ब्लॉगरी भी अजीब फितरत है। इसमें लगे रहो तो मुसीबत और न लग पाओ तो और मुसीबत। अभी एक पखवारे तक जो लोग इसमें लगे रहे वे निरापद लेखन की खोज में हलकान होते रहे और मैं इस चिन्ता में दुबला होता रहा कि मैं तो कुछ लिख ही नहीं पा रहा हूँ।

28052009306 बेटे के मुण्डन में गाँव जाना क्या हुआ मैने उसकी व्यस्तता की आड़ में खूब आलस्य का मजा लिया। कार्यक्रम की फोटुएं भी भतीजे की तगड़ी मोबाइल में वहीं छोड़ आया। घर-परिवार वालों ने सलाह दी कि बच्चे को ज्यादा एक्सपोजर दोगे तो नज़र लग जाएगी। बस मेरे आलस्य की बेल इस सलाह की डाल का सहारा पाकर लहलहा उठी। आज ही कुछ तस्वीरें मेरे हाथ लगी हैं लेकिन कौन सी लगाऊँ समझ नहीं पा रहा। …चलिए कोट माई के चरणों में खड़े सत्यार्थ की मुस्कान का आनन्द लीजिए।

इधर सत्यार्थ की मौसी श्रीमती रागिनी शुक्ला जी से भी भेंट हुई। उन्होंने एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की विधवा की करुण सत्यकथा हमें भेंट की। सोचा था पिछली दो कहानियों की कड़ी में उनकी तीसरी कहानी भी यहाँ पोस्ट कर दूंगा। लेकिन यहाँ घर में ही मात खा गया। श्रीमती जी ने अपनी दीदी की कहानी पर पहला हक़ जता दिया और वह भी टूटी-फूटी पर जा लगी।

उधर छ्ठे वेतन आयोग ने बुजुर्गों के साथ थोक भाव से सहानुभूति दिखायी है। अस्सी साल की उम्र पाते ही उन्हें २० प्रतिशत अधिक पेंशन दिए जाने और उसके बाद प्रत्येक पाँच साल पर इतना ही और बढ़ा देने का निर्णय ले लिया गया है। सौ साल पार करते ही वेतन के बराबर पेंशन हो जाएगी। इसमें अपने पति के स्थान पर पारिवारिक पेंशन पाने वाली अनेक बुजुर्ग और अनपढ़ महिलाएं ऐसी हैं जिन्हें स्वयं अपनी उम्र नहीं मालूम, और न ही कोई अभिलेख ऐसे हैं जो ठीक-ठीक उम्र बता सकें। सी.एम.ओ.(Chief Medical Officer) दफ़्तर आयु बताने का काउण्टर खोलकर बैठा है; जहाँ फौरन आयु का प्रमाणपत्र बन जा रहा है। शरीर पर ‘आला’ (Stethoscope) लगा कर और जीभ-मुँह देखकर आयु का निर्धारण कर दिया जा रहा है। सुना था कि किसी खास हड्डी का एक्स-रे लेकर सही आयु बतायी जा सकती है। लेकिन वहाँ शायद इसकी जरूरत नहीं पड़ रही।  विज्ञ पाठक इसपर प्रकाश डाल सकते हैं। डॉक्टर ब्लॉगर्स से विशेष अनुरोध है।

सावित्री देवी हाई स्कूल १९४४ऐसे में सावित्री देवी जैसी पेंशनर से मन प्रसन्न हो गया जिन्होंने १९४४ में हाई स्कूल की परीक्षा पास करके अपना प्रमाणपत्र सजो कर रखा है और आज उसका लाभ ८२ साल की उम्र में पाने जा रही हैं।

गाँव में लगभग सभी बच्चे बोर्ड परीक्षाओं में अच्छे अंको के साथ सफल रहे। वे भी जिन्हें खुद ही अपनी सफलता की आशा नहीं थी। नकल महायज्ञ की घनघोर सफलता ने सारे रिकार्ड पीछे छोड़ दिए। लड़कियाँ एक बार फिर लड़कों से आगे रहीं। इस शीर्षक की वार्षिक पुनरावृत्ति अखबारों में इस बार भी पूरे जोश से हुई। इसमें छिपी विडम्बना पर कुछ कहने की इच्छा थी, लेकिन संयोग से मेरी नज़र एक अज्ञेय ब्लॉगर की पोस्ट पर पड़ गई जहाँ इन साहब ने इस विषय पर काफी कुछ कह दिया है। सो यह प्रोजेक्ट भी जाता रहा।

Image039एक दिन के लिए ससुराल जाना हुआ। आम के बाग में बन्दरों की सेना समायी हुई थी। गाँव भर के लड़के बन्दरों को भगाने के बहाने गुलेल लेकर वहाँ जमा थे। उनकी निगाह बन्दरों द्वारा काटकर या तोड़कर गिराये जा रहे आमों पर अधिक थी। लेकिन जिस नन्हें और लुप्तप्राय जीव ने वहाँ मेरा मन मोहा वह थी वहाँ के पुराने मकान में जहाँ-तहाँ घोसला बनाकर रहने वाली नन्हीं गौरैया। घर के कोने-कोने में निर्भय होकर चहकने वाली और चुहू-चुहू की आवाज से पूरा घर गुंजायमान करने वाली गौरैया का बड़ा सा परिवार मुझे एक दुर्लभ आनन्द दे गया। मोबाइल से कठिनाई पूर्वक खींचे गये फोटू तो अभी भी सुरक्षित हैं लेकिन इस लुप्त होती प्रजाति पर एक खोजी और वैज्ञानिक रिपोर्ट बनाने के सपने ने इसपर भी एक पोस्ट को रोक रखा है। डॉ. अरविन्द जी या तसलीम जी कुछ मदद करें तो अच्छा हो।

लोकसभा चुनावों के परिणामों से मायावती जी को अपने खिसकते जनाधार का अंदेशा हुआ तो उन्होंने सत्ता की पकड़ मजबूत करने के लिए कई बड़े प्रशासनिक फैसले कर डाले। उस समय जब सरकारी अफसर ट्रान्सफर सीजन की तैयारी कर रहे थे और अच्छी पोस्टिंग के लिए अपने मन्त्रीजी को प्रसन्न करने के रास्ते तलाश रहे थे तभी मैडम ने शून्य स्थानान्तरण की नीति घोषित कर दी। कहते हैं कि कितनों के हाथ के तोते उड़ गये। लेकिन मैं स्वयं एक सरकारी मुलाजिम होने के नाते इन सुनी-सुनायी बातों पर चर्चा करने से बचता रहा।

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गाँव पर इस बार सन्ताइन और उनकी हिरमतिया से भेंट हुई। जब हम ‘कोट माई’ के स्थान पर बाबू के बाल चढ़ाने गये तो देखा कि वहीं पंचायत भवन के बरामदे में दोनो माँ-बेटी परित्यक्त और नारकीय जीवन जी रहे है। डिस्कवरी चैनेल पर दिखने वाला सोमालिया का भुखमरी का दृश्य वहाँ साक्षात्‌ उपस्थित था। मेरे कुछ मित्र और रिश्तेदार जिन्होंने हिरमतिया की कहानी पढ़ रखी थी वे भी उन्हें सजीव देककर आहत हो गये। लेकिन यहाँ सच कहूँ तो चाहकर भी मुझे इस दारुण कथा का अग्र भाग लिखने की हिम्मत नहीं हुई।

शशि पाण्डेय उधर इलाहाबाद संसदीय सीट की निर्दल प्रत्याशी शशि पाण्डेय ने सबसे कम वोट पाने के बाद अगले पाँच साल के लिए जो लक्ष्य निर्धारित किया है उसमें सबसे पहला लक्ष्य है- एक दूल्हा तलाशकर उससे शादी रचाना, उसके साथ देश विदेश घूमकर मजे करना और घर-गृहस्थी बस जाने के बाद पुनः जनसेवा के मैदान में कूद जाना। यह सब मुझे तब पता चला जब वो परिणाम घोषित होने के बाद अपने चुनावी खर्च का आखिरी हिसाब जमा करने के सिलसिले में मेरे कार्यालय आयी थीं। कल मुझे फोन करके पूछ रही थीं संसद में महिला आरक्षण बिल के बारे में मेरा क्या नजरिया है। मैने उनका नजरिया पू्छा तो बोलीं कि ‘आइ अपोज इट टूथ एण्ड नेल’ कह रहीं थीं कि इससे तो अगड़े कांग्रेसियों की बहुएं और बेटियाँ ही संसद में भर जाएंगी। …एक बार फिर उनके साहसी कदम की चर्चा करना चाहता था लेकिन उन्हीं के डर से आइडिया ड्रॉप कर दिया। निरापद लिखने का दौर जो चल पड़ा है इन दिनों…। 🙂

अभी एक शादी में शामिल होने के लिए गोरखपुर तक ट्रेन से जाना-आना हुआ। सफर के दौरान लालू जी की चमत्कारी सेवाओं से लेकर उनके निर्णयों को पलटने वाली ममता बनर्जी की खूब गर्मागर्म चर्चा सुनने को मिली। लालूजी के साइड मिडिल बर्थ की खोज पर लानत भेंजने वालों के कष्ट को स्वयं महसूस करने का मौका मिला। लेकिन जो बर्थें अब निकाली जा चुकी हैं उनकी चर्चा बेमानी लगती है। साइड अपर बर्थ को भी ऊपर सरकाकर जो छत से सटा दिया गया था वो अभी वहीं अटकी हुईं हैं और मुसल्सल कष्ट देती जा रही हैं। यह सब लिखकर मैं उस जनादेश का अनादर नहीं करना चाहता जो लालूजी को इतिहास की वस्तु बना चुका है। अब लालू ब्रैण्ड की टी.आर.पी. नीचे हो चली है।

तो मित्रों, ये सभी मुद्दे मेरे मन में पिछले एक पखवारे से उमड़-घुमड़ रहे थे लेकिन एक पूरी पोस्ट के रूप में नहीं आ सके। अभी कल जब मैने एक शत-प्रतिशत निरापद पोस्ट देखा तो मन में हुलास जगा कि एक अदद पोस्ट तो चाहे जैसे निकाली जा सकती है। लेकिन बाद में किसी ने मेरे कान में बताया कि यह निरापद पोस्ट भी हटाये जाने के आसन्न संकट से दो-चार है तो मेरे होश गु़म हो गये।

अब तो यह सोच ही नहीं पा रहा हूँ कि क्या लिखूँ…! आप विषय बताकर मेरी मदद करिए न…! सादर!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)