मेरे एक सीनियर अधिकारी कानपुर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में किसी काम से आ रहे थे। कानपुर से निकलते समय मुझे फोन किया। सुबह सात बजे मैं ‘मेयोहाल’ जाने के लिए बैडमिन्टन की किट टांगकर निकलने वाला ही था कि उन्होंने फरमाया-

बहुत दिनों बाद इलाहाबाद आ रहा हूँ। मेरे लिए फाफामऊ से दो बोरी खरबूज मंगा लो।

मैने सोचा शायद मजाक कर रहे होंगे। पूछा- दो बोरी कुछ ‘कम’ नहीं है?

बोले- मजाक नहीं कर रहा हूँ। सच में चाहिए।

मैने फिर पूछा- ये तरबूज वही न जो बड़ा सा हरा-हरा होता है? खाने में पानी टपकता है?

आदेश के स्वर में बोले- ज्यादा पूछो मत। तुरन्त निकल लो। देर हो जाएगी तो माल मिलेगा ही नहीं। दो बोरी लाना…।

मैंने मन की दुविधा को परे धकेल दिया। स्कूटर अन्दर किया। कार की चाभी ली, दो बोरे और सुतली रखा, और चल पड़ा। तेलियरगंज होते हुए गंगा जी के पुल को पार करते ही मन्जिल आ गयी। गाड़ी को सड़क किनारे खड़ा कर लिया।

किसी से अभीष्ठ स्थान का पता पूछने की जरुरत नहीं पड़ी। पुल समाप्त होते ही गंगा की रेत में पैदा होने वाले तरबूज, खरबूज, खीरा, ककड़ी इत्यादि की सड़क पर लगने वाली थोक बाजार बिल्कुल सामने थी। कुछ ट्रैक्टर ट्रॉलियों से माल उतर रहा था। तरबूज के पहाड़ सड़क के किनारे जमाए जा रहे थे। अन्य माल थोड़ा कम मात्रा में था।

मैं मोल-भाव करने और पूरी बाजार में न्यूनतम मूल्य पता करने के उद्देश्य से मुख्य सड़क की पूर्वी पटरी से निकलने वाली छोटी सड़क पर आगे बढ़ गया जो नदी के तट पर जाती है। इस राह पर शवदाह प्रक्रिया से सम्बन्धित सामग्रियों की दुकाने भी हैं लेकिन मुझे उनमें कोई रुचि न थी।

सुबह के वक्त मैने वहाँ जो दृश्य देखा वह मेरे लिए बिल्कुल नया था। सड़क के किनारे पंक्तिबद्ध होकर पीठ पर तरबूजों से भरे विशेष आकृति के विशाल पात्र (छेंवकी) लादे पूरे अनुशासन से बैठे हुए दर्जनों ऊँटों की श्रृंखला देखकर मुझे थोड़ी हैरत हुई। अपने लम्बे पैरों को जिसप्रकार मोड़कर और शरीर को सिकोड़कर ये बैठे हुए थे उन्हें देखकर झटसे मेरा मोबाइल कैमरा चालू हो गया।

पहली तस्वीर तो चित्र-पहेली के लायक है। लेकिन मेरे पास धैर्य की कमी है इसलिए सबकुछ अभी दिखा देता हूँ:

तरबूज (2)

इसको ठीक से समझ पाने के लिए आगे से देखना पड़ेगा:

तरबूज

इन्हें इनके मालिक ने अलग बैठा दिया है। शायद डग्गामारी का इरादा है।

तरबूज (4)

असली पाँत वाले तो यहाँ हैं:

तरबूज (3) 

इस दृश्य को आपतक पहुँचाने का उत्साह मेरे मन में ऐसा अतिक्रमण कर गया कि मुझे यह ध्यान ही नहीं रहा कि मुझे क्या-क्या खरीदना था। मैने दो बोरी तरबूज खरीद डाले। दो अलग-अलग दुकानों से ताकि सारे खराब होने की प्रायिकता आधी की जा सके। गंगाजी की रेती में उपजा ताजा नेनुआ और खीरा भी मिल गया। लेकिन गड़बड़ तो हो ही गयी…।

जब हमारे मेहमान सपत्नीक पधारे तो घर के बाहरी बरामदे में ही दोनो बोरियाँ देखकर खुश हो गये। मैने भी चहकते हुए बताया कि इन्हें मैं अपने हाथों खरीदकर और गाड़ी में लाद कर लाया हूँ। उन्होंने बोरी का मुँह खोलकर देखा तो उनका अपना मुँह भी खुला का खुला रह गया…।

मैंने उनके चेहरे पर आते-जाते असमन्जस के भाव को ताड़ लिया। “ सर, क्या हुआ। आपने तरबूज ही कहा था न…?”

“नहीं भाई, मैंने तो खरबूज कहा था। लेकिन कोई बात नहीं। यह भी बढ़िया है।” मैने साफ देखा कि उनके चेहरे पर दिलासा देने का भाव अधिक था, सन्तुष्टि का नहीं…।

…ओफ़्फ़ो, …खरबूज तो पीला-धूसर या सफेद होता है। कुछ हरी-हरी चित्तियाँ होती हैं और साइज इससे काफी छोटी होती है। मुझे वही लाना था लेकिन ऊँटों के नजारे में कुछ सूझा ही नहीं। ढेर तो इसी तरबूज का ही लगा था।

मैने ध्यान से सोचा और कहा; “वो खरबूज तो वहाँ इक्का-दुक्का दुकानों पर ही था और अच्छा नहीं दिख रहा था।”

“हाँ अभी उसकी आवक कम होगी। लेकिन फाफामऊ का खरबूज जितना मीठा होता है उतना कहीं और का नहीं। जब कभी मौका मिले तो जरूर लाना” वे मेरे उत्साह को सम्हालते हुए बोले।

परिणाम: जाते-जाते वे एक बोरी तरबूज तो ले गये लेकिन दूसरी बोरी मेरे गले पड़ी है। तीन दिन से सुबह-दोपहर-शाम उसी का नाश्ता कर रहा हूँ। पर है तो बड़ा मीठा। यही सन्तोष की बात है। 🙂

(सिद्धार्थ)