मान गये जबलपुर की मिट्टी में ब्लॉगिंग का कीड़ा है…

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स्थान: जबलपुर का एक कार वर्कशॉप

समय: दोपहर के १२: ३० बजे

अपनी निजी कार से वर्धा से इलाहाबाद के लिए निकलते समय यह कत्तई नहीं सोचा था कि रास्ते में रुककर ब्लॉग पोस्ट लिखने का मौका मिलेगा। लेकिन किसी अदृश्य शक्ति ने मानो मुझे धकेलकर यहाँ बैठा दिया है। मुझे इलाहाबाद की यात्रा सड़कमार्ग से करने की योजना अचानक नहीं बनानी पड़ी। पूरा सोच समझकर पहले से तैयारी थी। लेकिन गड़बड़ तो हो ही गयी।

विश्वविद्यालय परिसर के सबसे अच्छे ड्राइवर को इसके लिए पहले से ही तैयार कर लिया था। दिशाशूल इत्यादि का विचार करने के बाद आज सुबह पाँच बजे निर्धारित समय पर निकला था। इसके पहले गाड़ी की पूरी सर्विसिंग  भी इसी सप्ताह करा ली थी कि कोई समस्या न आये। ऑयल, फिल्टर, कूलैंट, बैटरी, लाइट इत्यादि के बाद वर्कशॉप वाले की सलाह पर ह्वील बैलेन्सिंग व एलाइनमेन्ट भी करा लिया। पहियों में पहली बार आम हवा के बजाय नाइट्रोजन डलवाया गया। उसने बताया कि यह इनर्ट गैस होती है जो स्थिर ताप की होती है। लम्बी यात्रा में भी पहिए गर्म नहीं होते।

पूरी सावधानी बरतने के बाद मैंने वर्धा से यात्रा प्रारंभ की। नागपुर जल्दी पहुँच गया। भोर का रास्ता सुनसान था। हमारी गाड़ी आगे बढ़ते हुए पहाड़ी जगलों के बीच बने राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-७ पर बढ़ रही थी। अचानक ट्रकों की लम्बी कतार सड़क के किनारे खड़ी मिली। हमारे ड्राइवर ने गाड़ी खड़ी करने के बजाय सड़क की दाहिनी पटरी पर आगे बढ़ते हुए उस बिन्दु तक गाड़ी पहुँचा दी जहाँ सामने से आने वाली गाड़ियों की कतार प्रारम्भ हो रही थी। आमने-सामने खड़े ट्रकों के बीच महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश की सीमा थी जहाँ कई किस्म की जाँच चौकियाँ अपना काम कर रही थीं। ड्राइवर ने बड़ी कुशलता से उस भीड़ के बीच से हमें बाहर निकाल लिया। लेकिन इसके लिए उसे कई बार सड़क छोड़कर किनारे के कीचड़ युक्त गढ्ढों में गाड़ी उतारनी पड़ी।

खैर हम आगे बढ़े और फर्राटे से चलते बने। करीब अस्सी किलोमीटर चलने के बाद ड्राइवर ने अचानक गाड़ी रोक दी। पता चला कि दाहिनी ओर का पिछला पहिया फ्लैट हो चुका है। अब हमारा माठा ठनका। पता नहीं कितनी देर से पंक्चर पहिया चलता रहा। हम स्टेपनी बदलकर आगे बढ़े और अगली ही दुकान पर टायर चेक कराया। पता चला कि रिम पर चलते हुए नये नवेले टायर का कबाड़ा हो चुका है। अब इस जंगल के बीच नया टायर मिलने से रहा। शिवनी, धूमा, लाखनखेड़ा, बर्गी आदि बाजारों में टायर खोजते हम अंततः जबलपुर आ गये हैं। यहाँ टायर मिल गया है। करीब दो सौ किमी. चिन्तित अवस्था में चलते हुए अब हमें सकून मिला है तो यह हाल आपके हवाले कर रहा हूँ। यदि स्टेपनी का कमजोर टायर भी पंक्चर हो जाता तो हम क्या करते?

इस डर को खत्म करने के लिए हमने दो टायर खरीदे। स्टेपनी भी नयी हो गयी। अब इस कथा को ठेलते हुए हम इलाहाबाद की ओर बढ़ रहे हैं। जबलपुर के प्रिय मित्रों से क्षमा याचना सहित कि इच्छा रहते हुए भी हम उनके साथ चाय नहीं पी सके।

जबलपुर की ब्लॉग-उर्वर मिट्टी को हमारा सलाम।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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क्या अखबार का पाठक चिरकुट है…?

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राष्ट्रीय संगोष्ठी में बहस का मुद्दा बना एक प्रबंध संपादक का बयान

देश की प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रतिनिधि इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में जुटे थे। विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता की शिक्षा देने वाले प्रोफ़ेसर, बड़े अखबारों के संपादक और न्यूज चैनेल्स के एंकर सिर जोड़कर वर्धा विश्वविद्यालय के पत्रकारिता के छात्रों और अकादमिकों को मीडिया की असली दुनिया से परिचित करा रहे थे। मिशनरी पत्रकारिता पर बहस चल रही थी। मीडिया द्वारा मिशन छोड़कर व्यावसायिकता की ओर मुड़ जाने पर चिंता व्यक्त की जा रही थी। मीडिया और राडिया के अंतर्सम्बन्ध खंगाले जा रहे थे। तभी एक प्रतिष्ठित अखबार के प्रबंध संपादक ने यह मंतव्य रखा कि जब एक साबुन की टिकिया के लिए लोग अपना अखबार बदल देते हैं तो उनसे प्रतिबद्धता की उम्मीद क्या की जाय। दो-ढाई रूपये देकर क्या उन्होंने अखबार के मालिक को खरीद लिया है जो उससे मिशन और नैतिकता की अपेक्षा करते हैं?

पाठकों को उक्त प्रकार से चिरकुट बताने से पहले उन्होंने पत्रकारों को भी उनकी औकात बताने की कोशिश की। बोले- आप इस भ्रम में मत रहिएगा कि यह राज-काज आपके भरोसे चल रहा है। आपकी स्थिति उस छिपकली जैसी है जो छत से चिपककर यह भ्रम पाल बैठी है कि इसे उसी ने रोक रखा है; या हाथी की पीठ पर बैठी उस मक्खी की तरह है जो उसे छोड़कर अकेले जंगल में इसलिए नहीं जाने देती कि उसके बिना इसकी (हाथी की) रक्षा नहीं हो सकेगी।

उनके पहले के वक्ताओं ने “मिशनरी पत्रकारिता- संदर्भ और प्रासंगिकता” नामक विषय पर बोलते हुए देश में लगातार बढ़ रहे भ्रष्टाचार, माफ़ियागीरी, घोटालों, इत्यादि के परिप्रेक्ष्य में मीडिया की भूमिका पर अनेक सुंदर व्याख्यान दिए थे और भविष्य के मीडियाकर्मियों को उनकी बढ़ती जिम्मेदारियों का बोध कराने का प्रयास किया था। चहुँओर निराशा के घने बादलों के बीच आशा का एक मात्र सूरज समाज के चौथे स्तंभ को बताया गया था। तब प्रबंध सम्पादक जी ने अपनी बात की शुरुआत एक रोचक कहानी से की थी-

बताने लगे- एक वृद्ध मौलवी लैंप पोस्ट के नीचे सड़क पर बहुत देर से कुछ ढूँढ रहा था।  एक नौजवान को उसकी परेशानी देखी नहीं गयी। सहायता करने की गर्ज़ से पूछा- बाबा क्या खोज रहे हो?

“बेटा, मैं अपनी टोपी सी रहा था, अचानक सुई हाथ से गिर गयी। वही ढूँढ रहा हूँ लेकिन मिल नहीं रही है” मौलवी ने तफ़सील से बताया।

“अच्छा बताइए टोपी कहाँ सिल रहे थे और सूई ठीक कहाँ गिरी? मैं खोजता हूँ।” युवक ने सहानुभूति दिखायी।

“बेटा सुई तो मस्ज़िद में गिरी थी लेकिन वहाँ बहुत अंधेरा है इसलिए यहाँ रोशनी में ढूँढ रहा हूँ।”

हाल में ठहाका लगना तय था ही। तालियाँ थमीं तो उक्त वक्ता ने बताया कि आज यहाँ की चर्चा भी कुछ इसी प्रकार की हो रही है। समस्या की असली जड़ जहाँ है उसे कोई नहीं देखना चाहता। सबका समाधान मीडिया से कराना चाहता है। देश की सरकारें भ्रष्ट है, संसद अपना काम नहीं कर पा रही। न्यायालय भी संदेह से परे नहीं रह गये हैं। उद्योगपति तेजी से अपना पैसा बढ़ा रहे हैं। गुप्त गठबंधन हो रहे हैं। हर आदमी लाभ कमाने के उद्यम में लगा है, लेकिन मीडिया को नैतिकता और मिशन का पाठ पढ़ाया जाता है। जब हम मीडिया में प्रोफ़ेशनलिज़्म की बात करते हैं तो इसे गाली समझा जाता है। आजादी से पहले अखबारों ने एक मिशन के साथ काम किया था- देश को गुलामी से मुक्त कराने का मिशन। लेकिन आज स्थिति वैसी नहीं है। आज यह अन्य प्रोफेशन्स की तरह एक पेशा के रूप में क्यों नहीं पहचाना जाना चाहिए? अख़बार या टीवी चैनेल का जो मालिक करोड़ो रुपये का पूँजी निवेश करता है उसे लाभ कमाने के बारे में क्यों नहीं सोचना चाहिए? मात्र दो रूपये में चालीस पृष्ठ का अखबार आपके दरवाजे पर पहुँचाने का प्रबंध करने वाला अखबार मालिक आपके बारे में कितना सोचे जब आप दो रुपये की साबुन की टिकिया पाने के लिए अपना वर्षों पुराना अखबार बदल देते हैं। आपकी कोई प्रतिबद्धता नहीं है तो अखबार चलाने वालों से आप क्या अपेक्षा रखते हैं?

उन्होंने अखबार पहुँचाने वाले हॉकर के प्रति पाठकों के रूखे व्यवहार का वर्णन भी किया कि कैसे वह विपरीत मौसम में भी सुबह छः बजे घर पर अखबार पहुँचाता है और कभी देर हो जाने पर सुबह की चाय का स्वाद खराब कर देने का दोषी बन जाता है। बिना नागा किए तीस दिन अखबार देने के बाद जब वह पैसा लेने पहुँचता है तो महानुभावों को  ‘आज नहीं कल’ का जवाब देते देर नहीं लगती। “ऐसे लोग जब बिना जाने समझे अखबार के मालिक, अखबार के सम्पादक और अखबार के रिपोर्टर पर आरोप लगाते हैं तो मुझे आपत्ति होती है।”

कोई भी व्यवसाय जब प्रारम्भ किया जाता है तो उसकी प्रगति का लक्ष्य निर्धारित किया जाता है। लाभ कमाना एक सर्वमान्य लक्ष्य है। उसके लिए जरूरी उपाय तलाशे जाते हैं और उन्हें अपनाया जाता है। स्वतंत्रता मिलने के बाद पत्रकारिता भी किसी अन्य  व्यवसाय की तरह कुछ लक्ष्यों की पूर्ति के उद्देश्य से आगे बढ़ी। समय के साथ तालमेल बिठा कर चलने वाले सफल हुए। यह कार्य आज भी एक मिशन बना हुआ है, लेकिन इसका स्वरूप बदल गया है। आज पत्रकारिता ‘स्वांतः सुखाय’ नहीं है।

धारा प्रवाह बोलते हुए उन्होंने एक-दो और चुटकुले और आख्यान सुनाये और बोले- यह अजीब स्थिति है कि प्रायः सभी पत्रकार अपने प्रबंधन को कोसते रहते हैं। उनके अनैतिक कार्यों और शोषक प्रवृत्तियों का रोना रोते हैं। लेकिन वे ही जब स्वयं प्रबंधक अर्थात्‌ मालिक बन जाते हैं तो वे सारी मिशनरी बातें हवा हो जाती हैं और वे सभी बुराइयाँ अपना लेते हैं जिन्हें कोसते इनका समय बीता है। फिर उन्होंने जोड़ा कि इन सारी बातों के बावजूद आज भी जब देशहित का मुद्दा उठता है तो देश की पूरी मीडिया एकजुट होकर आवाज उठाती है। उन्होंने इसके कई उदाहरण भी गिना डाले।

अपने को एक अदना सा पत्रकार बताते हुए उन्होंने ‘छोटे-छोटे प्रयासों का महत्व’ रेखांकित करने के लिए उस गिलहरी की कथा सुनायी जिसने समुद्र पर रामसेतु के निर्माण की प्रक्रिया में योगदान कर्ताओं की सूची में अपना नाम लिखाने के लिए बार-बार तट पर लोटपोट कर शरीर में रेत बटोरने और पुल पर जाकर शरीर झाड़ देने का उद्यम किया था। ताकि भविष्य में इतिहास लिखने वाले यह न लिखें कि जब सारा  बानर समाज पुल बना रहा था तो वहाँ मौजूद एक गिलहरी कुछ नहीं कर रही थी। अस्तु कुछ न कुछ यथा सामर्थ्य करते रहना चाहिए। इसके बाद उन्होंने एक जोरदार वीररस की कविता सुनायी। मैं एक ही पंक्ति नोट कर पाया क्योंकि उन्होंने दुहराया नहीं था। हाल को गुँजाने वाली तालियाँ बजीं और अगले वक्ता बुलाये गये।

यहाँ तक तो सब ठीक-ठाक रहा लेकिन जब प्रश्न-उत्तर का दौर चला तो प्रबंध-संपादक महोदय को उठकर सफाई देनी पड़ी। छात्र श्रोताओं के तीखे प्रहार वाकई बेचैन करने वाले थे। अंततः कुलपति जी को अध्यक्षीय भाषण में इस मसले पर अंतिम बात कहनी पड़ी। वह बहुत ही मार्मिक और सजग करने वाली बात थी। लेकिन उसकी चर्चा अगली कड़ी में। अभी तो आप उस वीररस की कविता का आनंद लेते हुए इस ‘चिरकुटई के आरोप’ का जवाब दीजिए।

गूगल महराज ने उस एक लाइन का ‘जामन’ लेकर पल भर में अपने क्षीर सागर के भंडार से पूरी कविता की दही परोस कर रख दी।

वह लाइन थी-

हम वो कलम नहीं हैं जो बिक जाती हों दरबारों में
हम शब्दों की दीप- शिखा हैं अंधियारे चौबारों में

इस लंबी कविता के मूल कवि हैं डॉ. हरिओम पवार। इसके आगे पीछे की कुछ और लाइनें यहाँ आपके लिए। पूरी कविता यहाँ है।

इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

कोई रूप नहीं बदलेगा सत्ता के सिंहासन का
कोई अर्थ नहीं निकलेगा बार-बार निर्वाचन का
एक बड़ा ख़ूनी परिवर्तन होना बहुत जरुरी है
अब तो भूखे पेटों का बागी होना मजबूरी है

जागो कलम पुरोधा जागो मौसम का मजमून लिखो
चम्बल की बागी बंदूकों को ही अब कानून लिखो
हर मजहब के लम्बे-लम्बे खून सने नाखून लिखो
गलियाँ- गलियाँ बस्ती-बस्ती धुआं-गोलियां खून लिखो

हम वो कलम नहीं हैं जो बिक जाती हों दरबारों में
हम शब्दों की दीप- शिखा हैं अंधियारे चौबारों में
हम वाणी के राजदूत हैं सच पर मरने वाले हैं
डाकू को डाकू कहने की हिम्मत करने वाले हैं

जब तक भोली जनता के अधरों पर डर के ताले हैं
तब तक बनकर पांचजन्य हम हर दिन अलख जगायेंगे
बागी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

अगवानी हर परिवर्तन की भेंट चढ़ी बदनामी की
हमने बूढ़े जे.पी. के आँसू की भी नीलामी की
परिवर्तन की पतवारों से केवल एक निवेदन था
भूखी मानवता को रोटी देने का आवेदन था

अब भी रोज कहर के बादल फटते हैं झोपड़ियों पर
कोई संसद बहस नहीं करती भूखी अंतड़ियों पर
अब भी महलों के पहरे हैं पगडण्डी की साँसों पर
शोकसभाएं कहाँ हुई हैं मजदूरों की लाशों पर

निर्धनता का खेल देखिये कालाहांडी में जाकर
बेच रही है माँ बेटी को भूख प्यास से अकुलाकर
यहाँ बचपना और जवानी गम में रोज बुढ़ाती हैं
माँ , बेटे की लाशों पर आँचल का कफ़न उढाती है

जब तक बंद तिजोरी में मेहनतकश की आजादी है
तब तक हम हर सिंहासन को अपराधी बतलायेंगे
बाग़ी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

 

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

पढ़ना, पढ़वाना और लिखना साथ-साथ…

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wife-scoldआजकल मुझे डाँटने वालों की फ़ेहरिश्त लम्बी होती जा रही है। प्रदेश सरकार की नौकरी से छुट्टी लेकर घर से हजार किलोमीटर दूर आ गया और केंद्रीय विश्वविद्यालय में काम शुरू किया तो माता-पिता ही नाराज हो गये। भाई-बंधु, दोस्त-मित्र और रिश्तेदार भी फोन पर ताने मारने लगे कि क्या मिलेगा यहाँ जो वहाँ नहीं था। ऊल-जलूल मुद्दों को लेकर सुर्खियों में छाये रहने वाले एक विश्वविद्यालय से जुड़कर ऐसा क्या ‘व्यक्तित्व विकास’ कर लोगे?

बच्चे और पत्नी तो जैसे एक बियाबान जंगल में फँस जाने का कष्ट महसूस करने लगे हैं। …ना कोई पड़ोस, ना कोई रिश्तेदार और ना कोई घूमने –फिरने लायक सहज सुलभ स्थान। …कहीं जाना हो तो दूरी इतनी अधिक की कार से नहीं जा सकते। रेलगाड़ी में टिकट डेढ़-दो महीना पहले बुक कराने पर भी कन्फ़र्म नहीं मिलता। शादी-ब्याह के निमंत्रण धरे रह जाते हैं और सफाई देने को शब्द नहीं मिलते। किसने कहा था आपसे यह वनवास मोल लेने को..?

लेकिन मैं खुद को समझाता रहता हूँ। प्रदेश सरकार की नौकरी में ही क्या क्वालिटी ऑफ़ लाइफ़ थी। दिनभर बैल की तरह जुते रहो। चोरी, बेईमानी, मक्कारी, धुर्तता धूर्तता, शोषण, अनाचार, अक्षमता, लापरवाही, संत्राष संत्रास, दुख, विपत्ति, कलुष, अत्याचार, बेचारगी, असहायता इत्यादि के असंख्य उदाहरण  आँखों के सामने गुजरते रहते और हम असहाय से उन्हें देखते रहते। सिस्टम का अंग होकर भी बहुत कुछ न कर पाने का मलाल सालता रहता और मन उद्विग्न हो उठता। बहुत हुआ तो सत्यार्थमित्र  के इन पृष्ठों पर अपने मन की बात पोस्ट कर दी। लेकिन उसमें भी यह सावधानी बरतनी होती कि सिस्टम के आकाओं को कुछ बुरा न लग जाय; नहीं तो लेने के देने पड़ जाँय। कम से कम यहाँ वह सब आँखों से ओझल तो हो गया है। यहाँ आकर शांति से अपने मन का काम करने का अवसर तो है।

हिंदी साहित्य की विविध विधाओं में जो कुछ भी अच्छा लिखा गया है; अर्थात्  क्लासिक साहित्य के स्थापित रचनाकारों की लेखनी से निसृत शब्दों का अनमोल खजाना, उसे हिंदीसमय[डॉट]कॉम पर अपलोड करने का जो सुख मुझे यहाँ मिल रहा है वह पहले कहाँ सुलभ था। प्रिंट में उपलब्ध उत्कृष्ट सामग्री को यूनीकोड में बदलकर इंटरनेट पर पठनीय रूप रंग में परोसने की प्रक्रिया में उन्हें पढ़कर जो नैसर्गिक सुख अपने मन-मस्तिष्क को मिलता है वह  पहले कहाँ था?

कबीर ग्रंथावली के समस्त दोहे और पद अपलोड हुए तो इनके भक्तिरस और दर्शन में डूबने के साथ-साथ इसके संपादक डॉ. श्याम सुंदर दास की लिखी प्रस्तावना से भक्तिकाल के संबंध में बहुत कुछ जानने को मिला-

“…कबीर के जन्म के समय हिंदू जाति की यही दशा हो रही थी। वह समय और परिस्थिति अनीश्वरवाद के लिए बहुत ही अनुकूल थी, यदि उसकी लहर चल पड़ती तो उसे रोकना बहुत ही कठिन हो जाता। परंतु कबीर ने बड़े ही कौशल से इस अवसर से लाभ उठाकर जनता को भक्तिमार्ग की ओर प्रवृत्त किया और भक्तिभाव का प्रचार किया। प्रत्येक प्रकार की भक्ति के लिए जनता इस समय तैयार नहीं थी।

मूर्तियों की अशक्तता वि.सं. 1081 में बड़ी स्पष्टता से प्रगट हो चुकी थी जब कि मुहम्मद गजनवी ने आत्मरक्षा से विरत, हाथ पर हाथ रखकर बैठे हुए श्रद्धालुओं को देखते-देखते सोमनाथ का मंदिर नष्ट करके उनमें से हजारों को तलवार के घाट उतारा था। गजेंद्र की एक ही टेर सुनकर दौड़ आने वाले और ग्राह से उसकी रक्षा करने वाले सगुण भगवान जनता के घोर संकटकाल में भी उसकी रक्षा के लिए आते हुए न दिखाई दिए। अतएव उनकी ओर जनता को सहसा प्रवृत्त कर सकना असंभव था। पंढरपुर के भक्तशिरोमणि नामदेव की सगुण भक्ति जनता को आकृष्ट न कर सकी, लोगों ने उनका वैसा अनुकरण न किया जैसा आगे चलकर कबीर का किया; और अंत में उन्हें भी ज्ञानाश्रित निर्गुण भक्ति की ओर झुकना पड़ा।…”

मोहन राकेश का लिखा पहले बहुत कम पढ़ पाया था लेकिन जब उनकी रचनाओं का संचयन (कहानी, डायरी, यात्रा-वृत्त, उपन्यास, निबंध आदि) अपलोड करना हुआ तो बीच-बीच में काम रोककर उनकी शब्दों की सहज जादूगरी में डूबता चला जाता था। एक बानगी देखिए-

“पत्रिका के कार्यालय में हम चार सहायक सम्पादक थे। एक ही बड़े से कमरे में पार्टीशन के एक तरफ़ प्रधान सम्पादक बाल भास्कर बैठता था और दूसरी तरफ़ हम चार सहायक सम्पादक बैठते थे। हम चारों में भी एक प्रधान था जिसे वहाँ काम करते चार साल हो चुके थे। एक ही लम्बी डेस्क के साथ चार कुरसियों पर हम लोग बैठते थे। छोटे प्रधान की कुरसी डेस्क के सिरे पर खिडक़ी के पास थी और हम तीनों की कुरसियाँ उसके बाद वेतन के क्रम से लगी थीं। छोटे प्रधान उर्फ बड़े सहायक सुरेश का वेतन दो सौ रुपये था। उसके बाद लक्ष्मीनारायण था जिसे पौने दो सौ मिलते थे। तीसरे नम्बर पर मेरी एक सौ साठ वाली कुरसी थी और चौथे नम्बर पर डेढ़ सौ वाली कुरसी पर मनोहर बत्रा बैठता था। छोटा प्रधान सबसे ज़्यादा काम करता था, क्योंकि प्रूफ़ देखने के अलावा उसे हम सब पर नज़र भी रखनी होती थी और जब सम्पादक के कमरे में घंटी बजती, तो उठकर आदेश लेने के लिए भी उसी को जाना होता था। वह दुबला-पतला हड्डियों के ढाँचे जैसा आदमी था, जिसे देखकर यह अन्देशा होता था कि बार-बार उठने-बैठने में उसकी टाँगें न चटक जाएँ। सम्पादक को हममें से किसी से भी बात करनी होती, तो पहले उसी की बुलाहट होती थी और वह वापस आकर कारखाने के फ़ोरमैन की तरह हमें आदेश देता था, “नम्बर तीन, उधर जाओ। साहब याद कर रहे हैं।” एक बार बत्रा ने उससे कह दिया कि वह साहब के लिए चपरासी का काम क्यों करता है, तो वह सप्ताह-भर बत्रा से अपने प्रूफ़ दिखाता रहा था।”

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हुए देश के विभाजन के ऊपर लगभग सभी भारतीय भाषाओं में बहुत सी मार्मिक कहानियाँ लिखी गयी हैं। इनका हिंदी में अनूदित संचयन भी हिंदी-समय पर उपलब्ध है। इन कहानियों को पढ़कर हम सहसा उस दौर में पहुँच जाते हैं जिसने आज की अनेक राष्ट्रीय समस्याओं को जन्म दिया है। किसी भी साहित्य प्रेमी या समाज के अध्येता के लिए इन ८६ कहानियों से दो-चार होना उपयोगी ही नहीं अपितु अनिवार्य हैं।

अज्ञेय जी का एक लेख ‘सन्नाटा’ नाम से इंटर के कोर्स में पढ़ रखा था। ‘शेखर एक जीवनी’ और ‘नदी के द्वीप’ जैसे उपन्यास यूनिवर्सिटी के समय में पढ़ रखे थे लेकिन अभी जब उनके विशाल रचना संसार से परिचित हुआ और विविध विधाओं में उनके लेखन को अपलोड करते हुए दुरूह विषयों पर उनकी गहरी समझ और सटीक भाषा से प्रभावित हुआ तो लगा कि सब काम छोड़कर उन्हें ही समग्रता से पढ़ लिया जाय तो जीवन सफल हो जाय। मेरी बात मानने के लिए उनका संक्षिप्त जीवन वृत्त ही पढ़ लेना पर्याप्त होगा। दो-चार दिनों के भीतर सम्पूर्ण सामग्री हिंदी-समय पर होगी।

और हाँ,  अमीर खुसरों की मुकरियाँ पढ़कर और सुनाकर जो मुस्कान फैलती है उसका लोभसंवरण किया ही नहीं जा सकता। अब कहाँ तक गिनाऊँ। बहुत बड़ा भंडार है जी…।

इन सब सामग्रियों के बीच डूबकर मुझे इस बात का ध्यान ही नहीं रहा कि सत्यार्थमित्र पर अंतिम पोस्ट डाले हुए तीन सप्ताह निकल चुके हैं और हिंदी ब्लॉग जगत में विचरण का मेरा प्रिय कार्य प्रायः बंद हो चला है। मेरी तंद्रा आज तब टूटी जब घर में ही डाँट-सी सुननी पड़ी।

“आप को क्या हो गया है जी…? देख रही हूँ कि आपने आजकल पोस्ट लिखना बंद ही कर दिया है। जिस ब्लॉगरी के कारण आप सबकुछ छोड़कर यहाँ आये वही भूल गये हैं। यह दिनभर दूसरों के पुराने लिखे में आँख फोड़ने से कोई मेडल नहीं मिलने वाला है। आपकी पहचान हिंदी ब्लॉगजगत से है। उसे छोड़कर आप ‘फ्रंटपेज’ खोले बैठे हैं। कौन जानता है कि आप यह सब कर रहे हैं? कोई क्रेडिट नहीं मिलने वाली।… यही चलता रहा तो …न घर के रहेंगे न घाट के”

मैंने यह समझाने की कोशिश की मैं इस घिसे-पिटे मुहावरे का ‘पात्र’ नहीं हूँ। अब तो कोई धोबी भी इसे नहीं पालता। बल्कि विद्यार्थी जीवन में पहले जो कुछ नहीं पढ़ पाया था उसे पढ़ रहा हूँ और दूसरों को पढ़वाने का उपक्रम भी कर रहा हूँ। इसी काम के लिए मुझे तनख्वाह मिलती है। वैसे भी नेट पर अपना लिखा कूड़ा पढ़वाने से बेहतर है कि दूसरे उत्कृष्ट जनों का लिखा श्रेष्ठ साहित्य नेट पर उपलब्ध कराऊँ।

“तो आपको यह नौकरी करने से कौन मना कर रहा है। इस ‘पुनीत कार्य’ को अपने ऑफिस तक ही रखिए। छुट्टी के दिन घर पर भी वही जोतते रहेंगे तो कुछ दिन में पागल हो जाएंगे। …और आपके दिमाग में जो कूड़ा ही भरा है तो उसे बाहर निकाल देना ही श्रेयस्कर है। उसी ने आपको यहाँ ला पटका है। आप अपनी पहचान खो देने के रास्ते पर क्यों बढ़ रहे हैं।”

मैने सोचा पूछ लूँ कि अपने ब्लॉग पर क्यों कई महीने बाद कल एक पोस्ट डाल पायी हो लेकिन चुप लगा गया। कारण यह था कि उनकी बातें कहीं न कहीं मुझे अंदर से सही लग रही थीं। अपनी आशंका दूर करने के लिए मैंने कुछ ब्लॉगर मित्रों से बात की तो सबने यही कहा कि कुछ न कुछ लिखते रहना तो अनिवार्य ही है। इसी से मन को शांति मिल सकती है।

अब मेरी दुविधा कुछ मिट चली है। अब काम का बँटवारा करूंगा। घर पर ब्लॉगरी और ऑफिस में हिंदी-समय पर अपलोडिंग। काम के घंटे निर्धारित करने होंगे। हिंदी साहित्य का क्षेत्र इतना विस्तृत तो है ही कि इसे कुछ दिनों के ताबड़तोड़ प्रयास से पार नहीं किया जा सकता। स्थिर गति से लम्बे समय तक लगना होगा इसलिए इस काम में रोचकता बनाये रखना जरूरी है। सिर पर लगातार लादे रखने से कहीं यह बोझ न बन जाय। अब होगा पढ़ना-पढ़वाना और लिखना साथ-साथ।

लीजिए इस राम कहानी में एक पोस्ट निकल आयी। अब ठेल ही देता हूँ…!!!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

अच्छाई को सजोना पड़ता है जबकि बुराई अपने आप फैलती है…।

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पिछले दिनों विश्वविद्यालय प्रांगण में आयोजित ब्लॉगिंग संगोष्ठी में दिल्ली से श्री जय कुमार झा जी पधारे थे। ‘ऑनेस्टी प्रोजेक्ट डेमोक्रेसी’  के अलावा उनके दूसरे भी ब्लॉग हैं। ब्लॉगरी को सामाजिक सरोकारों से जोड़ने पर झा जी का बहुत जोर है। इतना कि उनसे चाहे जिस मुद्दे पर बात करिए उनका हर तीसरा वाक्य ‘सामाजिक सरोकार’ की ओर ही मोड़ कर ले जाता है। उनसे हमें जब भी कुछ चर्चा का मौका मिला वे ‘सोशल ऑडिट’ पर जोर देते दिखे। मुझे थोड़ा विस्मय हुआ कि घूम-फिरकर इन्हीं दो बातों के इर्द-गिर्द परिक्रमा करने से ये थकते क्यों नहीं। उनका कहना था कि हमारे समाज की गड़बड़ियों को दूर करने का सबसे कारगर तरीका है सोशल ऑडिट यानि सामाजिक जाँच।

जय कुमार झा जी ने संगोष्ठी समाप्त होने पर बताया कि वे वर्धा प्रांगण में एक दिन और रुकेंगे। यहाँ संपन्न हुई कार्यशाला में ब्लॉगिंग से जुड़ने वाले नये ब्लॉगर विद्यार्थियों व अन्य छात्रों से अलग से मिलकर कुछ संदेश देना चाहेंगे। संभव हो तो कुलपति जी को भी यह प्रस्ताव देंगे कि वे अपने छात्रों की टीम बनाकर सुदूर गाँवों में सोशल ऑडिट के लिए भेजें। राष्ट्रीय स्तर पर जो लोग इस प्रकार के अभियान में लगे हुए हैं उनकी मदद से इन टीमों को प्रशिक्षित कराया जाय आदि-आदि।

दो-दिवसीय संगोष्ठी की समाप्ति पर मैं थकान मिटाने के नाम पर आराम की मुद्रा में जाना चाहता था लेकिन उनकी ऊर्जा और सामाजिक सरोकार के प्रति अदम्य आग्रह को देखकर मुझे जन संचार विभाग के अध्यक्ष प्रो. अनिल राय ‘अंकित’ से बात करके झा जी की कक्षा का आयोजन करना पड़ा। विभागाध्यक्ष ने सहर्ष रुचि दिखायी और हम झा जी को लेकर पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे छात्रों के बीच एक क्लास-रूम में पहुँच गये। विभाग में उपस्थित सभी कक्षाओं के छात्र कुछ शिक्षकों के साथ वहाँ इकठ्ठा थे। मैने सबसे पहले वहाँ उपस्थित विद्यार्थियों को संगोष्ठी के आयोजन में सहयोग देने हेतु धन्यवाद दिया और फिर अतिथि वार्ताकार का संक्षिप्त परिचय देकर पोडियम पर झा जी को आमंत्रित कर दिया। झा जी ने अपनी बात सामाजिक सरोकार, सोशल ऑडिट, ग्रास रूट लेवेल, सिटिजेन जर्नलिस्ट इत्यादि के माध्यम से रखी। झा जी ने India Rejuvenation Initiative (iri.org.in) नामक संगठन के बारे में बताया जो प्रायः सेवानिवृत्त हो चुके ऐसे प्रभावशाली और अनुभवी नौकरशाहों, न्यायाधीशों, पुलिस अधिकारियों इत्यादि द्वारा खड़ा किया गया है जो समाज में सच्चाई और ईमानदारी को बढ़ावा देना चाहते हैं।

उनकी वार्ता सुनकर मैंने जो समझा उसका सार यह था कि समाज के जागरूक लोगों द्वारा अपने आस-पास हो रहे प्रत्येक कार्य पर न सिर्फ़ निगरानी रखना चाहिए बल्कि कुछ भी गड़बड़ पाने पर सक्षम प्राधिकारियों तक उसकी शिकायत भी पहुँचानी चाहिए। जबतक हर पढ़ा लिखा आदमी सबसे निचले स्तर (grass-root level) पर सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर सतर्क निगाह रखकर धाँधली करने वाले लाभार्थियों, कर्मचारियों और अधिकारियों को गलत करने से रोकने व टोकने के लिए कुछ कष्ट नहीं उठाएगा तबतक हम एक ईमानदार और पारदर्शी समाज की रचना नहीं कर सकेंगे। आज स्थिति बिल्कुल उल्टी और भयावह है। सरेआम लूट और भ्रष्टाचार होते देखकर भी हम चुप रह जाते हैं और अपराधी निर्द्वंद्व होकर अपने कारनामें करता रहता है। ऐसा इसलिए कि हम केवल अपने सुकून और स्वार्थ की पूर्ति की चिंता में ही रमे हुए हैं। किसी ऐसे काम को झंझटी समझ कर किनारा कर लेते हैं जिसमें कुछ व्यक्तिगत स्वार्थ न सधता हो। सामाजिक सरोकारों पर ध्यान देने की फुर्सत किसी के पास नहीं है। उन्होंने सबसे अपील की कि हमें अपने कीमती समय में से कुछ समय समाज के गरीब और असहाय तबके की सहायता के लिए निकालना चाहिए।

झा जी की बातें सबने बड़े ध्यान से सुनीं। बीच-बीच में अनेक छात्र-छात्राओं ने उनसे सवाल दागने शुरू कर दिए। उन युवा चेहरों पर व्यवस्था के प्रति अत्यन्त रोष दिखा। उनकी बातों से ऐसा लगा कि ये सब आदर्श की बातें हैं जो केवल गोष्ठियों और सभाओं में अच्छी लगती हैं। व्यावहारिक दुनिया की सच्चाई बहुत कठोर और कड़वी है। जो लोग सत्ता और शक्ति के शिखर पर बैठे हैं उन्हें किसी तरह से डिगा पाना लगभग असम्भव है। जिनके पास अवसर हैं वे इसका प्रयोग अपनी तिजोरियाँ भरने के लिए कर रहे हैं। अपराधी प्रवृत्ति के लोग गिरोहबंद होकर देश और समाज को लूट रहे हैं। ईमानदार और सच्चे लोगों को कदम-कदम पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। वे असहाय होकर किनारे खड़े हैं। हम युवाओं को ऐसे उपदेश खूब दिये जाते हैं। लेकिन हमारे सामने सबसे बड़ी समस्या तो जीविका का सहारा ढूँढना है। नौकरियाँ दुर्लभ होती जा रही हैं। जो थोड़ी बहुत हैं भी वे भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जा रही हैं। सरकारी धन की लूट मची हुई है। प्रायः सभी इस प्रयास में लगे हैं कि उस लूट में हिस्सेदारी पाने का कोई जुगाड़ खोज लिया जाय। जिन्हें हिस्सा मिल गया वो यथास्थिति बनाये रखने का इन्तजाम सोचते हैं और जो बाहर हैं वे विरोध, धरना, प्रदर्शन, आंदोलन की राह चुनते हैं या चुप होकर अपनी नियति का दोष मानकर घर बैठ जाते हैं।

मुझे लगा कि यह नयी पीढ़ी यथार्थ के धरातल पर कुछ ज्यादा ही पैर जमाकर चलने को तैयार है। आदर्श की बातें सुनने के लिए भी इनके पास धैर्य नहीं है। झा जी उत्साहपूर्वक अपनी ‘ऑनेस्टी प्रोजेक्ट डेमोक्रेसी’ की बात बढ़ाते रहे और छात्रगण उनसे रोटी का सवाल उछालते रहे। एक छात्र ने विश्वविद्यालय के विरुद्ध नाना प्रकार के अनर्गल कुप्रचार में लगी एक वेबसाइट का उदाहरण देते हुए कहा कि यहाँ बहुत से अच्छे कार्य हो रहे हैं लेकिन बाहर वालों के सामने यहाँ की जो छवि बनी है उसे देखकर हमें इस कैम्पस से बाहर जाने पर शर्म महसूस होती है। इस शरारत के पीछे जिनका हाथ है उन्हे सभी पहचानते भी हैं लेकिन फिर भी हम हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। उनके विरुद्ध तो हम कुछ कर नहीं रहे हैं, बल्कि कुछ कर ही नहीं पा रहे हैं तो बाकी दुनिया को सुधारने की बात करने का क्या औचित्य है? मतलब यह कि बुराई अपने पाँव पसारती जाएगी। उसे रोकने वाला कोई नहीं है। किसी के पास इसकी फुर्सत ही नहीं है। इस बहस के बीच मैने ह्वाइट बोर्ड (अब ब्लैक-बोर्ड नहीं रहे) पर इस प्रकार का रेखाचित्र बना दिया-

good&evil

मैने सबका ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा कि आपलोगों के हिसाब से आज के समाज में अच्छाई और बुराई की तुलनात्मक स्थिति कुछ इस प्रकार की है। बुराई का दानव विकराल रूप लेता जा रहा है और सच्चाई और ईमानदारी जैसी अच्छी बातें अल्पमत में आ गयी हैं। बुराई को कम करने के सभी प्रयास प्रायः विफल होते जा रहे हैं। कोई शरीफ़ आदमी गुंडे-मवाली से उलझना नहीं चाहता। झंझट मोल नहीं लेना चाहता। ‘संघे शक्तिः कलियु्गे’ – अपराधियों का गिरोह बहुत एकजुट होकर काम करता है जबकि सच्चे और ईमानदार लोग अकेले पड़ जाते हैं। ऐसे में शायद आप यह मान चुके हैं कि बायीं ओर के स्तम्भ को छोटा नहीं किया जा सकता। लगभग सभी ने मेरी इस बात पर हामी भरी। मैने कहा कि आप सबकी बात मानकर मैं भी स्वीकार कर लेता हूँ कि बुराई को कम नहीं किया जा सकता। लेकिन आप लोगों को अच्छाई की मात्रा बढ़ाने से किसने रोका है? अधिक से अधिक लोग यदि अपने आप में  सद्‍गुणों का विकास कर लें तो यह अंतर उलट सकता है। कुछ इस प्रकार से-

good&evil2

बुराई को उसके हाल पर छोड़ दें, और अच्छाई का अवगाहन करें तो आप दूसरी स्थिति पैदा कर सकते हैं। इस पर वे शांत होकर कुछ सोचने लगे। मैने आगे कहा – लेकिन यह इतना आसान काम नहीं है। क्योंकि प्रकृति आपके विरुद्ध खड़ी है। यह दुनिया जिस रूप में आज है उसमें बुराई स्वाभाविक रूप से अपने आप फैलती जाएगी लेकिन अच्छाई की मात्रा बढ़ाने के लिए मनुष्य को सकारात्मक कदम उठाने पड़ेंगे। प्राकृतिक रूप से  हमारा वातावरण ऐसा ही है। किसान अपने खेत की जुताई करके यत्न पूर्वक खर-पतवार की जड़ सहित सफाई कर लेने के बाद साफ़-सुथरी मिट्टी में अनाज के बीज डालता है। लेकिन बीज के साथ अवांछित घास-फूस अपने आप उग आती है। यदि खेत की निराई-गुड़ाई समय-समय पर न की जाय तो ये खर-पतवार अनाज के पौधों को अच्छादित कर देंगे और खेत की फसल चौपट हो जाएगी। थोड़ी सी असावधानी हुई नहीं कि बीज की बढ़वार रुक जाएगी और सारी मेहनत चौपट हो जाएगी। इसलिए सद्‌गुणों को अपने भीतर सावधानी से सजो कर रखना पड़ता है जबकि दुर्गुण अपने आप घर बना लेते हैं।

इस बात को सिद्ध करने के लिए कुछ और भी उदाहरण मेरे मन में आये। दाँतों को साफ़ रखने के लिए हमें नित्य उनकी सफाई करनी पड़ती है। लेकिन यदि उनका हम कुछ न करें, बस यूँ ही छोड़ दें तो जल्दी ही गंदगी जमती जाएगी। शरीर को साफ़ रखने के लिए रोज साबुन लगाकर नहाना पड़ता है, लेकिन इसे गंदा रखने के लिए किसी प्रयास की जरूरत नहीं है। हमारे वातावरण से आकर गंदगी अपने आप शरीर पर आसन जमा लेती है। घर को साफ रखने के लिए रोज झाड़ू-पोछा करना पड़ता है लेकिन गंदगी जाने कहाँ से अपने आप पधार जाती है। हमारे वातावरण में नकारात्मकता की विषबेल फैलने के अनुकूल अवसर बहुत हैं लेकिन सकारात्मक सुगंध का फूल खिलाने के लिए अच्छा माली बनकर कठिन परिश्रम करना पड़ेगा।

ऊपर के कई उदाहरण मुझे वहाँ कक्षा में नहीं देने पड़े। शायद नयी पीढ़ी को यह बात आसानी से समझ में आ गयी। कम से कम जोरदार तालियों से प्रकट होता उनका समर्थन तो यही कह रहा था।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

तेरा बिछड़ना फिर मिलना…

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हे तात,

आज तुम वापस घर लौट आये। मन को जो राहत मिली है उसका बयान नहीं कर पा रहा हूँ। तुम्हारा साथ वापस पाकर मुझे उस टाइप की खुशी मिल रही है जैसी सीमा पार गुमशुदा मान लिए गये सैनिक की देशवापसी पर उसके घर वालों को होती है। कोई उम्मीद नहीं कर रहा था कि तुम सकुशल अपने घर वापस आ जाओगे। वह भी जिस बुरी हालत में तुमने घर छोड़ा था और जिस तरह से तुम्हारा परिचय पत्र भी खो चुका था, मुझे कत्तई उम्मीद नहीं थी कि इतनी बड़ी दुनिया में कोई तुम्हें पहचानने को तैयार होगा, तुम्हारी सेवा-सुश्रुषा करेगा, तुम्हारी बीमारी की मुकम्मल दवा करेगा और फिर पूरी तरह स्वस्थ हो जाने पर हवाई टिकट कटाकर तुम्हें मेरे घर तक पहुँचवा देगा।

मैने सोचा कि तुम्हें वापस भेजने वाले को धन्यवाद दूँ, लेकिन इस पूरी कहानी में इतने अधिक लोग सहयोगी रहे हैं और उनमें अधिकांश को मैं जान-पहचान भी नहीं पा रहा हूँ इसलिए इस सार्वजनिक मंच से एक बार ही उन सबको सामूहिक धन्यवाद ज्ञापित कर देता हूँ।

तुम्हारे साथ मैंने जो किया वह कत्तई अच्छा व्यवहार नहीं कहा जा सकता। अपने सुख के लिए मैंने तुम्हारे साथ बहुत नाइंसाफी की। जब भी कभी हम साथ चले मैं अपना सारा बोझ तुम्हारे कंधे पर डाल देता और खुद मस्ती से इतराता चला करता। तुम इतने निष्ठावान और सेवाधर्मी निकले कि कभी उफ़्‌ तक नहीं की, कोई शिकायत नहीं की। शायद तुमने अपना माथा ठोंक लिया कि जब मैंने तुम्हें तुम्हारे जन्मदाता से रूपयों के बदले खरीदा है तो आखिरी साँस तक मेरी सेवा करना ही तुम्हारा कर्तव्य है, तुम्हारी नियति है। बिल्कुल गूंगा गुलाम बनकर रहे तुम मेरे साथ। जरूरत पड़ने पर तुमने मेरे भाइयों की सेवा भी उसी तत्परता से की। कोई भेद नहीं रखा।

एक बार तो तुम मेरे एक मित्र को लोक सेवा आयोग तक इंटरव्यू दिलाने चले गये। उसने पता नहीं तुममें क्या खूबी देखी कि एक दिन के लिए तुम्हें मुझसे मांगकर अपने साथ ले गया। मैने समझाया भी कि यह तो अभी बिल्कुल नया-नया आया है, मै भी इसके व्यवहार से भली भाँति परिचित नहीं हूँ। तुम्हें पता नहीं रास आये या न आये। वह बोला- “यह नया है तभी तो ले जा रहा हूँ। मुझे अनुभवी और पुराने साथियों के साथ ही तो परेशानी होती है। जब तक साथ रहेंगे, रास्ते भर पता नहीं क्या-क्या चर्र-पर्र करते रहेंगे। बार-बार मूड डिस्टर्ब होने की आशंका रहेगी। कॉन्फिडेन्स गड़बड़ाने का डर बना रहेगा। इंटरव्यू तो अपने दिमाग से देना है, फिर रास्ते भर इनकी सिखाइश और बक-बक की ओर ध्यान क्यों बँटाना? यह नया है तो मुझमें कोई खामी तो नहीं दिखाएगा। इसके चेहरे पर जो चमक है वह आत्म विश्वास बढ़ाने वाली है। यह खुशी से शांतिपूर्वक साथ चलेगा और सुकून से बिना कोई खटपट किए वापस आएगा। मुझे कुछ आराम ही रहेगा।” मैंने बिना कुछ कहे तुम्हें उसके साथ भेज दिया। तुम्हें तो घूमने का बहाना चाहिए। और क्या?

तुमने मुझसे कभी कुछ मुँह खोलकर नहीं मांगा। तुम दरवाजे के बाहर बैठे रहते या घर के कोने में चुपचाप दुबके रहते। टकटकी लगाये रहते कि मैं कब तुम्हें अपने साथ ले चलने वाला हूँ। तुमने खुद अपना खयाल कभी नहीं रखा। मुझे ही जब तुम्हारी दीन-हीन शक्ल-सूरत पर तरस आती तो थोड़ी बहुत साफ़-सफाई के लिए किसीसे कह देता या खुद ही हाथ लगा देता। वैसे मुझे यह तरस भी अपने स्वार्थ में ही आती। तुम्हें मेरे साथ चलना होता था, इसलिए तुम्हें मैली-कुचैली हालत में रखता तो अपनी ही नाक कटती न! जब किसी अच्छी शादी-व्याह, जन्मदिन पार्टी, सालगिरह इत्यादि का निमन्त्रण हो या खास सरकारी मीटिंग में बड़े अधिकारियों से मिलने जाना हो तो मैं तुम्हे कुछ ज्यादा ही महत्व देता। तुम्हारी सादगी और गरिमापूर्ण उपस्थिति से मुझमें आत्मविश्वास बढ़ जाता। तुम बोल नहीं पाते वर्ना मैं पूछता कि जिस दिन मेरी ही तरह तुम्हारी विशेष साज-सज्जा होती उस दिन तुम जरूर गेस कर लेते होगे कि किसी खास मौके पर बाहर निकलना है।

तुमने जब भी मेरे साथ कोई यात्रा की मुझे सुख देने का पूरा प्रयास किया। मेरी सुविधाओं का ख़याल रखते रहे। मेरा बोझ ढोते रहे। ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर तुम आगे-आगे चलकर मेरे लिए उसकी तकलीफ़ कम करने का जतन करते रहे। तुमने इतना तक खयाल रखा कि मेरे पाँव में काँटे न चुभने पाये। मुझसे पहले तुम जमीन पर पाँव रखते ताकि काँटे हों भी तो तुम्हे पता चल जाय और मुझे कोई धोखा न हो। सड़क जल रही हो तो मुझे उसपर नंगे पाँव नहीं चलने देते। तुमने अपने लिए कीचड़ भरा रास्ता चुन लिया होगा लेकिन मेरे पाँव कभी गीले नहीं होने दिया। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ कि मैं निरा स्वार्थी और अहंकारी बनकर तुम्हारा खरीदार होने के दंभ में तुम्हारी चमड़ी से एक-एक पैसा वसूल कर लेने की फिराक़ में लगा रहा जबकि तुमने बिना कोई शिकायत किए मेरी सेवा को अपना धर्म समझा। मैने तुम्हे जैसे चाहा वैसे इस्तेमाल किया। तुम्हारी राय या सहमति लेने की जरुरत भी नहीं समझी। लेकिन हद तो हद होती है। मैने एक बार हद पार की और तुमसे हाथ धोने की नौबत आ गयी।

हुआ यों कि एक बार मैं एक पहाड़ी इलाके में यात्रा पर गया। किसी ठंडी पहाड़ी का इलाका नहीं था बल्कि वहाँ कुछ पथरीले शुष्क टीले थे जिनके ऊपर एक वैश्विक शिक्षण संस्था आकार ले रही थी। उसी संस्था के मुखिया ने मुझे बुला भेंजा था। सुबह-सुबह हम टीले पर बने पथरीले रास्ते से ऊपर की ओर टहलते हुए जा रहे थे। तभी मुझे दूर चोटी पर कुछ परिचित लोग दिखायी दिए। वे लोग भी आगे की ओर बढ़ रहे थे। दूरी इतनी थी कि उन्हें आवाज देकर रोका नहीं जा सकता था। वे लोग आपस में बात करते हुए तेज कदमों से बढ़े जा रहे थे। मैने आव देखा न ताव, उन्हें पाने के लिए दौड़ लगाने लगा। मुझे तुम्हारा भरोसा कुछ ज्यादा ही था। लेकिन शायद तुम दौड़ने के लिए बने ही नहीं थे। संकोच में तुम कुछ बोल न सके। मेरे साथ दौड़ लगाते रहे। हमने उन लोगों को करीब एक किलोमीटर की दौड़ लगाकर पकड़ तो लिया लेकिन जल्द ही मुझे तुम्हारी तकलीफ़ का पता चल गया। मेरी ऊँखड़ी हुई साँस तो कुछ देर में स्थिर हो गयी लेकिन तुम्हारा हुलिया जो बिगड़ा तो सुधरने का नाम नहीं ले रहा था। लगभग कराहने की आवाज करने लगे तुम। मैंने तुम्हें सम्हालते हुए चलने में मदद की और गेस्ट हाउस में आने के बाद लिटाकर छोड़ दिया। फिर बाकी समय तुम मेरा साथ नहीं दे सके। तुम्हारे तलवे में फ्रैक्चर सा कुछ हो गया था। मुझे वापसी यात्रा में तुम्हें टांग कर चलना पड़ा।

जब हम घर वापस लौट गये तो तुम्हारी दुरवस्था देखकर मुझे लगा कि अब तुम मेरे किसी काम के नहीं हो। मुझे तुम्हारे ऊपर दया तो आ रही थी लेकिन उससे ज्यादा मुझे अपने हजार रूपए बेकार चले जाने का अफ़सोस होने लगा। तुम कोने में पड़े रहते मुझे आते-जाते देखते रहते। तुम्हारी देख-भाल में कमी आ गयी और तुम्हारा स्वास्थ्य और बिगड़ता गया। घर में एक बेकार का बोझ बन गये तुम। श्रीमती जी ने एक बार संकेत किया कि इसे किसी मंदिर या अनाथालय पर छोड़ आइए। किसी भिखारी के हाथ लग जाएगा तो शायद उसके काम आए। सुनकर मेरा कलेजा काँप गया। मुझे चिंता होने लगी कि मेरी अनुपस्थिति में कहीं तुम्हें ठिकाने न लगा दिया जाय। मैं तुम्हारे साथ पैदा हुई समस्या के एक सम्मानजनक निपटारे का रास्ता ढूँढने लगा।

(2)

एक दिन बाजार में घूमते हुए मुझे वही आदमी मिल गया जिससे मैने तुम्हें खरीदा था। मैं फौरन उसके पीछे लपक लिया। भीड़-भाड़ के बीच उससे बात करना मुश्किल था। उसने मुझे पहचान तो लिया लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा था कि उससे कैसे बात करूँ। उसने शायद मेरे असमंजस को भाँप लिया। वह बातचीत में गजब का चालाक था। उसी ने शुरुआत की- “ कहिए साहब, जो सामान मैने आपको दिया था वह अच्छा चल रहा है न? कोई शिकायत वाली बात तो नहीं है?” मुझे अब तरकीब सूझी। मैने चेहरे पर निराशा के भाव मुखर किए और बोला- “तुम्हारा सामान तो वैसे बड़े काम का था, लेकिन अब खराब हो गया है। घर में बेकार पड़ा रहता है। कहीं आने-जाने लायक नहीं रह गया है। अगर उसे वापस ले लेते तो ठीक रहता। जिस बुरी हालत में वह है उसको अब उसे बनाने वाले (जन्म देने वाले) ही ठीक कर सकते हैं। उसे उसकी कम्पनी को (अपनी माँ के पास) भेज दिया जाय तो शायद उसे नयी जिन्दगी मिल जाय।”

जानते हो, तुम्हें मेरे हाथों बेंचते समय उसने यह कहा था कि दो-तीन महीने में कोई शिकायत हो तो वापस लाइएगा, दूसरा ले जाइएगा। मेरे पास बहुत से हैं। मैंने उसे इस ‘वारण्टी’ की याद दिलायी। हाँलाकि उसका चेहरा यह साफ शक़ करता दीख रहा था कि यह खरीद-फ़रोख्त तीन महीने के भीतर की नहीं है। लेकिन मैने जब यह कहा कि इस सामान की रसीद तो है नहीं कि  सबूत के तौर पर पेश कर दूँ। तुम्हें अगर मेरी बात पर भरोसा हो तो उसे वापस ले लो नहीं तो मेरा घाटा तो हो ही रहा है। वह जब किसी काम का नहीं रह जाएगा तो हम कबतक उसे ढोते रहेंगे।

मेरी इस बात का जाने क्या असर हुआ कि वह तुम्हें वापस लेने पर राजी हो गया। बस एक शर्त रख दी कि तुम्हारे असली जन्मदाता जो निर्णय लेंगे उसे ही सबको मानना पड़ेगा। पैसा वापस होने की कोई उम्मीद न करें। उसने साफ़ कहा कि मैं तो दो पैसे के लिए केवल मध्यस्थ की भुमिका निभाता हूँ। माल कोई और बनाता है, इस्तेमाल कोई और करता है। मैं उन्हें केवल मिलवा देता हूँ। …उस दिन मैंने सिर्फ़ इस बात पर संतोष किया था कि घर में बेकार हो चुकी एक चीज हट गयी। तुम चूँकि अपने मूल स्थान वापस जा रहे थे इसलिए एक प्रकार के अपराधबोध से मुक्त होने का भाव तो मन में था ही, लेकिन अपने रूपये डूब जाने की आशंका से मन दुखी भी था।

आज जो तुम पूरी तरह से स्वस्थ होकर वापस मेरे घर मेरी सेवा करने के लिए भेंज दिए गये हो तो मुझे अजीब से भावों ने घेर लिया है। तुम्हें देखकर यह लगता ही नहीं है कि मेरे साथ उस पथरीली दौड़ में तुम्हारे पाँव जाया हो गये थे। तुम्हारा  यह लिम्ब ट्रान्सप्लांट किसी कुशल सर्जन का किया लगता है। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं है। सोच रहा हूँ कि मेरे कारण तुम विकलांग हो गये, लेकिन तुम्हारी चिकित्सा में मुझे दमड़ी भी नहीं लगानी पड़ी। मैंने बड़ी चतुराई से उस बाजार की साख पर प्रश्नचिह्न लगा दिया जिस बाजार से मैने तुम्हें खरीदा था। इसका असर यह हुआ कि अगले ने अपनी जबान की रक्षा के लिए सबकुछ दाँव पर लगा दिया।

वह चाहता तो मुझसे टाल-मटोल कर यूँही टहला देता। वह भी तब जब मैने उस शहर से अपने ट्रान्सपर की जानकारी भी उसे दे दी थी। लेकिन वह बन्दा या तो अपनी जबान का बहुत पक्का था या मेरी लानत-मलानत का असर इतना जबर्दस्त था कि उसने मेरा नया पता नोट किया और अपना मोबाइल नम्बर दिया। एक गुप्त कोड नम्बर भी बताया जिसका उल्लेख कर देने भर से वह पूरी बात समझ जाता और संकेत में ही तुम्हारी ‘लेटेस्ट कंडीशन’ बताता रहता। कब तुम अपनी माँ के पास पहुँचे। कब तुम्हारी जाँच करायी गयी, कब ऑपरेशन हुआ। कब अस्पताल से बाहर आये। मुझे पता चला कि तुम्हारे घर वाले तुम्हें हमेशा के लिए वापस रखने को राजी नहीं हुए। यह तय हुआ कि जिसने तुम्हें एक बार खरीद लिया उसी की सेवा में तुम्हें जाना चाहिए। भले ही तुम्हें सेवा के लायक बनाने में उन्हें बड़ा खर्च उठाना पड़े। डॉक्टर ने कहा कि खराब हो चुके अंग को पूरा ही बदलना पड़ेगा। परिवार बड़ा था। जाने कैसे स्पेयर अंग का जुगाड़ हो गया। यदि यह कृत्रिम अंग प्रत्यारोपण है तो अद्‌भुत है। बिल्कुल ओरिजिनल जैसा।

मुझे क्या, मैं तो बहुत खुश हूँ। खोयी पूँजी लौट आयी है। वह भी घर बैठे ही। बस फोन कर-करके उस मध्यस्थ को ललकारता रहा। उसने भी अपनी जबान पूरी करने की कसम खा ली थी। उसने तुम्हारे परिवार को फोन कर-करके तुम्हारे ठीक हो जाने के बाद अपने पास बुला ही लिया। तुम बोल नहीं सकते इसलिए तुम्हारे गले में मेरे नये घर का पता लिखकर टाँग दिया और रवाना कर दिया। तुम्हें पहुँचाने वह खुद तो नहीं आया लेकिन वहाँ से यहाँ तक पड़ने वाले हर स्टेशन पर उसके भाड़े के आदमी मौजूद थे। मुझे पता चला कि उस आदमी ने तुम्हारी बीमार हालत में तुम्हें तुम्हारे जन्मस्थान तक हवाई जहाज से भेंजा। तुम्हारी वापसी यात्रा भी हवाई मार्ग से हुई है।

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मुझे दो सप्ताह से तुम्हारा इन्तजार था। इंटरनेट बता रहा था कि तुम दिल्ली से नागपुर ्के लिए २६ तारीख को उड़ चुके हो। बाद में २७ ता. को  नागपुर से वर्धा भी चले आये हो। लेकिन वर्धा स्टेशन से मेरे घर तक आने में तुम्हें पन्द्रह दिन लग गये। आज पता चला कि जिस आदमी को तुम्हें पहुँचाने की जिम्मेदारी दी गयी थी वह बीमार हो गया था। तुम्हें अपने घर पर ही रखे हुए था।  आज पूछताछ करवाने पर वह तुम्हें लेकर आया।14092010912

आज जब तुम मेरे घर वापस आये हो तो लम्बी यात्रा की थकान तुम्हारे चेहरे पर साफ झलक रही है। तुम्हारी `बेडिंग’ के भी चीथड़े हो गये हैं। जाने कितने लोगों के हत्थे चढ़ने के बाद तुम अपने असली ग्राहक के पास वापस आ गये। अब सबकुछ ठीक हो जाएगा।

अब मैं तुम्हारे साथ कोई बुरा बर्ताव नहीं कर सकता। अपने पिछले दुर्व्यवहार पर पछता रहा हूँ। अब तुम्हें उस तरह तंग करने की सोच भी नहीं सकता। कल सुबह तुम्हारी मालिस-पॉलिश अपने हाथ से करूंगा। तुम्हारी आज जो सूरत है वह मेरी उस गलती की याद दिला रही है। उसे हमेशा याद रखने के लिए तुम्हारी एक तस्वीर खींच लेता हूँ। बुरा मत मानना। अब तो मैं तुम्हें बहुत लाड़-प्यार से रखने की सोच रहा हूँ। चिंता मत करना इस बीच अपनी सेवा के लिए मैने कुछ और ‘साधन’ जुटा लिए हैं। सारा बोझ अकेले तुमपर नहीं डालूंगा। तुमको दौड़ पर साथ ले जाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। अब तुम अपनी जमात के वी.आई.पी. हो चुके हो। बस, अब इतना ही। तुम्हारा बोधप्राप्त हितचिंतक…

 

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

इलाहाबाद से वर्धा की ओर…

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मित्रों,

packers and movers अब से करीब ढाई साल पहले जो यात्रा मैंने अन्तर्जाल की दुनिया पर शुरू की थी वह मुझे ऐसे विलक्षण अवसर उपलब्ध कराएगी यह मैने सपने में भी सोचा न था। लेकिन आज जब मैं इलाहाबाद छोड़कर जा रहा हूँ तो मन में अद्‌भुत उपलब्धि का भाव हिलोरें ले रहा है। इसे प्रयाग की पुण्य भूमि की उपलब्धि मानूँ, अपने सरकारी ओहदे की कामयाबी मानूँ या साहित्य के नाम पर सृजित अपनी अनगढ़ ब्लॉग पोस्टों की सफलता मानूँ, यह तय करना मुश्किल है। शायद यह इन सबका मिला-जुला प्रतिफलन हो। मैं तो मानता हूँ कि यह मेरे इष्ट-मित्रों की शुभकामनाओं, वरिष्ठ ब्लॉग लेखकों के मार्गदर्शन, परिवारीजन के सहयोग और समर्थन, बड़े-बुजुर्गों के आशीर्वाद और ईश्वर की कृपा के बिना कत्तई सम्भव नहीं था।

यूँ तो नौकरी में स्थानान्तरण कोई असामान्य घटना नहीं है, लेकिन जिस रूप में यह इसबार मुझे मिला है वह सरकारी कायदे के जानकारों को भी अचम्भित करने वाला है। उत्तर प्रदेश सरकार की कोषागार सेवा (राज्य वित्त एवं लेखा सेवा, उ.प्र.) का एक अधिकारी किसी केन्द्रीय विश्वविद्यालय में अपनी सेवाएं देने का अवसर प्राप्त करे तो यह उसके लिए गौरव की बात है। दुर्लभ तो है ही।

मैं आन्तरिक सम्परीक्षा अधिकारी (Internal Audit Officer)  के पद पर अपनी सेवाएं देने के लिए महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा(महाराष्ट्र) में तीन वर्ष के लिए जा रहा हूँ। अपने मूल प्रोफ़ेशन से मेल खाता यह कार्य मुझे अच्छा तो लगेगा ही, लेकिन असली आकर्षण इस बात में है कि यहाँ हिन्दी भाषा को एक कामकाजी भाषा बनाने व विविध विषयों के ज्ञान भण्डार को हिन्दी में उपलब्ध कराने के जिस अनुष्ठान में यह विश्वविद्यालय लगा हुआ है उसमें कुछ विशेष योगदान करने का अवसर  मुझे भी मिलेगा। हिन्दी ब्लॉग जगत के असंख्य मित्रों से भेंट-मुलाकात और विचार गोष्ठियों में प्रतिभाग के अवसर भी मिलेंगे। विश्वविद्यालय में चिट्ठाकारी पर राष्ट्रीय स्तर का सम्मेलन तो प्रतिवर्ष होगा ही।

इलाहाबाद से मुझे पढ़ाई के दिनों से ही बहुत कुछ मिलता रहा है। नौकरी पाने की जद्दोजहद यहीं से शुरू हुई थी और पिछली बार जब मैने इस शहर से विदा ली थी तो उस समय भी नई नौकरी ज्वाइन करने के लिए ही जाना हुआ था। इस बार भी मैं पुनः एक नयी नौकरी शुरू करने जा रहा हूँ। प्रयाग की धरती को शत्‌-शत्‌ नमन।

मैं अपना घरेलू सामान ट्रक के हवाले करने के बाद अपनी कार से ही सपरिवार वर्धा की यात्रा करने का कार्यक्रम बना चुका हूँ। बाइस जून की सुबह हम चल पड़ेंगे वर्धा की ओर। शाम को जबलपुर पहुँचकर रात्रि विश्राम करने से पहले वहाँ के  चिठ्ठाकार मित्रों के साथ भेंट-मुलाकात का कार्यक्रम भी होगा। National Research Centre for Weed science, Mahrajpur Adhartal Jabalpur  के अतिथिगृह में हमें पहुँचना है। मुझे समीर जी ‘उड़न तश्तरी’ की नगरी में अपने दोस्तों से मुलाकात की बेसब्री प्रतीक्षा है।

अभी फिलहाल इतना ही। शेष बातें वर्धा पहुँचने के बाद होंगी। इलाहाबाद से कदाचित्‌ यह मेरी आखिरी पोस्ट होगी। अब वर्धा में स्थापित होने के बाद जल्द ही इसके आगे के अनुभव आप सबकी सेवा में प्रस्तुत करूंगा।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

वर्धा में हमने जो देखा वह अद्‌भुत है…

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सेवाग्राम स्टेशन का निकास द्वाररेलगाड़ी के ठण्डे कूपे से निकलकर बैशाख की चिलचिलाती धूप में जब हम सेवाग्राम स्टेशन पर उतरे तो पल भर में माथे पर पसीना आ गया। पत्थरों और कंक्रीट की इमारतों के बीच हरियाली बहुत विरल थी। तराई क्षेत्र का रहने वाला हूँ इसलिए यह इलाका कुछ ज्यादा ही उजाड़ और वीरान लग रहा था। गर्मी के कारण लोग खुले स्थानों पर प्रायः नहीं थे। स्टेशन से बाहर आकर हमें प्रतीक्षा करती गाड़ी मिल गयी जो काफी देर से धूप में खड़ी रहने के कारण भट्ठी जैसी गरम हो चुकी थी। स्टार्ट होने के बाद इसका ए.सी. चालू हुआ तो एक-दो मिनट में राहत मिल गयी।

सेवाग्राम से वर्धा विश्वविद्यालय की दूरी करीब छः किलोमीटर है। रास्ते में इक्का-दुक्का लोग ही दिखे। हमारे इलाहाबाद की तरह सड़क किनारे लगे लाई-चना-चुरमुरा के खोमचे, खीरा-ककड़ी बेचती औरतें, कच्चे आम का पना बेंचते ठेलेवाले या तरबूज-खरबूज के ढेर लगाकर बैठे कुजड़े वहाँ नहीं दिखे। वर्धा शहर को बायपास करती सड़क से होकर जब हम प्रायः निर्जन इलाके की ओर बढ़ चले तो मेरे मन में उत्सुकता का स्थान व्याकुलता ने ले लिया। गर्म हवा की लपटें सड़क पर दूर चमकते तारकोल से यूँ उठती दिख रही थीं जैसे नीचे किसी हवन कुण्ड में आग जल रही हो। आखिरी मोड़ पर जब गाड़ी मुड़ी तो एक ऊँचे से टीले की ढलान पर सफेद पेण्ट से “महात्मा गांधी अन्तर राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय-वर्धा” बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा हुआ दिखायी पड़ा। अपनी मंजिल के प्रथम साक्षात्कार का यह दृश्य अद्‍भुत लगा।

लेकिन यह शुष्क टीला अपनी तरह का अकेला नहीं था। आस-पास चार-पाँच टीले ऐसे ही दिखायी पड़े जो कदाचित्‌ प्रकृति के कृपापात्र नहीं हो पाये थे। प्रायः वनस्पति विहीन और पथरीले भूभाग पर उठे हुए ये नंगे-ठिगने पहाड़ प्रकृति पर मानव की सत्ता स्थापित होने की कहानी कह रहे थे। इनके शीर्षतल पर जाने के लिए चट्टानों को काटकर बनायी गयी सर्पिल सड़क के किनारे करीने से सजाये गये गमले, शिक्षा संकाय के लिए हाल ही में बने भव्य विद्यापीठ, पुस्तकालय व अन्य मानवनिर्मित भवनों को अन्तिम रूप देती मशीनें और मजदूर, बिजली के खम्भे और उनपर दौड़ती केबिल में प्रवाहित होती विद्युत धारा, निर्माणाधीन पानी की टंकी, पंक्तिबद्ध रोपे गये नये पौधे और उन्हें पानी देने के लिए मीलों दूर से लायी हुई पाइपलाइन  यह बता रही थी कि इस निर्जन पहाड़ पर मानव ने मेधा को तराशने का कारखाना बनाने का मन बना लिया है।

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View Larger Map गूगल अर्थ की उपग्रह तस्वीर में पंचटीला(वर्धा) की पाँच साल पुरानी स्थिति जो अब बहुत बदल गयी है

भव्य तोरणद्वार से प्रवेश कर हमारी गाड़ी फादर कामिल बुल्के अन्तरराष्ट्रीय छात्रावास की सीढ़ियों के पास जाकर रुकी तो बाहर निकलने पर गर्म पत्थर से आँच निकलती सी महसूस हुई। सीढ़ियाँ चढ़कर हम ऊँचे चबूतरे पर पहुँचे। आधुनिक वास्तुकला का सुन्दर नमूना पेश करता हुआ यह भवन भी हाल ही में तैयार हुआ जान पड़ा क्योंकि गूगल अर्थ पर मैने इस प्रांगण को देखने की जो कोशिश की थी उसमें इसका कोई अता-पता नहीं था। इस छात्रावास को फिलहाल गेस्ट हाउस के रूप में भी प्रयोग किया जा रहा है।

दोपहर के दो बजे होंगे जब हम अपने लिए निर्धारित कमरे में पहुँचे। कूलर की ठण्डी हवा मिलते ही हम बिस्तर पर पसर तो गये, लेकिन लम्बी यात्रा के बाद स्नान किए बिना पड़े रहना रास नहीं आया। वहाँ का बाथरूम तो सुसज्जित था लेकिन छत पर रखी टंकी का पानी अपने क्वथनांक के करीब पहुँच चुका था। हमारे पास ‘स्टीम बाथ’ के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प भी नहीं था इसलिए हमने कम से कम पानी खर्च करने का पाठ तत्काल सीखते हुए उसपर अमल भी कर लिया और सज सवँरकर तैयार हो लिए। हमें बताया गया कि मनीषा जी एक-दो घण्टे के भीतर ही वापस आगरा के लिए निकलने वाली हैं। उनसे मिलना तो हमारे प्रमुख उद्देश्यों में से एक था।

हमने उनका फोन मिलाया तो पता चला कि इस इलाके में बी.एस.एन.एल. की सेवाएं बहुत अच्छी नहीं हैं। दूसरे सिरे पर स्थित व्यक्ति के अतिरिक्त दूसरी तमाम आवाजें आ रही थीं लेकिन मनीषा जी अन्त तक यह नहीं बता सकीं कि वे दस-पन्द्रह मिनट में गेस्ट हाउस पहुँचने वाली हैं। खैर, उनकी एक सहयोगी ने बताया कि वो बस आने ही वाली हैं। वन्दना मिश्रा, मनीषा कुलश्रेष्ठ और...मैं

मनीषा जी, यानि मनीषा कुलश्रेष्ठहिन्दीनेस्ट.कॉम की मालकिन और प्रतिष्ठित लेखिका, कवयित्री और सम्पादक। उनकी सहयोगी यानि वन्दना मिश्रा। लखनऊ में रहकर आपने तमाम पुस्तकों का प्रकाशन किया है। प्रसिद्ध लेखक और पत्रकार स्व. अखिलेश मिश्र जी की पुत्री वन्दना जी उस कोर ग्रुप की सदस्य हैं जो विश्वविद्यालय की साहित्यिक वेबसाइट हिन्दीसमय.कॉम की सामग्री के चयन और प्रकाशन के लिए उत्तरदायी है। इस कोर ग्रुप के तीसरे सदस्य अनहद नाद वाले अपने प्रिय ब्लॉगर आदरणीय प्रियंकर जी हैं जो उस समय कोलकाता से इस समिति की बैठक के लिए आये हुए थे। हिन्दी साहित्य के दस लाख पृष्ठ अन्तर्जाल में एक ही पते पर अपलोड करने की महत्वाकांक्षी योजना को कार्यरूप देने के लिए विश्वविद्यालय द्वारा इन विभूतियों को एक साथ सिर जोड़कर कार्य करने हेतु आमन्त्रित किया गया है। इतने कम समय में यह जालस्थल कितनी दूरी तय कर चुका है उसे आप वहाँ जाकर देख सकते हैं।

मनीषा जी अपनी सद्यःप्रकाशित पुस्तक शिग़ाफ लेकर आयी थीं। मैने उन्हें सत्यार्थमित्र की एक प्रति भेंट की। वन्दना जी का एक कविता संग्रह अनामिका प्रकाशन से छपकर शीघ्र ही आने वाला है। मेरे साथ अनामिका प्रकाशन के मालिक विनोद शुक्ला जी ही थे। उन्होंने वन्दना जी और मनीषा जी के साथ फटाफट मेरा फोटो सेशन करा दिया। पुस्तक प्रकाशन के बाजार से लेकर विश्वविद्यालय की अन्तर्जाल सम्बन्धी प्रकाशन योजना पर विस्तृत चर्चा हुई। कुछ देर में ट्रेन का समय नजदीक आया और हम मनीषा जी को विदा करके गेस्ट हाउस की कैण्टीन की ओर चाय लेने चल दिए।

शुद्ध दूध की गाढ़ी चाय बड़े से कप में लबालब भरी हुई आ गयी। वहाँ पहले से ही एक प्रोफ़ेसर साहब बैठकर चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे। मुझे उनका चेहरा परिचित सा जान पड़ा। मैने दरियाफ़्त की तो पता चला कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय से सेवा निवृत्त अंग्रेजी के प्रो.सचिन तिवारी जी हैं। हम करीब पन्द्रह साल पहले मिले थे जब वे कैम्पस थियेटर चलाते थे और मैं पत्रकारिता का विद्यार्थी हुआ करता था। कैण्टीन में राजकिशोर जी मिलेइसी बीच एक छोटेकद के श्यामवर्ण वाले भयंकर बुद्धिजीवी टाइप दिखने वाले महाशय का पदार्पण हुआ। उन्होंने बैठने से पहले ही कैन्टीन के वेटर से कहा कि मुझे बिना चीनी की चाय देना और दूनी मात्रा में देना। यानि कप के बजाय बड़ी गिलास में भरकर। मुझे मन ही मन उनकी काया के रंग का रहस्य सूझ पड़ा और सहज ही उभर आयी मेरे चेहरे की मुस्कान पर उनकी नजर भी पड़ गयी। मैने झेंप मिटाते हुए उनका परिचय पूछ लिया।

वे तपाक से बोले- “मुझे राजकिशोर कहते हैं… दिल्ली से आया हूँ। आप कहाँ से…?”

मेरे यह बताने पर कि मैं इलाहाबाद से आया हूँ और वहाँ कोषाधिकारी हूँ, उन्होंने सीधा सवाल दाग दिया- “अच्छा, ये बताइए कि ट्रेजरी में भ्रष्टाचार की स्थिति अब कैसी है?”

यदि मैं शुद्ध सरकारी अधिकारी होता तो शायद इसका जवाब देना थोड़ा कठिन होता लेकिन समाज के दूसरे पढ़े-लिखे वर्ग से भी सम्पर्क में होने के कारण मैने इसका कुछ दार्शनिक सा उत्तर दे दिया। मैने यह भी बताया कि कम्प्यूटर और सूचना प्रौद्यौगिकी के प्रयोग से अब मनुष्य के हाथ का बहुत सा काम मशीनों को दे दिया गया है इसलिए भ्रष्टाचार करने के अवसर ट्रेजरी में कम होते गये हैं। फिर भी जहाँ अवसर उपलब्ध है वहाँ प्रयास जारी है। लेकिन इस मानवसुलभ प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के प्रयास भी साथ-साथ जारी हैं।

राजकिशोर जी ने इस चर्चा का उपसंहार यह कहते हुए कर दिया कि अब इस मुद्दे को छोड़िए, इसमें कोई दम नहीं बचा है, महंगाई बहुत बढ़ गयी है। मुझे तबतक यह पता चल चुका था कि आज शाम छः बजे गांधी हिल्स पर राजकिशोर जी ‘सभ्यता के भविष्य’ पर अपने विचार व्यक्त करने वाले हैं। गांधीजी की प्रिय बकरीयह सुखद संयोग ही था कि जिनके लेख हम चोखेर बाली और हिन्दी भारत जैसे जालस्थलों पर तथा अनेक पत्र पत्रिकाओं में पढ़ते आ रहे थे उन्हें सजीव सुनने का अवसर मिलने जा रहा था। वार्ता का समय होने तक हम कैण्टीन में ही बात करते रहे और फिर गाड़ी हमें टीले की चोटी पर ले जाने के लिए आ गयी। 

मुख्य टीले पर जाने के लिए जो घुमावदार सड़क बनी हुई है उससे ऊपर पहुँचने पर सड़क की बायीं ओर विकसित किये जा रहे उद्यान में एक बकरी की सुन्दर अनुकृति स्थापित की गयी है। कदाचित्‌ वहाँ गांधी जी के प्रिय पात्रों और उनके उपयोग की वस्तुओं को जुटाने का प्रयास किया गया है। वहीं थोड़ा आगे बढ़ने पर गांधी जी की आदमकद प्रतिमा उनके तीन प्रिय बन्दरों के साथ स्थापित है। हमारे पास उन सबको देखने का समय उस समय नहीं था। हमने सभास्थल पर पहुँचकर विश्वविद्यालय के कुलपति जी से मुलाकात की। कुशल-क्षेम के बाद हम राजकिशोरजी की वार्ता सुनने के लिए गोलाकार सीढ़ीनुमा चबुतरे पर बैठ गये। अर्द्धवृत्ताकार दर्शकदीर्घा के ठीक सामने खड़े लैम्प-पोस्ट के नीचे वार्ताकार का चबूतरा बना था। खुले आकाश के नीचे टीले की चोटी पर बना यह मुक्त गोष्ठी स्थल महानगरीय सभ्यता की शोरगुल भरी भागमभाग जिन्दगी से बिल्कुल अलग एक सुरम्य वातावरण सृजित कर रहा था। इस स्थान पर बैठकर ‘सभ्यता के भविष्य’ के बारे में चिन्तन करते लोग मुझे बहुत भले लगे।

सभ्यता का भविष्ययद्यपि अपनी वार्ता में राजकिशोर जी ने जिस कम्यून पद्धति की ओर लौटने की बात की और वर्तमान उदारवादी लोककल्याणकारी जनतंत्रात्मक राज्य को पूँजीवादी सत्ता करार देते हुए पूरी तरह नकारने योग्य ठहराने का प्रयास किया उससे मैं सहमत नहीं हो सका लेकिन देश के कुछ बड़े बुद्धिजीवियों द्वारा विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच बैठकर इस प्रकार की चर्चा करना बहुत सुखद और आशाजनक लगा। उस छोटी सी दर्शक दीर्घा में कुलपति विभूति नारायण राय के साथ दिल्ली से पधारे हिन्दी के प्रतिष्ठित हस्ताक्षर प्रो. अब्दुल बिस्मिल्लाह, हैदराबाद के प्रो. सुवास कुमार, और विश्वविद्यालय संकाय के प्रो.सूरज पालीवाल व अन्य अनेक आचार्यगण मौजूद थे। राजकिशोर जी ने अपने विशद अध्ययन और दुनियाभर के अनुभवों को यहाँ बाँटते हुए बहुत सी बाते बतायीं जो जन संचार और पत्रकारिता के विद्यार्थियों का दृष्टिकोण प्रभावित करने वाली थी। एक छात्र द्वारा पूरी वार्ता की वीडियो रिकॉर्डिंग भी की गयी जो उनके लिए प्रायोगिक प्रशिक्षण के तौर पर अपेक्षित था।सभ्यता का भविष्य बताते राजकिशोर जी

शाम को कुलपति जी ने हमें डिनर साथ लेने के लिए आमन्त्रित किया। वहाँ पर एक बार फिर बौद्धिक चर्चा शुरू हो गयी। साहित्य, समाज, राजनीति, कला,और शेरो शायरी से भरी हुई वह चर्चा रिकॉर्ड करने लायक थी लेकिन मैं उसके लिए पहले से तैयारी नहीं कर सका था। इसी बीच मशहूर शायर और गीतकार शहरयार का फोन कई बार आता रहा और वहाँ उन्हें आज के जमाने का सबसे बड़ा शायर बताया जाता रहा। प्रो. अब्दुल बिस्मिल्लाह से प्रो. सचिन तिवारी ने सलमान रुश्दी की किताब शैतानी आयते (satanic verses) के बारे में कुछ सवाल किए। उनके जवाब पर काफ़ी देर तक बहस होती रही। पूरा ब्यौरा यहाँ देना सम्भव नहीं है, लेकिन उस परिचर्चा में शामिल होकर हमें बहुत आनन्द आया। अन्त में यह कड़ी समाप्त करने से पहले अब्दुल बिस्मिल्लाह जी द्वारा सुनाये और समझाए गये एक शेर की चर्चा करना चाहता हूँ।

वर्धा में सूर्योदय (१४ अप्रैल,२०१०)बुझा जो रौजने जिन्ना तो हमने समझा है

कि तेरी मांग सितारों से भर गयी होगी।

चमक उठे जो सलासिल तो हमने जाना है

कि अब सहर तेरे रुख पर बिखर गयी होगी॥

हमारे अनेक सुधी पाठक इस शेर से परिचित होंगे। यदि कोई अपनी टिप्पणी के माध्यम से इसके शायर का नाम बताते हुए इसका सन्दर्भ-प्रसंग बताना चाहे तो मुझे बहुत खुशी होगी। अगली कड़ी में इसकी चर्चा के बाद मैं बताऊंगा कि अगले दिन अम्बेडकर जयन्ती के अवसर पर मुझे वहाँ क्या कुछ चमत्कृत करने वाले अनुभव हुए। अभी इतना ही… प्रतीक्षा कीजिए अगली कड़ी का।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) 

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