्कत ये है कि अपने पति की मृत्यु के बाद पारिवारिक पेन्शन प्राप्त कर रही अनेक बुजुर्ग महिलाओं की जन्मतिथि पेन्शन के रिकार्ड्स में उपलब्ध नहीं है। अबसे अस्सी साल पहले पढ़ाई से कोसों और नौकरी से योजनों दूर रहने वाली महिलाओं की साक्षरता और उनकी जन्मतिथियाँ सहेज कर रखने की प्रायिकता का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। कार्यालय में ऐसे मामलों पर निर्णय लेने के लिए अभी औपचारिक नीति बनायी जानी है।

ऐसे में यदि किसी महिला के पास जन्मतिथि के विश्वसनीय प्रमाण सरकारी दस्तावेजों में उपलब्ध हैं तो उनके तार्किक परीक्षण के बाद सही पाये जाने पर इस लाभकारी योजना का लाभ उसे दिया ही जाना चाहिए। न कि अन्य के लिए नीति बन जाने की प्रतीक्षा करनी चाहिए। इसी अवधारणा के अन्तर्गत मैने उनके मूल प्रमाणपत्र देखकर उक्त लाभ देने का निर्देश दे दिया था।

मैने उनके इस विचित्र अनुरोध पर अपनी उलझन शान्त करने के लिए जब उन्हें कुरेदा तो वे बोले – “मैंने सरकारी ‘सिस्टम’ बहुत देखा है। …यहाँ रुटीन से ही चलना ठीक है।”

मैंने अपने ‘प्रो-एक्टिव एप्रोच’ का उत्साह ठण्डा होता देखकर  फिर जिज्ञासा जाहिर की तो उन्होंने समझाया – “…असल में आज तो आप डाँट-डपटकर मेरा काम करा देंगे लेकिन भविष्य में हमेशा तो उन्हीं से काम पड़ेगा। …अगर बाबू जी बिदक गये तो कभी न कभी परेशान करने का मौका पा ही जाएंगे। …फिर तो मेरी बुजुर्ग भाभी जी को लेने के देने पड़ जाएंगे। …इसलिए पूरे आदर और सम्मान के साथ मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि इसे ऐसे ही चलने दें।”

मैं असमन्जस में हूँ कि क्या करूँ? इसे ऐसे ही छोड़ दूँ? उस पेन्शनर का काम प्राथमिकता के आधार पर निजी देख-रेख में पूरा करा दूँ? उस बाबू के बारे में सुप्रीम बॉस को बताकर कोई निरोधात्मक कार्यवाही प्रस्तावित करूँ? या उसे खुद ही समझाने का प्रयास करूँ? ऐसे में कहीं सचमुच बुरा मान गया तो? 

कोई मैनेजमेण्ट गुरू मार्गदर्शन देंगे क्या?

[ऊपर का चित्र www.citizenarcane.com से साभार लिया गया है। आपत्ति की सूचना प्राप्त होने पर सहर्ष हटा लिया जाएगा।]

(सिद्धार्थ)

गाँव में ताज़िया का मेला: तब और अब

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इस साल बहुत दिनों के बाद मोहर्रम के मौके पर गाँव जाने का अवसर मिला। मन में यह जानने की उत्सुकता थी कि बचपन में हमें जिस ‘ताजिया मेला’ का इन्तजार सालोसाल रहता था, उसका अब क्या रूप हो गया होगा।

हमें याद है जब बगल के गाँव में लगने वाले ताजिया के मेले के दिन [मोहर्रम की दसवीं तारीख (योमे आशुरा) ] हम दोपहर से ही तैयार होकर घर के बड़े-बुजुर्गों से ‘मेला करने’ के लिए चन्दा इकठ्ठा करते थे। गाँव के बीच से गुजरने वाली सड़क से होकर मेले की ओर जाने वाली ताजियों की कतार व उन्हें ढोने वालों व साथ चलने वालों के कंठ से हासन-हुसैन की जै-जयकार के नारों के बीच ढोल नगाड़े की कर्णभेदी ध्वनियों के साथ उड़ती हुई धूल को दरकिनार कर उनके बीच में तमाशाई बन पहुँच जाते थे। मेले में पहुँचकर चारो ओर से आने वाली ताजियों की प्रदर्शनी देखते, मुस्लिम नौजवानों की तलवार बाजी व अन्य हथियारों का प्रदर्शन व विविध शारीरिक कौशल के करतब देखकर रोमांचित हो जाते।

आसपास के २०-२५ गाँवों के हिन्दू-मुस्लिम जुटते थे मेले में। दूर-दूर से लड़कियाँ, औरतें और बच्चे बैलगाड़ी में लद-फदकर आ जाते। अपने-अपने अभिभावक के साथ ‘मेला करते’ लाल-पीले-हरे परिधानों में लिपटे हुए। तेल-इत्र-फुलेल का प्रयोग पूरी उदारता से किया जाता था।

मेले में बिकने वाली कड़क लाल रंग की जलेबी, इसकी रंगीली रसीली बहन इमरती, गट्टा-बताशा, ल‍इया, मूँगफली, चिनियाबादाम, फोंफी, इत्यादि बच्चों को ललचाती थी तो घर-गृहस्थी के उपयोग की तमाम सामग्रियों से सजी दुकानें बड़ी उम्र के पुरुषों व महिलाओं को आकर्षित करती थीं। मेले में पुराने परिचितों और रिश्तेदारों से मुलाकात भी हो जाया करती थी। काफी समाचारों और हाल-चाल का आदान-प्रदान भी हो जाता था। कुछ जोड़ों की शादियाँ भी तय हो जाने की भूमिका बन जाया करती थी।

तब हमें यह कदाचित्‌ पता नहीं था कि मोहर्रम का पर्व पैगम्बर साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन की शहादत की याद में मनाया जाता है जहाँ मूलतः शोक का भाव प्रधान होता है। हम बच्चों के लिए तो यह स्कूल से छुट्टी और मेले की मौज-मस्ती का दिन होता था।

पिछले बीस-पच्चीस सालों में ग्रामीण समाज में भी काफी बदलाव आ गये हैं। शहरों की ओर आवागमन बढ़ने से बाजार की संस्कृति का प्रसार तेजी से हुआ है। आर्थिक संसाधन बढ़े हैं, उपभोक्ता वस्तुओं का विपणन बढ़ा है और दूरस्थ क्षेत्रों तक इनकी पहुँच भी बढ़ गयी है।  अब मेले का रूप वह नही रहा। बाहरी चमक-दमक तो बढ़ गयी है लेकिन ग्रामीण लोगों की सामाजिकता संकुचित सी हो गयी है।

अब विशाल, ऊँचे और दामी ताजिये बनाने की होड़ लग रही है। इतने बड़े कि उन्हें कन्धों पर लादकर ढोते हुए मेले में ले जाना सम्भव ही नहीं रहा। अब तो जिस गाँव में ये बनाये जाते हैं, वहीं पर मेला लग जाता है। परिणाम यह है कि हर दूसरे गाँव में एक बड़े ताजिए के इर्द-गिर्द छोटा सा मेला लगा हुआ है। कई-कई लाख रूपयों की लागत लगाकर ताजिए बनाए जा रहे हैं। रचनात्मकता औए उत्कृष्ट हस्तकला का नित नया और सुन्दर नमूना पेश करने वाले कारीगर इन दिनों बहुत व्यस्त हो जाते हैं।

इस बार मुझे बगल का पारम्परिक मेला बेजान लगा तो दूसरे गाँव में बनी एक नामी ताजिया को देखने चल पड़ा। वहाँ की कुछ तस्वीरें मोबाइल के कैमरे मे कैद कर लाया हूँ:

 

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पूर्वी उत्तरप्रदेश के कुशीनगर जिले के ‘बन्धवा’ गाँव में खड़ी की गयी इस ताजिया के निर्माता कलाकारों ने बताया कि उन्होंने दिल्ली की मशहूर जामा मस्जिद का प्रतिरूप बनाने की कोशिश की है। लकड़ी, बाँस और रंगीन कागजों से तैयार इस ताजिए की इस ऊपर वाली तस्वीर में इसका पिछला भाग दिखाया गया है जबकि नीचे वाली तस्वीर में सामने की ओर बने प्रवेश द्वार से अन्दर जा रहे लोगों की अपार भीड़ दिखायी दे रही है।

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सुदूर ग्रामीण अञ्चल की दृष्टि से एक अद्‍भुत दृश्य उत्पन्न करने वाले इस मॉडल के सामने के मुख्य द्वार पर जियारत करने वालों की भीड़ लगी रही जिसमें मची ठेलमठेल के कारण मैं भीतर जाने से वञ्चित रह गया।

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मेले में जो लोग आये थे उनका उद्देश्य इस ताजिए को देखना ही था। वहाँ की दुकानों में सजी सामग्री कुछ खास नहीं थी। पान, तम्बाकू, गुटखा, चाय, पकौड़ी, जलेबी, सूजी का हलवा, उनपर भिनभिनाती मक्खियाँ, सस्ती-रंगीन टॉफी, बच्चों के हल्के कपड़े जैसी साधारण चीजें ही थीं। अलबत्ता देहात की औरतों और लड़कियों के साज-श्रृंगार के सामान, चूड़ियों और अधोवस्त्रों का फूहड़ प्रदर्शन करती दुकानें जरूर लगी हुई थीं। उनपर खरीदारों की भीड़ भी जमी हुई थी।

Image025 क्या खरीदें? कैसे खरीदें?

 Image026 चुप रह बेटा! चूड़ियाँ पसन्द तो कर लूँ…

Image024यह बिन्दी कैसे है? 

मेले में कुछ ऐसे दृश्य भी थे जिनकी तस्वीर लेना मेरे लिए बहुत मुश्किल था। सरेआम भीड़ के बीच में ही खुले में बकरे-बकरियों को हलाल करके उनका चमड़ा छीलना, एक लठ्ठे से लटकाकर मांस की बोटियाँ काट-काटकर बेंचना, मुर्गे-मुर्गियों के पैर रस्सी में बाँधकर रखना और खरीदार की पसन्द के मुताबिक छाँटकर उसे उसके सामने ही जिबह करना, केंव-केंव के करुण क्रन्दन की क्रमशः कम होती ध्वनि से निस्पृह धारदार हथियार के यन्त्रवत प्रयोग से उनकी एक के बाद एक घटती संख्या छोटे-छोटे बच्चों के मानस-पटल पर क्या प्रभाव छोड़ेगी, यह सोचकर मन दुःखी हो गया।

निष्प्रयोज्य मांस के टुकड़ों व रक्त के लिए झगड़ते कुतों की टोली और उनपर भिनभिनाती मक्खियाँ पूरे मेला क्षेत्र में घूमते हुए अन्य खाद्य पदार्थों को दूषित कर रही थीं। 

सुर्ख लाल कलगी वाला

एक सफेद मुर्गा

दुकान पर बँधा

कोंय-कोंय करता हुआ

तेजी से मिट्टी खोद रहा है

अपने लिए अनाज के दाने

या कीड़े-मकोड़े खोज रहा है

ताकि वो उसे अपना आहार बना सके।

इस बात से बेखबर

बेपरवाह

कि वह किसी भी क्षण

आदमी का आहार बनने के लिए

काट दिया जाएगा

क्योंकि

उसका रेट लग चुका है

(सिद्धार्थ)

बालमन की दो कविताएं…!

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इलाहाबाद में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए दूर-दूर से आनेवाले विद्यार्थियों की एक ऐसी जमात है जो विश्वविद्यालय के छात्रावासों के अलावा इसके चारो ओर पसरे मुहल्लों, जैसे कटरा, कर्नलगंज, मम्फ़ोर्डगंज, एलनगंज, सलोरी, अल्लापुर, चर्चलेन, टैगोरटाउन, कमलानगर, राजापुर, से लेकर तेलियरगंज और दारागंज की संकरी गलियों और नुक्कड़ों पर चाय पीते और परिचर्चा करते मिल जाएगी। इस शहर की अर्थव्यवस्था में इन प्रवासी विद्यार्थियों की बहुत बड़ी भूमिका है।

श्री फणीश्वर त्रिपाठी इलाहाबाद की पहचान बताने वाली उसी जमात से आते हैं। फिलहाल मेरे साथ हैं। अभी प्रतियोगी परीक्षाओं में जुटे हुए हैं। कोर्स से अलग हटकर कभी-कभार अपने आस-पास की चीजों में कविता ढूँढ लेते हैं। आप इन्हें पहले भी यहाँ और यहाँ पढ़ चुके हैं। अपने स्वर्गीय दादा जी का दिया नाम बालमन ये बड़ी श्रद्धा से अपनी कविताओं के लिए प्रयोग करते हैं। आज प्रस्तुत है इनकी आत्मानुभूति से उपजी दो कविताएं:

 

(१) परीक्षा और प्रसव

किसी परीक्षा का आवेदन पत्र भरना,

एक बीजारोपण है सृजन का,

उत्पादक क्षमता की दागबेल

 

परीक्षा की तैयारी और उसका इन्तजार,

गर्भकाल की ही तरह लंबा और सतर्क

नौ से दस महीने का,

बीच में बुने गये सपने बड़े मीठे,

एक बच्चे की तोतली बोली की तरह,

 

रिजल्ट की प्रतीक्षा

जैसे प्रसव की आहट

एक बेचैन सुगबुगाहट

उत्सुकता, भय, खुशी, सभी का मिश्रण,

 

बच्चा सकुशल हो तो,

सारे कष्ट पीछे छूट जाते हैं,

किन्तु अवांछित परिणाम?

प्रसव-वेदना को बढ़ा देता है,

 

लेकिन समय का मलहम

घाव को भरता है

परीक्षार्थी दोगुनी मेहनत से

अगला प्रयास करता है।

 

(२) रिजल्ट की प्रतीक्षा

 

घड़ी की सूईयों की टिक-टिक,

टन-टन सी प्रतीत होती है,

धड़कनों की धक-धक,

धड़-धड़ सी हो जाती है,

 

अपनी ही सासों की रफ़्तार डरा देती है,

कनपटी पर आ जाता है पसीना,

चुनचुनाहट सी होती है सिर में,

पैरों के तलवे पसीज जाते हैं,

 

गला फ़ँसता है बार-बार,

बाथरूम जाने की इच्छा होती है,

तब, जब इंतजार हो,

सामने आने वाले रिजल्ट का।

(बालमन)

मेरी पिछली पोस्ट तिल ने जो दर्द दिया अमर उजाला के सम्पादकीय पृष्ठ पर ब्लॉग कोना में जगह बनाने में सफल रही। आप मेरी पीठ थपथपा सकते हैं। मैं बुरा नहीं मानूंगा….:)smile_teeth 

काश हमें भी छुट्टी मिलती…!

14 टिप्पणियाँ

[आज की पोस्ट श्रीमती रचना त्रिपाठी की ओर से जिनके साहचर्य का सौभाग्य मुझे मिला है]

 indian-housewifeकाश हमें भी छुट्टी मिलती…!

छुट्टी किसे प्यारी नहीं होती है? बच्चे तो बच्चे, बड़े भी रविवार की खुशी शनिवार की शाम ढलने से पहले ही मनाने लगते हैं। सप्ताहान्त का मूड रोज से अलग होता है । बच्चे तो शनिवार को स्कूल से घर दौड़ते हुए आते हैं । उन्हें पता है कि आज मम्मी तुरन्त होमवर्क के लिए नहीं बैठाएगी। खेलने की पूरी छूट तो इसी दिन मिलने पाती है। नौकरी करने वालों के लिए शनिवार की शाम बड़े इत्मीनान की शाम होती है। पूरा रिलैक्स होने का मौका मिलता है। देर रात तक पार्टी-वार्टी, घूमना-फिरना, दोस्तों के बीच मौज करना या ‘ब्लॉगरी’ में छूटे कामों को रात के दो तीन बजे तक पूरा करने की छूट यहीं मिल पाती है।

…क्या फिक्र है? कल तो सण्डे है। … थोड़ी देर तक सो सकते हैं, …अलसाए पड़े रह सकते हैं, मन की मौज के लिए जो चाहें करे, जो न चाहें न करें…। लेकिन इस पंचदिवसीय या छःदिवसीय सप्ताह का फण्डा एक गृहिणी के लिए सात दिन से भी कुछ अधिक समय का लगने लगता है। जी हाँ, जब बच्चे छुट्टी में सुस्ता रहे होते हैं, या मिंयाजी ऑफिस से छुटकारा पाकर मस्ती में रीलैक्स कर रहे होते हैं तो हम घरवालियाँ ओवरटाइम की ड्यूटी बजा रही होती हैं।

हमारी आँखों में भी सपना पलता है कि एक दिन कुछ अलग सा मनोरंजन हो, कुछ बौद्धिक व्यायाम हो, लेखन हो, अध्ययन हो, चर्चा-परिचर्चा हो, या कुछ भी ‘करने को’ न हो, कम से कम रुटीन के काम से थोड़ा आराम मिले, छुट्टी कैसी होती है इसका अन्दाजा लग सके। लेकिन यह सपना हमारी आँखों में प्रति दिन क्या-क्या रूप धारण करता है, एक एक दिन कैसे बीत जाता है, इसका एक चित्र यहाँ प्रस्तुत है:

सोमवार- आज घर तरो-ताजा है। जैसे अभी-अभी लॉण्ड्री से धुलकर निकला हो। साप्ताहिक सफाई के विशेष कार्यक्रम के फलस्वरूप घर के पर्दे, चादरें, लिहाफ, पाँवदान, वाशबेसिन, सिंक, टॉयलेट, नाली, कूड़ेदान आदि सबके सब कुछ ज्यादा ही चमक रहे हैं। बच्चों को चमचमाते कपड़ों में स्कूल भेजने के बाद जो काम रविवार से छूटे रह गये थे उन्हें निपटाने की जिम्मेदारी इसी दिन पूरी होती है। आज घर की सफाई स्वच्छ चाँदनी की तरह सुकून देने वाली है मन इसी में रमा हुआ है। बाकी सपने कल सही…। [Monday= Moon-day]

मंगलवार-एक कार्यदिवस के स्थायी मीनू के सभी आइटम आज पूरे किए जाने हैं। साथ में इनका बजरंगबली का व्रत भी है। बच्चों को सुबह जल्दी उठाना, नहला-धुलाकर स्कूल के लिए तैयार करना, बैग चेक करना कि कोई कॉपी-किताब, स्टेशनरी या होमवर्क छूट न जाय, टिफिन तैयार करना, पतिदेव को अखबार और कम्प्यूटर से उठने, नाश्ता करने और समय से नहा-धोकर ऑफिस के लिए तैयार होने की याद दिलाना, दस बजे तक नाश्ता-भोजन (brunch) देकर बाहर ठेलना, फिर घर को अपनी जगह पर जमाना। दोपहर बीतते-बीतते बच्चों की वापसी, कपड़ा बदलना, भोजन कराकर जबरदस्ती सुलाना और पहरा देना, शाम को होमवर्क कराना, और उन्ही की नीद सोना-जागना…। और कहाँ है वो खूबसूरत सपना? वह तो बस हमें ही छेड़े जा रहा है…। [Tuesday= Tease-day]

बुधवार- सप्ताह का मध्य। लेकिन मंगल व्रत के उपवास के बाद कुछ स्पेशल जायकेदार अलग से बन जाय तो क्या कहने? बाकी कामों में कोई छूट नहीं। सपना अपनी जगह है…। आज कुछ हो सकता था लेकिन पड़ोस वाली बहन जी अपनी बेटियॊं के साथ मिलने आ गयीं। दो घण्टे की मुलाकात के बाद कुछ लिखने-पढ़ने की हिम्मत जवाब दे गयी और ये दिन भी ‘बेकार’ चला गया…। [Wednesday== Waste-day]

वृहस्पतिवार- सबकुछ वैसा ही। बस अन्तर ये कि इनके एक रिश्तेदार आ गये। “कुछ खास काम नहीं था। बस इधर निकले थे तो सोचा मिलते चलें।” “…बहुत अच्छा किया जी। …मिलते जुलते रहने से प्रेम-व्यवहार बना रहता है।” मनुष्य सामाजिक प्राणी है। यही बात तो हमें दूसरों से अलग करती है। बहुत अच्छा लगा… पर वो सपना कब पूरा होगा। वह तो बस एक प्यास बनकर गले में अटकी है…। [Thrusday= Thirst-day]

शुक्रवार-यह दिन आते-आते घर की अस्त-व्यस्तता और तन-मन की थकान से हालत चाँदनी से बदलकर कृष्ण पक्ष की कालिमा जैसी हो जाती है। आत्मा जल-भुन जाती है कि यह सप्ताह भी समाप्ति पर है और अपना सपना साकार करने का रंच मात्र अवसर नहीं निकाल सकी। ‘भेजा फ्राई’ यहीं से निकला था क्या? [Friday= Fry-day]

शनिवार- ओह ये हफ़्ता भी गया…! वीक-एण्ड शुरू? उम्मीदें परवान चढ़ने से पहले ही औंधे मुँह गिर गयीं। मन की बात मन ही में रह गयी। आज तो कल की तैयारी और निपट लाचारी में बीत गया। [Saturday= Shattered-day]

रविवार- छुट्टी का दिन। शनिवार की शाम भी रविवार में शामिल हो लेती है। घर के सभी बच्चे-बड़े उत्साहित और प्रसन्न। सबकी अलग-अलग ख़्वाहिश, टिपिकल फरमाइश, बस गृहस्वामिनी के लिए आराम की कोई नहीं गुन्जाइश। सबकी उम्मीदों पर खरा उतरते हुए उनके मैले कपड़ों की साप्ताहिक धुलाई, घर-द्वार की विशेष सफाई, सबके मनोरंजन, खेलकूद, पार्टी, आवागमन, घुमने-फिरने, और मौज लेने को खुशगंवार बनाने के लिए रोज से अधिक श्रम और समर्पण।

अजी सुनती हो… आज कुछ स्पेशल बनाओ… आज तुम्हारे हाथ का बना वो ‘गोभी मुसल्लम’ खाने का मन है… वो कुक क्या खाक बनाती है…? देखो, थोड़ी कढ़ी भी बना लेना…। नहीं मम्मी… आज तो मटर वाली पूड़ी बनाओ…। नाश्ते में सैण्डविच तो मिलेगा न…?  अच्छा, …आज शाम को कुछ दोस्तों को बुला रखा है। कुछ पकौड़ियों की तैयारी कर लेना…। अरे यार! मेरे बालों में आँवला और मेंहदी तो लगा दो। आज दोपहर को एक गेट-टुगेदर है… तुम तो चल नहीं पाओगी? मौका लगा तो अगले हफ़्ते बिग-बाजार चलेंगे…।

सबके पीछे भागते हुए हुए शाम ढल जाती है। रात को थककर चूर…। बिस्तर पर लेटे-लेटे शिवानी की ‘कृष्णकली’ उठाती है जिसका तेरहवा पृष्ठ दो हफ्ते से मुड़ा पड़ा है…। आगे पढ़ने का मौका ही नहीं मिला। आँखें उनींदी देखकर पतिदेव हाथ से किताब लेकर रख देते हैं… थक गयी लगती हो, सो जाओ, सुबह जल्दी उठकर बच्चों को तैयार करना है।

काश… ये छुट्टी का दिन नहीं होता। क्या कोई रास्ता है कि इस दिन से छुटकारा मिल जाय? क्या Sunday हो सकता है shun-day?

(रचना त्रिपाठी)

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