रेलवे की जुगाड़ सुविधा…

19 टिप्पणियाँ

 

समय: प्रातःकाल 6:30 बजे

स्थान: बर्थ सं.18 – A1, पटना-सिकंदराबाद एक्सप्रेस

इस पोस्ट को लिखने का तात्कालिक कारण तो इस ए.सी. कोच का वह ट्वॉएलेट है जिससे निकलकर मैं अभी-अभी आ रहा हूँ और जिसके दरवाजे पर लिखा है- ‘पाश्चात्य शैली’। लेकिन उसकी चर्चा से पहले बात वहाँ से शुरू करूँगा जहाँ पिछली पोस्ट में छोड़ रखा था।

आप जान चुके हैं कि वर्धा से कार में इलाहाबाद के लिए चला था तो एक चौथाई रास्ता टायर की तलाश में बीता। जबलपुर में टायर मिला तो साथ में एक पोस्ट भी अवतरित हो ली। आगे की राह भी आसान न थी। रीवा से इलाहाबाद की ओर जाने वाला नेशनल हाई-वे पिछले सालों से ही टूटा हुआ है। अब इसकी मरम्मत का काम हो रहा है। नतीज़तन पूरी सड़क बलुआ पत्थर, पथरीली मिट्टी और बेतरतीब गढ्ढों का समुच्चय बनी हुई है। पिछले साल इसी रास्ते से वर्धा जाते समय मुझे करीब चालीस किमी. की दूरी पार करने में ढाई घंटे लग गये थे। इसलिए इस बार मैं सावधान था।

मैंने अपने एक मित्र से वैकल्पिक रास्ता पूछ लिया था जो रीवा से सिरमौर की ओर जाता था; और काफी घूमने-फिरने के बाद रीवा-इलाहाबाद मार्ग पर करीब साठ किमी आगे कटरा नामक बाजार में आकर मिल जाता था। रीवा से सिरमौर तक चिकनी-चुपड़ी सड़क पर चलने के बाद हमें देहाती सड़क मिली जो क्यौटी होते हुए कटरा तक जाती थी। हमें दर्जनों बार रुक-रुककर लोगों से आगे की दिशा पूछनी पड़ी। एक गाँव के बाहर तिराहे पर भ्रम पैदा हो गया जिसे दूर करने के लिए हमें पीछे लौटकर गाँव के भीतर जाना पड़ा। अँधेरा हो चुका था। कोई आदमी बाहर नहीं दिखा। एक घर के सामने गाड़ी रोककर ड्राइवर रास्ता पूछने के लिए उस दरवाजे पर गया। दो मिनट के भीतर कई घरों के आदमी हाथ में टॉर्च लिए गाड़ी के पास इकठ्ठा हो गये। फिर हमें रास्ता बताने वालों की होड़ लग गयी। कम उम्र वालों को चुप कराकर एक बुजुर्गवार ने हमें तफ़्सील से पूरा रास्ता समझा दिया। उनके भीतर हमारी मदद का ऐसा जज़्बा था कि यदि हम चाहते तो वे हमारे साथ हाइ-वे तक चले आते।

खैर, आगे का करीब चालीस किमी. का सर्पाकार देहाती रास्ता प्रायः गढ्ढामुक्त था। रात का समय था इसलिए इक्का-दुक्का सवारी ही सामने से आती मिली। सड़क इतनी पतली थी कि किसी दुपहिया सवारी को पार करने के लिए भी किसी एक को सड़क छोड़ने की नौबत आ जाती। जब हम हाइ-वे पर निकल कर आ गये तो वही क्षत-विक्षत धूल-मिट्टी से अटी पड़ी सड़क सामने थी। उफ़्‌… हम हिचकोले खाते आगे बढ़ते जा रहे थे और सोचते जा रहे थे कि शायद हमारा वैकल्पिक रास्ते का चुनाव काम नहीं आया। खराब सड़क तो फिर भी मिल गयी। हमने कटरा बाजार में गाड़ी रुकवायी। सड़क किनारे दो किशोर आपस में तल्लीनता से बात कर रहे थे। उनमें से एक साइकिल पर था। जमीन से पैर टिकाए। दूसरा मोबाइल पर कमेंट्री सुन रहा था और अपने साथी को बता रहा था।

मैंने पूछा- भाई, यह बताओ यह सड़क अभी कितनी दूर तक ऐसे ही खराब है?

लड़का मुस्कराया- “अंकल जी, अब तो आप ‘कढ़’ आये हैं। पाँच सौ मीटर के बाद तो क्या पूछना। गाड़ी हवा की तरह चलेगी।” उसने अपने दोनो हाथों को हवा में ऐसे लहराया जैसे पानी में मछली के तैरने का प्रदर्शन कर रहा हो। जब हमने बताया कि हम हाई-वे से होकर नहीं आ रहे हैं बल्कि सिरमौर होकर आ रहे हैं तो उसने हमें शाबासी दी और बुद्धिमान बता दिया। बोला- जो लोग हाई-वे से आ रहे हैं उनकी गाड़ी लाल हो जाती है। गेरुए मिट्टी-पत्थर की धूल से। आप अपनी कार  ‘चीन्ह’  नहीं पाते। हमें समझ में आ गया कि आगे का रास्ता बन चुका है। हम खुश हो लिए और आगे चल दिए। इलाहाबाद तक कोई व्यवधान नही हुआ।

इलाहाबाद में सरकारी काम निपटाने के अलावा अनेक लोगों से मिलने का सुख मिला। आदरणीय ज्ञानदत्त पांडेय जी के घर गया। श्रद्धेया रीता भाभी के दर्शन हुए। सपरिवार वर्धा जाकर नौकरी करने के हानि-लाभ पर चर्चा हुई। गुरुदेव के स्वास्थ्य की जानकारी मिली। लम्बे समय तक चिकित्सकीय निगरानी में रहने और लगातार दवाएँ लेते रहने की मजबूरी चेहरे पर स्थिर भाव के रूप में झलक रही थी। वे इस बार कुछ ज्यादा ही गम्भीर दिखे।

प्रयाग में मेरे पूर्व कार्यस्थल-कोषागार से जुड़े जितने भी अधिकारी-कर्मचारी और इष्टमित्र मिले उन सबका मत यही था कि मुझे अपना प्रदेश और इलाहाबाद छोड़कर बाहर नहीं जाना चाहिए था। इस विषय पर फिर कभी चर्चा होगी।

वर्धा वापस लौटने का कार्यक्रम रेलगाड़ी से बना। दिन भर मंगल-व्रत का फलाहार लेने के बाद शाम को एक मित्र की गृहिणी के हाथ की बनी रोटी और दही से व्रत का समाहार करके मैं स्टेशन आ गया। अनामिका प्रकाशन के विनोद शुक्ल और वचन पत्रिका के संपादक प्रकाश त्रिपाठी गाड़ी तक विदा करने आये। उन्हें हार्दिक धन्यवाद देकर हम विदा हुए। रात में अच्छी नींद आयी।

आज सुबह जब हम ‘पाश्चात्य शैली’ के शौचालय में गये तो वहाँ का अद्‌भुत नजारा देखकर मुस्कराए बिना न रह सके। साथ ही पछताने लगे कि काश कैमरा साथ होता। फिलहाल ट्वॉएलेट की देखभाल करने वालों के बुद्धि-कौशल और गरीबी में भी काम चला लेने की भारतीय प्रतिभा का नमूना पेश करते इस ए.सी. कोच के पश्चिमी बनावट वाले शौचालय की कुछ तस्वीरें मैंने अपने मोबाइल से ही खींच डाली हैं। खास आपके लिए। देखिए न…

IMG0069A भारत की एक बड़ी आबादी जैसे स्थानों पर शौच आदि से निवृत्त होती है उससे बेहतर सफाई है यहाँ। यह दीगर बात है कि सीट को ट्‍वाएलेट पेपर से अपने हाथों साफ़ करने के बाद फोटो लेने का विचार आया।
Smile 
IMG0070A ट्‍वाएलेट पेपर …? पूरा बंडल उपलब्ध है जी। भले ही इसे रखे जाने का मूल बक्सा बेकार हो गया है लेकिन ठेकेदार ने इसे पॉलीथीन से बाँधकर वहीं लटका छोड़ा है। इसे प्रयोगार्थ निकालने के लिए थोड़ी ही मशक्कत करनी पड़ी।
Smile
IMG0061A हाथ धुलने के लिए पेपर सोप रखने की कोई जरूरत नहीं। रेलवे द्वारा लिक्विड सोप की सुविधा गारंटीड है। इसे रखने की डिबिया अपने स्थान से उखड़ गयी तो भी कोई बात नहीं।  ‘रेलनीर’  की बोतल तो है। साबुन भरकर बेसिन के बगल में ही लटका रखा है। जी भर इस्तेमाल करें।
Smile
IMG0062A ट्‍वाएलेट पेपर रोल को पॉलीथीन से बाँध कर रखने का काम बहुत बुद्धिमानी से किया गया है। स्टील फ्रेम में न होने के बावजूद यह नाचता भी है और थोड़ी  मेहनत करने पर टुकड़ों में निकल भी आता है। मनोरंजक भी है और स्किल टेस्टिंग भी…
Smile
IMG0068A येजो चमक रहे हैं उनमें एक स्टील का जग है, पानी की टोटी है, और स्वयं पानी है जो नीचे जमा है। जो नहीं चमक रही है वह लोहे की जंजीर है जिससे जग बँधा हुआ है। कौन जाने यह कीमती जग किसी को भा जाय और दूसरे यात्रियों को परेशानी उठानी पड़े। इसीलिए बाँध के डाल दिया होगा।
Smile
IMG0066A यदि आप पेपर का प्रयोग नहीं कर पाते और संयोग से टंकी का पानी खत्म होने के बाद आपकी बारी आयी तो क्या करेंगे? चिंता मत करिए…। एक बोतल एक्स्ट्रा पानी भी में डाल दिया गया है उधर कोने में…
Smile
रेल  हमारी सुविधाओं का कितना
ख्याल रखती है

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

Advertisements

शुक्रवारी की परंपरा से…

15 टिप्पणियाँ

“सृजन और नयी मनुष्यता की समस्याएँ” विषयक वार्ता और विमर्श: श्री प्रकाश मिश्र

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के प्रांगण में यूँ तो नियमित अध्ययन-अध्यापन से इतर विशिष्ट विषयपरक गोष्ठियों, सेमिनारों व साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को निरंतर आयोजित किये जाने की  प्रेरणा वर्तमान कुलपति द्वारा सदैव दी जाती रही है, लेकिन इन सबमें ‘शुक्रवारी’ का आयोजन एक अनूठा प्रयास साबित हो रहा है।

परिसर में बौद्धिक विचार-विमर्श को सुव्यवस्थित रूप देने के लिए ‘शुक्रवारी’ नाम से एक  समिति का गठन किया गया है। इस समिति के संयोजक हैं ख्यातिनाम स्तंभकार व विश्वविद्यालय के  ‘राइटर इन रेजीडेंस’ राजकिशोर। यहाँ के कुछ शिक्षकों को इसमें सह-संयोजक की जिम्मेदारी भी सौंपी गयी है। विश्वविद्यालय परिवार के सभी सदस्य इस साप्ताहिक चर्चा शृंखला में भागीदारी के लिए सादर आमंत्रित होते हैं। शुक्रवारी की बैठक हर शुक्रवार को विश्वविद्यालय के परिसर में किसी उपयुक्त जगह पर होती है जो विशिष्ट वक्ता और वार्ता के विषय के चयन के साथ ही निर्धारित कर ली जाती है। इस अनौपचारिक विमर्श के मंच पर परिसर से बाहर के अनेक अतिथियों ने भी बहुत अच्छी वार्ताएँ दी हैं। वार्ता समाप्त होने के बाद खुले सत्र में उपस्थित विद्यार्थियों और अन्य सदस्यों द्वारा उठाये गये प्रश्नों पर भी वार्ताकार द्वारा उत्तर दिया जाता है और बहुत सजीव बहस उभर कर आती है।

गत दिवस मुझे भी ‘शुक्रवारी’ में भाग लेने का अवसर मिला। इस गोष्ठी में कुलपति जी स्वयं उपस्थित थे। इस बार के वार्ताकार थे प्रतिष्ठित कवि, उपन्यासकार, आलोचक व साहित्यिक पत्रिका ‘उन्नयन’ के संपादक श्रीप्रकाश मिश्र। उनकी वार्ता का विषय था “सृजन और नयी मनुष्यता की समस्याएँ”। उनकी वार्ता सुनने से पहले तो मुझे इस विषय को समझने में ही कठिनाई महसूस हो रही थी लेकिन जब मैं गोष्ठी समाप्त होने के बाद बाहर निकला तो बहुत सी नयी बातों से परिचित हो चुका था; साथ ही श्री मिश्र के विशद अध्ययन, विद्वता व वक्तृता से अभिभूत भी। श्रीप्रकाश मिश्र वर्धा के स्टाफ के साथ

(बायें से दायें) मो.शीस खान (वित्ताधिकारी), शंभु गुप्त (आलोचक), प्रोफ़ेसर के.के.सिंह और श्री प्रकाश मिश्र

अबतक दो कविता संग्रह, दो उपन्यास और तीन आलोचना ग्रंथ प्रकाशित करा चुके श्री मिश्र का तीसरा काव्य संग्रह और दो उपन्यास शीघ्र ही छपकर आने वाले हैं। आप बीस से अधिक वर्षो से साहित्यिक पत्रिका ‘उन्नयन’ का सम्पादन कर रहे हैं जो साहित्यालोचना के क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित स्थान पा चुकी है। आलोचना के लिए प्रतिवर्ष ‘रामविलास शर्मा आलोचना सम्मान’ इसी प्रकाशन द्वारा प्रायोजित किया जाता है। यह सारा सृजन श्रीप्रकाश जी द्वारा केंद्रीय पुलिस संगठन में उच्चपदों पर कार्यरत रहते हुए किया गया है।

अपने उद्‌बोधन में उन्होंने सृजन की अवधारणा को समझाते हुए कहा कि सृजन एक प्रक्रिया है- बनाने की प्रक्रिया- जिसे मनुष्य अपनाता है। उस बनाने की कुछ सामग्री होती है, कुछ उपकरण होते हैं और उसका एक उद्देश्य होता है। उद्देश्य के आधार पर वह कला की श्रेणी में आता है तो सामग्री और उपकरण के आधार पर संगीत, चित्र, मूर्ति, वास्तु, साहित्य -और साहित्य में भी काव्य, नाटक, कथा आदि – कहा जाता है। इसमें संगीत सबसे सूक्ष्म होता है और वास्तु सबसे स्थूल। सृजन मूल्यों की स्थापना करता है जो सौंदर्य के माध्यम से होती है। इसका उद्देश्य वृहत्तर मानवता का कल्याण होता है। साहित्य के माध्यम से यह कार्य अधिक होता है।

सृजन को चिंतन से भिन्न बताते हुए उन्होंने कहा कि चिंतन विवेक की देन होता है जबकि सृजन का आधार अनुभूति होती है। इस अनुभूति के आधार पर संवेदना के माध्यम से वहाँ एक चाहत की दुनिया रची जाती है जिसका संबंध मस्तिष्क से अधिक हृदय से होता है। लेकिन सृजन में अनुभूति के साथ-साथ विवेक और कल्पना की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं होती है।

मूल्यों की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि इनका महत्व इसलिए नहीं होता कि वे जीवन में पूरे के पूरे उतार लिये जाते हैं; बल्कि इसलिए होता है कि एक पूरा समुदाय उन्हें महत्वपूर्ण मानता है, उन्हें जीवन का उद्देश्य मानता है- व्यक्ति के भी और समुदाय के भी- उससे भी बढ़कर इसे वह आचरण का मानदंड मानता है। मूल्य मनुष्य की गरिमा की प्रतिष्ठा करते हैं। सृजनकर्ता का दायित्व उस गरिमा में संवेदनाजन्य आत्मा की प्रतिष्ठा करना होता है जिसका निर्वाह बहुत वेदनापूर्ण होता है। सृजन के हर क्षण उसे इसका निर्वाह करना होता है।

मनुष्यता को अक्सर संकट में घिरा हुआ बताते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान में मनुष्यता पर जो संकट आया हुआ है वह दुनिया के एक-ध्रुवीय हो जाने से उत्पन्न हुआ है। उन्होंने रसेल होवान के उपन्यास ‘रिडले वाकर’, डेविड प्रिन के ‘पोस्टमैन’, कामार्क मेकॉर्थी के ‘द रोड’ का उल्लेख करते हुए बताया कि ज्ञानोदय द्वारा रचित मनुष्य की प्रगति और विकास की सभी योजनाएँ आज इतनी संकट में हैं कि उनका अंत ही आ गया है। सच पूछिए तो मनुष्य की मूलभूत अवधारणा ही संकट में है; और यह संकट वास्तविक है। जिस प्रौद्यौगिकी पर मनुष्य ने भरोसा करना सीखा है वह उसके विरुद्ध हो गयी है।

हमारी दुनिया वास्तविक न रहकर आभासित बन गयी है और आदमी मनुष्य न रहकर ‘साइबोर्ग’ बन गया है। साईबोर्ग यानि- “A human being prosthetically inhanced, or hybridized with electronic or mechanical components which interact with its own biological system.”

जलवायु वैज्ञानिक जेम्स लवलॉक का कहना है कि धरती को खोदकर, जल को सुखाकर, और वातावरण को प्रदू्षित कर हम कुछ इस तरह से जीने लगे हैं कि मनुष्य का जीवन बहुत तेजी से विनाश की ओर बढ़ने लगा है। धरती के किसी अन्य ग्रह से टकराने से पहले ही ओज़ोन की फटती हुई पर्त, समुद्र का बढ़ता हुआ पानी, धरती के पेट से निकलती हुई गैस और फटते हुए ज्वालामुखी मनुष्य जाति को विनष्ट कर देंगे।

जॉन ग्रे कहते हैं कि मनुष्य तमाम प्राणियों में एक प्राणी ही है; और उसे अलग से बचाकर रखने के लिए पृथ्वी के पास कोई कारण नहीं है। यदि मनुष्य के कारन कारण पृथ्वी को खतरा उत्पन्न होगा तो वह मनुष्य का ही अंत कर सकती है। वह नहीं रहेगा तो पृथ्वी बच जाएगी। दूसरे प्राणियों का जीवन चलता रहेगा। इस प्रकार राष्ट्रों की आंतरिक नीतियों के कारण मनुष्य का जीवन खतरे में है।

इस खतरे के प्रति कौन आगाह करेगा, उससे कौन बचाएगा? सृजन ही न…!!!

श्री मिश्र ने विश्व की शक्तियों के ध्रुवीकरण और इस्लामिक और गैर-इस्लामिक खेमों के उभरने तथा विश्व की एकमात्र महाशक्ति द्वारा किसी न किसी बहाने अपने विरोधियों का क्रूर दमन करने की नीति का उल्लेख करते हुए  भयंकर युद्ध की सम्भावना की ओर ध्यान दिलाया। आतंकवाद ही नहीं आणविक युद्ध की भयावहता धरती से आकाश तक घनीभूत होती जा रही है। पश्चिमी प्रचार तंत्र द्वारा यह दिखाया जा रहा है कि सभ्य दुनिया बर्बर दुनिया से लड़ने निकल पड़ी है।

अपने विस्तृत उद्‌बोधन में उन्होंने वर्तमान वैश्विक परिदृश्य के तमाम लक्षणों और दुनिया भर में रचे जा रहे साहित्य में उसकी छाया का उल्लेख करते हुए मनुष्यता की अनेक समस्याओं कि ओर ध्यान दिलाया और उनके समाधान की राह तलाशने की जिम्मेदारी सृजनशील बुद्धिजीवियों के ऊपर डालते हुए मिशेल फूको का उद्धरण दिया जिनके अनुसार पश्चिम का समकालीन सृजन मनुष्यता संबंधी इन तमाम चुनौतियों को स्वीकार करने में सक्षम नहीं दिख रहा है। लेकिन, उन्होंने बताया कि अमेरिकन विचारक ब्राउन ली के मत से सहमत होते हुए कहा कि इतना निराश होने की जरूरत नहीं है। अभी भी एशिया, अफ़्रीका और लातिनी अमेरिका का सृजन संबंधी चिंतन मनुष्य को बचाये रखने में और मनुष्यता संबंधी मूल्यों की प्रगति में कुछ योग दे सकता है।

इस लम्बी वार्ता की सभी बातें इस ब्लॉग पोस्ट में समाहित नहीं की जा सकती। उनका पूर्ण आलेख शीघ्र ही विश्वविद्यालय की साहित्यिक वेब साइट (हिंदीसमय[डॉट]कॉम और त्रैमासिक बहुवचन में प्रकाशित किया जाएगा।

निश्चित रूप से शुक्रवारी की जो परंपरा शुरू की गयी है उससे अनेक मुद्दों पर विचार मंथन की प्रक्रिया तेज होने वाली है। वार्ता के बाद वहाँ उपस्थित विद्यार्थियों ने जिस प्रकार के गम्भीर प्रश्न पूछे और विद्वान वक्ता द्वारा जिस कुशलता से उनका समाधान किया गया वह चमत्कृत करने वाला था। हमारी कोशिश होगी कि शुक्रवारी में होने वाली चर्चा आपसे समय-समय पर विश्वविद्यालय के ब्लॉग के माध्यम से बाँटी जाय।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

दास्ताने स्कूटर… बहुत कठिन है डगर।

13 टिप्पणियाँ

पिछली कड़ी में आपने पढ़ा…

…तभी एक हँसमुख डॉक्टर साहब ने मुस्कराते हुए कहा- “मुझे इसका बहुत अच्छा अनुभव है। आपकी समस्या का जो पक्का समाधान है वह मैं बताता हूँ…। ऐसा कीजिए इसे जल्दी से जल्दी बेंच दीजिए…। जो भी दो-तीन हजार मिल जाय उसे लेकर खुश हो जाइए और मेरी तरह शेल्फ़-स्टार्ट वाली स्कूटी ले लीजिए…” वहाँ उपस्थित सभी लोग ठठाकर हँस पड़े, इनका चेहरा उतर गया और मेरे पहियों के नीचे से जमीन खिसक गयी…।

अब आगे…

लेकिन इन्होंने धैर्य नहीं खोया। बोले- “बेंचने का तो मैंने कभी सोचा ही नहीं; अधिक से अधिक मैं इसे वापस उत्तर प्रदेश भेज दूंगा। वहाँ पर इसके स्पेयर पार्ट्स मिल जाएंगे। …आपलोग बस इतना कन्फ़र्म कर दीजिए कि उद्योगपति जमनालालाल बजाज के मूलस्थान वर्धा में बजाज स्कूटर का एक भी मिस्त्री नहीं है। दीपक तले अंधेरा की इस मिसाल को मैं पूरी दुनिया को बता लूँगा उसके बाद ही हार मानूंगा।” इतना सुनने के बाद वहाँ के डिप्टी स्पोर्ट्स ऑफीसर ने कहा कि आप घबराइए नहीं; मैं आपको एक एक्सपर्ट के पास ले चलता हूँ। मेरे मुहल्ले में रहता है। इन्होंने मुझे उनकी बाइक के पीछे लगा दिया। कई चौराहों, तिराहों और अंधे मोड़ों को पार करते हुए, मोटी-पतली गलियों से गुजरते हुए हम अंततः एक मिस्त्री के दरवाजे पर जा पहुँचे। सुबह आठ बजे का वक्त था और उसके छोटे से अहाते से लेकर बाहर सड़क तक पंद्रह-बीस मोटरसाइकिलें आड़े-तिरछे खड़ी हुईं थीं। इन्होंने उचक-उचक कर देखा, उस भीड़ में एक भी स्कूटर नहीं दिखा।

‘नितिन मिस्त्री’ ने अभी काम शुरू नहीं किया था। ये सभी गाड़ियाँ पिछले दिन इलाज के लिए भर्ती हुईं थीं। उस भीड़ की ओर देखते हुए स्पोर्ट्स ऑफीसर ने भावपूर्ण मुस्कान बिखेरी। मानो कह रहे हों- “देखा, कितना बड़ा मिस्त्री है… गाड़ियों की लाइन लगी है। एक दिन जमा करो तो दूसरे-तीसरे दिन नम्बर लगता है”

मुझे उस मुस्कान में कोई आशा की किरण नहीं दिखी। यदि बोल पाता तो मैं कहता- “हाँ देख रहा हूँ… कितना चिरकुट मिस्त्री है। आठ-गुणा-आठ फुट के कमरे में तीन-चार बच्चो और पत्नी के साथ रह रहा है और साथ में शायद एक छोटा भाई भी है। इतनी ही कमाई होती तो एक बड़ा गैरेज न बना लेता…!! काम अधिक है तो असिस्टेंट रख लेता, स्टाफ़ बढ़ा लेता…!!!”  दर‌असल मुझे वहाँ ‘प्रोफ़ेसनलिज़्म’ का घोर अभाव दिखायी दे रहा था।

स्पोर्ट्स ऑफीसर ने नितिन मिस्त्री को बुलाया जो ब्रश करते हुए बाहर निकला। आपस में दोनो ने मराठी में कुछ बात की। वे शायद हम नये ग्राहकों का परिचय बता रहे थे। कुछ देर बाद मिस्त्री मेरे मालिक से मुखातिब हुआ, “सर जी, हम इसको देख तो लेंगा लेकिन इसमें कोई स्पेयर पार्ट ‘लगेंगा’ तो यहाँ नहीं मिल ‘पायेंगा’।  नागपुर से आपको मँगाना पड़ेंगा…” हमें इस बात की उम्मीद तो पहले से ही थी इसलिए उसके बाद तय यह हुआ कि मिस्त्री मेरी जनरल सर्विसिंग करेगा। मेरी हेड लाइट का स्विच जाम हो गया है उसकी ऑयलिंग-ग्रीसिंग करेगा, पुरानी हो चुकी बैटरी बदल देगा ताकि हॉर्न और लाइट तेज हो सके, लेकिन ‘चोक-वायर’ की समस्या ठीक होने की गारंटी नहीं होगी। कोई जुगाड़ आजमाने की कोशिश करेगा लेकिन सफलता की संभावना क्षीण ही है। इन्होंने जब संभावित समय पूछा तो मध्यस्थ महोदय के दबाव में उसने मुझे ‘अगले दिन भर्ती कर लेने’ पर सहमति दे दी।

अगले दिन स्टेडियम से हम दुबारा उसकी दुकान पर पहुँचे। मिस्त्री ने इन्हें घर तक छोड़ा और मुझे वापस अपने घर/दुकान/गैरेज पर ले जाकर खड़ा कर दिया। मैं दिन भर दूसरी बाइक्स का आना-जाना देखता रहा। मिस्त्री वास्तव में बहुत बिजी था। उसकी मेहनत की तुलना में उसका मेहनताना बहुत कम था। ज्यादातर ग्राहक उसके परिचित टाइप थे जो छोटी-मोटी गड़बड़ियाँ मुफ़्त में ठीक कराने की फिराक में लगे रहते थे। पिछले दिन से भर्ती गाड़ियाँ एक-एक कर जाती रहीं और शाम तक उतनी दूसरी गाड़ियाँ आकर जमा हो गयीं। मेरी पैरवी करने वाला कोई नहीं था, इसलिए मुझे शाम होने तक उसने हाथ नहीं लगाया। शाम को छः बजे मेरे मालिक का फोन आया कि काम पूरा हो गया हो तो मुझे लेने आ जाँय। ऑफिस से छूटते वक्त इन्होंने फोन किया होगा। इधर से मिस्त्री ने जवाब दिया कि अभी थोड़ा काम बाकी रह गया है। एकाध घंटे बाद हो पाएगा। फोन पर मिस्त्री के हाव-भाव से लगा कि वे इस समय मुझे लेने नहीं आ रहे हैं, क्योंकि उसने उस फोन के बाद भी मुझे छुआ नहीं था।

अगले दिन सुबह आठ बजे ये स्टेडियम से खेलकर कार से गैरेज पर  आये तो मेरी बारी आ चुकी थी। हेडलाइट का स्विच ठीक हो चुका था लेकिन असली समस्या जस की तस थी। मिस्त्री ने उन्हें बताया कि स्कूटर के लिए ‘ओरिजिनल बैटरी’ कल मिल नहीं पायी थी। आज मँगाया है। शाम तक मैं चोक का भी कुछ कर दूँगा। ये चले गये तो उसने दूसरी गाड़ियों का काम शुरू कर दिया। आखिरकार दोपहर बाद बैटरी बदली गयी। शाम को ये आये तो मिस्त्री ने चोक की समस्या न ठीक कर पाने के कई कारण गिनाने शुरू किए। इन्होंने उससे पारिश्रमिक पूछकर डेढ़ हजार रूपये थमाए और मुझे लेकर घर आ गये।

अगले दिन से इन्होंने चोक वायर की खोज शुरू की। इनके एक मित्र इलाहाबाद से वर्धा आने वाले थे। उनसे इन्होंने कहा कि बजाज-लीजेंड में जितने किस्म के ‘वायर’ लगते हों सभी वहाँ से लेते आयें। एक सप्ताह बाद क्लच-वायर, एक्सीलरेटर-वायर और चोक वायर इलाहाबाद से वर्धा की यात्रा करके आ गये। अगले दिन चोक वायर के साथ मुझे नितिन के गैरेज़ भेजा गया। एक बार फिर चौबीस घंटे की प्रतीक्षा के बाद नम्बर आया। लेकिन दुर्भाग्य के क्षण अभी समाप्त नहीं हुए थे…Sad smile

पुराना केबल निकालकर नया केबल डालने में उसके पसीने छूट गये। अंततः उसने हार मान ली। फोन करके इसने बता दिया कि इलाहाबाद से मँगाया हुआ चोक-वायर इस मॉडल का नहीं हैं इसलिए नहीं लग सकता। फिर एक विचित्र जुगाड़ लगाने का काम शुरू हुआ। चोक वायर के दोनो सिरों पर घुंडियाँ होती हैं। एक सिरा दाहिनी हैंडिल के पास बने लीवर के खाँचे में फिट होता है और दूसरा सिरा कार्ब्यूरेटर में जाता है जहाँ एक स्प्रिंग के साथ जोड़कर इसे खास तरीके से फिट किया जाता है। नितिन मिस्त्री ने एक पुराने तार के घुंडी वाले सिरे को नीचे कार्ब्यूरेटर में तो फिट कर दिया लेकिन दूसरे सिरे को उसके सही रूट से हैंडिल तक ले जाने के बजाय सीट के नीचे से दाहिनी ओर बाहर निकाल दिया और उसमें एक छल्ला बना दिया। इस प्रकार चोक लेने के लिए सीट के नीचे छिपे छल्ले को बाहर निकालकर उसमें उंगली फसाते हुए जोर से खींचना होता था और फिर इसी स्थिति में किक मारना होता था।

जुगाड़ वाला चोक लगवाकर हम घर आये। लेकिन इसमें एक बड़ी खामी रह गयी थी। छल्ला पकड़कर जोर से खींचने पर चोक लेने की प्रक्रिया तो पूरी हो गयी लेकिन छोड़ने पर तार ठीक से वापस नहीं हो पा रहा था। नतीजा यह हुआ कि एक बार चोक में ही तार अटका रह गया और मेरे मालिक मुझे चोक में ही हाँकते रहे। अलस्सुबह जब पहली किक में ही मैं भरभराकर स्टार्ट हो गया तो इन्हें कुछ संदेह तो हुआ लेकिन एक दो बार उस तार की पूँछ उल्टा घुसेड़ने के अलावा ये कुछ न कर सके। इनका संदेह यकीन में तब बदला जब मेरी टंकी का पेट्रोल सम्भावित समय से बहुत पहले ही खत्म हो गया। मुझे एक बार फिर उसी नितिन के पास जाना पड़ा। उसने ढ‌क्‌कन खोलकर फँसा हुआ तार छुड़ा दिया और तार को ‘आहिस्ता खींचने’ की ट्रेनिंग देकर चलता कर दिया।

अब दो-चार दिन के अभ्यास से काम आसान होता गया और जुगाड़ चल निकला। लेकिन एक दूसरी समस्या तैयार खड़ी थी।  अचानक क्लच वायर की घुंडी भी तीन-चार साल की सेवा देकर चल बसी। गनीमत थी कि यह दुर्घटना घर पर ही हुई, इसलिए मुझे ठेलकर चलाने की जरुरत नहीं पड़ी। वैसे तो नया क्लच वायर डालने में पाँच से दस मिनट ही लगते हैं लेकिन मिस्त्री की तलाश में ही तीन दिन लग गये। मुझको बिना क्लच के स्टार्ट करके दुकान तक ले जाना संभव नहीं था। इन्होंने नितिन मिस्त्री को फोन मिलाया तो उसने असमर्थता जताते हुए ‘ऑउट ऑफ़ स्टेशन’ होने की बात बतायी। दूसरी कई दुकानों पर संपर्क किया गया तो सबने कहा कि दुकान छोड़कर नहीं जाएंगे। गाड़ी यहीं लाइए, यह भी कि गाड़ी देखकर ही बता पाएंगे कि काम हो पाएगा कि नहीं। रोज़ शाम को ये घर आते और अपनी असफलता की कहानी मालकिन को सुनाते। मैं  उत्सुकता पूर्वक रोज किसी मिस्त्री की प्रतीक्षा करता रहा।

अंततः इन्होंने विश्वविद्यालय के इंजीनियर साहब को, जो यहाँ का स्थानीय निवासी ही हैं, मेरी समस्या बताकर एक मिस्त्री का जुगाड़ करने का अनुरोध किया। उन्होंने विश्वास दिलाया कि बहुत जल्द मेरा काम हो जाएगा। दो-दिन और बीते तब अचानक इनके ऑफ़िस का एक कर्मचारी एक मिस्त्री को लेकर आया और उसने दस मिनट में एक क्लच वायर फिट कर दिया। इलाहाबाद से आया क्लच-वायर का केबल पड़ा रह गया। इन्होंने उस मिस्त्री से अनुरोध किया कि यदि हो सके तो चोक वायर को उसके सही स्थान पर फिट कर दो। इसपर उसने कहा कि किसी दिन फुर्सत से गाड़ी दुकान पर भेज दीजिएगा। ठीक करा दूँगा।

अगले इतवार को इन्होंने स्वयं उसकी दुकान पर जाकर चोक वायर डलवाने का निश्चय किया। लेकिन जब इन्होंने मोबाइल पर आने की अनुमति माँगी तो उसने टरकाते हुए कहा कि आज वह मिस्त्री आया ही नहीं है जो इस काम का एक्सपर्ट है।

इतना सुनने के बाद कोई भी झुँझलाकर सिर पीट लेता। लेकिन दाद देनी पड़ेगी इनके धैर्य की और काम पूरा कराने की जिद्दी धुन की। ये चोक वायर की केबिल डिक्की में डाल मुझे लेकर शहर की ओर निकल पड़े। पूछते-पू्छते बजाज कंपनी की अधिकृत वर्कशॉप पर जा पहुँचे। वही वर्कशॉप जहाँ से बहुत पहले मुझे बैरंग लौटाया जा चुका था। उसबार इनके चपरासी ने मुझे वहाँ ले जाकर सर्विसिंग कराने की असफल कोशिश की थी। तब किसी मिस्त्री ने मुझे घास नहीं डाली थी। कहते थे कि इस शहर में यह गाड़ी है ही नहीं इसलिए हम इसका स्पेयर पार्ट नहीं रखते। कंपनी के नियमों के अनुसार हम बाहर से मँगाकर कोई स्पेयरपार्ट डाल भी नहीं सकते।

इस बार भी यही टका सा जवाब इन्हें मिला। लेकिन इन्होंने मैनेजर से बहस करनी शुरू की। बोले- यदि बजाज कंपनी ने मुझे यह स्कूटर बेचा है और आपको सर्विस सेंटर चलाने का लाइसेंस दिया है तो आपको इसे ठीक करना ही चाहिए…। यह कैसे होगा यह आप जानिए, लेकिन आप बिना सर्विस दिए लौटा नहीं सकते…। मैं इसके लिए ‘राहुल बजाज’ को भी एप्रोच कर सकता हूँ…। आपकी कम्पलेंण्ट करके कुछ नुकसान तो करा ही सकता हूँ। आप अपने उत्तरदायित्व से भाग नहीं सकते… कुछ तो संवेदनशील होना सीखिए आप लोग…  आदि-आदि। मैनेजर भौचक होकर देख रहा था। …फिर इनका पूरा परिचय पूछने लगा।

एक मिस्त्री ने इनको किनारे ले जाकर प्रस्ताव रखा कि सामने जो प्राइवेट मिस्त्री ने दुकान खोल रखी है वह स्कूटर का स्पेशलिस्ट  है। मैं उससे बोल देता हूँ कि आपका चोक वायर डाल दे। लेकिन इन्होंने ठान लिया था कि काम यहीं से कराकर जाना है। अब और भटकने को तैयार नहीं थे ये। इनकी मंशा भाँपकर वहाँ सबने आपस में बात की और भीतर काम कर रहे एक मिस्त्री को बुलाया गया। उस मिस्त्री ने मुझे देखकर पहचान लिया। उसी ने पिछली बार मुझे छू-छाकर छोड़ दिया था। लेकिन इस बार उसे मैनेजर द्वारा समझाया गया कि काम करना ही है, चाहे जैसे हो। जनार्दन मिस्त्री ने बेमन से तैयार होते हुए आखिरी दाँव चला। साहब जी, इसे छोड़कर जाना पड़ेगा। तीन-चार घण्टे लगेंगे। न हो तो कल सुबह लेकर आ जाओ।

लेकिन ये टस से मस न हुए। बोले- आज मेरी छुट्टी है। मैं पूरा दिन यहीं बैठने को तैयार हूँ। बस अब आगे के लिए नहीं टाल सकता। देखते-देखते सभी मिस्त्री वहाँ से चले गये, एक आदमी दुकान का शटर गिराने लगा। इन्होंने पूछा तो बताया गया कि लंच ब्रेक हो गया है अब तीन बजे से काम शुरू होगा। ये अड़े रहे कि मैं काम पूरा कराकर ही जाऊँगा, आपलोग लंच करके आइए। इसपर उस मिस्त्री ने मुझे स्टैंड से उतारा और भीतर की ओर लेकर चला गया। इनको पिछले दरवाजे से आने के लिए कह दिया।

जब ये पिछले दरवाजे से भीतरी अहाते में पहुँचे तो जनार्दन मिस्त्री अपना टिफिन समाप्त करने वाला था। हाथ धोकर उसने मेरी डिक्की से केबल निकाला, दोनो सिरों की घुंडियों का मुआइना किया और इंजन का ढक्कन उतारकर पुरानी केबल के उपरी सिरे से नयी केबल का निचला सिरा एक पतले तार से बाँध दिया। फिर पुरानी केबल के निचले सिरे को धीरे-धीरे खींचकर बाहर निकालने लगा। इस प्रकार दो-तीन मिनट में ही पुरानी केबल का स्थान नयी केबल ने ले लिया। केबल के भीतर दौड़ रहे चोक-वायर के दोनो सिरों को उनके जायज स्थानों में फिट करने में पाँच मिनट और लगे। इस प्रकार पूरा काम पंद्रह मिनट का ही निकला।

मेरे मालिक इस टुच्चे से काम पर इतना समय और दौड़-धूप करने के बाद मन ही मन कुढ़ तो रहे ही थे लेकिन अंततः मिली अपनी सफलता पर प्रसन्न भी हो गये थे। इन्होंने उस मिस्त्री को पचास रूपये देने का मन बनाया था, लेकिन देने से पहले आदतन उससे ही पूछ लिया। पहले तो उसने संकोच किया लेकिन जब इन्होंने कहा कि ‘काम मेरे मनमाफ़िक और दाम तुम्हारी इच्छानुसार’ तो उसने अपनी फीस माँगी- 20/- रूपये।

प्रस्तुति : सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

हाय, मैं फुटबॉल का दीवाना न हुआ… पर हिंदी का हूँ !!

24 टिप्पणियाँ

 

इलाहाबाद से वर्धा आकर नये घर में गृहस्थी जमाने के दौरान फुटबॉल विश्वकप के मैच न देख पाने का अफ़सोस तो मुझे था लेकिन जब मैने इसका प्रसारण समय जाना तो मन को थोड़ी राहत मिल गयी। यदि मेरा टीवी चालू रहता और केबल वाला कनेक्शन भी जोड़ चुका होता तबभी देर रात जागकर मैच देखना मेरे वश की बात नहीं होती। इस खेल के लिए मेरे मन में वैसा जुनून कभी नहीं रहा कि अपनी दिनचर्या को बुरी तरह बिगाड़ लूँ। जैसे-जैसे टुर्नामेण्ट आगे बढ़ता गया इसकी चर्चा का दायरा भी फैलता गया। ऑफ़िस से लेकर कैंटीन तक और गेस्ट हाउस से लेकर घर के नुक्कड़ तक जहाँ देखिए वहीं चर्चा फुटबॉल की। मैं इसमें सक्रिय रूप से शामिल नहीं हो पाता क्योंकि मैं कोई मैच देख ही नहीं पा रहा था।कांस्य पदक के साथ जर्मन खिलाड़ी

हमारे कुलपति जी रात में मैच भी देखते और सुबह हम लोगों के साथ साढ़े पाँच बजे टहलने के लिए भी निकल पड़ते। आदरणीय दिनेश जी ने तो रतजगा करने के बाद मैच की रिपोर्ट ठेलना भी शुरू कर दिया। मैने अखबारों से लेकर न्यूज चैनेलों तक जब इस खेल का बुखार चढ़ा हुआ देखा तो मुझे अपने भीतर कुछ कमी नजर आने लगी। कैसा मूढ़ हूँ कि दुनिया के सबसे बड़े उत्सव के प्रति उदासीन हूँ। मैंने तुरन्त टीवी सेट तैयार किया और केबल वाले को आनन-फानन में ढूँढकर कनेक्शन ले लिया। यह सब होने तक क्वार्टर फाइनल मैच पूरे हो चुके थे। नेट पर देखकर पता चला कि सेमी फाइनल मैच सात और आठ जुलाई को खेले जाने हैं। मैंने रतजगे की तैयारी कर ली।

शाम को ऑफिस से आया तो पता चला कि दोपहर की बारिश के बाद टीवी बन्द पड़ा है। ऑन ही नहीं हो रहा है। मैने देखा तो टीवी का पावर इन्डीकेटर जल ही नहीं रहा है। मैने बिजली का तार चेक किया। इसमें एक छोटी सी खरोंच पर सन्देह करते हुए नया तार लगा दिया। फिर भी लाइट नहीं जली। मैने टीवी का पिछला ढक्कन खोलकर चेक किया तो इनपुट प्वाइण्ट पर बिजली थी लेकिन उसके अन्दरूनी हिस्से में कहीं कोई गड़बड़ थी। यह सब करने में पसीना भी बहा। सुबह तो अच्छा भला चलता छोड़कर गया था… फिर यह अचानक खराब कैसे हो गयी?

श्रीमती जी बताया कि दोपहर में बारिश के समय जोर की गर्जना हुई थी। कहीं आसपास ही बिजली गिरी होगी शायद। मुझे सन्देह हुआ कि केबल के रास्ते बिद्युत तड़ित की उर्जा टीवी में जा समायी होगी और किसी पुर्जे का सत्यानाश हो गया होगा। मैंने फौरन इसे गाड़ी में लादा और दुकान पर ले गया। वहाँ बिजली से आहत कुछ और टीवी सेट रखे हुए थे। दुकानदार ने बताया कि नागपुर से मिस्त्री आएगा तब चेक करके बताएगा कि क्या खराबी है? मैने पूछा कि कितना समय और पैसा लगेगा तो उसने मेरा मोबाइल नम्बर मांग लिया। बोला कि मिस्त्री के चेक करने के बाद ही बता पाऊंगा। यदि जला हुआ स्पेयर पार्ट यहाँ मिल गया तब तो तत्काल ठीक करा लूंगा नहीं तो उसे नागपुर से मंगाने में दो-तीन दिन लग जाएंगे।

मुझे न चाहते हुए भी इलाहाबाद छोड़ने का पछतावा होने लगा। श्रीमती जी कि फब्तियाँ सुनना तो तय जान पड़ा- अच्छा भला शहर और काम छोड़कर इस वीराने में यही पाने के लिए आये थे- बच्चों का स्कूल सात किलोमीटर, सब्जी बाजार आठ किलोमीटर, किराना स्टोर पाँच किलोमीटर, दूध की डेयरी छः किलोमीटर… हद है, नजदीक के नाम पर है तो बस ईंट पत्थर और सूखा- ठिगना पहाड़… ले देकर एक पार्क है तो वह भी पहाड़ी पर चढ़ाई करने के बाद मिलता है। वहाँ भी रोज नहीं जा सकते…

मैं अपने को यह सब पुनः सुनने के लिए तैयार करता हुआ घर लौट आया। यह भी पक्का हो गया कि अब दोनो सेमी फाइनल भी नहीं देख पाऊंगा। मन मसोस कर रह गया। आखिरकार अगले दिन मिस्त्री ने खबर दी कि सामान नागपुर से आएगा औए साढ़े नौ सौ रूपए लगेंगे। मरता क्या न करता। मैने फौरन हामी भरी। टीवी बनकर आ गयी। मैने पता किया कि तीसरे-चौथे स्थान का मैच १०-११ की रात में होगा। मैने शनिवार की छुट्टी को दिन में सोकर बिताया ताकि रात में जागकर मैच देख सकूँ। दस बजे रात को परिवार के अन्य सदस्य सोने चले गये और मैं बारह बजने का इन्तजार करता रहा। इस दौरान टीवी पर कुछ फालतू कार्यक्रम भी देखने पड़े। स्टार प्लस पर ‘जरा नच के दिखा’ का ग्रैण्ड फ़िनाले चल रहा था जिसमें नाच से ज्यादा नखरा और उससे भी ज्यादा विज्ञापन देखना पड़ा।

नींद के डर से प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठा रहा लेकिन जब पहलू में कष्ट हुआ तो भारी भरकम सोफ़ा उठाकर टीवी के सामने ले आया। गावतकिया लगाकर आराम से देखने का इन्तजाम हो गया। मैच शुरू हुआ। जर्मनी ने पहला गोल दागा और जब बोर्ड पर यह स्कोर लिख कर आया तब मैंने पक्के तौर पर जाना कि काली जर्सी वाले खिलाड़ी जर्मन टीम के हैं। इसके बाद युरुग्वे ने गोल उतारा फिर बढ़त ले ली। अब मुझे ऑक्टोपस पॉल की जान सांसत में नजर आने लगी। तभी जर्मनी ने बराबरी कर ली। मैच में जोश आया हुआ था लेकिन सोफ़े पर आराम से पसरा हुआ मैं जाने कब सो गया। जब नींद खुली तो खिलाड़ियो को मैदान से बाहर जाते देखा और चट से विज्ञापन शुरू हो गया। अन्तिम परिणाम देखने के लिए न्यूज चैनेल पर जाना पड़ा। वहाँ की हेडलाइन थी- ऑक्टोपस पॉल की भविष्यवाणी एक बार फिर सही साबित हुई। जर्मनी तीसरे स्थान पर। युरुग्वे को ३-२ से हराया।

***

अफ़सोस है कि मैं दूसरों की तरह फुटबॉल का दीवाना नहीं बन पाया। कुछ लोग मुझे जरूर कोसेंगे कि कैसा अहमक है। चलिए कोई बात नहीं…। मेरी दीवानगी कहीं और तो है। आज स्वप्नलोक पर विवेक जी ने एक कविता ठेल दी लेकिन कविता अंग्रेजी में देखकर मुझे ताव आ गया। मैने आनन-फानन में उसका हिन्दी तर्जुमा करके टिप्पणी में पेश कर दिया है। मेरी दीवानगी का आलम यहीं देख लीजिए। स्वप्नलोक तक बाद में जाइएगा 🙂

“Though I have done no mistake,
Excuse me for God’s sake.
I am poor, you are great.
You are master of my fate.

गलती मेरी नहीं है काफी

प्रभुजी दे दो फिर भी माफी

मैं गरीब तू बड़ा महान

भाग्यविधाता लूँ मैं मान

But remember always that,
human, lion, dog or cat,
all creatures are same for God.
No sound is, in his rod.

पर इतना तुम रखना ध्यान

नर नाहर बिल्ली और श्वान

सबको समझे एक समान

मौन प्रहार करे भगवान

He, who will afflict others,
will be facing horrid curse.
Killing weak is not correct.
This is universal fact.”

जिसने परपीड़ा पहुँचाई

वह अभिशप्त रहेगा भाई

निर्बल को मारन है पाप

दुनिया कहती सुन लो आप

Listening this the hunter said,
“Don’t teach me good and bad.”
Gun fire ! but no scream ?
Thank God it was a dream !

सुन उपदेश शिकारी भड़का

ले बन्दूक जोर से कड़का

धाँय-धाँय… पर नहीं तड़पना

शुक्र खुदा का यह था सपना

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

साँईं बाबा का प्रसाद और ज्ञानजी की सेहत…

22 टिप्पणियाँ

 

श्री साँई बाबाआज वृहस्पतिवार है। शिर्डी वाले साँई बाबा के भक्तों का खास दिन। इस दिन व्रत-उपवास रखकर श्रद्धालु जन साँईं मन्दिरों में दर्शन के लिए उमड़ पड़ते हैं। इलाहाबाद का मुख्य मन्दिर भी इस दिन विशेष आकर्षण का केन्द्र हो जाता है। श्रद्धा और सबूरी के बीज मन्त्रों से प्रेरित भक्तजन बड़ी भीड़ के बावजूद पूरी तरह अनुशासित रहकर लम्बी लाइन में अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हुए साँईं मन्त्रों का जप करते हैं और आगे बढ़ते हैं। शाम के वक्त तो इतनी भीड़ हो जाती है कि व्यवस्थापकों को रस्सियाँ तानकर लाइन बनानी पड़ती है जो मन्दिर के भीतर कई चक्रों में घूमने के बाद भी बाहर सड़क तक आ जाती है।

श्रद्धा-सबूरीजब श्रीमती जी के आग्रह पर पहली बार मैं इस मन्दिर में दर्शन करने गया था तो साँईं बाबा के प्रति श्रद्धा से अधिक एक अच्छे पति होने की सदिच्छा के वशीभूत होकर गया था। यहाँ आकर जब मैंने भक्तों की अपार भीड़ देखी और यह अनुमान किया कि भीतर साँईं बाबा की मूर्ति तक पहुँचने में कम से कम दो घण्टे लगेंगे तो मेरे पसीने छूट गये। भीड़ में तिल रखने की जगह नहीं थी इसलिए करीब ढाई साल के बेटे को भी गोद में लेना अपरिहार्य हो गया था। इस दुस्सह परिस्थिति में भी हम लोगों ने धैर्यपूर्वक दर्शन किये थे। वहाँ साँई बाबा के भजनों और उनकी जय-जयकार के बीच इतना अच्छा भक्तिमय माहौल बना हुआ था कि मन में किसी कठिनाई के भाव ने कब्जा नहीं किया।

साँईं प्रसादालयउस प्रथम दर्शन के समय एक ऐसी बात हो गयी थी जो साँईं बाबा के चमत्कारी प्रभाव की पुष्टि करती सी लगी। मेरे लाख सिर हिलाने के बावजूद श्रीमती जी तो इसे चमत्कार ही मानती हैं। हुआ ये कि जब मैं लाइन में लगा था उसी समय मेरा मोबाइल बज उठा। बड़ी मुश्किल से जब मैंने इसे जेब से निकालकर ‘काल रिसीव’ किया तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। यह एक ऐसे व्यक्ति का फोन था जिसे मैं करीब दो साल से ढूँढ रहा था। वह मेरे तीस हजार रुपये लौटाने में लगातार टाल-मटोल करते हुए अबतक मुझे टहलाता रहा था। उसदिन उसने अचानक फोन पर बताया कि रूपयों की व्यवस्था हो गयी है। किसी को भेंज दीजिए, आकर ले जाय। बस क्या था, मेरी पत्नी ने इसे साँईं बाबा का अनुपम प्रसाद मानते हुए उनमें अपना अडिग विश्वास प्रकट किया और आगे ऐसी कुछ अन्य उपलब्धियों को भी साँई बाबा की कृपा मानने सिलसिला शुरू हो गया। ऐसे प्रत्येक अवसर पर हमने साँईं के दर्शन किए। लेकिन मैने समय की अनुपलब्धता के कारण हमेशा वृहस्पतिवार को दर्शन से परहेज किया। मुझे लगता है कि पूजा-अर्चना में शान्तचित्त होकर बैठना और ध्यान करना अधिक महत्वपूर्ण है, न कि भीड़ में गुत्थमगुत्था होकर प्रसाद चढ़ाना।

साँईं इम्पोरियमआज रचना ने वृहस्पति को ही वहाँ जाने की खास वजह बतायी। उन्होंने लगातार नौ गुरुवार साँईं का व्रत रखा था जिसका आज समापन (उद्यापन) करना था। इसके अन्तर्गत गरीबों और लाचारों को भोजन कराना होता है। हलवा और पूड़ी का मीठा भोजन थैलियों में पैक करके हम मन्दिर गये। लेकिन शाम को नहीं, सुबह साढ़े दस बज गये। इस समय भीड़ बहुत कम थी।  मन्दिर और इसके आस-पास का वातावरण दर्शन, पूजन, और दान-पुण्य करने के लिए आवश्यक सभी अवयवों से युक्त है। मन्दिर प्रांगण में ही पूजन और प्रसाद की सामग्री के लिए साँई प्रसादालय है तो वहीं साँईं इम्पोरियम में बाबा से जुड़ी अनेक पुस्तकें, मूर्तियाँ, तस्वीरें, चुनरी, चादरें, ऑडियो कैसेट्स, सीडी, और अन्य प्रयोग की वस्तुएं उपलब्ध हैं। जूते-चप्पल रखने के लिए एक ओर बने स्टैण्ड में दो तीन कर्मचारी मुस्तैद हैं जो अलग-अलग खानों में इसे सुरक्षित रखकर टोकन दे देते हैं। हाथ धुलने के लिए और पीने के लिए स्वच्छ और शीतल पेयजल की व्यवस्था है।

मन्दिर के बाहर वाहन स्टैण्ड भी है और बड़ी संख्या में भिखारी भी। उनमें से अनेक विकलांग, अपंग और लाचार हैं तो कई बिल्कुल ठीकठाक सुविधाभोगी और अकर्मण्य भी। साधुवेश धारी कुछ व्यक्ति कमण्डल लटकाये या रामनामी बिछाए हुए भी मिले जो कदाचित्‌ गुरुवार को ही यहाँ दान बटोरने आते हैं। अनेक महिलाएं अपने झुण्ड के झुण्ड बच्चों के साथ भीख इकट्ठा करने के लिए जमा थीं। सड़क पर भी फूल-माला और प्रसाद की अनेक दुकानें सजी हुई थीं। हर स्तर के भक्तों के लिए अलग-अलग सामग्री यहाँ मौजूद है।

जब हम गाड़ी से उतरकर भोजन की थैलियाँ बाँटने शारीरिक रूप से अक्षम कुछ गरीबों के पास गये तो वहाँ एक व्यक्ति रसीद-बुक लिए खड़ा था। उसने उसे आगे बढ़ाते हुए कहा कि साहब यह रसीद कटा लीजिए। इसका पैसा विकलांगों की सेवा में खर्च होता है। मैंने पूछा- इसकी क्या गारण्टी? वह बोला- साहब आप विश्वास कीजिए। उसकी वेश-भूषा और शैली देखकर मुझे कत्तई विश्वास नहीं हुआ। हमने साक्षात्‌ दरिद्रनारायण की यथासामर्थ्य सेवा की और वहाँ से दर्शन-पूजन करने के बाद प्रसाद लेकर आदरणीय ज्ञानदत्त जी‌ का कुशल क्षेम जानने रेल-अस्पताल की ओर चल पड़े। (मन्दिर के भीतर फोटो खींचने की मनाही है इसलिए हमारा कैमरा ज्यादा कुछ नहीं कर सका।)

    रेलवे अस्पताल के वी.आई.पी. केबिन में आसन जमाए ज्ञानजी किसी भी तरह से मरीज जैसे नहीं लगे। विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और परिवारीजन के साथ बातचीत में मशगूल थे। वागीशा और सत्यार्थ (मेरे बेटी-बेटे) ने उनका पैर छुआ तो प्रमुदित होकर दोनो हाथों से आशीर्वाद दिया। वहाँ ‘बाबूजी’ सबसे सक्रिय और मुस्तैद दिखे। सुबह से शाम तक लगातार अपने बेटे के आस-पास रहते हुए उन्होंने अपना सुख और आराम मुल्तवी कर रखा है। वैसे तो शुभेच्छुओं और तीमारदारों की कोई कमी नहीं है, लेकिन बाबूजी की उपस्थिति पिता-पुत्र के बीच विलक्षण आत्मीय सम्बन्ध को रेखांकित करती हुई भावुक बना देती है।

     एम.आर. आई. रिपोर्ट आ चुकी है। सबकुछ प्रायः सामान्य है। मस्तिष्क के दाहिने हिस्से में हल्की सी सूजन पायी गयी है जो दवा से ठीक हो जाएगी। तीन-चार दिन अस्पताल में ही रहना होगा। आज दूसरा दिन बीत गया है। अगले पन्द्रह दिनों तक दवा चलेगी। उसके बाद सबकुछ वापस पटरी पर आ जाएगा। ज्ञान जी किसी को मोबाइल पर बता रहे हैं – कुछ लोग इसे ब्लॉगिंग से जोड़ रहे हैं लेकिन ऐसा कुछ नहीं है। ब्लॉगिंग तो मेरे लिए केवल टाइम-फिलर है। यह मेन जॉब तो नहीं ही है।

ए.सी. कमरे में एक्स्ट्रा बेड और सोफे पड़े हुए  हैं, और टीवी भी लगी है। लैप-टॉप भी आ गया है जो अभी खोला नहीं गया है, लेकिन मोबाइल पर लगातार हाथ चल रहा है।

    सबकुछ चंगा है जी…

 एक एसएमएस कर लूँ...     DSC02790

मेरी पिछली पोस्ट पर अबतक की सर्वाधिक प्रतिक्रियाएं दर्ज हुईं। ज्ञान जी के लिए आप सबका प्रेम और आदर देखकर अभिभूत हूँ। दद्दा तूसी ग्रेट हो जी…

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

निरुपमा के बाद रजनी को भी जान गँवानी पड़ी… क्यों???

13 टिप्पणियाँ

 

मोहब्बत में मिली रजनी को मौत 001 निरुपमा पाठक की मौत का मामला अभी अखबारी सुर्खियों से हटा भी नहीं था कि इलाहाबाद  में ऐसे ही क्रूर कथानक की पुनरावृत्ति हो गयी। इस बार किसी सन्देह या अनुमान की गुन्जाइश भी नहीं है। पुलिस को घटनास्थल पर मिले सबूतों के अनुसार परिवार वालों ने अपने पड़ोसी लड़के से प्रेम कर बैठी रजनी को उसके गर्भवती हो जाने के बाद पीट-पीटकर मार डाला और फिर उसे छत पर एक एंगिल से दुपट्टे के सहारे लटकाकर आत्महत्या का रूप देने की कोशिश की। लेकिन यहाँ पोस्ट मार्टम रिपोर्ट ने सच्चाई से पर्दा उठाने में कोई चूक नहीं की।

रिपोर्ट ने जाहिर किया है कि रजनी को इतना पीटा गया कि शरीर के कई हिस्से काले पड़ गये। सिर में गम्भीर चोट पायी गयी। नाक से खून बहा। गले पर उंगलियों के निशान मिले हैं और सिर दीवार से टकराने की बात आयी है। गर्भवती रजनी के पेट पर वार किये गये थे जिससे उसे अन्दरूनी चोट लगी थी। पुलिस ने रजनी के माता-पिता, दो भाइयों और एक बहन को हिरासत में ले लिया। उसके प्रेमी से भी पुलिस पूछताछ कर रही है।(पूरी रिपोर्ट पढने के लिए अखबारी कतरन को क्लिक करिए)

यह मामला निरुपमा पाठक प्रकरण की तरह पेंचीदा नहीं है। बल्कि अत्यन्त सरल और उजाले की तरह साफ़ है। यहाँ लड़की केवल हाई स्कूल तक पढ़ी थी। निम्न मध्यम वर्ग के साहू परिवार में जन्मी रजनी ने घर वालों की इच्छा के विरुद्ध पड़ोसी केसरवानी परिवार के लड़के से प्रेम किया। घर वाले उसकी शादी की उम्र होने पर अन्यत्र शादी करना चाहते थे जिससे इन्कार करने पर उसे पीट-पीटकर अधमरा कर दिया गया और फिर फाँसी पर लटका दिया गया। यहाँ दलित और सवर्ण जाति के बीच बेमेल रिश्ते का प्रश्‍न भी नहीं था। यह कुकृत्य किसी पिछड़े ग्रामीण इलाके की खाप पंचायत की देखरेख में भी नहीं हुआ। किसी हाई-सोसायटी की परम आधुनिक जीवन शैली में जीने वाली कोई आधुनिका भी नहीं थी रजनी। लेकिन हश्र वही हुआ जो निरुपमा का हुआ था। आखिर क्यों?

व्यक्ति का अस्तित्व किन बातों पर टिका है यह विचारणीय है। परिवार, समाज, राज्य और वैश्विक परिदृश्य के सापेक्ष उसकी निजी हैसियत क्या है? समाज में नाक कट जाने के डर से परिवारी जन घोर अमानवीय कृत्य कर डालते हैं और यही समाज/राज्य उन्हें जेल भेंज देता है। क्या इससे नाक बची रह जाती है? फिर यह वहशीपन क्यों? आखिर इस कुकृत्य की प्रेरक शक्तियाँ कहाँ से संचालित होती हैं। सुधीजन इस पर अपने विचार रखें। बिना किसी अगड़े-पिछड़े, छोटे-बड़े, हिन्दू-मुस्लिम, अमीर-गरीब, वाम-दक्षिण, महिला-पुरुष के चश्में को चढ़ाये इस मुद्दे पर सोच कर देखिए। केवल मनुष्य के रूप में इस विषय पर चर्चा करिए। क्या कुछ निष्कर्ष निकल पा रहा है?

मेरी कोशिश तो फिलहाल असफल हो रही है। मनुष्य ने अपने लिए जो तमाम श्रेणियाँ बना रखी हैं उससे बाहर निकलना सचमुच बड़ा कठिन है। शायद असम्भव सा…।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

त्रिवेणी महोत्सव में प्रयाग की धरती पर उतरे सितारे…।

13 टिप्पणियाँ

 

उन्नीस फरवरी से पच्चीस फरवरी तक लगातार सात दिनों तक इलाहाबाद में गीत, संगीत, नृत्य, कविता और शायरी की स्वर लहरियाँ यमुना नदी के तट पर बने शानदार मंच से बिखरती रहीं और रोज शाम को शहर का सारा ट्रैफिक बोट-क्लब मुक्तांगन की ओर मुड़ जाता रहा। सेवेन वण्डर्स ने जो विशाल मंच तैयार किया था उसकी शोभा देखते ही बनती थी। इस मंच पर जब पहले दिन उद्‌घाटन कार्यक्रम में आगरा से आये सुधीर नारायण ने अपने भजनो के साथ सुमधुर शुरुआत की तभी यह अन्दाज लग गया कि अगले कुछ दिन अभूतपूर्व आनन्द के रस में डूबने का अवसर मिलने वाला है।

उद्‌घाटन कार्यक्रम की औपचारिकता पूरी होने के तत्काल बाद श्रेया घोषाल ने एक रेल के डिब्बे से मंच पर उतरकर सबको रोमांचित कर दिया। दर्शक दीर्घा में शान्ति बनाए रखना पुलिस वालों के लिए असम्भव सा हो गया। एक के बाद एक हिट गानों को सजीव सुनते हुए दर्शक जोश में  खड़े होकर नाचते रहे, जाने कितनी कुर्सियाँ शहीद हुईं मगर जश्न का माहौल थमने का नाम नहीं ले रहा था। भगवान ने इस लोकप्रिय गायिका को जितना सुरीली आवाज दी है उतनी ही सुन्दरता से भी नवाज़ा है।

एक से बढ़कर एक उम्दा कार्यक्रम देखकर देर रात दो-तीन बजे घर लौटना, दिन भर उनींदी आँखों से दफ़्तर का काम निपटाना  और शाम होते ही फिर उसी महोत्सव का रुख कर लेना मेरा रूटीन बन गया… ऐसे में ब्लॉगिंग क्या खाक होती…? पिछली पोस्ट पर प्राप्त टिप्पणियों में लगभग सभी ने मुझसे रिपोर्ट की उम्मीद जतायी थी। मैने इसका मन भी बनाया था। कैमरा भी साथ लेकर जाता रहा, लेकिन सारी तैयारी धरी रह गयी। उस माहौल में तो बस झूम कर नाच उठने का मन करता था। डायरी कलम संभालने और फोटो खींचने की सुध ही नहीं रही। फिर भी आप लोगों को निराश नहीं करना चाहता हूँ। कुछ तस्वीरें जो मैने उतार ली थीं उनको देखकर माहौल का अन्दाज लगाइए। शेष बातें और वीडियो अगली पोस्ट में….

 

DSC02332 मंच की भव्यता देखते ही बनती थी

आइए देखते हैं कुछ यादगार तस्वीरें

 

DSC02328

       जबर्दस्त आतिशबाजी

DSC02331

मन्त्री जी ने उद्‍घाटन किया

DSC02333

लोकनृत्य-राजस्थानी चाकरी

DSC02338

लोकनृत्य-मणिपुरी

DSC02346

लोकनृत्य-मथुरा की होली

DSC02343

लोकनृत्य-कश्मीरी

DSC02347

       श्रेया घोषाल

DSC02360

बच्चों के साथ (बीच में वागीशा)

 

malini awasthi 

मालिनी अवस्थी की सज-धज एक भारतीय नारी की पारम्परिक वेश-भूषा में थी तो गायन में लोकरंग का अद्‍भुत पुट था। दर्शकों के बीच में जाकर उनसे सीधा सम्वाद करने की अदा ने सबका मन मोह लिया।

abhijit bhattacharya

अभिजीत दा ने अपने हिट गीतों से सबको मन्त्रमुग्ध तो किया ही उनके साथ आयी नृत्य मण्डली ने सभी नौजवानों को साथ थिरकने पर मजबूर कर दिया। दर्शकों की फ़रमाइश पर इन्होंने किशोर कुमार के सदाबहार गीत भी अलग अन्दाज में सुनाए।

DSC02459

 

बच्चों, नौजवानों समेत सभी दर्शक अभिजीत दा से हाथ मिलाने और बात करने के लिए उन तक पहुँचना चाहते थे लेकिन इसका सौभाग्य मिला आयोजन से जुड़े अधिकारियों को, मुख्य अतिथि को और मंच की संचालक उद्‌घोषिका को

 

शान की लुटायी मस्ती बटोरने के लिए जब दर्शक अनियन्त्रित होने लगे तो आई.जी. और डी.आई.जी. खुद ही स्थिति संभालने के लिए खड़े हो गये (देखिए सबसे नीचे वाले बायें चित्र में)। भीड़ ने उनकी एक न सुनी। कार्यक्रम समय से पहले बन्द करना पड़ा। लेकिन तबतक सैकड़ों कुर्सियाँ टूट चुकी थीं जिनपर खड़े होकर नौजवानों ने डान्स किया था।

shaan

बहती हवा सा था वो… (शान)

शान और जूनू

  शान और जूनू


DSC02477

पुलिस कप्तान हुए हलकान

DSC02496 मन्त्री जी द्वारा शान का सम्मान

तस्वीरें तो और भी ढेर सारी हैं लेकिन इनसे पेट तो भरने वाला है नहीं, इसलिए अब रहने देता हूँ। गिरिजेश भइया की इच्छा थी मालिनी अवस्थी की रिकॉर्डिंग सुनने की। मैने उसे रिकॉर्ड तो कर लिया है लेकिन सोनी के डिजिटल कैमरे में आवाज साफ़ नहीं रिकॉर्ड हो पायी है। सावधानी बरतते हुए मैने एनालॉग कैमरे (Handycam) से भी रिकॉर्ड किया है जो बहुत स्पष्ट और कर्णप्रिय है लेकिन इसको कम्प्यूटर में चढ़ाने के लिए एक कन्वर्टर की जरूरत है। मेरा टीवी ट्यूनर कार्ड अभी ऑडियो इनपुट नहीं ले रहा है। कोई तकनीकी विशेषज्ञ इसमें मदद कर सकता है क्या?

समीर जी मुझे आपकी फरमाइश भी याद है। लेकिन यही हाल कवि सम्मेलन का भी है। कैसेट में रिकॉर्डिंग मौजूद है लेकिन कम्प्यूटर पर कैसे चढाऊँ?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

हमें खेद है कि हम इनकी चर्चा न कर पाये-

उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र के कलाकार, सुगन्धा मिश्रा (लाफ़्टर चैलेन्ज), हिमानी और तोषी, वडाली बन्धु, निज़ामी बन्धु, गुलाम अली, अमजद अली खान, कुँवर बेचैन, राहत इन्दौरी, बसीम बरेलवी, मुनव्वर राना, ताहिर फ़राज, प्रदीप चौबे, पद्‍मश्री रंजना गौहर (ओडिसी), नीरजा श्रीवास्तव(कत्थक), इमरान प्रतापगढ़ी, यश मालवीय, शबा बलरामपुरी और ढेर सारे अन्य कवि, शायर और कलाकार जिन्होंने दर्शकों को बाँधे रखा।

Older Entries