Image065 पिछला पूरा सप्ताह ब्लॉगरी से जुदा होकर त्रिवेणी महोत्सव की धूम में खो जाने वाला रहा। रात में दो-ढाई  से चार बजे तक रंगारग कार्यक्रमों का आनन्द उठाने के बाद घर लौटता, सुबह यथासम्भव जल्दी उठकर बैडमिण्टन कोर्ट जाता, लौटकर नहा-धो तैयार होकर ऑफिस जाता, दिनभर ऊँघते हुए काम निपटाना और शाम होते ही फिर यमुना तट पर सजी महफिल में शामिल हो जाता।

शुरुआत गंगापूजन के बाद जोरदार आतिशबाजी से हुई। फिर जसवीर जस्सी ने पंजाबी पॉप की मस्ती लुटायी। ‘दिल लै गयी कुड़ी गुजरात की’ पर दर्शक झूम उठे।

डोना गांगुली का ओडिसी बैले, राजा हसन और सुमेधा की जोड़ी का फिल्मी गायन और भोर में साढ़े तीन बजे तक चलने वाला मुशायरा दूसरे दिन दर्शकों को बाँधे रखा।

तीसरे दिन भरतनाट्यम शैली में ‘रणचण्डी रानी लक्ष्मी बाई की वीरगाथा’ नृत्यनाटिका देखने के बाद दर्शकों ने सोनू निगम की ‘विजुरिया’  पर दिल खोलकर डान्स किया। दो घण्टे की अद्‌भुत प्रस्तुति में सोनू ने अपनी प्रतिभा से सबको चमत्कृत कर दिया।

चौथे दिन इलाहाबाद के स्कूली बच्चों के नाम रहा। स्थानीय बाल कलाकारों ने अपनी कला से मन को मोह लिया। बॉलीवुड की स्पष्ट छाप इन नन्हें कलाकारों पर देखी जा सकती थी।

अलपवयस्का रीम्पा शिवा ने तबलावादन में जो महारत हासिल कर ली है उसे देख-सुन कर सबने दाँतों तले अंगुली दबा ली। पाचवें दिन ही कॉमेडी सर्कस के चैम्पियन वी.आई.पी. (विजय) ने अपने गले से जो इक्यावन फिल्मी अभिनेताओं और राजनेताओं की आवाज निकाली वह अद्वितीय रही। के.शैलेन्द्र ने किशोर कुमार के गीत हूबहू नकल करके सुनाये और काफी तालियाँ बटोरी।

छठे दिन हर्षदीप कौर ने फिल्मी गीतों पर दर्शकों को खूब नचाया। उसके बाद विराट कवि सम्मेलन सुबह चार बजे तक चला। सुनील जोगी, विष्णु सक्सेना, सरदार मन्जीत सिंह, विनीत चौहान और वेदव्रत वाजपेयी आदि जैसे पन्द्रह कवि खूब सराहे गये।

सातवें और आखिरी दिन सुरमयी शाम की शुरुआत भजन संध्या और शाम-ए-ग़ज़ल को मिलाकर सजायी गयी। सुशील बावेजा, प्रीति प्रेरणा और इनके साथ पं. अशोक पाण्डे के तबले से निकली रामधुन पर दर्शक झूम उठे। इसके बाद के अन्तिम कार्यक्रम ने सर्वाधिक भीड़ बटोरी। विशाल और शेखर की हिट संगीतकार जोड़ी  जब अपने साजिन्दों के साथ स्टेज पर उतरी तो दर्शकों में जोश का जैसे तूफान उमड़ पड़ा। छोटे बच्चों से लेकर बड़े बूढ़े तक लगातार तालियाँ बजाते और थिरकते रहे। कुर्सियों के ऊपर खड़े होकर नाचते गाते युवा दर्शक कार्यक्रम का हिस्सा बन गये।

इस साल का त्रिवेणी महोत्सव हमारे मानस पटल पर एक अविस्मरणीय छाप छोड़ गया।

इस बीच ब्लॉगजगत में काफी कुछ बह गया। वैलेण्टाइन डे के आसपास गुलाबी चढ्ढियाँ छायी रहीं। सुरेश चिपलूकर जी और शास्त्री जी ने इस अभियान पर प्रश्नचिह्न खड़े किए तो बात बढ़ते-बढ़ते कहाँ की कहाँ पहुँच गयी। बहुत सी पोस्टें आयीं। मैने जहाँ तक देखा किसी भी पोस्ट में प्रमोद मुथालिक द्वारा मंगलौर में किए जाने वाले हिंसक कुकृत्य का समर्थन नहीं किया गया। और न ही किसी ब्लॉगर ने शराब खाने में जाकर जश्न मनाने को महिमा मण्डित किया। दोनो बातें गलत थीं और दोनो का समर्थन नहीं हुआ। इसके बावजूद पोस्टों की विषय-वस्तु पर गुत्थम-गुत्थी होती रही। केवल बात कहने के ढंग पर एतराज दर्ज होते रहे। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मर्यादा, वर्जना, नैतिकता, संयम, समानता, आदि कि कसौटी पर ‘स्त्री-विमर्श’ होता रहा।

जो चुप रहे उन्हें भी इस पक्ष या उस पक्ष के साथ जोड़ने का प्रयास हुआ। मुझे लगता है कि इस सहज सुलभ माध्यम की प्रकृति ही ऐसी है कि भीतर से कमोवेश एकमत होते हुए भी हमें अनर्गल विवाद की ओर बढ़ जाने का खतरा बना रहता है। कदाचित टीवी चैनेलों की तरह यहाँ भी टी.आर.पी.मेनिया अपने पाँव पसार रहा है। इसीलिए एक-दूसरे पर शंका पर आधारित आरोप-प्रत्यारोप लगते रहते हैं। फिर सफाई देने-लेने का व्यापार चलता रहता है।

क्या ऐसा करके हम ‘बन्दर के हाथ में उस्तरा’ थमाने वाली उक्ति चरितार्थ नहीं कर रहे हैं…?

अन्त में..

विष्णु सक्सेना ने कवि सम्मेलन में अपना सबसे प्रसिद्ध गीत भी सुनाया। यूँ तो उनकी आवाज में सुनने का अलग ही मजा है लेकिन इसके बोल भी बहुत प्यारे हैं। देखिए…

रेत पर नाम लिखने से क्या फायदा
एक आयी लहर कुछ बचेगा नहीं…
तुमने पत्थर का दिल हमको कह तो दिया
पत्थरों पर लिखोगे मिटेगा नहीं…

मैं तो पतझड़ था फिर क्यूँ निमन्त्रण दिया
ऋतु वसन्ती को तन पर लपेटे हुए
आस मन में लिए प्यास मन में लिए
कब शरद आयी पल्लू लपेटे हुए
तुमने फेरी निगाहें अन्धेरा हुआ
ऐसा लगता है सूरज उगेगा नहीं…

मैं तो होली बना लूँगा सच मान लो
तुम दिवाली बनोगी ये आभास दो
मैं तुम्हें सौंप दूंगा तुम्हारी धरा
तुम मुझे मेरे पंखों को आकाश दो
उंगलियों पर दुपट्टा लपेटो न तुम
यूँ करोगे तो दिल चुप रहेगा नहीं…

आँख खोली तो तुम रुक्मिणी सी दिखी
बन्द की आँख तो राधिका सी लगी
जब भी सोचा तुम्हें शान्त एकान्त में
मीराबाई सी एक साधिका तुम लगी
कृष्ण की बाँसुरी पर भरोसा रखो
मन कहीं भी रहे पर डिगेगा नहीं…

विष्णु सक्सेना