मेरा मन क्यूँ छला गया…?

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लो अक्टूबर चला गया

मेरा मन क्यूँ छला गया

 

सोचा भ्रष्टाचार मिटेगा सब खुशहाल बनेंगे अब

अन्ना जी की राह पकड़कर मालामाल बनेंगे सब

काला धन वापस आएगा, रामदेव जी बाटेंगे

अति गरीब पिछड़े जन भी अब धन की चाँदी काटेंगे

लेकिन था सब दिवास्वप्‍न जो पलक झपकते टला गया

मेरा मन फिर छला गया।

 

गाँव गया था घर-घर मिलने काका, चाचा, ताई से

बड़की माई, बुढ़िया काकी, भाई से भौजाई से

और दशहरे के मेले में दंगल का भी रेला था

लेकिन जनसमूह के बीच खड़ा मैं निपट अकेला था

ईर्श्या, द्वेष, कमीनेपन के बीच कदम ना चला गया

मेरा मन फिर छला गया

 

एक पड़ोसी के घर देखा एक वृद्ध जी लेटे थे

तन पर मैली धोती के संग विपदा बड़ी लपेटे थे

निःसंतान मर चुकी पत्नी अनुजपुत्रगण ताड़ दिए

जर जमीन सब छीनबाँटकर इनको जिन्दा गाड़ दिए

दीन-हीन थे, शरणागत थे,  सूखा आँसू जला गया

मेरा मन फिर छला गया

 

मन की पीड़ा दुबक गयी फिर घर परिवार सजाने में

जन्मदिवस निज गृहिणी का था खुश हो गये मनाने में

घर के बच्चे हैप्पी-हैप्पी बर्डे बर्डॆ गाते थे

केक, मिठाई, गिफ़्ट, डांस, गाना गाते, चिल्लाते थे

सबको था आनंद प्रचुर, हाँ बटुए से कुछ गला गया

मेरा मन बस छला गया

 

सोच रहा था तिहवारी मौसम में खूब मजे हैं जी

विजयादशमी, दीपपर्व पर घर-बाजार सजे हैं जी

शहर लखनऊ की तहजीबी सुबह शाम भी भली बहुत

फिर भी मन के कोने में क्यूँ रही उदासी पली बहुत

ओहो, मनभावन दरबारी राग गव‍इया चला गया

मेरा मन फिर छला गया।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

घर में जंग की नौबत : टालिए न…!

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आज मेरे घर में बात-बात में एक बहस छिड़ गयी। बहस आगे बढ़कर गर्मा-गर्मी तक पहुँच गयी है। घर में दो धड़े बन गये हैं। दोनो अड़े हुए हैं कि उनकी बात ही सही है। दोनो एक दूसरे को जिद्दी, कुतर्की, जब्बर, दबंग और जाने क्या-क्या बताने पर उतारू हैं। दोनो पक्ष अपना समर्थन बढ़ाने के लिए लामबन्दी करने लगे हैं। मोबाइल फोन से अपने-अपने पक्ष में समर्थन जुटाने का काम चालू हो गया है। अपने-अपने परिचितों, इष्ट-मित्रों व रिश्तेदारों से बात करके अपनी बात को सही सिद्ध करने का प्रमाण और सबूत इकठ्ठा कर रहे हैं। अब आप जानना चाहेंगे कि मुद्दा क्या है…?

तो मुद्दा सिर्फ़ इतना सा है कि यदि कोई व्यक्ति स्कूटी, स्कूटर, मोटरसाइकिल इत्यादि दुपहिया वाहन चलाना सीखना चाहे तो इसके लिए उसे पहले साइकिल चलाना आना चाहिए कि नहीं?

प्रथम पक्ष का कहना है कि जब तक कोई साइकिल चलाना नहीं सीख ले तबतक वह अन्य मोटर चालित दुपहिया वाहन नहीं सीख सकता। इसके समर्थन में उसका तर्क यह है कि दुपहिया सवारी पर संतुलन बनाये रखने का कार्य पूरे शरीर को करना पड़ता है जिसका अभ्यास साइकिल सीखने पर होता है। साइकिल चलाने आ जाती है तो शरीर अपने आप आवश्यकतानुसार दायें या बायें झुक-झुककर दुपहिया सवारी पर संतुलन साधना सीख जाती है। शरीर को यह अभ्यास न हो तो अन्य मोटरचालित दुपहिया वाहन सीख पाना सम्भव नहीं तो अत्यन्त कठिन अवश्य है। इसलिए पहले साइकिल सीखना जरूरी है।

द्वितीय पक्ष का कहना है कि साइकिल चलाने में असंतुलित होने की समस्या ज्यादा इसलिए होती है कि उसमें पैडल मारना पड़ता है। जब पैर दायें पैडल को दबाता है तो साइकिल दाहिनी ओर झुकने लगती है और जब बायें पैडल को दबाता है तो बायीं ओर झुकती है। इस झुकाव को संतुलित करने के लिए शरीर को क्रमशः बायीं और दायीं ओर झुकाना पड़ता है। लेकिन मोटरचालित दुपहिया में यह समस्या नहीं आयेगी क्योंकि उसमें पैर स्थिर रहेगा और पैडल नहीं दबाना होगा। जब एक बार गाड़ी चल पड़ेगी तो उसमें संतुलन अपने आप स्थापित हो जाएगा। इसलिए स्कूटी सीखने के लिए साइकिल चलाने का ज्ञान कत्तई आवश्यक नहीं है।

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इन दो पक्षों में सुलह की गुन्जाइश फिलहाल नहीं दिखती। प्रथम पक्ष का कहना है कि यदि द्वितीय पक्ष एक भी ऐसे व्यक्ति को सामने ला दे जो बिना साइकिल सीखे ही स्कूटी/ मोटरसाइकिल चलाना सीख गया हो तो वह हार मान जाएगा और उस ‘दिव्य आत्मा’ का शागिर्द बन जाएगा। दूसरे पक्ष को किसी ने फोन पर आश्वासन दिया है कि वह ऐसे आम आदमियों, औरतों व लड़के-लड़कियों की लाइन लगा देंगे जिन्होंने ‘डाइरेक्ट’ मोटरसाइकिल- स्कूटर चलाना सीख लिया है।

अब प्रथम पक्ष दिल थामे उस लाइन की प्रतीक्षा में है जो उसके घर के सामने लगने वाली है। लेकिन समय बीतने के साथ अभी उसके आत्मविश्वास में कोई कमी नहीं आयी है क्योंकि अभी कोई उदाहरण सामने नहीं आया है। मुद्दा अभी गरम है। सबूतों और गवाहों की प्रतीक्षा है।

इस मुद्दे को यहाँ लाने का उद्देश्य तो स्पष्ट हो ही गया है कि कुछ जानकारी यहाँ भी इकठ्ठी की जाय। ब्लॉग-जगत में भी तमाम (अधिकांश प्राय) लोग ऐसे हैं जो दुपहिया चलाना जानते हैं। आप यहाँ बताइए कि आपका केस क्या रहा है- पहले साइकिल या ‘डाइरेक्ट’ मोटर साइकिल? निजी अनुभव तो वास्तविक तथ्य के अनुसार बताइए लेकिन इस मुद्दे का व्यावहारिक, वैज्ञानिक और सैद्धान्तिक विवेचन करने की भी पूरी छूट है।

(नोट : घर के भीतर प्रथम पक्ष का प्रतिनिधित्व कौन कर रहा है व दूसरे पक्ष का कौन, यह स्वतःस्पष्ट कारण से गोपनीय रखा जा रहा है।)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)  

मई के मजे, जून की जन्नत और जुलाई की जुदाई

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इस बार की गर्मी बहुत अच्छे से गुजर गयी। 

  • विदर्भ क्षेत्र की गर्मी भयाक्रांत करने वाली होती है। इस साल भी वर्धा में पारा 49.5 डि.से. तक पहुँच गया था। हम जैसे तराई क्षेत्र वाले के लिए यह लगभग असह्य होता। इसलिए गर्मी तेज होने से पहले ही बच्चों को मार्च की परीक्षा के तत्काल बाद लखनऊ पहुँचा आया था।  पंद्रह मई के बाद अर्जित अवकाश लेकर खुद भी वर्धा से निकल गया।
  • लखनऊ के सुहाने मौसम और प्रायः निर्बाध विद्युत आपूर्ति के बीच ऊमस और गर्मी का प्रकोप अधिक नहीं झेलना पड़ा। बस घर के भीतर सत्यार्थ (४) और वागीशा (१०) यही वादा कराते रहे कि मैं अब उन्हें छोड़कर वर्धा नौकरी करने नहीं जाऊंगा। पत्नी का मन रखने के लिए शासन में जाकर अपने आला हाकिम से मिल आया और अर्जी डाल दी। इसी दौरान कुछ अधिकारी मित्रों से टुकड़े-टुकड़े चर्चा हुई और मोहन बाबू की कहानी की रचना हो गयी।
  • चचेरी बहन की शादी थी। २१ मई को। हम लड़की वाले बाराती बनकर लड़के वालों के शहर बनारस गये। उनलोगों ने ही सारा इन्तजाम कर रखा था। सभी मेहमानों की आव-भगत वर पक्ष ने की। हम लड़की वाले थे लेकिन चिंतामुक्त थे। वे लड़के वाले थे बस इस बात से खुश कि बारात सजाकर गोरखपुर जाने और आने का उनका समय बच गया। काम-धंधे में रुकावट कम होगी। अस्तु सज्जनतावश लड़की के बाप की तरह हाथ जोड़े सबकी कुशल क्षेम लेते रहे। हमने जमकर शादी का लुत्फ़ उठाया और अगले दिन घरवालों के साथ गोरखपुर लौट गये। डॉ.अरविंद मिश्र जी ने पहले ही बता दिया था कि उस दिन वे अन्यत्र किसी दूसरी शादी में व्यस्त रहेंगे इसलिए उनसे मुलाकात न हो सकी।
  • अगले सप्ताह २८ मई को ससुराल में साली की शादी थी। लद-फदकर सपरिवार पहुँचे। वरपक्ष भी हमारे पुराने रिश्ते में था। दोनो तरफ़ से आव-भगत हुई। सास, ससुर, साला, साली, सलहज, साढ़ू, सरपुत, मामा, मामी, मौसी, मौसा, फूआ, फूफा, चाचा, चाची, भैया, भाभी, भतीजा, भतीजी, भान्जा, भान्जी, बहन, बहनोई आदि ढेर सारे रिश्तेदारों व यार-दोस्तों से मिलना हुआ। ये शादी-ब्याह न पड़े तो इन सबसे मुलाकात कहाँ हो पाए…!
  • दोनो शादियों के बीच गाँव जाना हुआ। कई दिनों से बिजली नहीं आ रही थी। पिताजी के सान्निध्य में पाकड़ के पेड़ के नीचे खटिया डाले निखहरे लेटे रहे।  अचानक भंडार कोने (नैऋत्य कोण) से काले भूरे बादल उठे और अंधेरा सा छा गया। धूल भरी आँधी देख चप्पल निकालकर नंगे बदन बाग की ओर दौड़े। आम भदभदाकर गिर रहे थे। दौड़-दौड़कर बीनते रहे। देखते-देखते बोरा भर गया। फिर जोर की बारिश शुरू हुई। झूम-झूमकर भींगते रहे। मानो बचपन लौट आया। इतना भींगे कि ठंड से दाँत बजने लगे। घर लौटे तो अम्मा तौलिया और सूखे कपड़े लेकर खड़ी थीं।
  • एक दिन बाराबंकी जिले की रामनगर तहसील जाना हुआ। nice-फेम ‘सुमन जी’ ने बुला लिया था। डॉ.सुभाष राय और रवीन्द्र प्रभात जी का साथ मिला था। वहाँ तहसील परिसर के सभागार में सुमन जी ने महफिल जमा रखी थी। स्थानीय कविगण काव्यपाठ कर रहे थे। तहसील के तमाम वकील और मुवक्किल व दूसरे बुद्धिजीवी जमा थे। लोक संघर्ष पत्रिका के ताजे अंक का लोकार्पण होना था और रवीन्द्र प्रभात जी का सम्मान। सुभाष जी का भाषण कार्यक्रम की उपलब्धि रही। सुमन जी अपनी पत्रिका के सभी अंको का लोकार्पण हरबार इसी प्रकार किसी बड़े बुद्धिजीवी के हाथों कराते हैं। हमें भी फूलमाला और स्मृति चिह्न से नवाजा गया। nice.
  • लखन‍ऊ लौटकर बच्चों के साथ खूब मौज हुई। डाल के पके आमों की डाली सजाये साले साहब सपरिवार पधारे। घर में बच्चों की संख्या बढ़ गयी। सहारागंज, चिड़ियाघर, भूल-भुलैया, इमामबाड़ा और हजरत गंज की सैर में दिन तेजी से निकल गये। अचानक पता चला कि वर्धा की गाड़ी पकड़ने का दिन आ गया। वाटर-पार्क जाने का मौका ही नहीं मिला। तय हुआ कि उन्हें अगले दिन बच्चों के मामाजी ले जाएंगे।
  • जब बादशाहनगर स्टेशन पर राप्तीसागर एक्सप्रेस में बैठकर वर्धा फोन लगाया तो फरमाइश हुई कि लखन‍ऊ से आ रहे हैं तो आम जरुर लाइए। चारबाग स्टेशन पर गाड़ी से उतरकर मलीहाबादी दशहरी तलाशता रहा, बाहर सड़क तक गया लेकिन रेलवे परिसर के आस-पास से दुकानें नदारद थीं। दौड़ता-हाँफता खाली हाथ वापस अपने डिब्बे तक पहुँचा। गाड़ी चल पड़ी। आम मिले तो कैसे?
  • चलती गाड़ी में अपनी कन्फ़र्म बर्थ पर बैठते ही सबसे पहले यह ध्यान में आया कि यदि मैं ब्लॉगर न होता तो यात्रियों की जबरदस्त आवाजाही के इस व्यस्त सीजन में शायद  वह सीट भी नहीं मिली होती। इस बैठे-ठाले काम से जुड़कर हमें कितने भले लोगों से जुड़ने का मौका मिला यह बड़े सौभाग्य की बात है। हम अपने को गौरवान्वित महसूस कर ही रहे थे कि मन में आम न खरीद पाने की समस्या का समाधान भी कौंध गया। मैने झट फोन मिलाया और अगले स्टेशन पर पाँच किलो दशहरी  के साथ एक मूर्धन्य ब्लॉगर मेरे डिब्बे के सामने अवतरित हो गये। उनका नाम गोपनीय इसलिए रखना चाहता हूँ कि आगे से उनका बोझ न बढ़ जाय। Smile हमने दस मिनट के भीतर पूरी दुनिया की बातें की। कितनी ही त्वरित टिप्पणियाँ की गयीं और तमाम गुटों का हाल-चाल लिया-दिया गया। बातों की रौ में हमने आम का दाम भी पूछना मुनासिब न समझा। उनके स्नेह को मैं किसी प्रकार कम नहीं कर सकता था। 
  • अब वर्धा आ पहुँचा हूँ तो ध्यान आया कि यदि मैंने इस मौज मस्ती के बीच थोड़ा समय कम्प्यूटर पर दिया होता तो अनेक पोस्टें निकल आयी होतीं। लेकिन लम्बे प्रवास के बाद घर लौटने का सुख कुछ ऐसा डुबा देने वाला था कि इस ओर ध्यान ही नहीं गया। अब यह सब ब्लॉग पोस्ट की दृष्टि से कुछ पुराना हो गया है इसलिए उनका उल्लेख भर कर पा रहा हूँ।
  • वर्धा में बारिश का सुहाना मौसम शुरू हो चुका है लेकिन विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस के कमरे में अकेले पड़े रहना रास नही आ रहा है। अभी जुलाई नहीं आयी है लेकिन बच्चों से जुदाई शुरू हो गयी है। सोचता हूँ यहाँ से भाग जाऊँ।Open-mouthed smile

चलते-चलते लखनऊ के चिड़ियाघर से लिया गया यह चित्र लगाता हूँ जो मेरी अनुपस्थिति में रचना त्रिपाठी द्वारा लिया गया था। मैं वहाँ से अनुपस्थित इसलिए था कि वहाँ समीप ही जनसंदेश टाइम्स अखबार का दफ़्तर था ; उसके सम्पादक की कुर्सी पर डॉ. सुभाष राय बिराज रहे थे और वे स्वयं एक ब्लॉगर होने के नाते मुझे बतकही के लिए आमंत्रित कर चुके थे। जब दो ब्लॉगर मिल जाँय तो चिड़ियाघर की भला क्या बिसात…? Smile

तेज धूप में बरगद की छाँव तले आराम करते मृगशावक और बारहसिंगे

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) 

स्वस्थ और ईमानदार मीडिया मात्र खुशफ़हमी : विभूति नारायण राय

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साबुन की फैक्ट्री चलाने वाली मानसिकता छोड़नी होगी अखबार के मालिकों को…

पिछली कड़ी में आपने पढ़ा कि कैसे एक प्रतिष्ठित अखबार के प्रबंध संपादक ने अखबार की दुनिया की कथित ‘सच्चाई’ बताते हुए अखबार पढ़ने वालों की प्रतिबद्धता और पत्रकार बिरादरी की शक्तियों पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिये थे। उनके बाद हिंदी साहित्य की दुनिया के प्रतिष्ठित हस्ताक्षर प्रो. गंगा प्रसाद विमल बोलने आये। उन्होंने बिना लाग-लपेट के अखबार मालिकों और संपादकों पर हमला बोल दिया। बोले- आज हमारे बीच अखबारों की संख्या और प्रसार में बहुत वृद्धि हो गयी है लेकिन अखबारों ने आम पाठक की चिंता करना छोड़ दिया है। उन्होंने अपने वक्तव्य में मीडिया जगत पर तीन गम्भीर आरोप लगाये-

  1. अत्यल्प को छोड़कर अधिकांश संपादक बिचौलिए की भूमिका निभा रहे हैं।
  2. अंग्रेजी अखबारों ने भारतीय भाषा के अखबारों के साथ घोर दुष्कृत्य किया है।
  3. एक आम पत्रकार के लिए ‘प्रोफ़ेशनलिज़्म’ का सीधा अर्थ है अपने मालिक के लिए पैसा खींचना।

अपनी बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि आजकल मनुष्यता का सवाल कहीं नहीं उठाया जा रहा है। एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य के साथ क्या व्यवहार होना चाहिए इसपर कुछ उच्‍च आदर्शात्मक (lofty) किस्म की बातें प्राथमिक स्तर की स्कूली किताबों में भले ही मिल जाय लेकिन अखबारों और दूसरी मीडिया से यह गायब हो गयी हैं। आजकल ऊँची तनख्वाह पर काम करने वाले बड़े पत्रकार अपने मालिक के ‘टटके गुलाम’ हो गये हैं। व्यावसायिक हित सर्वोपरि हो गया है। भारत की सांस्कृतिक विरासत को समझना, इसे मिटाने के वैश्विक षड़यंत्र को पहचानना और उसे निष्फल करने के लिए देश को तैयार करने की जिम्मेदारी मीडिया में बैठे बुद्धिजीवियों की है; लेकिन इनके बीच ऐसे लोग घुसे हुए हैं जिनका एजेंडा ही अलग है। आज मीडिया को बाहर से कम चुनौतियाँ दरपेश हैं। भीतर के लोगों से ही खतरा है जिनसे लड़ना जरूरी हो गया है।

इनके बाद बोलने की बारी सत्र की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलपति विभूतिनारायण राय की थी। उनके बोलने से पहले श्रोताओं को पूर्व वक्ताओं से प्रश्न करने का अवसर दिया गया। अनेक छात्र तो जैसे इसी पल का इंतजार कर रहे थे। प्रश्नों की झड़ी लग गयी। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ  की ऐसी रूपरेखा की कल्पना कदाचित्‌ आदर्श पत्रकारिता का स्वप्न पाल रहे विद्यार्थियों ने नहीं की होगी। मुनाफ़ा कमाने के हिमायती प्रबंध संपादक को अपनी स्थिति स्पष्ट करने दुबारा आना पड़ा। भारतीय समाज में व्याप्त अन्याय और शोषण के विरुद्ध आम जनता को न्याय दिलाने और उसके लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करने के माध्यम के रूप में इन समाचार माध्यमों की जवाबदेही के प्रश्नों का उनके पास फिर भी कोई जवाब नहीं था। प्रश्नों का शोर जब थमने का नाम नहीं ले रहा था तब कुलपति जी ने माइक सँभाला।VNRai-last-words

बोले- पूर्व के एक वक्ता की यह धारणा कि चालीस पेज़ के अखबार के लिए दो रूपये देने वाले पाठक कोई हक नहीं रखता सर्वथा ग़लत  है। अखबार मालिक ने अपनी पूँजी जरूर लगा रखी है लेकिन पाठक के stakes अखबार वालों से ज्यादा हैं। उसका पूरा जीवन ही दाँव पर लगा है। वह ज्यादा बड़ा जोखिम उठा रहा है। मार्क ट्वेन को उद्धरित करते हुए उन्होंने कहा- “If you don’t read newspapers, you are uninformed; but if you read newspapers you are misinformed’’

आज जिस ठसक के साथ अखबार के पूँजीपति मालिक के मुनाफ़े के हक में दलील दी जा रही है वह कभी शर्म की बात मानी जाती थी। कोई संपादक या दूसरे बुद्धिजीवी ऐसी बात कहते झेंपते थे। लेकिन अब समय बदल गया है। यह बिडम्बना ही है कि आम जनता में ही दोष निकाले जा रहे हैं। यह वैसा ही है जैसा ब्रेख्त ने कहा था कि राजा अब बदला नहीं जा सकता इसलिए अब प्रजा को ही बदल देना होगा। यह स्थिति कतई ठीक नहीं है। जनता के प्रति अखबार की जिम्मेदारी उस प्रकार की नहीं है जैसी किसी फैक्ट्री मालिक की अपने उत्पाद के ग्राहकों के प्रति।

उन्होंने अपनी बात स्पष्ट करने के लिए प्रसिद्ध संपादक स्व.राजेंद्र माथुर जी के साथ अपनी एक बहस का हवाला दिया। वृंदावन में आयोजित एक गोष्ठी में राजेन्द्र माथुर जी ने कुछ ऐसे ही विचार रखते हुए कहा था कि एक स्टील कारखाना लगाने वाला उद्योगपति अथवा साबुन की फैक्ट्री चलाने वाला मालिक अपने निवेश पर लाभ कमाने के लिए स्वतंत्र है; लेकिन अखबार निकालने के लिए करोड़ो खर्च करने वाला हमारा मालिक यदि कुछ मुनाफ़ा कमाना चाहता है तो आपको यह बुरा क्यों लगता है? उस समय (1980 के दशक) की परिस्थितियों को देखते हुए यह बड़ा ही साहसिक वक्तव्य था। उनकी इस बात का विरोध उस समय भी हुआ था और आज भी इस तरह की सोच को नकारा जाना चाहिए।

कुलपति जी ने बताया कि स्टील या साबुन का कारखाना चलाने की तुलना में अखबार निकालना एकदम अलग किस्म का कार्य है। यदि किसी कारणवश स्टील या साबुन की फैक्ट्री बंद होने की नौबत आ जाय तो उससे आम जनता आंदोलन नहीं करती। लेकिन अखबार पर यदि किसी तरह की पाबंदी लगती है तो जनता सड़कों पर उतर आती है। राजीव गांधी के जमाने में सेंसरशिप कानून लगाने की कोशिश हुई तो पूरे देश में उबाल आ गया था। मीडिया को जो शक्तियाँ मिली हुई हैं वह इसी पाठक ने दी हैं। दो रूपये में अखबार देकर आप न तो एहसान कर रहे हैं और न ही घाटे में है। आप करोड़ों के विज्ञापन इसी जनता के कारण पाते हैं।

बाद के सत्रों में साधना चैनल प्रमुख व ब्रॉडकास्टिंग एडीटर्स एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी एन.के.सिंह, आईबीएन के वरिष्‍ठ संवाददाता अनन्‍त विजय, दैनिक भास्‍कर के समूह संपादक प्रकाश दूबे, लोकमत समाचार- नागपुर के संपादक गिरीश मिश्र, सुपसिद्ध न्यूज एंकर और स्‍तंभकार पुण्‍य प्रसून वाजपेयी, हिंदुस्तान टाइम्स के प्रदीप सौरभ इत्यादि ने विस्तार से प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों की वस्तुनिष्ठता, सामाजिक सरोकार और जिम्मेदारियों को समझने के बारे में सुंदर वक्तव्य दिये।

प्रो.गंगा प्रसाद विमल और विभूतिनारायण राय द्वारा लगाये गये आरोपों (बिचौलियापन व भ्रष्ट आचरण) पर अनंत विजय ने गम्भीर आपत्ति दर्ज़ करते हुए कहा कि हमारे बारे में इस प्रकार का सामूहिक आरोप लगाने के पहले  आपको सबूत जुटाना चाहिए। आप एक जिम्मेदार पद पर रहते हुए जब भी कुछ कहते हैं तो पूरा देश उसपर ध्यान देता है और अपनी राय बनाता है।

उक्त आपत्ति का जवाब देते हुए कुलपति जी ने अपनी पूरी बात दुहराते हुए अंत में कहा कि इस समय जब हमारे समाज के सभी अंग भ्रष्टाचार की सीढ़ियाँ चढ़ रहे हैं, मैं अपनी उस मूर्खता को कोस रहा हूँ जो एक स्वस्थ और ईमानदार मीडिया की इच्छा रखती है। लेकिन यदि हमने आशावाद नहीं बनाये रखा तो जल्दी ही हम cynical state में चले जाएंगे।

 

इस कार्यक्रम से संबंधित कुछ और रिपोर्टें यहाँ और यहाँ हैं।

Infotainment के दौर में भी नैतिक मूल्यों को बचाये रखना और जीवन से इनके जुड़ाव को रेखांकित करना एक सजग संपादक की जिम्मेदारी है।

प्रो.राम मोहन पाठक, वाराणसी

लोकतंत्र के सारे स्तंभ धराशायी हो रहे हैं, मीडिया भी। पत्रकारों को अपना कैनवास बड़ा करना होगा और विश्वसनीयता (credibility) बनाये रखनी होगी।

पुण्य प्रसून वाजपेयी- ZEE News

द्रौपदी के चीर हरण के समय भीष्म की भाँति यदि आज की मीडिया खामोश रह गयी तो लोकतंत्र की वेदी पर दुबारा महाभारत होगा।

गिरीश मिश्र, संपादक-लोकमत समाचार

ज्यादातर संपादक आजकल मालिक के लिए बिचौलिये की भूमिका निभा रहे हैं। पत्रकार का प्रोफ़ेशनलिज़्म मालिक के लिए पैसा खींचना हो गया है।

प्रो.गंगा प्रसाद विमल, जे.एन.यू. (से.नि.)

सबको समान रूप से आरोपित करना ग़लत है। मीडिया में अच्छे लोग भी काम कर रहे हैं। टीआरपी के आँकड़े दोषपूर्ण हैं। लाइसेंसिंग प्रक्रिया में सुधार जरूरी।

अनंत विजय- आई.बी.एन.

अब क्षेत्रीय अखबार की परिभाषा बदल रही है। वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने भाषाई अखबारों का बड़ा नुकसान किया है। मत्स्य न्याय का वातावरण बन गया है।

प्रदीप सौरभ- मीडिया समीक्षक, स्वतंत्र पत्रकार नयी दिल्ली

मीडिया का स्वरूप तकनीक ने बदल दिया है। अब इसकी पहुँच और रफ़्तार दोनो बढ़ चुकी है। हमें इसके साथ तालमेल बिठाना होगा।

प्रो.प्रदीप माथुर, IIMC, N.Delhi

मिशनरी पत्रकारिता का स्थान कमीशनरी पत्रकारिता ने ले लिया है। क्षेत्रीय पत्रकारों से लोग वैसे ही डरते हैं जैसे पुलिस से।

राजकिशोर, स्तम्भकार व राइटर इन रेजीडेंस, वर्धा वि.वि.

संपादक नामक संस्था का क्षरण हो रहा है। अब व्यावसायिक मालिक की महत्ता बढ़ गयी है। पत्रकारों को पैसा अधिक मिल रहा है लेकिन आजादी छिन गयी है।

शीतला सिंह- जनमोर्चा, फैज़ाबाद 

(compulsive corruption) भ्रष्टाचार अब मजबूरी भी हो गयी है। न केवल सरकारी क्षेत्र में बल्कि मिडिया जगत में भी।

सोमनाथ पाटील- सकाळ, पुणे

स्थानीय जरूरतों के हिसाब से मीडिया को अपना स्वरूप बदलना होगा। भविष्य का मीडिया ‘कम्यूनिटी रेडियो’ होगा। इसमें मालिकाना नियंत्रण स्थानीय समूह का ही होगा।

डॉ.गिरिजा शंकर शर्मा, आगरा

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

वर्धा परिसर के क्लब में झूमने का मजा…

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वर्धा विश्वविद्यालय शहर से दूर एक वीरान स्थल पर बसाया गया था। पाँच निर्जन शुष्क पहाड़ी टीले इस संस्था को घर बनाने के लिए नसीब हुए। बड़े-बड़े पत्थर और कंटीली झाड़ियाँ चारो ओर पसरी हुई थीं। लेकिन मनुष्य की अदम्य ऊर्जा और निर्माण करने की अनन्य शक्ति के आगे प्रकृति को भी रास्ता देना पड़ता है। शुरू-शुरू में एक कागज पर अवतरित हुआ विश्वविद्यालय आज इस पंचटीला पर धड़कता हुआ एक सुंदर रूपाकार ले रहा है। पहाड़ी ढलान से तादात्म्य बनाती इमारतों की डिजाइन ऐसी बनी है कि प्राकृतिक सौंदर्य अक्षुण्ण बना रहे। यहाँ वृक्षारोपण और जल-संग्रहण के विशेष प्रयास किए गये हैं।

परिसर में अध्यापकों, अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के परिवार भी आकर बसने लगे हैं। शहर से दूरी के कारण मौलिक जरूरतों की वस्तुओं को जुटाना कठिन है। अब धीरे धीरे दुकानें इस ओर सरकती आ रही है। आस-पास की जमीनें महँगी होने लगी हैं। यहाँ अब खेल और मनोरंजन की जरूरत पूरी करने का उपाय भी खोजा गया है। फैकल्टी एंड ऑफिसर्स क्लब का गठन हो गया है। वर्ष २०११ का आगमन हुआ तो उसी समय क्लब का विधिवत उद्‌घाटन किया गया। कुलपति जी की पत्नी पद्‍मा जी ने लाल फीता काटा। प्रतिकुलपति जी की पत्नी ने केक काटकर सबको बाँटा। बच्चों ने गुब्बारे फोड़ने की प्रतियोगिता खेली। बड़ों ने भी हाउज़ी का लुत्फ़ उठाया। खूब धूमधाम से नये साल का जश्न मना।

इसके पहले विश्वविद्यालय के १३वें स्थापना दिवस (२९ दिसंबर) को भी सबके परिवारों और विद्यार्थियों ने मिलजुलकर शाम को रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत किया। क्रिकेट, वॉलीबाल और बैडमिंटन की प्रतियोगिताएँ हुईं। पाककला का प्रदर्शन भी हुआ। मेरे बच्चों की उम्र छोटी है, लेकिन बड़ों के साथ उन्हें फैशन परेड और नृत्य करते देखकर मेरा मन झूम उठा। यहाँ कुछ तस्वीरें लगा रहा हूँ।

 

 

 

 

स्थापना दिवस समारोह के रंगारंग कार्यक्रम को परिसर में रहने वाले परिवारों की महिलाओं व बच्चों ने छात्रावासी छात्र-छात्राओं के साथ मिलकर तैयार किया था। दीपाजी के निर्देशन में एक बांग्ला गीत पर नृत्य प्रस्तुत किया चार बेटियों ने जिसमें एक मेरी वागीशा भी थी।

स्थापना दिवस समारोह में बांग्ला नृत्य प्रस्तुत करती वागीशा की टीम

भीषण गर्मी और नीरस दिनचर्या की बातें नेपथ्य में चली गयी हैं। आजकल यहाँ एक से एक कार्यक्रमों की झड़ी लगी है। रिपोर्ट लगाना मुश्किल हो गया है। यहाँ के मौसम के क्या कहने…! सारा देश कड़ाके की ठंड से परेशान है और हमें दोपहर की धूप से बचने के लिए छाया तलाशनी पड़ती है। घर के भीतर हाफ स्वेटर से काम चल जाता है। इलाहाबाद से बाँध कर लायी हुई रजाइयाँ खुली ही नहीं। पतला कम्बल पर्याप्त है। मेरे जैकेट और सूट भी ड्राई क्लीनर के टैग के साथ बक्से में सो रहे हैं।

क्या कहा, …जलन हो रही है? अजी यहाँ कुछ कठिनाइयाँ भी हैं। लेकिन इस मजे के वक्त हम अपनी तकलीफ़ें क्यों बताएँ…!!!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

दास्ताने स्कूटर… बहुत कठिन है डगर।

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पिछली कड़ी में आपने पढ़ा…

…तभी एक हँसमुख डॉक्टर साहब ने मुस्कराते हुए कहा- “मुझे इसका बहुत अच्छा अनुभव है। आपकी समस्या का जो पक्का समाधान है वह मैं बताता हूँ…। ऐसा कीजिए इसे जल्दी से जल्दी बेंच दीजिए…। जो भी दो-तीन हजार मिल जाय उसे लेकर खुश हो जाइए और मेरी तरह शेल्फ़-स्टार्ट वाली स्कूटी ले लीजिए…” वहाँ उपस्थित सभी लोग ठठाकर हँस पड़े, इनका चेहरा उतर गया और मेरे पहियों के नीचे से जमीन खिसक गयी…।

अब आगे…

लेकिन इन्होंने धैर्य नहीं खोया। बोले- “बेंचने का तो मैंने कभी सोचा ही नहीं; अधिक से अधिक मैं इसे वापस उत्तर प्रदेश भेज दूंगा। वहाँ पर इसके स्पेयर पार्ट्स मिल जाएंगे। …आपलोग बस इतना कन्फ़र्म कर दीजिए कि उद्योगपति जमनालालाल बजाज के मूलस्थान वर्धा में बजाज स्कूटर का एक भी मिस्त्री नहीं है। दीपक तले अंधेरा की इस मिसाल को मैं पूरी दुनिया को बता लूँगा उसके बाद ही हार मानूंगा।” इतना सुनने के बाद वहाँ के डिप्टी स्पोर्ट्स ऑफीसर ने कहा कि आप घबराइए नहीं; मैं आपको एक एक्सपर्ट के पास ले चलता हूँ। मेरे मुहल्ले में रहता है। इन्होंने मुझे उनकी बाइक के पीछे लगा दिया। कई चौराहों, तिराहों और अंधे मोड़ों को पार करते हुए, मोटी-पतली गलियों से गुजरते हुए हम अंततः एक मिस्त्री के दरवाजे पर जा पहुँचे। सुबह आठ बजे का वक्त था और उसके छोटे से अहाते से लेकर बाहर सड़क तक पंद्रह-बीस मोटरसाइकिलें आड़े-तिरछे खड़ी हुईं थीं। इन्होंने उचक-उचक कर देखा, उस भीड़ में एक भी स्कूटर नहीं दिखा।

‘नितिन मिस्त्री’ ने अभी काम शुरू नहीं किया था। ये सभी गाड़ियाँ पिछले दिन इलाज के लिए भर्ती हुईं थीं। उस भीड़ की ओर देखते हुए स्पोर्ट्स ऑफीसर ने भावपूर्ण मुस्कान बिखेरी। मानो कह रहे हों- “देखा, कितना बड़ा मिस्त्री है… गाड़ियों की लाइन लगी है। एक दिन जमा करो तो दूसरे-तीसरे दिन नम्बर लगता है”

मुझे उस मुस्कान में कोई आशा की किरण नहीं दिखी। यदि बोल पाता तो मैं कहता- “हाँ देख रहा हूँ… कितना चिरकुट मिस्त्री है। आठ-गुणा-आठ फुट के कमरे में तीन-चार बच्चो और पत्नी के साथ रह रहा है और साथ में शायद एक छोटा भाई भी है। इतनी ही कमाई होती तो एक बड़ा गैरेज न बना लेता…!! काम अधिक है तो असिस्टेंट रख लेता, स्टाफ़ बढ़ा लेता…!!!”  दर‌असल मुझे वहाँ ‘प्रोफ़ेसनलिज़्म’ का घोर अभाव दिखायी दे रहा था।

स्पोर्ट्स ऑफीसर ने नितिन मिस्त्री को बुलाया जो ब्रश करते हुए बाहर निकला। आपस में दोनो ने मराठी में कुछ बात की। वे शायद हम नये ग्राहकों का परिचय बता रहे थे। कुछ देर बाद मिस्त्री मेरे मालिक से मुखातिब हुआ, “सर जी, हम इसको देख तो लेंगा लेकिन इसमें कोई स्पेयर पार्ट ‘लगेंगा’ तो यहाँ नहीं मिल ‘पायेंगा’।  नागपुर से आपको मँगाना पड़ेंगा…” हमें इस बात की उम्मीद तो पहले से ही थी इसलिए उसके बाद तय यह हुआ कि मिस्त्री मेरी जनरल सर्विसिंग करेगा। मेरी हेड लाइट का स्विच जाम हो गया है उसकी ऑयलिंग-ग्रीसिंग करेगा, पुरानी हो चुकी बैटरी बदल देगा ताकि हॉर्न और लाइट तेज हो सके, लेकिन ‘चोक-वायर’ की समस्या ठीक होने की गारंटी नहीं होगी। कोई जुगाड़ आजमाने की कोशिश करेगा लेकिन सफलता की संभावना क्षीण ही है। इन्होंने जब संभावित समय पूछा तो मध्यस्थ महोदय के दबाव में उसने मुझे ‘अगले दिन भर्ती कर लेने’ पर सहमति दे दी।

अगले दिन स्टेडियम से हम दुबारा उसकी दुकान पर पहुँचे। मिस्त्री ने इन्हें घर तक छोड़ा और मुझे वापस अपने घर/दुकान/गैरेज पर ले जाकर खड़ा कर दिया। मैं दिन भर दूसरी बाइक्स का आना-जाना देखता रहा। मिस्त्री वास्तव में बहुत बिजी था। उसकी मेहनत की तुलना में उसका मेहनताना बहुत कम था। ज्यादातर ग्राहक उसके परिचित टाइप थे जो छोटी-मोटी गड़बड़ियाँ मुफ़्त में ठीक कराने की फिराक में लगे रहते थे। पिछले दिन से भर्ती गाड़ियाँ एक-एक कर जाती रहीं और शाम तक उतनी दूसरी गाड़ियाँ आकर जमा हो गयीं। मेरी पैरवी करने वाला कोई नहीं था, इसलिए मुझे शाम होने तक उसने हाथ नहीं लगाया। शाम को छः बजे मेरे मालिक का फोन आया कि काम पूरा हो गया हो तो मुझे लेने आ जाँय। ऑफिस से छूटते वक्त इन्होंने फोन किया होगा। इधर से मिस्त्री ने जवाब दिया कि अभी थोड़ा काम बाकी रह गया है। एकाध घंटे बाद हो पाएगा। फोन पर मिस्त्री के हाव-भाव से लगा कि वे इस समय मुझे लेने नहीं आ रहे हैं, क्योंकि उसने उस फोन के बाद भी मुझे छुआ नहीं था।

अगले दिन सुबह आठ बजे ये स्टेडियम से खेलकर कार से गैरेज पर  आये तो मेरी बारी आ चुकी थी। हेडलाइट का स्विच ठीक हो चुका था लेकिन असली समस्या जस की तस थी। मिस्त्री ने उन्हें बताया कि स्कूटर के लिए ‘ओरिजिनल बैटरी’ कल मिल नहीं पायी थी। आज मँगाया है। शाम तक मैं चोक का भी कुछ कर दूँगा। ये चले गये तो उसने दूसरी गाड़ियों का काम शुरू कर दिया। आखिरकार दोपहर बाद बैटरी बदली गयी। शाम को ये आये तो मिस्त्री ने चोक की समस्या न ठीक कर पाने के कई कारण गिनाने शुरू किए। इन्होंने उससे पारिश्रमिक पूछकर डेढ़ हजार रूपये थमाए और मुझे लेकर घर आ गये।

अगले दिन से इन्होंने चोक वायर की खोज शुरू की। इनके एक मित्र इलाहाबाद से वर्धा आने वाले थे। उनसे इन्होंने कहा कि बजाज-लीजेंड में जितने किस्म के ‘वायर’ लगते हों सभी वहाँ से लेते आयें। एक सप्ताह बाद क्लच-वायर, एक्सीलरेटर-वायर और चोक वायर इलाहाबाद से वर्धा की यात्रा करके आ गये। अगले दिन चोक वायर के साथ मुझे नितिन के गैरेज़ भेजा गया। एक बार फिर चौबीस घंटे की प्रतीक्षा के बाद नम्बर आया। लेकिन दुर्भाग्य के क्षण अभी समाप्त नहीं हुए थे…Sad smile

पुराना केबल निकालकर नया केबल डालने में उसके पसीने छूट गये। अंततः उसने हार मान ली। फोन करके इसने बता दिया कि इलाहाबाद से मँगाया हुआ चोक-वायर इस मॉडल का नहीं हैं इसलिए नहीं लग सकता। फिर एक विचित्र जुगाड़ लगाने का काम शुरू हुआ। चोक वायर के दोनो सिरों पर घुंडियाँ होती हैं। एक सिरा दाहिनी हैंडिल के पास बने लीवर के खाँचे में फिट होता है और दूसरा सिरा कार्ब्यूरेटर में जाता है जहाँ एक स्प्रिंग के साथ जोड़कर इसे खास तरीके से फिट किया जाता है। नितिन मिस्त्री ने एक पुराने तार के घुंडी वाले सिरे को नीचे कार्ब्यूरेटर में तो फिट कर दिया लेकिन दूसरे सिरे को उसके सही रूट से हैंडिल तक ले जाने के बजाय सीट के नीचे से दाहिनी ओर बाहर निकाल दिया और उसमें एक छल्ला बना दिया। इस प्रकार चोक लेने के लिए सीट के नीचे छिपे छल्ले को बाहर निकालकर उसमें उंगली फसाते हुए जोर से खींचना होता था और फिर इसी स्थिति में किक मारना होता था।

जुगाड़ वाला चोक लगवाकर हम घर आये। लेकिन इसमें एक बड़ी खामी रह गयी थी। छल्ला पकड़कर जोर से खींचने पर चोक लेने की प्रक्रिया तो पूरी हो गयी लेकिन छोड़ने पर तार ठीक से वापस नहीं हो पा रहा था। नतीजा यह हुआ कि एक बार चोक में ही तार अटका रह गया और मेरे मालिक मुझे चोक में ही हाँकते रहे। अलस्सुबह जब पहली किक में ही मैं भरभराकर स्टार्ट हो गया तो इन्हें कुछ संदेह तो हुआ लेकिन एक दो बार उस तार की पूँछ उल्टा घुसेड़ने के अलावा ये कुछ न कर सके। इनका संदेह यकीन में तब बदला जब मेरी टंकी का पेट्रोल सम्भावित समय से बहुत पहले ही खत्म हो गया। मुझे एक बार फिर उसी नितिन के पास जाना पड़ा। उसने ढ‌क्‌कन खोलकर फँसा हुआ तार छुड़ा दिया और तार को ‘आहिस्ता खींचने’ की ट्रेनिंग देकर चलता कर दिया।

अब दो-चार दिन के अभ्यास से काम आसान होता गया और जुगाड़ चल निकला। लेकिन एक दूसरी समस्या तैयार खड़ी थी।  अचानक क्लच वायर की घुंडी भी तीन-चार साल की सेवा देकर चल बसी। गनीमत थी कि यह दुर्घटना घर पर ही हुई, इसलिए मुझे ठेलकर चलाने की जरुरत नहीं पड़ी। वैसे तो नया क्लच वायर डालने में पाँच से दस मिनट ही लगते हैं लेकिन मिस्त्री की तलाश में ही तीन दिन लग गये। मुझको बिना क्लच के स्टार्ट करके दुकान तक ले जाना संभव नहीं था। इन्होंने नितिन मिस्त्री को फोन मिलाया तो उसने असमर्थता जताते हुए ‘ऑउट ऑफ़ स्टेशन’ होने की बात बतायी। दूसरी कई दुकानों पर संपर्क किया गया तो सबने कहा कि दुकान छोड़कर नहीं जाएंगे। गाड़ी यहीं लाइए, यह भी कि गाड़ी देखकर ही बता पाएंगे कि काम हो पाएगा कि नहीं। रोज़ शाम को ये घर आते और अपनी असफलता की कहानी मालकिन को सुनाते। मैं  उत्सुकता पूर्वक रोज किसी मिस्त्री की प्रतीक्षा करता रहा।

अंततः इन्होंने विश्वविद्यालय के इंजीनियर साहब को, जो यहाँ का स्थानीय निवासी ही हैं, मेरी समस्या बताकर एक मिस्त्री का जुगाड़ करने का अनुरोध किया। उन्होंने विश्वास दिलाया कि बहुत जल्द मेरा काम हो जाएगा। दो-दिन और बीते तब अचानक इनके ऑफ़िस का एक कर्मचारी एक मिस्त्री को लेकर आया और उसने दस मिनट में एक क्लच वायर फिट कर दिया। इलाहाबाद से आया क्लच-वायर का केबल पड़ा रह गया। इन्होंने उस मिस्त्री से अनुरोध किया कि यदि हो सके तो चोक वायर को उसके सही स्थान पर फिट कर दो। इसपर उसने कहा कि किसी दिन फुर्सत से गाड़ी दुकान पर भेज दीजिएगा। ठीक करा दूँगा।

अगले इतवार को इन्होंने स्वयं उसकी दुकान पर जाकर चोक वायर डलवाने का निश्चय किया। लेकिन जब इन्होंने मोबाइल पर आने की अनुमति माँगी तो उसने टरकाते हुए कहा कि आज वह मिस्त्री आया ही नहीं है जो इस काम का एक्सपर्ट है।

इतना सुनने के बाद कोई भी झुँझलाकर सिर पीट लेता। लेकिन दाद देनी पड़ेगी इनके धैर्य की और काम पूरा कराने की जिद्दी धुन की। ये चोक वायर की केबिल डिक्की में डाल मुझे लेकर शहर की ओर निकल पड़े। पूछते-पू्छते बजाज कंपनी की अधिकृत वर्कशॉप पर जा पहुँचे। वही वर्कशॉप जहाँ से बहुत पहले मुझे बैरंग लौटाया जा चुका था। उसबार इनके चपरासी ने मुझे वहाँ ले जाकर सर्विसिंग कराने की असफल कोशिश की थी। तब किसी मिस्त्री ने मुझे घास नहीं डाली थी। कहते थे कि इस शहर में यह गाड़ी है ही नहीं इसलिए हम इसका स्पेयर पार्ट नहीं रखते। कंपनी के नियमों के अनुसार हम बाहर से मँगाकर कोई स्पेयरपार्ट डाल भी नहीं सकते।

इस बार भी यही टका सा जवाब इन्हें मिला। लेकिन इन्होंने मैनेजर से बहस करनी शुरू की। बोले- यदि बजाज कंपनी ने मुझे यह स्कूटर बेचा है और आपको सर्विस सेंटर चलाने का लाइसेंस दिया है तो आपको इसे ठीक करना ही चाहिए…। यह कैसे होगा यह आप जानिए, लेकिन आप बिना सर्विस दिए लौटा नहीं सकते…। मैं इसके लिए ‘राहुल बजाज’ को भी एप्रोच कर सकता हूँ…। आपकी कम्पलेंण्ट करके कुछ नुकसान तो करा ही सकता हूँ। आप अपने उत्तरदायित्व से भाग नहीं सकते… कुछ तो संवेदनशील होना सीखिए आप लोग…  आदि-आदि। मैनेजर भौचक होकर देख रहा था। …फिर इनका पूरा परिचय पूछने लगा।

एक मिस्त्री ने इनको किनारे ले जाकर प्रस्ताव रखा कि सामने जो प्राइवेट मिस्त्री ने दुकान खोल रखी है वह स्कूटर का स्पेशलिस्ट  है। मैं उससे बोल देता हूँ कि आपका चोक वायर डाल दे। लेकिन इन्होंने ठान लिया था कि काम यहीं से कराकर जाना है। अब और भटकने को तैयार नहीं थे ये। इनकी मंशा भाँपकर वहाँ सबने आपस में बात की और भीतर काम कर रहे एक मिस्त्री को बुलाया गया। उस मिस्त्री ने मुझे देखकर पहचान लिया। उसी ने पिछली बार मुझे छू-छाकर छोड़ दिया था। लेकिन इस बार उसे मैनेजर द्वारा समझाया गया कि काम करना ही है, चाहे जैसे हो। जनार्दन मिस्त्री ने बेमन से तैयार होते हुए आखिरी दाँव चला। साहब जी, इसे छोड़कर जाना पड़ेगा। तीन-चार घण्टे लगेंगे। न हो तो कल सुबह लेकर आ जाओ।

लेकिन ये टस से मस न हुए। बोले- आज मेरी छुट्टी है। मैं पूरा दिन यहीं बैठने को तैयार हूँ। बस अब आगे के लिए नहीं टाल सकता। देखते-देखते सभी मिस्त्री वहाँ से चले गये, एक आदमी दुकान का शटर गिराने लगा। इन्होंने पूछा तो बताया गया कि लंच ब्रेक हो गया है अब तीन बजे से काम शुरू होगा। ये अड़े रहे कि मैं काम पूरा कराकर ही जाऊँगा, आपलोग लंच करके आइए। इसपर उस मिस्त्री ने मुझे स्टैंड से उतारा और भीतर की ओर लेकर चला गया। इनको पिछले दरवाजे से आने के लिए कह दिया।

जब ये पिछले दरवाजे से भीतरी अहाते में पहुँचे तो जनार्दन मिस्त्री अपना टिफिन समाप्त करने वाला था। हाथ धोकर उसने मेरी डिक्की से केबल निकाला, दोनो सिरों की घुंडियों का मुआइना किया और इंजन का ढक्कन उतारकर पुरानी केबल के उपरी सिरे से नयी केबल का निचला सिरा एक पतले तार से बाँध दिया। फिर पुरानी केबल के निचले सिरे को धीरे-धीरे खींचकर बाहर निकालने लगा। इस प्रकार दो-तीन मिनट में ही पुरानी केबल का स्थान नयी केबल ने ले लिया। केबल के भीतर दौड़ रहे चोक-वायर के दोनो सिरों को उनके जायज स्थानों में फिट करने में पाँच मिनट और लगे। इस प्रकार पूरा काम पंद्रह मिनट का ही निकला।

मेरे मालिक इस टुच्चे से काम पर इतना समय और दौड़-धूप करने के बाद मन ही मन कुढ़ तो रहे ही थे लेकिन अंततः मिली अपनी सफलता पर प्रसन्न भी हो गये थे। इन्होंने उस मिस्त्री को पचास रूपये देने का मन बनाया था, लेकिन देने से पहले आदतन उससे ही पूछ लिया। पहले तो उसने संकोच किया लेकिन जब इन्होंने कहा कि ‘काम मेरे मनमाफ़िक और दाम तुम्हारी इच्छानुसार’ तो उसने अपनी फीस माँगी- 20/- रूपये।

प्रस्तुति : सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

पढ़ना, पढ़वाना और लिखना साथ-साथ…

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wife-scoldआजकल मुझे डाँटने वालों की फ़ेहरिश्त लम्बी होती जा रही है। प्रदेश सरकार की नौकरी से छुट्टी लेकर घर से हजार किलोमीटर दूर आ गया और केंद्रीय विश्वविद्यालय में काम शुरू किया तो माता-पिता ही नाराज हो गये। भाई-बंधु, दोस्त-मित्र और रिश्तेदार भी फोन पर ताने मारने लगे कि क्या मिलेगा यहाँ जो वहाँ नहीं था। ऊल-जलूल मुद्दों को लेकर सुर्खियों में छाये रहने वाले एक विश्वविद्यालय से जुड़कर ऐसा क्या ‘व्यक्तित्व विकास’ कर लोगे?

बच्चे और पत्नी तो जैसे एक बियाबान जंगल में फँस जाने का कष्ट महसूस करने लगे हैं। …ना कोई पड़ोस, ना कोई रिश्तेदार और ना कोई घूमने –फिरने लायक सहज सुलभ स्थान। …कहीं जाना हो तो दूरी इतनी अधिक की कार से नहीं जा सकते। रेलगाड़ी में टिकट डेढ़-दो महीना पहले बुक कराने पर भी कन्फ़र्म नहीं मिलता। शादी-ब्याह के निमंत्रण धरे रह जाते हैं और सफाई देने को शब्द नहीं मिलते। किसने कहा था आपसे यह वनवास मोल लेने को..?

लेकिन मैं खुद को समझाता रहता हूँ। प्रदेश सरकार की नौकरी में ही क्या क्वालिटी ऑफ़ लाइफ़ थी। दिनभर बैल की तरह जुते रहो। चोरी, बेईमानी, मक्कारी, धुर्तता धूर्तता, शोषण, अनाचार, अक्षमता, लापरवाही, संत्राष संत्रास, दुख, विपत्ति, कलुष, अत्याचार, बेचारगी, असहायता इत्यादि के असंख्य उदाहरण  आँखों के सामने गुजरते रहते और हम असहाय से उन्हें देखते रहते। सिस्टम का अंग होकर भी बहुत कुछ न कर पाने का मलाल सालता रहता और मन उद्विग्न हो उठता। बहुत हुआ तो सत्यार्थमित्र  के इन पृष्ठों पर अपने मन की बात पोस्ट कर दी। लेकिन उसमें भी यह सावधानी बरतनी होती कि सिस्टम के आकाओं को कुछ बुरा न लग जाय; नहीं तो लेने के देने पड़ जाँय। कम से कम यहाँ वह सब आँखों से ओझल तो हो गया है। यहाँ आकर शांति से अपने मन का काम करने का अवसर तो है।

हिंदी साहित्य की विविध विधाओं में जो कुछ भी अच्छा लिखा गया है; अर्थात्  क्लासिक साहित्य के स्थापित रचनाकारों की लेखनी से निसृत शब्दों का अनमोल खजाना, उसे हिंदीसमय[डॉट]कॉम पर अपलोड करने का जो सुख मुझे यहाँ मिल रहा है वह पहले कहाँ सुलभ था। प्रिंट में उपलब्ध उत्कृष्ट सामग्री को यूनीकोड में बदलकर इंटरनेट पर पठनीय रूप रंग में परोसने की प्रक्रिया में उन्हें पढ़कर जो नैसर्गिक सुख अपने मन-मस्तिष्क को मिलता है वह  पहले कहाँ था?

कबीर ग्रंथावली के समस्त दोहे और पद अपलोड हुए तो इनके भक्तिरस और दर्शन में डूबने के साथ-साथ इसके संपादक डॉ. श्याम सुंदर दास की लिखी प्रस्तावना से भक्तिकाल के संबंध में बहुत कुछ जानने को मिला-

“…कबीर के जन्म के समय हिंदू जाति की यही दशा हो रही थी। वह समय और परिस्थिति अनीश्वरवाद के लिए बहुत ही अनुकूल थी, यदि उसकी लहर चल पड़ती तो उसे रोकना बहुत ही कठिन हो जाता। परंतु कबीर ने बड़े ही कौशल से इस अवसर से लाभ उठाकर जनता को भक्तिमार्ग की ओर प्रवृत्त किया और भक्तिभाव का प्रचार किया। प्रत्येक प्रकार की भक्ति के लिए जनता इस समय तैयार नहीं थी।

मूर्तियों की अशक्तता वि.सं. 1081 में बड़ी स्पष्टता से प्रगट हो चुकी थी जब कि मुहम्मद गजनवी ने आत्मरक्षा से विरत, हाथ पर हाथ रखकर बैठे हुए श्रद्धालुओं को देखते-देखते सोमनाथ का मंदिर नष्ट करके उनमें से हजारों को तलवार के घाट उतारा था। गजेंद्र की एक ही टेर सुनकर दौड़ आने वाले और ग्राह से उसकी रक्षा करने वाले सगुण भगवान जनता के घोर संकटकाल में भी उसकी रक्षा के लिए आते हुए न दिखाई दिए। अतएव उनकी ओर जनता को सहसा प्रवृत्त कर सकना असंभव था। पंढरपुर के भक्तशिरोमणि नामदेव की सगुण भक्ति जनता को आकृष्ट न कर सकी, लोगों ने उनका वैसा अनुकरण न किया जैसा आगे चलकर कबीर का किया; और अंत में उन्हें भी ज्ञानाश्रित निर्गुण भक्ति की ओर झुकना पड़ा।…”

मोहन राकेश का लिखा पहले बहुत कम पढ़ पाया था लेकिन जब उनकी रचनाओं का संचयन (कहानी, डायरी, यात्रा-वृत्त, उपन्यास, निबंध आदि) अपलोड करना हुआ तो बीच-बीच में काम रोककर उनकी शब्दों की सहज जादूगरी में डूबता चला जाता था। एक बानगी देखिए-

“पत्रिका के कार्यालय में हम चार सहायक सम्पादक थे। एक ही बड़े से कमरे में पार्टीशन के एक तरफ़ प्रधान सम्पादक बाल भास्कर बैठता था और दूसरी तरफ़ हम चार सहायक सम्पादक बैठते थे। हम चारों में भी एक प्रधान था जिसे वहाँ काम करते चार साल हो चुके थे। एक ही लम्बी डेस्क के साथ चार कुरसियों पर हम लोग बैठते थे। छोटे प्रधान की कुरसी डेस्क के सिरे पर खिडक़ी के पास थी और हम तीनों की कुरसियाँ उसके बाद वेतन के क्रम से लगी थीं। छोटे प्रधान उर्फ बड़े सहायक सुरेश का वेतन दो सौ रुपये था। उसके बाद लक्ष्मीनारायण था जिसे पौने दो सौ मिलते थे। तीसरे नम्बर पर मेरी एक सौ साठ वाली कुरसी थी और चौथे नम्बर पर डेढ़ सौ वाली कुरसी पर मनोहर बत्रा बैठता था। छोटा प्रधान सबसे ज़्यादा काम करता था, क्योंकि प्रूफ़ देखने के अलावा उसे हम सब पर नज़र भी रखनी होती थी और जब सम्पादक के कमरे में घंटी बजती, तो उठकर आदेश लेने के लिए भी उसी को जाना होता था। वह दुबला-पतला हड्डियों के ढाँचे जैसा आदमी था, जिसे देखकर यह अन्देशा होता था कि बार-बार उठने-बैठने में उसकी टाँगें न चटक जाएँ। सम्पादक को हममें से किसी से भी बात करनी होती, तो पहले उसी की बुलाहट होती थी और वह वापस आकर कारखाने के फ़ोरमैन की तरह हमें आदेश देता था, “नम्बर तीन, उधर जाओ। साहब याद कर रहे हैं।” एक बार बत्रा ने उससे कह दिया कि वह साहब के लिए चपरासी का काम क्यों करता है, तो वह सप्ताह-भर बत्रा से अपने प्रूफ़ दिखाता रहा था।”

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हुए देश के विभाजन के ऊपर लगभग सभी भारतीय भाषाओं में बहुत सी मार्मिक कहानियाँ लिखी गयी हैं। इनका हिंदी में अनूदित संचयन भी हिंदी-समय पर उपलब्ध है। इन कहानियों को पढ़कर हम सहसा उस दौर में पहुँच जाते हैं जिसने आज की अनेक राष्ट्रीय समस्याओं को जन्म दिया है। किसी भी साहित्य प्रेमी या समाज के अध्येता के लिए इन ८६ कहानियों से दो-चार होना उपयोगी ही नहीं अपितु अनिवार्य हैं।

अज्ञेय जी का एक लेख ‘सन्नाटा’ नाम से इंटर के कोर्स में पढ़ रखा था। ‘शेखर एक जीवनी’ और ‘नदी के द्वीप’ जैसे उपन्यास यूनिवर्सिटी के समय में पढ़ रखे थे लेकिन अभी जब उनके विशाल रचना संसार से परिचित हुआ और विविध विधाओं में उनके लेखन को अपलोड करते हुए दुरूह विषयों पर उनकी गहरी समझ और सटीक भाषा से प्रभावित हुआ तो लगा कि सब काम छोड़कर उन्हें ही समग्रता से पढ़ लिया जाय तो जीवन सफल हो जाय। मेरी बात मानने के लिए उनका संक्षिप्त जीवन वृत्त ही पढ़ लेना पर्याप्त होगा। दो-चार दिनों के भीतर सम्पूर्ण सामग्री हिंदी-समय पर होगी।

और हाँ,  अमीर खुसरों की मुकरियाँ पढ़कर और सुनाकर जो मुस्कान फैलती है उसका लोभसंवरण किया ही नहीं जा सकता। अब कहाँ तक गिनाऊँ। बहुत बड़ा भंडार है जी…।

इन सब सामग्रियों के बीच डूबकर मुझे इस बात का ध्यान ही नहीं रहा कि सत्यार्थमित्र पर अंतिम पोस्ट डाले हुए तीन सप्ताह निकल चुके हैं और हिंदी ब्लॉग जगत में विचरण का मेरा प्रिय कार्य प्रायः बंद हो चला है। मेरी तंद्रा आज तब टूटी जब घर में ही डाँट-सी सुननी पड़ी।

“आप को क्या हो गया है जी…? देख रही हूँ कि आपने आजकल पोस्ट लिखना बंद ही कर दिया है। जिस ब्लॉगरी के कारण आप सबकुछ छोड़कर यहाँ आये वही भूल गये हैं। यह दिनभर दूसरों के पुराने लिखे में आँख फोड़ने से कोई मेडल नहीं मिलने वाला है। आपकी पहचान हिंदी ब्लॉगजगत से है। उसे छोड़कर आप ‘फ्रंटपेज’ खोले बैठे हैं। कौन जानता है कि आप यह सब कर रहे हैं? कोई क्रेडिट नहीं मिलने वाली।… यही चलता रहा तो …न घर के रहेंगे न घाट के”

मैंने यह समझाने की कोशिश की मैं इस घिसे-पिटे मुहावरे का ‘पात्र’ नहीं हूँ। अब तो कोई धोबी भी इसे नहीं पालता। बल्कि विद्यार्थी जीवन में पहले जो कुछ नहीं पढ़ पाया था उसे पढ़ रहा हूँ और दूसरों को पढ़वाने का उपक्रम भी कर रहा हूँ। इसी काम के लिए मुझे तनख्वाह मिलती है। वैसे भी नेट पर अपना लिखा कूड़ा पढ़वाने से बेहतर है कि दूसरे उत्कृष्ट जनों का लिखा श्रेष्ठ साहित्य नेट पर उपलब्ध कराऊँ।

“तो आपको यह नौकरी करने से कौन मना कर रहा है। इस ‘पुनीत कार्य’ को अपने ऑफिस तक ही रखिए। छुट्टी के दिन घर पर भी वही जोतते रहेंगे तो कुछ दिन में पागल हो जाएंगे। …और आपके दिमाग में जो कूड़ा ही भरा है तो उसे बाहर निकाल देना ही श्रेयस्कर है। उसी ने आपको यहाँ ला पटका है। आप अपनी पहचान खो देने के रास्ते पर क्यों बढ़ रहे हैं।”

मैने सोचा पूछ लूँ कि अपने ब्लॉग पर क्यों कई महीने बाद कल एक पोस्ट डाल पायी हो लेकिन चुप लगा गया। कारण यह था कि उनकी बातें कहीं न कहीं मुझे अंदर से सही लग रही थीं। अपनी आशंका दूर करने के लिए मैंने कुछ ब्लॉगर मित्रों से बात की तो सबने यही कहा कि कुछ न कुछ लिखते रहना तो अनिवार्य ही है। इसी से मन को शांति मिल सकती है।

अब मेरी दुविधा कुछ मिट चली है। अब काम का बँटवारा करूंगा। घर पर ब्लॉगरी और ऑफिस में हिंदी-समय पर अपलोडिंग। काम के घंटे निर्धारित करने होंगे। हिंदी साहित्य का क्षेत्र इतना विस्तृत तो है ही कि इसे कुछ दिनों के ताबड़तोड़ प्रयास से पार नहीं किया जा सकता। स्थिर गति से लम्बे समय तक लगना होगा इसलिए इस काम में रोचकता बनाये रखना जरूरी है। सिर पर लगातार लादे रखने से कहीं यह बोझ न बन जाय। अब होगा पढ़ना-पढ़वाना और लिखना साथ-साथ।

लीजिए इस राम कहानी में एक पोस्ट निकल आयी। अब ठेल ही देता हूँ…!!!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

अच्छाई को सजोना पड़ता है जबकि बुराई अपने आप फैलती है…।

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पिछले दिनों विश्वविद्यालय प्रांगण में आयोजित ब्लॉगिंग संगोष्ठी में दिल्ली से श्री जय कुमार झा जी पधारे थे। ‘ऑनेस्टी प्रोजेक्ट डेमोक्रेसी’  के अलावा उनके दूसरे भी ब्लॉग हैं। ब्लॉगरी को सामाजिक सरोकारों से जोड़ने पर झा जी का बहुत जोर है। इतना कि उनसे चाहे जिस मुद्दे पर बात करिए उनका हर तीसरा वाक्य ‘सामाजिक सरोकार’ की ओर ही मोड़ कर ले जाता है। उनसे हमें जब भी कुछ चर्चा का मौका मिला वे ‘सोशल ऑडिट’ पर जोर देते दिखे। मुझे थोड़ा विस्मय हुआ कि घूम-फिरकर इन्हीं दो बातों के इर्द-गिर्द परिक्रमा करने से ये थकते क्यों नहीं। उनका कहना था कि हमारे समाज की गड़बड़ियों को दूर करने का सबसे कारगर तरीका है सोशल ऑडिट यानि सामाजिक जाँच।

जय कुमार झा जी ने संगोष्ठी समाप्त होने पर बताया कि वे वर्धा प्रांगण में एक दिन और रुकेंगे। यहाँ संपन्न हुई कार्यशाला में ब्लॉगिंग से जुड़ने वाले नये ब्लॉगर विद्यार्थियों व अन्य छात्रों से अलग से मिलकर कुछ संदेश देना चाहेंगे। संभव हो तो कुलपति जी को भी यह प्रस्ताव देंगे कि वे अपने छात्रों की टीम बनाकर सुदूर गाँवों में सोशल ऑडिट के लिए भेजें। राष्ट्रीय स्तर पर जो लोग इस प्रकार के अभियान में लगे हुए हैं उनकी मदद से इन टीमों को प्रशिक्षित कराया जाय आदि-आदि।

दो-दिवसीय संगोष्ठी की समाप्ति पर मैं थकान मिटाने के नाम पर आराम की मुद्रा में जाना चाहता था लेकिन उनकी ऊर्जा और सामाजिक सरोकार के प्रति अदम्य आग्रह को देखकर मुझे जन संचार विभाग के अध्यक्ष प्रो. अनिल राय ‘अंकित’ से बात करके झा जी की कक्षा का आयोजन करना पड़ा। विभागाध्यक्ष ने सहर्ष रुचि दिखायी और हम झा जी को लेकर पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे छात्रों के बीच एक क्लास-रूम में पहुँच गये। विभाग में उपस्थित सभी कक्षाओं के छात्र कुछ शिक्षकों के साथ वहाँ इकठ्ठा थे। मैने सबसे पहले वहाँ उपस्थित विद्यार्थियों को संगोष्ठी के आयोजन में सहयोग देने हेतु धन्यवाद दिया और फिर अतिथि वार्ताकार का संक्षिप्त परिचय देकर पोडियम पर झा जी को आमंत्रित कर दिया। झा जी ने अपनी बात सामाजिक सरोकार, सोशल ऑडिट, ग्रास रूट लेवेल, सिटिजेन जर्नलिस्ट इत्यादि के माध्यम से रखी। झा जी ने India Rejuvenation Initiative (iri.org.in) नामक संगठन के बारे में बताया जो प्रायः सेवानिवृत्त हो चुके ऐसे प्रभावशाली और अनुभवी नौकरशाहों, न्यायाधीशों, पुलिस अधिकारियों इत्यादि द्वारा खड़ा किया गया है जो समाज में सच्चाई और ईमानदारी को बढ़ावा देना चाहते हैं।

उनकी वार्ता सुनकर मैंने जो समझा उसका सार यह था कि समाज के जागरूक लोगों द्वारा अपने आस-पास हो रहे प्रत्येक कार्य पर न सिर्फ़ निगरानी रखना चाहिए बल्कि कुछ भी गड़बड़ पाने पर सक्षम प्राधिकारियों तक उसकी शिकायत भी पहुँचानी चाहिए। जबतक हर पढ़ा लिखा आदमी सबसे निचले स्तर (grass-root level) पर सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर सतर्क निगाह रखकर धाँधली करने वाले लाभार्थियों, कर्मचारियों और अधिकारियों को गलत करने से रोकने व टोकने के लिए कुछ कष्ट नहीं उठाएगा तबतक हम एक ईमानदार और पारदर्शी समाज की रचना नहीं कर सकेंगे। आज स्थिति बिल्कुल उल्टी और भयावह है। सरेआम लूट और भ्रष्टाचार होते देखकर भी हम चुप रह जाते हैं और अपराधी निर्द्वंद्व होकर अपने कारनामें करता रहता है। ऐसा इसलिए कि हम केवल अपने सुकून और स्वार्थ की पूर्ति की चिंता में ही रमे हुए हैं। किसी ऐसे काम को झंझटी समझ कर किनारा कर लेते हैं जिसमें कुछ व्यक्तिगत स्वार्थ न सधता हो। सामाजिक सरोकारों पर ध्यान देने की फुर्सत किसी के पास नहीं है। उन्होंने सबसे अपील की कि हमें अपने कीमती समय में से कुछ समय समाज के गरीब और असहाय तबके की सहायता के लिए निकालना चाहिए।

झा जी की बातें सबने बड़े ध्यान से सुनीं। बीच-बीच में अनेक छात्र-छात्राओं ने उनसे सवाल दागने शुरू कर दिए। उन युवा चेहरों पर व्यवस्था के प्रति अत्यन्त रोष दिखा। उनकी बातों से ऐसा लगा कि ये सब आदर्श की बातें हैं जो केवल गोष्ठियों और सभाओं में अच्छी लगती हैं। व्यावहारिक दुनिया की सच्चाई बहुत कठोर और कड़वी है। जो लोग सत्ता और शक्ति के शिखर पर बैठे हैं उन्हें किसी तरह से डिगा पाना लगभग असम्भव है। जिनके पास अवसर हैं वे इसका प्रयोग अपनी तिजोरियाँ भरने के लिए कर रहे हैं। अपराधी प्रवृत्ति के लोग गिरोहबंद होकर देश और समाज को लूट रहे हैं। ईमानदार और सच्चे लोगों को कदम-कदम पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। वे असहाय होकर किनारे खड़े हैं। हम युवाओं को ऐसे उपदेश खूब दिये जाते हैं। लेकिन हमारे सामने सबसे बड़ी समस्या तो जीविका का सहारा ढूँढना है। नौकरियाँ दुर्लभ होती जा रही हैं। जो थोड़ी बहुत हैं भी वे भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जा रही हैं। सरकारी धन की लूट मची हुई है। प्रायः सभी इस प्रयास में लगे हैं कि उस लूट में हिस्सेदारी पाने का कोई जुगाड़ खोज लिया जाय। जिन्हें हिस्सा मिल गया वो यथास्थिति बनाये रखने का इन्तजाम सोचते हैं और जो बाहर हैं वे विरोध, धरना, प्रदर्शन, आंदोलन की राह चुनते हैं या चुप होकर अपनी नियति का दोष मानकर घर बैठ जाते हैं।

मुझे लगा कि यह नयी पीढ़ी यथार्थ के धरातल पर कुछ ज्यादा ही पैर जमाकर चलने को तैयार है। आदर्श की बातें सुनने के लिए भी इनके पास धैर्य नहीं है। झा जी उत्साहपूर्वक अपनी ‘ऑनेस्टी प्रोजेक्ट डेमोक्रेसी’ की बात बढ़ाते रहे और छात्रगण उनसे रोटी का सवाल उछालते रहे। एक छात्र ने विश्वविद्यालय के विरुद्ध नाना प्रकार के अनर्गल कुप्रचार में लगी एक वेबसाइट का उदाहरण देते हुए कहा कि यहाँ बहुत से अच्छे कार्य हो रहे हैं लेकिन बाहर वालों के सामने यहाँ की जो छवि बनी है उसे देखकर हमें इस कैम्पस से बाहर जाने पर शर्म महसूस होती है। इस शरारत के पीछे जिनका हाथ है उन्हे सभी पहचानते भी हैं लेकिन फिर भी हम हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। उनके विरुद्ध तो हम कुछ कर नहीं रहे हैं, बल्कि कुछ कर ही नहीं पा रहे हैं तो बाकी दुनिया को सुधारने की बात करने का क्या औचित्य है? मतलब यह कि बुराई अपने पाँव पसारती जाएगी। उसे रोकने वाला कोई नहीं है। किसी के पास इसकी फुर्सत ही नहीं है। इस बहस के बीच मैने ह्वाइट बोर्ड (अब ब्लैक-बोर्ड नहीं रहे) पर इस प्रकार का रेखाचित्र बना दिया-

good&evil

मैने सबका ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा कि आपलोगों के हिसाब से आज के समाज में अच्छाई और बुराई की तुलनात्मक स्थिति कुछ इस प्रकार की है। बुराई का दानव विकराल रूप लेता जा रहा है और सच्चाई और ईमानदारी जैसी अच्छी बातें अल्पमत में आ गयी हैं। बुराई को कम करने के सभी प्रयास प्रायः विफल होते जा रहे हैं। कोई शरीफ़ आदमी गुंडे-मवाली से उलझना नहीं चाहता। झंझट मोल नहीं लेना चाहता। ‘संघे शक्तिः कलियु्गे’ – अपराधियों का गिरोह बहुत एकजुट होकर काम करता है जबकि सच्चे और ईमानदार लोग अकेले पड़ जाते हैं। ऐसे में शायद आप यह मान चुके हैं कि बायीं ओर के स्तम्भ को छोटा नहीं किया जा सकता। लगभग सभी ने मेरी इस बात पर हामी भरी। मैने कहा कि आप सबकी बात मानकर मैं भी स्वीकार कर लेता हूँ कि बुराई को कम नहीं किया जा सकता। लेकिन आप लोगों को अच्छाई की मात्रा बढ़ाने से किसने रोका है? अधिक से अधिक लोग यदि अपने आप में  सद्‍गुणों का विकास कर लें तो यह अंतर उलट सकता है। कुछ इस प्रकार से-

good&evil2

बुराई को उसके हाल पर छोड़ दें, और अच्छाई का अवगाहन करें तो आप दूसरी स्थिति पैदा कर सकते हैं। इस पर वे शांत होकर कुछ सोचने लगे। मैने आगे कहा – लेकिन यह इतना आसान काम नहीं है। क्योंकि प्रकृति आपके विरुद्ध खड़ी है। यह दुनिया जिस रूप में आज है उसमें बुराई स्वाभाविक रूप से अपने आप फैलती जाएगी लेकिन अच्छाई की मात्रा बढ़ाने के लिए मनुष्य को सकारात्मक कदम उठाने पड़ेंगे। प्राकृतिक रूप से  हमारा वातावरण ऐसा ही है। किसान अपने खेत की जुताई करके यत्न पूर्वक खर-पतवार की जड़ सहित सफाई कर लेने के बाद साफ़-सुथरी मिट्टी में अनाज के बीज डालता है। लेकिन बीज के साथ अवांछित घास-फूस अपने आप उग आती है। यदि खेत की निराई-गुड़ाई समय-समय पर न की जाय तो ये खर-पतवार अनाज के पौधों को अच्छादित कर देंगे और खेत की फसल चौपट हो जाएगी। थोड़ी सी असावधानी हुई नहीं कि बीज की बढ़वार रुक जाएगी और सारी मेहनत चौपट हो जाएगी। इसलिए सद्‌गुणों को अपने भीतर सावधानी से सजो कर रखना पड़ता है जबकि दुर्गुण अपने आप घर बना लेते हैं।

इस बात को सिद्ध करने के लिए कुछ और भी उदाहरण मेरे मन में आये। दाँतों को साफ़ रखने के लिए हमें नित्य उनकी सफाई करनी पड़ती है। लेकिन यदि उनका हम कुछ न करें, बस यूँ ही छोड़ दें तो जल्दी ही गंदगी जमती जाएगी। शरीर को साफ़ रखने के लिए रोज साबुन लगाकर नहाना पड़ता है, लेकिन इसे गंदा रखने के लिए किसी प्रयास की जरूरत नहीं है। हमारे वातावरण से आकर गंदगी अपने आप शरीर पर आसन जमा लेती है। घर को साफ रखने के लिए रोज झाड़ू-पोछा करना पड़ता है लेकिन गंदगी जाने कहाँ से अपने आप पधार जाती है। हमारे वातावरण में नकारात्मकता की विषबेल फैलने के अनुकूल अवसर बहुत हैं लेकिन सकारात्मक सुगंध का फूल खिलाने के लिए अच्छा माली बनकर कठिन परिश्रम करना पड़ेगा।

ऊपर के कई उदाहरण मुझे वहाँ कक्षा में नहीं देने पड़े। शायद नयी पीढ़ी को यह बात आसानी से समझ में आ गयी। कम से कम जोरदार तालियों से प्रकट होता उनका समर्थन तो यही कह रहा था।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

तेरा बिछड़ना फिर मिलना…

21 टिप्पणियाँ

 

हे तात,

आज तुम वापस घर लौट आये। मन को जो राहत मिली है उसका बयान नहीं कर पा रहा हूँ। तुम्हारा साथ वापस पाकर मुझे उस टाइप की खुशी मिल रही है जैसी सीमा पार गुमशुदा मान लिए गये सैनिक की देशवापसी पर उसके घर वालों को होती है। कोई उम्मीद नहीं कर रहा था कि तुम सकुशल अपने घर वापस आ जाओगे। वह भी जिस बुरी हालत में तुमने घर छोड़ा था और जिस तरह से तुम्हारा परिचय पत्र भी खो चुका था, मुझे कत्तई उम्मीद नहीं थी कि इतनी बड़ी दुनिया में कोई तुम्हें पहचानने को तैयार होगा, तुम्हारी सेवा-सुश्रुषा करेगा, तुम्हारी बीमारी की मुकम्मल दवा करेगा और फिर पूरी तरह स्वस्थ हो जाने पर हवाई टिकट कटाकर तुम्हें मेरे घर तक पहुँचवा देगा।

मैने सोचा कि तुम्हें वापस भेजने वाले को धन्यवाद दूँ, लेकिन इस पूरी कहानी में इतने अधिक लोग सहयोगी रहे हैं और उनमें अधिकांश को मैं जान-पहचान भी नहीं पा रहा हूँ इसलिए इस सार्वजनिक मंच से एक बार ही उन सबको सामूहिक धन्यवाद ज्ञापित कर देता हूँ।

तुम्हारे साथ मैंने जो किया वह कत्तई अच्छा व्यवहार नहीं कहा जा सकता। अपने सुख के लिए मैंने तुम्हारे साथ बहुत नाइंसाफी की। जब भी कभी हम साथ चले मैं अपना सारा बोझ तुम्हारे कंधे पर डाल देता और खुद मस्ती से इतराता चला करता। तुम इतने निष्ठावान और सेवाधर्मी निकले कि कभी उफ़्‌ तक नहीं की, कोई शिकायत नहीं की। शायद तुमने अपना माथा ठोंक लिया कि जब मैंने तुम्हें तुम्हारे जन्मदाता से रूपयों के बदले खरीदा है तो आखिरी साँस तक मेरी सेवा करना ही तुम्हारा कर्तव्य है, तुम्हारी नियति है। बिल्कुल गूंगा गुलाम बनकर रहे तुम मेरे साथ। जरूरत पड़ने पर तुमने मेरे भाइयों की सेवा भी उसी तत्परता से की। कोई भेद नहीं रखा।

एक बार तो तुम मेरे एक मित्र को लोक सेवा आयोग तक इंटरव्यू दिलाने चले गये। उसने पता नहीं तुममें क्या खूबी देखी कि एक दिन के लिए तुम्हें मुझसे मांगकर अपने साथ ले गया। मैने समझाया भी कि यह तो अभी बिल्कुल नया-नया आया है, मै भी इसके व्यवहार से भली भाँति परिचित नहीं हूँ। तुम्हें पता नहीं रास आये या न आये। वह बोला- “यह नया है तभी तो ले जा रहा हूँ। मुझे अनुभवी और पुराने साथियों के साथ ही तो परेशानी होती है। जब तक साथ रहेंगे, रास्ते भर पता नहीं क्या-क्या चर्र-पर्र करते रहेंगे। बार-बार मूड डिस्टर्ब होने की आशंका रहेगी। कॉन्फिडेन्स गड़बड़ाने का डर बना रहेगा। इंटरव्यू तो अपने दिमाग से देना है, फिर रास्ते भर इनकी सिखाइश और बक-बक की ओर ध्यान क्यों बँटाना? यह नया है तो मुझमें कोई खामी तो नहीं दिखाएगा। इसके चेहरे पर जो चमक है वह आत्म विश्वास बढ़ाने वाली है। यह खुशी से शांतिपूर्वक साथ चलेगा और सुकून से बिना कोई खटपट किए वापस आएगा। मुझे कुछ आराम ही रहेगा।” मैंने बिना कुछ कहे तुम्हें उसके साथ भेज दिया। तुम्हें तो घूमने का बहाना चाहिए। और क्या?

तुमने मुझसे कभी कुछ मुँह खोलकर नहीं मांगा। तुम दरवाजे के बाहर बैठे रहते या घर के कोने में चुपचाप दुबके रहते। टकटकी लगाये रहते कि मैं कब तुम्हें अपने साथ ले चलने वाला हूँ। तुमने खुद अपना खयाल कभी नहीं रखा। मुझे ही जब तुम्हारी दीन-हीन शक्ल-सूरत पर तरस आती तो थोड़ी बहुत साफ़-सफाई के लिए किसीसे कह देता या खुद ही हाथ लगा देता। वैसे मुझे यह तरस भी अपने स्वार्थ में ही आती। तुम्हें मेरे साथ चलना होता था, इसलिए तुम्हें मैली-कुचैली हालत में रखता तो अपनी ही नाक कटती न! जब किसी अच्छी शादी-व्याह, जन्मदिन पार्टी, सालगिरह इत्यादि का निमन्त्रण हो या खास सरकारी मीटिंग में बड़े अधिकारियों से मिलने जाना हो तो मैं तुम्हे कुछ ज्यादा ही महत्व देता। तुम्हारी सादगी और गरिमापूर्ण उपस्थिति से मुझमें आत्मविश्वास बढ़ जाता। तुम बोल नहीं पाते वर्ना मैं पूछता कि जिस दिन मेरी ही तरह तुम्हारी विशेष साज-सज्जा होती उस दिन तुम जरूर गेस कर लेते होगे कि किसी खास मौके पर बाहर निकलना है।

तुमने जब भी मेरे साथ कोई यात्रा की मुझे सुख देने का पूरा प्रयास किया। मेरी सुविधाओं का ख़याल रखते रहे। मेरा बोझ ढोते रहे। ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर तुम आगे-आगे चलकर मेरे लिए उसकी तकलीफ़ कम करने का जतन करते रहे। तुमने इतना तक खयाल रखा कि मेरे पाँव में काँटे न चुभने पाये। मुझसे पहले तुम जमीन पर पाँव रखते ताकि काँटे हों भी तो तुम्हे पता चल जाय और मुझे कोई धोखा न हो। सड़क जल रही हो तो मुझे उसपर नंगे पाँव नहीं चलने देते। तुमने अपने लिए कीचड़ भरा रास्ता चुन लिया होगा लेकिन मेरे पाँव कभी गीले नहीं होने दिया। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ कि मैं निरा स्वार्थी और अहंकारी बनकर तुम्हारा खरीदार होने के दंभ में तुम्हारी चमड़ी से एक-एक पैसा वसूल कर लेने की फिराक़ में लगा रहा जबकि तुमने बिना कोई शिकायत किए मेरी सेवा को अपना धर्म समझा। मैने तुम्हे जैसे चाहा वैसे इस्तेमाल किया। तुम्हारी राय या सहमति लेने की जरुरत भी नहीं समझी। लेकिन हद तो हद होती है। मैने एक बार हद पार की और तुमसे हाथ धोने की नौबत आ गयी।

हुआ यों कि एक बार मैं एक पहाड़ी इलाके में यात्रा पर गया। किसी ठंडी पहाड़ी का इलाका नहीं था बल्कि वहाँ कुछ पथरीले शुष्क टीले थे जिनके ऊपर एक वैश्विक शिक्षण संस्था आकार ले रही थी। उसी संस्था के मुखिया ने मुझे बुला भेंजा था। सुबह-सुबह हम टीले पर बने पथरीले रास्ते से ऊपर की ओर टहलते हुए जा रहे थे। तभी मुझे दूर चोटी पर कुछ परिचित लोग दिखायी दिए। वे लोग भी आगे की ओर बढ़ रहे थे। दूरी इतनी थी कि उन्हें आवाज देकर रोका नहीं जा सकता था। वे लोग आपस में बात करते हुए तेज कदमों से बढ़े जा रहे थे। मैने आव देखा न ताव, उन्हें पाने के लिए दौड़ लगाने लगा। मुझे तुम्हारा भरोसा कुछ ज्यादा ही था। लेकिन शायद तुम दौड़ने के लिए बने ही नहीं थे। संकोच में तुम कुछ बोल न सके। मेरे साथ दौड़ लगाते रहे। हमने उन लोगों को करीब एक किलोमीटर की दौड़ लगाकर पकड़ तो लिया लेकिन जल्द ही मुझे तुम्हारी तकलीफ़ का पता चल गया। मेरी ऊँखड़ी हुई साँस तो कुछ देर में स्थिर हो गयी लेकिन तुम्हारा हुलिया जो बिगड़ा तो सुधरने का नाम नहीं ले रहा था। लगभग कराहने की आवाज करने लगे तुम। मैंने तुम्हें सम्हालते हुए चलने में मदद की और गेस्ट हाउस में आने के बाद लिटाकर छोड़ दिया। फिर बाकी समय तुम मेरा साथ नहीं दे सके। तुम्हारे तलवे में फ्रैक्चर सा कुछ हो गया था। मुझे वापसी यात्रा में तुम्हें टांग कर चलना पड़ा।

जब हम घर वापस लौट गये तो तुम्हारी दुरवस्था देखकर मुझे लगा कि अब तुम मेरे किसी काम के नहीं हो। मुझे तुम्हारे ऊपर दया तो आ रही थी लेकिन उससे ज्यादा मुझे अपने हजार रूपए बेकार चले जाने का अफ़सोस होने लगा। तुम कोने में पड़े रहते मुझे आते-जाते देखते रहते। तुम्हारी देख-भाल में कमी आ गयी और तुम्हारा स्वास्थ्य और बिगड़ता गया। घर में एक बेकार का बोझ बन गये तुम। श्रीमती जी ने एक बार संकेत किया कि इसे किसी मंदिर या अनाथालय पर छोड़ आइए। किसी भिखारी के हाथ लग जाएगा तो शायद उसके काम आए। सुनकर मेरा कलेजा काँप गया। मुझे चिंता होने लगी कि मेरी अनुपस्थिति में कहीं तुम्हें ठिकाने न लगा दिया जाय। मैं तुम्हारे साथ पैदा हुई समस्या के एक सम्मानजनक निपटारे का रास्ता ढूँढने लगा।

(2)

एक दिन बाजार में घूमते हुए मुझे वही आदमी मिल गया जिससे मैने तुम्हें खरीदा था। मैं फौरन उसके पीछे लपक लिया। भीड़-भाड़ के बीच उससे बात करना मुश्किल था। उसने मुझे पहचान तो लिया लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा था कि उससे कैसे बात करूँ। उसने शायद मेरे असमंजस को भाँप लिया। वह बातचीत में गजब का चालाक था। उसी ने शुरुआत की- “ कहिए साहब, जो सामान मैने आपको दिया था वह अच्छा चल रहा है न? कोई शिकायत वाली बात तो नहीं है?” मुझे अब तरकीब सूझी। मैने चेहरे पर निराशा के भाव मुखर किए और बोला- “तुम्हारा सामान तो वैसे बड़े काम का था, लेकिन अब खराब हो गया है। घर में बेकार पड़ा रहता है। कहीं आने-जाने लायक नहीं रह गया है। अगर उसे वापस ले लेते तो ठीक रहता। जिस बुरी हालत में वह है उसको अब उसे बनाने वाले (जन्म देने वाले) ही ठीक कर सकते हैं। उसे उसकी कम्पनी को (अपनी माँ के पास) भेज दिया जाय तो शायद उसे नयी जिन्दगी मिल जाय।”

जानते हो, तुम्हें मेरे हाथों बेंचते समय उसने यह कहा था कि दो-तीन महीने में कोई शिकायत हो तो वापस लाइएगा, दूसरा ले जाइएगा। मेरे पास बहुत से हैं। मैंने उसे इस ‘वारण्टी’ की याद दिलायी। हाँलाकि उसका चेहरा यह साफ शक़ करता दीख रहा था कि यह खरीद-फ़रोख्त तीन महीने के भीतर की नहीं है। लेकिन मैने जब यह कहा कि इस सामान की रसीद तो है नहीं कि  सबूत के तौर पर पेश कर दूँ। तुम्हें अगर मेरी बात पर भरोसा हो तो उसे वापस ले लो नहीं तो मेरा घाटा तो हो ही रहा है। वह जब किसी काम का नहीं रह जाएगा तो हम कबतक उसे ढोते रहेंगे।

मेरी इस बात का जाने क्या असर हुआ कि वह तुम्हें वापस लेने पर राजी हो गया। बस एक शर्त रख दी कि तुम्हारे असली जन्मदाता जो निर्णय लेंगे उसे ही सबको मानना पड़ेगा। पैसा वापस होने की कोई उम्मीद न करें। उसने साफ़ कहा कि मैं तो दो पैसे के लिए केवल मध्यस्थ की भुमिका निभाता हूँ। माल कोई और बनाता है, इस्तेमाल कोई और करता है। मैं उन्हें केवल मिलवा देता हूँ। …उस दिन मैंने सिर्फ़ इस बात पर संतोष किया था कि घर में बेकार हो चुकी एक चीज हट गयी। तुम चूँकि अपने मूल स्थान वापस जा रहे थे इसलिए एक प्रकार के अपराधबोध से मुक्त होने का भाव तो मन में था ही, लेकिन अपने रूपये डूब जाने की आशंका से मन दुखी भी था।

आज जो तुम पूरी तरह से स्वस्थ होकर वापस मेरे घर मेरी सेवा करने के लिए भेंज दिए गये हो तो मुझे अजीब से भावों ने घेर लिया है। तुम्हें देखकर यह लगता ही नहीं है कि मेरे साथ उस पथरीली दौड़ में तुम्हारे पाँव जाया हो गये थे। तुम्हारा  यह लिम्ब ट्रान्सप्लांट किसी कुशल सर्जन का किया लगता है। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं है। सोच रहा हूँ कि मेरे कारण तुम विकलांग हो गये, लेकिन तुम्हारी चिकित्सा में मुझे दमड़ी भी नहीं लगानी पड़ी। मैंने बड़ी चतुराई से उस बाजार की साख पर प्रश्नचिह्न लगा दिया जिस बाजार से मैने तुम्हें खरीदा था। इसका असर यह हुआ कि अगले ने अपनी जबान की रक्षा के लिए सबकुछ दाँव पर लगा दिया।

वह चाहता तो मुझसे टाल-मटोल कर यूँही टहला देता। वह भी तब जब मैने उस शहर से अपने ट्रान्सपर की जानकारी भी उसे दे दी थी। लेकिन वह बन्दा या तो अपनी जबान का बहुत पक्का था या मेरी लानत-मलानत का असर इतना जबर्दस्त था कि उसने मेरा नया पता नोट किया और अपना मोबाइल नम्बर दिया। एक गुप्त कोड नम्बर भी बताया जिसका उल्लेख कर देने भर से वह पूरी बात समझ जाता और संकेत में ही तुम्हारी ‘लेटेस्ट कंडीशन’ बताता रहता। कब तुम अपनी माँ के पास पहुँचे। कब तुम्हारी जाँच करायी गयी, कब ऑपरेशन हुआ। कब अस्पताल से बाहर आये। मुझे पता चला कि तुम्हारे घर वाले तुम्हें हमेशा के लिए वापस रखने को राजी नहीं हुए। यह तय हुआ कि जिसने तुम्हें एक बार खरीद लिया उसी की सेवा में तुम्हें जाना चाहिए। भले ही तुम्हें सेवा के लायक बनाने में उन्हें बड़ा खर्च उठाना पड़े। डॉक्टर ने कहा कि खराब हो चुके अंग को पूरा ही बदलना पड़ेगा। परिवार बड़ा था। जाने कैसे स्पेयर अंग का जुगाड़ हो गया। यदि यह कृत्रिम अंग प्रत्यारोपण है तो अद्‌भुत है। बिल्कुल ओरिजिनल जैसा।

मुझे क्या, मैं तो बहुत खुश हूँ। खोयी पूँजी लौट आयी है। वह भी घर बैठे ही। बस फोन कर-करके उस मध्यस्थ को ललकारता रहा। उसने भी अपनी जबान पूरी करने की कसम खा ली थी। उसने तुम्हारे परिवार को फोन कर-करके तुम्हारे ठीक हो जाने के बाद अपने पास बुला ही लिया। तुम बोल नहीं सकते इसलिए तुम्हारे गले में मेरे नये घर का पता लिखकर टाँग दिया और रवाना कर दिया। तुम्हें पहुँचाने वह खुद तो नहीं आया लेकिन वहाँ से यहाँ तक पड़ने वाले हर स्टेशन पर उसके भाड़े के आदमी मौजूद थे। मुझे पता चला कि उस आदमी ने तुम्हारी बीमार हालत में तुम्हें तुम्हारे जन्मस्थान तक हवाई जहाज से भेंजा। तुम्हारी वापसी यात्रा भी हवाई मार्ग से हुई है।

lost&found

मुझे दो सप्ताह से तुम्हारा इन्तजार था। इंटरनेट बता रहा था कि तुम दिल्ली से नागपुर ्के लिए २६ तारीख को उड़ चुके हो। बाद में २७ ता. को  नागपुर से वर्धा भी चले आये हो। लेकिन वर्धा स्टेशन से मेरे घर तक आने में तुम्हें पन्द्रह दिन लग गये। आज पता चला कि जिस आदमी को तुम्हें पहुँचाने की जिम्मेदारी दी गयी थी वह बीमार हो गया था। तुम्हें अपने घर पर ही रखे हुए था।  आज पूछताछ करवाने पर वह तुम्हें लेकर आया।14092010912

आज जब तुम मेरे घर वापस आये हो तो लम्बी यात्रा की थकान तुम्हारे चेहरे पर साफ झलक रही है। तुम्हारी `बेडिंग’ के भी चीथड़े हो गये हैं। जाने कितने लोगों के हत्थे चढ़ने के बाद तुम अपने असली ग्राहक के पास वापस आ गये। अब सबकुछ ठीक हो जाएगा।

अब मैं तुम्हारे साथ कोई बुरा बर्ताव नहीं कर सकता। अपने पिछले दुर्व्यवहार पर पछता रहा हूँ। अब तुम्हें उस तरह तंग करने की सोच भी नहीं सकता। कल सुबह तुम्हारी मालिस-पॉलिश अपने हाथ से करूंगा। तुम्हारी आज जो सूरत है वह मेरी उस गलती की याद दिला रही है। उसे हमेशा याद रखने के लिए तुम्हारी एक तस्वीर खींच लेता हूँ। बुरा मत मानना। अब तो मैं तुम्हें बहुत लाड़-प्यार से रखने की सोच रहा हूँ। चिंता मत करना इस बीच अपनी सेवा के लिए मैने कुछ और ‘साधन’ जुटा लिए हैं। सारा बोझ अकेले तुमपर नहीं डालूंगा। तुमको दौड़ पर साथ ले जाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। अब तुम अपनी जमात के वी.आई.पी. हो चुके हो। बस, अब इतना ही। तुम्हारा बोधप्राप्त हितचिंतक…

 

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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