गूगल से साभाररविवार की शाम को NDTV24×7 चैनेल पर बरखा दत्त का कार्यक्रम “वी-द पीपुल” देखने का दुर्भाग्य हुआ। दुर्भाग्य…! जी हाँ, दुर्भाग्य। इस देश के अनेक कुलीन बुद्धिजीवी इकट्ठा होकर तथाकथित भाषा समस्या पर विचार कर रहे थे। बेलगाम जिले के मराठी भाषी ८६५ गाँवों को लेकर कर्नाटक और महाराष्ट्र के बीच जो अप्रिय स्थिति उत्पन्न हो गयी है उसी को आधार बनाकर यह कार्यक्रम पेश किया गया था। लेकिन मराठी और कन्नड़ के बजाय असल मामला हिन्दी का उलझा हुआ जान पड़ा। कम से कम मुझे तो ऐसा ही प्रदर्शित किया जाता महसूस हुआ।
वहाँ बहुत से ऐसे लोग सुनायी पड़े जिन्हें दक्षिण के स्कूलों में हिन्दी की पढ़ाई बच्चों के ऊपर अनावश्यक बोझ लग रही थी। वे इस पक्ष में थे कि क्षेत्रीय भाषा के बाद अंग्रेजी को अन्य संपर्क भाषा के रूप में अपनाया जाना चाहिए। इस विचारधारा का परोक्ष पोषण एंकर के रूप में मोहतरमा बरखा जी स्वयं कर रही थीं।
हम वहाँ की चर्चा देख-सुनकर दंग रह गये कि आज भी हमारे देश की अंग्रेजी मीडिया में बैठे लोग किस प्रकार हिन्दी को हेय दृष्टि से देख रहे हैं। वहाँ उपस्थित अशोक चक्रधर जी ने हिन्दी के पक्ष में अपनी बात कहने की कोशिश की लेकिन उन्हें टोकाटाकी झेलनी पड़ी। देश की जनसंख्या कें मात्र ३-४ प्रतिशत लोगों द्वारा बोली जाने वाली अंग्रेजी को हिन्दी की तुलना में वरीयता देते ये सम्प्रभु लोग यह तर्क दे रहे थे कि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर सफल होने के लिए अंग्रेजी का ज्ञान अनिवार्य है। गैर हिन्दी भाषी प्रदेश के लोग अपनी क्षेत्रीय भाषा के बाद यदि अंग्रेजी सीख लें तो उन्हें राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक अवसर प्राप्त हो जाएंगे। लेकिन हिन्दी को दूसरी भाषा के रूप में सीखने से उन्हें कोई फायदा नहीं होगा।
जो लोग हिन्दी को राष्ट्रीयता से जोड़ते हुए देश की सार्वजनिक भाषा बनाने के पक्ष में खड़े थे उनमें अशोक चक्रधर के अलावा सबसे महत्वपूर्ण मार्क टली थे।  मार्क टली वैसे तो अंग्रेज हैं, लेकिन भारत की धरती से उन्हें इतना लगाव है कि बीबीसी की नौकरी से अवकाश ग्रहण करने के बाद भी यहीं बस गये हैं। बीबीसी सम्वाददाता के रूप में अपने जीवन का बड़ा भाग भारत में गुजारते हुए उन्होंने दूर-दूर तक ग्रामीण भारत का भ्रमण किया है और वहाँ की सच्चाई से सुपरिचित हैं।  जब बरखा ने यह निष्कर्ष व्यक्त किया कि हमारे यहाँ मातृभाषा के अतिरिक्त सम्पर्क भाषा के रूप में अंग्रेजी का प्रयोग होना चाहिए तो पद्‍मश्री मार्क टली ने उलटकर पूछा कि अंग्रेजी के बजाय हिन्दी क्यों नही…। इसपर एक निर्लज्ज हँसी के अलावा बरखा जी के पास कोई जवाब नहीं था।
फर्राटेदार अंग्रेजी बोल रही एक तमिल मूल की छात्रा से जब यह पूछा गया कि  क्या आप हिन्दी जानती हैं तो उसने कहा कि मैने जिन स्कूलों में पढ़ाई की है वहाँ दुर्भाग्य से हिन्दी पढ़ाई जाती थी इसलिए मुझे सीखनी पड़ी। लेकिन मैं बोलती नहीं हूँ (यानि बोलना पसन्द नहीं करती)। इसपर अधिकांश लोगों ने जो प्रतिक्रिया व्यक्त की वह रोषपूर्ण होने के बजाय प्रमोद व्यक्त करती अधिक जान पड़ी। मैं तो यह देखकर सन्न रह गया।
यहाँ वर्धा स्थित हिन्दी विश्वविद्यालय के परिसर में रहते हुए जब मैं इस बारे में सोचता हूँ तो मन में एक अजीब सी तकलीफ़ पैदा हो जाती है। हम यहाँ इस सन्देश को फैलाने की चेष्टा में हैं कि हिन्दी ही इस देश को एकता के सूत्र में पिरो सकती है, लेकिन देश का एक बड़ा मीडिया समूह इस विचारभूमि में सन्देह के बीज बोने का कुत्सित प्रयास कर रहा है।
हम हिन्दी को न सिर्फ़ उत्कृष्ट साहित्य का खजाना बनते देखना चाहते हैं बल्कि इसे ज्ञान विज्ञान की एक सक्षम संवाहक भाषा के रूप में निरन्तर विकसित होते देखना चाहते हैं। अखिल भारत की सम्पर्क भाषा तो यह है ही, इसे अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर सम्पर्क भाषा का दर्जा दिलाने की गम्भीर कोशिश भी होनी चाहिए। संस्कृत मूल से उपजी तमाम भारतीय भाषाओं को एक मंच पर लाने में सक्षम यदि कोई एक भाषा है तो वह है हिन्दी जिसे बोलने वालों की संख्या सौ करोड़ के आस-पास है।
इसके बावजूद भारत की अंग्रेजी मीडिया हिन्दी की स्थिति निराशाजनक बताने पर तुली हुई है। देश की हिन्दी भाषी जनता से विज्ञापन द्वारा करोड़ॊ कमाने वाले ये मीडिया समूह ऐसी दोगली नीति पर काम कर रहे हैं तो मन में रोष पैदा होना स्वाभाविक ही है। क्या हिन्दी के ये दुश्मन देश के दुश्मन नहीं हैं?
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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