मेरी पिछली पोस्ट छपे दस दिन हो गये। यह सत्यार्थमित्र पर ९९वीं पोस्ट थी यह दे्खकर मेरा मन मुग्ध हो गया था। शतक से बस एक पोस्ट दूर था मैं। यानि अगली बार राइटर में ‘पब्लिश’ बटन दबाते ही मैं शतकवीर हो जाउंगा। सहसा हवा में बैट उठाकर पैबेलियन की ओर अभिवादन करते, फिर एक हाथ में हेलमेट और दूसरे में बल्ला पकड़े, बाँहें फैलाए आसमान की ओर देखकर किसी देवता को धन्यवाद देते सचिन का चेहरा मेरे मन की आँखों के आगे घूम गया।

nervous 90s

क्या यादगार क्षण होते हैं जब शतक जैसा एक मील का पत्थर पार किया जाता है। इसका मुझे प्रत्यक्ष अनुभव होने वाला था। मैने सोचना शुरू कर दिया कि इस नम्बर पर मैं कलमतोड़ लिखाई करूंगा। यादगार पोस्ट होगी। एक बार में ही समीर जी, ज्ञान जी, फुरसतिया जी, ये जी, वो जी, सबकी छुट्टी कर दूंगा। बस छा जाऊंगा। …यह भी सोच डाला कि जल्दबाजी नहीं करूंगा। फुरसत में सोचकर बढ़िया से लिखूंगा।

आदमी अपनी शादी के समय जिस तरह की योजनाएं बनाता है, सबसे अच्छा कपड़ा लेकर, सबसे अच्छा केश-विन्यास (हेयर स्टाइल) बनाकर, इत्र-फुलेल, चमकते जूते, ताजा इश्तरी, गर्मियों में भी कोट और टाई, आदि से सजधजकर, सभी दोस्तों-मित्रों व रिश्तेदारों के बीच सजी धजी गाड़ी में राजकुमार जैसा दिखने की जैसी लालसा करता है वैसी ही कुछ हलचल मेरे मन में होने लगी। ऐसा मौका रोज-रोज थोड़े ही आता है…। ये बात अलग है कि नाच-कूदकर जब दूल्हा ससुर के दरवाजे पर बारात लिए पहुँचता है तबतक सबकुछ हड़बड़ी में बदल चुका होता है। मुहूर्त निकला जाता है।

विषय के चयन को लेकर मन्थन शुरू हुआ। होली के बीतने के बाद हँसी-ठट्ठा का माहौल थोड़ा बदल लेना चाहिए इसलिए कोई हल्का-फुल्का विषय नहीं चलेगा। राजनीति में उबाल आ तो रहा है लेकिन मुझे इसपर लिखना नहीं है। सरकारी नौकर जो ठहरा। साहित्य की रचना करूँ भी तो अनाधिकार चेष्टा होगी, क्योंकि मैंने साहित्य का विषय पढ़ा ही नहीं है। बड़ी से बड़ी कोशिश में भी औसत से भी कम दर्जे की कविता बना पाऊंगा। इस मुकाम पर ऐसा कैसे चल पाएगा? सामाजिक मुद्दों पर लिखना भी बहुत अच्छा रिस्पॉन्स नहीं देता। वही दस-बारह लोग जो हमें पहले से ही जानते हैं, यहाँ आकर कुछ टीप जाएंगे। ट्रैफिक बढ़ाने की ताकत इन मुद्दों में भी नहीं है।

तो क्या कुछ विवादित बात की जाय जिससे क‍इयों की सुग्राही भृकुटियों का तनाव हमारी ओर लक्षित हो जाय। कुछ लोग तो तैयार मिलेंगे ही बमचक के लिए…। 

लेकिन जूतम-पैजारियत की संभावनाओं वाला लेखन मुझे सीखना अभी बाकी है। सत्यार्थमित्र की इस संकल्पना का क्या होगा?

“हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।”

फिर क्या लिखें फड़कता हुआ…?

यही सोचते विचारते पूरा सप्ताह निकल गया। ऑ्फ़िस से घर, घर से ऑफिस आते-जाते, चिन्तन-मनन करते एक कालजयी रचना का शीर्षक तक नहीं सूझ सका। शिवकुमार जी से बात की तो बोले ठाकुर बाबा जैसा कुछ लिख मारिए। …हुँह! मुझे किसी ‘जैसा’ तो लिखना ही नहीं है। मुझे तो बस अद्वितीय लिखना है। वह जो पिछली निन्यानबे पोस्टों में न रहा हो।

पत्नी को एक सप्ताह के लिए मायके जाना था तो बोलीं कि मेरे जाने से पहले शतक पूरा कर लेते। मैं था कि आइडिया ढूँढ नहीं पा रहा था। विदा लेते समय बोलीं,

“जा रही हूँ, …आपकी पोस्ट वहीं पढूंगी। घर में अकेले रहिएगा। जी भर लिखिएगा और ब्लॉगरी करिएगा। …कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा।”

मैं झेंपने जैसा मुँह बनाकर भी भीतर से मुस्करा रहा था। बात तो सही थी। जितना चाहूँ कम्प्यूटर पर बैठूँ? कोई टोकने वाला नहीं। एक ब्लॉगर को और क्या चाहिए?

लेकिन चाह से सबकुछ तो नहीं हो सकता न…! कोई झन्नाटेदार आइटम दिमाग में उतरा ही नहीं। इसलिए सीपीयू का बटन ऑन करने में भी आलस्य लगने लगा। मैं टीवी पर वरुण गान्धी का दुस्साहसी भाषण सुनता रहा। चैनेल वालों की सनसनी खेज कवरेज देखता रहा जैसे मुम्बई पर हमले के वक्त देखता था। सोचने लगा कि चलो कम से कम एक नेता तो ऐसा ईमानदार निकला जो जैसा सोचता है वही बोल पड़ा। अन्दर सोचना कुछ, और बाहर बोलना कुछ तो आजकल नेताओं के फैशन की बात हो गयी है। …लेकिन दिल की बात बोल के तो बन्दा फँस ही गया। तो ऐसे फँसे आदमी के बारे में क्या लिखा जाय?

इसी उधेड़ बुन मे नरभसा रहा था तभी अनूप जी ‘फुरसतिया’ हमारे तारणहार बनकर फोन से हाल-चाल लेने आ गये। उनका टेण्ट उखड़ने से थोड़ी मौज की हलचल दूसरे हल्कों में उठ गयी थी। उसी को समेटने के चक्कर में उन्होंने मुझे गुरुमन्त्र दे दिया कि जब ऐसी सोच हावी होने लगे कि बहुत कलमतोड़ लिखाई करनी है तो सावधान हो जाइए। झटपट एक घटिया पोस्ट लिख मारिए ताकि इस दलदल में धँसना न पड़े। …यह भी कि घटिया लिखने के अनेक फायदों में से एक यह भी है कि उसके बाद सुधार और विकास की सम्भावना बढ़ जाती है। उन्होंने दो मजबूत सूत्र और बताए हैं:

1.अगर आप इस भ्रम का शिकार हैं कि दुनिया का खाना आपका ब्लाग पढ़े बिना हजम नहीं होगा तो आप अगली सांस लेने के पहले ब्लाग लिखना बंद कर दें। दिमाग खराब होने से बचाने का इसके अलावा कोई उपाय नहीं है।

2.जब आप अपने किसी विचार को बेवकूफी की बात समझकर लिखने से बचते हैं तो अगली पोस्ट तभी लिख पायेंगे जब आप उससे बड़ी बेवकूफी की बात को लिखने की हिम्मत जुटा सकेंगे।-(ब्लागिंग के सूत्र से)

फिर क्या था। मेरी ‘लिथार्जी’ खतम हो गयी। …लेकिन कम्प्यूटर पर बैठना तबतक न हो पाता जबतक एक घटिया पोस्ट का विषय न मिल जाय। इसमें भी एक दिन लग गया। आखिरकार मैं अपने सपने की नश्वरता को पहचान कर वास्तविक धरातल पर लैंड कर गया। यह पोस्ट जबतक आपके सामने होगी तबतक मेरी धर्मपत्नी भी मायके से लौ्टकर यहाँ पहुँचने की राह में होंगी।

पुछल्ला: जब एक तस्वीर के जुगाड़ के लिए गूगल महराज से ईमेज सर्च करने के लिए nervous nineties टाइप करके चटका लगाया तो सबसे अधिक जो तस्वीरें आयीं वह उसी तेन्दुलकर की थीं जिसे दस दिन पहले ही मेरे मन की आँखों ने देखा था। आपभी आजमा कर देख लीजिए। मैं तो चला  फिरसे  आत्ममुग्ध होने। आप भी इस शतक का अपनी तरह से आनन्द उठाइए। नहीं तो मौज ही लीजिए…।

(सिद्धार्थ)