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आजकल चुनावी सरगर्मी में कोई दूसरा विषय अपनी ओर ध्यान नहीं खींच पा रहा है। दिनभर दफ़्तर से लेकर घर तक और अखबार-टीवी से लेकर इण्टरनेट तक बस चुनावी तमाशे की ही चर्चा है। सरकारी महकमें तो बुरी तरह चुनावगामी हो गये हैं।

ऐसे में मेरा मन भी चुनावी कविता में हाथ आजमाने का लोभ संवरण नहीं कर सका। तो लीजिए पेश हैं:

चुनावी कुण्डलियाँ

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वामपन्थ की रार से अलग पड़ गया ‘हाथ’।
सत्ता की खिचड़ी पकी, अमर मुलायम साथ॥

अमर मुलायम साथ चले कुछ मास निभाए।
बजा चुनावी बिगुल, छिटक कर बाहर आए॥

यू.पी. और बिहार में, नहीं ‘हाथ’ का काम।
तीन-चार मोर्चे बने, ढुल-मुल दक्षिण-वाम॥

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अडवाणी की मांग पर, मनमोहन हैं मौन।
सत्ताधारी पीठ का,     असली  नेता कौन॥

असली नेता कौन समझ में अभी न आया।
अडवानी,  पसवान,  मुलायम,  लालू,  माया॥

लोकतंत्र का मन्त्र,  जप रही बर्बर वाणी।
‘पी.एम. इन वेटिंग’ ही  बन बैठे अडवाणी॥

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नेता पहुँचे क्षेत्र में, भाग-भाग हलकान।
वोटर से विनती करें, हमें चुने श्रीमान्‌॥

हमें चुनें श्रीमान्,    करूँ वोटर की पूजा।
मैं बस एक महान, नहीं है काबिल दूजा॥

मचा   चुनावी शोर,  घोर घबराहट देता।‌
पाँच वर्ष के बाद    लौटकर आया नेता॥

आप चुनाव का भरपूर आनन्द लीजिए। लेकिन एक विनती है कि मतदान के दिन धूप, गर्मी, और शारीरिक कष्ट की परवाह किए बिना अपना वोट ई.वी.एम. मशीन में लॉक कराने जरूर जाइए। यदि हम इस महत्व पूर्ण अवसर पर अपने मताधिकार का सकारात्मक प्रयोग नहीं करते हैं तो राजनीतिक बहसों में हिस्सा लेने का हमें कोई हक नहीं है।

(सिद्धार्थ)

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