रेलयात्रा हमें सहिष्णु बनाती है…

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हमें स्कूल में भारतीय संस्कृति की विशेषताएँ विषय पर निबन्ध रटाया गया था। इसमें एक विशेषता थी- सहिष्णुता। इस विशेषता को लेकर मेरे मन में कौतूहल होता रहा है। भूख, भय, बेरोजगारी, प्राकृतिक आपदा या किसी दुर्घटना  से उत्पन्न दुख व विपत्ति को सहन कर लेने की क्षमता यदि हमारे भीतर प्रचुर मात्रा में है तो अच्छा ही है। हमें उस विपरीत परिस्थिति से बाहर निकलने में मदद मिलती है। लेकिन यदि इस फेर में हमें कुछ भी सह लेने की आदत पड़ जाय तो वही होता है जो भारत के साथ हुआ है। इतिहास बताता है कि किस तरह हमने विदेशी लुटेरों और आक्रान्ताओं को भी आराम से सहन कर लिया। घर बुलाकर मेहमान बनाया और फिर मालिक बनाकर देश की राजगद्दी सौंप दी। एक के बाद एक भ्रष्टाचारी कीर्तिमान हमारी आँखों के सामने बनते जाते हैं और हम मूक दर्शक बनकर या “अन्ना हजारे जिन्दाबाद” का नारा लगाकर घर बैठ जाते हैं। हमारे भीतर अन्याय, अत्याचार, शोषण, और भ्रष्टाचार के प्रति गजब की सहनशक्ति विकसित हो चुकी है। इस उपलब्धि के पीछे हमारी भारतीय रेल का भी थोड़ा हाथ है इसका विचार मेरे मन में पिछली यात्रा के दौरान प्रकट हुआ।

मेरा अनुभव कुछ नया नहीं है। आप सबको इस स्थिति का सामना आये दिन होता होगा। एक आम भारतीय के लिए रेलगाड़ी से यात्रा करना अपनेआप में एक मजबूरी है। एक मात्र सस्ता और टिकाऊ विकल्प यही है, सुन्दर भले ही न हो। a-crowded-passenger-trainलम्बी दूरी की गाड़ियो के जनरल डिब्बे किस प्रकार जीवित मानव देह की लदान करते हैं; और जायज टिकट वालों को भी किसप्रकार थप्पड़ खानी पड़ती है और अंटी ढीली करनी पड़ती है, यह वर्णनातीत है। मैं उस चरम स्थिति की चर्चा नहीं कर रहा हूँ। मैं तो अपेक्षाकृत अधिक सुविधा सम्पन्न श्रेणियों में यात्रा करने वालों में से एक होकर उससे प्राप्त अनुभव के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि रेलयात्रा हमें सहिष्णु बनाती है और इस प्रकार भारतीय संस्कृति की रक्षा में अनुपम योगदान दे रही है।Open-mouthed smile

हाल ही में मुझे अपनी माता जी के खराब स्वास्थ्य की चिन्ता से गोरखपुर जाना हुआ। वहाँ से लखनऊ वापसी की यात्रा रविवार 25 जुलाई, 2011 को अवध एक्सप्रेस से करनी थी जिसका निर्धारित समय दोपहर 1:15 का था। गाड़ी पकड़ने से पहले मुझे अम्मा को हड्डी के डॉक्टर से दिखाना था। अलस्सुबह उठकर मैंने डॉक्टर के यहाँ नम्बर लगाया, क्‍लिनिक खुलने पर लाइन लगाया, डॉक्टर ने प्रारम्भिक जाँच के बाद डिजिटल एक्स-रे के लिए अन्यत्र भेजा। वहाँ एक घंटे लगे। वापस आकर उन्होंने रिपोर्ट देखी और दवाएँ लिखने के बाद दो अन्य विशेषज्ञ चिकित्सकों (न्यूरोलॉजिस्ट और गैस्ट्रोइंटेरोलॉजिस्ट) को रेफ़र कर दिया। दोनो जगह जाने पर पता चला कि रविवार होने से इनके क्‍लिनिक बन्द थे। मेरे बड़े भैया ने कहा कि वे अम्मा को अगले दिन दिखा देंगे। यानि मुझे अब लखनऊ की गाड़ी पकड़ने के लिए स्टेशन जाना चाहिए। मैं यह सब दौड़-धूप करता हुआ लगातार मोबाइल से गाड़ी के प्रस्थान समय की सूचना ले रहा था।

गाड़ी 50 मिनट लेट होने की कम्प्यूटरीकृत सूचना मोबाइल पर एक बार शुरू हुई तो अन्ततक रिकार्ड बदला नहीं गया। मैं उसी के अनुसार स्टेशन पहुँचा तो पू्छताछ केन्द्र पर लगा बोर्ड गाड़ी के 30 मिनट देरी से  7-नम्बर प्‍ले‍टफॉर्म पर आने की सूचना दे रहा था। मेरे हाथ पाँव फूल गये। दौड़ता-भागता हुआ मैं ओवरब्रिज पर चढ़कर प्‍ले‍टफॉर्म नम्बर-7 पर उतरा। एक दिक्कत यह भी हुई कि ओवरब्रिज से प्‍ले‍टफॉर्मों पर उतरने वाली सीढ़ियों के पास प्‍ले‍टफॉर्म संख्या दर्शाने वाले बोर्ड नदारद थे। मुझे एक मिनट रुककर पहले नम्बर से गिनती करते हुए सातवें नम्बर का अनुमान लगाना पड़ा।

प्‍ले‍टफॉर्म पर अधिकांश यात्री अपना सामान हाथ में संभाले गाड़ी आने की दिशा की ओर देख रहे थे। मुझे आश्वस्ति हुई कि अभी गाड़ी आयी नहीं है, बल्कि कुछ ही देर में आने वाली है। दस-पन्द्रह मिनट बीते और गाड़ी नहीं आयी तो सबने अपने हाथ में टँगा सामान नीचे रखना शुरू किया और अपनी जगह पर वापस आने लगे। कुछ देर खड़ा रहने के बाद मैं भी थकान के कारण बैठने की जगह खोजने लगा। सारी बेन्चें क्षमता से अधिक भार से लदी हुई थीं। रेलगाड़ी चलाने वाले गार्ड्स के उपयोग हेतु बने लकड़ी या लोहे के बक्से बड़ी मात्रा में वहीं बिखरे पड़े थे। उनपर भी यात्रियों ने कब्जा जमा रखा था। एक जगह बक्से एक के ऊपर एक रखे हुए थे जो ऊँचे हो जाने के कारण खाली थे। मैं उचककर ऐसे ही एक बक्से पर बैठ गया। निचले बक्से के कोने की टिन फटी हुई थी जिसमें मेरे पैंट की मोहरी उलझ गयी लेकिन संयोग से कोई चीरा नहीं लगा।

मोबाइल पर कम्प्यूटरीकृत सूचना अभी भी वास्तविक आगमन समय 13:55 और वास्तविक प्रस्थान समय 14:00 बजे का बता रही थी जबकि सवा दो बज चुके थे और गाड़ी का कुछ पता नहीं था। कुछ देर बाद सात नम्बर प्‍ले‍टफॉर्म पर ही दूसरी दिशा से (लखनऊ की ओर से) एक गाड़ी आकर रुकी। इस पर भी अवध एक्सप्रेस लिखा था। कुछ लोग इसपर चढ़ने का उपक्रम करने लगे। ये वो थे जिन्हें अपने गन्तव्य की सही दिशा का ज्ञान नहीं था। गनीमत थी कि यह इस गाड़ी का आखिरी स्टेशन था और यात्रियों के उतरने के बाद रेलकर्मी इसकी खिड़कियाँ और दरवाजे बन्द करने लगे। मुझे अब यह चिन्ता हुई कि इस गाड़ी के प्‍ले‍टफॉर्म खाली करने में कम से कम आधे घंटे तो लगेंगे ही, इसलिए मेरी गाड़ी अभी आधे घंटे और नहीं आ सकेगी। तभी घोषणा हुई कि अवध एक्सप्रेस थोड़ी ही देर में दूसरी ओर प्‍ले‍टफॉर्म नम्बर-6 पर आ रही है। सभी यात्री अपना सामान उठाकर उसी प्‍ले‍टफॉर्म पर एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ हो लिए।

three_tier_air_conditioned_करीब सवा तीन बजे गाड़ी नमूदार हुई। हम थके-हारे अपना ए.सी. थर्ड कोच नम्बर-B2 ढूँढकर उसके बर्थ संख्या-11 पर पहुँचे। यह सबसे ऊपर की बर्थ मैंने जानबूझकर ली थी ताकि दिन में भी आराम से लेटकर यात्रा की जा सके। थकान इतनी थी कि तुरन्त सो जाने का मन हुआ। मैंने अटेन्डेन्ट को खोजकर तत्काल बेडरोल ले लेने का सोचा लेकिन वह अपने स्थान पर नहीं मिला। मैं अपनी बर्थ पर लौट आया और यूँ ही लेट गया। सामने की बर्थ से पहले से प्रयोग की जा चुकी एक तकिया लेकर अपने सिर को आराम दे दिया। गाड़ी चल चुकी थी। पन्द्रह-बीस मिनट बाद जब टीटीई साहब आये तो मुझे नींद लग चुकी थी। उनके जगाने पर मैंने आँखें मूँदे हुए ही जेब से टिकट और फोटो आईडी (PAN Card) निकाला और उनकी ओर बढ़ाते हुए अनुरोध किया कि बेडरोल वाले को चादर के साथ भेज दें। उनके आश्वासन से सन्तुष्ट होकर मैं करवट बदलकर सो गया।

करीब एक घंटे बाद एक स्टेशन पर कुछ और यात्री चढ़े। उनका टिकट देखने टीटीई साहब दुबारा आये तो मैंने उठकर बेडरोल की बात याद दिलायी। वे चकित होकर बोले- मैंने तो उससे तभी कह दिया था, क्या अभी तक नहीं दिया उसने? यह कहते हुए वे तत्परता से किनारे की ओर गये और थोड़ी देर में एक लड़के के साथ वापस आये। यह कोच अटेन्डेन्ट था। टीटीई ने उससे कहा कि इन्हें बताओ कि मैंने तुमसे बेडरोल के लिए कहा था कि नहीं। वह बोला- अच्छा, दे देंगे। उसकी लापरवाह शैली से मुझे झुँझलाहट हुई। मैंने अधीर होकर पूछा- कबतक दे दोगे। लखनऊ पहुँच जाने के बाद? इस पर वह तैश में आ गया और बोला- जाओ, नहीं दूँगा (मानो कह रहा था- क्या कल्लोगे!) मैं हतप्रभ सा हो गया। टीटीई साहब को भी यह बहुत बुरा लगा। वे उसे डाँटने जैसा कुछ कहने लगे। उसमें यह बात भी शामिल थी  कि उस लड़के के साथ ही अक्सर ऐसा लफड़ा हो जाता है। मैंने उनसे पूछा- क्या आपके पास इसकी शिकायत दर्ज करने का कोई अधिकार नहीं है? आप मेरी ओर से लिखित शिकायत दर्ज कर लीजिए और उच्चाधिकारियों के संज्ञान में लाइए।

मेरी इस बात पर टीटीई साहब थोड़े संजीदा हो गये। सकुचाते हुए बोले- अरे साहब, यह बात किसको नहीं पता है! जबसे यह काम प्राइवेट ठेकेदारों के हाथ में दे दिया गया है तबसे कोई कंट्रोल नहीं रह गया है। ये किसी की नहीं सुनते। इन्हें कोई डर ही नहीं है। मैं अगर शिकायत करना चाहूँ तो मुझे तमाम कागज बनाने पड़ेंगे, कई बार ऑफिस के चक्कर लगाने पड़ेंगे और परिणाम फिर भी कुछ नहीं मिलेगा। मैंने पूछा- अगर मैं शिकायत करना चाहूँ तो किसे लिखना होगा? वे बोले- वेबसाइट पर देखिएगा। यह गाड़ी (19040/AVADH EXP) पश्चिम रेलवे की है। ठेकेदार भी उन्ही का है। यहाँ से उनके खिलाफ़ कुछ नहीं हो पाता है। आप वहीं शिकायत कीजिए। मैंने तय किया कि घर पहुँचकर रेलवे में उस लापरवाह केयरटेकर की शिकायत ऑनलाइन दर्ज कराऊंगा।

इस कहासुनी के दस-पन्द्रह मिनट बाद उसने मुझे दो चादरें व एक तकिया लाकर दे दिया। कम्बल सामने की बर्थ पर मौजूद था जिसकी जरूरत नहीं थी, और छोटा तौलिया वह किसी को दे ही नहीं रहा था।

मैं अपनी बर्थ पर लेटे हुए इस परिदृश्य पर विचार करता रहा। काश रेलवे का कोई सक्षम अधिकारी बिना किसी पूर्व सूचना के ऐसे यात्री डिब्बों में चुपचाप यात्रा करता और बाद में दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही करता! wishful thinking!!! मैंने देखा तो यह है कि जब किसी ट्रेन में कोई बड़ा रेल अधिकारी अपने सैलून में चल रहा होता है तो वह ट्रेन भी समय से चलती है और दूसरी यात्री सुविधाएँ भी जैसे- भोजन व जलपान आदि  बेहतर हो जाती हैं। बाकी समय में रेल हमारी सहिष्णुता भरी छाती पर मूँग दलते ही चलती है।

मैं उस डिब्बे में चल रहे अन्य यात्रियों के दृष्टिकोण को परखने की कोशिश करने लगा। मैंने महसूस किया कि रेलवे द्वारा टिकट के पैसों में इस सुविधा के लिए अलग से शुल्क वसूलकर भी इसको वास्तव में उपलब्ध कराने में की जा रही लापरवाही के प्रति लोगों में प्रायः उदासीनता है। जो चिन्तित करने वाली बात है। मैंने देखा कि जिन्हें बेडरोल की तुरन्त जरूरत थी वे कोच के एक सिरे तक जाते और वहाँ उस लड़के से अनुरोध करके अपने लिए चादर वगैरह खुद ले आते। मैंने देखा कि वह लड़का जाने कहाँ से आये अपने साथियों के साथ ताश खेलने में व्यस्त रहा। उसने न तो कोई यूनीफॉर्म पहन रखा था और न ही नाम का कोई बिल्ला लगा रखा था कि उसे पहचाना जा सके। यात्री आपस में भुनभुनाते हुए उसके प्रति असंतोष तो व्यक्त कर रहे थे लेकिन उससे उलझने या उसको टोकने की जरूरत किसी ने नहीं समझी। शायद वे रात में सोने का समय होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। शायद तबतक उन्हें बेडरोल अपनेआप ही मिल जाता। लेकिन रात दस बजे लखनऊ पहुँचने तक लगभग सात घंटे की यात्रा में मैंने एक भी बर्थ पर उसे अपनेआप बेडरोल पहुँचाते नहीं देखा।

घर वापस आकर मैं अपनी गृहस्थी और नौकरी में व्यस्त हो गया हूँ। शिकायत दर्ज करने की इच्छा धीरे-धीरे दम तोड़ रही है। तीन दिन बीत जाने के बाद यह हाल आपको बता पाने का मौका पा सका हूँ। यात्रा की तिथि, स्थान, समय व अन्य विवरण वास्तविक रूप से इसलिए उद्धरित कर दिया है कि शायद रेल महकमें का कोई जिम्मेदार अधिकारी इसे पढ़कर कोई स्वतः स्फूर्त कार्यवाही कर डाले। हमें तो परिस्थितिजन्य सहिष्णुता ने घेर लिया है। Confused smile

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

घर में जंग की नौबत : टालिए न…!

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आज मेरे घर में बात-बात में एक बहस छिड़ गयी। बहस आगे बढ़कर गर्मा-गर्मी तक पहुँच गयी है। घर में दो धड़े बन गये हैं। दोनो अड़े हुए हैं कि उनकी बात ही सही है। दोनो एक दूसरे को जिद्दी, कुतर्की, जब्बर, दबंग और जाने क्या-क्या बताने पर उतारू हैं। दोनो पक्ष अपना समर्थन बढ़ाने के लिए लामबन्दी करने लगे हैं। मोबाइल फोन से अपने-अपने पक्ष में समर्थन जुटाने का काम चालू हो गया है। अपने-अपने परिचितों, इष्ट-मित्रों व रिश्तेदारों से बात करके अपनी बात को सही सिद्ध करने का प्रमाण और सबूत इकठ्ठा कर रहे हैं। अब आप जानना चाहेंगे कि मुद्दा क्या है…?

तो मुद्दा सिर्फ़ इतना सा है कि यदि कोई व्यक्ति स्कूटी, स्कूटर, मोटरसाइकिल इत्यादि दुपहिया वाहन चलाना सीखना चाहे तो इसके लिए उसे पहले साइकिल चलाना आना चाहिए कि नहीं?

प्रथम पक्ष का कहना है कि जब तक कोई साइकिल चलाना नहीं सीख ले तबतक वह अन्य मोटर चालित दुपहिया वाहन नहीं सीख सकता। इसके समर्थन में उसका तर्क यह है कि दुपहिया सवारी पर संतुलन बनाये रखने का कार्य पूरे शरीर को करना पड़ता है जिसका अभ्यास साइकिल सीखने पर होता है। साइकिल चलाने आ जाती है तो शरीर अपने आप आवश्यकतानुसार दायें या बायें झुक-झुककर दुपहिया सवारी पर संतुलन साधना सीख जाती है। शरीर को यह अभ्यास न हो तो अन्य मोटरचालित दुपहिया वाहन सीख पाना सम्भव नहीं तो अत्यन्त कठिन अवश्य है। इसलिए पहले साइकिल सीखना जरूरी है।

द्वितीय पक्ष का कहना है कि साइकिल चलाने में असंतुलित होने की समस्या ज्यादा इसलिए होती है कि उसमें पैडल मारना पड़ता है। जब पैर दायें पैडल को दबाता है तो साइकिल दाहिनी ओर झुकने लगती है और जब बायें पैडल को दबाता है तो बायीं ओर झुकती है। इस झुकाव को संतुलित करने के लिए शरीर को क्रमशः बायीं और दायीं ओर झुकाना पड़ता है। लेकिन मोटरचालित दुपहिया में यह समस्या नहीं आयेगी क्योंकि उसमें पैर स्थिर रहेगा और पैडल नहीं दबाना होगा। जब एक बार गाड़ी चल पड़ेगी तो उसमें संतुलन अपने आप स्थापित हो जाएगा। इसलिए स्कूटी सीखने के लिए साइकिल चलाने का ज्ञान कत्तई आवश्यक नहीं है।

फोटोसर्च.कॉम से साभार

clipartpal.com से साभार

इन दो पक्षों में सुलह की गुन्जाइश फिलहाल नहीं दिखती। प्रथम पक्ष का कहना है कि यदि द्वितीय पक्ष एक भी ऐसे व्यक्ति को सामने ला दे जो बिना साइकिल सीखे ही स्कूटी/ मोटरसाइकिल चलाना सीख गया हो तो वह हार मान जाएगा और उस ‘दिव्य आत्मा’ का शागिर्द बन जाएगा। दूसरे पक्ष को किसी ने फोन पर आश्वासन दिया है कि वह ऐसे आम आदमियों, औरतों व लड़के-लड़कियों की लाइन लगा देंगे जिन्होंने ‘डाइरेक्ट’ मोटरसाइकिल- स्कूटर चलाना सीख लिया है।

अब प्रथम पक्ष दिल थामे उस लाइन की प्रतीक्षा में है जो उसके घर के सामने लगने वाली है। लेकिन समय बीतने के साथ अभी उसके आत्मविश्वास में कोई कमी नहीं आयी है क्योंकि अभी कोई उदाहरण सामने नहीं आया है। मुद्दा अभी गरम है। सबूतों और गवाहों की प्रतीक्षा है।

इस मुद्दे को यहाँ लाने का उद्देश्य तो स्पष्ट हो ही गया है कि कुछ जानकारी यहाँ भी इकठ्ठी की जाय। ब्लॉग-जगत में भी तमाम (अधिकांश प्राय) लोग ऐसे हैं जो दुपहिया चलाना जानते हैं। आप यहाँ बताइए कि आपका केस क्या रहा है- पहले साइकिल या ‘डाइरेक्ट’ मोटर साइकिल? निजी अनुभव तो वास्तविक तथ्य के अनुसार बताइए लेकिन इस मुद्दे का व्यावहारिक, वैज्ञानिक और सैद्धान्तिक विवेचन करने की भी पूरी छूट है।

(नोट : घर के भीतर प्रथम पक्ष का प्रतिनिधित्व कौन कर रहा है व दूसरे पक्ष का कौन, यह स्वतःस्पष्ट कारण से गोपनीय रखा जा रहा है।)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)  

रेलवे की जुगाड़ सुविधा…

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समय: प्रातःकाल 6:30 बजे

स्थान: बर्थ सं.18 – A1, पटना-सिकंदराबाद एक्सप्रेस

इस पोस्ट को लिखने का तात्कालिक कारण तो इस ए.सी. कोच का वह ट्वॉएलेट है जिससे निकलकर मैं अभी-अभी आ रहा हूँ और जिसके दरवाजे पर लिखा है- ‘पाश्चात्य शैली’। लेकिन उसकी चर्चा से पहले बात वहाँ से शुरू करूँगा जहाँ पिछली पोस्ट में छोड़ रखा था।

आप जान चुके हैं कि वर्धा से कार में इलाहाबाद के लिए चला था तो एक चौथाई रास्ता टायर की तलाश में बीता। जबलपुर में टायर मिला तो साथ में एक पोस्ट भी अवतरित हो ली। आगे की राह भी आसान न थी। रीवा से इलाहाबाद की ओर जाने वाला नेशनल हाई-वे पिछले सालों से ही टूटा हुआ है। अब इसकी मरम्मत का काम हो रहा है। नतीज़तन पूरी सड़क बलुआ पत्थर, पथरीली मिट्टी और बेतरतीब गढ्ढों का समुच्चय बनी हुई है। पिछले साल इसी रास्ते से वर्धा जाते समय मुझे करीब चालीस किमी. की दूरी पार करने में ढाई घंटे लग गये थे। इसलिए इस बार मैं सावधान था।

मैंने अपने एक मित्र से वैकल्पिक रास्ता पूछ लिया था जो रीवा से सिरमौर की ओर जाता था; और काफी घूमने-फिरने के बाद रीवा-इलाहाबाद मार्ग पर करीब साठ किमी आगे कटरा नामक बाजार में आकर मिल जाता था। रीवा से सिरमौर तक चिकनी-चुपड़ी सड़क पर चलने के बाद हमें देहाती सड़क मिली जो क्यौटी होते हुए कटरा तक जाती थी। हमें दर्जनों बार रुक-रुककर लोगों से आगे की दिशा पूछनी पड़ी। एक गाँव के बाहर तिराहे पर भ्रम पैदा हो गया जिसे दूर करने के लिए हमें पीछे लौटकर गाँव के भीतर जाना पड़ा। अँधेरा हो चुका था। कोई आदमी बाहर नहीं दिखा। एक घर के सामने गाड़ी रोककर ड्राइवर रास्ता पूछने के लिए उस दरवाजे पर गया। दो मिनट के भीतर कई घरों के आदमी हाथ में टॉर्च लिए गाड़ी के पास इकठ्ठा हो गये। फिर हमें रास्ता बताने वालों की होड़ लग गयी। कम उम्र वालों को चुप कराकर एक बुजुर्गवार ने हमें तफ़्सील से पूरा रास्ता समझा दिया। उनके भीतर हमारी मदद का ऐसा जज़्बा था कि यदि हम चाहते तो वे हमारे साथ हाइ-वे तक चले आते।

खैर, आगे का करीब चालीस किमी. का सर्पाकार देहाती रास्ता प्रायः गढ्ढामुक्त था। रात का समय था इसलिए इक्का-दुक्का सवारी ही सामने से आती मिली। सड़क इतनी पतली थी कि किसी दुपहिया सवारी को पार करने के लिए भी किसी एक को सड़क छोड़ने की नौबत आ जाती। जब हम हाइ-वे पर निकल कर आ गये तो वही क्षत-विक्षत धूल-मिट्टी से अटी पड़ी सड़क सामने थी। उफ़्‌… हम हिचकोले खाते आगे बढ़ते जा रहे थे और सोचते जा रहे थे कि शायद हमारा वैकल्पिक रास्ते का चुनाव काम नहीं आया। खराब सड़क तो फिर भी मिल गयी। हमने कटरा बाजार में गाड़ी रुकवायी। सड़क किनारे दो किशोर आपस में तल्लीनता से बात कर रहे थे। उनमें से एक साइकिल पर था। जमीन से पैर टिकाए। दूसरा मोबाइल पर कमेंट्री सुन रहा था और अपने साथी को बता रहा था।

मैंने पूछा- भाई, यह बताओ यह सड़क अभी कितनी दूर तक ऐसे ही खराब है?

लड़का मुस्कराया- “अंकल जी, अब तो आप ‘कढ़’ आये हैं। पाँच सौ मीटर के बाद तो क्या पूछना। गाड़ी हवा की तरह चलेगी।” उसने अपने दोनो हाथों को हवा में ऐसे लहराया जैसे पानी में मछली के तैरने का प्रदर्शन कर रहा हो। जब हमने बताया कि हम हाई-वे से होकर नहीं आ रहे हैं बल्कि सिरमौर होकर आ रहे हैं तो उसने हमें शाबासी दी और बुद्धिमान बता दिया। बोला- जो लोग हाई-वे से आ रहे हैं उनकी गाड़ी लाल हो जाती है। गेरुए मिट्टी-पत्थर की धूल से। आप अपनी कार  ‘चीन्ह’  नहीं पाते। हमें समझ में आ गया कि आगे का रास्ता बन चुका है। हम खुश हो लिए और आगे चल दिए। इलाहाबाद तक कोई व्यवधान नही हुआ।

इलाहाबाद में सरकारी काम निपटाने के अलावा अनेक लोगों से मिलने का सुख मिला। आदरणीय ज्ञानदत्त पांडेय जी के घर गया। श्रद्धेया रीता भाभी के दर्शन हुए। सपरिवार वर्धा जाकर नौकरी करने के हानि-लाभ पर चर्चा हुई। गुरुदेव के स्वास्थ्य की जानकारी मिली। लम्बे समय तक चिकित्सकीय निगरानी में रहने और लगातार दवाएँ लेते रहने की मजबूरी चेहरे पर स्थिर भाव के रूप में झलक रही थी। वे इस बार कुछ ज्यादा ही गम्भीर दिखे।

प्रयाग में मेरे पूर्व कार्यस्थल-कोषागार से जुड़े जितने भी अधिकारी-कर्मचारी और इष्टमित्र मिले उन सबका मत यही था कि मुझे अपना प्रदेश और इलाहाबाद छोड़कर बाहर नहीं जाना चाहिए था। इस विषय पर फिर कभी चर्चा होगी।

वर्धा वापस लौटने का कार्यक्रम रेलगाड़ी से बना। दिन भर मंगल-व्रत का फलाहार लेने के बाद शाम को एक मित्र की गृहिणी के हाथ की बनी रोटी और दही से व्रत का समाहार करके मैं स्टेशन आ गया। अनामिका प्रकाशन के विनोद शुक्ल और वचन पत्रिका के संपादक प्रकाश त्रिपाठी गाड़ी तक विदा करने आये। उन्हें हार्दिक धन्यवाद देकर हम विदा हुए। रात में अच्छी नींद आयी।

आज सुबह जब हम ‘पाश्चात्य शैली’ के शौचालय में गये तो वहाँ का अद्‌भुत नजारा देखकर मुस्कराए बिना न रह सके। साथ ही पछताने लगे कि काश कैमरा साथ होता। फिलहाल ट्वॉएलेट की देखभाल करने वालों के बुद्धि-कौशल और गरीबी में भी काम चला लेने की भारतीय प्रतिभा का नमूना पेश करते इस ए.सी. कोच के पश्चिमी बनावट वाले शौचालय की कुछ तस्वीरें मैंने अपने मोबाइल से ही खींच डाली हैं। खास आपके लिए। देखिए न…

IMG0069A भारत की एक बड़ी आबादी जैसे स्थानों पर शौच आदि से निवृत्त होती है उससे बेहतर सफाई है यहाँ। यह दीगर बात है कि सीट को ट्‍वाएलेट पेपर से अपने हाथों साफ़ करने के बाद फोटो लेने का विचार आया।
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IMG0070A ट्‍वाएलेट पेपर …? पूरा बंडल उपलब्ध है जी। भले ही इसे रखे जाने का मूल बक्सा बेकार हो गया है लेकिन ठेकेदार ने इसे पॉलीथीन से बाँधकर वहीं लटका छोड़ा है। इसे प्रयोगार्थ निकालने के लिए थोड़ी ही मशक्कत करनी पड़ी।
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IMG0061A हाथ धुलने के लिए पेपर सोप रखने की कोई जरूरत नहीं। रेलवे द्वारा लिक्विड सोप की सुविधा गारंटीड है। इसे रखने की डिबिया अपने स्थान से उखड़ गयी तो भी कोई बात नहीं।  ‘रेलनीर’  की बोतल तो है। साबुन भरकर बेसिन के बगल में ही लटका रखा है। जी भर इस्तेमाल करें।
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IMG0062A ट्‍वाएलेट पेपर रोल को पॉलीथीन से बाँध कर रखने का काम बहुत बुद्धिमानी से किया गया है। स्टील फ्रेम में न होने के बावजूद यह नाचता भी है और थोड़ी  मेहनत करने पर टुकड़ों में निकल भी आता है। मनोरंजक भी है और स्किल टेस्टिंग भी…
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IMG0068A येजो चमक रहे हैं उनमें एक स्टील का जग है, पानी की टोटी है, और स्वयं पानी है जो नीचे जमा है। जो नहीं चमक रही है वह लोहे की जंजीर है जिससे जग बँधा हुआ है। कौन जाने यह कीमती जग किसी को भा जाय और दूसरे यात्रियों को परेशानी उठानी पड़े। इसीलिए बाँध के डाल दिया होगा।
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IMG0066A यदि आप पेपर का प्रयोग नहीं कर पाते और संयोग से टंकी का पानी खत्म होने के बाद आपकी बारी आयी तो क्या करेंगे? चिंता मत करिए…। एक बोतल एक्स्ट्रा पानी भी में डाल दिया गया है उधर कोने में…
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रेल  हमारी सुविधाओं का कितना
ख्याल रखती है

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

हाय, मैं फुटबॉल का दीवाना न हुआ… पर हिंदी का हूँ !!

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इलाहाबाद से वर्धा आकर नये घर में गृहस्थी जमाने के दौरान फुटबॉल विश्वकप के मैच न देख पाने का अफ़सोस तो मुझे था लेकिन जब मैने इसका प्रसारण समय जाना तो मन को थोड़ी राहत मिल गयी। यदि मेरा टीवी चालू रहता और केबल वाला कनेक्शन भी जोड़ चुका होता तबभी देर रात जागकर मैच देखना मेरे वश की बात नहीं होती। इस खेल के लिए मेरे मन में वैसा जुनून कभी नहीं रहा कि अपनी दिनचर्या को बुरी तरह बिगाड़ लूँ। जैसे-जैसे टुर्नामेण्ट आगे बढ़ता गया इसकी चर्चा का दायरा भी फैलता गया। ऑफ़िस से लेकर कैंटीन तक और गेस्ट हाउस से लेकर घर के नुक्कड़ तक जहाँ देखिए वहीं चर्चा फुटबॉल की। मैं इसमें सक्रिय रूप से शामिल नहीं हो पाता क्योंकि मैं कोई मैच देख ही नहीं पा रहा था।कांस्य पदक के साथ जर्मन खिलाड़ी

हमारे कुलपति जी रात में मैच भी देखते और सुबह हम लोगों के साथ साढ़े पाँच बजे टहलने के लिए भी निकल पड़ते। आदरणीय दिनेश जी ने तो रतजगा करने के बाद मैच की रिपोर्ट ठेलना भी शुरू कर दिया। मैने अखबारों से लेकर न्यूज चैनेलों तक जब इस खेल का बुखार चढ़ा हुआ देखा तो मुझे अपने भीतर कुछ कमी नजर आने लगी। कैसा मूढ़ हूँ कि दुनिया के सबसे बड़े उत्सव के प्रति उदासीन हूँ। मैंने तुरन्त टीवी सेट तैयार किया और केबल वाले को आनन-फानन में ढूँढकर कनेक्शन ले लिया। यह सब होने तक क्वार्टर फाइनल मैच पूरे हो चुके थे। नेट पर देखकर पता चला कि सेमी फाइनल मैच सात और आठ जुलाई को खेले जाने हैं। मैंने रतजगे की तैयारी कर ली।

शाम को ऑफिस से आया तो पता चला कि दोपहर की बारिश के बाद टीवी बन्द पड़ा है। ऑन ही नहीं हो रहा है। मैने देखा तो टीवी का पावर इन्डीकेटर जल ही नहीं रहा है। मैने बिजली का तार चेक किया। इसमें एक छोटी सी खरोंच पर सन्देह करते हुए नया तार लगा दिया। फिर भी लाइट नहीं जली। मैने टीवी का पिछला ढक्कन खोलकर चेक किया तो इनपुट प्वाइण्ट पर बिजली थी लेकिन उसके अन्दरूनी हिस्से में कहीं कोई गड़बड़ थी। यह सब करने में पसीना भी बहा। सुबह तो अच्छा भला चलता छोड़कर गया था… फिर यह अचानक खराब कैसे हो गयी?

श्रीमती जी बताया कि दोपहर में बारिश के समय जोर की गर्जना हुई थी। कहीं आसपास ही बिजली गिरी होगी शायद। मुझे सन्देह हुआ कि केबल के रास्ते बिद्युत तड़ित की उर्जा टीवी में जा समायी होगी और किसी पुर्जे का सत्यानाश हो गया होगा। मैंने फौरन इसे गाड़ी में लादा और दुकान पर ले गया। वहाँ बिजली से आहत कुछ और टीवी सेट रखे हुए थे। दुकानदार ने बताया कि नागपुर से मिस्त्री आएगा तब चेक करके बताएगा कि क्या खराबी है? मैने पूछा कि कितना समय और पैसा लगेगा तो उसने मेरा मोबाइल नम्बर मांग लिया। बोला कि मिस्त्री के चेक करने के बाद ही बता पाऊंगा। यदि जला हुआ स्पेयर पार्ट यहाँ मिल गया तब तो तत्काल ठीक करा लूंगा नहीं तो उसे नागपुर से मंगाने में दो-तीन दिन लग जाएंगे।

मुझे न चाहते हुए भी इलाहाबाद छोड़ने का पछतावा होने लगा। श्रीमती जी कि फब्तियाँ सुनना तो तय जान पड़ा- अच्छा भला शहर और काम छोड़कर इस वीराने में यही पाने के लिए आये थे- बच्चों का स्कूल सात किलोमीटर, सब्जी बाजार आठ किलोमीटर, किराना स्टोर पाँच किलोमीटर, दूध की डेयरी छः किलोमीटर… हद है, नजदीक के नाम पर है तो बस ईंट पत्थर और सूखा- ठिगना पहाड़… ले देकर एक पार्क है तो वह भी पहाड़ी पर चढ़ाई करने के बाद मिलता है। वहाँ भी रोज नहीं जा सकते…

मैं अपने को यह सब पुनः सुनने के लिए तैयार करता हुआ घर लौट आया। यह भी पक्का हो गया कि अब दोनो सेमी फाइनल भी नहीं देख पाऊंगा। मन मसोस कर रह गया। आखिरकार अगले दिन मिस्त्री ने खबर दी कि सामान नागपुर से आएगा औए साढ़े नौ सौ रूपए लगेंगे। मरता क्या न करता। मैने फौरन हामी भरी। टीवी बनकर आ गयी। मैने पता किया कि तीसरे-चौथे स्थान का मैच १०-११ की रात में होगा। मैने शनिवार की छुट्टी को दिन में सोकर बिताया ताकि रात में जागकर मैच देख सकूँ। दस बजे रात को परिवार के अन्य सदस्य सोने चले गये और मैं बारह बजने का इन्तजार करता रहा। इस दौरान टीवी पर कुछ फालतू कार्यक्रम भी देखने पड़े। स्टार प्लस पर ‘जरा नच के दिखा’ का ग्रैण्ड फ़िनाले चल रहा था जिसमें नाच से ज्यादा नखरा और उससे भी ज्यादा विज्ञापन देखना पड़ा।

नींद के डर से प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठा रहा लेकिन जब पहलू में कष्ट हुआ तो भारी भरकम सोफ़ा उठाकर टीवी के सामने ले आया। गावतकिया लगाकर आराम से देखने का इन्तजाम हो गया। मैच शुरू हुआ। जर्मनी ने पहला गोल दागा और जब बोर्ड पर यह स्कोर लिख कर आया तब मैंने पक्के तौर पर जाना कि काली जर्सी वाले खिलाड़ी जर्मन टीम के हैं। इसके बाद युरुग्वे ने गोल उतारा फिर बढ़त ले ली। अब मुझे ऑक्टोपस पॉल की जान सांसत में नजर आने लगी। तभी जर्मनी ने बराबरी कर ली। मैच में जोश आया हुआ था लेकिन सोफ़े पर आराम से पसरा हुआ मैं जाने कब सो गया। जब नींद खुली तो खिलाड़ियो को मैदान से बाहर जाते देखा और चट से विज्ञापन शुरू हो गया। अन्तिम परिणाम देखने के लिए न्यूज चैनेल पर जाना पड़ा। वहाँ की हेडलाइन थी- ऑक्टोपस पॉल की भविष्यवाणी एक बार फिर सही साबित हुई। जर्मनी तीसरे स्थान पर। युरुग्वे को ३-२ से हराया।

***

अफ़सोस है कि मैं दूसरों की तरह फुटबॉल का दीवाना नहीं बन पाया। कुछ लोग मुझे जरूर कोसेंगे कि कैसा अहमक है। चलिए कोई बात नहीं…। मेरी दीवानगी कहीं और तो है। आज स्वप्नलोक पर विवेक जी ने एक कविता ठेल दी लेकिन कविता अंग्रेजी में देखकर मुझे ताव आ गया। मैने आनन-फानन में उसका हिन्दी तर्जुमा करके टिप्पणी में पेश कर दिया है। मेरी दीवानगी का आलम यहीं देख लीजिए। स्वप्नलोक तक बाद में जाइएगा 🙂

“Though I have done no mistake,
Excuse me for God’s sake.
I am poor, you are great.
You are master of my fate.

गलती मेरी नहीं है काफी

प्रभुजी दे दो फिर भी माफी

मैं गरीब तू बड़ा महान

भाग्यविधाता लूँ मैं मान

But remember always that,
human, lion, dog or cat,
all creatures are same for God.
No sound is, in his rod.

पर इतना तुम रखना ध्यान

नर नाहर बिल्ली और श्वान

सबको समझे एक समान

मौन प्रहार करे भगवान

He, who will afflict others,
will be facing horrid curse.
Killing weak is not correct.
This is universal fact.”

जिसने परपीड़ा पहुँचाई

वह अभिशप्त रहेगा भाई

निर्बल को मारन है पाप

दुनिया कहती सुन लो आप

Listening this the hunter said,
“Don’t teach me good and bad.”
Gun fire ! but no scream ?
Thank God it was a dream !

सुन उपदेश शिकारी भड़का

ले बन्दूक जोर से कड़का

धाँय-धाँय… पर नहीं तड़पना

शुक्र खुदा का यह था सपना

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

साँईं बाबा का प्रसाद और ज्ञानजी की सेहत…

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श्री साँई बाबाआज वृहस्पतिवार है। शिर्डी वाले साँई बाबा के भक्तों का खास दिन। इस दिन व्रत-उपवास रखकर श्रद्धालु जन साँईं मन्दिरों में दर्शन के लिए उमड़ पड़ते हैं। इलाहाबाद का मुख्य मन्दिर भी इस दिन विशेष आकर्षण का केन्द्र हो जाता है। श्रद्धा और सबूरी के बीज मन्त्रों से प्रेरित भक्तजन बड़ी भीड़ के बावजूद पूरी तरह अनुशासित रहकर लम्बी लाइन में अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हुए साँईं मन्त्रों का जप करते हैं और आगे बढ़ते हैं। शाम के वक्त तो इतनी भीड़ हो जाती है कि व्यवस्थापकों को रस्सियाँ तानकर लाइन बनानी पड़ती है जो मन्दिर के भीतर कई चक्रों में घूमने के बाद भी बाहर सड़क तक आ जाती है।

श्रद्धा-सबूरीजब श्रीमती जी के आग्रह पर पहली बार मैं इस मन्दिर में दर्शन करने गया था तो साँईं बाबा के प्रति श्रद्धा से अधिक एक अच्छे पति होने की सदिच्छा के वशीभूत होकर गया था। यहाँ आकर जब मैंने भक्तों की अपार भीड़ देखी और यह अनुमान किया कि भीतर साँईं बाबा की मूर्ति तक पहुँचने में कम से कम दो घण्टे लगेंगे तो मेरे पसीने छूट गये। भीड़ में तिल रखने की जगह नहीं थी इसलिए करीब ढाई साल के बेटे को भी गोद में लेना अपरिहार्य हो गया था। इस दुस्सह परिस्थिति में भी हम लोगों ने धैर्यपूर्वक दर्शन किये थे। वहाँ साँई बाबा के भजनों और उनकी जय-जयकार के बीच इतना अच्छा भक्तिमय माहौल बना हुआ था कि मन में किसी कठिनाई के भाव ने कब्जा नहीं किया।

साँईं प्रसादालयउस प्रथम दर्शन के समय एक ऐसी बात हो गयी थी जो साँईं बाबा के चमत्कारी प्रभाव की पुष्टि करती सी लगी। मेरे लाख सिर हिलाने के बावजूद श्रीमती जी तो इसे चमत्कार ही मानती हैं। हुआ ये कि जब मैं लाइन में लगा था उसी समय मेरा मोबाइल बज उठा। बड़ी मुश्किल से जब मैंने इसे जेब से निकालकर ‘काल रिसीव’ किया तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। यह एक ऐसे व्यक्ति का फोन था जिसे मैं करीब दो साल से ढूँढ रहा था। वह मेरे तीस हजार रुपये लौटाने में लगातार टाल-मटोल करते हुए अबतक मुझे टहलाता रहा था। उसदिन उसने अचानक फोन पर बताया कि रूपयों की व्यवस्था हो गयी है। किसी को भेंज दीजिए, आकर ले जाय। बस क्या था, मेरी पत्नी ने इसे साँईं बाबा का अनुपम प्रसाद मानते हुए उनमें अपना अडिग विश्वास प्रकट किया और आगे ऐसी कुछ अन्य उपलब्धियों को भी साँई बाबा की कृपा मानने सिलसिला शुरू हो गया। ऐसे प्रत्येक अवसर पर हमने साँईं के दर्शन किए। लेकिन मैने समय की अनुपलब्धता के कारण हमेशा वृहस्पतिवार को दर्शन से परहेज किया। मुझे लगता है कि पूजा-अर्चना में शान्तचित्त होकर बैठना और ध्यान करना अधिक महत्वपूर्ण है, न कि भीड़ में गुत्थमगुत्था होकर प्रसाद चढ़ाना।

साँईं इम्पोरियमआज रचना ने वृहस्पति को ही वहाँ जाने की खास वजह बतायी। उन्होंने लगातार नौ गुरुवार साँईं का व्रत रखा था जिसका आज समापन (उद्यापन) करना था। इसके अन्तर्गत गरीबों और लाचारों को भोजन कराना होता है। हलवा और पूड़ी का मीठा भोजन थैलियों में पैक करके हम मन्दिर गये। लेकिन शाम को नहीं, सुबह साढ़े दस बज गये। इस समय भीड़ बहुत कम थी।  मन्दिर और इसके आस-पास का वातावरण दर्शन, पूजन, और दान-पुण्य करने के लिए आवश्यक सभी अवयवों से युक्त है। मन्दिर प्रांगण में ही पूजन और प्रसाद की सामग्री के लिए साँई प्रसादालय है तो वहीं साँईं इम्पोरियम में बाबा से जुड़ी अनेक पुस्तकें, मूर्तियाँ, तस्वीरें, चुनरी, चादरें, ऑडियो कैसेट्स, सीडी, और अन्य प्रयोग की वस्तुएं उपलब्ध हैं। जूते-चप्पल रखने के लिए एक ओर बने स्टैण्ड में दो तीन कर्मचारी मुस्तैद हैं जो अलग-अलग खानों में इसे सुरक्षित रखकर टोकन दे देते हैं। हाथ धुलने के लिए और पीने के लिए स्वच्छ और शीतल पेयजल की व्यवस्था है।

मन्दिर के बाहर वाहन स्टैण्ड भी है और बड़ी संख्या में भिखारी भी। उनमें से अनेक विकलांग, अपंग और लाचार हैं तो कई बिल्कुल ठीकठाक सुविधाभोगी और अकर्मण्य भी। साधुवेश धारी कुछ व्यक्ति कमण्डल लटकाये या रामनामी बिछाए हुए भी मिले जो कदाचित्‌ गुरुवार को ही यहाँ दान बटोरने आते हैं। अनेक महिलाएं अपने झुण्ड के झुण्ड बच्चों के साथ भीख इकट्ठा करने के लिए जमा थीं। सड़क पर भी फूल-माला और प्रसाद की अनेक दुकानें सजी हुई थीं। हर स्तर के भक्तों के लिए अलग-अलग सामग्री यहाँ मौजूद है।

जब हम गाड़ी से उतरकर भोजन की थैलियाँ बाँटने शारीरिक रूप से अक्षम कुछ गरीबों के पास गये तो वहाँ एक व्यक्ति रसीद-बुक लिए खड़ा था। उसने उसे आगे बढ़ाते हुए कहा कि साहब यह रसीद कटा लीजिए। इसका पैसा विकलांगों की सेवा में खर्च होता है। मैंने पूछा- इसकी क्या गारण्टी? वह बोला- साहब आप विश्वास कीजिए। उसकी वेश-भूषा और शैली देखकर मुझे कत्तई विश्वास नहीं हुआ। हमने साक्षात्‌ दरिद्रनारायण की यथासामर्थ्य सेवा की और वहाँ से दर्शन-पूजन करने के बाद प्रसाद लेकर आदरणीय ज्ञानदत्त जी‌ का कुशल क्षेम जानने रेल-अस्पताल की ओर चल पड़े। (मन्दिर के भीतर फोटो खींचने की मनाही है इसलिए हमारा कैमरा ज्यादा कुछ नहीं कर सका।)

    रेलवे अस्पताल के वी.आई.पी. केबिन में आसन जमाए ज्ञानजी किसी भी तरह से मरीज जैसे नहीं लगे। विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और परिवारीजन के साथ बातचीत में मशगूल थे। वागीशा और सत्यार्थ (मेरे बेटी-बेटे) ने उनका पैर छुआ तो प्रमुदित होकर दोनो हाथों से आशीर्वाद दिया। वहाँ ‘बाबूजी’ सबसे सक्रिय और मुस्तैद दिखे। सुबह से शाम तक लगातार अपने बेटे के आस-पास रहते हुए उन्होंने अपना सुख और आराम मुल्तवी कर रखा है। वैसे तो शुभेच्छुओं और तीमारदारों की कोई कमी नहीं है, लेकिन बाबूजी की उपस्थिति पिता-पुत्र के बीच विलक्षण आत्मीय सम्बन्ध को रेखांकित करती हुई भावुक बना देती है।

     एम.आर. आई. रिपोर्ट आ चुकी है। सबकुछ प्रायः सामान्य है। मस्तिष्क के दाहिने हिस्से में हल्की सी सूजन पायी गयी है जो दवा से ठीक हो जाएगी। तीन-चार दिन अस्पताल में ही रहना होगा। आज दूसरा दिन बीत गया है। अगले पन्द्रह दिनों तक दवा चलेगी। उसके बाद सबकुछ वापस पटरी पर आ जाएगा। ज्ञान जी किसी को मोबाइल पर बता रहे हैं – कुछ लोग इसे ब्लॉगिंग से जोड़ रहे हैं लेकिन ऐसा कुछ नहीं है। ब्लॉगिंग तो मेरे लिए केवल टाइम-फिलर है। यह मेन जॉब तो नहीं ही है।

ए.सी. कमरे में एक्स्ट्रा बेड और सोफे पड़े हुए  हैं, और टीवी भी लगी है। लैप-टॉप भी आ गया है जो अभी खोला नहीं गया है, लेकिन मोबाइल पर लगातार हाथ चल रहा है।

    सबकुछ चंगा है जी…

 एक एसएमएस कर लूँ...     DSC02790

मेरी पिछली पोस्ट पर अबतक की सर्वाधिक प्रतिक्रियाएं दर्ज हुईं। ज्ञान जी के लिए आप सबका प्रेम और आदर देखकर अभिभूत हूँ। दद्दा तूसी ग्रेट हो जी…

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

अब तो बस करिए ज्ञान जी…

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रात को सवा दस बजे सोफ़े पर लेटे हुए जी-टीवी पर १२/२४ करोल बाग के काण्ड देख रहा था। चूँकि लेटकर ब्लॉगरी नहीं कर सकता इसलिए शाम को एक घण्टा इसी प्रकार टीवी देखना अच्छा लगता है। तो ऑफिस और गृहस्थी के कामों की थकान मिटा ही रहा था कि फोन पर सूचना मिली कि ज्ञानजी के लिए एम्बुलेन्स मंगायी गयी है और वे रेलवे अस्पताल की राह पर हैं। उनके बाएं हाथ में लकवा की शिकायत पायी गयी है। मैंने झट से जीन्स डाला और पैर में हवाई चप्पल फटकारते हुए गाड़ी की चाबी लेकर गैरेज की ओर चल दिया। श्रीमती जी पीछे-पीछे कारण जानने को बढ़ लीं। उन्हें संक्षेप में सूचना देकर मैं चल पड़ा। पाँच मिनट में अस्पताल के भीतर…।

बाहर से लेकर भीतर तक शुभचिन्तकों और रेलवे के वरिष्ठ अधिकारियों का जमावड़ा हो चुका था। मेरा मन धक्‌ से हुआ। एक आदमी ने बताया कि पाण्डे जी आई.सी.यू. में भर्ती हैं। मैंने दिल कड़ा करके भीतर प्रवेश किया। आदरणीया रीता जी से आँखें मिली। मुझे अचानक वहाँ देखकर वे चकित हुईं, फिर प्रसन्न सी मुद्रा में अभिवादन किया। मेरा मन तुरन्त हल्का हो गया। मैने चप्पल उतारकर गहन चिकित्सा कक्ष में प्रवेश कर लिया था, जिसके भीतर आठ-दस लोग पहले से ही थे। माहौल में कोई चिन्ताजनक छाया नहीं दिखी तो मैंने ज्ञानजी को मुस्कराकर प्रणाम किया। फिर उनके बायें हाथ में अपना हाथ थमाया। उन्होंने हाथ दबाकर यह जताया कि सबकुछ ठीक से काम कर रहा है।

एक वरिष्ठ अधिकारी ने निर्णय लिया कि सी.टी.स्कैन अभी करा लिया जाय ताकि चिन्ता की कोई बात न रहे। एम्बुलेन्स में बैठकर डायग्नोस्टिक सेन्टर चल पड़े। वहाँ जब मरीज भीतर चला गया तो दरवाजे के बाहर बेन्च पर बैठते ही मैने रीता जी से पूरा वाकया पूछ लिया। ….लोगों की हलचल अबतक प्रायः शान्त हो चुकी थी…। उन्होंने बताया कि साढ़े नौ बजे खाना खाने के बाद लेटते समय इनका बायाँ हाथ तेजी से काँपने लगा था और कुछ देर के लिए अनियन्त्रित सा हो गया था। कुछ मांसपेशियाँ शिथिल पड़ गयीं तो चिन्ता हो गयी कि कहीं पूरा बायाँ हिस्सा लकवाग्रस्त तो नहीं हो रहा है। ईश्वर की कृपा से ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है।

मैने कहा कि अब इन्हें कम्प्यूटर पर समय कम देना चाहिए। ब्लॉगरी के कारण ऐसे बेहाल हो जाएंगे तो दोष ब्लॉगरी को जाएगा। रीता जी ने कहा कि इनकी लम्बे समय तक बैठने की आदत नहीं छूट रही है। मैने पूछा कि ये तो रात में जल्दी सो जाते हैं फिर आज कैसे यह सब हो गया। वे बोलीं- जल्दी भले ही सो जाते हैं लेकिन अचानक तीन बजे नींद खुल जाय तो भी तुरन्त कम्प्यूटर पर पहुँच जाते हैं। ऑफिस से आने के बाद पहले लैप-टॉप ऑन होता है तब बाकी कोई काम। सुबह भी जल्दी उठकर उसी काम में लग लेते हैं। बगल में चिन्ताग्रस्त बैठे ‘बाबूजी’ ने बताया कि डेस्क टॉप के साथ लैपटॉप था ही, अब पामटॉप भी आ गया है, और मोबाइल से भी पोस्टिंग होती रहती है।

दाहिने हाथ में सुई लगी है।

24052010764 

“परमानेण्ट ऑन लाइन विदाउट ब्रेक।”  यह हाल तो हम इनका ऑउटपुट देखकर ही जान जाते हैं। उनके ऑफिस के एक सज्जन ने बताया कि आज ऑफिस में इन्हें ब्लॉगिंग को कम करने की सलाह दी गयी। सलाह देने वाले जबतक कमरे में थे तबतक तो इन्होंने गले में पट्टा डालकर सिर ऊँचा उठाये सबकी बात सुनने का धैर्य दिखाया लेकिन जैसे ही सबलोग चले गये , इन्होंने पट्टा निकाल के धर दिया और कम्प्यूटर पर फिर से झुक गये। फिर वही फीडरीडर खोलकर पढ़ना और टिप्पणी करना। …अब जो यह खुद ही बताते हैं कि ब्लॉग पढ़ने की चीज है तो करके दिखाएंगे ही…। लेकिन मुझे अब यह डर है इनकी हालत से भाई लोग यह न मान बैठें कि ब्लॉग वास्तव में पढ़ने की चीज नहीं है…। बड़े खतरे हैं इस राह में…।

रीता जी कहा कि हम सोच ही नहीं पाते कि यह (ब्लॉगरी) न करें तो करें क्या? यह तमाम दूसरे कामों से बेटर एन्गेजमेन्ट है। मुझे तो अबसे पाँच साल बाद की चिन्ता हो रही है। अभी तो रेलवे वाले इन्हें कुछ काम टिका देते हैं जिसमें अच्छा समय निकल जाता है। लेकिन बाद में क्या करेंगे यह सोचकर चिन्ता होती है…।

इसी चर्चा के बीच श्रीमन्‌ स्कैनिंग रूम से मुस्कराते हुए अपने पैरों पर चलते हुए बाहर आये और एम्बुलेन्स में जाकर बैठ गये।  दाहिने हाथ में लगे इन्जेक्शन के स्थान पर लगे रूई के टुकड़े को सम्हाले हुए ज्ञान जी को अकेला पाकर मैंने पूछ लिया कि इजाजत दें तो आपको कल ब्लॉगजगत के कठघरे में खड़ा किया जाय। उन्होंने मुझे मना नहीं किया तो मैने झटसे उनकी दो तस्वीरें उतार लीं। एक तस्वीर में इन्जेक्शन के दर्द को सम्हालते हुए और दूसरी में यह दिखाते हुए कि उन्हें कुछ खास नहीं हुआ है। सब कुछ ठीक ठाक है। यह सब रात साढ़े ग्यारह बजे की बात है।

रात भर अस्पताल में डॉक्टर की देखभाल में रहना है। मैने पूछा- लैप टॉप घर छोड़ आये क्या? कैसे कटेगी रात? रीता जी ने बताया कि चिन्ता की कोई बात नहीं है। कुछ बुक्स साथ में ले आये हैं।

अब आपलोग उन्हें जो कहना चाहें कहें। मैंने तो कह दिया कि अब तो बस करिए ज्ञानजी..…।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

ऎ बहुरिया साँस लऽ, ढेंका छोड़ि दऽ जाँत लऽ

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आज गिरिजेश भैया ने अपनी पोस्ट से गाँव की याद दिला दी। गाँव को याद तो हम हमेशा करते रहते हैं लेकिन आज वो दिन याद आये जब हम गर्मी की छुट्टियों में वहाँ बचपन बिताया करते थे। अपनी ताजी पोस्ट में उन्होंने पुरानी दुपहरी के कुछ बिम्ब उकेरे हैं। एक बिम्ब देखकर सहसा मेरे सामने वह पूरा दृश्य उपस्थित हो गया जो वैशाख-जेठ की दुपहरी में सास-बहू की तू-तू मैं-मैं से उत्पन्न हो सकता है। ये रहा उनकी कविता में रेखांकित बिम्ब और उसके आगे है उसकी पड़ताल-

हुई रड़हो पुतहो
घर में सास पतोहू लड़ीं।
भरी दुपहरी
मर्दों को अगोर रही
दुआरे खटिया खड़ी

इसके पीछे की कहानी यह रही–

धर दिया सिलबट पर
टिकोरा को छीलकर
सास बोल गई
लहसुन संग पीस दे पतोहू
मरिचा मिलाय दई
खोंट ला पुदीना…

बहू जम्हियाय
उठ के न आय

तो…
वहीं शुरू हुआ
रड़हो-पुतहो

धनकुट्टी की टिक टिक हमने भी सुनी है, धान कुटाने को साइकिल के बीच में बोरा लादकर गये भी हैं। ये बात दीगर है कि बहुत छोटी उम्र के कारण हमें धान कुटाने के लिए शारीरिक श्रम नहीं करना पड़ता। दरवाजे पर का आदमी  साथ होता। हम तो केवल उस मशीनी गतिविधि को देखने जाते थे। इंजन की आवाज इतनी तेज कि सभी एक दूसरे से इशारे में ही बात कर पाते। लेकिन वह एक बहुत बड़ी सुविधा थी जो आम गृहस्थ के घर की औरतों को ढेंका और जाँत से मुक्त होने की राह दिखा रही थी। इन्जन मशीन से चलने वाली चक्की और ‘हालर’ ने गाँव की रंगत बदल दी। अब तो हमारी भाषा से कुछ चुटीले मुहावरे इस मशीनी क्रान्ति की भेंट चढ़ गये लगते हैं। आइए देखें कैसे…!

पहले हर बड़े घर में एक ढेंकाघर होता था। ढेंका से कूटकर धान का चावल बनाया जाता था। असल में यह कूटने की क्रिया ही इस यन्त्र से निकली हुई है। आजकल धान की ‘कुटाई’ तो होती ही नहीं। अब तो धान को ‘रगड़कर’ उसकी भूसी छुड़ाई जाती है। ढेंका के रूप में लकड़ी का एक लम्बा सुडौल बोटा दो खूंटों के बीच क्षैतिज आलम्ब पर टिका होता था जो लीवर के सिद्धान्त पर काम करता था। इसके एक सिरे पर मूसल जड़ा होता था जिसका निचला सिरा धातु से मढ़ा हुआ होता था। इस मूसल के ठीक नीचे जमीन की सतह पर ओखली का मुँह होता। आलम्ब के दूसरी ओर ढेंका का छोटा हिस्सा होता जिसपर पैर रखकर नीचे दबाया जाता था। नीचे दबाने पर इसका अगला हिस्सा ऊपर उठ जाता और छोड़ देने पर मूसल तेजी से ओखली में चोट करता। ओखली में रखे धान पर बार-बार के प्रहार से चावल और भूसी अलग-अलग हो जाते। इसे बाद में निकाल कर सूप से फटक लिया जाता।

मूसल के अग्र भाग को थोड़ा भोथरा रखते हुए इसी ढेंका से चिउड़ा कूटने का काम भी हो जाता था। धान को कुछ घण्टॆ पानी में भिगोकर निकाल लिया जाता है। फिर उसे कड़ाही में भूनकर गर्म स्थिति में ही ओखली में डालकर कूट लिया जाता है। चलते हुए मूसल के साथ ताल-मेल बनाकर ओखली के अनाज को चलाते रहना भी एक कमाल का कौशल मांगता है। मूसल की चोट से नौसिखिए की अंगुलियाँ कट जाने या टूट जाने की दुर्घटना प्रायः होती रहती थी। ओखली से अनाज बाहर निकालते समय ढेंका को ऊपर टिकाए रखने के लिए एक मुग्‌दर जैसी लकड़ी का प्रयोग होता था जिसे उसके नीचे खड़ा कर उसीपर ढेंका टिका दिया जाता था।

गेंहूँ से आटा बनाने के लिए भी हाथ से चलने वाली चक्की अर्थात्‌ ‘जाँता’ का प्रयोग किया जाता था। जाँता की मुठिया पकड़कर महिलाएं भारी भरकम चक्की को घुमातीं और गेंहूँ इत्यादि ऊपर बने छेद से डालते हुए उसका आटा तैयार करती। चक्की से बाहर निकलते आटे को सहेजने के लिए कच्ची मिट्टी का घेरा बना होता था। इसे बनाने के लिए दक्ष औरतों द्वारा तालाब की गीली मिट्टी से इसकी आकृति तैयार कर धूप में सुखा लिया जाता था। जाँता चलाते हुए इस अवसर पर पाराम्परिक लोकगीत भी गाये जाते जिन्हें जँतसार कहते थे। पं. विद्यानिवास मिश्र ने इन गीतों का बहुत अच्छा संकलन अपनी एक पुस्तक में किया है।

ढेंका-जाँत

ये दोनो यन्त्र गृहस्थी के बहुत जरूरी अंग हुआ करते थे। जिन गरीब घरों में ये उपलब्ध नहीं थे उन्हें अपने पड़ोसी से इसकी सेवा निःशुल्क मिल जाती थी। घर की बड़ी बूढ़ी औरतें इन यन्त्रों की देखभाल करती। बहुओं को भी बहुत जल्द इनका प्रयोग करना सीखना पड़ता था। जिन घरों में नौकर-चाकर होते उन घरों में यह काम वे ही करते। यहाँ तक आते-आते मेरी ही तरह आप के दिमाग में भी दो-तीन मुहावरे और लोकोक्तियाँ आ ही गयी होंगी। नयी पीढ़ी के बच्चों को शायद यह किताब से रटना पड़े कि ‘ओखली में सिर दिया तो मूसलॊं से क्या डरना’ का मतलब क्या हुआ। लेकिन जिसने ओखली में धुँआधार मूसल गिरते देखा हो उसे कुछ समझाने की जरूरत नहीं। गेंहूँ के साथ घुन भी कैसे पिस जाते हैं यह समझाने की जरूरत नहीं है।

कबीर दास जी ने यही चक्की देखी थी जब वे इस संसार की नश्वरता पर रो पड़े थे।

चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोय।

दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय॥

आपको अपने आस-पास ऐसे लोग मिल जाएंगे जो कोई भी काम करने में कमजोरी जाहिर कर देते हैं। किसी काम में लगा देने पर बार-बार उसके समाप्त होने की प्रतीक्षा करते हैं और ऐसे उपाय अपनाते हैं कि कम से कम मेहनत में काम पूरा हो जाय। ऐसे लोगों के लिए एक भोजपुरी कहावत है- “अब्बर कुटवैया हाली-हाली फटके” अब इस लोकोक्ति का अर्थ तभी जाना जा सकता है जब ढेंका से धान कूटने की प्रक्रिया पता हो। ढेंका चलाने में काफी मेहनत लगती है। कमजोर आदमी लगातार इसे नहीं चला सकता, इसलिए वह सुस्ताने के लिए धान से भूसी फटक कर अलग करने का काम जल्दी-जल्दी यानि कम अन्तराल पर ही करता रहता है।

आपने सौ प्याज या सौ जूते खाने की बोधकथा सुनी होगी। इसका प्रयोग तब होता है जब दो समान रूप से कठिन विकल्पों में से एक चुनने की बात हो और यह तय करना मुश्किल हो कि कौन वाला विकल्प कम कष्टदायक है। ऐसे में हश्र यह होता है कि अदल-बदलकर दोनो काम करने पड़ते हैं। इसी सन्दर्भ में हमारे ग्रामीण वातावरण में यह कहावत पैदा हुई होगी जब बहू को बहुत देर से ढेंका चलाते हुए देखकर उसकी सास प्यार से कहती है कि ऐ बहू, थोड़ा ब्रेक ले लो। तुम थक गयी होगी इसलिए ढेंका चलाना छोड़ दो और जाँता चलाना शुरू कर दो यानि धान कूटने के बजाय गेंहूँ पीस डालो।

ऎ बहुरिया साँस लऽ, ढेंका छोड़ि दऽ जाँत लऽ

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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