हाल ही में ऋषभ देव शर्मा जी की कविता ‘औरतें औरतें नहीं हैं’ ब्लॉगजगत में चर्चा का केन्द्र बनी। इसे मैने सर्व प्रथम ‘हिन्दी भारत’ समूह पर पढ़ा था। बाद में डॉ.कविता वाचक्नवी ने इसे चिठ्ठा चर्चा पर अपनी पसन्द के रूप में प्रस्तुत किया। अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस (८ मार्च) के अवसर पर स्त्री विमर्श से सम्बन्धित चिठ्ठों की चर्चा के अन्त में यह कविता दी गयी और इसी कविता की एक पंक्ति को चर्चा का शीर्षक  बना दिया गया। इस शीर्षक ने कुछ पाठकों को आहत भी किया।

स्त्री जाति के प्रति जिस हिंसा का चित्रण इस कविता में किया गया है वह रोंगटे खड़ा कर देने वाला है। युद्ध की एक विभीषिका विजित राष्ट्र के पकड़े गये सैनिकों, नागरिकों, मर्दों और औरतों के साथ की जाने वाली कठोर और अमानवीय यातना के रूप में देखी जाती है। विजेता सैनिकों में उठने वाली क्रूर हिंसा की भावना का शिकार सबसे अधिक औरतों को होना पड़ता है। इसका कारण कदाचित्‌ उनका औरत होना ही है। बल्कि और स्पष्ट कहें तो उनका मादा शरीर होना है। जो पुरुष ऐसी जंगली पाशविकता की विवेकहीन कुत्सा के वशीभूत होकर इस प्रकार से हिंस्र हो उठता है वह स्वयं मानव होने के बजाय एक नर पशु से अधिक कुछ भी नहीं होता। मेरा मानना है कि जिसके भीतर मनुष्यता का लेशमात्र भी शेष है वह इस प्रकार के पैशाचिक कृत्य नही कर सकता। इस कविता में ऐसे ही नर-पिशाचों की कुत्सित भावना का चित्रण किया गया है।

सभ्यता के विकास की कहानी हमारे लिए भौतिक सुख साधनों की खोज और अविष्कारों से अधिक हमारी पाशविकता पर विवेकशीलता के विजय की कहानी है। यह मनुष्य द्वारा जंगली जीवन से बाहर आकर मत्स्य न्याय की आदिम प्रणाली का त्याग करके उच्च मानवीय मूल्यों पर आधारित समाज विकसित करने की कहानी है। यह एक ऐसे सामाजिक जीवन को अपनाने की कहानी है जहाँ शक्ति पर बुद्धि और विवेक का नियन्त्रण हो। जहाँ जीव मात्र की अस्मिता को उसकी शारीरिक शक्ति के आधार पर नहीं बल्कि उसके द्वारा मानव समाज को किये गये योगदान के महत्व को आधार बना कर परिभाषित किया जाय। जहाँ हम वसुन्धरा को वीर-भोग्या नहीं बल्कि जननी-जन्मभूमि मानकर आदर करें। जहाँ हम नारी को भोग की वस्तु के बजाय सृजन और उत्पत्ति की अधिष्ठात्री माने और उसे उसी के अनुरूप प्रतिष्ठित करें।

यदि हम अपने मन और बुद्धि को इस दृष्टिकोण से संचालित नहीं कर पाते हैं तो यह हमें उसी पाशविकता की ओर धकेल देगा जहाँ निर्बल को सबल के हाथों दमित होते रहने का  दुष्चक्र झेलना पड़ता है। वहाँ क्या पुरुष और क्या नारी? केवल ‘शक्तिशाली’ और ‘कमजोर’ की पहचान रह जाती है। इस जंगली व्यवस्था में नर की अपेक्षा नारी को कमजोर पाया जाता है और इसी लिए उसे पीड़िता के रूप में जीना-मरना पड़ता है।

आपने देखा होगा कि यदि बन्दरों के झुण्ड में अनेक नर वानर हों तो वे आपस में भी हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। मादा वानर पर आधिपत्य के लिए अधिक शक्तिशाली नर कमजोर नर को भी अपनी हिंसा का शिकार उसी प्रकार बनाता है जिस प्रकार वह मादा को अपनी शक्ति से वश में करने के लिए हिंसा का भय दिखाता है। यह बात दीगर है कि बन्दरों में भी मादा को रिझाने के लिए मनुष्यों की भाँति ही दूसरे करतब दिखाने की प्रवृत्ति भी पायी जाती है। कदाचित्‌ इसलिए कि कोमल प्रेम का अवदान बलप्रयोग से प्राप्त नहीं किया जा सकता।

हम अपने समाज में जो हिंसा और उत्पीड़न देखते हैं उसके पीछे वही पाशविकता काम करती है जो हमारे आदिम जीवन से अबतक हमारे भीतर जमी हुई है। सभ्यता की सीढ़ियाँ चढते हुए हम आगे तो बढ़ते आये हैं लेकिन इस सतत प्रक्रिया में अभी बहुत लम्बा रास्ता तय करना बाकी है। बल्कि सम्पूर्ण मानव प्रजाति के अलग-अलग हिस्सों ने अलग-अलग दूरी तय की है। तभी तो हमारे समाज में सभ्यता के स्तर को भी ‘कम’ या ‘ज्यादा’ के रूप में आँकने की जरूरत पड़ती है। जिस समाज में स्वतंत्रता, समानता और न्याय के मूल्य जिस मात्रा में प्रतिष्ठित हैं वह समाज उसी अनुपात में सभ्य माना जाता है।

औरत को प्रकृति ने कोमल और सहनशील बनाया है क्यों कि उसकी कोंख में एक जीव की रचना होती है। उसे वात्सल्य का स्निग्ध स्पर्श देना और स्वयं कष्ट सहकर उस नन्हें जीव को सकुशल इस धरती पर उतारना होता है।

जीवोत्पत्ति की सक्रिय वाहक बनने की प्रक्रिया स्त्री को अनेक शारीरिक कष्ट और मानसिक तनाव देती है। यौवन की दहलीज पर कदम रखते ही उसके शरीर से रक्तश्राव का प्राकृतिक चक्र शुरू हो जाता है और इसके प्रारम्भ होते ही तमाम हार्मोन्स उसकी मनोदशा को तनाव ग्रस्त करते जाते हैं। इस अतिरिक्त जिम्मेदारी के साथ जीना उसे सीखना ही पड़ता है। वह इसे प्रकृति का अनुपम वरदान मानकर  इसमें सुख ढूँढ लेती है। रितु क्रिया को लेकर अनेक धार्मिक और पारिवारिक रूढ़ियाँ स्त्री को हीन दशा में पहुँचाने का काम करती हैं। कहीं कहीं इस अवस्था में उसे अछूत बना दिया जाता है। घर के किसी एकान्त कोने में अस्पृश्य बनकर पड़े रहना उसकी नियति होती है। घर की दूसरी महिलाएं ही उसकी इस दशा को लेकर एक बेतुकी आचार संहिता बना डालती हैं। आधुनिक शिक्षा और वैज्ञानिक जानकारी के अभाव में यह सजा किसी भी औरत को भोगनी पड़ जाती है।

तरुणाई आते ही शरीर में होने वाले बड़े बदलाव के दर्द को महसूस करती, अपने आस पास की नर आँखों से अपने यौवन को ढकती छुपाती और बचपन की उछल कूद को अपने दुपट्टे में बाँधती हुई लड़की अपने समवयस्क लड़कों की तेज होती रफ़्तार से काफी पीछे छूट जाती है। लड़के जहाँ अपनी शारीरिक शक्ति का विस्तार करते हैं वहीं लड़कियों को परिमार्जन का पाठ पढ़ना पड़ता है।

जीवन में आने वाले पुरुष के साथ संसर्ग का प्रथम अनुभव भी कम कष्टदायक नहीं होता। आदमी जब अपने पुरुषत्व के प्रथम संधान का डंका पीट रहा होता है तब औरत बिना कोई शिकायत किए एक और रक्तश्राव को सम्हाल रही होती है। ऐसे रास्ते तलाश रही होती है कि दोनो के बीच प्रेम के उत्कर्ष का सुख सहज रूप में प्राप्त हो सके। पुरुष जहाँ एक भोक्ता का सिंहनाद कर रहा होता है, वहीं स्त्री शर्माती सकुचाती भोग्या बनकर ही तृप्ति का भाव ढूँढती है।

स्त्री देह में एक जीव का बीजारोपण शारीरिक और मानसिक तकलीफों का एक लम्बा सिलसिला लेकर आता है। इस पूरी प्रक्रिया में कभी कभी तो जान पर बन आती है। लेकिन सामान्य स्थितियों में भी अनेक हार्मोन्स के घटने बढ़ने से शुरुआती तीन-चार महीने मितली, उल्टी और चक्कर आने के बीच ही कटते हैं। बहुत अच्छी देखभाल के बावजूद ये कष्ट प्रायः अपरिहार्य हैं। जहाँ किसी अनुभवी महिला द्वारा देखभाल की सुविधा उपलब्ध नहीं है वहाँ समस्या गम्भीर हो जाती है।

जब हम किसी कष्ट को बड़ा और असह्य बताना चाहते हैं तो उसकी तुलना ‘प्रसव वेदना’ से करते हैं। लेकिन उसका क्या कीजिए जिसे प्रकृति ने ही इस वेदना का पात्र बना रखा  है। कोई पुरुष दुःख बाँटने की चाहे जितनी कोशिश कर ले, यह कष्ट सहन करने का भार औरत के ही हिस्से में रहेगा। अत्यन्त पीड़ादायी प्रसव के बाद महीनों चलने वाला रक्त श्राव हो या नवजात के साथ रात-दिन जाकर उसकी सफाई-दफाई करने और स्तनपान कराने का क्रम हो, ये सभी कष्ट अपरिहार्य हैं। इन्हें स्त्री प्रकृति का वरदान मानकर गौरव का अनुभव भले ही करती है और इससे कष्ट के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन भी हो जाता होगा, लेकिन कष्ट की मात्रा कम नहीं होती।

ऊपर मैने जो कष्ट गिनाए हैं वो तब हैं जब स्त्री को भले लोगों के बीच सहानुभूति और संवेदना मिलने के बावजूद उठाने पड़ते हैं। अब इसमें यदि समाज के हम नर-नारी अपनी नासमझी, पिछड़ेपन, ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ, काम, क्रोध, मद, लोभ, उन्माद, महत्वाकांक्षा, आदि विकारों के वशीभूत होकर किसी स्त्री को अन्य प्रकार से भी कष्ट देते हैं तो इससे बड़ी विडम्बना कुछ नहीं हो सकती है।

मुझे ऐसा लगता है कि प्रकृति ने स्त्री के लिए जैसी जिम्मेदारी दे रखी है उसे ठीक से निभाने के लिए उसने पुरुष को भी अनेक विशिष्ट योग्यताएं दे रखी हैं। शारीरिक ताकत, युद्ध कौशल, शक्तिप्रदर्शन, निर्भीकता, मानसिक कठोरता, स्नेहशीलता, अभिभावकत्व, और विपरीत परिस्थितियों में भी दृढ़्ता पूर्वक संघर्ष करने की क्षमता प्रायः इनमें अधिक पायी जाती है। लेकिन यह भी सत्य है कि पुरुषों के भीतर पाये जाने वाले ये गुण स्त्रैण विशिष्टताओं की भाँति अनन्य नहीं हैं बल्कि ये स्त्रियों में भी न्यूनाधिक मात्रा में पाये जाते हैं।

ऐसी हालत को देखते हुए एक सभ्य समाज में स्त्री के प्रति किए जाने वाले व्यवहार में प्रकृतिप्रदत्त इस पीड़ा को कम करने के लिए भावनात्मक सम्वेदना, सहानुभूति और कार्यात्मक सहयोग देना अनिवार्य है। उसकी कठिनाई को उसके प्रति सहृदयता, संरक्षण और सामाजिक सुरक्षा देकर कम किया जा सकता है। समाज में उसकी प्रास्थिति को सृजन और उत्पत्ति के आधार के रूप में गरिमा प्रदान की जानी चाहिए, उसे एक जननी के रूप में समादृत और महिमा मण्डित किया जाना चाहिए, जीवन संगिनी और अर्धांगिनी के रूप में बराबरी के अधिकार का सम्मान देना चाहिए और सबसे बढ़कर एक व्यक्ति के रूप में उसके वहुमुखी विकास की परिस्थितियाँ पैदा करनी चाहिए।

इसके विपरीत यदि हम किसी औरत की कमजोरी का लाभ उठाते हुए उसका शारीरिक, मानसिक वाचिक अथवा अन्य प्रकार से शोषण करते हैं तो निश्चित रूप से हम सभ्यता के सोपान पर बहुत नीचे खड़े हुए हैं।

आजकल स्त्री विमर्श के नाम पर कुछ नारीवादी लेखिकाओं द्वारा कुछेक उदाहरणों द्वारा पूरी पुरुष जाति को एक समान स्त्री-शोषक और महिला अधिकारों पर कुठाराघात करने वाला घोषित किया जा रहा है और सभी स्त्रियों को शोषित और दलित श्रेणी में रखने का रुदन फैलाया जा रहा है। इनके द्वारा पुरुषवर्ग को गाली देकर और महिलाओं में उनके प्रति नफ़रत व विरोध की भावना भरकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली जा रही है। यह सिर्फ़ उग्र प्रतिक्रियावादी पुरुषविरोधवाद होकर रह गया है। यह प्रवृत्ति न सिर्फ़ विवेकहीनता का परिचय देती है बल्कि नारी आन्दोलन को गलत धरातल पर ले जाती है।

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हमें कोशिश करनी चाहिए कि सामाजिक शिक्षा के आधुनिक माध्यमों से स्त्री-पुरुष की भिन्न प्रास्थितियों को समझाते हुए उनके बीच उच्च मानवीय मूल्यों की स्थापना हेतु मिल-बैठकर विचार-विमर्श करें और कन्धे से कन्धा मिलाकर साझे प्रयास से एक प्रगतिशील समतामूलक समाज के निर्माण की दिशा में आशावादी होकर काम करें।

आइए हम खुद से पूछें कि प्रकृति ने औरतों के साथ क्या कम हिंसा की है जो हम इस क्रूरता को तोड़्ना नहीं चाहते…? यदि तोड़ना चाहते है तो सच्ची सभ्यता की राह पर आगे क्यों नहीं बढ़ते…?

(सिद्धार्थ)