ताजा हवाओं ने कहला दी एक ग़जल…

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पिछले दिनों त्रिवेणी महोत्सव की धूम में एक बहुत अच्छे कार्यक्रम की चर्चा करने से चूक गया था। मैने पहले भी आपलोगों का परिचय इमरान प्रतापगढ़ी और उनकी संस्था ताजा हवाएं से कराया था। इस नौजवान शायर में कुछ अलग हटकर अनूठे सांस्कृतिक आयोजन करने का उत्साह देखते ही बनता है। मई २००८ में ब्लॉगरी की कक्षा लगाने का प्रयोग इन्हीं के माध्यम से सफ़ल हो पाया था।

गत २१ फरवरी को रविवार के दिन इन्होंने उत्तर प्रदेश और आसपास के अनेक सरकारी अधिकारियों को इकठ्ठा कर लिया। किसी मीटिंग आदि के लिए नहीं बल्कि उनके भीतर बसे कवि और शायर को सम्मानित करने के लिए तथा उनसे काव्य पाठ सुनवाने के लिए। इसमें नीतिश्वर कुमार जैसे आई.ए.एस. अधिकारी भी थे तो रिज़वान अहमद व एस.पी. श्रीवास्तव जैसे वरिष्ठ आई.पी.एस. अधिकारी भी थे। इन्द्रमणि जैसे रेलवे के विजिलेन्स अफ़सर भी थे राजकुमार सचान जैसे वरिष्ठ पी.सी.एस. अधिकारी भी। प्रशासनिक व्यस्तता के कारण कई अधिकारी अन्तिम क्षणों में न आ सके। इन अधिकारियों की खासियत यह थी कि इन लोगों ने एक मन्च पर पाल्थी मारकर बैठे हुए जूनियर-सीनियर का प्रोटोकॉल दरकिनार करके विशुद्ध काव्यरस का आदान-प्रदान किया। प्रायः सभी अधिकारी कवियों ने अपनी काव्य प्रतिभा से चमत्कृत कर दिया। कुछ चुनिन्दा रचनाओं की रिकॉर्डिंग मैं अगली पोस्टों में सुनवाने का प्रयास करूंगा।

अभी तो मैं यह बताना चाहता हूँ कि इस कार्यक्रम में बजने वाली तालियों ने मुझे कविताई की ओर बड़ी मजबूती से ढकेलना शुरू कर दिया। यमुना तट पर सितारों के जमघट, ट्रेजरी की नौकरी और होली की भागदौड़ के बीच कुछ शब्दों की जोड़-गाँठ रुक-रुककर चलती रही। आज जब होली की छुट्टी पूरी होने के बाद भी इलाहाबाद में एक दिन अतिरिक्त रंग खेला जा रहा है तो मैं घर में दुबका हुआ यह कारनामा पूरा करने में सफ़ल हो गया हूँ। अब गुणी जन इसे पढ़कर बताएं कि मुझे इस क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहिए कि नहीं 🙂

 

दिल की हर बात सरे-राह निकाली नहीं जाती

प्यार की धड़कन पर दिल में दबा ली नहीं जाती

 

हमने देखे हैं बहुत लोग जिन्हें प्यार हुआ

पर ये दौलत सभी लोगों से संभाली नहीं जाती

 

था हुनरमन्द और गैरत-ओ- ईमान का पक्का

फिर भला कैसे उसकी उसकी पगड़ी उछाली नहीं जाती

 

बहुत गरीब था यह जुर्म किया था उसने

वर्ना मासूम उसकी बेटी उठा ली नहीं जाती

 

सितम तमाम दफ़न हैं चमकती खादी में

वर्ना हसरत वज़ीर बनने की पाली नहीं जाती

 

तंग नाले के किनारे जला लिया चूल्हा

कामगारों से भूख अब जरा टाली नहीं जाती

 

लूट, हत्या, गबन, फिरका परस्ती, महंगाई

इनसे अखबार की सुर्खी कभी खाली नहीं जाती

 

देख ‘सत्यार्थमित्र’ अपने रहनुमाओं को

जिनके घर सजते हैं हरहाल दिवाली नहीं जाती

-सिद्धार्थ 

 

चलते-चलते आपको अपने मित्र और उम्दा शायर मनीष शुक्ला की वो ग़जल सुनवाता हूँ जिसने उस प्रशासनिक अधिकारियों के कवि सम्मेलन में खूब तालियाँ बटोरी। मुझे विश्वास है ये आपको जरूर पसन्द आएगी।

 

वादा किया गया था उजालों का क्या हुआ…

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राम रसोई हुई मुखर…|

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बुरा हो इस ब्लॉगजगत का जो चैन से आलस्य भी नहीं करने देता। एक स्वघोषित आलसी महाराज तुरत-फुरत कविता रचने और ठेलने की फैक्ट्री लगा रखे हैं। इधर-उधर झाँकते हुए टिपियाते रह्ते हैं। रहस्यमय प्रश्न उछालते हैं और वहीं से कोई सूत्र निकालकर कविता का एक नया प्रयोग ठेल देते हैं। उधर बेचैन आत्मा ने एक बसन्त का गीत लिखा- महज दो घण्टे में। उसपर आलसी महाराज ने दो मिनट में एक टिप्पणी लिखी होगी। उसके बाद क्या देखता हूँ कि उनके कविता ब्लॉग पर एक नयी सजधज के साथ कुछ नमूदार हुआ है। पता नहीं कविता ही है या कुछ और।

इस अबूझ आइटम की दो लाइनें ही मेरी समझ में आ सकीं। उन लाइनों पर सवार होकर मैं अपने गाँव चला गया। मिट्टी के चूल्हे में जलती लकड़ी के आँच पर बड़ी बटुली में भात और छोटी बटुली में दाल बनाती माँ दिख गयी। लकड़ी की आँच की लालच में वहीं सटकर बैठ गया हूँ। मैं पहँसुल पर तेजी से चलते उसके हाथों को देखता हूँ जो तरकारी काट रहे हैं। बड़ी दीदी सिलबट्टे पर चटनी पीस रही है। कान में कई मधुर आवाजों का संगीत बज रहा है जिसमें गजब का ‘स्वाद’ है। यह सब मुश्किल से पाँच मिनट में रच गया क्यों कि संगीत की गति अनोखी है:

 

अदहन खदकत भदर-भदर
ढक्कन खड़कत खड़र-खड़र
करछुल टनकत टनर-टनर
लौना लहकत लपर-लपर

बटुली महकत महर-महर
पहँसुल कतरत खचर-खचर
सिलबट रगड़त चटर-पटर
लहसुन गमकत उदर-अधर

राम रसोई हुई मुखर
कविता बोली देख इधर

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

घुस पैठी थकान…

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इतवार का बिहान

सिर तक रजाई लिए तान

घर में की खटपट से बन्द किए कान

आंगन में धूप रही नाच

छोटू ककहरा किताब रहा बाँच

फिर भी न आलस पर आने दी आँच

कुंजीपट खूँटी पर टांग

धत्‌ कुर्सी कर्मठता का स्वांग

दफ़्तर में अनसुनी है छुट्टी की मांग

कूड़े का ढेर

फाइल में फैला अंधेर

चिट्ठों में आँख मीच रहे उटकेर

आफ़त में जान

भला है बन बैठो अन्जान

देह नहीं मन में घुस पैठी थकान

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

मुर्दा पीटना बन्द कर कुछ अच्छा सोचें नये साल में…

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कलम उठाकर लिखते थे हम

शुभकामनाएं नये साल की

लिफाफे को सजाकर कुछ फूलों की डिजायन से

भरते थे उसमें अपना सुलेख

ग्रीटिंग कार्ड तैयार कर लेते थे- सस्ता, सुन्दर और टिकाऊ

अपने गुरुजनों को, सखा और सखियों को,

बस थमा देते थे अपनी शुभकामनाएं।

स्कूल में पहुँचने पर शुरू होता था नया साल

सबकी जुबान पर चढ़ा होता था

हैप्पी न्यू इयर, हैप्पी न्यू इयर, हैप्पी न्यू इयर

बदला जमाना

आ गया मोबाइल और इण्टरनेट

अब यहीं हो रही है मुलाकात और भेंट

अब नया साल रात में ही आ जाता है।

तीनो सूइयाँ एक दूसरे से मिलते ही शोर मच जाता है

नया साल टीवी के पर्दे से होकर निकलता है

लाइनें जाम हो जाती हैं

संदेश देने को फोन नहीं मिलता है।

 

आज अभी

होटलों में मोटी रकम खर्च करके भी

कुछ लोग नये साल को आता देख रहे होंगे।

ब्लॉगवाणी में भी शिड्यूल्ड

कुछ शुभकामनाओं के लेख रहे होंगे।

साल की अगवानी में

हम बहुत कुछ अनोखा कर जाते हैं

कुछ लोग तो इस हो हल्ले में

मानवता से ही धोखा कर जाते हैं

 

लेकिन जो सुविधा विहीन हैं

वे यूँ ही साल को आ जाने देते हैं

जैसे इतने दिन चले गये

आज का एक और दिन चले जाने देते हैं

मैं भी आज जागकर नया साल मना रहा हूँ

जैसे इसके आने में मेरी कोई भूमिका होना जरूरी हो

लिख रहा हूँ यह बोर करती बातें

जैसे कोई मजबूरी हो

 

लेकिन क्या करूँ

आज देखता हूँ कुछ लोग मुर्दा पीटने में व्यस्त हैं

एक अदनी सी बात का बहाना लेकर

अपना शब्द शौर्य दिखाने में व्यस्त हैं

 

अन्दर की भयानक गन्दगी

उबलकर बाहर आ रही है

उनके शब्दों की घटिया बाजीगरी

इस ब्लॉगमंच को मुँह चिढ़ा रही है

 

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का

यह कलुषित हश्र हो गया है

बुद्धि-विवेक, संस्कार, मर्यादा, सभ्यता और भावसौन्दर्य

इन सबका यह सारा कुनबा मुँह ढंककर सो गया है

 

अब इस ब्लॉगजगत में

आती-जाती रचनाओं का जो हाल है

वह सकारत्मक रचना कम

और ज्यादा बवाल है

ऐसे में हम क्या विश करें?

बस भगवान से प्रार्थना है

वे अविलम्ब यह विष हरें

 

नये साल में सबकी मर्यादा पुनरुज्जीवित होकर पुष्पित पल्लवित हो।

हमारा एक सकारात्मक संसार की रचना करने का प्रयास सुफलित हो॥

(शुभकामनाओं सहित)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

गृहिणी की कविता

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मन के भीतर उमड़-घुमड़

कुछ बादल सघन

ललक बरसन

पर पछुआ की धार से छितर-बितर

कुछ टुकड़ा इधर

कुछ खाँड़ उधर

 

घर के भीतर की खनखन

कलरव बच्चों का

कि अनबन

घरनी के मन में कुछ तड़पन

फिर ठनगन

उठता नहीं स्वर गगन

बस होती भनभन

मन ही मन

घरवाला अपने में मगन

देख ना सके है अगन

जाने किस बुरी घड़ी

लग गयी थी लगन

मन चाहे अब तोड़कर दीवारें

सरपट भगन

 

निकल नही पाती

मन से सब बात

लिखने को पाती

अब उठते नहीं हाथ

होकर अनाथ

साथ छोड़ रहा साहस

बिलाता एहसास अपनेपन का

दिखता नहीं कुछ भी

मन का

तन का

अब क्या करना

बस पेट भरना

तन कर

अब क्या रहना

बरबस अब है कहना

थाती मिटाती

ये आँधी

युगों ने थी बाँधी

जिस डोर से

चटक रही कैसे

किस ओर से

 

कैसे बतलाए

मन तो सकुचाए

अबतक तो रहे थे अघाए

नहीं….

खेले-खाए-अघाए

जितना भी पाए

उलीच दिया गागर

पर जो थी खाली

सारे मत अभिमत

सिद्ध हुए जाली

रखवाली का भ्रम था

जो करते नहीं थे

बस हो जाती थी

 

एक चिन्गारी लगी

ज्वाला फूटी

निकल पड़ी लेकर लकूटी

टूटी-फूटी…

 

ना ना

यह थी छिद्रहीन साबुत

जिन्दगी से भरी

भरी सी गगरी

न थी पत्थर की बुत

थोड़ी अलसाई

फिर लेती अंगड़ाई

छलक उठी गागर

समोए है सागर

कल-कल झरने की अठकेली

कई नदियों की धारा

लो इनको भी आँचल में लेली

अब खुलती हथेली

  गृहिणी

बन्द हुई मोटी किताबें

दूर धरी थियरी

सीधी सी बतियाँ बस

लाइव कमेन्टरी

घटित हो रहा मन में

जो घर में आँगन में

हस्तामलकवत्‌

चेतन मन कानन में

 

बात बेबात पे लड़ना

घड़ी-घड़ी झगड़ना

क्या दे देगा

किसी और का मुँह ताकते

एक ही लउर से हाँकते

भीतर बाहर झाँकते

आते-जाते को आँकते

हाँफ़ते फाँकते

सब ले लेगा

फिर

चाहिए ही क्या?

जो टाले न टले

हटाये न हटे

उसे यूँ साध लेना

मासूम बच्चा सा

मोहपाश सच्चा सा

डालकर यूँ बाँध लेना

सीखो तो सही

यह प्रेम की भाषा

दूर करेगी सारी निराशा

बोलो तो सही

बसता है ईश्वर

सबके भीतर बनकर

चेतना, दया और करुणा

जगाओ तो सही

 

फिर तो मनुष्य

बुरा कैसे रह जाएगा

सारा मालिन्य

इस अनुपम उजियारे में

झट से बह जाएगा

 

यह वाद वह आन्दोलन

यह भाषण वह सम्मेलन

अपने पूर्वाग्रह गठरी में बाँधकर

धर दो आले पर

मन की गाँठ खोलकर

चोट करो ताले पर

पहले घर से शुरू करो

कर डालो रिहर्सल

रियाज में ही राह दिखेगी

जिन्दा बनो हर पल

अन्धेरे को चीरकर

बन्द दिमागों से टकराएगी

आशा की उजली किरण

चहुँ ओर छा जाएगी।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

इलाहाबाद की राष्ट्रीय ब्लॉगर गोष्ठी से पहले…

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(१)

भाव हमारे शब्द उधार के…

पाँच दिनों की ट्रेनिंग पूरी करके लखनऊ से इलाहाबाद लौटा हूँ। पत्नी और बच्चे बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे थे। दीपावली की छुट्टी मनाने मेरे दो भाई भी अपने-अपने हॉस्टेल से आ चुके थे। घर में एक जन्मदिन भी था। लेकिन मुझे इसकी खुशी मनाने के लिए कोई उपहार खरीदने या अन्य तैयारी का कोई समय नहीं मिल पाया था। बस रात के नौ बजे तक घर पहुँच जाना ही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि रही। रिक्शे से उतरकर सबसे पहले पड़ोसी के लॉन से गुलाब के फूल माँग लाया और घर में प्रवेश करते ही उन्ही फूलों को पेश करते हुए  यह उधार का शेर सुना डाला-

तमाम उम्र तुम्हें जिन्दगी का प्यार मिले।

खु़दा करे ये खुशी तुमको बार-बार मिले॥

“हैप्पी बड्डे” का काम पूरा हो लिया था। तभी मेरे एक दोस्त ने चार खूबसूरत लाइनें बता दीं। तड़ से मैने एक सुनहले कार्ड पर उन्हें लिखा और चुपके से वहाँ रख दिया जहाँ उनकी नजर जल्दी से पहुँच जाय-

चन्द मासूम अदाओं के सिवा कुछ भी नहीं।
महकी-महकी सी हवाओं के सिवा कुछ भी नहीं॥
आज के प्यार भरे दिन पे तुम्हें देने को,
पास में मेरे दुआओं के सिवा कुछ भी नहीं।

फिर क्या था। आनन्द आ गया। भाव जम गया था। मेरी भावनाएं पूरी तरह से संचारित हो गयीं। दोनो तरफ़ सन्तुष्टि का भाव था। मेरे मन को बहुत तसल्ली मिल गयी और कुछ न कर पाने का मलाल थोड़ा मद्धिम हुआ।

(२)

कहानी कुछ यूँ पलटी:

अब मैं अगली चिन्ता की ओर से बरबस मोड़े हुए मन को दुबारा उस ओर ले जाने का उपक्रम करने लगा। कम्प्यूटर पर बैठकर आगामी कार्यक्रम की तैयारियों की प्रगति समीक्षा के उद्देश्य से मेलबॉक्स चेक करना था। कार्यक्रम के संयोजक श्री सन्तोष भदौरिया जी से बात करनी थी। अपने छोटे भाइयों से कम्प्यूटर तकनीक पर कुछ नया सीखना था, और अपने ब्लॉग पर एक नयी पोस्ट लिखने का मन भी था।

राष्ट्रीय सेमिनार के आयोजन में हमारे चिठ्ठाकार बन्धुओं ने जिस उत्साह और सौजन्यता से प्रतिभाग करने हेतु अपनी सहमति भेंजी है उसका धन्यवाद ज्ञापन भी करना था और ज्योतिपर्व दीपावली की शुभकामनाएं भी प्रेषित करनी थीं। इन सभी कार्यों पर एक के बाद एक ध्यान दौड़ाता रहा, लेकिन एकाग्र नहीं हो सका।

तभी एक जबरदस्त तुकबन्दी मेरे कानों से टकरायी। मेरी गृहिणी को यह सब अच्छा नहीं लग रहा था। उन्हें मुझसे शिकायत हो ली थी और वह तुकबन्दी उसी का बयान कर रही थी।

मैने पीछे मुड़कर पूछा, “इसके आगे भी कुछ जोड़ोगी कि यहीं अटकी रहोगी?”

“इसके आगे आप जोड़िए… मेरे भाव से तो आप भली भाँति परिचित हैं ही। …मैं चली सोने।” यह कहकर वो सही में चली गयीं।

अब मेरा सारा प्रोग्राम चौपट हो गया। पत्नी का आदेश पालन करना अपना धर्म समझते हुए मैने उस दो लाइन की तुकबन्दी को यथावत्‌ रखते हुए आगे की पंक्तियाँ जोड़ डाली हैं। इनमें व्यक्त भावों का कॉपीराइट मेरा नहीं है और इनसे मेरा सहमत होना भी जरूरी नहीं है। अस्तु…।

(३)

भाव तुम्हारे शब्द हमारे…

सोच रही हूँ, काश! मैं कम्प्यूटर होती।

तब अपने पतिदेव के दिल के भीतर होती॥

 

मैं सहचरी नहीं रह पायी अब उनकी जी।

इस निशिचर ने चुरा लिया है अब उनका जी॥

घर में मुझसे अधिक समय उसको देते हैं।

आते ही अब हाल-चाल उसका लेते हैं॥

चिन्ता नहीं उन्हें मेरी जो ना घर होती।

सोच रही हूँ, काश! मैं कम्प्यूटर होती….

 

सुबह शाम औ दिन रातें बस एक तपस्या।

नहीं दीखती घर में कोई अन्य समस्या॥

बतियाना औ हँसना, गाना कम्प्यूटर से।

रूठ जाय तो उसे मनाना है जी भर के॥

चिन्ता नहीं उन्हें चाहे मैं ठनकर रोती।

सोच रही हूँ, काश! मैं कम्प्यूटर होती॥

 

घर की दुनिया भले प्रतीक्षा कर ले भाई।

कम्प्यूटर की दुनिया की जमती प्रभुताई॥

‘घर का मेल’ बने, बिगड़े या पटरी छोड़े।

पर ‘ई-मेल’ बॉक्स खुलकर नित सरपट दौड़े।

वैसी अपलक दृष्टि कभी ना मुझपर होती।

सोच रही हूँ, काश! मैं कम्प्यूटर होती॥

 

शादी के अरमान सुनहरे धरे रह गये।

‘दो जिस्म मगर एक जान’ ख़तों में भरे रह गये॥

कम्प्यूटर ने श्रीमन्‌ की गलबहिंयाँ ले ली।

दो बच्चों की देखभाल, मैं निपट अकेली॥

लगे डाह सौतन को इच्छा जीभर होती।

सोच रही हूँ, काश! मैं कम्प्यूटर होती॥

 

(४)

शुभकामनाएं

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आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। सपरिवार सानन्द रहें। पति-पत्नी और बच्चों को महालक्ष्मी जी अपार खुशियाँ दें। सभी राजी खुशी रहें। हमपर भी देवी-देवता ऐसे ही प्रसन्न रहें, इसकी दुआ कीजिए। २३-२४ अक्टूबर को ब्लॉगर महाकुम्भ में यहाँ या वहाँ आप सबसे मुलाकात होगी ही।

!!!जय हो लक्ष्मी म‍इया की!!!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

अनूप जी, अब सम्हालिए… सेमिनार तय हो गया!!

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पिछली पोस्ट में मैने जिस सेमिनार के न हो पाने की बात बतायी थी उसके आयोजन की तैयारी में आदरणीय अनूप शुक्ल जी ने बहुत समय खर्च किया था। जाने कितने चिठ्ठाकारों से चर्चा में लगे रहे। इन्होंने जाने कितने आदि, अनादि, अनामय, अविचल, अविनाशी चिठ्ठाकार भाइयों, बहनों और दोस्तों को इस राष्ट्रीय सेमिनार के स्वरूप के बारे में बताया होगा। अनेक प्रतिष्ठित और ‘स्टार’ ब्लॉगर जन को न्यौता भी इन्होंने ही दिया था। मैं तो सिर्फ़ इनका पता जानता था सो सारी बातें इन्हीं को बता देता था।

जब अचानक कार्यक्रम टलने की बात प्रकट हुई तो मुझे सबसे बड़ी कठिनाई यह समाचार फुरसतिया जी को बताने में हुई। अपने से अधिक निराश मैने इन्हें पाया था। करीब दो सप्ताह का उत्साह दो मिनट में ठण्डा पड़ गया था। उधर मेरे बड़े भाई डॉ. अरविन्द मिश्र जी ने मुझे पहले ही आगाह किया था कि जब तक सब प्रकार से बात पक्की न हो जाय और बजट की व्यवस्था सुनिश्चित न हो जाय तबतक हाथ न डलियो। इसलिए जब उन्होंने स्थगन का समाचार सुना था तो थोड़े दुखी तो जरूर हुए लेकिन अपनी भविष्यवाणी के सच होने पर उनके मन में एक स्थितिप्रज्ञ का सन्तोष भाव भी जरूर था।

लेकिन अब तो कहानी बदल गयी है। अब “बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेहु…” की पॉलिसी पर चलना है।

अब अनूप जी को अपना पहले का किया श्रम व्यर्थ नहीं लगना चाहिए। कार्यक्रम की रूपरेखा जो हमने तब तय की थी कमोबेश वही रहने वाली है। शीघ्र ही महात्मागांधी अन्तर राष्ट्रीय  हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के अधिकारियों के साथ इलाहाबाद में बैठकर हम कार्यक्रम को अन्तिम रूप देंगे। अतिथियों की सूची भी वहीं तय हो पाएगी, लेकिन हिन्दी ब्लॉगजगत का सच्चा प्रतिनिधित्व कराने का पूरा प्रयास होगा। आदरणीय अनूप जी, अरविन्दजी, ज्ञानदत्तजी, आदि ने सदैव मेरे प्रति जो स्नेह का भाव रखा है उसी की ऊर्जा से मैं यह आयोजन करा पाने का आत्मविश्वास सजो पा रहा हूँ।

हिन्दुस्तानी एकेडेमी द्वारा इस अवसर पर एक महत्वाकांक्षी योजना बनायी गयी है। आप सभी इसमें सक्रिय सहयोग दें। एक अनूठी कृति आकार लेने वाली है। निस्संकोच होकर अपना योगदान सुनिश्चित करें। एकेडेमी के सचिव डॉ.एस.के. पाण्डेय जी ने उस अनुपम प्रकाशन का लोकार्पण २३ अक्टूबर के उद्‌घाटन सत्र में कराने का निश्चय अभी कर लिया है, जबकि प्रकाश्य सामग्री का एक भी शब्द अभी तय नहीं हुआ है। लेकिन हमें पूरा विश्वास है कि एक जोरदार पुस्तक उस तिथि तक आपके सामने होगी। बस आप अपनी प्रविष्टियाँ तत्काल भेंज दीजिए। कहाँ और कैसे? यह जानने के लिए एकेडेमी के ब्लॉग पृष्ठ पर पधारें।

अस्तु, हे अनूप जी! आगे का जिम्मा आपै सम्हारौ। हम त चलै माता रानी का आशीष बटोरै…  अरविन्द जी यदि चुनाव कराने में नहीं लगाये गये तो बाकी सब काम उनके लिए बहुत सरल हो जाएगा।

वैष्णो देवी धाम से लौटकर जब मैं वापस आऊंगा तो एकेडेमी के मेल-बॉक्स में सैकड़ों प्रविष्टियाँ आ चुकी होंगी। उनको छाँटने-बीनने के बाद संपादक मण्डल किताब को अन्तिम रूप देने में अधिकतम सात दिन लेगा और मुद्रक किताब बनाकर देने में सात दिन और लेगा। बस तबतक ब्लॉगिंग का महाकुम्भ भी आ ही जाएगा। किताब का लोकार्पण भी लगे हाथों हो जाएगा।

अब तो हम यह पोस्ट ठेलकर ट्रेन में बैठ जाएंगे। एक सप्ताह बाद लौटकर जुट जाएंगे इस महामेला की तैयारी में। तबतक अनूप जी अपने तरीके से तैयारी पूरी ही कर डालेंगे। बस मौजा ही मौजा… 🙂

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