परदुःखकातर… :(

23 टिप्पणियाँ

 

वैशाख की दुपहरी में सूर्य देवता आग बरसा रहे हैं… ऑफ़िस की बिजली बार-बार आ-जा रही है। जनरेटर से कूलर/ए.सी. नहीं चलता…। अपनी बूढ़ी उम्र पाकर खटर-खटर करता पंखा शोर अधिक करता है और हवा कम देता है। मन और शरीर में बेचैनी होती है…। कलेक्ट्रेट परिसर में ही दो ‘मीटिंग्स’ में शामिल होना है। कार्यालय से निकलकर पैदल ही चल पड़ता हूँ। गलियारे में कुछ लोग छाया तलाशते जमा हो गये हैं। बरामदे की सीलिंग में लगे पंखे  से लू जैसी गर्म हवा निकल रही है। लेकिन बाहर की तेज धूप से बचकर यहाँ खड़े लोग अपना पसीना सुखाकर ही सुकून पा रहे हैं। …काले बुरके में ढकी-छुपी एक बूढ़ी औरत फर्श पर ही पसर कर बैठी है। शायद अकेली आयी है। ….बाहर गेट पर लगी चाय की दुकान से पॉलीथिन में चाय लेकर एक महिला चपरासी कलेक्ट्रेट की ओर जा रही है। पसीने से भींगी उसकी पीठ पर पड़ती तीखी धूप से भाप उड़ती जान पड़ रही है…। बाबू लोगों की चाय लाना ही इस विधवा की ड्यूटी है। पति की अकाल मृत्यु के बाद उसे अनुकम्पा की नौकरी मिली है…। उसे देखकर मुझे अपने कमरे का माहौल बेहतर लगने लगता है…।

चुनाव आयोग ने ईवीएम (Electronic Voting Machine) के उचित रखरखाव के लिए कुछ सख़्त आदेश जारी किए हैं। उसी के अनुपालन के लिए डी.एम. साहब ने कमेटी बनाकर बैठक बुलायी है। डबल लॉक स्ट्रोंग रूम सिस्टम (द्वितालक दृढ़कक्ष) में इन मशीनों को रखकर उनकी लॉगबुक बनानी है। एक-एक मशीन का सत्यापन होना है। चार-पाँच बड़े अधिकारी जमा हो गये हैं। आयोग के निर्देश के अनुसार कमेटी के गठन का जो आदेश ए.डी.एम. के हस्ताक्षर से जारी हुआ है वह त्रुटिपूर्ण हो गया है। उस ओर ध्यान दिलाने पर ए.डी.एम. साहब बाबू को बुलाकर जोर से बिगड़ते हैं। “क्या गलत-सलत दस्तख़त करा लेते हो? कुछ भी अक़्ल नहीं है क्या?” …बाबू पलटकर सफाई देता है “साहब आदेश टाइप करके आपके सामने ही तो रखा था। आपने पढ़कर ही साइन किया था…”

“दरअसल कल शाम को बिजली चली गयी थी, उसी समय अन्धेरे में इसने उल्टा-सीधा साइन करा लिया” साहब की कैफ़ियत पर सभी मुस्कराते हैं, भीषण गर्मी और उससे उत्पन्न बिजली संकट की चर्चा होती है, लस्सी मंगायी जाती है, एक बेहतरीन स्वाद का चरपरा नमकीन खाया जाता है और नया आदेश बनाने की सलाह के साथ बैठक समाप्त होती है… सभी सदस्यों को किसी न किसी अगली बैठक में जाने की जल्दी है। मैं भी जिला सैनिक बन्धु की मासिक बैठक में शामिल होने चल देता हूँ।

परिसर में गुजरते हुए उधर देखता हूँ जहाँ एक तरफ़ पेशी पर लाये गये बन्दियों को दिन में ठहराने का लॉक-अप है। जेल की गाड़ी उन्हें यहाँ सुबह ले आती है और सुनवायी के बाद शाम को गिनती करके ले जाती है। गाड़ी से उतरकर लॉक-अप में घुसते, अपनी बारी आने पर लॉक-अप से निकलकर कोर्ट तक जाते फिर लौटते और दुबारा जेल वापसी के लिए गाड़ी में जानवरों की तरह भरे जाते समय उन कैदियों की एक झलक पाने के लिए और उनसे दो शब्द बात कर लेने के लिए सुबह से शाम तक टकटकी लगाये धूप में खड़ी उनकी बूढ़ी माँ, पत्नी, बेटे-बेटियाँ या बुजुर्ग बाप दिनभर अवसर की तलाश करते रहते हैं। बड़ी संख्या में पुलिस वाले उन्हें पास फटकने नहीं देते। हट्ट-हट्ट की दुत्कार के बीच वे जैसे-तैसे अपनी बातों के साथ कुछ खाने पीने के सामान की गठरी अपने स्वजन को थमा ही देते हैं। अधिकांश कैदी गरीब, कमजोर और फटेहाल से हैं। उनके मुलाकाती भी दीन-हीन, लज्जित और म्लानमुख…। यह सब टीवी पर दिखाये जाने वाले हाई-प्रोफाइल कैदियों से बिल्कुल अलग सा है। image

चित्रांकन- सिद्धार्थ ‘सत्यार्थमित्र’

जिस दिन कोई अमीर और मजबूत कैदी आता है उस दिन सुरक्षा और बढ़ा दी जाती है। वे इस ‘कैटिल क्लास’ की गाड़ी में ठूस कर नहीं लाये जाते। …घण्टों से धूप में खड़ी मासूम औरतों और बच्चों को देखकर मुझे गर्मी का एहसास कम होने लगता है। फौजियों की बैठक में समय की पाबन्दी जरूरी है…। मैं तेज कदमों से मीटिंग हॉल में प्रवेश करता हूँ।

एक सेवा निवृत्त कर्नल साहब ने जब से जिला सैनिक कल्याण और पुनर्वास अधिकारी का पद सम्हाला है तबसे यह बैठक माह के प्रत्येक तीसरे शनिवार को नियमित रूप से होने लगी है। जिलाधिकारी द्वारा आहूत इस बैठक में पूरे जिले से सेवानिवृत्त फौजी स्वयं अथवा अपने ब्लॉक प्रतिनिधि के माध्यम से अपनी समस्याओं के निपटारे के लिए यहाँ इकठ्ठा होते हैं। औपचारिक परिचय और उपस्थिति पंजिका पर हस्ताक्षर का काम जल्दी से निपटाकर कार्यवाही शुरू होती है। देश की सेना में जवान, सिपाही, सूबेदार हवलदार आदि पदों पर सेवा कर चुके ये लोग अब ‘सिविलियन’ हो गये हैं और अपनी जिन्दगी को नये सिरे से बसाने की कोशिश में लगे हैं। सरकार ने इन्हें सहारा देने के लिए तमाम इन्तजाम किये हैं, लेकिन इस बैठक को देखने के बाद लगता है कि सेवा निवृत्ति के बाद इन फौजियों के ऊपर मुसीबत का अन्तहीन सिलसिला शुरू हो गया है…।

इनकी जमीन पर अवैध कब्जा, माफ़िया और गुण्डों द्वारा धमकी, शस्त्र लाइसेन्स मिलने या उसके नवीनीकरण में लालफीताशाही, सरकारी दफ़्तरों में धक्के खाने और न पहचाने जाने का संकट इन फौजियों के मुंह से ज्वार की तरह फूट पड़ा। पुलिस और प्रशासन के अधिकारी उन्हें समझाने-बुझाने और जाँच का आश्वासन देकर चुप कराने की कोशिश कर रहे थे।

एक फौजी की बेटी को शरेआम उठा लिया गया था। उसने अपनी बात कहनी शुरू की। वह वास्तव में हकला रहा था कि उसकी पीड़ा उसकी जुबान को लड़खड़ाने पर मजबूर कर रही थी यह मैं अन्त तक नहीं समझ पाया। साहब… मैं सबको जानता हूँ। उन लोगों ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा… पुलिस भी उनको जानती है… दरोगा जी उन लोगों से कहाँ मिलते हैं यह भी जानता हूँ… महीने भर से परेशान हूँ लेकिन मेरी लड़की को मेरे सामने नहीं ला रहे हैं… जब जाता हूँ तो मुझे ही उल्टा समझाने लगते हैं… कहते हैं कि लड़की अठ्ठारह साल की है… अपनी मर्जी से गयी है… मैं कहता हूँ कि एक बार मेरी लड़की को मेरे सामने लाकर दिखा दो तो मैं मान जाऊँगा। लेकिन वे कुछ नहीं कर रहे हैं। डिप्टी एस.पी. साहब मोबाइल पर थानेदार से बात करके दरियाफ़्त करते हैं और बताते हैं कि लड़की ने उस मुस्लिम लड़के के साथ कोर्ट मैरिज कर लिया है… फौजी के चेहरे पर दर्द और घना हो जाता है। साहब, मैं तो बस चाहता हूँ कि एक बार मेरी बच्ची को मेरे सामने ला दो… मैं उसे देख लूंगा तो संतोष कर लूंगा… वह ऐसी नहीं है…. हमारी बच्ची को जबरिया उठाया गया है… मुझे सब मालूम है… वह ऐसा कर ही नहीं सकती… कोई मुझे समझ नहीं रहा है…

पुलिस अधिकारी समझाने की कोशिश करते हैं… देखिए जब आपकी लड़की बालिग हो चुकी है तो वह अपनी मर्जी से जहाँ चाहे वहाँ रह सकती है। हम इसमें कुछ नहीं कर सकते…. नहीं साहब, मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है कि वह ऐसा कैसे कर सकती है… मैं यह नहीं मान सकता… फौजी की आवाज काँप रही है। …असल में आपने अपनी बेटी को तालीम ठीक नहीं दी है। उसने आपको छोड़कर उस लड़के के साथ रहने का निर्णय ले लिया है… इसमें हम क्या कर सकते हैं… ठीक है, तो आपभी मुझे वही समझा रहे हैं जो दरोगा जी समझा रहे थे। हार कर अब मैं अपनी जान दे दूंगा… लेकिन उसके पहले उन दुश्मनों से बदला लेकर रहूंगा… अब मैं खुद ही कुछ करूंगा… मेरी कोई सुनने वाला नहीं है… मेरी बेटी को उन लोगों ने अगवा कर लिया है…। बार-बार यह सब दुहराता है। उसे अपनी सीट पर बैठ जाने का हुक्म होता है। अगला केस बताया जाय…

दूसरा फौजी खड़ा होता है। मेरी बेटी तो सिर्फ़ पन्द्रह साल की है। मैं दो महीने से भटक रहा हूँ। दरोगा जी केवल दौड़ा रहे हैं। मैने नामजद रिपोर्ट लिखवायी है। उन लोगों ने ‘अरेस्ट स्टे’ ले रखा था। मैने हाईकोर्ट से उसे खारिज करवा दिया है… फिर भी पुलिस उन्हें गिरफ़्तार नहीं कर रही है। वे बहुत बड़े माफ़िया हैं। मुझे डर है कि मेरी बेटी को उन लोगों ने कहीं बाहर भेंज दिया है या उसके साथ कोई गलत काम हो रहा है…। वे लोग रोज हाईकोर्ट आ-जा रहे हैं। मैं उन्हें रोज देखता हूँ लेकिन पुलिस को दिखायी नहीं पड़ते। दरोगा जी कह रहे थे कि आई.जी. साहब ने गिरफ़्तार करने से मना किया है…। डिप्टी एस.पी. तुरन्त प्रतिवाद करते हैं। यह सब गलत बात है। आप कप्तान साहब (डी.आई.जी.) से मिलकर अपनी बात कहिए। गिरफ़्तारी तो अब हो जानी चाहिए। लेकिन उनकी बात में विश्वास कम और सान्त्वना अधिक देखकर फौजी विफ़र पड़ते हैं। साहब, थानेदार को तलब कर लिया जाय… मोबाइल पर बात होती है। थानेदार किसी कोर्ट में चल रही बहस में व्यस्त हैं। अभी नहीं आ सकते…। उनसे बात करके बाद में आपको सूचना दे दी जाएगी…। आश्वासन मिलता है।

आगे समोसा, मिठाई, नमकीन की प्लेटें लगायी जा चुकी हैं। फ्रिज का ठण्डा पानी गिलासों में भरकर रखा जा चुका है, जिनकी बाहरी सतह पर छोटी-छोटी बूँदें उभर आयी हैं। सबके सामने कपों में चाय रखी जा रही है। …किसी और की कोई समस्या हो तो बताये। कोषागार से या वित्त सम्बन्धी कोई परेशानी हो तो इन्हें नोट करा दें। यह बात नाश्ता प्रारम्भ होने की भुनभुनाहट में दब जाती है। कोई शिकायत नहीं आती है। कर्नल साहब सबको धन्यवाद देते हैं। बैठक ‘सकुशल’ समाप्त होती है…

मेरा मन ए.सी. की ठण्डी हवा में भी उद्विग्न होकर गर्मी महसूस करने लगता है। सीने पर कुछ बोझ सा महसूस होता है। एक लोक कल्याणकारी राज्य का यह सारा शासन प्रशासन किसकी सेवा में लगा हुआ है…?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

Advertisements

वर्धा में अम्बेडकर को याद करने का तरीका अनूठा था…

10 टिप्पणियाँ

 

मेरी वर्धा यात्रा की प्रथम, द्वितीय, और तृतीय रिपोर्ट आप यहाँ पढ़ चुके हैं। अब आगे…

विश्वविद्यालय गेस्ट हाउस से जब हम सेवाग्राम आश्रम के लिए निकले तो धूप चढ़ चुकी थी। यद्यपि यह आश्रम घूमने का सबसे अच्छा समय नहीं था, लेकिन हमारे पास कोई दूसरा विकल्प उपलब्ध भी नहीं था। हम वर्धा शहर के बीच से होकर ही गुजरे लेकिन रास्ते में कोई भीड़ भरी ट्रैफ़िक नहीं मिली। निश्चित ही गर्मी का असर सड़कों पर उतर आया था। हमें किसी मोड़, तिराहे या चौराहे पर रुककर सेवाग्राम का रास्ता पूछने के लिए गाड़ी से उतरकर किसी दुकानदार तक जाना पड़ता क्यों कि सड़क पर राहगीर नहीं मिल रहे थे। लेकिन हमें दो स्थानों पर इस कड़ी धूप को धता बताते लोग मिले जो पूरी सज-धज के साथ समूह में इकठ्ठा होकर किसी जश्न की तैयारी में जाते दिखायी दिए।

अम्बेडकर जयन्ती की धूम मैने नजदीक पहुँचकर देखा तो पता चला कि ये लोग बाबा साहब के जन्मदिन की शोभायात्रा निकाल रहे हैं। नीले अबीर का तिलक लगाकर एक दूसरे का अभिवादन करते लोगों में बड़े-बुजुर्ग, मर्द-औरतें, लड़के व लड़कियाँ, सभी मौजूद थे। एक अदम्य उत्साह और उमंग से लबरेज़ ये श्रद्धालु अपने नेता के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए जिस स्वतः स्फूर्त भाव से इस आयोजन में शामिल हो रहे थे उसे देखकर सहज ही अनुमान किया जा सकता था कि डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने किस प्रकार एक बहुत बड़े समाज को अपनी अस्मिता पर गौरव महसूस करने और सिर ऊँचा उठाकर जीने की प्रेरणा दे दी है।

एक पेट्रोल पंप के अहाते में जमा हो रहे समूह को पीछे छोड़कर जब हम सेवाग्राम में बापू के आश्रम के मुख्यद्वार पर पहुँचे तो वहाँ भी एक ऐसा ही जुलूस जश्न के उल्लास में डूबा हुआ मिला। एक खुली हुई गाड़ी पर बाबा साहब अम्बेडकर के आदमकद चित्र को सजाकर झाँकी तैयार की गयी थी जिसके सामने बड़ी संख्या में लड़के और वयस्क पुरुष नाच रहे थे। ढोल-नगाड़े और बैण्ड-बाजे की तेज ध्वनि पर उनके पाँव खुशी-खुशी तारकोल की गर्म सड़क पर भी सहजता से थिरक रहे थे। मैने गेट के किनारे गाड़ी खड़ी की और अपना कैमरा निकाल कर इस शोभा यात्रा की कुछ तस्वीरें लेनी चाही। लेकिन पहले स्नैप के बाद ही कैमरा स्वचालित तरीके से बन्द हो गया। स्क्रीन पर यह संदेश आया कि सीमा से अधिक गर्म हो जाने के कारण कैमरा बन्द हो रहा है। ए.सी. कार के डैश बोर्ड पर शीशे से छन कर आ रही धूप इस सोनी डिजिटल कैमरे की नाजुक कार्यप्रणाली को बन्द करने में सक्षम थी लेकिन अपने नेता के जन्मदिन को यादगार बनाने में जुटे उन लोगों के ऊपर कड़ी धूप का जरा भी असर नहीं दिखा। माथे पर नीली पट्टी बाँधे हुए दर्जनों नौजवान लड़के मोटरसाइकिलों पर फर्राटा भरते किसी बाराती का सा उत्साह लिए समूह में आ जा रहे थे।

जब वह शोभा यात्रा थोड़ी दूर चली गयी तो हम एक और महापुरुष की कर्मस्थली के प्रांगण में चले गये। यह था बापू का सेवाग्राम आश्रम। 

सन्‌ १९३४ मेंबापू यहाँ बैठकर काम करते गांधीजी को उनके प्रिय मित्र और प्रसिद्ध उद्योगपति जमनाबापू का दफ़्तरलाल बजाज ने वर्धा में निवास हेतु आमन्त्रित किया था। वर्धा के करीब शेगाँव (Shegaon) नामक ग्रामीण क्षेत्र में जंगली वनस्पतियों से हरे-भरे इलाके में बापू के रहने के लिए स्थानीय सामग्री के उपयोग से खपरैल की छत वाला जो मकान बना उसे अभी भी ज्यों का त्यों सजोकर रखा गया है।  सबसे पहले हम उसी ‘आदि निवास’ के बरामदे में पहुँचे।  हमने वहाँ उल्लिखित निर्देश के सम्मान में अपने पैर के जूते निकाल दिए। पूरे प्रांगण में पत्थर की छोटी गिट्टियों की परत बिछायी गयी थी जो धूप से गर्म तो हो ही चुकी थी, उनपर नंगे पाँव चलने से इनकी तीखी नोक से चुभन भी खूब हो रही थी। वहाँ कार्यरत एक बुजुर्ग महिला ने बताया कि इस स्थान पर साँप और बिच्छू बहुत निकलते हैं। इन गिट्टियों के बीच उनका चलना कठिन होता है इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से यह गिट्टी डाली गयी है। एक्यूप्रेशर चिकित्सा में विश्वास करने वाले इन गिट्टियों पर नंगे पाँव चलना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद मानते हैं। एक कक्ष में साँप पकड़ने का पिजरा भी रखा हुआ था जिसमें साँपों को पकड़कर दूर जंगल में छोड़ दिया जाता था।

बताते हैं कि बापू के कार्यकाल में निर्मित भवनों जैसे- आदि निवास, बा-कुटी, बापू- कुटी, आखिरी निवास, परचुरे कुटी, महादेव कुटी, किशोर निवास, रुस्तम भवन इत्यादि में से किशोर निवास को छोड़कर किसी भी भवन में पक्की ईंटों व सीमेण्ट का प्रयोग नहीं किया गया था। इस प्रांगण में गांधी जी द्वारा व्यक्तिगत रूप से उपयोग की गयी वस्तुओं को करीने से सजाकर आगन्तुकों के दर्शनार्थ रखा गया है। आश्रम में आकर मेरा कैमरा अबतक ठण्डा हो चुका था इसलिए हमने कुछ यादगार तस्वीरें उतार लीं।

 दवात बापू द्वारा उपयोग की गयी संग्रहित वस्तुएं तीन बन्दर और लकड़ी का करण्डक
बापू का टेलीफोन गांधी जी का सामान

  बापू का चश्मा 

 

बापू कुटी का परिचय देता यह बोर्ड हमारा ध्यान बरबस खींचता है। इसमें सात सामाजिक पातक (social sins) उल्लिखित हैं जो यंग इण्डिया से उद्धरित हैं। समाज को पतन की ओर ले जाने वाले जिन तत्वों की पहचान गांधी जी ने तब की थी वे आज हमारे सामने प्रत्यक्ष उपस्थित हैं और उनका वैसा ही प्रभाव होता भी दिखायी दे रहा है। बापू कुटी का परिचय और सात सामाजिक पातक सिद्धान्तहीन राजनीति, विवेकभ्रष्ट भोग-विलास, बिना श्रम के अर्जित सम्पत्ति, मानवीय मूल्यों से विहीन वैज्ञानिक विकास, अनैतिक बाणिज्य-व्यापार, त्याग और बलिदान से रहित पूजा-पाठ, और चरित्र निर्माण से रहित शिक्षा  जैसे घटक हमारे समाज को आज भी अन्धेरे की ओर ले जा रहे हैं। यदि हमारे देश के नीति नियन्ता राष्ट्रीय स्तर पर इन्हीं विन्दुओं को दृष्टिगत रखकर नीति निर्माण करें और उनके अनुपालन की कार्ययोजना तैयार करें तो बहुत कुछ सुधारा जा सकता है।

प्रांगण में अनेक छायादार और फलदार वृक्ष दिखे जिनका रोपण देश की महान विभूतियों ने किया था और उनकी नाम पट्टिकाएं वृक्षों पर लगी हुई थीं। भारतीय स्वतंत्रता संगाम के अन्तिम दशक में देश का ऐसा कोई भी महत्वपूर्ण व्यक्ति नहीं रहा होगा जो वर्धा के सेवाग्राम आश्रम तक न आया हो। गांधी जी ने अपने जीवन के अन्तिम भाग में अधिकांश समय यहीं बिताया। विभाजन के बाद उपजे साम्प्रदायिक दंगो से लड़ने के लिए बंगाल के नोआखाली के लिए प्रस्थान करने के बाद गांधी जी यहाँ नहीं लौट सके।

इस प्रांगण से बाहर आकर हमने खादी की दुकान से कुछ खरीदारी की। भूख और प्यास ने जब हमें नोटिस थमायी तो हमें बगल के प्राकृतिक आहार केन्द्र की ओर जाना पड़ा। इस रेस्तराँ को देखकर हम झूम उठे। डाइनिंग टेबल के स्थान पर यहाँ चौकोर चौकियाँ रखी हुई थीं जिनके बीच में तिपाये पर ठण्डे पानी से भरे मिट्टी के घड़े रखे हुए थे।प्राकृतिक आहार केन्द्र, सेवाग्राम हमने वहाँ किसी फूल के अर्क से तैयार किया हुआ ठंडा स्वादिष्ट शरबत लिया, कुछ तस्वीरें ली और अपनी गाड़ी की ओर बढ़ चले। गेस्ट हाउस की कैण्टीन में बना भोजन हमारा इन्तजार कर रहा था।

शाम को गेस्ट हाउस के चबूतरे पर आयोजित एक अद्भुत कार्यक्रम में शामिल होने का अवसर मिला। अम्बेडकर जयन्ती के अवसर पर विश्वविद्यालय के संस्कृति विभाग ने इस विशेष कार्यक्रम का  आयोजन किया था। विभाग के विशेष कार्याधिकारी (OSD) राकेश जी ने कार्यक्रम के प्रथम चरण में डॉ. अम्बेडकर की राजनैतिक आर्थिक दृष्टि और आज का समय विषय पर बोलने के लिए नागपुर से आमन्त्रित प्रोफ़ेसर श्रीनिवास खान्देवाले का परिचय दिया। अर्थशास्त्र के प्रतिष्ठित विद्वान प्रोफ़ेसर खान्देवाले ने करीब एक घण्टे के अपने भाषण में डॉ. भीमराव अम्बेडकर के जिस व्यक्तित्व से परिचित कराया उसे इतनी गहराई से हम पहले नहीं जान पाये थे। भारतीय संविधान के निर्माता और दलित समुदाय के मसीहा के रूप में अम्बेडकर की जो छवि हमारे मन में थी उसके दो रूप थे। एक रूप वह था जिसमें वे राजनैतिक रूप से जागरूक हो रहे एक खास सामाजिक जाति वर्ग के प्रेरणापुंज और उपास्य देवता थे जिनकी अन्धभक्ति में डूबे हुए लोग अपने समर्थक समूह से इतर प्रत्येक व्यक्ति को मनुवादी कहकर गाली देने का काम करते रहे हैं।

उनकी छवि का दूसरा रूप वह था जो अरुण शौरी जैसे लेखकों द्वारा ‘फर्जी भगवान’ के रूप में गढ़ा गया था- जिसके प्रति विद्वेष से भरे हुए लोगों द्वारा चौराहे पर लगी उनकी मूर्तियों को तोड़ने, अपमानित करने और एक जाति विशेष के लोगों के लिए अपशब्द प्रयोग करने और उत्पीड़ित करने का जघन्य कार्य किया जाता रहा है।  कदाचित्‌ डॉ. अम्बेडकर को एक खास राजनैतिक उद्देश्य से इस्तेमाल करने की होड़ में लगी पार्टियों ने इस प्रकार की परस्पर विरोधी छवियों का निर्माण कर रखा है। प्रो. खान्देवाले ने अपने वक्तव्य में अम्बेडकर की एक मध्यमार्गी छवि पेश की। उनका कहना था कि अम्बेडकर की दृष्टि सच्चे समाजवाद से ओतप्रोत थी। वे शान्तिपूर्ण ढंग से सामाजिक परिवर्तन लाने के हिमायती थे। उनकी राजनैतिक दृष्टि तो उनके द्वारा तैयार किये गये हमारे संविधान में परिलक्षित होती ही है, साथ में उनकी आर्थिक दृष्टि को भी संविधान के सूक्ष्म अध्ययन से समझा जा सकता है।रजिस्ट्रार, प्रतिकुलपति और कुलपति के साथ प्रो. श्रीनिवास खान्देवाले (सबसे दाएं)

समाज में फैली घोर आर्थिक विषमता को दूर करने के लिए सम्पत्ति का प्रवाह ऊपर से नीचे की ओर होना आवश्यक है लेकिन हो रहा है इसका उल्टा। गरीब मजदूर और किसान अपनी विकट परिस्थिति से हारकर आत्महत्या कर रहे हैं और पूँजीपति वर्ग लगातार अपनी सम्पत्ति बढ़ाता जा रहा है। आई.पी.एल. के अर्थशास्त्र का उदाहरण देकर उन्होंने बताया कि जबतक समाज के पिछ्ड़े तबके को आर्थिक उन्नति के उचित और न्यायपूर्ण अवसर नहीं प्राप्त होंगे तबतक सामाजिक समरसता नहीं पायी जा सकेगी। यही उचित अवसर दिलाने की लड़ाई शान्तिपूर्ण तरीके से लड़ने की राह डॉ.अम्बेडकर ने दिखायी। पारस्परिक विद्वेष को भुलाकर इस लड़ाई में समाज के सभी तबकों से बराबर का सहयोग करने का आह्वान भी प्रो. खान्देवाले ने वहाँ उपस्थित छात्रों, अध्यापकों और वि.वि. के पदाधिकारियों से किया।

कार्यक्रम के अगले चरण में लखनऊ से आयी संगीत मण्डली रवि नागर एण्ड ग्रुप ने कुछ बेहतरीन कविताओं का मोहक संगीतमय पाठ किया। इसमें सबसे पहले डॉ.दिनेश कुमार शुक्ल के कुछ दोहे गाकर सुनाये गये-

भाषा के सोपान से, शब्द लुढकते देख।

पढ़ा लिखा सब पोंछकर, लिखो नया आलेख॥

जीवन को अर्था रहा, गूंगा बहरा मौन।

किसने देखा राम को, रमता जोगी कौन॥

सीली-सीली है हवा, ठण्डी-ठण्डी छाँव।

सन्निपात का ज्वर बढ़ा, झुलस रहा है गाँव॥

यहाँ न सूर्योदय हुआ, यहाँ न फैली धूप।

कालरात्रि फैली रही, जैसे अन्धा कूप॥

काले भूरे खुरदुरे, ले अकाल के रंग।

गगन पटल पर लिख रहा, औघड़ एक अभंग॥

जंगलों में रहने वाले आदिवासी समुदाय के जीवन पर आधारित निर्मला पुतुल की कविता ‘तुम्हारे हाथों बने पत्तल पर भरते हैं पेट हजारो, पर हजारों पत्तल भर नहीं पाते पेट तुम्हारा’  के भावुक प्रस्तुतिकरण ने वातावरण बहुत मार्मिक बना दिया। इसके बाद अदम गोंडवी की प्रसिद्ध रचना चमारों की गली का गायन हुआ। आइए महसूस करिए जिन्दगी के ताप को। मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको॥

इस एक घंटे की संगीतमय प्रस्तुति ने दलित शोषित समाज की जिस कष्टप्रद और शोचनीय परिस्थिति की जिन्दा तस्वीर पेश की उसको और गहनता से महसूस कराया कार्यक्रम के अगले चरण में प्रस्तुत नुक्कड़ नाटक ‘सात हजार छः सौ छियासी’ ने।

clip_image001 clip_image002
clip_image003 clip_image004

प्रोबीर गुहा निर्देशित नुक्कड़ नाटक७६८६

विश्वविद्यालय के फिल्म व थिएटर विभाग के विद्यार्थी कलाकारों द्वारा इसे कोलकाता के नाट्य समूह ‘अल्टरनेटिव लिविंग थिएटर’ के प्रोबीर गुहा के नाट्य निर्देशन में प्रस्तुत किया गया। श्री गुहा वि.वि. के गेस्ट फैकल्टी हैं जो कुछ दिनों के लिए यहाँ आये हुए थे। महाराष्ट्र में कपास किसानों द्वारा बड़ी संख्या में की जा रही आत्महत्या के पीछे जो सामाजिक-आर्थिक कारण हैं उन्हें समझाने का यह बहुत ही प्रभावशाली प्रयास था।  भयंकर गरीबी के बीच नैसर्गिक जिजीविषा से प्रेरित किसान अपनी जमीन पर कपास उगाने में खाद, बीज और कीटनाशक के लिए आने वाली तमाम कठिनाइयों से लड़ता हुआ, पूँजीपतियों, ऋणदाता बैंको, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों, भ्रष्ट नौकरशाहों, विपरीत मौसम और पर्यावरण की तमाम समस्यायों से जूझता हुआ जब अपना तैयार माल बाजार में बेंचने ले जाता है तो वहाँ लालची दलालों के हाथों पड़कर अपना सर्वस्व लुटा देता है। ऐसे में जब यह रिपोर्ट आती है कि विदर्भ क्षेत्र में ७६८६ किसानों ने आत्महत्या कर ली तो मात्र कुछ दिनों के लिए हाहाकार मचता है। उसके बाद स्थिति जस की तस हो जाती है।

चौदह अप्रैल की वह शाम मेरे लिए अभूतपूर्व अनुभवों वाली साबित हुई। एक के बाद एक उम्दा कार्यक्रमों को देखने-सुनने का मौका पाकर मुझे वहाँ कुछ और दिन रुकने का मन हो चला लेकिन ये मुई सरकारी नौकरी इतने भर की छुट्टी भी बड़ी मुश्किल से देती है। हम अगले दिन विश्वविद्यालय के नवनिर्मित प्रशासनिक भवन, पुस्तकालय व विभिन्न विद्यापीठ देखने टीले के ऊपर गये। DSC02667 वित्त अधिकारी मो.शीस खान से मिलने के बाद हम अन्त में कुलपति जी के कार्यालय में गये। आधुनिक सुविधाओं और संचार साधनों  से लैस कार्यालय में कुर्ता पाजाम पहनकर श्री विभूति नारायण राय एक साथ दक्षता, सादगी और कर्मठता का परिचय दे रहे थे। इस शुष्क टीले को हरा-भरा करके उसपर स्थापित अनेक उत्कृष्ट विद्यापीठों में पठन-पाठन व शोध सम्बन्धी गतिविधियों को गति प्रदान करने का जो कार्य आपने शुरू किया है वह किसी भगीरथ प्रयत्न से कम नहीं है।

हमने उनकी मेज पर रखे कम्प्यूटर से अपने रेल टिकट का पी.एन.आर. स्टेटस जाँचा और टिकट कन्फ़र्म होने की खुशी का भाव लिए  उनसे विदा लेकर विनोद जी के साथ सेवाग्राम स्टेशन के लिए चल पड़े।

(समाप्त)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

 

Technorati Tags: ,

वर्धा में हमने जो देखा वह अद्‌भुत है…

19 टिप्पणियाँ

 

सेवाग्राम स्टेशन का निकास द्वाररेलगाड़ी के ठण्डे कूपे से निकलकर बैशाख की चिलचिलाती धूप में जब हम सेवाग्राम स्टेशन पर उतरे तो पल भर में माथे पर पसीना आ गया। पत्थरों और कंक्रीट की इमारतों के बीच हरियाली बहुत विरल थी। तराई क्षेत्र का रहने वाला हूँ इसलिए यह इलाका कुछ ज्यादा ही उजाड़ और वीरान लग रहा था। गर्मी के कारण लोग खुले स्थानों पर प्रायः नहीं थे। स्टेशन से बाहर आकर हमें प्रतीक्षा करती गाड़ी मिल गयी जो काफी देर से धूप में खड़ी रहने के कारण भट्ठी जैसी गरम हो चुकी थी। स्टार्ट होने के बाद इसका ए.सी. चालू हुआ तो एक-दो मिनट में राहत मिल गयी।

सेवाग्राम से वर्धा विश्वविद्यालय की दूरी करीब छः किलोमीटर है। रास्ते में इक्का-दुक्का लोग ही दिखे। हमारे इलाहाबाद की तरह सड़क किनारे लगे लाई-चना-चुरमुरा के खोमचे, खीरा-ककड़ी बेचती औरतें, कच्चे आम का पना बेंचते ठेलेवाले या तरबूज-खरबूज के ढेर लगाकर बैठे कुजड़े वहाँ नहीं दिखे। वर्धा शहर को बायपास करती सड़क से होकर जब हम प्रायः निर्जन इलाके की ओर बढ़ चले तो मेरे मन में उत्सुकता का स्थान व्याकुलता ने ले लिया। गर्म हवा की लपटें सड़क पर दूर चमकते तारकोल से यूँ उठती दिख रही थीं जैसे नीचे किसी हवन कुण्ड में आग जल रही हो। आखिरी मोड़ पर जब गाड़ी मुड़ी तो एक ऊँचे से टीले की ढलान पर सफेद पेण्ट से “महात्मा गांधी अन्तर राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय-वर्धा” बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा हुआ दिखायी पड़ा। अपनी मंजिल के प्रथम साक्षात्कार का यह दृश्य अद्‍भुत लगा।

लेकिन यह शुष्क टीला अपनी तरह का अकेला नहीं था। आस-पास चार-पाँच टीले ऐसे ही दिखायी पड़े जो कदाचित्‌ प्रकृति के कृपापात्र नहीं हो पाये थे। प्रायः वनस्पति विहीन और पथरीले भूभाग पर उठे हुए ये नंगे-ठिगने पहाड़ प्रकृति पर मानव की सत्ता स्थापित होने की कहानी कह रहे थे। इनके शीर्षतल पर जाने के लिए चट्टानों को काटकर बनायी गयी सर्पिल सड़क के किनारे करीने से सजाये गये गमले, शिक्षा संकाय के लिए हाल ही में बने भव्य विद्यापीठ, पुस्तकालय व अन्य मानवनिर्मित भवनों को अन्तिम रूप देती मशीनें और मजदूर, बिजली के खम्भे और उनपर दौड़ती केबिल में प्रवाहित होती विद्युत धारा, निर्माणाधीन पानी की टंकी, पंक्तिबद्ध रोपे गये नये पौधे और उन्हें पानी देने के लिए मीलों दूर से लायी हुई पाइपलाइन  यह बता रही थी कि इस निर्जन पहाड़ पर मानव ने मेधा को तराशने का कारखाना बनाने का मन बना लिया है।

http://maps.google.co.in/maps?hl=en&ie=UTF8&ll=20.764782,78.587383&spn=0.006661,0.011362&t=h&z=17&output=embed
View Larger Map गूगल अर्थ की उपग्रह तस्वीर में पंचटीला(वर्धा) की पाँच साल पुरानी स्थिति जो अब बहुत बदल गयी है

भव्य तोरणद्वार से प्रवेश कर हमारी गाड़ी फादर कामिल बुल्के अन्तरराष्ट्रीय छात्रावास की सीढ़ियों के पास जाकर रुकी तो बाहर निकलने पर गर्म पत्थर से आँच निकलती सी महसूस हुई। सीढ़ियाँ चढ़कर हम ऊँचे चबूतरे पर पहुँचे। आधुनिक वास्तुकला का सुन्दर नमूना पेश करता हुआ यह भवन भी हाल ही में तैयार हुआ जान पड़ा क्योंकि गूगल अर्थ पर मैने इस प्रांगण को देखने की जो कोशिश की थी उसमें इसका कोई अता-पता नहीं था। इस छात्रावास को फिलहाल गेस्ट हाउस के रूप में भी प्रयोग किया जा रहा है।

दोपहर के दो बजे होंगे जब हम अपने लिए निर्धारित कमरे में पहुँचे। कूलर की ठण्डी हवा मिलते ही हम बिस्तर पर पसर तो गये, लेकिन लम्बी यात्रा के बाद स्नान किए बिना पड़े रहना रास नहीं आया। वहाँ का बाथरूम तो सुसज्जित था लेकिन छत पर रखी टंकी का पानी अपने क्वथनांक के करीब पहुँच चुका था। हमारे पास ‘स्टीम बाथ’ के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प भी नहीं था इसलिए हमने कम से कम पानी खर्च करने का पाठ तत्काल सीखते हुए उसपर अमल भी कर लिया और सज सवँरकर तैयार हो लिए। हमें बताया गया कि मनीषा जी एक-दो घण्टे के भीतर ही वापस आगरा के लिए निकलने वाली हैं। उनसे मिलना तो हमारे प्रमुख उद्देश्यों में से एक था।

हमने उनका फोन मिलाया तो पता चला कि इस इलाके में बी.एस.एन.एल. की सेवाएं बहुत अच्छी नहीं हैं। दूसरे सिरे पर स्थित व्यक्ति के अतिरिक्त दूसरी तमाम आवाजें आ रही थीं लेकिन मनीषा जी अन्त तक यह नहीं बता सकीं कि वे दस-पन्द्रह मिनट में गेस्ट हाउस पहुँचने वाली हैं। खैर, उनकी एक सहयोगी ने बताया कि वो बस आने ही वाली हैं। वन्दना मिश्रा, मनीषा कुलश्रेष्ठ और...मैं

मनीषा जी, यानि मनीषा कुलश्रेष्ठहिन्दीनेस्ट.कॉम की मालकिन और प्रतिष्ठित लेखिका, कवयित्री और सम्पादक। उनकी सहयोगी यानि वन्दना मिश्रा। लखनऊ में रहकर आपने तमाम पुस्तकों का प्रकाशन किया है। प्रसिद्ध लेखक और पत्रकार स्व. अखिलेश मिश्र जी की पुत्री वन्दना जी उस कोर ग्रुप की सदस्य हैं जो विश्वविद्यालय की साहित्यिक वेबसाइट हिन्दीसमय.कॉम की सामग्री के चयन और प्रकाशन के लिए उत्तरदायी है। इस कोर ग्रुप के तीसरे सदस्य अनहद नाद वाले अपने प्रिय ब्लॉगर आदरणीय प्रियंकर जी हैं जो उस समय कोलकाता से इस समिति की बैठक के लिए आये हुए थे। हिन्दी साहित्य के दस लाख पृष्ठ अन्तर्जाल में एक ही पते पर अपलोड करने की महत्वाकांक्षी योजना को कार्यरूप देने के लिए विश्वविद्यालय द्वारा इन विभूतियों को एक साथ सिर जोड़कर कार्य करने हेतु आमन्त्रित किया गया है। इतने कम समय में यह जालस्थल कितनी दूरी तय कर चुका है उसे आप वहाँ जाकर देख सकते हैं।

मनीषा जी अपनी सद्यःप्रकाशित पुस्तक शिग़ाफ लेकर आयी थीं। मैने उन्हें सत्यार्थमित्र की एक प्रति भेंट की। वन्दना जी का एक कविता संग्रह अनामिका प्रकाशन से छपकर शीघ्र ही आने वाला है। मेरे साथ अनामिका प्रकाशन के मालिक विनोद शुक्ला जी ही थे। उन्होंने वन्दना जी और मनीषा जी के साथ फटाफट मेरा फोटो सेशन करा दिया। पुस्तक प्रकाशन के बाजार से लेकर विश्वविद्यालय की अन्तर्जाल सम्बन्धी प्रकाशन योजना पर विस्तृत चर्चा हुई। कुछ देर में ट्रेन का समय नजदीक आया और हम मनीषा जी को विदा करके गेस्ट हाउस की कैण्टीन की ओर चाय लेने चल दिए।

शुद्ध दूध की गाढ़ी चाय बड़े से कप में लबालब भरी हुई आ गयी। वहाँ पहले से ही एक प्रोफ़ेसर साहब बैठकर चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे। मुझे उनका चेहरा परिचित सा जान पड़ा। मैने दरियाफ़्त की तो पता चला कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय से सेवा निवृत्त अंग्रेजी के प्रो.सचिन तिवारी जी हैं। हम करीब पन्द्रह साल पहले मिले थे जब वे कैम्पस थियेटर चलाते थे और मैं पत्रकारिता का विद्यार्थी हुआ करता था। कैण्टीन में राजकिशोर जी मिलेइसी बीच एक छोटेकद के श्यामवर्ण वाले भयंकर बुद्धिजीवी टाइप दिखने वाले महाशय का पदार्पण हुआ। उन्होंने बैठने से पहले ही कैन्टीन के वेटर से कहा कि मुझे बिना चीनी की चाय देना और दूनी मात्रा में देना। यानि कप के बजाय बड़ी गिलास में भरकर। मुझे मन ही मन उनकी काया के रंग का रहस्य सूझ पड़ा और सहज ही उभर आयी मेरे चेहरे की मुस्कान पर उनकी नजर भी पड़ गयी। मैने झेंप मिटाते हुए उनका परिचय पूछ लिया।

वे तपाक से बोले- “मुझे राजकिशोर कहते हैं… दिल्ली से आया हूँ। आप कहाँ से…?”

मेरे यह बताने पर कि मैं इलाहाबाद से आया हूँ और वहाँ कोषाधिकारी हूँ, उन्होंने सीधा सवाल दाग दिया- “अच्छा, ये बताइए कि ट्रेजरी में भ्रष्टाचार की स्थिति अब कैसी है?”

यदि मैं शुद्ध सरकारी अधिकारी होता तो शायद इसका जवाब देना थोड़ा कठिन होता लेकिन समाज के दूसरे पढ़े-लिखे वर्ग से भी सम्पर्क में होने के कारण मैने इसका कुछ दार्शनिक सा उत्तर दे दिया। मैने यह भी बताया कि कम्प्यूटर और सूचना प्रौद्यौगिकी के प्रयोग से अब मनुष्य के हाथ का बहुत सा काम मशीनों को दे दिया गया है इसलिए भ्रष्टाचार करने के अवसर ट्रेजरी में कम होते गये हैं। फिर भी जहाँ अवसर उपलब्ध है वहाँ प्रयास जारी है। लेकिन इस मानवसुलभ प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के प्रयास भी साथ-साथ जारी हैं।

राजकिशोर जी ने इस चर्चा का उपसंहार यह कहते हुए कर दिया कि अब इस मुद्दे को छोड़िए, इसमें कोई दम नहीं बचा है, महंगाई बहुत बढ़ गयी है। मुझे तबतक यह पता चल चुका था कि आज शाम छः बजे गांधी हिल्स पर राजकिशोर जी ‘सभ्यता के भविष्य’ पर अपने विचार व्यक्त करने वाले हैं। गांधीजी की प्रिय बकरीयह सुखद संयोग ही था कि जिनके लेख हम चोखेर बाली और हिन्दी भारत जैसे जालस्थलों पर तथा अनेक पत्र पत्रिकाओं में पढ़ते आ रहे थे उन्हें सजीव सुनने का अवसर मिलने जा रहा था। वार्ता का समय होने तक हम कैण्टीन में ही बात करते रहे और फिर गाड़ी हमें टीले की चोटी पर ले जाने के लिए आ गयी। 

मुख्य टीले पर जाने के लिए जो घुमावदार सड़क बनी हुई है उससे ऊपर पहुँचने पर सड़क की बायीं ओर विकसित किये जा रहे उद्यान में एक बकरी की सुन्दर अनुकृति स्थापित की गयी है। कदाचित्‌ वहाँ गांधी जी के प्रिय पात्रों और उनके उपयोग की वस्तुओं को जुटाने का प्रयास किया गया है। वहीं थोड़ा आगे बढ़ने पर गांधी जी की आदमकद प्रतिमा उनके तीन प्रिय बन्दरों के साथ स्थापित है। हमारे पास उन सबको देखने का समय उस समय नहीं था। हमने सभास्थल पर पहुँचकर विश्वविद्यालय के कुलपति जी से मुलाकात की। कुशल-क्षेम के बाद हम राजकिशोरजी की वार्ता सुनने के लिए गोलाकार सीढ़ीनुमा चबुतरे पर बैठ गये। अर्द्धवृत्ताकार दर्शकदीर्घा के ठीक सामने खड़े लैम्प-पोस्ट के नीचे वार्ताकार का चबूतरा बना था। खुले आकाश के नीचे टीले की चोटी पर बना यह मुक्त गोष्ठी स्थल महानगरीय सभ्यता की शोरगुल भरी भागमभाग जिन्दगी से बिल्कुल अलग एक सुरम्य वातावरण सृजित कर रहा था। इस स्थान पर बैठकर ‘सभ्यता के भविष्य’ के बारे में चिन्तन करते लोग मुझे बहुत भले लगे।

सभ्यता का भविष्ययद्यपि अपनी वार्ता में राजकिशोर जी ने जिस कम्यून पद्धति की ओर लौटने की बात की और वर्तमान उदारवादी लोककल्याणकारी जनतंत्रात्मक राज्य को पूँजीवादी सत्ता करार देते हुए पूरी तरह नकारने योग्य ठहराने का प्रयास किया उससे मैं सहमत नहीं हो सका लेकिन देश के कुछ बड़े बुद्धिजीवियों द्वारा विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच बैठकर इस प्रकार की चर्चा करना बहुत सुखद और आशाजनक लगा। उस छोटी सी दर्शक दीर्घा में कुलपति विभूति नारायण राय के साथ दिल्ली से पधारे हिन्दी के प्रतिष्ठित हस्ताक्षर प्रो. अब्दुल बिस्मिल्लाह, हैदराबाद के प्रो. सुवास कुमार, और विश्वविद्यालय संकाय के प्रो.सूरज पालीवाल व अन्य अनेक आचार्यगण मौजूद थे। राजकिशोर जी ने अपने विशद अध्ययन और दुनियाभर के अनुभवों को यहाँ बाँटते हुए बहुत सी बाते बतायीं जो जन संचार और पत्रकारिता के विद्यार्थियों का दृष्टिकोण प्रभावित करने वाली थी। एक छात्र द्वारा पूरी वार्ता की वीडियो रिकॉर्डिंग भी की गयी जो उनके लिए प्रायोगिक प्रशिक्षण के तौर पर अपेक्षित था।सभ्यता का भविष्य बताते राजकिशोर जी

शाम को कुलपति जी ने हमें डिनर साथ लेने के लिए आमन्त्रित किया। वहाँ पर एक बार फिर बौद्धिक चर्चा शुरू हो गयी। साहित्य, समाज, राजनीति, कला,और शेरो शायरी से भरी हुई वह चर्चा रिकॉर्ड करने लायक थी लेकिन मैं उसके लिए पहले से तैयारी नहीं कर सका था। इसी बीच मशहूर शायर और गीतकार शहरयार का फोन कई बार आता रहा और वहाँ उन्हें आज के जमाने का सबसे बड़ा शायर बताया जाता रहा। प्रो. अब्दुल बिस्मिल्लाह से प्रो. सचिन तिवारी ने सलमान रुश्दी की किताब शैतानी आयते (satanic verses) के बारे में कुछ सवाल किए। उनके जवाब पर काफ़ी देर तक बहस होती रही। पूरा ब्यौरा यहाँ देना सम्भव नहीं है, लेकिन उस परिचर्चा में शामिल होकर हमें बहुत आनन्द आया। अन्त में यह कड़ी समाप्त करने से पहले अब्दुल बिस्मिल्लाह जी द्वारा सुनाये और समझाए गये एक शेर की चर्चा करना चाहता हूँ।

वर्धा में सूर्योदय (१४ अप्रैल,२०१०)बुझा जो रौजने जिन्ना तो हमने समझा है

कि तेरी मांग सितारों से भर गयी होगी।

चमक उठे जो सलासिल तो हमने जाना है

कि अब सहर तेरे रुख पर बिखर गयी होगी॥

हमारे अनेक सुधी पाठक इस शेर से परिचित होंगे। यदि कोई अपनी टिप्पणी के माध्यम से इसके शायर का नाम बताते हुए इसका सन्दर्भ-प्रसंग बताना चाहे तो मुझे बहुत खुशी होगी। अगली कड़ी में इसकी चर्चा के बाद मैं बताऊंगा कि अगले दिन अम्बेडकर जयन्ती के अवसर पर मुझे वहाँ क्या कुछ चमत्कृत करने वाले अनुभव हुए। अभी इतना ही… प्रतीक्षा कीजिए अगली कड़ी का।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) 

वर्धा में पूरा होता गान्धी का एक सपना…

15 टिप्पणियाँ

 

आप जानते ही होंगे कि सरकारी कोषागार कार्यालय वित्तीय वर्ष की समाप्ति करीब आने पर अत्यधिक व्यस्त हो जाते हैं। इस बार भी स्थिति बदली नहीं थी। पन्द्रह मार्च के बाद ही ऑफिस में कमरतोड़ मेहनत करनी पड़ रही थी। घर आकर ब्लॉगरी करने की हिम्मत नहीं पड़ती। जैसे-तैसे ई-मेल खाता चेक कर पाने की फुर्सत ही निकाल पाये। कोई पोस्ट ठेलने या पढ़ने की तो हम सोच ही नहीं पाये। मेरा मन था इस वार्षिक लेखाबन्दी पर सरकारी दफ़्तरों की कार्य प्रणाली में आने वाले बदलाव पर आपसे विचार बाँटने का लेकिन मन को इधर एकाग्र ही नहीं कर सका। मार्च का महीना पाँच अप्रैल तक समाप्त हो पाया। महालेखाकार (AG) को अन्तिम लेखा-जोखा भिंजवाने के बाद जब हमें फुरसत मिली तो कुछ दिन आराम करने के बाद कम्प्यूटर खोलने का मन हुआ।

मेरे मेल बॉक्स में असंख्य सन्देश जमा हो चुके थे। फ़ेसबुक, ऑर्कुट, ट्वीटर, लिंक्ड-इन, ई-कविता, एस्ट्रोलॉजीडॉट्कॉम, मि.पॉजिटिव, फ्रॉपर, बड्डीटीवी, मॉर्निंग डिस्पैच-एच.टी., चिट्ठाजगत, ब्लॉगवाणी भोजपुरी.कॉम इत्यादि ने अपना दैनिक कोटा भेंज रखा था। अनेक ब्लॉगर भाइयों ने अपनी रचनाएं भी जबरिया ठेल रखी थी। मुझे नहीं पता कि इतनी सामग्री कोई कैसे पढ़ पाता होगा। मैने तो मजबूरी में ‘सेलेक्ट ऑल’ और ‘मार्क ऐज रेड’ का ऑप्शन चुन लिया। अलबत्ता मैने व्यक्तिगत रूप से परिचित मित्रों और परिजनों के सन्देश जरूर पढ़े। 15042010608

इन्ही में से हिन्दी भारत समूह के लिए डॉ. कविता वाचक्नवी जी का एक सन्देश मुझे देखने को मिला जो वर्धा स्थित महात्मा गान्धी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय से सम्बन्धित था। वहाँ के स्थानीय समाचारपत्रों में छपी कुछ रिपोर्ट्स की कतरन किसी शिक्षक द्वारा भेंजी गयी थी जिसे कविता जी ने समूह पर चस्पा कर दिया था। उस सामग्री को देखकर मैं हैरत से भर उठा। इस संस्था की जो छवि मेरे मन में थी उसे चोट पहुँची। लेकिन मुझे सहसा याद आ गया कि मैने पिछले साल इसी संस्था के सौजन्य से एक बड़ा कार्यक्रम इलाहाबाद में कराया था- हिन्दी चिट्ठाकारी की दुनिया पर राष्ट्रीय गोष्ठी। उस समय भी अन्तर्जाल पर अनेक आलोचना के स्वर मुखरित हो गये थे। ये आलोचना एक खास किस्म की नकारात्मक प्रवृत्ति से प्रेरित लगी थी। उस समय की बातों को नजदीक से जानता हूँ इसलिए इन रिपोर्टों की सच्चाई पर मुझे पर्याप्त सन्देह हो चला। बल्कि मेरे मन में इस संस्था को और नजदीक से देखने की इच्छा बलवती हो गयी।

मैंने संस्था के कुलपति जी से बात की और वहाँ आने की इच्छा जतायी। प्रयोजन प्रायः पर्यटन का ही था। उन्होंने सहर्ष आमन्त्रित किया, मैने झटसे टिकट लिया और १३ अप्रैल की दोपहर में सेवाग्राम रेलवे स्टेशन पर पटना-सिकन्दराबाद एक्सप्रेस से उतर गया।  स्टेशन पर उतरते ही प्रथम साक्षात्कार प्रचण्ड गर्मी से हुआ। विश्वविद्यालय की ओर से एक वाहन स्टेशन पर आ चुका था। अपने एक मित्र के साथ मैने उसमें शरण ली। करीब छः किलोमीटर के रास्ते में मुझे पथरीली जमीन पर बड़े जतन से उगाये हुए कुछ पेड़ दिखे, सड़कें प्रायः खाली दिखी, इलाहाबाद की तरह ठेले और खोमचे पर गर्म मौसम से लड़ने वाले उत्पाद उस दोपहरी में वहाँ नहीं दिखायी पड़े। गाड़ी वर्धा शहर से बाहर निकली तो मुझे चारो ओर पसरी हुई वीरानी ने घेर लिया। लेकिन जल्दी ही हमें एक पहाड़ी टीले पर विश्वविद्यालय का नाम लिखा हुआ दिख गया। 

सबकुछ मेरी कल्पना से परे दिख रहा था। बिल्कुल निर्जन और दुर्गम पथरीले पहाड़ को तराशकर शिक्षा का केन्द्र बनाने की कोशिश विलक्षण लग रही थी। हिमालय की कन्दराओं में तपस्वी ऋषियों की साधना के बारे में तो पढ़ रखा था लेकिन उन हरे भरे जंगलों की शीतल छाया में मिलने वाले सुरम्य वातावरण की तुलना विदर्भ क्षेत्र के इस वनस्पति विहीन पत्थरो के पाँच टीलों पर उगायी जा रही शिक्षा की पौधशाला से कैसे की जा सकती है। मेरे मन में जिज्ञासा का ज्वार उठने लगा। आखिर इस स्थान का चयन ही क्यों हुआ? मौका मिलते ही पूछूंगा। गान्धी हिल्स पर स्थापित प्रतिमा

मेरे लिए वि.वि. के गेस्ट हाउस (फादर कामिल बुल्के अन्तरराष्ट्रीय छात्रावास) में रुकने का इन्तजाम किया गया था। सभी ए.सी. कमरे पहले से ही भर चुके थे। हमें कूलर से सन्तोष करना पड़ा। लेकिन वह भी पर्याप्त ठंडक दे रहा था। असली परेशानी स्नान करने में हुई। दोपहर के दो बजे टंकी का पानी लगभग खौल रहा था। उसे बाल्टी में भरकर थोड़ी देर छोड़ दिया गया तो उसकी गर्मी सहने लायक हो गयी। विश्वविद्यालय के कुलपति श्री विभूति नारायण राय जी ने बाद में बताया कि हम रोज सुबह बाल्टियों में पानी इकट्ठा करते हैं और ठण्डा हो जाने के बाद नहाते हैं। मालूम हुआ कि यहाँ पानी ४०-५० किलोमीटर दूर किसी नदी से पाइपलाइन के जरिए लाया जाता है और टंकियों में चढ़ाकर रखा जाता है। लॉन के पौधों को पर्याप्त पानी नहीं दिया जा सकता इसलिए ऐसे पौधे लगाये गये हैं जिन्हें पानी की कम जरूरत पड़े।

फादर कामिल बुल्के अन्तरराष्ट्रीय छात्रावास गर्म मौसम की मार से तो प्रायः पूरा देश ही त्रस्त है, इसलिए यह अकेले वर्धा की परेशानी नहीं कही जा सकती। इसे नजरन्दाज करते हुए मैं उन बातों की चर्चा करना चाहूंगा जो मुझे असीम मानसिक सन्तुष्टि देने वाली साबित हुई। प्रदेश सरकार की नौकरी बजाते हुए मुझे जिन अनचाहे अनुभवों से गुजरना पड़ता है, जिस प्रकार की बेतुकी फाइलों में सिर खपाना पड़ता है और निरर्थक कामों में जीवन का कीमती समय गुजारना पड़ता है उससे परे वहाँ बिताये दो दिनों में मुझे विलक्षण अनुभव प्राप्त हुए। मुझे जिस अद्‍भुत बौद्धिक चर्चा में शामिल होने का अवसर मिला, साहित्य, संगीत और कला की जिस त्रिवेणी में डुबकी लगाने का अवसर मिला,  जिन लोगों के साहचर्य में इस इस अध्ययन केन्द्र के निरन्तर विकसित होते परिसर के सौन्दर्य के साक्षात्कार का सुख मिला उसकी चर्चा इस एक पोस्ट में नहीं की जा सकती।

रेगिस्तान में नखलिस्तान का निर्माण

अगली पोस्ट में मैं बताऊंगा कि वहाँ मुझे कौन-कौन ऐसे लोग मिले जिनकी चर्चा राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर होती रहती है। कौन लोग हैं जो शिक्षा की मशाल जलाये रखने के लिए शान्तिपूर्ण ढंग से अपना व्यक्तिगत सुख त्यागकर इस तपोभूमि में अपनी ऊर्जा का प्रतिदान कर रहे है, वे कौन सी प्रेरक शक्तियाँ हैं   जो महात्मा गान्धी के सेवाग्राम में देखे गये एक सपने को पूरा करने के लिए इस रेगिस्तान में नख़लिस्तान का निर्माण करा रही हैं। बस प्रतीक्षा कीजिए अगली पोस्ट का….

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

क्षमा प्रार्थना…

21 टिप्पणियाँ

 

DSC02527 हे मूषक राज,

बहुत भारी मन से आपको विदा कर रहा हूँ। आपको कष्ट देने का मेरा कोई इरादा नहीं था। लेकिन क्या करूँ, आपने हमारे परिवार को ऐसा मानसिक कष्ट दिया कि आपको अपने घर से दूर कर देने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। आपसे विनती करने का कोई माध्यम होता तो मैं आपसे हाथ जोड़कर कहता कि आप इस घर के निरीह प्राणियों पर दया करिए। लेकिन आपको सलाखों के पीछे कैद करने के सिवा हमारे पास कोई दूसरा हल नहीं था। आपको जो कष्ट हुआ उसके लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं।

अपने विचित्र शौक को पूरा करते हुए आपने हमारे घर के किचेन से लेकर ड्राइंग रूम तक और आंगन से लेकर बेड रूम तक क्या-क्या नहीं काट खाया। कितने कपड़े, जूते-चप्पल, और घरेलू सामान आपकी निरन्तर वृद्धिमान दन्तपंक्ति की भेंट चढ़ गये। लेकिन हम यह सब कुछ सहते रहे। एक तो आपकी चंचल गति और दूसरे हमारी धर्म भीरु मति- दोनो आपकी सुरक्षा में सहायक रहे। आप हमारे आराध्य देव प्रथम वंदनीय, प्रातः स्मरणीय, गणपति, गणनायक, विघ्नविनाशक, लम्बोदर, उमासुत श्री गणेश जी के वाहन हैं। आपको किसी प्रकार की क्षति पहुँचाना हमारे लिए पाप की बात है। ऐसे कई अवसर आये जब आप हमारी आँखों के सामने ही हमें चिढ़ाते हुए चलते बने। घर के मन्दिर में चढ़ाया हुआ प्रसाद उठाने से जो हम चूक गये तो उसका भोग आप ही लगाते रहे। कदाचित्‌ मेरी गृहिणी मन ही मन खुश होती रही कि शायद आपकी पीठ पर बैठकर भगवान स्वयं भोग लगाने आते हों।

खुराफ़ात का अन्त आप छत से रोशनदान की ओर आने वाले डिश-टीवी के केबल पर चढ़कर घर के भीतर आते-जाते रहे। भारी देह होने के कारण एकाध बार अचानक ताली की आवाज से विचलित होकर आप फर्श पर आ गिरे तो भी आपका बाल बांका नहीं हुआ। बल्कि हम ही पाप के भागी होने के डर से सहम गये थे।

बचपन में अपने गाँव पर गेंहूँ की कटाई के बाद खाली हुए खेतों में आपका शिकार करने वालों को मैं देखता था। आपके बिल की खुदाई करने पर जमीन के भीतर आपकी बनायी हुई जो सुरंग मिलती थी उसे देखकर हम चौक जाते थे। आपने कितनी सफाई से भीतर ही भीतर गेंहूं की बालियों को इकठ्ठा रखने के लिए बड़े-बडे गोदाम बना रखे होते थे। अपने नवजात बच्चों के लिए सुरंग की सबसे भीतरी छोर पर नर्म मुलायम घास के बिस्तर सजा रखे होते थे। जब ये मुसहर जाति के शिकारी कुदाल से आपका आशियाना खोद रहे होते और आपके पूरे खानदान का सफाया कर रहे होते तो मेरा कलेजा कांप उठता था। आप द्वारा जमा किया हुआ अनाज उनका भोजन बन जाता। लेकिन जिस किसान के खेत पर आपकी कृपा हो जाती वह सिर पकड़ कर बैठ जाता।

मैने देखा था कि आपको पानी से बहुत भय हुआ करता था। आपको बिल से बाहर निकालने के लिए उसमें पानी भर दिया जाता था। आप जब घर में आयी बाढ़ से बचने के लिए बदहवास होकर भाग रहे होते तो आपके पीछे डण्डा लेकर दौड़ते गाँव के लड़के और उनके साथ आपका पीछा करने वाले कुत्ते अपनी पूरी शारीरिक शक्ति झोंक दिया करते थे।  बहुधा आप उन्हें चकमा देने में सफल हो जाते। लेकिन वे जब आपका शिकार कर लेते थे तो आपको आग में भूनकर नमक मिर्च के साथ चटखारे लेकर खाते हुए  वे लोग मेरे मन को घृणा से भर देते थे।

कुत्ते और बिल्लियों के लिए आपका उत्सर्ग तो अब किंवदन्ती बन चुका है। टीवी पर टॉम और जेरी का कार्टून देखते हुए मेरे बच्चे हमेशा आपके चरित्र से सहानुभूति रखते हैं। बिल्ले को हमेशा छकाते हुए आप सदैव तालियाँ बटोरते रहते हैं, लेकिन असली दुनिया आपके लिए इतनी उत्साहजनक नहीं है। शहरी जीवन शैली में आपको बर्दाश्त करने का धैर्य कम ही लोगों में है। आपको मारने के लिए तमाम जहरीले उत्पाद बाजार में लाये गये हैं। अब तो एक ऐसा पदार्थ बिक रहा है जिसे खाकर आप घर से बाहर निकल जाते हैं और खुले स्थान पर काल-कवलित हो लेते हैं।

एक बार गाँव में जब आपकी प्रजाति ने घर में कुहराम मचा रखा था तो एक दवा आँटे में मिलाकर जगह जगह रख दी गयी थी। उसके बाद जो हुआ उसे याद करके हम काँप जाते हैं। पूरे घर में बिखरी हुई लाशें कई दिनों तक इकठ्ठा की जाती रहीं। दो-चार दिन बाद जब दुर्गन्ध के कारण घर में रहना मुश्किल हो गया तो नाक पर पट्टी बाँधकर चींटियों की पंक्ति का सहारा लेते हुए अनेक दुर्गम स्थानों पर अवशेष मृत शरीरों को खोजा गया।   पूरे घर को शुद्ध करने के लिए हवन-अनुष्ठान कराना पड़ा। इसके बाद घर में यदि कोई बीमार हो जाता तो इसे उस हत्या के पाप का प्रतिफल माना जाता रहा। तबसे हम आपका समादर करने के अतिरिक्त कुछ सोच ही नहीं सकते।

हमने आपको कैद करने के बारे में कदापि नहीं सोचा होता यदि आपने शौचालय की सीट में लगे साइफ़न में इकठ्ठा पानी को अपना स्विमिंग पूल न बनाया होता। जाने आपको इस गन्दे पानी में स्नान करने का शौक कहाँ से चढ़ गया? इधर हमने देखा कि आपके पैरों के निशान कमोड से प्रारम्भ होकर वाश बेसिन पर और साबुनदानी को उलटने –पुलटने के बाद बरामदे में रखे सभी सामानों पर अपनी छाप छोड़ते हुए डाइनिंग टेबुल तक पहुँचने लगे थे। आपने हमारे सरकारी मकान के बाथरूम में लगे जीर्ण हो चुके दरवाजे के निचले कोनों पर छेद बना रखा था।

DSC02541 हमने पहली कोशिश तो यही की थी कि आपको ट्वायलेट में जाने से रोका जाय। रात में सोने से पहले हमने उन छेदों को एक बोरे से बन्द करके उसपर ईंट रख दिया था। सुबह हमने देखा कि आपने गुस्से में बोरे को कुतर दिया है और उसकी लुग्दी पूरे बाथरूम में बिखरा दी है। कदाचित इस गुस्से के कारण ही आपने उस रात रोज से ज्यादा लेड़ियाँ भी  भेंट कर दी थीं। हमने अगले दिन उन छिद्रों को टिन की प्लेट से ढँक दिया। लेकिन आप हार मानने वाले हैं ही नहीं। आपने अगली रात को उस टिन के ठीक बगल में दूसरा छेद बना लिया और अपना नरक-स्नान बदस्तूर जारी रखा।  छेद के पास ही दरवाजे के बाहर हमने जो एक चूहेदानी लगा रखी थी उसे भी आपने नहीं छुआ। आपको तो भीतर घुसने की जल्दी रही होगी।एक रास्ता बन्द हुआ तो दूसरा खोल लिया

हमें विश्वास हो गया कि आपको ट्वायलेट के भीतर जाने से नहीं रोका जा सकता है। आप स्नान करने से पहले कुछ और नहीं करते। चूहेदानी में रखे आलू के टुकड़े को आप तभी छुएंगे जब स्नान ध्यान पूरा हो जाएगा। मैने इस बार चूहेदानी को अन्दर ही लगा दिया ताकि जब आप अपने बाथटब से बाहर निकलें तभी भोजन की तलाश में उधर आकर्षित हों। इस बार युक्ति काम कर गयी। रात के करीब एक बजे जब खटाक की आवाज हुई तो मुझे चैन मिला। उठकर मैने तत्क्षण देखा। आप मेरे कैदी हो चुके थे। सद्दाम हुसेन को पकड़ने के बाद राष्ट्रपति बुश के चेहरे पर जो विजयी मुस्कान थी उसे भी मात देती हुई खुशी के साथ मैंने रात बितायी। आपको आपके पसन्दीदा स्थान पर ही कैदबन्द छोड़ दिया था मैने।

DSC02553 जब सुबह उठकर देखा तो आप अपने पिंजड़े के साथ कमोड की सीट में लुढ़के हुए थे। गजब का प्रेम था आपका उस नरक के रस्ते से। मैने एक प्लास से आपको पिजड़े सहित उठाया, आंगन में ले जाकर नल के पानी से विधिवत स्नान कराया और सुबह की ताजी धूप में सुखाने के बाद आपकी यादों को कैमरे में कैद करने के लिए उसी डाइनिंग टेबुल पर रख दिया जिसपर आप प्रायः विचरण करते रहते थे। आपको सलाखों के पीछे बहुत देर तक रखने की मेरी कोई मंशा नहीं थी। लेकिन मेरी श्रीमती जी सोमवती अमावस्या के अवसर पर पीपल देवता की पूजा करने, उनकी १०८ बार परिक्रमा करने गयी हुई थीं और मेरे बच्चे सो रहे थे। उन सबको आपका दर्शन कराये बगैर मैं आपको भला कैसे जाने देता?

अब जबकि मैने आपको अपने घर से एक किलोमीटर दूर इस मन्दिर के प्रांगण में लाकर छोड़ने का निश्चय किया है तो मन में मिश्रित भाव पैदा हो रहे हैं। दुःख और सन्तोष दोनो कुलांचे भर रहे हैं। उम्मीद है कि मन्दिर से सटा हुआ यह हरा-भरा पार्क आपको निश्चित ही अच्छा लगेगा। इस मन्दिर में दक्षिणमुखी हनुमान जी है, भगवान शंकर जी हैं, दुर्गा माँ की छत्रछाया भी है और आपके स्वामी गणेश जी भी पदासीन हैं। देखिए न, यहाँ कितनी धर्मपरायण सुहागिन औरतें पीपल के चबूतरे पर पूजा-परिक्रमा कर रही हैं। बड़ी मात्रा में प्रसाद चढ़ाया जा रहा है। आप इनका आनन्द उठाइए। हाँ, अपना नरक-स्नान का शौक त्याग दीजिएगा तो भला होगा।

आशा है कि मैने आपको जो नया बसेरा दिया है उसको मद्देनज़र रखते हुए आप मुझे माफ़ कर देंगे। मैने आपको पिजड़े में बन्द करके और नल के साफ पानी से स्नान कराके जो कष्ट दिया है और आपकी कैदी हालत में बेचैनी से किए गये क्रिया-कलाप दुनिया को दिखाने के लिए रिकॉर्ड किया है उसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ।

सादर!

आपका एक अनिच्छुक भक्त

(सिद्धार्थ)

विदा से पूर्व मूषक राज के करतब

कैद में खुराफ़ाती
सलाखों के पीछे

ढाबा संस्कृति और बर्बाद होते बच्चे…

22 टिप्पणियाँ

 

“साहब मुझे यहाँ से छुड़ा दीजिए… ये लोग मुझे बहुत मार रहे हैं…” अचानक कान में ये शब्द पड़े तो मैं अपने मोबाइल के मेसेज पढ़ना छोड़कर उसकी ओर देखने लगा। एक लड़का बिल्कुल मेरे नजदीक आकर मुझसे ही कुछ कहने की कोशिश कर रहा था।

करीब तेरह चौदह साल की उम्र का वह दुबला सा लड़का निश्चित ही किसी गरीब परिवार का लग रहा था…। पहले तो उसका आर्त स्वर मुझे कुछ बनावटी लगा शायद भीख मांगने वाले लड़कों की तरह अभिनय करता हुआ सा…  उसकी सिसकियों के बीच से छन कर आ रही स्पष्ट आवाज और शुद्ध हिन्दी के प्रयोग से लग रहा था कि उसे स्कूल की शिक्षा जरूर मिली होगी। लेकिन इसने मुझसे रुपया-पैसा तो कुछ मांगा ही नहीं… फिर यह यहाँ ढाबे पर क्या कर रहा है…?

थोड़ी देर के लिए मैं उसकी सच्चाई को लेकर थोड़ा असमन्जस में पड़ गया था, लेकिन जब उसे मुझसे बात करता देखकर ‘ढाबे का मालिक’ नुमा एक लड़का तेजी से मेरे पास आकर उसे बोलने से रोकने की कोशिश करने लगा और सफाई की मुद्रा में मुझे कुछ समझाने लगा तो मेरे कान खड़े हो गये। मैने उस लड़के को शान्त कराकर उससे पूरी बात बताने को कहा। इसपर मालिक के लड़के की बेचैनी कुछ बढ़ती सी लगी।

11032010535हुआ ये था कि मैं कोषागार स्ट्रॉंग-रूम से सम्बन्धित एक महत्वपूर्ण कार्य के लिए इलाहाबाद से कानपुर सड़क मार्ग से जा रहा था। मेरे साथ में मेरा स्टाफ़ और दो सशस्त्र वर्दीधारी गार्ड भी थे। करीब दस बजे दिन में उन सबको खाना खिलाने के लिए मैने गाड़ी चौड़गरा के ‘परिहार ढाबा’ पर रुकवा दी थी। मेरे चीफ़ कैशियर ने स्टाफ़ के लिए दाल फ्राई, चना मसाला और तन्दूरी रोटी का ऑर्डर दे दिया था। मुझे स्वयं खाना खाने की इच्छा नहीं थी लेकिन ढाबे पर यदि खीर मिल जाय तो मैं उसका लोभ संवरण नहीं कर पाता। सो यहाँ भी मैने एक प्लेट खीर खाने के बाद ही एक कप चाय पीने की इच्छा जतायी थी।

इस साधारण से ढाबे पर टिपिकल शैली में लकड़ी के लाल, हरे, नीले तख्त लाइन से बिछे हुए थे। उनके किनारे प्लास्टिक की कुर्सियाँ डालकर डाइनिंग हाल का रूप दिया गया था। हाई-वे पर चलने वाली ट्रकों के ड्राइवर और क्लीनर इन्ही तख़्तों पर बैठकर भोजन करते हैं और जरुरत के मुताबिक इसी पर पसरकर आराम भी करते हैं। बाकी प्राइवेट गाड़ियों की सवारियाँ भी यदा-कदा यहाँ रुककर भोजन या नाश्ता करती हैं।

फ्रिज में रखी हुई ठण्डी और स्वादिष्ट खीर मुझे तत्काल मिल गयी। उसे चटपट समाप्त करके मैं चाय की प्रतीक्षा कर ही रहा था कि उस लड़के ने मुझे कोई सरकारी अफ़सर समझकर कदाचित्‌ अपने को संकट से निकालने की उम्मीद में अपनी समस्या बतानी शुरू कर दी। वहीं एक टीवी पर फुल वॉल्यूम में कोई मसाला फिल्म चल रही थी जिसके शोर में बाकी लोगों तक यह बातचीत नहीं जा रही थी। लेकिन ढाबे पर काम करने वाले दूसरे रसोइये और नौकर इस लड़के पर सतर्क निगाह रखे हुए थे इसलिए दो मिनट के भीतर ढाबे के मालिक का लड़का लपका हुआ चला आया…।

लड़का बता रहा था, “मुझे स्टेशन से एक आदमी यहाँ लाकर छोड़ गया है। ये लोग मुझसे जबरदस्ती काम करा रहे हैं और बहुत मार रहे हैं।” उसकी सिंसकियाँ बढ़ती जा रही थीं जो अचानक मालिक के लड़के के आते ही रुक गयीं।

मैने मालिक के लड़के से ही पूछ लिया- “यह क्यों रो रहा है जी…?”11032010533

“कुछ नहीं साहब, यह अभी दो-तीन दिन पहले ही आया है। इससे हम लोग कोई काम नहीं कराते हैं। कहते हैं कि- बस जो खाना हो खाओ, और यहीं पड़े रहो … लेकिन यह बार-बार यहाँ से जाने को कहता है…”

“तो इसके साथ जबरदस्ती क्यों करते हो? जाने क्यों नहीं देते?” मैने तल्ख़ होकर पूछा।

“इसको हम अकेले किसी ट्रक पर बैठकर जानें दें तो पता नहीं कहाँ गायब हो जाएगा। फिर जिस ठेकेदार ने इसे यहाँ दिया है उसको हम क्या जवाब देंगे? …हम इससे कह रहे हैं कि ठेकेदार को आ जाने दो तो छोड़ देंगे, लेकिन मान ही नहीं रहा है…”

मैने लड़के से उस ठेकेदार के बारे में पूछा तो उसे कुछ भी मालूम नहीं था। फिर उसका नाम पूछा तो बोला, “मेरा नाम अजय है- स्कूल का नाम मुकेश और घर का नाम अजय”

उसने बिल्कुल शिशुमन्दिर के लड़कों की तरह जवाब देना शुरू किया। लखनऊ के पास चिनहट में किसी शिक्षा निकेतन नामक स्कूल से दर्जा पाँच का भागा हुआ विद्यार्थी था। बता रहा था कि वह अपने साथ के एक लड़के के साथ घूमने के लिए ट्रेन में बेटिकट बैठ गया। पकड़े जाने पर आगे के किसी स्टेशन पर टीटी द्वारा उतार दिया गया तो वहीं प्लैटफ़ॉर्म पर एक आदमी मिला। उसने इसकी मदद करने के नाम पर इस ढाबे पर लाकर छोड़ दिया।

11032010534

इतनी कहानी जानने के बाद मैं चिन्ताग्रस्त हो गया। मैं जिस जरूरी सरकारी काम से निकला था उसके लिए मुझे जल्दी से जल्दी कानपुर पहुँचना जरूरी था। लड़के को उसके हाल पर छोड़ कर जाने में खतरा यह था कि ढाबे का मालिक उसे निश्चित ही और दंडित करता क्योंकि उसने मुझसे उसकी शिकायत कर दी थी। …इससे बढ़कर यह चिन्ता थी कि मेरे ऊपर लड़के ने जो भरोसा किया था और संकट से उबारे जाने की जो गुहार लगायी थी उसका क्या होगा। मैं सोचने लगा- एक जिम्मेदार लोकसेवक होने के नाते मुझे क्या करना चाहिए? वह लड़का मेरे जाते ही घोर संकट में फँस सकता था।

तभी उस ढाबे का मालिक भी आ गया जिसको उसके लड़के ने फोन करके बुला लिया था। सफेद कुर्ता-पाजामा पहने हुए शिवमंगल सिंह परिहार ने अपना परिचय देते हुए बताया कि ऐसे लड़के इधर-उधर से आ जाते हैं साहब, लेकिन हम लोग इनका बड़ा खयाल रखते हैं। गलत हाथों में पड़कर ये खराब हो सकते हैं…। मैने टोककर कहा- “यह लड़का तो बता रहा है कि इसने कल से खाना ही नहीं खाया है, क्या खयाल रखते हैं आप?‘”

इसपर वह झेंपते हुए अपने रसोइये को डाँटने लगा…। मालिक के लड़के ने बीच में आकर कहा “नहीं साहब, इससे पूछिए, रात में खाना दिया गया था कि नहीं…!” लेकिन मेरे पूछने से पहले ही वह बोल उठा  कि मुझे कुछ नहीं मिला है, मुझे बहुत भूख लगी थी” इस बीच मेरे स्टाफ़ के साथ अजय उर्फ़ मुकेश भी खाना खा चुका था।

अजीब स्थिति बन गयी। अब मैं इसे इस हाल में छोड़कर कत्तई नहीं जा सकता था। फतेहपुर के एक विभागीय अधिकारी का नम्बर मेरे पास था। मैने उन्हें फोन मिलाकर पूरी बात बतायी। वहाँ वरिष्ठ कोषाधिकारी के पद पर तैनात श्री विनोद कुमार जी ने इसको गम्भीरता से लिया। जिले के पुलिस विभाग को इत्तला दी गयी। उनके आश्वासन के बाद मैने ढाबे पर मौजूद सभी पक्षों को लक्ष्य करते हुए दनादन कुछ तस्वीरें खींच डाली, ताकि बाद में कोई इस बात से इन्कार न करे। 11032010537

मुझे यह आशंका हो रही थी कि मेरे रवाना होते ही यदि लड़के को मार-पीट कर भगा दिया गया तो जिले की पुलिस या बालश्रम उन्मूलन विभाग वाले आकर ही क्या कर लेंगे। इसकी सम्भावना से बचने के लिए मैने ढाबा मालिक के साथ बच्चे को और अपने चीफ़ कैशियर को खड़ा कराकर फोटो खींच लिया। मैने शिवमंगल सिंह को प्यार से समझा दिया कि जबतक कोई जिम्मेदार सरकारी व्यक्ति यहाँ आकर इस बच्चे को न ले जाया तबतक आप इसे कहीं नहीं जाने देंगे। यदि इस बीच इस लड़के के साथ कोई दुर्व्यवहार हुआ तो आपकी जिम्मेदारी तय मानी जाएगी। सबूत के तौर पर ये तस्वीरें मैं अपने कैमरे में कैद कर लिए जा रहा हूँ।

मैने लड़के को भी समझा दिया कि जबतक कोई सरकारी अधिकारी या थाने से कोई आकर तुम्हें यहाँ से न ले जाय तबतक यहीं रहना। शाम तक वापसी में आकर मैं फिर से समाचार लूंगा। अब निश्चिन्त होकर मैं कानपुर चला गया, लेकिन अगले प्रत्येक आधे घण्टे पर फतेहपुर के वरिष्ठ कोषाधिकारी से उसका हाल-चाल मिलता रहा। कानपुर से वापसी करते हुए मैं ऐसी सामग्री के साथ था कि कहीं रुके बगैर मुझे सीधे इलाहाबाद कोषागार में पहुँचना निर्दिष्ट था। इसलिए मुझे मोबाइल के माध्यम से मिली सूचना पर निर्भर रहना पड़ा।

***

शाम को लौटते हुए रास्ते में जो अन्तिम सूचना मिली उसके अनुसार स्थानीय थाने के थानेदार ने वहाँ जाकर लड़के को अपने साथ थाने में लाकर ठहरा दिया था। शिवमंगल सिंह ने उसे मजदूरी के बचे हुए डेढ़ सौ रूपये देकर प्यार से विदा किया था और पुलिस के अनुसार लड़के को ढाबे वालों से कोई शिकायत नहीं रह गयी थी। लड़के ने जो अपना पता बताया था उस क्षेत्र के सम्बन्धित थाने से सम्पर्क कर इसके गायब होने का सत्यापन कराया जा रहा था। बाल श्रम कानून के प्रयोग की आवश्यकता नहीं महसूस की गयी थी। लड़के ने भी अपने साथ वी.आई.पी. वर्ताव पाकर अपने आँसू पोछ लिए थे और किसी पुलिस हमराही के साथ अपनी घर वापसी की प्रतीक्षा कर रहा था।

मैं वापसी में रास्ते भर सड़क किनारे चल रहे असंख्य ढाबों, रेस्तराओं, होटलों और चाय की दुकानों की ओर देखता हुआ यही सोचता रहा कि इनमें जाने कितने अजय, मुकेश, छोटू, बहादुर, पिन्टू, रामू, बच्चा, आदि किसी न किसी ठेकेदार के हाथों चढ़कर अपना जीवन खराब कर चुके होंगे…।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

 

त्रिवेणी महोत्सव में प्रयाग की धरती पर उतरे सितारे…।

13 टिप्पणियाँ

 

उन्नीस फरवरी से पच्चीस फरवरी तक लगातार सात दिनों तक इलाहाबाद में गीत, संगीत, नृत्य, कविता और शायरी की स्वर लहरियाँ यमुना नदी के तट पर बने शानदार मंच से बिखरती रहीं और रोज शाम को शहर का सारा ट्रैफिक बोट-क्लब मुक्तांगन की ओर मुड़ जाता रहा। सेवेन वण्डर्स ने जो विशाल मंच तैयार किया था उसकी शोभा देखते ही बनती थी। इस मंच पर जब पहले दिन उद्‌घाटन कार्यक्रम में आगरा से आये सुधीर नारायण ने अपने भजनो के साथ सुमधुर शुरुआत की तभी यह अन्दाज लग गया कि अगले कुछ दिन अभूतपूर्व आनन्द के रस में डूबने का अवसर मिलने वाला है।

उद्‌घाटन कार्यक्रम की औपचारिकता पूरी होने के तत्काल बाद श्रेया घोषाल ने एक रेल के डिब्बे से मंच पर उतरकर सबको रोमांचित कर दिया। दर्शक दीर्घा में शान्ति बनाए रखना पुलिस वालों के लिए असम्भव सा हो गया। एक के बाद एक हिट गानों को सजीव सुनते हुए दर्शक जोश में  खड़े होकर नाचते रहे, जाने कितनी कुर्सियाँ शहीद हुईं मगर जश्न का माहौल थमने का नाम नहीं ले रहा था। भगवान ने इस लोकप्रिय गायिका को जितना सुरीली आवाज दी है उतनी ही सुन्दरता से भी नवाज़ा है।

एक से बढ़कर एक उम्दा कार्यक्रम देखकर देर रात दो-तीन बजे घर लौटना, दिन भर उनींदी आँखों से दफ़्तर का काम निपटाना  और शाम होते ही फिर उसी महोत्सव का रुख कर लेना मेरा रूटीन बन गया… ऐसे में ब्लॉगिंग क्या खाक होती…? पिछली पोस्ट पर प्राप्त टिप्पणियों में लगभग सभी ने मुझसे रिपोर्ट की उम्मीद जतायी थी। मैने इसका मन भी बनाया था। कैमरा भी साथ लेकर जाता रहा, लेकिन सारी तैयारी धरी रह गयी। उस माहौल में तो बस झूम कर नाच उठने का मन करता था। डायरी कलम संभालने और फोटो खींचने की सुध ही नहीं रही। फिर भी आप लोगों को निराश नहीं करना चाहता हूँ। कुछ तस्वीरें जो मैने उतार ली थीं उनको देखकर माहौल का अन्दाज लगाइए। शेष बातें और वीडियो अगली पोस्ट में….

 

DSC02332 मंच की भव्यता देखते ही बनती थी

आइए देखते हैं कुछ यादगार तस्वीरें

 

DSC02328

       जबर्दस्त आतिशबाजी

DSC02331

मन्त्री जी ने उद्‍घाटन किया

DSC02333

लोकनृत्य-राजस्थानी चाकरी

DSC02338

लोकनृत्य-मणिपुरी

DSC02346

लोकनृत्य-मथुरा की होली

DSC02343

लोकनृत्य-कश्मीरी

DSC02347

       श्रेया घोषाल

DSC02360

बच्चों के साथ (बीच में वागीशा)

 

malini awasthi 

मालिनी अवस्थी की सज-धज एक भारतीय नारी की पारम्परिक वेश-भूषा में थी तो गायन में लोकरंग का अद्‍भुत पुट था। दर्शकों के बीच में जाकर उनसे सीधा सम्वाद करने की अदा ने सबका मन मोह लिया।

abhijit bhattacharya

अभिजीत दा ने अपने हिट गीतों से सबको मन्त्रमुग्ध तो किया ही उनके साथ आयी नृत्य मण्डली ने सभी नौजवानों को साथ थिरकने पर मजबूर कर दिया। दर्शकों की फ़रमाइश पर इन्होंने किशोर कुमार के सदाबहार गीत भी अलग अन्दाज में सुनाए।

DSC02459

 

बच्चों, नौजवानों समेत सभी दर्शक अभिजीत दा से हाथ मिलाने और बात करने के लिए उन तक पहुँचना चाहते थे लेकिन इसका सौभाग्य मिला आयोजन से जुड़े अधिकारियों को, मुख्य अतिथि को और मंच की संचालक उद्‌घोषिका को

 

शान की लुटायी मस्ती बटोरने के लिए जब दर्शक अनियन्त्रित होने लगे तो आई.जी. और डी.आई.जी. खुद ही स्थिति संभालने के लिए खड़े हो गये (देखिए सबसे नीचे वाले बायें चित्र में)। भीड़ ने उनकी एक न सुनी। कार्यक्रम समय से पहले बन्द करना पड़ा। लेकिन तबतक सैकड़ों कुर्सियाँ टूट चुकी थीं जिनपर खड़े होकर नौजवानों ने डान्स किया था।

shaan

बहती हवा सा था वो… (शान)

शान और जूनू

  शान और जूनू


DSC02477

पुलिस कप्तान हुए हलकान

DSC02496 मन्त्री जी द्वारा शान का सम्मान

तस्वीरें तो और भी ढेर सारी हैं लेकिन इनसे पेट तो भरने वाला है नहीं, इसलिए अब रहने देता हूँ। गिरिजेश भइया की इच्छा थी मालिनी अवस्थी की रिकॉर्डिंग सुनने की। मैने उसे रिकॉर्ड तो कर लिया है लेकिन सोनी के डिजिटल कैमरे में आवाज साफ़ नहीं रिकॉर्ड हो पायी है। सावधानी बरतते हुए मैने एनालॉग कैमरे (Handycam) से भी रिकॉर्ड किया है जो बहुत स्पष्ट और कर्णप्रिय है लेकिन इसको कम्प्यूटर में चढ़ाने के लिए एक कन्वर्टर की जरूरत है। मेरा टीवी ट्यूनर कार्ड अभी ऑडियो इनपुट नहीं ले रहा है। कोई तकनीकी विशेषज्ञ इसमें मदद कर सकता है क्या?

समीर जी मुझे आपकी फरमाइश भी याद है। लेकिन यही हाल कवि सम्मेलन का भी है। कैसेट में रिकॉर्डिंग मौजूद है लेकिन कम्प्यूटर पर कैसे चढाऊँ?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

हमें खेद है कि हम इनकी चर्चा न कर पाये-

उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र के कलाकार, सुगन्धा मिश्रा (लाफ़्टर चैलेन्ज), हिमानी और तोषी, वडाली बन्धु, निज़ामी बन्धु, गुलाम अली, अमजद अली खान, कुँवर बेचैन, राहत इन्दौरी, बसीम बरेलवी, मुनव्वर राना, ताहिर फ़राज, प्रदीप चौबे, पद्‍मश्री रंजना गौहर (ओडिसी), नीरजा श्रीवास्तव(कत्थक), इमरान प्रतापगढ़ी, यश मालवीय, शबा बलरामपुरी और ढेर सारे अन्य कवि, शायर और कलाकार जिन्होंने दर्शकों को बाँधे रखा।

Older Entries Newer Entries