वर्धा में हमने जो देखा वह अद्‌भुत है…

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सेवाग्राम स्टेशन का निकास द्वाररेलगाड़ी के ठण्डे कूपे से निकलकर बैशाख की चिलचिलाती धूप में जब हम सेवाग्राम स्टेशन पर उतरे तो पल भर में माथे पर पसीना आ गया। पत्थरों और कंक्रीट की इमारतों के बीच हरियाली बहुत विरल थी। तराई क्षेत्र का रहने वाला हूँ इसलिए यह इलाका कुछ ज्यादा ही उजाड़ और वीरान लग रहा था। गर्मी के कारण लोग खुले स्थानों पर प्रायः नहीं थे। स्टेशन से बाहर आकर हमें प्रतीक्षा करती गाड़ी मिल गयी जो काफी देर से धूप में खड़ी रहने के कारण भट्ठी जैसी गरम हो चुकी थी। स्टार्ट होने के बाद इसका ए.सी. चालू हुआ तो एक-दो मिनट में राहत मिल गयी।

सेवाग्राम से वर्धा विश्वविद्यालय की दूरी करीब छः किलोमीटर है। रास्ते में इक्का-दुक्का लोग ही दिखे। हमारे इलाहाबाद की तरह सड़क किनारे लगे लाई-चना-चुरमुरा के खोमचे, खीरा-ककड़ी बेचती औरतें, कच्चे आम का पना बेंचते ठेलेवाले या तरबूज-खरबूज के ढेर लगाकर बैठे कुजड़े वहाँ नहीं दिखे। वर्धा शहर को बायपास करती सड़क से होकर जब हम प्रायः निर्जन इलाके की ओर बढ़ चले तो मेरे मन में उत्सुकता का स्थान व्याकुलता ने ले लिया। गर्म हवा की लपटें सड़क पर दूर चमकते तारकोल से यूँ उठती दिख रही थीं जैसे नीचे किसी हवन कुण्ड में आग जल रही हो। आखिरी मोड़ पर जब गाड़ी मुड़ी तो एक ऊँचे से टीले की ढलान पर सफेद पेण्ट से “महात्मा गांधी अन्तर राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय-वर्धा” बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा हुआ दिखायी पड़ा। अपनी मंजिल के प्रथम साक्षात्कार का यह दृश्य अद्‍भुत लगा।

लेकिन यह शुष्क टीला अपनी तरह का अकेला नहीं था। आस-पास चार-पाँच टीले ऐसे ही दिखायी पड़े जो कदाचित्‌ प्रकृति के कृपापात्र नहीं हो पाये थे। प्रायः वनस्पति विहीन और पथरीले भूभाग पर उठे हुए ये नंगे-ठिगने पहाड़ प्रकृति पर मानव की सत्ता स्थापित होने की कहानी कह रहे थे। इनके शीर्षतल पर जाने के लिए चट्टानों को काटकर बनायी गयी सर्पिल सड़क के किनारे करीने से सजाये गये गमले, शिक्षा संकाय के लिए हाल ही में बने भव्य विद्यापीठ, पुस्तकालय व अन्य मानवनिर्मित भवनों को अन्तिम रूप देती मशीनें और मजदूर, बिजली के खम्भे और उनपर दौड़ती केबिल में प्रवाहित होती विद्युत धारा, निर्माणाधीन पानी की टंकी, पंक्तिबद्ध रोपे गये नये पौधे और उन्हें पानी देने के लिए मीलों दूर से लायी हुई पाइपलाइन  यह बता रही थी कि इस निर्जन पहाड़ पर मानव ने मेधा को तराशने का कारखाना बनाने का मन बना लिया है।

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View Larger Map गूगल अर्थ की उपग्रह तस्वीर में पंचटीला(वर्धा) की पाँच साल पुरानी स्थिति जो अब बहुत बदल गयी है

भव्य तोरणद्वार से प्रवेश कर हमारी गाड़ी फादर कामिल बुल्के अन्तरराष्ट्रीय छात्रावास की सीढ़ियों के पास जाकर रुकी तो बाहर निकलने पर गर्म पत्थर से आँच निकलती सी महसूस हुई। सीढ़ियाँ चढ़कर हम ऊँचे चबूतरे पर पहुँचे। आधुनिक वास्तुकला का सुन्दर नमूना पेश करता हुआ यह भवन भी हाल ही में तैयार हुआ जान पड़ा क्योंकि गूगल अर्थ पर मैने इस प्रांगण को देखने की जो कोशिश की थी उसमें इसका कोई अता-पता नहीं था। इस छात्रावास को फिलहाल गेस्ट हाउस के रूप में भी प्रयोग किया जा रहा है।

दोपहर के दो बजे होंगे जब हम अपने लिए निर्धारित कमरे में पहुँचे। कूलर की ठण्डी हवा मिलते ही हम बिस्तर पर पसर तो गये, लेकिन लम्बी यात्रा के बाद स्नान किए बिना पड़े रहना रास नहीं आया। वहाँ का बाथरूम तो सुसज्जित था लेकिन छत पर रखी टंकी का पानी अपने क्वथनांक के करीब पहुँच चुका था। हमारे पास ‘स्टीम बाथ’ के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प भी नहीं था इसलिए हमने कम से कम पानी खर्च करने का पाठ तत्काल सीखते हुए उसपर अमल भी कर लिया और सज सवँरकर तैयार हो लिए। हमें बताया गया कि मनीषा जी एक-दो घण्टे के भीतर ही वापस आगरा के लिए निकलने वाली हैं। उनसे मिलना तो हमारे प्रमुख उद्देश्यों में से एक था।

हमने उनका फोन मिलाया तो पता चला कि इस इलाके में बी.एस.एन.एल. की सेवाएं बहुत अच्छी नहीं हैं। दूसरे सिरे पर स्थित व्यक्ति के अतिरिक्त दूसरी तमाम आवाजें आ रही थीं लेकिन मनीषा जी अन्त तक यह नहीं बता सकीं कि वे दस-पन्द्रह मिनट में गेस्ट हाउस पहुँचने वाली हैं। खैर, उनकी एक सहयोगी ने बताया कि वो बस आने ही वाली हैं। वन्दना मिश्रा, मनीषा कुलश्रेष्ठ और...मैं

मनीषा जी, यानि मनीषा कुलश्रेष्ठहिन्दीनेस्ट.कॉम की मालकिन और प्रतिष्ठित लेखिका, कवयित्री और सम्पादक। उनकी सहयोगी यानि वन्दना मिश्रा। लखनऊ में रहकर आपने तमाम पुस्तकों का प्रकाशन किया है। प्रसिद्ध लेखक और पत्रकार स्व. अखिलेश मिश्र जी की पुत्री वन्दना जी उस कोर ग्रुप की सदस्य हैं जो विश्वविद्यालय की साहित्यिक वेबसाइट हिन्दीसमय.कॉम की सामग्री के चयन और प्रकाशन के लिए उत्तरदायी है। इस कोर ग्रुप के तीसरे सदस्य अनहद नाद वाले अपने प्रिय ब्लॉगर आदरणीय प्रियंकर जी हैं जो उस समय कोलकाता से इस समिति की बैठक के लिए आये हुए थे। हिन्दी साहित्य के दस लाख पृष्ठ अन्तर्जाल में एक ही पते पर अपलोड करने की महत्वाकांक्षी योजना को कार्यरूप देने के लिए विश्वविद्यालय द्वारा इन विभूतियों को एक साथ सिर जोड़कर कार्य करने हेतु आमन्त्रित किया गया है। इतने कम समय में यह जालस्थल कितनी दूरी तय कर चुका है उसे आप वहाँ जाकर देख सकते हैं।

मनीषा जी अपनी सद्यःप्रकाशित पुस्तक शिग़ाफ लेकर आयी थीं। मैने उन्हें सत्यार्थमित्र की एक प्रति भेंट की। वन्दना जी का एक कविता संग्रह अनामिका प्रकाशन से छपकर शीघ्र ही आने वाला है। मेरे साथ अनामिका प्रकाशन के मालिक विनोद शुक्ला जी ही थे। उन्होंने वन्दना जी और मनीषा जी के साथ फटाफट मेरा फोटो सेशन करा दिया। पुस्तक प्रकाशन के बाजार से लेकर विश्वविद्यालय की अन्तर्जाल सम्बन्धी प्रकाशन योजना पर विस्तृत चर्चा हुई। कुछ देर में ट्रेन का समय नजदीक आया और हम मनीषा जी को विदा करके गेस्ट हाउस की कैण्टीन की ओर चाय लेने चल दिए।

शुद्ध दूध की गाढ़ी चाय बड़े से कप में लबालब भरी हुई आ गयी। वहाँ पहले से ही एक प्रोफ़ेसर साहब बैठकर चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे। मुझे उनका चेहरा परिचित सा जान पड़ा। मैने दरियाफ़्त की तो पता चला कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय से सेवा निवृत्त अंग्रेजी के प्रो.सचिन तिवारी जी हैं। हम करीब पन्द्रह साल पहले मिले थे जब वे कैम्पस थियेटर चलाते थे और मैं पत्रकारिता का विद्यार्थी हुआ करता था। कैण्टीन में राजकिशोर जी मिलेइसी बीच एक छोटेकद के श्यामवर्ण वाले भयंकर बुद्धिजीवी टाइप दिखने वाले महाशय का पदार्पण हुआ। उन्होंने बैठने से पहले ही कैन्टीन के वेटर से कहा कि मुझे बिना चीनी की चाय देना और दूनी मात्रा में देना। यानि कप के बजाय बड़ी गिलास में भरकर। मुझे मन ही मन उनकी काया के रंग का रहस्य सूझ पड़ा और सहज ही उभर आयी मेरे चेहरे की मुस्कान पर उनकी नजर भी पड़ गयी। मैने झेंप मिटाते हुए उनका परिचय पूछ लिया।

वे तपाक से बोले- “मुझे राजकिशोर कहते हैं… दिल्ली से आया हूँ। आप कहाँ से…?”

मेरे यह बताने पर कि मैं इलाहाबाद से आया हूँ और वहाँ कोषाधिकारी हूँ, उन्होंने सीधा सवाल दाग दिया- “अच्छा, ये बताइए कि ट्रेजरी में भ्रष्टाचार की स्थिति अब कैसी है?”

यदि मैं शुद्ध सरकारी अधिकारी होता तो शायद इसका जवाब देना थोड़ा कठिन होता लेकिन समाज के दूसरे पढ़े-लिखे वर्ग से भी सम्पर्क में होने के कारण मैने इसका कुछ दार्शनिक सा उत्तर दे दिया। मैने यह भी बताया कि कम्प्यूटर और सूचना प्रौद्यौगिकी के प्रयोग से अब मनुष्य के हाथ का बहुत सा काम मशीनों को दे दिया गया है इसलिए भ्रष्टाचार करने के अवसर ट्रेजरी में कम होते गये हैं। फिर भी जहाँ अवसर उपलब्ध है वहाँ प्रयास जारी है। लेकिन इस मानवसुलभ प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के प्रयास भी साथ-साथ जारी हैं।

राजकिशोर जी ने इस चर्चा का उपसंहार यह कहते हुए कर दिया कि अब इस मुद्दे को छोड़िए, इसमें कोई दम नहीं बचा है, महंगाई बहुत बढ़ गयी है। मुझे तबतक यह पता चल चुका था कि आज शाम छः बजे गांधी हिल्स पर राजकिशोर जी ‘सभ्यता के भविष्य’ पर अपने विचार व्यक्त करने वाले हैं। गांधीजी की प्रिय बकरीयह सुखद संयोग ही था कि जिनके लेख हम चोखेर बाली और हिन्दी भारत जैसे जालस्थलों पर तथा अनेक पत्र पत्रिकाओं में पढ़ते आ रहे थे उन्हें सजीव सुनने का अवसर मिलने जा रहा था। वार्ता का समय होने तक हम कैण्टीन में ही बात करते रहे और फिर गाड़ी हमें टीले की चोटी पर ले जाने के लिए आ गयी। 

मुख्य टीले पर जाने के लिए जो घुमावदार सड़क बनी हुई है उससे ऊपर पहुँचने पर सड़क की बायीं ओर विकसित किये जा रहे उद्यान में एक बकरी की सुन्दर अनुकृति स्थापित की गयी है। कदाचित्‌ वहाँ गांधी जी के प्रिय पात्रों और उनके उपयोग की वस्तुओं को जुटाने का प्रयास किया गया है। वहीं थोड़ा आगे बढ़ने पर गांधी जी की आदमकद प्रतिमा उनके तीन प्रिय बन्दरों के साथ स्थापित है। हमारे पास उन सबको देखने का समय उस समय नहीं था। हमने सभास्थल पर पहुँचकर विश्वविद्यालय के कुलपति जी से मुलाकात की। कुशल-क्षेम के बाद हम राजकिशोरजी की वार्ता सुनने के लिए गोलाकार सीढ़ीनुमा चबुतरे पर बैठ गये। अर्द्धवृत्ताकार दर्शकदीर्घा के ठीक सामने खड़े लैम्प-पोस्ट के नीचे वार्ताकार का चबूतरा बना था। खुले आकाश के नीचे टीले की चोटी पर बना यह मुक्त गोष्ठी स्थल महानगरीय सभ्यता की शोरगुल भरी भागमभाग जिन्दगी से बिल्कुल अलग एक सुरम्य वातावरण सृजित कर रहा था। इस स्थान पर बैठकर ‘सभ्यता के भविष्य’ के बारे में चिन्तन करते लोग मुझे बहुत भले लगे।

सभ्यता का भविष्ययद्यपि अपनी वार्ता में राजकिशोर जी ने जिस कम्यून पद्धति की ओर लौटने की बात की और वर्तमान उदारवादी लोककल्याणकारी जनतंत्रात्मक राज्य को पूँजीवादी सत्ता करार देते हुए पूरी तरह नकारने योग्य ठहराने का प्रयास किया उससे मैं सहमत नहीं हो सका लेकिन देश के कुछ बड़े बुद्धिजीवियों द्वारा विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच बैठकर इस प्रकार की चर्चा करना बहुत सुखद और आशाजनक लगा। उस छोटी सी दर्शक दीर्घा में कुलपति विभूति नारायण राय के साथ दिल्ली से पधारे हिन्दी के प्रतिष्ठित हस्ताक्षर प्रो. अब्दुल बिस्मिल्लाह, हैदराबाद के प्रो. सुवास कुमार, और विश्वविद्यालय संकाय के प्रो.सूरज पालीवाल व अन्य अनेक आचार्यगण मौजूद थे। राजकिशोर जी ने अपने विशद अध्ययन और दुनियाभर के अनुभवों को यहाँ बाँटते हुए बहुत सी बाते बतायीं जो जन संचार और पत्रकारिता के विद्यार्थियों का दृष्टिकोण प्रभावित करने वाली थी। एक छात्र द्वारा पूरी वार्ता की वीडियो रिकॉर्डिंग भी की गयी जो उनके लिए प्रायोगिक प्रशिक्षण के तौर पर अपेक्षित था।सभ्यता का भविष्य बताते राजकिशोर जी

शाम को कुलपति जी ने हमें डिनर साथ लेने के लिए आमन्त्रित किया। वहाँ पर एक बार फिर बौद्धिक चर्चा शुरू हो गयी। साहित्य, समाज, राजनीति, कला,और शेरो शायरी से भरी हुई वह चर्चा रिकॉर्ड करने लायक थी लेकिन मैं उसके लिए पहले से तैयारी नहीं कर सका था। इसी बीच मशहूर शायर और गीतकार शहरयार का फोन कई बार आता रहा और वहाँ उन्हें आज के जमाने का सबसे बड़ा शायर बताया जाता रहा। प्रो. अब्दुल बिस्मिल्लाह से प्रो. सचिन तिवारी ने सलमान रुश्दी की किताब शैतानी आयते (satanic verses) के बारे में कुछ सवाल किए। उनके जवाब पर काफ़ी देर तक बहस होती रही। पूरा ब्यौरा यहाँ देना सम्भव नहीं है, लेकिन उस परिचर्चा में शामिल होकर हमें बहुत आनन्द आया। अन्त में यह कड़ी समाप्त करने से पहले अब्दुल बिस्मिल्लाह जी द्वारा सुनाये और समझाए गये एक शेर की चर्चा करना चाहता हूँ।

वर्धा में सूर्योदय (१४ अप्रैल,२०१०)बुझा जो रौजने जिन्ना तो हमने समझा है

कि तेरी मांग सितारों से भर गयी होगी।

चमक उठे जो सलासिल तो हमने जाना है

कि अब सहर तेरे रुख पर बिखर गयी होगी॥

हमारे अनेक सुधी पाठक इस शेर से परिचित होंगे। यदि कोई अपनी टिप्पणी के माध्यम से इसके शायर का नाम बताते हुए इसका सन्दर्भ-प्रसंग बताना चाहे तो मुझे बहुत खुशी होगी। अगली कड़ी में इसकी चर्चा के बाद मैं बताऊंगा कि अगले दिन अम्बेडकर जयन्ती के अवसर पर मुझे वहाँ क्या कुछ चमत्कृत करने वाले अनुभव हुए। अभी इतना ही… प्रतीक्षा कीजिए अगली कड़ी का।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) 

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ढाबा संस्कृति और बर्बाद होते बच्चे…

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“साहब मुझे यहाँ से छुड़ा दीजिए… ये लोग मुझे बहुत मार रहे हैं…” अचानक कान में ये शब्द पड़े तो मैं अपने मोबाइल के मेसेज पढ़ना छोड़कर उसकी ओर देखने लगा। एक लड़का बिल्कुल मेरे नजदीक आकर मुझसे ही कुछ कहने की कोशिश कर रहा था।

करीब तेरह चौदह साल की उम्र का वह दुबला सा लड़का निश्चित ही किसी गरीब परिवार का लग रहा था…। पहले तो उसका आर्त स्वर मुझे कुछ बनावटी लगा शायद भीख मांगने वाले लड़कों की तरह अभिनय करता हुआ सा…  उसकी सिसकियों के बीच से छन कर आ रही स्पष्ट आवाज और शुद्ध हिन्दी के प्रयोग से लग रहा था कि उसे स्कूल की शिक्षा जरूर मिली होगी। लेकिन इसने मुझसे रुपया-पैसा तो कुछ मांगा ही नहीं… फिर यह यहाँ ढाबे पर क्या कर रहा है…?

थोड़ी देर के लिए मैं उसकी सच्चाई को लेकर थोड़ा असमन्जस में पड़ गया था, लेकिन जब उसे मुझसे बात करता देखकर ‘ढाबे का मालिक’ नुमा एक लड़का तेजी से मेरे पास आकर उसे बोलने से रोकने की कोशिश करने लगा और सफाई की मुद्रा में मुझे कुछ समझाने लगा तो मेरे कान खड़े हो गये। मैने उस लड़के को शान्त कराकर उससे पूरी बात बताने को कहा। इसपर मालिक के लड़के की बेचैनी कुछ बढ़ती सी लगी।

11032010535हुआ ये था कि मैं कोषागार स्ट्रॉंग-रूम से सम्बन्धित एक महत्वपूर्ण कार्य के लिए इलाहाबाद से कानपुर सड़क मार्ग से जा रहा था। मेरे साथ में मेरा स्टाफ़ और दो सशस्त्र वर्दीधारी गार्ड भी थे। करीब दस बजे दिन में उन सबको खाना खिलाने के लिए मैने गाड़ी चौड़गरा के ‘परिहार ढाबा’ पर रुकवा दी थी। मेरे चीफ़ कैशियर ने स्टाफ़ के लिए दाल फ्राई, चना मसाला और तन्दूरी रोटी का ऑर्डर दे दिया था। मुझे स्वयं खाना खाने की इच्छा नहीं थी लेकिन ढाबे पर यदि खीर मिल जाय तो मैं उसका लोभ संवरण नहीं कर पाता। सो यहाँ भी मैने एक प्लेट खीर खाने के बाद ही एक कप चाय पीने की इच्छा जतायी थी।

इस साधारण से ढाबे पर टिपिकल शैली में लकड़ी के लाल, हरे, नीले तख्त लाइन से बिछे हुए थे। उनके किनारे प्लास्टिक की कुर्सियाँ डालकर डाइनिंग हाल का रूप दिया गया था। हाई-वे पर चलने वाली ट्रकों के ड्राइवर और क्लीनर इन्ही तख़्तों पर बैठकर भोजन करते हैं और जरुरत के मुताबिक इसी पर पसरकर आराम भी करते हैं। बाकी प्राइवेट गाड़ियों की सवारियाँ भी यदा-कदा यहाँ रुककर भोजन या नाश्ता करती हैं।

फ्रिज में रखी हुई ठण्डी और स्वादिष्ट खीर मुझे तत्काल मिल गयी। उसे चटपट समाप्त करके मैं चाय की प्रतीक्षा कर ही रहा था कि उस लड़के ने मुझे कोई सरकारी अफ़सर समझकर कदाचित्‌ अपने को संकट से निकालने की उम्मीद में अपनी समस्या बतानी शुरू कर दी। वहीं एक टीवी पर फुल वॉल्यूम में कोई मसाला फिल्म चल रही थी जिसके शोर में बाकी लोगों तक यह बातचीत नहीं जा रही थी। लेकिन ढाबे पर काम करने वाले दूसरे रसोइये और नौकर इस लड़के पर सतर्क निगाह रखे हुए थे इसलिए दो मिनट के भीतर ढाबे के मालिक का लड़का लपका हुआ चला आया…।

लड़का बता रहा था, “मुझे स्टेशन से एक आदमी यहाँ लाकर छोड़ गया है। ये लोग मुझसे जबरदस्ती काम करा रहे हैं और बहुत मार रहे हैं।” उसकी सिंसकियाँ बढ़ती जा रही थीं जो अचानक मालिक के लड़के के आते ही रुक गयीं।

मैने मालिक के लड़के से ही पूछ लिया- “यह क्यों रो रहा है जी…?”11032010533

“कुछ नहीं साहब, यह अभी दो-तीन दिन पहले ही आया है। इससे हम लोग कोई काम नहीं कराते हैं। कहते हैं कि- बस जो खाना हो खाओ, और यहीं पड़े रहो … लेकिन यह बार-बार यहाँ से जाने को कहता है…”

“तो इसके साथ जबरदस्ती क्यों करते हो? जाने क्यों नहीं देते?” मैने तल्ख़ होकर पूछा।

“इसको हम अकेले किसी ट्रक पर बैठकर जानें दें तो पता नहीं कहाँ गायब हो जाएगा। फिर जिस ठेकेदार ने इसे यहाँ दिया है उसको हम क्या जवाब देंगे? …हम इससे कह रहे हैं कि ठेकेदार को आ जाने दो तो छोड़ देंगे, लेकिन मान ही नहीं रहा है…”

मैने लड़के से उस ठेकेदार के बारे में पूछा तो उसे कुछ भी मालूम नहीं था। फिर उसका नाम पूछा तो बोला, “मेरा नाम अजय है- स्कूल का नाम मुकेश और घर का नाम अजय”

उसने बिल्कुल शिशुमन्दिर के लड़कों की तरह जवाब देना शुरू किया। लखनऊ के पास चिनहट में किसी शिक्षा निकेतन नामक स्कूल से दर्जा पाँच का भागा हुआ विद्यार्थी था। बता रहा था कि वह अपने साथ के एक लड़के के साथ घूमने के लिए ट्रेन में बेटिकट बैठ गया। पकड़े जाने पर आगे के किसी स्टेशन पर टीटी द्वारा उतार दिया गया तो वहीं प्लैटफ़ॉर्म पर एक आदमी मिला। उसने इसकी मदद करने के नाम पर इस ढाबे पर लाकर छोड़ दिया।

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इतनी कहानी जानने के बाद मैं चिन्ताग्रस्त हो गया। मैं जिस जरूरी सरकारी काम से निकला था उसके लिए मुझे जल्दी से जल्दी कानपुर पहुँचना जरूरी था। लड़के को उसके हाल पर छोड़ कर जाने में खतरा यह था कि ढाबे का मालिक उसे निश्चित ही और दंडित करता क्योंकि उसने मुझसे उसकी शिकायत कर दी थी। …इससे बढ़कर यह चिन्ता थी कि मेरे ऊपर लड़के ने जो भरोसा किया था और संकट से उबारे जाने की जो गुहार लगायी थी उसका क्या होगा। मैं सोचने लगा- एक जिम्मेदार लोकसेवक होने के नाते मुझे क्या करना चाहिए? वह लड़का मेरे जाते ही घोर संकट में फँस सकता था।

तभी उस ढाबे का मालिक भी आ गया जिसको उसके लड़के ने फोन करके बुला लिया था। सफेद कुर्ता-पाजामा पहने हुए शिवमंगल सिंह परिहार ने अपना परिचय देते हुए बताया कि ऐसे लड़के इधर-उधर से आ जाते हैं साहब, लेकिन हम लोग इनका बड़ा खयाल रखते हैं। गलत हाथों में पड़कर ये खराब हो सकते हैं…। मैने टोककर कहा- “यह लड़का तो बता रहा है कि इसने कल से खाना ही नहीं खाया है, क्या खयाल रखते हैं आप?‘”

इसपर वह झेंपते हुए अपने रसोइये को डाँटने लगा…। मालिक के लड़के ने बीच में आकर कहा “नहीं साहब, इससे पूछिए, रात में खाना दिया गया था कि नहीं…!” लेकिन मेरे पूछने से पहले ही वह बोल उठा  कि मुझे कुछ नहीं मिला है, मुझे बहुत भूख लगी थी” इस बीच मेरे स्टाफ़ के साथ अजय उर्फ़ मुकेश भी खाना खा चुका था।

अजीब स्थिति बन गयी। अब मैं इसे इस हाल में छोड़कर कत्तई नहीं जा सकता था। फतेहपुर के एक विभागीय अधिकारी का नम्बर मेरे पास था। मैने उन्हें फोन मिलाकर पूरी बात बतायी। वहाँ वरिष्ठ कोषाधिकारी के पद पर तैनात श्री विनोद कुमार जी ने इसको गम्भीरता से लिया। जिले के पुलिस विभाग को इत्तला दी गयी। उनके आश्वासन के बाद मैने ढाबे पर मौजूद सभी पक्षों को लक्ष्य करते हुए दनादन कुछ तस्वीरें खींच डाली, ताकि बाद में कोई इस बात से इन्कार न करे। 11032010537

मुझे यह आशंका हो रही थी कि मेरे रवाना होते ही यदि लड़के को मार-पीट कर भगा दिया गया तो जिले की पुलिस या बालश्रम उन्मूलन विभाग वाले आकर ही क्या कर लेंगे। इसकी सम्भावना से बचने के लिए मैने ढाबा मालिक के साथ बच्चे को और अपने चीफ़ कैशियर को खड़ा कराकर फोटो खींच लिया। मैने शिवमंगल सिंह को प्यार से समझा दिया कि जबतक कोई जिम्मेदार सरकारी व्यक्ति यहाँ आकर इस बच्चे को न ले जाया तबतक आप इसे कहीं नहीं जाने देंगे। यदि इस बीच इस लड़के के साथ कोई दुर्व्यवहार हुआ तो आपकी जिम्मेदारी तय मानी जाएगी। सबूत के तौर पर ये तस्वीरें मैं अपने कैमरे में कैद कर लिए जा रहा हूँ।

मैने लड़के को भी समझा दिया कि जबतक कोई सरकारी अधिकारी या थाने से कोई आकर तुम्हें यहाँ से न ले जाय तबतक यहीं रहना। शाम तक वापसी में आकर मैं फिर से समाचार लूंगा। अब निश्चिन्त होकर मैं कानपुर चला गया, लेकिन अगले प्रत्येक आधे घण्टे पर फतेहपुर के वरिष्ठ कोषाधिकारी से उसका हाल-चाल मिलता रहा। कानपुर से वापसी करते हुए मैं ऐसी सामग्री के साथ था कि कहीं रुके बगैर मुझे सीधे इलाहाबाद कोषागार में पहुँचना निर्दिष्ट था। इसलिए मुझे मोबाइल के माध्यम से मिली सूचना पर निर्भर रहना पड़ा।

***

शाम को लौटते हुए रास्ते में जो अन्तिम सूचना मिली उसके अनुसार स्थानीय थाने के थानेदार ने वहाँ जाकर लड़के को अपने साथ थाने में लाकर ठहरा दिया था। शिवमंगल सिंह ने उसे मजदूरी के बचे हुए डेढ़ सौ रूपये देकर प्यार से विदा किया था और पुलिस के अनुसार लड़के को ढाबे वालों से कोई शिकायत नहीं रह गयी थी। लड़के ने जो अपना पता बताया था उस क्षेत्र के सम्बन्धित थाने से सम्पर्क कर इसके गायब होने का सत्यापन कराया जा रहा था। बाल श्रम कानून के प्रयोग की आवश्यकता नहीं महसूस की गयी थी। लड़के ने भी अपने साथ वी.आई.पी. वर्ताव पाकर अपने आँसू पोछ लिए थे और किसी पुलिस हमराही के साथ अपनी घर वापसी की प्रतीक्षा कर रहा था।

मैं वापसी में रास्ते भर सड़क किनारे चल रहे असंख्य ढाबों, रेस्तराओं, होटलों और चाय की दुकानों की ओर देखता हुआ यही सोचता रहा कि इनमें जाने कितने अजय, मुकेश, छोटू, बहादुर, पिन्टू, रामू, बच्चा, आदि किसी न किसी ठेकेदार के हाथों चढ़कर अपना जीवन खराब कर चुके होंगे…।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

 

बुद्धू सा खड़ा मैं…।

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ब्लॉग जगत की हलचल से अलग रहते हुए अपनी सरकारी नौकरी बजाने में ही हलकान हो जाने पर मैने मन को समझा लिया कि इसमें बहुत परेशान होने की जरूरत नहीं है। ऑफ़िस से लौटकर घर आने के बाद शर्ट की बटन खोलने के पहले कम्प्यूटर का बटन ऑन करने की आदत पड़ गयी थी। उसे बड़े जतन से बदल लिया है। आलसी की कुर्सी खाली देख उसे ही हथिया लिया है मैंने।

अहा, निष्क्रियता के भी क्या मजे हैं…! क्या हुआ जो नयी पोस्ट डाले हफ़्ते से ज्यादा हो गये…? क्या फ़र्क पड़ता है जो गूगल रीडर में सैकड़ों पोस्टें पढ़े जाने का इन्तजार कर रहीं हैं…?  मेरी श्रीमती जी जो कम्प्यूटर से मेरी इस बढ़ती दूरी से मन ही मन प्रसन्न रहने लगी थीं, उन्होंने भी लम्बे ब्रेक के लिए टोक दिया तो क्या हुआ..!  मैं तो बस आराम से आराम करने की जिद पर अड़ा अकर्मण्यता के मजे ले रहा था।

मेरा बेटा जो बैट-बॉल के खेल में मुझे अनायास पाकर हर्षित हो रहा था उसने भी अन्ततः मुझे ‘कम्प्यूटर पर पढ़ाई’ करने की सलाह दे डाली। बेटी की परीक्षा की तैयारियों में मेरी अचानक बढ़ती रुचि से वह भी हैरत में पड़ गयी- “डैडी, तुम्हें अब कुछ पोस्ट नहीं करना है?”  लेकिन मैं तो अपने मस्तिष्क को कोई कष्ट देने के मूड में ही नहीं था। ऑफिस के काम से ही दिमाग का दही बन जाय तो घर पर उसकी लस्सी घोंटने की हिम्मत कहाँ बचती है? सोच रहा था कि अब मार्च बीतने तक ऐसा ही रहने वाला है।

अब हम ज्ञान जी जैसी खोजी शक्ति से सम्पन्न तो हैं नहीं कि जहाँ नजर उठायी वहीं से एक पोस्ट का माल जुटा लिया। कुछ अच्छा और नया लिखने के लिए जो पैनी नजर, सृजनात्मकता और घ्राण शक्ति चाहिए वह तो मुझमें  सीमित ही है। केवल उत्साह के दम पर कबतक आस-पास की सर्वविदित बातें ठेलते रहेंगे? हिन्दी चिट्ठों पर भाई लोग कितना कुछ तो लिख रहे हैं। मेरे लिए कुछ छोड़ें तब न…। मन को यही सब समझा-बुझाकर अपनी निष्क्रियता के आनन्द सागर में गोते लगाते हुए मैं दिन काट रहा था तभी ये मुंआ वेलेन्टाइन आ धमका…।

एक दिन पहले से ही तार टूट जाने से मेरे सरकारी मुहल्ले की बिजली गुल थी। किसी ने कॅम्प्लेन्ट नहीं दर्ज करायी क्योंकि साहब लोगों के घर बिजली का आना जाना जल्दी पता ही नहीं चलता। जब रात में इन्वर्टर जवाब दे गया तो पता चला कि बिजली दस घण्टे से गुल थी। कम्प्यूटर भी घूल धूल से नजदीकियाँ बढ़ा रहा था।

सुबह सुबह जब मोबाइल पर ‘एसेमेस’ आने लगे तो हम उन्हें मिटाने लगे। कई तो बिना पढ़े ही। फिर एक फोन आया- एक पुरानी साथी का था।

“हैप्पी वेलेन्टाइन डे”

“थैंक्यू- सेम टू यू…” मैने अचकाते हुए कहा फिर झेंप मिटाते हुए बोला, “अरे, बहुत दिन बाद… अचानक आज के दिन? सब खैरियत तो है?”

“क्यों, ऐसे क्यों पूछ रहे हैं… विश नहीं कर सकते क्या?”

“क्यों नहीं, जरूर करिए… अधिक से अधिक लोगों को कर डालिए, प्यार तो बहुत अच्छी चीज है…”

सामने से मुस्कराती हुई श्रीमती जी ने पूछा किसका फोन है। मेरे जवाब देने से पहले उधर से लाइन कट गयी। फिर मैं यूनिवर्सिटी के दिनों की बातें बताने लगा। कई बार बता चुका था फिर भी नये सन्दर्भ में बताना पड़ा। अब दिनभर सण्डे टाइप काम-धाम होते रहे। तेल में तली हुई लज्जतदार बाटी और आलू-बैगन-टमाटर का भर्ता व चने की तड़का दाल बनी। चटखारें ले-लेकर खाया गया। बनाने वाली की बड़ाई की गयी।

शाम को एक भाभी जी का मेसेज आया। वही भगत सिंह को फाँसी दिए जाने की तिथि को भुलाकर वेलेण्टाइन मनाने को लानत भेंजने वाली। श्रीमती जी ने मुझे दिखाया। मुझे बात खटक गयी। उस समय भौतिकी के एक सेवा निवृत्त प्रोफ़ेसर मेरे घर आये हुए थे। उनसे चर्चा हुई। मैने याद करके बताया कि फाँसी मार्च में हुई थी। उन्होंने समर्थन किया। यह भी कि गान्धी जी को इसके बाद लाहौर जाते समय रास्ते में बहुत गालियाँ पड़ी थी कि उन्होने लॉर्ड इर्विन से समझौते के समय फाँसी की माफी नहीं मांगी। मैने रचना से कहा कि नेट खोलकर चेक कर लो। ये नेट पर तो आयीं लेकिन अपनी ताजी पोस्ट की टिप्पणियाँ देखने लगीं।

जी-मेल पर गिरिजेश भैया मिल गये। चैट पर उनसे ही सवाल दाग दिया- भगत सिंह को फाँसी कब हुई? जवाब आया- २३ मार्च। उसके बाद ‘धन्यवाद’ टाइप करने के बजाय इन्होंने गलती से ‘0’ छाप दिया। भइया ने समझा कि परीक्षा में उन्हें शून्य अंक मिला है। उन्होंने लिखा- मुझे तो यही पता है, सही जवाब आप बताइए।

इसी समय प्रोफ़ेसर साहब को विदा करके मैं कमरे में आया। चैट की कमान मैने सम्हाल ली और विकीपीडिया से कॉपी-पेस्ट किया-  सरदार भगत सिंह (28 सितंबर 190723 मार्च 1931) और बात बिगड़ने से बच गयी, नहीं तो आज जेठ-भवइ के बीच कालिदास और विद्योत्तमा का शास्त्रार्थ शुरू होने वाला था। 🙂

उसके बाद मैने उन भाभी जी को फोन किया और उस मेसेज को दुरुस्त करने की सलाह दी। उन्होंने उस डॉक्टर मित्र को लानत भेंजी जिसने उन्हें यह मेसेज किया था और अधिकाधिक लोगों तक फॉर्वर्ड करने को भी कहा था। मैंने बाद में जब यही कुछ मानसिक हलचल पर देखा तो हैरान रह गया कि किसी एक खुराफ़ाती दिमाग ने कितने भले लोगों की वॉट लगा दी है।

बात ही बात में उन भाभी जी ने मुझे एक संकट में डाल दिया। पूछ लिया कि ‘आपने किसी को वेलेण्टाइन विश किया कि नहीं…।’ मैने झटसे ईमानदारी पूर्वक कह दिया – ‘नहीं’ और यह भी जोड़ दिया कि ‘मेरी तो कोई वेलेण्टाइन है ही नहीं’

लीजिए साहब, सामने खड़ी श्रीमती जी की गहरी मुस्कराहट देखकर मैं घक्‌ से रह गया। मेरी इस सपाटबयानी को जरूर निराशापूर्ण अर्थ में ग्रहण कर लिया गया होगा। सोचने लगा- अब इन्हें कैसे समझाऊँगा…???

तभी भाभी जी ने यह पूछ कर मेरा काम आसान कर दिया- “क्यों? आपकी इतनी अच्छी पत्नी हैं …उन्हें?”

DSC00245 “वो मेरी वेलेण्टाइन कैसे हुई? वो तो मेरी मलकाइन (मालकिन) हैं। उनकी जो हैसियत है उसके पासंग भर भी कोई वेलेण्टाइन नहीं हो सकती… आप सागर  की तुलना एक छोटे तालाब से कर रही हैं। …हम उनसे जो पाते हैं वह कोई वेलेन्टाइन क्या दे पाएगा? …हम एक दिन के चोंचले में विश्वास नहीं करते, हम तो रोज उस अन्दाज में जीते हैं जिसकी आज के दिन पार्कों और क्लबों में घूमने वाले तमाम कृत्रिम जोड़े कल्पना भी नहीं कर सकते।” इस बीच रचना चाय के खाली कप समेटकर वहाँ से जा चुकी थीं।

शाम को मुझे कम्प्यूटर पर बैठने की प्रेरणा हुई। सफ़ेद घर पर बाल्टिआन बाबा को कड़ाही चढ़ायी जा रही थी। गुरुदेव की पोस्ट पर भगत सिंह की फाँसी का मेसेज चिठ्ठाजगत में भी खुराफ़ात करता दिखायी पड़ा। लेकिन उनकी पोस्टेरस की नयी उड़ान और मोबाइल ब्लॉगिंग की हाइटेक शुरुआत की बात पढ़कर मुझे हीनता ग्रन्थि ने घेरना शुरू कर दिया। उसके बाद मैं पहुँचा- आलसी के चिट्ठे पर।

यहाँ जो लिखा हुआ पाया उसे पढ़ने के बाद तो मेरा कान गरम हो गया। रे सिद्धार्थ, लानत है तुझपर। देख, अपनी जीवन संगिनी को देखने का सही ढंग। उस चलते फिरते स्तम्भ को तू क्यों न देख पाया? बड़ा अपने को शब्दशिल्पी समझता रहा। दूसरे भी तुम्हारी शब्दसम्पदा की प्रशंसा करते रहे… लेकिन तुम तो पाजी निकले। तुमसे यह सब क्यों न लिखा गया?

मैने यहाँ लौटकर बहुत कोशिश की कुछ लिखने की। अपने हृदय की गहराइयों में बहुत नीचे तक उतरकर उसे पकड़ने की कोशिश की लेकिन मैं उसे बाहर निकाल नहीं पाया। शब्द बेगाने होकर साथ छोड़ गये हैं। पिछले ग्यारह साल के साथ को याद करके उसकी गर्माहट और आश्वस्ति महसूस तो कर सकता हूँ लेकिन चाह कर भी लिख नहीं पा रहा। जैसे मूढ़मति होकर बहती हुई गंगा की धारा के बीच आँखें बन्द किए खड़ा हूँ। बुद्धू सा।

किनारे एक बड़ा सा बोर्ड लगा है- गंगे तव दर्शनार्थ मुक्तिः।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

इलाहाबाद में अमरूद के लिए तरसने का मजा… !?!

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मुझे इलाहाबाद में नौकरी करते हुए ढाई साल हो गये। इसके पहले एक दशक से कुछ ही कम साल विद्यार्थी के रूप में यहाँ गुजार चुका हूँ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सर गंगानाथ झा छात्रावास में रहते हुए हम रोज शाम को लक्ष्मी टाकीज चौराहे पर चाय पीने आते और फलों की दुकान से मौसमी फल ले जाते। जाड़ा शुरू होते ही इलाहाबाद के प्रसिद्ध अमरूद मिलने लगते- बिल्कुल ताजे और स्वादिष्ट। पहली बार में ही इनकी खुशबू और मिठास का दीवाना कौन न हो जाय…! हमें जब गाँव जाना होता तो बैग भरकर अमरूद ही ले जाते। जब डिमाण्ड बढ़ती गयी तो एक बार यहाँ के खुसरूबाग से अमरूद का पौधा ही लेते गये। गाँव पर उसका पेड़ तो तैयार हो गया लेकिन वहाँ फल का स्वाद इलाहाबादी अमरूदों जैसा न रहा।

दुबारा इलाहाबाद की पोस्टिंग मिलने पर हम इस कारण से भी खुश हो लिए थे कि अब सेब से टक्कर लेते लाल-लाल अमरूदों का आनन्द खूब मिलेगा। उसपर जब सरकारी आवास मिला तो यह देखकर खुशी दोगुनी हो गयी कि घर के आगे-पीछे अमरूद के तीन-चार पेड़ लगे हुए थे। पिछवाड़े कोने में लगा पेड़ तो काफी बड़ा था और फलने के लिए पूरी तरह तैयार था। यानि वह अनुपम सुख बिना पैसा खर्च किए मिलने वाला था। मुझे यह भी बताया गया कि साल में इस पेड़ में दो-तीन बार फल लगते हैं।यहाँ हैं शिकारी तोताराम

फिर क्या था- पेड़ में फूल लगे और देखते-देखते फलों में बदलते गये। मैं इनके पकने का इन्तजार करने लगा। इनका आकार भी अच्छा खासा हो गया। असली इलाहाबादी ही थे। लेकिन कई दिनों के बाद भी जब मुझे कोई पका फल नहीं दिखा तो मैने थोड़ी निगरानी की। पता चला कि जब मेरे ऑफिस और बेटी के स्कूल चले जाने के बाद श्रीमती जी घर के भीतर अपनी गृहस्थी सम्हालने में व्यस्त हो जातीं, तो सुनसान देखकर कलेक्ट्रेट कैम्पस में रहने वाले कुछ कर्मचारियों के परिवारों से बच्चों के झुण्ड आते और चारदीवारी पर चढ़कर पेड़ की पूरी पैमाइश कर जाते।

एक बार मुझे अचानक ऑफिस से घर आना हुआ तो मैने देखा- दो बच्चे पेड़ पर, तीन दीवार पर और कुछ नीचे खड़े होकर पेड़ को खंगाल रहे थे। मुझे आता देख नीचे खड़े बच्चे सरपट भाग गये। दीवार वाले सीधे कूद पड़े और लड़खड़ाते हुए भागने लगे। पेड़ की डाल पर चढ़े हुए शूरमा भी हाथ के अमरूद फेंककर तेजी से उतरने लगे। मुझे चिन्ता हुई कि वे कहीं हड़बड़ी में गिरकर चोट न खा बैठें। मैनें हाथ के इशारे से उन्हें आश्वस्त किया कि घबराने की जरूरत नहीं है। (यानि मैं उनका कुछ करने वाला नहीं हूँ।) यह भी कि जो फल तोड़ लिए गये हैं वे उन्हीं के हैं…। मैने उन्हें आराम से उतरकर जाने दिया। बस एक सलाह देकर कि पहले अमरूद पक जाने देते…। गाँव पर बाग से आम की चोरी करते पकड़े गये बच्चों पर पिताजी के नर्म व्यवहार की याद आ गयी थी।

ये फ़सल किस काम की

लेकिन उस दिन मुझसे जो ‘गलती’ हुई उसका खामियाजा अबतक भुगत रहा हूँ।  मेरे पूर्वाधिकारी ने कदाचित्‌ अपने रौब और गार्डों के माध्यम से उन बच्चों के मन में जो डर बनाया होगा वह उसी दिन से काफूर हो गया। …और निःशुल्क ताजे पके अमरुद खाने का मेरा सपना चकनाचूर हो गया। अब तो वे बेधड़क अपनी मर्जी से दीवार के सहारे चढ़कर अमरूद तलाशते रहते हैं।

हमने आशा का दामन फिर भी नहीं छोड़ा था। पेड़ में बहुत से अमरूद छिपे हुए भी होते हैं, जिनपर जल्दबाजी में काम करने वाले शिकारी बच्चों की निगाह नहीं पड़ती। मैं पेड़ों का मालिक होने के कारण आराम से खोज-खोजकर उन बचे-खुचे फलों को तोड़ सकता था। वे मेरे छोटे से परिवार के आनन्द के लिए पर्याप्त होते। चिड़ियों की दावत लेकिन तभी मुझे एक और शिकारी वर्ग से दो-चार होना पड़ा। मैने देखा कि पेड़ के नीचे कच्चे और अधपके फलों के छोटे-छोटे टुकड़े गिरे हुए हैं। ऊपर देखा तो हैरान रह गया। कई फल टहनी से तो लगे हुए थे लेकिन आधा-तिहाई खाये जा चुके थे। यानि कि मेरे सपने पर केवल मनुष्य ही नहीं पक्षी भी तुषारापात करने को कमर कस चुके थे। भूरे रंग की स्थानीय देशी चिड़िया; जिसका नाम मुझे नहीं मालूम (शायद मैना), झुण्ड में आकर पेड़ की एक-एक डाल पर मंडराने लगी। फिर अपने तोताराम कैसे पीछे रहते? ये भी सपरिवार पधारने लगे। बड़ी सफाई से फलों को कुतरा जाने लगा। टहनी से बिना अलग किए अमरूद का ज्यादातर हिस्सा चट हो जाता।

फिर तो मेरे आकर्षण का केन्द्र अमरूद न होकर ये अनोखे मेहमान हो गये। मैं चुपके से छिपकर इनका फल कुतरना देखता। सच में इनकी कारीगरी देखकर मजा आने लगा। मैने जब भी इनकी फोटो खींचनी चाही, जाने कैसे इन्हें पता चल जाता और ये फुर्र हो जाते। फिर भी मेरा प्रयास जारी रहा। अन्ततः आज तोते की एक जोड़ी मेरे कैमरे की पकड़ में आ ही गयी। वह भी ऐसे कि चोरी का माल पंजे में दबाए साबुत बरामद हुआ। अमरूद की हरी-हरी पत्तियों और हरे फलों के बीच बैठे हुए ये हरे पंख और लाल चोंच वाले आकर्षक जीव आँखों को इतनी तृप्ति देते हैं कि मैं इनपर सारे फल खुशी-खुशी न्यौछावर कर दूँ।

पंजे में दबाकर ले उड़े

समाधान के तौर पर मैं एक दिन बाजार से कुछ अमरूद खरीद लाया तो श्रीमती जी का ताना सुनना पड़ा कि घर का अमरूद दूसरे खा रहे हैं और आप बाजार से ला रहे हैं… लानत है। तबसे मैने बाजार के अमरूद की ओर आँख उठाना भी छोड़ दिया है। अब आप ही बताइए मुझे इलाहाबादी अमरूद का सुखद स्वाद कैसे मिलेगा?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

अवकाश-त्रसित मन की आकुलता में समाया क्रिकेट…

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जिलाधिकारी द्वारा प्रकाशित छुट्टियों की लिस्ट अपनी ऑफिस टेबल के शीशे से दबाकर सभी अधिकारियों की तरह मैने भी लगा रखा है। हाँलाकि उसमें दिखने वाली सभी छुट्टियाँ हम ट्रेजरी वालों को नसीब नहीं होती। स्थानीय अवकाश, निर्बन्धित अवकाश और कार्यकारी अवकाश के दिन हमारे लिए बहुत कोफ़्त के होते हैं। इन दिनों दूसरे दफ़्तर जब बन्द रहते हैं तब भी बैंक की तरह हम सरकारी खजाना खोलकर बैठे रहते हैं। महीने का दूसरा शनिवार भी हमें सालता है। महीने के पहले सप्ताह में तनख्वाह लेकर इस दिन सरकारी कर्मचारी बाजार जाते हैं और महीने की खरीदारी करते हैं। लेकिन हम यह काम भी शाम को घर लौटने के बाद ही कर पाते हैं।

इलाहाबाद की ट्रेजरी में एक अतिरिक्त लफ़ड़ा भी है। यहाँ आए दिन कोई न कोई प्रतियोगी परीक्षा होती रहती है जो प्रायः रविवार की छुट्टी के दिन पड़ती है। इन परीक्षाओं के प्रश्नपत्र सीलबन्द लिफाफों में हमारे द्वितालक दृढ़कक्ष (double-lock strong room) में रखे जाते हैं, जिन्हें परीक्षा प्रारम्भ होने के एक घण्टा पहले निकालकर मजिस्ट्रेट के हाथों परीक्षा केन्द्र तक भेंजा जाता है। परीक्षा में दो पारियाँ हों तो डबल-लॉक दो बार खोला जाता है। यानि हमारी साप्ताहिक छुट्टी भी नौकरी के हवाले चली जाती है।

ऐसे अवकाश-त्रसित मन को जब पता चला कि क्रिसमस से लेकर मोहर्रम तक लगातार चार दिन में तीन दिन छुट्टी के हैं और इस बीच कोई परीक्षा भी नहीं है तो मन बल्लियों उछल पड़ा। खूब आराम करेंगे। किसी काम की फिक्र न होगी। बेटी का स्कूल और संगीत क्लास दोनो बन्द रहेगा, इसलिए उसे छोड़ना भी न होगा। मेयोहाल भी दो दिन बन्द रहेगा, इसलिए बैडमिण्टन से भी आराम रहेगा। सुबह जल्दी उठने का कोई टेंशन नहीं। ….ब्लॉगरी में जो काम पिछड़ गये हैं वो सब बैकलॉग पूरा कर लेंगे। फीडरीडर का जाम हटा लेंगे….  ना..ना..ना.., तब तो फिर छुट्टी का मजा जाता रहेगा। ठीक है… ब्लॉगरी को भी नमस्ते कर देंगे। जैसे इतना छूटा है वैसे थोड़ा और सही। इस छुट्टी में तो मन मस्तिष्क को पूरा ‘रेस्ट’ पर रखेंगे। कुछ नहीं सोचेंगे, कुछ नहीं करेंगे… बस देर तक अलसाए बिस्तर पर पड़े रहेंगे… नींद का ओवरडोज लेंगे… खूब निश्चिन्त होकर पड़े रहेंगे… ऐसा दुर्लभ सुख फिर मिले न मिले…!!!

रविवार की सुबह अखबार ने बताया कि भारत-श्रीलंका का आखिरी एकदिवसीय मैच सुबह नौ बजे प्रारम्भ हो जाएगा। ३-१ की अपराजेय बढ़त के साथ उतरने वाली भारतीय टीम की उम्दा बल्लेबाजी  का लुत्फ़ उठाने का ऐसा मौका हाथ से क्यों जाने दूँ। छुट्टी के दिन मैच हो तो क्या कहने। ऑफ़िस मे होने पर तो बार-बार घर से स्कोर पूछता रहता हूँ, आज तो पूरा मैच लाइव देखना है। बस मैं तुरत-फुरत रजाई से बाहर निकला, जल्दी-जल्दी नहा लिया, खड़े-खड़े भन्न से पूजा किया और टन्न से टीवी ऑन कर दिया। ड्राइंग रूम की सेन्ट्रल टेबल किनारे कर कालीन पर गद्दे डालकर चादर बिछायी, मसनद लगाया और कम्बल में पैर डालकर अधलेटा हो लिया। दिनभर सोफ़े पर बैठना मुश्किल जो था। वाह क्या आनन्द था…!Upul Tharanga was cleaned up first ball 

डिश टीवी वाले नियो-क्रिकेट चैनेल नहीं दिखाते इसलिए इसका ‘मैक्सी पैकेज’ लेने के बाद भी मुझे इस एक चैनेल के लिए लोकल केबल वाले से अनुरोध करना पड़ा था। यह बात दीगर है कि जब तक मुझे यह सुविधा मिली तबतक टेस्ट श्रृंखला समाप्त हो चुकी थी और टी-२० तथा ओडीआई का प्रसारण अपने दूरदर्शन पर आने लगा था। फिर भी मैने केबल कनेक्शन चेक कर लिया था, दूरदर्शन का क्या भरोसा… कभी भी खेदप्रकाश की तख्ती नमूदार हो सकती है। आधे घण्टे की समीक्षा ध्यान से सुनने के बाद असली मैच शुरू हुआ। श्रीमती जी इस बीच कई बार मुझे हिकारत से देखकर जा चुकी थीं। चूंकि मेरी यह कमजोरी जानती हैं इसलिए शायद कुछ ऐसा-वैसा नहीं कहा। वर्ना मजाल क्या कि उनके सजाए ड्राइंग रूम में किसी परिवर्तन की गुस्ताखी मैं कर सकूँ।

टॉस जीतने के बाद भारत ने श्रीलंका को बल्लेबाजी की दावत दी थी। सुनील गावस्कर पिच की रिपोर्ट में गोलमोल बता चुके थे कि बहुत अच्छा मैच होगा। पिच में जान है। शुरुआती घण्टे में गेंदबाजों के लिए मददगार रहेगी लेकिन बल्लेबाजों को भी निराश होने की जरूरत नहीं है। बाद में खूब रन बरसेंगे। बहुत जबरदस्त मुकाबला होगा…। पिच को सहलाते हुए कैमरा क्लोजप शॉट ले रहा था। हल्की खुरदरी घास…। गावस्कर बोले- यह किसी गन्जे सिर पर ताजा रोपे गये नकली बालों की तरह दिख रही है। जो गेंद घास पर पड़ेगी उसकी उछाल और दिशा अलग होगी और गन्जे हिस्से पर गिरने वाली गेंद अलग…। मैं इतनी बारीकी नहीं समझता इसलिए पहली गेंद फ़ेंके जाने का इन्तजार करता रहा।

पहला ओवर जहीर खान का था। पहली गेंद फेंकते ही जोरदार शोर हुआ। खब्बू ओपनर उपुल थरंगा अपने पैड को बल्ले से ढंके हुए रक्षात्मक मुद्रा में खड़े थे और उनकी गिल्लियाँ हवा में बिखर चुकी थीं। ओ, व्हाट ए स्टार्ट… !! कमेण्ट्रेटर उत्तेजित थे। इसके बाद तो जो खेल आगे बढ़ा उसे देखकर भारतीय दर्शक खुशी से झूम उठे। जब एक के बाद एक विकेट सस्ते में गिरने लगे तो मेरा मन अजीब उदासी का शिकार होने लगा। ऐसे तो पूरे दिन रोमांच बना ही नहीं रहेगा। चुनौती ही नहीं रहेगी तो इण्डिया बैटिंग क्या करेगी।

Fall of wickets1-0 (Tharanga, 0.1 ov), 2-39 (Dilshan, 10.5 ov), 3-58 (Sangakkara, 15.1 ov), 4-60 (Jayasuriya, 16.4 ov),5-63 (Samaraweera, 17.6 ov)

पहली गेंद पर विकेट, दूसरे ओवर की पहली गेंद पर छूटा कैच, ब्ल्लेबाजों की कुहनी, कन्धे और अंगुलियों पर बार बार लगती चोटें, विकेटों के बीच हड़बड़ी में लगती दौड़, थर्डमैन को छकाती थिक-एज से निकलती सनसनाती गेंदे, जहीर खान, हरभजन सिंह और पहला मैच खेल रहे सुदीप त्यागी को मिलने वाले एक-एक विकेट, दो मैचों का प्रतिबन्ध झेलकर लौटे धोनी की शानदार विकेटकीपिंग, रैना का धारदार क्षेत्ररक्षण और रन आउट… इस पहले सत्र में क्या-क्या नहीं देखने को मिला।

 

लेकिन चौबीसवें ओवर के आते-आते वह हो गया जो किसी को पसन्द नहीं आया होगा। मैच रद्द होने की ओर बढ़ गया। चोटग्रस्त श्रीलंकाई टीम ने पिच की शिकायत की और मैच रेफ़री ने काफी सोच-विचार के बाद मैच को रद्द कर दिया और हमने टीवी से नजर हटाकर कम्बल में मुंह ढंक लिया। अब श्रीमती जी क सब्र टूट चुका था। उन्होंने कम्बल उठाया और लेकर चली गयीं। मने भी मन मसोस कर अपना गद्दा समेट लिया। सेन्ट्रल टेबल अपने स्थान पर आ गयी, और मैं कम्प्यूटर पर अपनी ब्लॉगरी में आधे मन से जुट गया। 

छुट्टी का मजा एक बार फिर किरकिरा हो लिया है। आलसी होने का सपना चूर-चूर हो गया। कल मैच के दौरान गिरिजेश भइया ने फोन पर दरियाफ़्त भी की थी कि कहाँ गायब हो गये हो। मैने बताया कि आपकी आलसी वाली उपाधि हथियाने की फिराक में हूँ। आलसी का चिट्ठा तो गजब की तेजी पकड़ चुका है इसलिए भूमिका हथियाने की राह पर चल पड़ा हूँ। आज बहुत आलस के बाद यह पोस्ट ठेल रहा हूँ।

बीबी-बच्चे भुनभुना रहे हैं, इसलिए यहीं बन्द करता हूँ और चलता हूँ इन्हें थ्री ईडिएट्स दिखाने। मुझे देख-देखकर शायद ये बोर हो चुके हैं।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

पुछल्ला : मजेदार फिल्म रही: थ्री ईडिएट्स। कहकहे और भावुक स्वर (आँसू) दोनो बारी-बारी आते रहे दर्शकों के बीच से। बहुत दिन बाद कोई फिल्म देखा और भरपूर आनन्द उठाया।

आप सब को नये साल की हार्दिक शुभकामनाएं।

(सिद्धार्थ)

 

हाय रे तेरी किस्मत…

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तीर्थयात्रा से लौटकर दुबारा कामकाज सम्हालने को जब मैने ऑफिस में प्रवेश किया तो पाया कि नये बॉस ने कदम रखते ही यहाँ रंग-रोगन लगवाकर, गमले रखवाकर, सुनहले अक्षरों में नामपट्टिका लगवाकर और ‘फेसलिफ्ट’ के दूसरे तमाम उपायों द्वारा यह संकेत दे दिया है कि अब हमारा कोषागार किसी कॉर्पोरेट ऑफिस की तरह ही चाकचौबन्द  और समय की पाबन्दी से काम करेगा। सब कुछ चमकता-दमकता हमारे कॉन्फिडेन्स को बढ़ाने वाला था।

अपने कक्ष में जाकर मैने मेज पर लगी फाइलों, बिलों व चेकों के अम्बार को एक-एक कर निपटाना शुरू किया। बीच-बीच में बुजुर्ग पेंशनर्स का आना-जाना भी होता रहा। करीब तीन घण्टे तक लगातार दस्तख़त बनाने के बाद मेज साफ हुई और मुझे यह सोचने की फुर्सत मिली कि घर से क्या-क्या काम सोचकर चले थे।

वायरल हमले से त्रस्त बच्चों व पत्नी की दवा, खराब हो गये घर के कम्प्यूटर को ठीक कराने के लिए किसी तकनीकी विशेषज्ञ की खोज, हिन्दुस्तानी एकेडेमी में जाकर वहाँ होने वाले आगामी कार्यक्रम की तैयारी की समीक्षा, वहाँ से प्रकाशन हेतु प्रस्तावित पुस्तक के लिए ब्लॉगजगत से प्राप्त प्रविष्टियों का प्रिन्ट लेकर उसे कम्पोजिंग के लिए भेंजना, इसी बीच ट्रेनिंग के लिए परिवार छोड़कर एक सप्ताह के लिए लखनऊ जाने की चिन्ता और अपनी गृहस्थी के तमाम छोटे-छोटे लम्बित कार्य मेरे मन में उमड़-घुमड़ मचाने लगे। मेज पर हाल ही में लगा पुराना कम्प्यूटर कच्छप गति से बूट हो रहा था। नेट का सम्पर्क बार-बार कट जा रहा था। लैन(LAN) की खराबी बदस्तूर कष्ट दे रही थी। चारो ओर से घिर आयी परेशानियों का ध्यान आते ही मन में झुँझलाहट ने डेरा डाल दिया।

तभी एक नौजवान कमरे में दाखिल हुआ। चेहरा कुछ जाना-पहचाना लगा। उसने जब एक कागज मेरे सामने सरकाया तो ध्यान आया कि दो-तीन सप्ताह पहले यह एक विकलांग लड़की को पहिए वाली कुर्सी पर बिठाकर ले आया था। उस लड़की को अपने पिता की मृत्यु के बाद पारिवारिक पेंशन स्वीकृत हुई थी। उसी पेंशन के प्रथम भुगतान से पहले दो गवाहों के माध्यम से की जाने वाली औपचारिक पहचान के लिए वह लड़की मेरे सामने लायी गयी थी।

imageइस लड़के की चचेरी बहन थी वह लड़की। मुझे याद आया कि इसने उसकी पेंशन दिलाने में जो मदद की थी उसके लिए मैने इसे  शाबासी दी थी, और पेंशन का चेक उस लड़की के बैंक खाते में तत्काल भिजवा दिया था। वही लड़का आज कुछ परेशान सा जब मुझसे मिला तो मैने पूछा-

“क्या हुआ? पेंशन तो मिल गयी न…?”

“नहीं सर, बैंक वाले बहुत परेशान कर रहे हैं” उसके स्वर में अजीब शान्ति थी।

“क्यों, क्या कह रहे हैं…?”

“आपने तो देखा ही था… वह बोल नहीं पाती है। अनपढ़ है। हाथ-पैर भी सीधे नहीं हैं। सिग्नेचर बना नहीं सकती है।”

“बैंक वालों ने उसका खाता तो खोल ही दिया था न…। शायद उसकी बड़ी बहन के साथ संयुक्त खाता था…?” मैने मस्तिष्क पर जोर देते हुए पूछा।

“जी सर, खाते में पैसा भी चला गया है। …लेकिन जब पैसा निकालने गये तो बोले कि यह पेंशन का पैसा है इसलिए इसे बड़ी बहन के दस्तख़त से नहीं निकाला जा सकता।”

“फिर उसका अंगूठा क्यों नहीं लगवा लेते? …अपने सामने अंगूठा निशान लगवाकर प्रमाणित करें और भुगतान कर दें।” मैने आसान हल सुझाया।

“नहीं सर, वो कहते हैं कि जब तक लड़की से पूछने पर वह बताएगी नहीं कि वह फलाँ है, और अमुक धनराशि निकालना चाहती है तबतक कोई बैंक अधिकारी उसका अंगूठा निशान प्रमाणित नहीं करेगा।” उसने परेशानी बतायी।

“…तो फिर अभिभावक के रूप में बड़ी बहन के साथ संयुक्त खाता इसीलिए तो खोला गया होगा कि वह पैसा निकाल सके और अपनी विकलांग बहन का भरण-पोषण कर सके?”

मैने पूछा तो उसने बताया कि मैनेजर साहब इसे बैंककर्मी की गलती से खोला गया खाता बता रहे हैं और पेंशन का पैसा वापस भेंजने को कह रहे हैं। कहते हैं कि अक्षम बच्चे के लिए केवल माँ-बाप ही गार्जियन हो सकते हैं। दूसरा कोई तभी अभिभावक बन सकता है जब उसे सक्षम न्यायालय अधिकृत करे।

“…वैसे उसके परिवार में और कौन लोग हैं?” मैने उत्सुकतावश पूछ लिया।

“कोई नहीं सर…। चाचा-चाची दोनो मर चुके हैं, तभी तो उसे फेमिली पेंशन मंजूर हुई है। केवल यही दोनो अकेले शहर में रहती हैं। चाचा ने हम लोगों से अलग होकर यहाँ एक छोटा सा मकान बनवा लिया था। हम लोग गाँव पर रहते हैं। इन लोगों का अब गाँव पर कुछ नहीं है।”

“क्यों? तुम्हारे चाचा का हिस्सा तो खेती-बाड़ी में रहा होगा।” मैने उससे कुछ और जानने के उद्देश्य से पूछा।

“ऐसा है सर, चाचा बहुत दारू पीते थे। पुलिस में सिपाही थे। केवल दो बेटियाँ थीं जिसमें एक विकलांग ही थी। इसलिए सब कुछ बेंच-बेंचकर पीते गये। कहते थे- किसके लिए बचाकर रखूंगा…” वह बेहद भावशून्य चेहरे से बता रहा था।

“जब रिटायर हुए तो पता चला कि चाची को कैंसर है। उनके इलाज में भी बाकी जमीनें बिक गयीं। …अन्ततः चाची मर भी गयीं और चाचाजी कंगाल हो गये।” उसका चेहरा बेहद शान्त था।

मैने पूछा कि जब वे रिटायर हुए होंगे तो तीन-चार लाख रूपये तो मिले ही होंगे। उनका क्या हुआ?

“चाची के मरने के तुरन्त बाद चाचा को पता चला कि उनके गले में भी कैंसर है। …तीन बार ऑपरेशन कराया गया। बहुत महंगा इलाज चला…, लेकिन तीसरे ऑपरेशन के आठ दिन बाद वे भी मर गये।” वह यन्त्रवत्‌ बताता जा रहा था।

“उफ़्फ़्‌” मेरे मन में पीड़ा भर गयी। मैं उसकी ओर देख नहीं पा रहा था, “फिर तो कोर्ट का ही सहारा लेना पड़ेगा उसकी बड़ी बहन को अभिभावक बनाने के लिए…”

“सर मैं कोर्ट से भी लौट आया हूँ। …जज साहब ने कहा कि किसी को इसका गार्जियन तभी बनाया जा सकता है जब यह पुष्ट हो जाय कि यह पागल और मानसिक दिवालिया है। इसके लिए सी.एम.ओ. (Chief Medical Officer) से लिखवाकर लाना होगा।”

“तो क्या सी.एम.ओ. के यहाँ गये थे?”

“जी सर, लेकिन वहाँ भी काफी दौड़ने के बाद डॉक्टर साहब ने कह दिया कि यह लड़की जब पागल ही नहीं है तो कैसे लिख दें कि पागल है। …कह रहे थे कि विकलांग होने में और पागल होने में बहुत अन्तर है।”

“उनसे कहो कि यह लिख दें कि इसकी शारीरिक विकलांगता और मानसिक अक्षमता इस प्रकार की है कि बैंक खाते का संचालन नहीं कर सकती…। इसके आधार पर तो जजसाहब को उसका अभिभावक बड़ी बहन को बना देना चाहिए।” मैने आशा जतायी।

“अब मैं बिल्कुल हार चुका हूँ साहब… मैं खुद ही गरीब परिवार का हूँ। इस चक्कर में मेरे अपने बड़े भाई ने मुझे अलग कर दिया है क्योंकि मैं चाचा की लड़कियों की सहायता में अपने घर से पैसा खर्च करता हूँ। …बोले कि अपना हिस्सा बाँट लो और उसी में से खर्च करो इनके ऊपर… मैं अपना नहीं लगाने वाला…।”

अब मैं निरुत्तर हो चुका था। उस लड़के की परिस्थितियाँ विकट थीं… और उससे भी अधिक कठिन उस विकलांग बालिका व उसकी बड़ी बहन की जिन्दगी थी जिनकी बीस व बाइस की उम्र के आगे पीछे कोई नहीं था। इस लड़के का धीरज जवाब दे रहा था। उसने बताया कि पेंशन के एरियर से बड़ी वाली की शादी करना चाहता था और उसके बाद मासिक पेंशन से छोटी वाली का गुजारा हो जाता लेकिन…

मैने बैंक मैनेजर को फोन मिलाया तो उन्होंने यह साफ़ कर दिया कि माँ-बाप के अलावा ‘नेचुरल गार्जियन’ केवल कोर्ट के ऑर्डर से ही बनाया जा सकता है। बिना उस ऍथारिटी के हम पेंशन का पेमेण्ट नहीं कर सकते।

…इसके बाद मुझे अपनी छोटी-मोटी परेशानियाँ क़ाफूर होती नजर आयीं। अब तो उस लड़की की कठिनाई में मन उलझ सा गया है।

अन्ततः हम इस उलझन को सुलझाने के लिए विशेषज्ञों की राय आमन्त्रित करने को मजबूर हुए हैं, मामला अभी लम्बित है। ध्यान रहे कोषागार से पेंशन का भुगतान शत-प्रतिशत पेंशनर के बैंक खाते में ही किए जाने का प्राविधान है।

किसी उचित समाधान के लिए आप अपनी राय देना चाहेंगे क्या?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

बच के रहना रे बाबा… जाने कौन कैसा मिल जाय !?!

15 टिप्पणियाँ

 

मुझे तो अपने ही ऊपर तरस आ रही थी। कैसे यह सब सुनकर भी मैं उसके लिए कुछ खास नहीं कर पाया था। बेचारी कितनी हिम्मत करके आयी होगी अपना दुखड़ा सुनाने…।

मैं अपने बॉस के पास उनके चैम्बर में बैठा कुछ सरकारी कामकाज पर विचार-विमर्श में तल्लीन था। मई का महीना… बाहर सूर्यदेवता आग उगल रहे थे। कमरे के भीतर आती-जाती बिजली की आँख-मिचौनी के बीच ए.सी. की अधकचरी सेवा मन को उद्विग्न कर रही थी। गर्मी के कारण दफ़्तर में प्रायः सन्नाटा ही था। इसी बीच उसने अपने पिता के साथ कमरे में प्रवेश किया था।

साफ-सुथरे परिधान में पूरा शरीर ढँका हुआ था। पूरी बाँह ढँकने वाला कुर्ता, एड़ियों के नीचे तक पहुँचने वाली सलवार, और गले में लिपटा व सिर को ऊपर तक ढँकने वाला सूती दुपट्टा कान के पीछे करीने से दबाया गया था। कट-शू में पूरी तरह छिपे हुए पाँव उसके नख-शिख आवृत्त होने के सायास उपक्रम की कहानी कह रहे थे। दुग्ध धवल चेहरे पर प्रायः कोई मेक-अप नहीं था। जैसे सोकर उठने के बाद किसी अच्छे फेसवाश से चेहरा धुलकर साफ़ तौलिए से पोंछ लिया गया हो… बस। चेहरे पर असीम गाम्भीर्य और स्थिरता का भाव चस्पा था। निगाहें जमीन की ओर अपलक ताकती हुईं। करीब दो घण्टे की बात-चीत में कुछ सेकेण्ड्‌स के लिए ही नज़र ऊपर उठी होगी।

साथ में जो सज्जन आए थे वे काफी थके-हारे और दुखी दिख रहे थे। चेहरे पर उभरता पसीना जो रुमाल से बार-बार पोंछने के बाद भी छिटक आता। उम्र साठ के पार रही होगी। हमने सोचा शायद पेंशन के फरियादी होंगे जो अपनी बेटी के साथ आए हैं। बिना कुछ बोले कुर्सी पर आराम से बैठ गये। अपने थैले से कुछ कागज निकालने और रखने लगे। जैसे कोई खास कागज दिखाने के लिए ढूँढ रहे हों…।

बॉस ने हमारी बात-चीत बीच में रोककर उनसे आने का प्रयोजन पूछा तो उन्होंने इशारे से कहा कि आपलोग अपनी बात पूरी कर लें और ध्यान से सुनने को तैयार हों तभी वे अपनी बात कहेंगे। हम फौरन उनकी बात सुनने को तैयार हो लिए।

“हमें अमुक विभाग के एक अधिकारी की पे-स्लिप चाहिए…”

“कौन सा अधिकारी? कहाँ काम करता है?”

“आज-कल लखनऊ में ट्रेनिंग ले रहा है…”

“तो पे-स्लिप तो वहीं से मिलेगी, यहाँ से उसकी कोई सूचना कैसे मिल सकती है?”

“वहाँ से नहीं मिल पा रही है, तभी तो ट्रेजरी में आपकी मदद के लिए आए हैं…” पिता का स्वर लाचार सा था।

“किसी भी ट्रेजरी से प्रदेश के सभी अफसरों की पे-स्लिप नहीं मिलती…। ऐसी क्या जरूरत पड़ गयी आपको पे-स्लिप की..? और मिलने में क्या समस्या आ रही है?” बॉस के प्रश्न में हैरानी थी।

इसके बाद उन्होंने जो कहानी सुनायी वह सिर पीट लेने लायक थी।

“हमने इस लड़की की शादी उस अफसर लड़के से की थी। दहेज में काफी रकम खर्च किया था मैने। गाड़ी और जेवर अलग से…। …लेकिन हमें धोखा हो गया है। …अब नौबत तलाक की आ गयी है। …कोर्ट में मुकदमा चल रहा है। उसी सिलसिले में हमें उसकी नौकरी से सम्बन्धित कागजात की जरूरत है” बगल में शान्त बैठी बेटी के बाप की आवाज रुक-रुककर निकल रही थी।

सहसा लड़की ने भी बोलना शुरू कर दिया, “वह झूठ पर झूठ बोल रहा है। हम उसकी असलियत साबित करना चाह रहे हैं लेकिन सरकारी विभाग हमारी मदद नहीं कर रहे हैं।”

हमने पूछा, “आखिर गड़बड़ी क्या हो गयी जो बात तलाक तक पहुँच गयी? ”

इसपर बाप-बेटी दोनो एक दूसरे का मुँह देखने लगे। जैसे यह तय कर रहे हों कि बात खोली जाय कि नहीं…। फिर दोनो ने इशारे से एक-दूसरे को सहमति दी।

imageलड़की ने बड़े इत्मीनान से बताया, “इन-फैक्ट… वो इम्पोटेन्ट है”

यह सुनकर हम सन्न रह गये, “ओफ़्फ़ो… आपलोगों को बड़ा धोखा हुआ!”

“…अगर ऐसा था तो उसे क्या पड़ी थी शादी करने की”, मैने हैरत से कहा और मन में उभर आये अजीब  से भाव को संयत करने के लिए कुर्सी की पीठ पर टेक लेकर छत की ओर निहारने लगा।

…ईश्वर ने इस लड़की को इतना सुन्दर व्यक्तित्व दिया, एक सक्षम पिता के घर जन्म लेकर सुख सुविधाओं में पली बढ़ी, घर वालों ने अच्छे दान-दहेज के साथ एक राजपत्रित अधिकारी के साथ इसका विवाह कर दिया; …फिर भी बेचारी आज भरी दुपहरी में कोर्ट  कचहरी और सरकारी दफ़्तरों के चक्कर काट रही है। निश्चित्‌ रूप से बुरे ग्रहों का प्रभाव झेल रही है यह…। …ऐसा दुर्भाग्य जिसकी कल्पना भी न की जा सके!

इस बीच बॉस ने फोन मिलाकर उस ट्रेनिंग इन्स्टीट्यूट के अधिकारियों से बात करनी शुरू कर दी थी। स्वार्थ में अन्धे युवक द्वारा अपनी कमजोरी छिपाकर एक मालदार बाप से दहेज ऐंठने के लालच में एक सुन्दर सुशील कन्या का जीवन नर्क बना देने वाले का परोक्ष रूप से सहयोग करने वालों को भी लानत भेंजी जाने लगी।

मैने भी ‘सूचना का अधिकार कानून (RTI Act)’ के अन्तर्गत पे-स्लिप की सूचना मांगने की सलाह दे दी। इसपर उन्होंने बताया कि वे इसप्रकार के सारे उपाय आजमा चुके हैं। कोई परिणाम नहीं निकला। मैने प्रदेश के ‘सूचना आयुक्त’ से अपील करने को कहा। वहाँ कार्यरत अपने एक मित्र से मदद के लिए फौरन मोबाइल पर बात कर लिया और इन लोगों से परिचय भी करा दिया।

इस काम से मेरे मन को थोड़ी तसल्ली मिली…।

हमने उन दोनो के मुँह से ही शादी तय होने, बारात का भव्य स्वागत सत्कार किए जाने और मोटी दहेज देने के साथ ही साथ लड़की के ससुराल जाने के बाद एक-दो दिन के भीतर उसे अपने दुर्भाग्य की जानकारी होने, संकोच में बात छिपाकर रखने, उस लड़के द्वारा ‘फर्जी नाम से पर्चा बनवाकर’ अनेक डाक्टरों से परामर्श लेने तथा अपनी अक्षमता को छिपाने के प्रयासों का विस्तृत वर्णन सुना। पूरी दास्तान बताने में लड़की ज्यादा मुखर हो उठी थी। उसने कहा कि मैने कोर्ट से इसका मेडिकल टेस्ट कराने की प्रार्थना की है लेकिन वह इससे भग रहा है।

हमने यथासामर्थ्य मदद का आश्वासन देकर उन्हें सहानुभूति पूर्वक विदा किया। उन्होंने भी अपने ठगे जाने की कहानी विस्तार से बताने के बाद हमसे सधन्यवाद विदा लिया।

भाग-दो 

जुलाई की ऊमस भरी गर्मी…। मैं अपने ऑफिस में बैठा कूलर की घर्र-घर्र के बीच चिपचिपे पसीने पर कुढ़ता हुआ सरकारी फाइलों और देयकों (bills) आदि का काम निपटा रहा था। बाहर का मौसम तेज धूप और रुक-रुक कर पड़ते बारिश के छींटो से ऐसा खराब बन गया था कि बहुत मजबूरी में ही बाहर निकला जा सकता था। मेरे कमरे में कोई दूसरा न था।

तभी एक स्मार्ट सा युवक अन्दर आया और मेरी अनुमति लेकर कुर्सी पर बैठ गया। उसका चेहरा कुछ जाना पहचाना लगा…।

(कहानी थोड़ी लम्बी खिंचने वाली है, इसलिए अभी यहीं बन्द करता हूँ। शेष अगली पोस्ट में बहुत शीघ्र…)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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