अनूप जी, अब सम्हालिए… सेमिनार तय हो गया!!

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पिछली पोस्ट में मैने जिस सेमिनार के न हो पाने की बात बतायी थी उसके आयोजन की तैयारी में आदरणीय अनूप शुक्ल जी ने बहुत समय खर्च किया था। जाने कितने चिठ्ठाकारों से चर्चा में लगे रहे। इन्होंने जाने कितने आदि, अनादि, अनामय, अविचल, अविनाशी चिठ्ठाकार भाइयों, बहनों और दोस्तों को इस राष्ट्रीय सेमिनार के स्वरूप के बारे में बताया होगा। अनेक प्रतिष्ठित और ‘स्टार’ ब्लॉगर जन को न्यौता भी इन्होंने ही दिया था। मैं तो सिर्फ़ इनका पता जानता था सो सारी बातें इन्हीं को बता देता था।

जब अचानक कार्यक्रम टलने की बात प्रकट हुई तो मुझे सबसे बड़ी कठिनाई यह समाचार फुरसतिया जी को बताने में हुई। अपने से अधिक निराश मैने इन्हें पाया था। करीब दो सप्ताह का उत्साह दो मिनट में ठण्डा पड़ गया था। उधर मेरे बड़े भाई डॉ. अरविन्द मिश्र जी ने मुझे पहले ही आगाह किया था कि जब तक सब प्रकार से बात पक्की न हो जाय और बजट की व्यवस्था सुनिश्चित न हो जाय तबतक हाथ न डलियो। इसलिए जब उन्होंने स्थगन का समाचार सुना था तो थोड़े दुखी तो जरूर हुए लेकिन अपनी भविष्यवाणी के सच होने पर उनके मन में एक स्थितिप्रज्ञ का सन्तोष भाव भी जरूर था।

लेकिन अब तो कहानी बदल गयी है। अब “बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेहु…” की पॉलिसी पर चलना है।

अब अनूप जी को अपना पहले का किया श्रम व्यर्थ नहीं लगना चाहिए। कार्यक्रम की रूपरेखा जो हमने तब तय की थी कमोबेश वही रहने वाली है। शीघ्र ही महात्मागांधी अन्तर राष्ट्रीय  हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के अधिकारियों के साथ इलाहाबाद में बैठकर हम कार्यक्रम को अन्तिम रूप देंगे। अतिथियों की सूची भी वहीं तय हो पाएगी, लेकिन हिन्दी ब्लॉगजगत का सच्चा प्रतिनिधित्व कराने का पूरा प्रयास होगा। आदरणीय अनूप जी, अरविन्दजी, ज्ञानदत्तजी, आदि ने सदैव मेरे प्रति जो स्नेह का भाव रखा है उसी की ऊर्जा से मैं यह आयोजन करा पाने का आत्मविश्वास सजो पा रहा हूँ।

हिन्दुस्तानी एकेडेमी द्वारा इस अवसर पर एक महत्वाकांक्षी योजना बनायी गयी है। आप सभी इसमें सक्रिय सहयोग दें। एक अनूठी कृति आकार लेने वाली है। निस्संकोच होकर अपना योगदान सुनिश्चित करें। एकेडेमी के सचिव डॉ.एस.के. पाण्डेय जी ने उस अनुपम प्रकाशन का लोकार्पण २३ अक्टूबर के उद्‌घाटन सत्र में कराने का निश्चय अभी कर लिया है, जबकि प्रकाश्य सामग्री का एक भी शब्द अभी तय नहीं हुआ है। लेकिन हमें पूरा विश्वास है कि एक जोरदार पुस्तक उस तिथि तक आपके सामने होगी। बस आप अपनी प्रविष्टियाँ तत्काल भेंज दीजिए। कहाँ और कैसे? यह जानने के लिए एकेडेमी के ब्लॉग पृष्ठ पर पधारें।

अस्तु, हे अनूप जी! आगे का जिम्मा आपै सम्हारौ। हम त चलै माता रानी का आशीष बटोरै…  अरविन्द जी यदि चुनाव कराने में नहीं लगाये गये तो बाकी सब काम उनके लिए बहुत सरल हो जाएगा।

वैष्णो देवी धाम से लौटकर जब मैं वापस आऊंगा तो एकेडेमी के मेल-बॉक्स में सैकड़ों प्रविष्टियाँ आ चुकी होंगी। उनको छाँटने-बीनने के बाद संपादक मण्डल किताब को अन्तिम रूप देने में अधिकतम सात दिन लेगा और मुद्रक किताब बनाकर देने में सात दिन और लेगा। बस तबतक ब्लॉगिंग का महाकुम्भ भी आ ही जाएगा। किताब का लोकार्पण भी लगे हाथों हो जाएगा।

अब तो हम यह पोस्ट ठेलकर ट्रेन में बैठ जाएंगे। एक सप्ताह बाद लौटकर जुट जाएंगे इस महामेला की तैयारी में। तबतक अनूप जी अपने तरीके से तैयारी पूरी ही कर डालेंगे। बस मौजा ही मौजा… 🙂

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होली की छुट्टी में बैठे-ठाले…? (भाग-२)

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image मैं यहाँ प्रयाग में बैठा तो हूँ लेकिन संजय की तरह अपने गाँव की रंग बिरंगी होली को ठीक-ठीक देख पा रहा हूँ। जैसा कि मैने कल पिछली कड़ी में बताया था आधी रात के बाद होलिका दहन फाग और जोगीरा के गलाफाड़ प्रदर्शन के बीच सम्पन्न हो चुका होगा। सुबह-सुबह घर के बच्चे सम्मत से आग लाकर घर का चूल्हा जलवा चुके हैं। एक दिन पहले ही हरे बाँस का पलौझा (सबसे ऊपरी सिरा जो अधिक खोखला, पतला और हल्का होता है) काटकर देसी पिचकारियाँ बनायी जा चुकी हैं। धूप होने से पहले ही गाँव के मर्द और लड़के सम्मत उड़ाने यानि होलिकादहन की राख का भभूत उड़ाने चल पड़ते हैं।

सम्मत स्थल से राख का प्रसाद (भभूत) एक दूसरे के मस्तक पर लगाकर यथोचित चरण-स्पर्श या आशीर्वाद का अभिवादन करेंगे। जोगीरा के शब्द और भाव बरसने लगेंगे। सभी इस प्रसाद को गमछे और कुर्ते की थैलियों में भरकर गायन मण्डली के साथ गाते-बजाते गाँव के भीतर बाहर के सभी देवस्थलों (बरम बाबा, कालीमाई, कोटमाई, भवानीमाई, महादेव जी, इनरा पर के बाबा) पर जाकर उस विभूति को चढ़ाकर प्रणाम करेंगे। इन सभी स्थलों पर प्रार्थना परक फाग गाया जाएगा।

रास्ते में मिलने वाले सभी लोगों को व अपरिचित राहगीरों को भी सम्मत की राख का प्रसाद विधिवत पोता जाएगा। इस ‘धुरखेल’ का शिकार सबको बनाया जाएगा। इस समय बाँस की पिचकारियों में नाबदान का पानी भरकर हर एक के ऊपर फेंकना गाँव के बच्चे अपना नैसर्गिक अधिकार मान लेते हैं। उन्हे इससे कोई रोक भी नहीं सकता। बड़े लोग भी बाल्टी में गोबर-मिट्टी घोलकर एक दूसरे को और हर आने-जाने वाले को आपादमस्तक नहलाने का काम एक शौर्य प्रदर्शन की भाँति करते हैं। इस बात की जानकारी क्षेत्रीय लोगों को तो होती है लेकिन यदि कोई बाहरी मुसाफिर इस समय राह पर आता मिल गया तो उसकी दुर्गति करने में भी कोई संकोच नहीं करता है। ग्यारह-बारह बजे तक धुरखेल व कनई-माटी (कीचड़-मिट्टी) का खेल चलता रहेगा। उसके बाद सभी अपनी-अपनी दुर्गति कराने के बाद चीथड़ों में लिपटकर नहर या बोरिंग पर नहाने जाएंगे। ऐसी म्लेच्छ अवस्था में घर में प्रवेश वर्जित हो जाता है।

नहाकर घरमें आने के बाद  गुझिया, नमकीन, मालपूआ, पूड़ी, खीर, और तेज मसालेदार सब्जी का गम्भीर भोजन होगा। अब रंग खेलने की बारी आएगी। लाल गुलाबी हरे रंगों में डूबी मानव आकृतिया झुण्ड में चलेंगी तो उन्हें अलग-अलग पहचानना मुश्किल हो जाएगा। प्रायः सबके चेहरे विविध रंगों और अबीर से पूरी तरह ढके होंगे। गाँव के सभी टोलों से लड़कियों-बच्चों की रंग-टोलियाँ घर-घर में जाकर रंग-स्नान का आदान-प्रदान करेंगी। बड़े लड़के और मर्द फाग मंडली में शामिल होकर सबके दरवाजे पर जाएंगे। छोटे-बड़े के पद के अनुसार पारम्परिक रीति से अभिवादन होगा। सबके दरवाजे पर जाजिम बिछाकर एक-दो फाग गाया जाएगा। गृहस्वामी सबको यथा सामर्थ्य जलपान कराएगा। यह क्रम शाम ढलने तक चलता रहेगा। गायक मण्डली के सदस्य शाम तक अपने ऊपर रंग गुलाल की अत्यन्त मोटी परत चढ़ा चुके होते हैं।

 

होलीघर के आंगन में रंग होली (6)  बाहर फाग मण्डली का सत्कार
होली (3)       रंग स्नान होली (7)     ठण्ड‍ई में भाँग तो नहीं?

शाम को रंग का प्रयोग बन्द करके सभी नहा-धोकर एक-दूसरे से होली मिलने निकलते हैं। घर-घर में जलपान की व्यवस्था होती है। सब जगह कुछ न कुछ लेना ही पड़ता है। रात में इसे पचाने के लिए विशेष दवा का इन्तजाम करना पड़ता है।

होली के दिन सबसे रोचक होता है जोगीरा पार्टी का नाच-गाना। गाँव के दलित समुदाय के बड़े लड़के और वयस्क अपने बीच से किसी मर्द को ही साड़ी पहनाकर स्त्रैंण श्रृंगारों से सजाकर नचनिया बनाते हैं। यहाँ इसे  ‘लवण्डा’ नचाना कहते हैं। जोगीरा बोलने वाला इस डान्सर को जानी कहता है। दूसरे कलाकार हीरो बनकर जोगीरा गाते हैं। और पूरा समूह प्रत्येक कवित्त के अन्त में जोर-जोर से सररर… की धुन पर कूद-कूद कर नाचता है। वाह भाई वाह… वाह खेलाड़ी वाह… का ठेका लगता रहता है।

कुछ जोगीरा दलों के (दोहा सदृश) कवित्तों की बानगी यहाँ पेश है :

[दोहे की पहली लाइन दो-तीन बार पढ़ि जाती है, उसके बाद दूसरी लाइन के अन्त में सबका स्वर ऊँचा हो जाता है।]

जोगीरा सर रर… रर… रर…

फागुन के महीना आइल ऊड़े रंग गुलाल।

एक ही रंग में सभै रंगाइल लोगवा भइल बेहाल॥

जोगीरा सर रर… रर… रर…

गोरिया घर से बाहर ग‍इली, भऽरे ग‍इली पानी।

बीच कुँआ पर लात फिसलि गे, गिरि ग‍इली चितानी॥

जोगीरा सर रर… रर… रर…

चली जा दौड़ी-दौड़ी, खालऽ गुलाबी रेवड़ी।

नदी के ठण्डा पानी, तनी तू पी लऽ जानी॥

जोगीरा सर रर… रर… रर…

चिउरा करे चरर चरर, दही लबा लब।

दूनो बीचै गूर मिलाके मारऽ गबा गब॥

जोगीरा सर रर… रर… रर…

सावन मास लुग‍इया चमके, कातिक मास में कूकुर।

फागुन मास मनइया चमके, करे हुकुर हुकुर॥

जोगीरा सर रर… रर… रर…

एक त चीकन पुरइन पतई, दूसर चीकन घीव।

तीसर चीकन गोरी के जोबना, देखि के ललचे जीव॥

जोगीरा सर रर… रर… रर…

भउजी के सामान बनल बा अँखिया क‍इली काजर।

ओठवा लाले-लाल रंगवली बूना क‍इली चाकर॥

जोगीरा सर रर… रर… रर…

ढोलक के बम बजाओ, नहीं तो बाहर जाओ।

नहीं तो मारब तेरा, तेरा में हक है मेरा॥

जोगीरा सर रर… रर… रर…

बनवा बीच कोइलिया बोले, पपिहा नदी के तीर।

अंगना में भ‍उज‍इया डोले, ज‍इसे झलके नीर॥

जोगीरा सर रर… रर… रर…

गील-गील गिल-गिल कटार, तू खोलऽ चोटी के बार।

ई लौण्डा हऽ छिनार, ए जानी के हम भतार॥

जोगीरा सर रर… रर… रर…

आज मंगल कल मंगल मंगले मंगल।

जानी को ले आये हैं जंगले जंगल॥

जोगीरा सर रर… रर… रर…

कै हाथ के धोती पहना कै हाथ लपेटा।

कै घाट का पानी पीता, कै बाप का बेटा?

जोगीरा सर रर… रर… रर…

 

ये पंक्तियाँ पूर्वी उत्तर प्रदेश व बिहार के भोजपुरी लोकगायकों द्वारा अब रिकार्ड कराकर व्यावसायिक लाभ के लिए भी प्रयुक्त की जा रही हैं। शायद यह धरोहर बची रह जाय।

 (समाप्त)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

होली की छुट्टी में बैठे-ठाले…? (भाग-१)

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होली की छुट्टी है और मैं अपने गाँव पर नहीं हूँ। जीवन में ऐसा पहली बार हुआ है। यहाँ इलाहाबाद में बैठा हुआ मन को समझा रहा हूँ कि इस साल अपने पूज्य दादाजी के दिवंगत होने के कारण होली का जश्न और रंगों की हुड़दंग मेरे घर में नहीं मनायी जाएगी तो वहाँ जाने का कोई फायदा नहीं होगा। पर मन है कि भाग-भाग कर उस मस्ती और मसखरी के माहौल में डूब जाने व रंग-गुलाल से अटे पड़े मानव समूह के बीच खो जाने के लिए मचल रहा है।

महीने भर से गाँव के गवैये ढोलक की थाप और झाल की झंकार पर ‘फगुआ’ गाते रहे होंगे।

धनि-धनि ए सिया रउरी भाग, राम वर पायो।

लिखि चिठिया नारद मुनि भेजें, विश्वामित्र पठायो।

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लरिकैयाँ के मोर संहाती हो लरिकैयाँ के मोर संहाती हो

जोबना पे कर हो जनि घाती, ई पिया के मोर थाती

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चइत के चान निराली ए आली, चइत के चान निराली

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आ हो गोरी सुन्दर तेरो काहें बदन मलीन

आज उसका उरोज होगा। गाँव के बाहर पूरब की तरफ चकबन्दी में ‘सम्मत’ के लिए छोड़ी गयी जगह पर गाड़े गये हरे बाँस के नीचे गन्ने की सूखी पत्तियों (पतहर) और लकड़ियों का अम्बार लग गया होगा। जो कमी रह जाएगी उसे पूरा करने के लिए गाँव के साहसी लड़के रात की योजना बना रहे होंगे। किस-किसके घर से या खेत से पतहर उड़ाना है, किसकी टूटी मड़ई (छप्पर) टांग लाना है, कहाँ पर लावारिस या अरक्षित लकड़ी उठायी जा सकती है। इस पर मन्त्रणा हो रही होगी। इन सामग्रियों के मालिक भी सुरक्षा इन्तजाम की चिन्ता कर रहे होंगे।

ऐन वक्त पर पंडितजी साइत देखकर बताएंगे कि मंगलवार को सम्मत फूँकना वर्जित है इसलिए होलिकादहन का कार्य बारह बजे रात के बाद ही होगा।

गाँव के सभी घरों से मर्द और लड़के कुछ उपले और लकड़ी वगैरह लेकर सम्मत स्थल पर रात को बारह बजे जाएंगे। उनके साथ एक और जरूरी चीज होगी। आज दिन में घर के सभी सदस्यों को सरसो का उबटन (बुकवा) लग रहा होगा। यह उबटन शरीर की मैल को छुड़ा कर उसके साथ ‘झिल्ली’ बनाता है। यही झिल्ली घर-घर से लाकर इस सम्मत में डाल दी जाती है। यानि होलिका के साथ देह की सारी मैल भी स्वाहा हो जाती है।

सम्मत जलाकर उसी की रोशनी में जमीन पर बैठकर फाग मण्डली जो विशिष्ट गायन करती है उसे सुनकर कान के कीड़े भी झड़ जाते हैं। वयस्क किस्म के दोहे, कवित्त और फूहड़ मजाक के माध्यम से प्रकृति सुलभ यौनाचार के शब्दरुप जिस उन्मुक्त भाव से फूटते हैं उसका वर्णन इस माध्यम पर नहीं किया जा सकता। यह वा‍क्‌व्यवहार शायद मन के भीतर जमी मैल को बाहर निकाल देता हो। इस परम्परा के पीछे गाँव में यौन शिक्षा का प्रथम परिचय देने के उद्देश्य से वसन्त के इस मौसम में शायद यह एक अनगढ़ माध्यम भी रहा हो। इस दिन ऐसी बातों का कोई बुरा नहीं मानता बल्कि उत्सव के अंग के रूप में ही लेता है।

कबीरा बनाम जोगीरा

होली के अवसर पर जो यौनक्रिया सम्बन्धी दोहे और कवित्त कहे जाते हैं उन्हें ‘कबीरा’ या ‘जोगीरा’ कहे जाने का रोचक किस्सा पता चला है। बनारस की धरती पर रहते हुए सन्त कबीर ने अपने जमाने में धार्मिक पाखण्ड और वाह्याडम्बर पर चोट करने वाले दोहे कहे। जोगी के वेश में भोगी बने मदमस्त और कामुक लोगों के विरुद्ध उनकी देसी रचनाएं ‘जोगीरा’ कही गयीं। इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप इन जोगियों ने भी जवाबी कार्यवाही की और कबीर के नाम पर बहुत सी फूहड़ बातों को अपनी कविताई का विषय बनाया और होली के मौके पर उन्हें गाली देने का बहाना ‘कबीरा’ बनाकर गढ़ लिया। बाद में इस श्रेणी की सबकी कविताई इन्ही दो लेबेल्स के अन्तर्गत प्रसारित होती रही है।

रात में गाने बजाने और गला साफ करने के बाद सभी घर लौट आएंगे। सुबह होने पर घर-घर से छोटे बच्चे कोई बर्तन लेकर सम्मत से आग का एक छोटा टुकड़ा लेने जाएंगे। होली के पकवान बनाने के लिए चूल्हा इसी आग से जलाया जाएगा। घर की औरतें और लड़कियाँ मालपूआ, खजूर, गुझिया, नमकीन, पू्ड़ी, खीर और गर्म मसालेदार सब्जी बनाने में लग जाएंगी। मांसाहारी घरों में बकरे या मुर्गे का मांस भी बनेगा। घर के मर्द और लड़के धूप होने से पहले ही ‘सम्मत उड़ाने’ पहुँच जाएंगे।

शेष बातें कल होंगी इसलिए कल ही बताउँगा… (जारी)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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