लोकतन्त्र के भस्मासुर

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“कृपया मेरे सच बोलने पर नाराज न होइए; कोई भी व्यक्ति जो इस नगर-राज्य में घट रही अनेक अन्यायपूर्ण व गैरकानूनी घटनाओं को रोकने की कोशिश करेगा; और आपका या किसी अन्य ‘भीड़’ का सच्चा विरोध करेगा वह बच नहीं पाएगा। कोई भी व्यक्ति जो न्याय के लिए वास्तविक संघर्ष करता है, उसे यदि जीने की थोड़ी भी इच्छा है तो उसे सार्वजनिक जीवन त्याग कर निजी ज़िन्दगी बितानी होगी।” (एपॉल्जी से)

image यह उद्‍गार ग्रीक दार्शनिक प्लेटो के गुरू सुकरात ने ‘जूरी’ के सामने भरी अदालत में तब व्यक्त किए थे जब उनके विरुद्ध देशद्रोह का मुकदमा चलाया जा रहा था। कुछ ही समय में वह जूरी उन्हें मृत्युदण्ड सुनाने वाली थी। प्लेटो ने अपने गुरू की मौत का कारण जिस राज-व्यवस्था को ठहराया उसे ‘डेमोक्रेसी’ कहा जाता था, जिसमें भींड़ द्वारा नितान्त अविवेकपूर्ण निर्णय लिए जाते थे, और प्रायः अन्यायपूर्ण स्थिति उत्पन्न हो जाती थी। वही डेमोक्रेसी आज दुनिया की सबसे लोकप्रिय, सर्वमान्य और सर्वाधिक व्यहृत शासन व्यवस्था हो गयी है। यह बात अलग है कि राजनीति विज्ञान के जानकार प्राचीन ग्रीक कालीन डेमोक्रेसी और आधुनिक ‘लोकतंत्र’ में जमीन-आसमान का अन्तर बताएंगे।

प्लेटो ने जिस नगर-राज्य को देखा था उसकी जनसंख्या इतनी छोटी होती थी कि राज्य के सभी नागरिक एक स्थान पर एकत्र होकर बहुमत से अपना शासक चुन लेते थे। भीड़ का एक बड़ा हिस्सा जिसे पसन्द करता था वही राजा होता था और उसके फैसले सभी नागरिकों पर बाध्यकारी होते थे। सिद्धान्त रूप में आज भी लोकतंत्र का मतलब यही है- जनता की सरकार, जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों की बहुमत आधारित सरकार।

लेकिन प्लेटो ने इस बहुमत की व्यवस्था का जो विश्लेषण किया, वह इसकी खामियों को उजागर करने वाला है, और कदाचित्‌ सच्चाई के करीब भी है। उन्होंने राज्य की तुलना एक व्यक्ति से की थी, और बताया था कि जिस प्रकार एक व्यक्ति के भीतर इन्द्रियबोध (sensation), चित्तवृत्ति (emotion), और बुद्धि (intelligence) के बीच उचित तालमेल से ही उसका सन्तुलित और स्वस्थ जीवन सम्भव है, उसी प्रकार राज्य के विभिन्न अवयवों के आपसी सामन्जस्य से ही न्यायपूर्ण राज-व्यवस्था स्थापित की जा सकती है। यदि बुद्धि-विवेक के ऊपर मन व शरीर में पलने वाले काम, क्रोध, मद व लोभ जैसे विकार हावी हो जाते हैं, तो व्यक्तित्व दोषयुक्त और अन्या्यपूर्ण हो जाता है। शरीर के ऊपर मन और मन के ऊपर मस्तिष्क का नियन्त्रण बहुत आवश्यक है। यदि नियन्त्रण की यह दिशा उलट-पु्लट जाय तो व्यक्ति नष्ट होने लगता है। पतन अवश्यम्भावी हो जाता है। यही स्थिति उस राज्य की भी होती है, जहाँ विवेक पर उन्माद हावी हो जाता है।

लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सभी व्यक्तियों को एक इकाई के रूप में बराबर माना जाता है। भले ही उनकी मानसिक और शारीरिक क्षमता तथा सामाजिक पृष्ठभूमि में भारी अन्तर हो। यह व्यवस्था इसी सिद्धान्त पर टिकी है कि राज्य/देश की सरकार चुनने में प्रत्येक व्यक्ति के मत का मान बराबर है। कोई किसी से कम या अधिक महत्व नहीं रखता। कुल मतदाताओं में से बहुमत जिसके पक्ष में हो, वही सरकार बनाता है। इस सरकार द्वारा जो भी निर्णय लिए जाते हैं वह उन अल्पमत वाले नागरिकों पर भी प्रभावी होता है जिनका मत इस सरकार के विरुद्ध रहा है।

सिद्धान्त रूप में इस व्यवस्था में कोई कमी नहीं नज़र आती; लेकिन व्यवहार में बहुत कुछ बदला हुआ नजर आता है। प्लेटो ने इन बदलावों पर कुछ प्रकाश डाला था। बहुमत की पसन्द कौन होता है? लोकप्रियता का पैमाना क्या है? व्यक्ति अपना नेता किसे चुनता है? जिसे देश की सम्पूर्ण जनता का ख़्याल रखना है; आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, सामरिक, राजनयिक, वाणिज्यिक आदि विषयों से सम्बन्धित लोकनीति बनानी है, उसका चुनाव करते समय जनता इन विषयों में उसकी प्रवीणता देखने के बजाय उसकी जाति, उसका धर्म व रंग देखती है; उसकी वक्तृता पर मोहित हो जाती है, किसी दूसरे क्षेत्र में उसके कौशल से प्रभावित हो लेती है; और अपना नेता चुन लेती है।

अच्छी भाषण कला में माहिर एक नेता किसी स्वास्थ्य सम्बन्धी मुद्दे पर आम जनता का मत एक डॉक्टर की अपेक्षा अधिक आसानी से बदल सकता है। वह कमजोर और निरीह नागरिकों  को भी शत्रु देश पर हमले के लिए तैयार कर सकता है, जो एक आर्मी-जनरल नहीं कर सकता। जनप्रतिनिधियों द्वारा प्रभावशाली भाषण के माध्यम से बड़े-बड़े जनसमूहों को सम्मोहित कर बेवक़ूफ बनाने और उनके अन्ध-समर्थन से अत्यन्त शक्तिशाली बन जाने के उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है।

फ्रेडरिक नीत्शे कहते थे कि उन्माद, पागलपन, मूर्खता या विक्षिप्तता के लक्षण किसी व्यक्ति के भीतर किंचित्‌ ही पाये जाते हैं; लेकिन एक समूह, दल, राष्ट्र या किसी ऐतिहासिक कालखण्ड में ये लक्षण एक अनिवार्य नियम जैसे मिलते हैं। एक भीड़ या समूह का हिस्सा बन जाने पर व्यक्ति के सोचने समझने का ढंग पूरी तरह बदल जाता है। भीड़ में उसकी मानसिकता भेंड़ जैसी हो जाती है। विवेक भ्रष्ट हो जाता है। इसी भीड़ द्वारा चुने गये प्रतिनिधि जब सरकार चलाते हैं तो सुकरात को जहर का प्याला पीना पड़ता है।

भारतवर्ष में लोकतंत्र का जो मॉडल चलाया जा रहा है, उसमें भी इस उत्कृष्ट सिद्धान्त का व्यावहारिक रूप किसी धोखे से कम नहीं है। यहाँ का समाज भी जाति, धर्म, कुल, गोत्र, क्षेत्र, रंग, रूप, अमीर, गरीब, अगड़े, पिछड़े, दलित, सवर्ण, निर्बल, सबल, शिक्षित, अशिक्षित, शहरी, ग्रामीण, उच्च, मध्यम, निम्न, काले, गोरे, स्त्री, पुरुष, आदि के पैमानों पर इतना खण्ड-खण्ड विभाजित है; और ये पैमाने हमारी लोक संस्कृति में इतनी गहरी पैठ बना चुके हैं, कि किसी भी मुद्दे पर आम सहमति या सर्वसहमति नहीं बनायी जा सकती। राष्ट्र-राज्य की परिकल्पना से हम कोसों दूर हैं। ऐसे में बहुमत का अर्थ मात्र दस-पन्द्रह प्रतिशत मतों तक सिमट जाता है। शेष मत विखण्डित होकर इस आँकड़े से पीछे छूट जाते हैं।

कोई भी राजनेता यदि इस गणित को ठीक से समझ लेता है तो वह उन्हीं दस-पन्द्रह प्रतिशत मतों को अपने पक्ष में सुनिश्चित हुआ जानकर सन्तुष्ट हो लेता है, और यह सन्देश भी देता है कि उनके हितों की रक्षा के लिए वह कुछ भी कर सकता है। सारे नियम-कायदे ताख़ अपर रख सकता है; दूसरे समूहों को सार्वजनिक रूप से गाली दे सकता है; साम्प्रदायिक हिंसा करा सकता है; मार-पीट, झगड़ा-लड़ाई, अभद्रता और गुण्डागर्दी से यदि उनका स्वार्थ सधता है तो उसका सहारा लेने में तनिक भी संकोच नहीं करता है। विरोधी मतवाले वर्ग के विरुद्ध खुलेआम अत्याचार और दुर्व्यवहार करने से यदि उसके पीछे खड़ी उन्मादी भीड़ तालिया पीटती है तो इस तथाकथित जनप्रतिनिधि को वह सब करने में कोई गुरेज़ नहीं है।

ऐसी हालत में लोकतन्त्र के चार उपहार- स्वतंत्रता, समानता, भ्रातृत्व व न्याय एक बड़े वर्ग के हाथ से छीन लिए जा रहे हैं, और इन्हें लोकतन्त्र के भस्मासुर अपनी चेरी बनाकर रखने में सफल हो रहे हैं। आजकल अखबारों की सुर्खिया ऐसे समाचारों से भरी पड़ी हैं जहाँ नेता जी अपनी बात मनवाने के लिए प्रशासन के अधिकारियों को मारने-पीटने से लेकर उनकी हत्या कर देने से भी गु़रेज नहीं करते। राजनैतिक पार्टियों द्वारा आपसी रंजिश में एक दूसरे पर राजनैतिक हमले करना तो अब पुरानी बात हो गयी है। अब तो सीधे आमने-सामने दो-दो हाथ कर लेने और विरोधी के जान-माल को क्षति पहुँचाने का काम भी धड़ल्ले से किया जा रहा है।

क्या हम प्लेटो के मूल्यांकन को आधुनिक सन्दर्भ में भी सही होता नहीं पा रहे हैं? 

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पैदाइशे इन्सान न रोको लोगों…!

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चुनावी ड्यूटी से फारिग़ होने के बाद अगले दिन कार्यालय में काम कुछ हल्का ही था। एक सीनियर अफ़सर मेरे कमरे में आये तो मैंने उनका खड़ा होकर स्वागत किया। मेरे अन्दाज में कुछ अतिरिक्त गर्मजोशी अनायास ही आ गयी थी क्यों कि वे शायराना तबीयत के मालिक हैं। ग़ज़लें और नज्में लिखते हैं। ‘क्लीन शेव’ मुसलमान हैं। उनकी बातों से दकियानूसी या कट्टर ख़्याल की बू कभी नहीं आयी थी। अच्छी तालीम हासिल किए होंगे तभी अधिकारी बने हैं। मेरे मन में उनके प्रति यही भाव बने हुए थे।

मैने उनसे उर्दू अदब और ग़ज़लकारी की कुछ चर्चा की। उन्होंने बताया कि उनकी चार-पाँच किताबें उर्दू एकेडेमी से छप चुकी हैं। फै़ज़ अहमद फैज़ ने उनकी पीठ ठोकी है। फिराक़ साहब ने भी प्रशंसा में सिर हिलाया है…। मैने शिकायत की कि आपने हिन्दी (देवनागरी) में प्रकाशन क्यों नहीं कराया तो बोले प्रकाशक नहीं मिला। मैंने अफ़सोस जताया।

मैने उनसे ग़ज़ल, नज़्म और रुबाई आदि के बारे में कुछ जानना चाहा। अनाड़ी जो ठहरा। वे कुछ उदाहरण देकर मुझे समझा रहे थे। मेरे जैसा चेला पाकर वे उत्साहित भी लग रहे थे। तभी एक गजब हो गया…

उन्होंने कहा कि ये चार लाइनें सुनो…। यह गवर्नमेण्ट की पॉलिसी के खिलाफ़ है इसलिए मैने इसे कहीं साया (प्रकाशित) नहीं कराया है। लेकिन यह एक वजनदार बात है। उम्मीद है तुम्हें पसन्द आएगी।

उनकी ये चार लाइनें सुनने के बाद मैने सिर पकड़ लिया। मन में बेचैनी होने लगी कि नाहक इन्हें उस्ताद बनाने को सोच रहा था। कोफ़्त इतनी बढ़ गयी कि वार्ता बन्द करके उठ गया… इतना निकल ही गया कि सर! यह तो पब्लिक पॉलिसी और नेशनल पॉलिसी के भी खिलाफ़ है…।

अच्छा हुआ ये कहीं प्रकाशित नहीं हुआ। लेकिन उनके मन की खिड़की में झाँककर जो देख लिया उससे आपको परिचित जरूर कराना चाहूंगा। पता नहीं यह नैतिक है या नहीं लेकिन जिस सोच से मैं परिचित हुआ  वो चिन्तित करने वाली जरूर है…

उन्होंने फ़रमाया…

तामीरे तनो-जान न रोको लोगों

ये नस्ले परीशान न रोको लोगों

शायद कोई इन्सान निकल ही आये

पैदाइशे इन्सान न रोको लोगों

(तामीरे तनो जान= शरीर और प्राण का निर्माण)

अचानक हुए इस मानसिक आघात्‌ से मैं हतप्रभ होकर अपने बॉस के कमरे में चला गया। वो बहुत व्यस्त थे। अपनी पीड़ा बताने के अवसर की प्रतीक्षा में मैने सामने पड़े कागज के टुकड़े पर ये चार लाइनें भी लिख डाली…

हो रहा मुल्ला परेशान न रोको लोगों

देश बन जाये पाकिस्तान न रोको लोगों

दिवाला निकले देश का कि मुसीबत आये

निकल जो आये तालिबान न रोको लोगों

 

आप इस बारे में क्या सोचते हैं? क्या यह हकीकत चोट पहुँचाने वाली नहीं है? आप इसमें कुछ जोड़ना चाहेंगे क्या?

(सिद्धार्थ)

उफ्फ्‌ ये नर्वस नाइण्टीज़…

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मेरी पिछली पोस्ट छपे दस दिन हो गये। यह सत्यार्थमित्र पर ९९वीं पोस्ट थी यह दे्खकर मेरा मन मुग्ध हो गया था। शतक से बस एक पोस्ट दूर था मैं। यानि अगली बार राइटर में ‘पब्लिश’ बटन दबाते ही मैं शतकवीर हो जाउंगा। सहसा हवा में बैट उठाकर पैबेलियन की ओर अभिवादन करते, फिर एक हाथ में हेलमेट और दूसरे में बल्ला पकड़े, बाँहें फैलाए आसमान की ओर देखकर किसी देवता को धन्यवाद देते सचिन का चेहरा मेरे मन की आँखों के आगे घूम गया।

nervous 90s

क्या यादगार क्षण होते हैं जब शतक जैसा एक मील का पत्थर पार किया जाता है। इसका मुझे प्रत्यक्ष अनुभव होने वाला था। मैने सोचना शुरू कर दिया कि इस नम्बर पर मैं कलमतोड़ लिखाई करूंगा। यादगार पोस्ट होगी। एक बार में ही समीर जी, ज्ञान जी, फुरसतिया जी, ये जी, वो जी, सबकी छुट्टी कर दूंगा। बस छा जाऊंगा। …यह भी सोच डाला कि जल्दबाजी नहीं करूंगा। फुरसत में सोचकर बढ़िया से लिखूंगा।

आदमी अपनी शादी के समय जिस तरह की योजनाएं बनाता है, सबसे अच्छा कपड़ा लेकर, सबसे अच्छा केश-विन्यास (हेयर स्टाइल) बनाकर, इत्र-फुलेल, चमकते जूते, ताजा इश्तरी, गर्मियों में भी कोट और टाई, आदि से सजधजकर, सभी दोस्तों-मित्रों व रिश्तेदारों के बीच सजी धजी गाड़ी में राजकुमार जैसा दिखने की जैसी लालसा करता है वैसी ही कुछ हलचल मेरे मन में होने लगी। ऐसा मौका रोज-रोज थोड़े ही आता है…। ये बात अलग है कि नाच-कूदकर जब दूल्हा ससुर के दरवाजे पर बारात लिए पहुँचता है तबतक सबकुछ हड़बड़ी में बदल चुका होता है। मुहूर्त निकला जाता है।

विषय के चयन को लेकर मन्थन शुरू हुआ। होली के बीतने के बाद हँसी-ठट्ठा का माहौल थोड़ा बदल लेना चाहिए इसलिए कोई हल्का-फुल्का विषय नहीं चलेगा। राजनीति में उबाल आ तो रहा है लेकिन मुझे इसपर लिखना नहीं है। सरकारी नौकर जो ठहरा। साहित्य की रचना करूँ भी तो अनाधिकार चेष्टा होगी, क्योंकि मैंने साहित्य का विषय पढ़ा ही नहीं है। बड़ी से बड़ी कोशिश में भी औसत से भी कम दर्जे की कविता बना पाऊंगा। इस मुकाम पर ऐसा कैसे चल पाएगा? सामाजिक मुद्दों पर लिखना भी बहुत अच्छा रिस्पॉन्स नहीं देता। वही दस-बारह लोग जो हमें पहले से ही जानते हैं, यहाँ आकर कुछ टीप जाएंगे। ट्रैफिक बढ़ाने की ताकत इन मुद्दों में भी नहीं है।

तो क्या कुछ विवादित बात की जाय जिससे क‍इयों की सुग्राही भृकुटियों का तनाव हमारी ओर लक्षित हो जाय। कुछ लोग तो तैयार मिलेंगे ही बमचक के लिए…। 

लेकिन जूतम-पैजारियत की संभावनाओं वाला लेखन मुझे सीखना अभी बाकी है। सत्यार्थमित्र की इस संकल्पना का क्या होगा?

“हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।”

फिर क्या लिखें फड़कता हुआ…?

यही सोचते विचारते पूरा सप्ताह निकल गया। ऑ्फ़िस से घर, घर से ऑफिस आते-जाते, चिन्तन-मनन करते एक कालजयी रचना का शीर्षक तक नहीं सूझ सका। शिवकुमार जी से बात की तो बोले ठाकुर बाबा जैसा कुछ लिख मारिए। …हुँह! मुझे किसी ‘जैसा’ तो लिखना ही नहीं है। मुझे तो बस अद्वितीय लिखना है। वह जो पिछली निन्यानबे पोस्टों में न रहा हो।

पत्नी को एक सप्ताह के लिए मायके जाना था तो बोलीं कि मेरे जाने से पहले शतक पूरा कर लेते। मैं था कि आइडिया ढूँढ नहीं पा रहा था। विदा लेते समय बोलीं,

“जा रही हूँ, …आपकी पोस्ट वहीं पढूंगी। घर में अकेले रहिएगा। जी भर लिखिएगा और ब्लॉगरी करिएगा। …कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा।”

मैं झेंपने जैसा मुँह बनाकर भी भीतर से मुस्करा रहा था। बात तो सही थी। जितना चाहूँ कम्प्यूटर पर बैठूँ? कोई टोकने वाला नहीं। एक ब्लॉगर को और क्या चाहिए?

लेकिन चाह से सबकुछ तो नहीं हो सकता न…! कोई झन्नाटेदार आइटम दिमाग में उतरा ही नहीं। इसलिए सीपीयू का बटन ऑन करने में भी आलस्य लगने लगा। मैं टीवी पर वरुण गान्धी का दुस्साहसी भाषण सुनता रहा। चैनेल वालों की सनसनी खेज कवरेज देखता रहा जैसे मुम्बई पर हमले के वक्त देखता था। सोचने लगा कि चलो कम से कम एक नेता तो ऐसा ईमानदार निकला जो जैसा सोचता है वही बोल पड़ा। अन्दर सोचना कुछ, और बाहर बोलना कुछ तो आजकल नेताओं के फैशन की बात हो गयी है। …लेकिन दिल की बात बोल के तो बन्दा फँस ही गया। तो ऐसे फँसे आदमी के बारे में क्या लिखा जाय?

इसी उधेड़ बुन मे नरभसा रहा था तभी अनूप जी ‘फुरसतिया’ हमारे तारणहार बनकर फोन से हाल-चाल लेने आ गये। उनका टेण्ट उखड़ने से थोड़ी मौज की हलचल दूसरे हल्कों में उठ गयी थी। उसी को समेटने के चक्कर में उन्होंने मुझे गुरुमन्त्र दे दिया कि जब ऐसी सोच हावी होने लगे कि बहुत कलमतोड़ लिखाई करनी है तो सावधान हो जाइए। झटपट एक घटिया पोस्ट लिख मारिए ताकि इस दलदल में धँसना न पड़े। …यह भी कि घटिया लिखने के अनेक फायदों में से एक यह भी है कि उसके बाद सुधार और विकास की सम्भावना बढ़ जाती है। उन्होंने दो मजबूत सूत्र और बताए हैं:

1.अगर आप इस भ्रम का शिकार हैं कि दुनिया का खाना आपका ब्लाग पढ़े बिना हजम नहीं होगा तो आप अगली सांस लेने के पहले ब्लाग लिखना बंद कर दें। दिमाग खराब होने से बचाने का इसके अलावा कोई उपाय नहीं है।

2.जब आप अपने किसी विचार को बेवकूफी की बात समझकर लिखने से बचते हैं तो अगली पोस्ट तभी लिख पायेंगे जब आप उससे बड़ी बेवकूफी की बात को लिखने की हिम्मत जुटा सकेंगे।-(ब्लागिंग के सूत्र से)

फिर क्या था। मेरी ‘लिथार्जी’ खतम हो गयी। …लेकिन कम्प्यूटर पर बैठना तबतक न हो पाता जबतक एक घटिया पोस्ट का विषय न मिल जाय। इसमें भी एक दिन लग गया। आखिरकार मैं अपने सपने की नश्वरता को पहचान कर वास्तविक धरातल पर लैंड कर गया। यह पोस्ट जबतक आपके सामने होगी तबतक मेरी धर्मपत्नी भी मायके से लौ्टकर यहाँ पहुँचने की राह में होंगी।

पुछल्ला: जब एक तस्वीर के जुगाड़ के लिए गूगल महराज से ईमेज सर्च करने के लिए nervous nineties टाइप करके चटका लगाया तो सबसे अधिक जो तस्वीरें आयीं वह उसी तेन्दुलकर की थीं जिसे दस दिन पहले ही मेरे मन की आँखों ने देखा था। आपभी आजमा कर देख लीजिए। मैं तो चला  फिरसे  आत्ममुग्ध होने। आप भी इस शतक का अपनी तरह से आनन्द उठाइए। नहीं तो मौज ही लीजिए…।

(सिद्धार्थ)

खामोशी में ऐसे मनाया छः दिसम्बर… ॥

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मेरी पिछली पोस्ट पर टिप्पणी देते हुए कार्तिकेय ने सत्यार्थ को जन्मदिन की शुभकामना दी है। जी हाँ, पिछले छः दिसम्बर को सत्यार्थ (मेरा बेटा) दो साल का हो गया। इस बार पारिवारिक रीति से सादगी पूर्वक जन्मदिन याद किया गया। हाँलाकि दिनभर ‘हैप्पी बर्डे’ और ‘थेंकू’ की रटंत होती रही, लेकिन नये कपड़े, खिलौने और चाकलेट की खुशी छोड़ दें तो उस मासूम को इस दिन में नया कुछ भी नहीं लगा होगा। रोज ही कुछ नये शब्द सीख रहा है। उसी कड़ी में ये शब्द भी उसके शब्दकोश में जुड़ गये होंगे।

अलबत्ता उसकी बड़ी बहन वागीशा अधिक उत्साहित थी। साढ़े आठ साल की उम्र में उसे यह बताना कि यह वक्त पार्टी लायक नहीं है, मुझे गैर-जरूरी लगा। उसकी अपेक्षा के अनुरुप घर में ही कुछ पारिवारिक मित्रों व उनके बच्चों को बुला लिया गया, और पार्टी भी हो ली। सत्यार्थ को टीका लगाने की औपचारिकता और भगवान की पूजा भी घर के मन्दिर में ही की गयी। कहीं बाहर जाकर घूमने का मन नहीं हुआ।

सत्यार्थमित्र पर भी इसकी तत्समय चर्चा करने का मन नहीं हुआ। उस दिन मुम्बई के आतंकी हमलों के बाद बने राष्ट्रीय परिदृश्य में बाबरी मस्जिद की बरसी पर सारा देश सहमा हुआ सा किसी बुरी घटना की आहट पर कान लगाए बैठा था। मेरे मन में भी यही कुछ चल रहा था। मेरी धर्मपत्नी ने भी इसे भाँपकर चुप्पी लगा ली थी।

मेरे गुरुदेव ज्ञान जी भी एक मालगाड़ी के पटरी से उतर जाने पर अचानक व्यस्त हो गये और नहीं आ सके।

मेरे मन में भारतवर्ष की बेचारगी टीस रही थी। कुछ विक्षिप्त नौजवानों द्वारा धर्म की अफीम खाकर मानवता को जार-जार करते हुए कथित तौर पर चन्द रूपयों से अपने परिवार की दरिद्रता मिटाने के लिए जो आपराधिक कुकृत्य किया गया था, उसका असर दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र और एक सम्प्रभु राष्ट्र की अस्मिता पर प्रश्नचिह्न लगाने वाला हो चुका था। साठ साल पहले जो हमें छोड़कर धर्म के आधार पर अलग हो गये वही आज फिर से हमारी छाती चीरने के लिए गोलबन्द होकर हमले कर रहे हैं, और हम कातर होकर दुनिया के चौकीदारों से गुहार कर रहे हैं।

इसी मनःस्थिति में मैने पिछली पोस्ट में यह बात रखी कि “हम अक्षम हैं… इसलिए बेचैन हैं…।” इसपर प्राप्त टिप्पणियों से यह बात और पुष्ट होती गयी। आदरणीय ज्ञानजी, समीर जी, अभिषेक जी, और राजभाटिया जी भी इसी मत के मिले। श्रद्धेय डॉ. अमर कुमार ने एक एतराज दर्ज तो किया लेकिन वह भी केवल सही शब्द के चयन को लेकर था। वस्तुतः वह भी अक्षमता को स्वीकार करते हैं।

मेरे प्रिय कार्तिकेय भारतीय संविधान में अपनी श्रद्धा को अभी भी अक्षुण्ण रखने के पक्षधर लगे। उन्हें इसमें कोई कमी नजर नहीं आती। वे लिखते हैं कि-

…इस निष्क्रियता के लिए संविधान को जिम्मेदार ठहराना अनुचित होगा.गलती संविधान की धाराओं में नही, बल्कि उनके स्वयंसिद्ध इंटरप्रेटशंस की है. ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार हमारी धर्मान्धता और कट्टरता के लिए उदारवादी वेदों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.

मेरे विचार से आवश्यकता संविधान में परिवर्तन की नहीं, अपितु उसको क्लेअर -कट परिभाषित करने की है….

यानि कि सुस्पष्ट परिभाषा की आवश्यकता अभी बनी हुई है। मेरा मानना है कि जिस चुनावी प्रणाली से जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा, लिंग और अगड़े – पिछड़े की संकुचित राजनीति करने वाले, भ्रष्ट, माफिया और लम्पट किस्म के जनप्रतिनिधि चुनकर सत्ता के गलियारों को दूषित करने पहुँच जा रहे हैं; और फिर भी इस प्रणाली को संविधान सम्मत मानना हमारी मजबूरी है, तो कुछ तो सुधार करना ही पड़ेगा।

चुनावों में मोटे तौर पर १०० मतदाताओं में से १०-१२ का वोट पाने वाला प्रत्याशी सत्ता की कुर्सी पर काबिज हो जाता है। क्योंकि ५०-५५ लोग तो वोट डालने जाते ही नहीं और ३०-३५ लोगों के वोट दर्जनों अन्य प्रत्याशी आपस में बाँट कर हार जाते हैं। इसी कारण से नेता जी लोग एक खास सीमित वर्ग के वोट जुटाने लायक नीतियों की खुलेआम अभ्यर्थना उन्हें खुश करने के लिए करते हैं, और साथ ही अन्य वर्गों के बीच आपसी कटुता और वैमनस्य के बीज बोते जाते हैं। आज के एक अत्यन्त लोकप्रिय और सफल केन्द्रीय मन्त्री जो पहले मुख्यमन्त्री रह चुके हैं, उन्होंने तो अपने वोटरों को निरन्तर पिछड़ेपन और अशिक्षा के दलदल में फँसाये रखने की नीति की लगभग घोषणा ही कर रखी थी। उन्हें बिजली, सड़क, पानी, शिक्षा और अखबार की पहुँच से सायास दूर रखने की मानो नीति ही लागू थी।

दुनिया में ऐसी चुनाव प्रणालियाँ भी हैं जहाँ जीतने के लिए कम से कम ५० प्रतिशत वोट पाना आवश्यक है। सभी मतदाताओं के लिए अपना मत डालना अनिवार्य है, न डालने पर जुर्माना है। कदाचित्‌ मतपत्र में एक विकल्प सभी प्रत्याशियों को नकारने का भी है। क्या भारत में ऐसा हो जाने के बाद भी राजनेता अपनी छवि संकुचित दायरे में बना कर सफल हो पाएंगे? आज विडम्बना यह है कि देश में एक सच्चे जननायक और सर्वप्रिय नेता का अकाल पड़ा हुआ है। बहुत से माननीय सांसदों और विधायकों की प्रोफाइल देखकर सिर शर्म से झुक जाता है।

एक बार जैसे-तैसे चुन लिए जाने के बाद बड़े से बड़ा अपकृत्य करने का और बच निकलने का लाइसेन्स इनके हाथ लग जाता है। संविधान में जो दायित्व दिये गये हैं उनके प्रति इनमें कोई जवाबदेही नहीं दिखायी देती। यह देश के भाग्य भरोसे है कि माननीय इसे किस रसातल तक ले जाकर छोड़ने को तैयार हैं। इश्कबाजी में उपमुख्यमन्त्री बरखास्त होते हैं। नौबत ये है कि संसद भवन से तिहाड़ आने-जाने का ट्रैफिक बढ़ता जा रहा है। कुछेक जो पढ़े-लिखे और जिम्मेदार वहाँ पहुँच भी जा रहे हैं उनके हाथ किसी अयोग्य मालिक के आगे जुड़े ही रहते हैं, और बँधे भी।

स्कन्द शुक्ला अपनी अंग्रेजी टिप्पणी में सवाल करते है कि यदि यह हमला किसी निम्नवर्गीय स्थल पर हुआ होता तो भी क्या ऐसी ही प्रतिक्रिया देखने को मिलती। रेलवे स्टेशन और कामा हॉस्पिटल पर भी हमले हुए लेकिन जितने टीवी कैमरे पंचसितारा होटलों पर फोकस किए गये उतने बाकी जगहों पर नहीं थे। इस बार शायद मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग को आतंकी खतरे का अनुभव कुछ ज्यादा ही हो गया है। आशा की जानी चाहिए कि उनके इस गुस्से का प्रस्फुटन चुनावों के समय अधिक मतदान के रूप में सामने आयेगा। उनका प्रश्न यह भी है कि हम अपनी ही चुनी हुई सरकार की आलोचना क्यों कर रहे हैं। इन्हें हमलों के बाद हुए मतदान के आँकड़े कुछ आशा बँधाते हैं कि शायद मध्यम वर्ग अपनी दोपहर की मीठी नींद से जाग रहा है।

लेकिन मुझे फिलहाल कोई आशा नहीं नजर आती। क्योंकि इस प्रकार के संकट से निपटने में हमारी कमजोरी सिर्फ एक मोर्चे पर नहीं है। इसका प्रसार चारो ओर है। कार्यपालिका की मानसिक दृढ़ता में कमजोरी, न्यायपालिका की जायज-नाजायज सीमाएं, विधायिका की अयोग्यता, भू-राजनैतिक परिस्थितियाँ, भौगोलिक स्थिति, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, राजनैतिक शासन प्रणाली, धार्मिक विश्वास और परम्परा, सामाजिक संघटन (composition of society ), निकम्मा राष्ट्रीय नेतृत्व, क्षीण इच्छा शक्ति, सर्वव्यापी भ्रष्टाचार, चारण-संस्कृति… दुष्ट, लापरवाह और पतनशील पड़ोसी। कहाँ तक गिनाऊँ… सूची अनन्त है।

फिर तो हमें बड़े परिवर्तन के लिए कमर कसना होगा। चलते-चलते ये पंक्तियाँ मन में मचल रही हैं, सो लिख ही देता हूँ।

सबने मिलबैठकर ये जान लिया,
मर्ज़ क्या है इसे पहचान लिया।
अब तो बस खोजनी दवाई है;
वो भी मिल जाएगी जो ठान लिया॥

(सिद्धार्थ)

पुनश्च :
कुछ टिप्पणियों के स्नेह और आशीष से प्रेरित होकर वागीशा और सत्यार्थ की एक तस्वीर लगा रहा हूँ। आप सबके स्नेह का शुक्रिया।

हम अक्षम हैं इसलिए बेचैन हैं…!

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मुम्बई में हुए आतंकी हमले के बाद एक आम भारतवासी के मन में गुस्से का तूफान उमड़ पड़ा है। सरकार की कमजोरी, खुफिया संगठनों की नाकामी, नेताओं की सत्ता लोलुपता, कांग्रेस में व्याप्त चारण-संस्कृति, राष्ट्रीय मुद्दों पर आम सहमति के बजाय जाति, धर्म, क्षेत्र और दल आधारित राजनीति की खींचतान, शासन और प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार और इससे उपजी दोयम दर्जे की कार्यकुशलता, विभिन्न सरकारी संगठनों में तालमेल का अभाव आदि अनगिनत कारणों की चर्चा से मीडिया और अखबार भरे पड़े हैं। जैसे इन बुराइयों की पहचान अब हो पायी है, और पहले सबकुछ ठीक-ठाक था। जैसे यह सब पहले से पता होता तो शायद हम सुधार कर लिए होते।

पहले के आतंकी हमलों की तुलना में इस बार का विलाप कुछ ज्यादा समय तक खिंच रहा है। आमतौर पर संयत भाषा का प्रयोग करने वाले लोग भी इसबार उग्र हो चुके हैं। पाकिस्तान पर हमले से लेकर आतंकी ठिकानों पर हवाई बमबारी करने, कांग्रेसी सरकार के प्रति विद्रोह करने, लोकतान्त्रिक व्यवस्था समाप्त कर देश की कमान सेना के हाथों में सौंप देने, जनता द्वारा सीधी कार्यवाही करने जैसी बड़ी बातों के अलावा टैक्स नहीं जमा करने, गली कूचों में पाकिस्तानी झण्डा फहराने वालों को सबक सिखाने, उर्दू बोलने वालों और जालीदार सफेद टोपी पहनने वालों की देशभक्ति पर सवाल खड़ा करने और यहाँ तक कि लिपिस्टिक-पाउडर तक की ओछी बातें भी आज राष्ट्रीय बहस का विषय बन गयी हैं।

दूसरों की खबर देते-देते भारतीय मीडिया भी खुद ही खबर बन गयी है। आतंकवादियों को कमाण्डो ऑपरेशन का सीधा प्रसारण ताज के भीतर टीवी पर दिखाकर इनके क्राइम रिपोर्टरों ने अपनी अच्छी फजीहत करा ली। एन.एस.जी. कमाण्डो की कार्यवाही देखकर इनकी प्रशंसा और आलोचना के स्वर बराबर मात्रा में उठ रहे हैं। हम तो मुग्ध होकर इनकी बहादुरी पर वाह-वाह कर रहे थे तभी अपने देश में आतंकवाद के विरुद्ध निरन्तर मोर्चा सम्हाल रहे इस्राइली विशेषज्ञों ने इनकी कमजोर तैयारी और असुरक्षित मोर्चाबन्दी की पोलपट्टी उजागर कर दी। तो क्या मन्त्रियों और नेताओं के चारो ओर शोभा की वस्तु बने ये चुस्त-दुरुस्त जवान उतने कुशल नहीं निकले जितना होना चाहिए? भारी कनफ्यूजन है, मन में खलबली है। सारी दुनिया हम पर हँस रही है और हम बड़े-बड़े बयान देते जा रहे हैं।

‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के सम्पादक वीर संघवी ने अपने रविवासरीय लेख में इस जबानी जमा-खर्च और पागल हाथी जैसे व्यवहार का कारण बताते हुए लिखा है कि दरअसल हम कुछ भी कर पाने में अक्षम हैं इसीलिए दिशाहीन होकर लफ़्फ़ाजी कर रहे हैं।

यह बात कितनी सही है इसपर विचार करना चाहिए। करीब सवा करोड़ की जनसंख्या वाले देश में आजादी के साठ साल बाद भी यह हालत है कि हमारे पास एक निर्विवाद, निष्कलुष और देशभक्त नेता नहीं है जो सभी प्रकार से भारत का नेतृत्व करने में सक्षम हो। पाश्चात्य और ईसाई संस्कारों में पली-बढ़ी एक विदेशी महिला के हाथ में सर्वोच्च सत्ता की चाभी है जिसके इशारे पर सारे सत्ताधारी नेता उठक-बैठक करने को तैयार हैं। त्रासदी यह है कि यह विडम्बनापूर्ण स्थिति किसी चुनावी धाँधली या सैनिक विद्रोह से नहीं पैदा हुई है, बल्कि इस देश के संविधान के अनुसार विधिवत् सम्पन्न कराये गये स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के फलस्वरूप बनी है। यानि हमारे देश की जनता अपने को इसी नेतृत्व के लायक समझती है।

सोनिया गान्धी के बारे में कोई भी विरोधी बात आपको भारतीय संस्कृति और सभ्यता के विरुद्ध खड़ा कर सकती है, पोलिटिकली इनकरेक्ट बना सकती है; और कांग्रेस के भीतर रहकर ऐसा करना तो आपके अस्तित्व के लिए संकट खड़ा कर सकता है। इस सम्बन्ध में भारतीय हाई-कमान के विरुद्ध एक रोचक आरोप-पत्र यहाँ पढने को मिला। यह एक फ्रान्सीसी पत्रकार फ्रांस्वाँ गातिये द्वारा भारत की आन्तरिक राजनीति और सामाजिक सोच की विकलांगता पर तीखा व्यग्य है।

हम सभी जानते हैं कि पाकिस्तान जैसे दुष्ट पड़ोसी के कारण ही हमें ऐसे दिन देखने पड़ रहे हैं। हम यह भी जानते हैं कि मुस्लिम वोटबैंक की लालच हमारे देश के नेताओं को इनके भीतर पनप रही राष्ट्रविरोधी भावना पर लगाम लगाने में रोड़ा डाल रही है। लेकिन हम इन दोनो बुराइयों पर लगाम लगाने में असमर्थ हैं। हम ब्लैकमेल होने के लिए सदैव प्रस्तुत हैं। एक अपहृत हवाई जहाज में सफर कर रहे कुछ भारतीयों की जान बचाने के लिए अपनी जेलों में बन्द बर्बर आतंकवादियों को बाइज्जत रिहा करके हम अपनी कमजोरी पहले ही जतला चुके हैं। भले ही उन विषधरों ने उसके बाद कई गुना भारतीयों की हत्या कर दी हो। उस गलती को सुधारने के बजाय कांग्रेसी उसी का नाम लेकर अपने निकम्मेपन को जायज ठहराते रहते हैं। अफ़जल गुरू को फाँसी नहीं देने के सवाल पर कहते हैं कि जब भाजपा अफजल गुरू के गुरु मौलाना मसूद अजहर को फिरौती में कन्धहार छोड़ कर आ सकती है तो हम फाँसी क्यों दें? यानि भारतीय राजनीति में निर्लज्जता की कोई सीमा नहीं हो सकती।

देश की वर्तमान हालत यही बताती है कि यदि हमारे संविधान में कोई आमूल-चूल परिवर्तन करके एक सच्चे राष्ट्रभक्त जननायक को सत्ता के शिखर पर पहुँचाने का मार्ग प्रशस्त नहीं किया गया, राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रविरोधी मानसिकता का पोषण और प्रसार करने वालों की पहचान कर उनका संहार नहीं किया गया, पकड़े गये आतंकवादियों के विरुद्ध कठोर सजा सुनिश्चित नहीं की गयी और देश की बहुसंख्यक आबादी की सभ्यता और संस्कृति का सम्मान अक्षुण्ण नहीं रखा गया तो वह दिन दूर नहीं जब हम एक बार फिर से गुलाम देश होने को अभिशप्त हो जाँय।