ग्रामीण परिवेश में बिताए बचपन के दिनों से मेरे मन में अमिट रूप में जो चरित्र अंकित हैं उनमें ‘नाच पार्टी’ में स्त्री पात्रों की भूमिका निभाने वाले मर्दों की छवि विशेष कौतूहल का विषय रही है। यह ‘नाच’ शादी-विवाह के अवसर पर बारातियों के मनोरंजन के लिए आती थी। बारात के मालिक की प्रतिष्ठा इस ‘नाच’ की ख्याति के स्तर से भी नापी जाती थी। इस नाट्यदल पार्टी की ख्याति उसमें शामिल ‘पुरुष नर्तकियों’ की संख्या और गुणवत्ता के आधार पर तय होती थी।

image कमनीय काया, पतली लोचदार कमर, लम्बे-काले-असली बाल, सुरीला गला, गोरा-चिकना चेहरा और उसपर फिल्मी हिरोइनों की नकल करते हुए देर तक नाचने की क्षमता इत्यादि इस पेशे की मांग हुआ करती थी। एक मर्द के भीतर इतने स्त्रैण गुणों का एक साथ मिलना दुर्लभ तो था ही, यदि कोई ‘लवण्डा’ इस कोटी का मिल जाता था तो उसकी नाच देखने दूर-दूर से ‘नचदेखवा’ टूट पड़ते थे।

अलग-अलग गाँवों से आने वाले ये समूह इस नाच कार्यक्रम को अपने अनुसार चलाने की होड़ में कभी-कभार भिड़ भी जाते थे। यहाँ तक कि लाठियाँ निकल आतीं और सिर-फुटौवल की नौबत भी आ जाती। एक नामी ‘नचनिया’ को उसके डान्स पर खुश होकर ईनाम देने वालों की होड़ भी लग जाती। बारात में आये दूल्हे के रिश्तेदार एक दूसरे के नाम से रूपया न्यौछावर करते और स्त्री के श्रृंगार में नाचने वाला लवण्डा ढोलक और नगाड़े की थाप पर एक खास शैली में उन्हें ‘शुक्रिया अदा’ करता। अचानक दर्शक दीर्घा में बैठे किसी खास रिश्तेदार (दूल्हे के बहनोई, फूफा आदि) के पास पहुँचकर उसके ऊपर साड़ी का पल्लू फेंक देने और बदले में जबरिया ईनाम ऐंठ लेने की कला भी इनको खास अकर्षक बनाती और तालियाँ बटोरने के काम आती।

मुझे याद है जब बिजली के लिए जेनरेटर का चलन गाँवो में नहीं था, तो शादी-विवाह या अन्य बड़े आयोजनों पर पेट्रोमेक्स जलाए जाते थे। मिट्टी के तेल से चलने वाला यह ‘पंचलाइट’ ही रात के अंधेरे को दूर करने वाला उत्कृष्ट साधन माना जाता था। इस गैसलाइट को संक्षेप में ‘गैस’ ही कहा जाता था। नाच के आयोजन में इसकी भूमिका भी महत्वपूर्ण थी। मंच के सामने ऊपर बाँस या बल्ली में दो ‘गैस’ लटकाये जाते थे। जमें-जमाये कार्यक्रम के दौरान अचानक जब प्रेशर कम हो जाने पर गैस से रोशनी के बजाये आग की लपटें निकलने लगतीं तो सभी ‘गैसड़ी’ को पुकारने लगते। वह सबकी लानत-मलानत सुनता हुआ गैस को नीचे उतारता, तेल डालता, गैस में हवा भरता और दुबारा टांग कर नीचे आ जाता। इस दौरान नाच का जोकर मंच से लोगों को अपनी ठिठोली से सम्हालता।

imageगाँव के  छोटे बच्चे नाच देखने के बजाय नाच पार्टी की तैयारी और कलाकारों के सजने-सवँरने की प्रक्रिया को ताकने- झाँकने में अधिक रुचि लेते थे। नाच की ‘हिरोइन’ को दाढ़ी बनवाते, मूँछ साफ कराते और लुंगी लपेटकर बींड़ी पीते देखना उन्हें ज्यादा रोमांचक लगता। ये राजा हरिश्चन्द्र,  तारामती, मन्त्री, राजकुमारी विद्यावती, उसकी  सहेली,  रानी सारंगा, जोकर, सिपाही, साधू, फकीर, पागल, देवी, देवता, सेठ, मुनीब, कर्जदार, गब्बर, बसन्ती, बीरू और जय इत्यादि स्टेज के पीछे बने एक छोटे से घेरे में अपना मेक-अप करते तो बच्चे उस घेरे की कनात में छेद ढूँढकर या बनाकर  उनकी एक झलक पा जाने को आतुर दिखायी पड़ते। स्त्री पात्र का साज-श्रृंगार तो जैसे किसी बड़े रहस्य की बात थी। इससे पर्दा उठाने की फिराक में कुछ किशोर वय के बच्चे भी लगे रहते थे।

image किसी भी नाच का यूएसपी उसका मुख्य नर्तक ही होता था। इस कलाकार को एक खास तरह की इज्जत मिलती थी। कदाचित्‌ इसी इज्जत की लालच में बहुतेरे लड़के तरुणाई में साड़ी चढ़ाने को तैयार हो जाते थे। आर्थिक और सामाजिक कारण चाहे जो रहे हों लेकिन जिसके शरीर में नचनिया के हार्मोन्स का स्राव होने लगता वह किसी नाच के मंच तक अपना रास्ता बनाने के लिए चल ही पड़ता।

जैसा कि साहित्य, संगीत और कला के क्षेत्र में प्रायः देखा जाता है, इसमें प्रतिभा और क्षमता के अनेक स्तर पाये जाते हैं। विविधता तो होती ही है। इसमें अच्छे और खराब का कोई सर्वमान्य वस्तुनिष्ठ पैमाना न होने से इस क्षेत्र में उतरने के लिए किसी को मनाही नहीं है। कोई भी व्यक्ति कवि, गीतकार, कहानीकार, लेखक, चित्रकार, गायक, नर्तक या वादक होने के बारे में सोच सकता है और इस दिशा में शुरुआत कर सकता है। लेकिन आगे बढ़ने के लिए उसकी स्वीकार्यता पाठकों, दर्शकों, श्रोताओं और रसग्राहियों के बीच होनी जरूरी हो जाती है। अपने ब्लॉगजगत में भी यह सब खूब साफ-साफ दिखायी देता है। यहाँ भी अनेक कवि और लेखक बहती गंगा में हाथ धोते मिल जाएंगे। टीवी चैनेल्स के रियलिटी शो के माध्यम से अपनी किस्मत आजमाने के मौके नये कलाकारों को भी अब काफी मिलने लगे हैं।

लेकिन ऐसी सुविधा ग्रामीण कलाकारों के पास नहीं थी। नाचने का कीड़ा काट लेने के बाद उन्हे किसी नाचपार्टी में शामिल होने के लिए अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन का मौका मिलना बहुत कठिन था। नचदेखवों की भीड़ जिसकी नाच देखने आयी होती उसके अलावा किसी नौसिखिए को मंच पर देखना उन्हें गँवारा नहीं था। अपनी रेखिया मूँछ और शुरुआती दाढ़ी को उगना शुरू होते ही सफाचट कराकर किशोरी का वेश बनाए हुए नवोढ़ा जब बहुत मिन्नत करता तो उसे दो-चार मिनट असली नाच की शुरुआत से पहले नाचने को दे दिए जाते।

जब झुण्ड के झुण्ड अलग-अलग गाँवों से आने वाले नचदेखवों के बीच बैठने के स्थान को लेकर नोंक-झोंक हो रही होती, बारातियों को जनवासे से खाने-पीने के लिए बिटिहा के घर पर बुलाया जा रहा होता, क्षेत्र के कुछ बड़े आदमी थोड़ी देर के लिए ‘मेन आर्टिस्ट’ का एकाध नाच-गाना देकने के लिए आसन जमा रहे होते; उसी शोर-शराबे के बीच अपनी कला का प्रदर्शन करने के लिए इस नये लवण्डे को मंच दे दिया जाता। तैयारी पूरी होते ही उसे बाद में या अन्त में नाचने का वादा करके उतार दिया जाता। फिर वह पूरी रात साड़ी चढ़ाए नेपथ्य में इस आस में बैठा रहता कि नाटक पूरा हो जाने के बाद वह फिर नाचेगा।

रात के अन्तिम प्रहर में जब नाच समाप्त होने को होती और भीड़ लगभग छँट चुकी होती तब उसकी नाच कौन देखता। नाच का मालिक उसे समझाता कि अब तो गैस का तेल समाप्त हो चला है। गर्ज का मारा कलाकार इस मौके के लिए मानों पहले से तैयार बैठा हो। तेल का गैलन हाजिर…। यही वो दृश्य रहा होगा जब यह कहावत प्रचलित  हुई होगी-

“गर्जू नचनिया तेल दै दै नाचे”

एक दिन ऑफिस के लन्च रुम में जब विनोदी स्वभाव के मेरे बॉस ने अपनी खास शैली में यह लोकोक्ति सुनायी थी तो अचानक छूटी हँसी ने मेरे मुँह का जिगराफ़िया बिगाड़ दिया था। साथ बैठे कुछ दूसरे लोग जिन्हें पूरब की गऊ-पट्टी का देहाती ‘लवंडा नाच’ देखने का कोई अनुभव नहीं था वे हक्का-बक्का थे। मेरी श्वांस नली में फँस गये भुने हुए चने के टुकड़े से जब राहत मिली तब मैंने संयत होकर उन्हें कुछ बताने की कोशिश की।

चर्चा में एक साथी ने जब कहा कि यह हाल कुछ-कुछ उन तथाकथित कवियों जैसा ही है जो अपनी जेब में ताजी कविता की पाण्डुलिपि लिए घूमते रहते हैं और कोई शिकार नजर में आते ही उसे चाय-पानी का न्यौता देकर फाँस लेते हैं, तो सभी उनका समर्थन करते दिखे। जबरिया कवि से पीड़ित होने का अपना-अपना अनुभव बाँटने लगे।

अब सोच रहा हूँ कि  कुछ ऐसा ही भाव उन लेखकों और कवियों के भीतर भी पैठा रहा होगा जो अपनी मेहनत से लिखी किताब को किसी प्रकाशक से पैसा देकर छपवाते हैं और फिर अपने  लोगों के बीच उसकी प्रतियाँ सादर, सप्रेम या सस्नेह भेंट करते हैं। जेब से पैसा खर्च करके पढ़ने की आदत हमारे समाज में कम तो हुई ही है लेकिन ‘तेल देकर नाचने’ को तैयार लोगों ने भी इस प्रवृत्ति को खाद-पानी देकर मजबूत बनाया है।

इसी विचित्र मनःस्थिति से उत्पन्न दुविधा के कारण मैने अपने खर्च से  किसी इष्टमित्र या रिश्तेदार को ‘सत्यार्थमित्र’ पुस्तक की प्रति मुफ़्त भेंट नहीं की। कुछ लोग शायद नाराज भी हों।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)