लोकतन्त्र के भस्मासुर

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“कृपया मेरे सच बोलने पर नाराज न होइए; कोई भी व्यक्ति जो इस नगर-राज्य में घट रही अनेक अन्यायपूर्ण व गैरकानूनी घटनाओं को रोकने की कोशिश करेगा; और आपका या किसी अन्य ‘भीड़’ का सच्चा विरोध करेगा वह बच नहीं पाएगा। कोई भी व्यक्ति जो न्याय के लिए वास्तविक संघर्ष करता है, उसे यदि जीने की थोड़ी भी इच्छा है तो उसे सार्वजनिक जीवन त्याग कर निजी ज़िन्दगी बितानी होगी।” (एपॉल्जी से)

image यह उद्‍गार ग्रीक दार्शनिक प्लेटो के गुरू सुकरात ने ‘जूरी’ के सामने भरी अदालत में तब व्यक्त किए थे जब उनके विरुद्ध देशद्रोह का मुकदमा चलाया जा रहा था। कुछ ही समय में वह जूरी उन्हें मृत्युदण्ड सुनाने वाली थी। प्लेटो ने अपने गुरू की मौत का कारण जिस राज-व्यवस्था को ठहराया उसे ‘डेमोक्रेसी’ कहा जाता था, जिसमें भींड़ द्वारा नितान्त अविवेकपूर्ण निर्णय लिए जाते थे, और प्रायः अन्यायपूर्ण स्थिति उत्पन्न हो जाती थी। वही डेमोक्रेसी आज दुनिया की सबसे लोकप्रिय, सर्वमान्य और सर्वाधिक व्यहृत शासन व्यवस्था हो गयी है। यह बात अलग है कि राजनीति विज्ञान के जानकार प्राचीन ग्रीक कालीन डेमोक्रेसी और आधुनिक ‘लोकतंत्र’ में जमीन-आसमान का अन्तर बताएंगे।

प्लेटो ने जिस नगर-राज्य को देखा था उसकी जनसंख्या इतनी छोटी होती थी कि राज्य के सभी नागरिक एक स्थान पर एकत्र होकर बहुमत से अपना शासक चुन लेते थे। भीड़ का एक बड़ा हिस्सा जिसे पसन्द करता था वही राजा होता था और उसके फैसले सभी नागरिकों पर बाध्यकारी होते थे। सिद्धान्त रूप में आज भी लोकतंत्र का मतलब यही है- जनता की सरकार, जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों की बहुमत आधारित सरकार।

लेकिन प्लेटो ने इस बहुमत की व्यवस्था का जो विश्लेषण किया, वह इसकी खामियों को उजागर करने वाला है, और कदाचित्‌ सच्चाई के करीब भी है। उन्होंने राज्य की तुलना एक व्यक्ति से की थी, और बताया था कि जिस प्रकार एक व्यक्ति के भीतर इन्द्रियबोध (sensation), चित्तवृत्ति (emotion), और बुद्धि (intelligence) के बीच उचित तालमेल से ही उसका सन्तुलित और स्वस्थ जीवन सम्भव है, उसी प्रकार राज्य के विभिन्न अवयवों के आपसी सामन्जस्य से ही न्यायपूर्ण राज-व्यवस्था स्थापित की जा सकती है। यदि बुद्धि-विवेक के ऊपर मन व शरीर में पलने वाले काम, क्रोध, मद व लोभ जैसे विकार हावी हो जाते हैं, तो व्यक्तित्व दोषयुक्त और अन्या्यपूर्ण हो जाता है। शरीर के ऊपर मन और मन के ऊपर मस्तिष्क का नियन्त्रण बहुत आवश्यक है। यदि नियन्त्रण की यह दिशा उलट-पु्लट जाय तो व्यक्ति नष्ट होने लगता है। पतन अवश्यम्भावी हो जाता है। यही स्थिति उस राज्य की भी होती है, जहाँ विवेक पर उन्माद हावी हो जाता है।

लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सभी व्यक्तियों को एक इकाई के रूप में बराबर माना जाता है। भले ही उनकी मानसिक और शारीरिक क्षमता तथा सामाजिक पृष्ठभूमि में भारी अन्तर हो। यह व्यवस्था इसी सिद्धान्त पर टिकी है कि राज्य/देश की सरकार चुनने में प्रत्येक व्यक्ति के मत का मान बराबर है। कोई किसी से कम या अधिक महत्व नहीं रखता। कुल मतदाताओं में से बहुमत जिसके पक्ष में हो, वही सरकार बनाता है। इस सरकार द्वारा जो भी निर्णय लिए जाते हैं वह उन अल्पमत वाले नागरिकों पर भी प्रभावी होता है जिनका मत इस सरकार के विरुद्ध रहा है।

सिद्धान्त रूप में इस व्यवस्था में कोई कमी नहीं नज़र आती; लेकिन व्यवहार में बहुत कुछ बदला हुआ नजर आता है। प्लेटो ने इन बदलावों पर कुछ प्रकाश डाला था। बहुमत की पसन्द कौन होता है? लोकप्रियता का पैमाना क्या है? व्यक्ति अपना नेता किसे चुनता है? जिसे देश की सम्पूर्ण जनता का ख़्याल रखना है; आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, सामरिक, राजनयिक, वाणिज्यिक आदि विषयों से सम्बन्धित लोकनीति बनानी है, उसका चुनाव करते समय जनता इन विषयों में उसकी प्रवीणता देखने के बजाय उसकी जाति, उसका धर्म व रंग देखती है; उसकी वक्तृता पर मोहित हो जाती है, किसी दूसरे क्षेत्र में उसके कौशल से प्रभावित हो लेती है; और अपना नेता चुन लेती है।

अच्छी भाषण कला में माहिर एक नेता किसी स्वास्थ्य सम्बन्धी मुद्दे पर आम जनता का मत एक डॉक्टर की अपेक्षा अधिक आसानी से बदल सकता है। वह कमजोर और निरीह नागरिकों  को भी शत्रु देश पर हमले के लिए तैयार कर सकता है, जो एक आर्मी-जनरल नहीं कर सकता। जनप्रतिनिधियों द्वारा प्रभावशाली भाषण के माध्यम से बड़े-बड़े जनसमूहों को सम्मोहित कर बेवक़ूफ बनाने और उनके अन्ध-समर्थन से अत्यन्त शक्तिशाली बन जाने के उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है।

फ्रेडरिक नीत्शे कहते थे कि उन्माद, पागलपन, मूर्खता या विक्षिप्तता के लक्षण किसी व्यक्ति के भीतर किंचित्‌ ही पाये जाते हैं; लेकिन एक समूह, दल, राष्ट्र या किसी ऐतिहासिक कालखण्ड में ये लक्षण एक अनिवार्य नियम जैसे मिलते हैं। एक भीड़ या समूह का हिस्सा बन जाने पर व्यक्ति के सोचने समझने का ढंग पूरी तरह बदल जाता है। भीड़ में उसकी मानसिकता भेंड़ जैसी हो जाती है। विवेक भ्रष्ट हो जाता है। इसी भीड़ द्वारा चुने गये प्रतिनिधि जब सरकार चलाते हैं तो सुकरात को जहर का प्याला पीना पड़ता है।

भारतवर्ष में लोकतंत्र का जो मॉडल चलाया जा रहा है, उसमें भी इस उत्कृष्ट सिद्धान्त का व्यावहारिक रूप किसी धोखे से कम नहीं है। यहाँ का समाज भी जाति, धर्म, कुल, गोत्र, क्षेत्र, रंग, रूप, अमीर, गरीब, अगड़े, पिछड़े, दलित, सवर्ण, निर्बल, सबल, शिक्षित, अशिक्षित, शहरी, ग्रामीण, उच्च, मध्यम, निम्न, काले, गोरे, स्त्री, पुरुष, आदि के पैमानों पर इतना खण्ड-खण्ड विभाजित है; और ये पैमाने हमारी लोक संस्कृति में इतनी गहरी पैठ बना चुके हैं, कि किसी भी मुद्दे पर आम सहमति या सर्वसहमति नहीं बनायी जा सकती। राष्ट्र-राज्य की परिकल्पना से हम कोसों दूर हैं। ऐसे में बहुमत का अर्थ मात्र दस-पन्द्रह प्रतिशत मतों तक सिमट जाता है। शेष मत विखण्डित होकर इस आँकड़े से पीछे छूट जाते हैं।

कोई भी राजनेता यदि इस गणित को ठीक से समझ लेता है तो वह उन्हीं दस-पन्द्रह प्रतिशत मतों को अपने पक्ष में सुनिश्चित हुआ जानकर सन्तुष्ट हो लेता है, और यह सन्देश भी देता है कि उनके हितों की रक्षा के लिए वह कुछ भी कर सकता है। सारे नियम-कायदे ताख़ अपर रख सकता है; दूसरे समूहों को सार्वजनिक रूप से गाली दे सकता है; साम्प्रदायिक हिंसा करा सकता है; मार-पीट, झगड़ा-लड़ाई, अभद्रता और गुण्डागर्दी से यदि उनका स्वार्थ सधता है तो उसका सहारा लेने में तनिक भी संकोच नहीं करता है। विरोधी मतवाले वर्ग के विरुद्ध खुलेआम अत्याचार और दुर्व्यवहार करने से यदि उसके पीछे खड़ी उन्मादी भीड़ तालिया पीटती है तो इस तथाकथित जनप्रतिनिधि को वह सब करने में कोई गुरेज़ नहीं है।

ऐसी हालत में लोकतन्त्र के चार उपहार- स्वतंत्रता, समानता, भ्रातृत्व व न्याय एक बड़े वर्ग के हाथ से छीन लिए जा रहे हैं, और इन्हें लोकतन्त्र के भस्मासुर अपनी चेरी बनाकर रखने में सफल हो रहे हैं। आजकल अखबारों की सुर्खिया ऐसे समाचारों से भरी पड़ी हैं जहाँ नेता जी अपनी बात मनवाने के लिए प्रशासन के अधिकारियों को मारने-पीटने से लेकर उनकी हत्या कर देने से भी गु़रेज नहीं करते। राजनैतिक पार्टियों द्वारा आपसी रंजिश में एक दूसरे पर राजनैतिक हमले करना तो अब पुरानी बात हो गयी है। अब तो सीधे आमने-सामने दो-दो हाथ कर लेने और विरोधी के जान-माल को क्षति पहुँचाने का काम भी धड़ल्ले से किया जा रहा है।

क्या हम प्लेटो के मूल्यांकन को आधुनिक सन्दर्भ में भी सही होता नहीं पा रहे हैं? 

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बच के रहना रे बाबा… जाने कौन कैसा मिल जाय !?!

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मुझे तो अपने ही ऊपर तरस आ रही थी। कैसे यह सब सुनकर भी मैं उसके लिए कुछ खास नहीं कर पाया था। बेचारी कितनी हिम्मत करके आयी होगी अपना दुखड़ा सुनाने…।

मैं अपने बॉस के पास उनके चैम्बर में बैठा कुछ सरकारी कामकाज पर विचार-विमर्श में तल्लीन था। मई का महीना… बाहर सूर्यदेवता आग उगल रहे थे। कमरे के भीतर आती-जाती बिजली की आँख-मिचौनी के बीच ए.सी. की अधकचरी सेवा मन को उद्विग्न कर रही थी। गर्मी के कारण दफ़्तर में प्रायः सन्नाटा ही था। इसी बीच उसने अपने पिता के साथ कमरे में प्रवेश किया था।

साफ-सुथरे परिधान में पूरा शरीर ढँका हुआ था। पूरी बाँह ढँकने वाला कुर्ता, एड़ियों के नीचे तक पहुँचने वाली सलवार, और गले में लिपटा व सिर को ऊपर तक ढँकने वाला सूती दुपट्टा कान के पीछे करीने से दबाया गया था। कट-शू में पूरी तरह छिपे हुए पाँव उसके नख-शिख आवृत्त होने के सायास उपक्रम की कहानी कह रहे थे। दुग्ध धवल चेहरे पर प्रायः कोई मेक-अप नहीं था। जैसे सोकर उठने के बाद किसी अच्छे फेसवाश से चेहरा धुलकर साफ़ तौलिए से पोंछ लिया गया हो… बस। चेहरे पर असीम गाम्भीर्य और स्थिरता का भाव चस्पा था। निगाहें जमीन की ओर अपलक ताकती हुईं। करीब दो घण्टे की बात-चीत में कुछ सेकेण्ड्‌स के लिए ही नज़र ऊपर उठी होगी।

साथ में जो सज्जन आए थे वे काफी थके-हारे और दुखी दिख रहे थे। चेहरे पर उभरता पसीना जो रुमाल से बार-बार पोंछने के बाद भी छिटक आता। उम्र साठ के पार रही होगी। हमने सोचा शायद पेंशन के फरियादी होंगे जो अपनी बेटी के साथ आए हैं। बिना कुछ बोले कुर्सी पर आराम से बैठ गये। अपने थैले से कुछ कागज निकालने और रखने लगे। जैसे कोई खास कागज दिखाने के लिए ढूँढ रहे हों…।

बॉस ने हमारी बात-चीत बीच में रोककर उनसे आने का प्रयोजन पूछा तो उन्होंने इशारे से कहा कि आपलोग अपनी बात पूरी कर लें और ध्यान से सुनने को तैयार हों तभी वे अपनी बात कहेंगे। हम फौरन उनकी बात सुनने को तैयार हो लिए।

“हमें अमुक विभाग के एक अधिकारी की पे-स्लिप चाहिए…”

“कौन सा अधिकारी? कहाँ काम करता है?”

“आज-कल लखनऊ में ट्रेनिंग ले रहा है…”

“तो पे-स्लिप तो वहीं से मिलेगी, यहाँ से उसकी कोई सूचना कैसे मिल सकती है?”

“वहाँ से नहीं मिल पा रही है, तभी तो ट्रेजरी में आपकी मदद के लिए आए हैं…” पिता का स्वर लाचार सा था।

“किसी भी ट्रेजरी से प्रदेश के सभी अफसरों की पे-स्लिप नहीं मिलती…। ऐसी क्या जरूरत पड़ गयी आपको पे-स्लिप की..? और मिलने में क्या समस्या आ रही है?” बॉस के प्रश्न में हैरानी थी।

इसके बाद उन्होंने जो कहानी सुनायी वह सिर पीट लेने लायक थी।

“हमने इस लड़की की शादी उस अफसर लड़के से की थी। दहेज में काफी रकम खर्च किया था मैने। गाड़ी और जेवर अलग से…। …लेकिन हमें धोखा हो गया है। …अब नौबत तलाक की आ गयी है। …कोर्ट में मुकदमा चल रहा है। उसी सिलसिले में हमें उसकी नौकरी से सम्बन्धित कागजात की जरूरत है” बगल में शान्त बैठी बेटी के बाप की आवाज रुक-रुककर निकल रही थी।

सहसा लड़की ने भी बोलना शुरू कर दिया, “वह झूठ पर झूठ बोल रहा है। हम उसकी असलियत साबित करना चाह रहे हैं लेकिन सरकारी विभाग हमारी मदद नहीं कर रहे हैं।”

हमने पूछा, “आखिर गड़बड़ी क्या हो गयी जो बात तलाक तक पहुँच गयी? ”

इसपर बाप-बेटी दोनो एक दूसरे का मुँह देखने लगे। जैसे यह तय कर रहे हों कि बात खोली जाय कि नहीं…। फिर दोनो ने इशारे से एक-दूसरे को सहमति दी।

imageलड़की ने बड़े इत्मीनान से बताया, “इन-फैक्ट… वो इम्पोटेन्ट है”

यह सुनकर हम सन्न रह गये, “ओफ़्फ़ो… आपलोगों को बड़ा धोखा हुआ!”

“…अगर ऐसा था तो उसे क्या पड़ी थी शादी करने की”, मैने हैरत से कहा और मन में उभर आये अजीब  से भाव को संयत करने के लिए कुर्सी की पीठ पर टेक लेकर छत की ओर निहारने लगा।

…ईश्वर ने इस लड़की को इतना सुन्दर व्यक्तित्व दिया, एक सक्षम पिता के घर जन्म लेकर सुख सुविधाओं में पली बढ़ी, घर वालों ने अच्छे दान-दहेज के साथ एक राजपत्रित अधिकारी के साथ इसका विवाह कर दिया; …फिर भी बेचारी आज भरी दुपहरी में कोर्ट  कचहरी और सरकारी दफ़्तरों के चक्कर काट रही है। निश्चित्‌ रूप से बुरे ग्रहों का प्रभाव झेल रही है यह…। …ऐसा दुर्भाग्य जिसकी कल्पना भी न की जा सके!

इस बीच बॉस ने फोन मिलाकर उस ट्रेनिंग इन्स्टीट्यूट के अधिकारियों से बात करनी शुरू कर दी थी। स्वार्थ में अन्धे युवक द्वारा अपनी कमजोरी छिपाकर एक मालदार बाप से दहेज ऐंठने के लालच में एक सुन्दर सुशील कन्या का जीवन नर्क बना देने वाले का परोक्ष रूप से सहयोग करने वालों को भी लानत भेंजी जाने लगी।

मैने भी ‘सूचना का अधिकार कानून (RTI Act)’ के अन्तर्गत पे-स्लिप की सूचना मांगने की सलाह दे दी। इसपर उन्होंने बताया कि वे इसप्रकार के सारे उपाय आजमा चुके हैं। कोई परिणाम नहीं निकला। मैने प्रदेश के ‘सूचना आयुक्त’ से अपील करने को कहा। वहाँ कार्यरत अपने एक मित्र से मदद के लिए फौरन मोबाइल पर बात कर लिया और इन लोगों से परिचय भी करा दिया।

इस काम से मेरे मन को थोड़ी तसल्ली मिली…।

हमने उन दोनो के मुँह से ही शादी तय होने, बारात का भव्य स्वागत सत्कार किए जाने और मोटी दहेज देने के साथ ही साथ लड़की के ससुराल जाने के बाद एक-दो दिन के भीतर उसे अपने दुर्भाग्य की जानकारी होने, संकोच में बात छिपाकर रखने, उस लड़के द्वारा ‘फर्जी नाम से पर्चा बनवाकर’ अनेक डाक्टरों से परामर्श लेने तथा अपनी अक्षमता को छिपाने के प्रयासों का विस्तृत वर्णन सुना। पूरी दास्तान बताने में लड़की ज्यादा मुखर हो उठी थी। उसने कहा कि मैने कोर्ट से इसका मेडिकल टेस्ट कराने की प्रार्थना की है लेकिन वह इससे भग रहा है।

हमने यथासामर्थ्य मदद का आश्वासन देकर उन्हें सहानुभूति पूर्वक विदा किया। उन्होंने भी अपने ठगे जाने की कहानी विस्तार से बताने के बाद हमसे सधन्यवाद विदा लिया।

भाग-दो 

जुलाई की ऊमस भरी गर्मी…। मैं अपने ऑफिस में बैठा कूलर की घर्र-घर्र के बीच चिपचिपे पसीने पर कुढ़ता हुआ सरकारी फाइलों और देयकों (bills) आदि का काम निपटा रहा था। बाहर का मौसम तेज धूप और रुक-रुक कर पड़ते बारिश के छींटो से ऐसा खराब बन गया था कि बहुत मजबूरी में ही बाहर निकला जा सकता था। मेरे कमरे में कोई दूसरा न था।

तभी एक स्मार्ट सा युवक अन्दर आया और मेरी अनुमति लेकर कुर्सी पर बैठ गया। उसका चेहरा कुछ जाना पहचाना लगा…।

(कहानी थोड़ी लम्बी खिंचने वाली है, इसलिए अभी यहीं बन्द करता हूँ। शेष अगली पोस्ट में बहुत शीघ्र…)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

ब्लॉगिंग कार्यशाला: पाठ-5 (कुछ गुरुमन्त्र : ज्ञानदत्त पाण्डेय)

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जब हमने इमरान प्रतापगढ़ी के साथ इस कार्यशाला के आयोजन की योजना बनायी थी तो हमारे प्रयास का सबसे बड़ा सम्बल आदरणीय ज्ञानदत्त पाण्डेय जी का इलाहाबाद में उपस्थित होना था। फिर भी जब हम उनकी सहमति लेने उनके आवास पर पहुँचे तो पाँच मिनट के भीतर जो बात हुई उससे हमारा ‘भव्य आयोजन’ खटाई में पड़ता दिखा। उन्होंने कहा कि मैं तो चाहता हूँ कि केवल चुने हुए पच्चीस लोग ही रहें जिनसे सहज ढंग से बातों का आदान-प्रदान किया जा सके। बड़ी सी भीड़ जुटाकर भाषण दिलाना हो तो मुझे घटाकर ही योजना बनाइए।

इमरान ने मुझसे फुसफुसाकर कहा कि सर इतने तो कार्यकर्ता ही हो जाएंगे। मैंने उन्हें मनाते हुए पचास की संख्या पर राजी कर लिया। इसमें आदरणीया रीता भाभी का पूरा सपोर्ट हमारे पक्ष में रहा।

 गुरुमन्त्र

कार्यक्रम के निर्धारित समय से दो मिनट पहले अपने लैपटॉप के साथ पहुँचकर उन्होंने हमें आश्वस्त कर दिया कि सबकुछ अच्छा ही होने वाला है। सबसे वरिष्ठ होने के कारण स्वाभाविक रूप से उन्हें कार्यक्रम के अध्यक्ष की कुर्सी सम्हालनी पड़ी और इसी के फलस्वरुप उन्हे अपनी बात कहने का अवसर सबसे अन्त में मिला। मजे की बात यह रही कि जब कार्यक्रम अपने उत्स पर था तो निराला सभागार ठसाठस भरा हुआ था, लेकिन जब अन्त में ब्लॉगिंग के गुरुमन्त्र जानने की बारी आयी तो हाल में वही पच्चीस-तीस धैर्यवान श्रोता बैठे हुए थे जितने की इच्छा गुरुदेव ने जाहिर की थी।

समर्पित श्रोता  

पीछे की कुर्सियों से उन्हें आगे बुलाया गया और लैप टॉप के की-बोर्ड पर अंगुलिया फिराते हुए ‘पॉवर प्वाइण्ट’ के माध्यम से उन्होंने अपनी सूत्रवत बातें बतानी शुरू कीं। जो सज्जन डॉ. अरविन्द मिश्रा जी की प्रस्तुति अंग्रेजी में होने पर प्रश्न उठा चुके थे वे इस सुन्दर हिन्दीमय झाँकी को देखने के लिए नहीं रहे।

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व्यर्थ का झंझट तो कतई नहीं…  लाभ का आशय अलग-अलग है

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   अपेक्षा के हिसाब से समय और प्रतिभा का निवेश भी जरूरी है।

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   शुरू करना बहुत आसान है लेकिन नियमित बने रहना मुश्किल 

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टिप्पणी पाने के लिए टिप्पणी देना भी जरूरी… वह भी पढ़कर:)

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एक गुरू जरूर तलाश लें …समस्या कभी भी आ सकती है।

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निराला सभागार में यह अंश फास्ट-फॉर्वर्ड का शिकार हुआ

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यही तो यू.एस.पी. है एक सफल ब्लॉगर का

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सबको जानने की कोशिश करें, तब सभी आपको जान पाएंगे

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   भविष्य उज्ज्वल है… और क्या… !?

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बहुत बहुत धन्यवाद…:)

और नमस्कार मेरी ओर से भी… आपने इतने धैर्य से इसे पढ़ने, जानने और समझने के लिए समय निकाला…।

ये शब्द थे दृश्यकला विभाग के मुखिया और इलाहाबादी बकबक नामक ब्लॉग के प्रणेता धनन्जय चोपड़ा जी के जिनके जिम्मे कार्यक्रम के अतिथियों, वार्ताकारों, श्रोताओं, पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और माइक-मंच-फर्नीचर के व्यस्थापकों को धन्यवाद देने का जिम्मा सौंपा गया था।

ज्ञान जी की हड़बड़ प्रस्तुति के बाद जो प्रश्नोत्तर काल निर्धारित था उसमें एक बड़ा मौलिक सवाल किया गया- “आखिर ब्लॉग बनाएं कैसे?” सभी पैनेलिस्ट इसका आसान तरीका और गूगल की साइट का पता बताने लगे। तभी धनन्जय जी ने माइक सम्हाल लिया और बोले-

“गूगल सर्च में टाइप करो blog, एक खिड़की खुलेगी, एक जगह लिखा मिलेगा create new blog, उसे चटकाओ और जो-जो कहे करते जाओ। ब्लॉग बन गया।”

“हाँ इसके पहले जी-मेल का खाता होना जरूरी है। यदि नहीं है तो गूगल सर्च में gmail टाइप करो। एक खिड़की खुलेगी, एक जगह लिखा मिलेगा create new account , उसे चटकाओ और जो-जो कहे करते जाओ। खाता दो मिनट में बन जाएगा।”

(समाप्त)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

ब्लॉगिंग कार्यशाला: पाठ-४ डॉ.कविता वाचक्नवी (हिन्दी कम्प्यूटिंग) द्वितीय भाग

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इस पाठ के प्रथम भाग में हमने जाना कि डॉ.कविता वाचक्नवी ने अपने वक्तव्य में हिन्दी कम्प्यूटिंग के क्षेत्र में होने वाली बड़े कार्यों का उल्लेख किया था। कविता कोष से सम्बन्धित बिन्दु-७ पर उनका स्पष्टीकरण आया है कि नेट पर ख़ुसरो से आज तक के कवियों की कविताओं की कुल संख्या 60 हज़ार से ऊपर है, ना कि केवल कविता कोष की। कविता कोष पर लगभग 18 हज़ार व अनुभूति पर भी लगभग 25 हज़ार से ऊपर कविताएं संकलित की गयी हैं।

हिन्दी कम्प्यूटिंग और अनुप्रयोग इसी कड़ी में अब आगे…

८. साहित्य कोश:

अन्तर्जाल पर हिन्दी साहित्य का विपुल भण्डार उपलब्ध है। गद्य और पद्य दोनो में। प्रेमचन्द जी का लगभग पूरा साहित्य ही नेट पर उपलब्ध है। वागर्थ, नया ज्ञानोदय, तद्भव, हंस, अन्यथा जैसी अनेकानेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के साथ ही साथ १०-२० नेट पत्रिकाएं जैसे: अनुभूति, अभिव्यक्ति, साहित्यकुंज, इन्द्रधनुष आदि भी सुलभ हैं

९.हिन्दी समाचार:

प्रायः सभी हिन्दी समाचार पत्र और साप्ताहिक पत्र पत्रिकाएं जैसे इण्डिया-टुडे, बी.बी.सी. पत्रिका, ऑउटलुक आदि हिन्दी प्रयोक्ताओं के लिए उपलब्ध हैं। बी.बी.सी. रेडियो (हिन्दी समाचार) सेवा से कौन अपरिचित होगा। अब यह ऑन लाइन सुनी जा सकती है।

९.विकीपीडिया:

अंग्रेजी संस्करण की तर्ज पर ही हिन्दी में भी यह मुक्त ज्ञानकोष लगातार बढ़ता जा रहा है। इससे न सिर्फ़ आप दुनिया के किसी भी विषय पर अच्छी जानकारी पा सकते है बल्कि इसमें अपनी जानकारी को जोड़कर इसके भण्डार को और समुन्नत भी बना सकते हैं।

९. चर्चा समूह:

अब हिन्दी में भी अनेक विशिष्ट विषयों पर आधारित चर्चा समूह और फोरम सक्रिय हो चुके हैं। हिन्दीभारत, ई-कविता, हिन्दीफ़ोरम,  तकनीकी व वैज्ञानिक हिन्दी, …..आदि बीसियों सहायता व विमर्श हेतु जालस्थल(sites) उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त ऑर्कुट और फेसबुक जैसी

१०.फॉण्ट परिवर्तक:

फॉण्ट की पारम्परिक समस्या अब नहीं रही। यूनिकोड फॉण्ट में  ऑफ़लाईन/ऑनलाईन टंकड़ के औंजार उपलब्ध हैं।  फ़ोनेटिक औंजार भी सुलभ हैं; जैसे- इंडिक ट्रांसलिट्रेशन व क्विलपैड सीधे देवनागरी में टंकड़ की सुविधा देते हैं।

पुरानी से पुरानी किसी फॉण्ट में  रखी सामग्री को यूनिकोडित करने हेतु २० से  अधिक फॉण्ट परिवर्तक मुफ़्त में उपलब्ध हैं। जिस फॉण्ट का परिवर्तक उपलब्ध नहीं है उसे अधिकतम एक सप्ताह में तैयार कर आपकी सेवा में उपलब्ध कराने के लिए कुछ तकनीकी महारथी सदैव तत्पर हैं। अनुनाद जी, नारायण प्रसाद जी, और हरिराम जी ने इस दिशा में स्तुत्य प्रयास किया है।

११. संकलक (एग्रेगेटर्स):

अब हिन्दी के ब्लॉग्स को उनके प्रकाशन के समय और श्रेणी के अनुसार एक स्थान पर संकलित करके व्यवस्थित ढंग से नेटप्रयोक्ताओं को सुलभ कराने का काम ब्लॉगवाणी, नारद, चिट्ठाजगत आदि कर रहे हैं। निरन्तर शोध और रचनात्मक कौशल द्वारा इन्होंने चिठ्ठाकारी की दुनिया में सहज विचरण को आसान और सुरुचिपूर्ण बना दिया है। ब्लॉग्स की लोकप्रियता और सक्रियता के आँकड़े आसानी से देखे जा सकते हैं।

१२. खोज इन्जन:

नेट पर सबसे बड़े खोज इन्जन गूगलसर्च में भी हिन्दी/देवनागरी  में ‘सर्च’ की सुविधा उपलब्ध हो चुकी है। अब आपकी खोज को पूरा करने के लिए हिन्दी में उपलब्ध सम्पूर्ण सामग्री भी गूगल द्वारा खंगाली जाती है। दूसरे सर्चइन्जन भी हिन्दी आधारित विषयों को उपलब्ध करा रहे हैं।

कविता जी ने उपरोक्त के अलावा यह भी बताया कि वाचान्तर (सीडैक)नाम से एक ‘स्पीच रिकॉग्निशन’ सुविधा है जो पैसा लेकर दी जाने वाली एकमात्र सुविधा है। हिन्दी की शेष सभी सुविधाएँ व संसाधन निःशुल्क हैं।
कई ब्लॉग्स पर हिंदी में प्रौद्योगिकी  विषयक लेखन हो रहा है

इसके अतिरिक्त TTS (text to speech/hindi sceen reader) जैसी दृष्टिबाधित उपयोक्ताओं के लिए हिन्दी में अनेक सुविधाएं विकसित की गयी है।

अब सभी मुख्य ब्रॉउजर हिन्दी में उपलब्ध हो चुके है। ऑनलाइन लाइब्रेरीज, शब्दकोश, तकनीकी शब्दावली कोश, मुहावरा कोश, वर्तनी शुद्धिकरण यन्त्र के साथ ही हिन्दी में बाजार विषयक लेखन भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। सभी बड़ी संस्थाओं की साइट्स हिन्दी में बनायी जा रही है। MSN,google,Yahoo आदि ने हिन्दी में संदेशों के आदान-प्रदान और गप्पे लड़ाने (चैटिंग) की सुविधा दे रखी है।

हिन्दी कम्प्यूटिंग के महत्व को रेखांकित करते हुए कविता जी ने कहा कि वैश्वीकरण के इस दौर में भारत का जो बड़ा बाजार बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की दृष्टि में है उसपर कब्जा जमाने के लिए उन्हें हिन्दी के प्रयोग को बढ़ावा देना अपरिहार्य होगा। इसलिए अब इस दिशा में बदलाव आना शुरू भी हो चुका है।

अब अंग्रेजी पर निर्भर होने की मजबूरी नहीं है। मुझे आजतक ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो अपने बच्चों को इंलिश मीडियम से इसलिए पढ़ाता हो कि उसे अंग्रेजी से बहुत प्यार है। बल्कि वह यह समझता है कि आज के समाज में कैरियर की सफलता के लिए अंग्रेजी का ज्ञान जरूरी है। अब यदि हिन्दी में दक्षता आपको रोजगार उपलब्ध करा दे तो अंग्रेजी पढ़ना एक मजबूरी नहीं रह जाएगी। उन्होंने पूछा कि अमेरिका की सिलिकॉन वैली में जाकर भारतीय बच्चे यदि उनके लिए अंग्रेजी में सॉफ्टवेयर विकसित कर रहे हैं तो वही बच्चे भारत में रहकर हिन्दी में अच्छे सॉफ़्टवेयर क्यों नहीं बना सकते?

अपने वक्तव्य की समाप्ति कविता जी ने एक अपील से की- वह थी सभी हिन्दी प्रेमियों से हिन्दी की सेवा का व्रत लेने की। उन्होंने कहा कि आप सभी अपनी रुचि के अनुसार किसी एक साहित्यकार, कवि या लेखक को चुन लीचिए। उनके रचना संसार को यूनीकोड में टाइप करके इण्टरनेट पर अपलोड करिए। अभी यह सारी सुविधा निःशुल्क है। अपने पसंदीदा साहित्य को अन्तर्जाल पर सुरक्षित कराइए। इससे यह मात्र एक-दो पीढ़ियों तक नहीं बल्कि अनन्त काल तक अक्षुण्ण रह पाएगा।

(पाठ-४ समाप्त)

एक अनुरोध: समयाभाव व तकनीकी कमजोरी के कारण बहुत से उपयोगी लिंक इच्छा रहते हुए भी नहीं दे पाया हूँ। आप इस कमी को पूरा कर सकते हैं। अपनी टिप्पणियों में आप चाहें तो हिन्दी अनुप्रयोगों से सम्बन्धित महत्वपूर्ण लिंक दे सकते हैं जो नये जिज्ञासु पाठकों और चिठ्ठाकार भाइयों-बहनों के लिए उपयोगी हो सकता है।

लिंक देने का तरीका /कोड: <a href="लिंक का युआरएल ">चयनित शब्द जिसपर लिंक देना है</a>

(अगला और अन्तिम पाठ:

कुशल ब्लॉग प्रबन्धन- ज्ञानदत्त पाण्डेय)

ब्लॉगिंग कार्यशाला: पाठ-१ (विषय प्रवर्तन)

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“हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया” में प्रवेशोत्सुक नये कलमकारों को चिठ्ठाकारी के विविध पक्षों से परिचित कराने के लिए जो कार्यशाला आयोजित की गयी उसके चित्र आप देख चुके हैं। अब बारी है रिपोर्टिंग की। अनेक बड़े भाइयों ने विस्तृत जानकारी चाही है। नये लोग भी इसे यहाँ से जानना चाहेंगे कि हमने उन तीन घण्टों में ऐसा क्या किया जो शहर के सभी अखबारों को इसकी चित्रमय रिपोर्टिंग करनी पड़ी। विश्वविद्यालय में फोटो पत्रकारिता और जन संचार की पढ़ाई करने वाले छात्रों और शहर में रहने वाले अन्य बुद्धिजीवियों व पत्रकारों से बने श्रोता समूह को क्या बताया गया, आइए जानते हैं:

सर्वप्रथम भारतीय परम्परा के अनुसार सभी अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ (bouquet) भेंट करके किया गया। प्रदेश के अपर पुलिस महानिदेशक श्री एस.पी. श्रीवास्तव जी ने मुख्य अतिथि की भूमिका निभाते हुए दीप प्रज्ज्वलित करके कार्यक्रम का विधिवत उ्द्‌घाटन किया। पाँच बाती वाले दीप-स्तम्भ में घी के दीपक जलाने में पाँचो वक्ताओं ने हाथ बँटाया। इमरान की शेरो-शायरी ने माहौल को जिन्दा बनाए रखा।

जुगनू भी मेरे घर में चमकने नहीं देते,

कुछ लोग अन्धेरों को सिमटने नहीं देते।

हम हैं कि नयी पौध लगाने पे तुले हैं;

बरगद हैं कि पौधों को पनपने नहीं देते॥

प्रो.अलका अग्रवाल कार्यक्रम विश्वविद्यालय परिसर में था इसलिए विश्वविद्यालय की महिला सलाहकार समिति की अध्यक्ष और अर्थशास्त्र की विभागाध्यक्ष प्रो.अलका अग्रवाल जी अतिथियों का स्वागत करने स्वयं उपस्थित हो गयी थीं। इमरान उन्हें बता नहीं पाये थे कि यहाँ क्या होने वाला है क्योंकि उन्हें भी इनके आगमन की पूर्वसूचना नहीं थी। जब उन्होंने बताया कि वे स्वागत करने आयी हैं तो संचालक की भूमिका निभा रहे उनके शिष्य को माइक थमाना ही था। फिर बकौल ज्ञानजी आगे वही हुआ जो शाश्‍वत है। सबके शुरुआती उत्साह के सूरज पर उनका करीब २० मिनट का माइक-मोह घने बादल के रूप में छाया रहा। देश, काल, वातावरण और राजनीति से सम्बन्धित अनेक बातें होती रहीं और श्रोता किसी खुर्राट ब्लॉगर की भाँति उसे `स्किप’ करते रहे।

आखिरकार संचालक को मौका मिला और असली बातें शुरू करने के लिए सबसे पहले सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी बुलाए गये। इससे यह बात पुष्ट हो गयी कि इमरान को कवि सम्मेलनों और मुशायरों के कुशल संचालन का अच्छा अनुभव है। जहाँ नौसिखिए कवियों को शुरू में निपटाना पड़ता है क्यों कि श्रोता अभी महफिल छोड़ने के बारे में नहीं सोच रहे होते हैं।

विषय प्रवर्तन मैने अपने लिए बहुत साधारण काम ले रखा था- सिर्फ़ यह बताने का कि यहाँ क्या-क्या बताया जाएगा और उसको बताने की जरूरत क्यों है। लेकिन मुझे सबसे पहले यह स्पष्ट करना पड़ा कि यहाँ क्या-क्या नहीं बोलना है। समय के प्रबन्धन की जो बात किसी वार्ताकार को आगे बतानी थी उसका अनुपालन तत्काल करने की विनती मुझे करनी पड़ी। हम पहले ही आधा घण्टा गँवा चुके थे।

मैने मुद्दे पर लौटते हुए सबसे पहले यह बताया कि ब्लॉग आज के जमाने की ऐसी विद्या है जिसे सीखने के लिए किसी गुरू की आवश्यकता ही नहीं है। यहाँ जो लोग आए हुए हैं वो सभी मात्र यही बताने आए हैं कि इसे बहुत टेक्निकल मानकर दूर-दूर न रहिए। केवल इन्टरनेट युक्त कम्प्यूटर के पास बैठने की देर है। यदि हमारे भीतर जिज्ञासा की जरा भी लौ जल रही है तो बाकी सारी पढ़ाई अपने आप हो जाएगी। इक्कीसवी सदी में परवान चढ़ा यह माध्यम हमें विचार अभिव्यक्ति का एक ऐसा मौका देता है जहाँ हम स्वयं रचनाकार-लेखक, सम्पादक, प्रकाशक और मुद्रक सबकी भूमिकाएं निभाते हैं। कोई हमारा हाथ रोकने वाला नहीं है। केवल हमारा अपना विवेक ही है जो हमें कुछ करने या न करने के लिए रास्ता दिखाता है।

यहाँ बैठे अनुभवी लोग आपको यह नहीं बताएंगे कि आप क्या लिखें। बल्कि यह बताएंगे कि अपने मन की कोई भी बात लिखने और दूसरों को बताने से यदि अभी तक आप वंचित रह गये हैं तो अब समय आ गया है कि बिना किसी सम्पादक की कृपा का जुगाड़ खोजे आप अपने मन के उद्‌गार खुलकर व्यक्त कर सकते हैं। घर बैठे-बैठे आप पूरी दुनिया में पढ़े जा सकते हैं और अपने लिखे हुए पर पाठकों की स्वतंत्र टिप्पणी भी पलक झपकते पा सकते हैं। अपरिमित स्वतंत्रता के इस सुलभ माध्यम का आप कैसे प्रयोग करेंगे यह हम नहीं बताएंगे, यह तो आपको ही तय करना है। हम तो यह बताएंगे कि इसका प्रयोग कितने प्रकार से किया जा सकता है। कविता, कहानी, गीत, ग़ज़ल, डायरी, समाचार, व्यंग्य, आदि लिखकर, बोलकर, गाकर, या वीडियो बनाकर चाहे जैसे पूरी दुनिया को पेश कर सकते हैं।

हमने यहाँ इन अनुभवी ब्लॉगर्स को सिर्फ़ इस लिए बुला रखा है कि ये अपने अनुभव से आपको वह सब बताएंगे जो आपके मन के संकोच और संशय को मिटा देगा। एक ब्लॉगर के रूप में आप जो यात्रा शुरू करने वाले हैं उस यात्रापथ पर पहले से ही चलने वाले आपको इस राह की विशेषताओं के बारे में बताएंगे। यहाँ यह पता चलेगा कि यह सड़क कंकड़ीली, पथरीली, ऊबड़-खाबड़ है कि साफ-सुन्दर, चिकनी और रंगी-पुती आकर्षित करने वाली है।

इस यात्रा वृत्तान्त के पहले हमराही कानपुर के श्री अनूप शुक्ल जी  आपको ब्लॉगिंग के शुरुआती दिनों की बात बताते हुए अब तक की यात्रा से परिचित काराएंगे। आपका फुरसतिया नामक ब्लॉग यद्यपि लम्बी पोस्टों के लिए जाना जाता है लेकिन एक बार पढ़ना शुरू करने के बाद इसे बीच में छोड़ा ही नहीं जा सकता। आप हिन्दी भाषा के सभी ब्लॉग्स पर नजर रखते हैं। चिठ्ठाचर्चा नामक ब्लॉग से आजकल छपने वाले सभी चिठ्ठों में से चुनिन्दा पोस्टों की समीक्षा और लिंक्स वहाँ पायी जा सकती हैं। आज की चिठ्ठाकारी की दुनिया में जो रुझान चल रहे हैं ये उनकी नब्ज टटोलते रहते हैं। इनसे हम जानेंगे कि कैसी है हिन्दी चिठ्‌ठाकारी की दुनिया की आम प्रवृत्तियाँ और वे कौन लोग हैं जिन्होंने इसे यहाँ तक पहुँचाने में सक्रिय योगदान किया है।

चिठ्ठाकारी का कार्य एक खास उद्देश्य से किया जाना चाहिए। यह सिर्फ मन बहलाव के लिए करने पर अधिक दूरी तक नहीं जाता। उद्देश्य सामाजिक भी हो सकता है और व्यक्तिगत भी। इसी कड़ी में कुछ विज्ञानप्रेमी लेखकों ने बड़ी गम्भीरता से वैज्ञानिक विषयों पर ब्लॉग लेखन की एक विशिष्ट धारा शुरू की है। इनका प्रकट उद्देश्य समाज में व्याप्त अनेक रूढ़ियों और अन्धविश्वासों को मिटाना और सबके भीतर एक वैज्ञानिक सोच विकसित करने  का है। विज्ञान सम्बन्धी विषयों पर लिखने वाले चिठ्ठाकारों के संगठन साइंस ब्लॉगर्स एसोसिएशन ऑव इण्डिया के अध्यक्ष और क्वचिदन्यतोअपिसांईब्लॉग के लेखक वाराणसी से आए डॉ. अरविन्द मिश्रा जी इस धारा पर प्रकाश डालेंगे।

जब आप हिंदी भाषा का ब्लॉगर बनने का निर्णय लेकर कम्प्यूटर का ‘माउस’ पकड़ेंगे और की-बोर्ड (कुञ्जीपटल) पर केवल अंग्रेजी के अक्षर लिखा पाएंगे तो थोड़ी उलझन हो सकती है। हिन्दी टाइपिंग का ज्ञान इस विद्या के लिए जरूरी तो है नहीं। इसलिए आपको यह जानना होगा कि अपने कम्प्यूटर पर हिन्दी में लिखना-पढ़ना कैसे सम्भव हो पाएगा। मैं इतना बता दूँ कि यह बहुत आसान और सहज है। कैसे? यह आपको कविता जी बताएंगी। हैदराबाद (आन्ध्र प्रदेश) में रहने वाली डॉ.कविता वाचक्नवी आपको यह बताने आयी हैं कि हिन्दी कम्प्यूटिंग कितनी आसान है। आपके दर्जन भर ब्लॉग्स में से हिन्दी-भारत इस दिशा में काफी चर्चित है। इसी नामसे याहू-समूह का संचालन भी आप करती हैं। आप जानेंगे कि किस प्रकार शब्दों की रोमन वर्तनी लिखकर आप देवनागरी में छाप सकते हैं। कम्प्यूटर पर हिन्दी अनुप्रयोगों पर पूरा पैकेज आपको मिलने वाला है।

यहाँ एक बात मैं ही बता दूँ कि हिन्दी ब्लॉगिंग से अभी पैसा कमाने का काम नहीं शुरू हो सका है। अभी यह शैशवकाल में हैं। हम पढ़-लिखकर बड़े हो जाएंगे तभी कमाने के बारे में सोच पाएंगे। अभी तो स्वान्तः सुखाय का मुहावरा ही चलता है। जाहिर है कि जीविका के लिए या उसकी तैयारी के लिए आप कोई अन्य कार्य भी कर रहे होंगे। विश्वविद्यालय की या प्रतियोगी परीक्षाओं की पढ़ाई हो, प्राईवेट या सरकारी नौकरी हो, छोटा या बड़ा व्यवसाय हो, या वकील, डॉक्टर, पत्रकार, अध्यापक आदि का पेशा हो, ये सभी समय माँगते हैं। रोजी रोटी से जुड़े इन कार्यों के साथ आप ढिलाई नहीं बरत सकते। इसके अतिरिक्त कुछ सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियाँ भी हैं जो आपका समय चाहेंगी।

ब्लॉगिंग का नशा ऐसा है कि इसके आगोश में आपकी दिनचर्या गड़बड़ा सकती है। आप स्वास्थ्य को लेकर भी परेशान हो सकते हैं। ऐसे में आपको अपने समय का प्रबन्धन चतुराई और अनुशासन से करना पड़ेगा। हमारे बीच इस कठिन कार्य में अत्यन्त सफल होकर सबको चमत्कृत कर देने वाले हिन्दी ब्लॉगिंग के शीर्षपुरुष मौजूद हैं। ज्ञानदत्त पाण्डेय जी रेल विभाग के बहुत बड़े अफसर हैं। एन.सी.आर. की सभी मालगाड़ियाँ आपका इशारा पाकर ही सामान लादती हैं और गन्तव्य के लिए प्रस्थान करती हैं। नौकरी में चौबीसो घण्टे ऑन लाइन रहने वाले ज्ञानजी अपनी मानसिक हलचल को जितने सातत्य और सुरुचिपूर्ण ढंग से हमारे बीच प्रकाशित करते रहते हैं वह अद्वितीय है। इनसे हम एक सफल ब्लॉगर की सकारात्मक और नकारात्मक सीमाओं के बारे में जानेंगे और ब्लॉग प्रबन्धन के गुर सीखेंगे।

हमारा प्रयास होगा कि जब आप यहाँ से वापस जाएँ तो घर पहुँचते-पहुँचते आप अपने ब्लॉग का नाम तय कर चुके हों और एक दो दिन में आपका लिखा हम ब्लॉगवाणी पर देख सकें।

प्रत्येक वार्ताकार अपनी बातों को पूरा करने के बाद आपसे एक दो प्रश्न ले सकता है। आप अपना प्रश्न लिखकर रख लें। सम्भव है कि चारों वक्तव्य पूरा होने तक आप अपने प्रश्न का उत्तर पा जाएँ। लेकिन यदि फिर भी कुछ छूटा रह जाता है तो उसे आखिरी आधे घण्टे के प्रश्‍नोत्तर काल में निस्संकोच पूछें। यह एक दुर्लभ अवसर है। इसे हाथ से कत्त‍ई न जाने दें।

मैने चलते-चलते अपनी यह व्यक्तिगत राय भी रख दी कि आज इक्कीसवीं सदी में सूचना प्रौद्योगिकी के बढ़ते कदम के साथ कदम मिला कर चलना प्रत्येक पढ़े-लिखे व्यक्ति की पहचान होनी चाहिए। आज के जमाने में यदि आपका कोई ब्लॉग नहीं है तो  आप अपने व्यक्तित्व को सर्वश्रेष्ठ और पूर्ण नहीं मान सकते। ब्लॉग आपके प्रोफ़ाइल को मूल्यवान बनाता है।

!!धन्यवाद!!

(…जारी)

(अगला पाठ: अनूप शुक्ल जी का)

(सिद्धार्थ)

पैदाइशे इन्सान न रोको लोगों…!

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चुनावी ड्यूटी से फारिग़ होने के बाद अगले दिन कार्यालय में काम कुछ हल्का ही था। एक सीनियर अफ़सर मेरे कमरे में आये तो मैंने उनका खड़ा होकर स्वागत किया। मेरे अन्दाज में कुछ अतिरिक्त गर्मजोशी अनायास ही आ गयी थी क्यों कि वे शायराना तबीयत के मालिक हैं। ग़ज़लें और नज्में लिखते हैं। ‘क्लीन शेव’ मुसलमान हैं। उनकी बातों से दकियानूसी या कट्टर ख़्याल की बू कभी नहीं आयी थी। अच्छी तालीम हासिल किए होंगे तभी अधिकारी बने हैं। मेरे मन में उनके प्रति यही भाव बने हुए थे।

मैने उनसे उर्दू अदब और ग़ज़लकारी की कुछ चर्चा की। उन्होंने बताया कि उनकी चार-पाँच किताबें उर्दू एकेडेमी से छप चुकी हैं। फै़ज़ अहमद फैज़ ने उनकी पीठ ठोकी है। फिराक़ साहब ने भी प्रशंसा में सिर हिलाया है…। मैने शिकायत की कि आपने हिन्दी (देवनागरी) में प्रकाशन क्यों नहीं कराया तो बोले प्रकाशक नहीं मिला। मैंने अफ़सोस जताया।

मैने उनसे ग़ज़ल, नज़्म और रुबाई आदि के बारे में कुछ जानना चाहा। अनाड़ी जो ठहरा। वे कुछ उदाहरण देकर मुझे समझा रहे थे। मेरे जैसा चेला पाकर वे उत्साहित भी लग रहे थे। तभी एक गजब हो गया…

उन्होंने कहा कि ये चार लाइनें सुनो…। यह गवर्नमेण्ट की पॉलिसी के खिलाफ़ है इसलिए मैने इसे कहीं साया (प्रकाशित) नहीं कराया है। लेकिन यह एक वजनदार बात है। उम्मीद है तुम्हें पसन्द आएगी।

उनकी ये चार लाइनें सुनने के बाद मैने सिर पकड़ लिया। मन में बेचैनी होने लगी कि नाहक इन्हें उस्ताद बनाने को सोच रहा था। कोफ़्त इतनी बढ़ गयी कि वार्ता बन्द करके उठ गया… इतना निकल ही गया कि सर! यह तो पब्लिक पॉलिसी और नेशनल पॉलिसी के भी खिलाफ़ है…।

अच्छा हुआ ये कहीं प्रकाशित नहीं हुआ। लेकिन उनके मन की खिड़की में झाँककर जो देख लिया उससे आपको परिचित जरूर कराना चाहूंगा। पता नहीं यह नैतिक है या नहीं लेकिन जिस सोच से मैं परिचित हुआ  वो चिन्तित करने वाली जरूर है…

उन्होंने फ़रमाया…

तामीरे तनो-जान न रोको लोगों

ये नस्ले परीशान न रोको लोगों

शायद कोई इन्सान निकल ही आये

पैदाइशे इन्सान न रोको लोगों

(तामीरे तनो जान= शरीर और प्राण का निर्माण)

अचानक हुए इस मानसिक आघात्‌ से मैं हतप्रभ होकर अपने बॉस के कमरे में चला गया। वो बहुत व्यस्त थे। अपनी पीड़ा बताने के अवसर की प्रतीक्षा में मैने सामने पड़े कागज के टुकड़े पर ये चार लाइनें भी लिख डाली…

हो रहा मुल्ला परेशान न रोको लोगों

देश बन जाये पाकिस्तान न रोको लोगों

दिवाला निकले देश का कि मुसीबत आये

निकल जो आये तालिबान न रोको लोगों

 

आप इस बारे में क्या सोचते हैं? क्या यह हकीकत चोट पहुँचाने वाली नहीं है? आप इसमें कुछ जोड़ना चाहेंगे क्या?

(सिद्धार्थ)

मिलिए एक साहसी प्रत्याशी से…!

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शशि पाण्डेय चुनावी ड्यूटी के रूप में आजकल कोषागार के सभी अधिकारी प्रत्याशियों के चुनावी खर्चे का हिसाब लेने में व्यस्त हैं। व्यय रजिस्टर का सूक्ष्म परीक्षण करने के लिए निर्वाचन आयोग ने कड़े दिशा निर्देश जारी कर रखे हैं। बुधवार को मैं भी इसी कार्य में व्यस्त था। तभी मेरे बॉस का बुलावा आ गया। मैं उनके कार्यालय कक्ष में दाखिल हुआ तो वहाँ का नजारा देखकर दंग रह गया।

एक पढ़ी लिखी सम्भ्रान्त सी दिखने वाली युवती अपने हाथ में कागजों का पुलिन्दा लिए बदहवास सी रोए जा रही थी। गोरे चिट्टे स्निग्ध चेहरे का रंग सुर्ख लाल हो गया था और आँखों से अश्रु धारा बहती जा रही थी। लगातार बोलते रहने से आवाज बैठ गयी थी। क्रोध और असहायता का मिश्रित भाव समेटे उसकी आँखों में भी लाल डोरे उभर आए थे। भर्राती आवाज गला सूखने का संकेत दे रही थी। वहा बैठे दूसरे लोग इस मोहतरमा को चुप कराने की सूरत नहीं निकाल पा रहे थे।  एक तूफान सा उमड़ पड़ा था जो थमने का नाम नहीं ले रहा था।

कुछ क्षण के लिए मैं भी विस्मय से निहारता रहा। फिर मैने महिला गार्ड से ठण्डा पानी लाने को कहा और उन्हें शान्त होकर अपनी बात नये सिरे से धीरे-धीरे कहने का अनुरोध करने लगा। वो अकस्मात्‌ फिर से शुरू हो गयीं तब मैने उनकी बात सुनने से पहले ठण्डा पानी पीने और आँसू पोंछकर बिलकुल नॉर्मल हो जाने की शर्त रख दी।

जब आँधी और बूँदा बाँदी थम गयी तब मुझे पता चला कि ये एक निर्दल प्रत्याशी हैं जो इलाहाबाद से सांसद बनकर देश की सेवा करने का सपना पूरा करना चाहती हैं। एक सपना जो इन्होंने अपने बचपन में ही देखा था और जिसे पूरा करने के लिए अन्य बातों के अलावा अविवाहित रहने का फैसला भी कर लिया था।

फिलहाल जिस समस्या से ये हलकान हुई जा रही थीं वो ये थी कि इनके द्वारा प्रस्तुत खर्च का व्यौरा जाँच अधिकारी ने अस्वीकृत कर दिया था। इस बात का आसन्न खतरा मडराता देखकर इनके होश उड़ गये थे कि शायद इनकी उम्मीदवारी खतरे में न पड़ जाय।

सुप्रीम कोर्ट में वकालत कर चुकी कु. शशि पांडेय करीब डेढ़ साल पहले अपने पुराने शहर वापस आयी जहाँ २३ वर्ष पहले इलाहाबाद विश्वविद्यालय से इन्होंने राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की थी। भारत की संसद में लोकसभा के लिए चुने जाने का सपना इनके दिल और दिमाग पर इस कदर छाया हुआ है कि बड़ी से बड़ी बाधा की चट्टान इनके फौलादी इरादों को रोक नहीं सकती।

सम्पन्न माँ बाप की इकलौती दुलारी बेटी ने अपने लिए जो रास्ता चुना है उसपर चलते हुए इन्होंने दिल्ली की पॉश कॉलोनी की आभिजात्य जीवन शैली का त्याग कर इलाहाबाद की मेजा, माण्डा, करछना तहसीलों के धूल भरे दुर्गम और अन्जान रास्तों पर निकल कर देहात में पसरी बदहाल गरीबी, भुखमरी और लाचारी के बीच उम्मीद की किरण फैलाने का फैसला किया है। कॉन्वेन्ट शिक्षा की विशुद्ध अंग्रेजी जुबान छोड़कर ग्रामीण परिवेश की स्थानीय अवधी/भोजपुरी बोली में संवाद कायम करने की चेष्टा बार-बार मुखरित हो जाती है। 

सुश्री शशि पाण्डे- सांसद प्रत्याशी इलाहाबाद

Name: Km. Shashi Pandey

D/O: shri Vishwanath Pandey

Date of Birth: 13 June, 1963

Marital Status: Unmarried

Residence:  Pitam Nagar, Allahabad

 

Education & Qualifications:

Graduation: BA with  Eng.Literature, History, Political Science-1984 (University of Allahabad)

Post Graduation: MA in Political Science-1986 (AU).

LT : KP Training College, Allahabad-1988.

EDP: Entrepreneur Development Programme- FICC Tanasen Marg- 1994

LLB: Delhi University- Law Centre-2nd.(2001)

Diploma in Human Rights Law (2002): Indian Law Institute(Deemed University)

Family Background: Armed Forces Officers’ Family.

-Represented Delhi University in March 2000 for 1st PN Bhagawati Moot Court Competion in Benglore, Adjudged- “runner up”.

-Member: “Hum Aapke” – a registered NGO for Legal assistance to those who work in public interest. PIL on Ajmer Shariff to root out corruption rampant in Dargah Shariff, Ajmer.

“ I fought for the cause and rights of poor, indigent and sick which was deer to Khwaja Sahib”

“Pain of masses is my own pain. It pains me to watch them without water, electricity, sanitation, cleanliness, road and other basic amenities of life.”

किसी पार्टी का समर्थन प्राप्त किए बिना, समर्पित कार्यकर्ताओं की टीम गठित किए बिना, और चुनावी अभियान की विस्तृत रूपरेखा तैयार किए बिना ही संसद की मंजिल तक पहुँचने की राह दुश्‍वार नहीं लगती? इस प्रश्‍न का उत्तर कु.शशि बड़े आत्मविश्वास से देती हैं। अपने पहले प्रयास में मेरी कोशिश है कि मैं ग्रामीण जनता से व्यक्तिगत रूप से मिलूँ और उन्हें विश्वास दिलाऊँ कि राजनीति में स्वच्छ और ईमानदार छवि के लोग भी आगे कदम बढ़ाने को इच्छुक हैं।  गाँव के बड़े-बुजुर्गों और महिलाओं ने जिस हर्षित भाव से मेरे सिर पर हाथ रखा है उसे देखकर मुझे बहुत खुशी मिल रही है।

गाँव-गाँव में घूमकर लोगों से अपने लिए वोट जुटाने में लगी शशि को रास्ता बताने वाले भी क्षेत्र से ही खोजने पड़ते हैं। अपनी सुरक्षा के लिए भी इन्होंने जिलाधिकारी से गनर नहीं मांगे। एक मात्र ड्राइवर के साथ सुबह का ‘ब्रन्च’ लेकर जब ये अपनी निजी इण्डिका में निकलती हैं तो पता नहीं होता कि आज किससे मिलना है। जिधर ही दस-बीस लोग दिख जाते हैं वहीं गाड़ी से उतरकर अपना परिचय देती हैं , अपनी योजनाओं को समझाती हैं, आशीर्वाद मांगती हैं, और वहीं से कोई आदमी गाड़ी में बैठकर अगले पड़ाव तक पहुँचा देता है। रात ढल जाने पर किसी देहाती बाजार, छोटे कस्बे या तहसील मुख्यालय में ही धूल, मिट्टी, मच्छर और गर्मी के बीच बिना बिजली के रात बिताने के चिह्न आसानी से चेहरे पर देखे जा सकते हैं। प्रत्येक तीसरे दिन चुनावी खर्चे का एकाउण्ट दिखाना अनिवार्य है इसलिए शहर आकर समय खराब करना पड़ता है।

इतने मजबूत और नेक इरादों वाली लड़की यदि छोटी सी बात पर रोती हुई पायी जाती है तो इसका क्या अर्थ क्या समझा जाय? एक नेता यदि इतना अधीर हो जाएगा तो कठिन परिस्थियों में कैसे नेतृत्व देगा? इस सवाल पर शशि झेंप जाती है लेकिन झटसे सच्चाई का खुलासा करती है। दर‍असल मुझे लगा कि मेरी एक चूक से मेरा सारा सपना यहीं चकनाचूर हुआ जा रहा है। मैं नियम कानून का अक्षरशः पालन करने में विश्वास करती हूँ। कोई गलत काम करने के बारे में सोच भी नहीं सकती। कानून का पेशा है मेरा। फिर भी यदि एक कानूनी चूक से मुझे ब्लैकलिस्ट कर दिया जाता है तो यह मेरे लिए सबसे बुरा होगा। इसी घबराहट में मेरा धैर्य जवाब दे गया था।

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शशि से लम्बी बात-चीत मैने अपने मोबाइल कैमरे से रिकॉर्ड की है। इसे दो-तीन बार सुन चुका हूँ। सुनने के बाद मेरा मन बार-बार यही पूछ रहा है कि इस युग में क्या ईमानदारी भी मनुष्य को कमजोर बना देती है?

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