वर्धा विश्वविद्यालय शहर से दूर एक वीरान स्थल पर बसाया गया था। पाँच निर्जन शुष्क पहाड़ी टीले इस संस्था को घर बनाने के लिए नसीब हुए। बड़े-बड़े पत्थर और कंटीली झाड़ियाँ चारो ओर पसरी हुई थीं। लेकिन मनुष्य की अदम्य ऊर्जा और निर्माण करने की अनन्य शक्ति के आगे प्रकृति को भी रास्ता देना पड़ता है। शुरू-शुरू में एक कागज पर अवतरित हुआ विश्वविद्यालय आज इस पंचटीला पर धड़कता हुआ एक सुंदर रूपाकार ले रहा है। पहाड़ी ढलान से तादात्म्य बनाती इमारतों की डिजाइन ऐसी बनी है कि प्राकृतिक सौंदर्य अक्षुण्ण बना रहे। यहाँ वृक्षारोपण और जल-संग्रहण के विशेष प्रयास किए गये हैं।

परिसर में अध्यापकों, अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के परिवार भी आकर बसने लगे हैं। शहर से दूरी के कारण मौलिक जरूरतों की वस्तुओं को जुटाना कठिन है। अब धीरे धीरे दुकानें इस ओर सरकती आ रही है। आस-पास की जमीनें महँगी होने लगी हैं। यहाँ अब खेल और मनोरंजन की जरूरत पूरी करने का उपाय भी खोजा गया है। फैकल्टी एंड ऑफिसर्स क्लब का गठन हो गया है। वर्ष २०११ का आगमन हुआ तो उसी समय क्लब का विधिवत उद्‌घाटन किया गया। कुलपति जी की पत्नी पद्‍मा जी ने लाल फीता काटा। प्रतिकुलपति जी की पत्नी ने केक काटकर सबको बाँटा। बच्चों ने गुब्बारे फोड़ने की प्रतियोगिता खेली। बड़ों ने भी हाउज़ी का लुत्फ़ उठाया। खूब धूमधाम से नये साल का जश्न मना।

इसके पहले विश्वविद्यालय के १३वें स्थापना दिवस (२९ दिसंबर) को भी सबके परिवारों और विद्यार्थियों ने मिलजुलकर शाम को रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत किया। क्रिकेट, वॉलीबाल और बैडमिंटन की प्रतियोगिताएँ हुईं। पाककला का प्रदर्शन भी हुआ। मेरे बच्चों की उम्र छोटी है, लेकिन बड़ों के साथ उन्हें फैशन परेड और नृत्य करते देखकर मेरा मन झूम उठा। यहाँ कुछ तस्वीरें लगा रहा हूँ।

 

 

 

 

स्थापना दिवस समारोह के रंगारंग कार्यक्रम को परिसर में रहने वाले परिवारों की महिलाओं व बच्चों ने छात्रावासी छात्र-छात्राओं के साथ मिलकर तैयार किया था। दीपाजी के निर्देशन में एक बांग्ला गीत पर नृत्य प्रस्तुत किया चार बेटियों ने जिसमें एक मेरी वागीशा भी थी।

स्थापना दिवस समारोह में बांग्ला नृत्य प्रस्तुत करती वागीशा की टीम

भीषण गर्मी और नीरस दिनचर्या की बातें नेपथ्य में चली गयी हैं। आजकल यहाँ एक से एक कार्यक्रमों की झड़ी लगी है। रिपोर्ट लगाना मुश्किल हो गया है। यहाँ के मौसम के क्या कहने…! सारा देश कड़ाके की ठंड से परेशान है और हमें दोपहर की धूप से बचने के लिए छाया तलाशनी पड़ती है। घर के भीतर हाफ स्वेटर से काम चल जाता है। इलाहाबाद से बाँध कर लायी हुई रजाइयाँ खुली ही नहीं। पतला कम्बल पर्याप्त है। मेरे जैकेट और सूट भी ड्राई क्लीनर के टैग के साथ बक्से में सो रहे हैं।

क्या कहा, …जलन हो रही है? अजी यहाँ कुछ कठिनाइयाँ भी हैं। लेकिन इस मजे के वक्त हम अपनी तकलीफ़ें क्यों बताएँ…!!!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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