स्वस्थ और ईमानदार मीडिया मात्र खुशफ़हमी : विभूति नारायण राय

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साबुन की फैक्ट्री चलाने वाली मानसिकता छोड़नी होगी अखबार के मालिकों को…

पिछली कड़ी में आपने पढ़ा कि कैसे एक प्रतिष्ठित अखबार के प्रबंध संपादक ने अखबार की दुनिया की कथित ‘सच्चाई’ बताते हुए अखबार पढ़ने वालों की प्रतिबद्धता और पत्रकार बिरादरी की शक्तियों पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिये थे। उनके बाद हिंदी साहित्य की दुनिया के प्रतिष्ठित हस्ताक्षर प्रो. गंगा प्रसाद विमल बोलने आये। उन्होंने बिना लाग-लपेट के अखबार मालिकों और संपादकों पर हमला बोल दिया। बोले- आज हमारे बीच अखबारों की संख्या और प्रसार में बहुत वृद्धि हो गयी है लेकिन अखबारों ने आम पाठक की चिंता करना छोड़ दिया है। उन्होंने अपने वक्तव्य में मीडिया जगत पर तीन गम्भीर आरोप लगाये-

  1. अत्यल्प को छोड़कर अधिकांश संपादक बिचौलिए की भूमिका निभा रहे हैं।
  2. अंग्रेजी अखबारों ने भारतीय भाषा के अखबारों के साथ घोर दुष्कृत्य किया है।
  3. एक आम पत्रकार के लिए ‘प्रोफ़ेशनलिज़्म’ का सीधा अर्थ है अपने मालिक के लिए पैसा खींचना।

अपनी बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि आजकल मनुष्यता का सवाल कहीं नहीं उठाया जा रहा है। एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य के साथ क्या व्यवहार होना चाहिए इसपर कुछ उच्‍च आदर्शात्मक (lofty) किस्म की बातें प्राथमिक स्तर की स्कूली किताबों में भले ही मिल जाय लेकिन अखबारों और दूसरी मीडिया से यह गायब हो गयी हैं। आजकल ऊँची तनख्वाह पर काम करने वाले बड़े पत्रकार अपने मालिक के ‘टटके गुलाम’ हो गये हैं। व्यावसायिक हित सर्वोपरि हो गया है। भारत की सांस्कृतिक विरासत को समझना, इसे मिटाने के वैश्विक षड़यंत्र को पहचानना और उसे निष्फल करने के लिए देश को तैयार करने की जिम्मेदारी मीडिया में बैठे बुद्धिजीवियों की है; लेकिन इनके बीच ऐसे लोग घुसे हुए हैं जिनका एजेंडा ही अलग है। आज मीडिया को बाहर से कम चुनौतियाँ दरपेश हैं। भीतर के लोगों से ही खतरा है जिनसे लड़ना जरूरी हो गया है।

इनके बाद बोलने की बारी सत्र की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलपति विभूतिनारायण राय की थी। उनके बोलने से पहले श्रोताओं को पूर्व वक्ताओं से प्रश्न करने का अवसर दिया गया। अनेक छात्र तो जैसे इसी पल का इंतजार कर रहे थे। प्रश्नों की झड़ी लग गयी। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ  की ऐसी रूपरेखा की कल्पना कदाचित्‌ आदर्श पत्रकारिता का स्वप्न पाल रहे विद्यार्थियों ने नहीं की होगी। मुनाफ़ा कमाने के हिमायती प्रबंध संपादक को अपनी स्थिति स्पष्ट करने दुबारा आना पड़ा। भारतीय समाज में व्याप्त अन्याय और शोषण के विरुद्ध आम जनता को न्याय दिलाने और उसके लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करने के माध्यम के रूप में इन समाचार माध्यमों की जवाबदेही के प्रश्नों का उनके पास फिर भी कोई जवाब नहीं था। प्रश्नों का शोर जब थमने का नाम नहीं ले रहा था तब कुलपति जी ने माइक सँभाला।VNRai-last-words

बोले- पूर्व के एक वक्ता की यह धारणा कि चालीस पेज़ के अखबार के लिए दो रूपये देने वाले पाठक कोई हक नहीं रखता सर्वथा ग़लत  है। अखबार मालिक ने अपनी पूँजी जरूर लगा रखी है लेकिन पाठक के stakes अखबार वालों से ज्यादा हैं। उसका पूरा जीवन ही दाँव पर लगा है। वह ज्यादा बड़ा जोखिम उठा रहा है। मार्क ट्वेन को उद्धरित करते हुए उन्होंने कहा- “If you don’t read newspapers, you are uninformed; but if you read newspapers you are misinformed’’

आज जिस ठसक के साथ अखबार के पूँजीपति मालिक के मुनाफ़े के हक में दलील दी जा रही है वह कभी शर्म की बात मानी जाती थी। कोई संपादक या दूसरे बुद्धिजीवी ऐसी बात कहते झेंपते थे। लेकिन अब समय बदल गया है। यह बिडम्बना ही है कि आम जनता में ही दोष निकाले जा रहे हैं। यह वैसा ही है जैसा ब्रेख्त ने कहा था कि राजा अब बदला नहीं जा सकता इसलिए अब प्रजा को ही बदल देना होगा। यह स्थिति कतई ठीक नहीं है। जनता के प्रति अखबार की जिम्मेदारी उस प्रकार की नहीं है जैसी किसी फैक्ट्री मालिक की अपने उत्पाद के ग्राहकों के प्रति।

उन्होंने अपनी बात स्पष्ट करने के लिए प्रसिद्ध संपादक स्व.राजेंद्र माथुर जी के साथ अपनी एक बहस का हवाला दिया। वृंदावन में आयोजित एक गोष्ठी में राजेन्द्र माथुर जी ने कुछ ऐसे ही विचार रखते हुए कहा था कि एक स्टील कारखाना लगाने वाला उद्योगपति अथवा साबुन की फैक्ट्री चलाने वाला मालिक अपने निवेश पर लाभ कमाने के लिए स्वतंत्र है; लेकिन अखबार निकालने के लिए करोड़ो खर्च करने वाला हमारा मालिक यदि कुछ मुनाफ़ा कमाना चाहता है तो आपको यह बुरा क्यों लगता है? उस समय (1980 के दशक) की परिस्थितियों को देखते हुए यह बड़ा ही साहसिक वक्तव्य था। उनकी इस बात का विरोध उस समय भी हुआ था और आज भी इस तरह की सोच को नकारा जाना चाहिए।

कुलपति जी ने बताया कि स्टील या साबुन का कारखाना चलाने की तुलना में अखबार निकालना एकदम अलग किस्म का कार्य है। यदि किसी कारणवश स्टील या साबुन की फैक्ट्री बंद होने की नौबत आ जाय तो उससे आम जनता आंदोलन नहीं करती। लेकिन अखबार पर यदि किसी तरह की पाबंदी लगती है तो जनता सड़कों पर उतर आती है। राजीव गांधी के जमाने में सेंसरशिप कानून लगाने की कोशिश हुई तो पूरे देश में उबाल आ गया था। मीडिया को जो शक्तियाँ मिली हुई हैं वह इसी पाठक ने दी हैं। दो रूपये में अखबार देकर आप न तो एहसान कर रहे हैं और न ही घाटे में है। आप करोड़ों के विज्ञापन इसी जनता के कारण पाते हैं।

बाद के सत्रों में साधना चैनल प्रमुख व ब्रॉडकास्टिंग एडीटर्स एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी एन.के.सिंह, आईबीएन के वरिष्‍ठ संवाददाता अनन्‍त विजय, दैनिक भास्‍कर के समूह संपादक प्रकाश दूबे, लोकमत समाचार- नागपुर के संपादक गिरीश मिश्र, सुपसिद्ध न्यूज एंकर और स्‍तंभकार पुण्‍य प्रसून वाजपेयी, हिंदुस्तान टाइम्स के प्रदीप सौरभ इत्यादि ने विस्तार से प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों की वस्तुनिष्ठता, सामाजिक सरोकार और जिम्मेदारियों को समझने के बारे में सुंदर वक्तव्य दिये।

प्रो.गंगा प्रसाद विमल और विभूतिनारायण राय द्वारा लगाये गये आरोपों (बिचौलियापन व भ्रष्ट आचरण) पर अनंत विजय ने गम्भीर आपत्ति दर्ज़ करते हुए कहा कि हमारे बारे में इस प्रकार का सामूहिक आरोप लगाने के पहले  आपको सबूत जुटाना चाहिए। आप एक जिम्मेदार पद पर रहते हुए जब भी कुछ कहते हैं तो पूरा देश उसपर ध्यान देता है और अपनी राय बनाता है।

उक्त आपत्ति का जवाब देते हुए कुलपति जी ने अपनी पूरी बात दुहराते हुए अंत में कहा कि इस समय जब हमारे समाज के सभी अंग भ्रष्टाचार की सीढ़ियाँ चढ़ रहे हैं, मैं अपनी उस मूर्खता को कोस रहा हूँ जो एक स्वस्थ और ईमानदार मीडिया की इच्छा रखती है। लेकिन यदि हमने आशावाद नहीं बनाये रखा तो जल्दी ही हम cynical state में चले जाएंगे।

 

इस कार्यक्रम से संबंधित कुछ और रिपोर्टें यहाँ और यहाँ हैं।

Infotainment के दौर में भी नैतिक मूल्यों को बचाये रखना और जीवन से इनके जुड़ाव को रेखांकित करना एक सजग संपादक की जिम्मेदारी है।

प्रो.राम मोहन पाठक, वाराणसी

लोकतंत्र के सारे स्तंभ धराशायी हो रहे हैं, मीडिया भी। पत्रकारों को अपना कैनवास बड़ा करना होगा और विश्वसनीयता (credibility) बनाये रखनी होगी।

पुण्य प्रसून वाजपेयी- ZEE News

द्रौपदी के चीर हरण के समय भीष्म की भाँति यदि आज की मीडिया खामोश रह गयी तो लोकतंत्र की वेदी पर दुबारा महाभारत होगा।

गिरीश मिश्र, संपादक-लोकमत समाचार

ज्यादातर संपादक आजकल मालिक के लिए बिचौलिये की भूमिका निभा रहे हैं। पत्रकार का प्रोफ़ेशनलिज़्म मालिक के लिए पैसा खींचना हो गया है।

प्रो.गंगा प्रसाद विमल, जे.एन.यू. (से.नि.)

सबको समान रूप से आरोपित करना ग़लत है। मीडिया में अच्छे लोग भी काम कर रहे हैं। टीआरपी के आँकड़े दोषपूर्ण हैं। लाइसेंसिंग प्रक्रिया में सुधार जरूरी।

अनंत विजय- आई.बी.एन.

अब क्षेत्रीय अखबार की परिभाषा बदल रही है। वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने भाषाई अखबारों का बड़ा नुकसान किया है। मत्स्य न्याय का वातावरण बन गया है।

प्रदीप सौरभ- मीडिया समीक्षक, स्वतंत्र पत्रकार नयी दिल्ली

मीडिया का स्वरूप तकनीक ने बदल दिया है। अब इसकी पहुँच और रफ़्तार दोनो बढ़ चुकी है। हमें इसके साथ तालमेल बिठाना होगा।

प्रो.प्रदीप माथुर, IIMC, N.Delhi

मिशनरी पत्रकारिता का स्थान कमीशनरी पत्रकारिता ने ले लिया है। क्षेत्रीय पत्रकारों से लोग वैसे ही डरते हैं जैसे पुलिस से।

राजकिशोर, स्तम्भकार व राइटर इन रेजीडेंस, वर्धा वि.वि.

संपादक नामक संस्था का क्षरण हो रहा है। अब व्यावसायिक मालिक की महत्ता बढ़ गयी है। पत्रकारों को पैसा अधिक मिल रहा है लेकिन आजादी छिन गयी है।

शीतला सिंह- जनमोर्चा, फैज़ाबाद 

(compulsive corruption) भ्रष्टाचार अब मजबूरी भी हो गयी है। न केवल सरकारी क्षेत्र में बल्कि मिडिया जगत में भी।

सोमनाथ पाटील- सकाळ, पुणे

स्थानीय जरूरतों के हिसाब से मीडिया को अपना स्वरूप बदलना होगा। भविष्य का मीडिया ‘कम्यूनिटी रेडियो’ होगा। इसमें मालिकाना नियंत्रण स्थानीय समूह का ही होगा।

डॉ.गिरिजा शंकर शर्मा, आगरा

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

क्या अखबार का पाठक चिरकुट है…?

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राष्ट्रीय संगोष्ठी में बहस का मुद्दा बना एक प्रबंध संपादक का बयान

देश की प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रतिनिधि इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में जुटे थे। विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता की शिक्षा देने वाले प्रोफ़ेसर, बड़े अखबारों के संपादक और न्यूज चैनेल्स के एंकर सिर जोड़कर वर्धा विश्वविद्यालय के पत्रकारिता के छात्रों और अकादमिकों को मीडिया की असली दुनिया से परिचित करा रहे थे। मिशनरी पत्रकारिता पर बहस चल रही थी। मीडिया द्वारा मिशन छोड़कर व्यावसायिकता की ओर मुड़ जाने पर चिंता व्यक्त की जा रही थी। मीडिया और राडिया के अंतर्सम्बन्ध खंगाले जा रहे थे। तभी एक प्रतिष्ठित अखबार के प्रबंध संपादक ने यह मंतव्य रखा कि जब एक साबुन की टिकिया के लिए लोग अपना अखबार बदल देते हैं तो उनसे प्रतिबद्धता की उम्मीद क्या की जाय। दो-ढाई रूपये देकर क्या उन्होंने अखबार के मालिक को खरीद लिया है जो उससे मिशन और नैतिकता की अपेक्षा करते हैं?

पाठकों को उक्त प्रकार से चिरकुट बताने से पहले उन्होंने पत्रकारों को भी उनकी औकात बताने की कोशिश की। बोले- आप इस भ्रम में मत रहिएगा कि यह राज-काज आपके भरोसे चल रहा है। आपकी स्थिति उस छिपकली जैसी है जो छत से चिपककर यह भ्रम पाल बैठी है कि इसे उसी ने रोक रखा है; या हाथी की पीठ पर बैठी उस मक्खी की तरह है जो उसे छोड़कर अकेले जंगल में इसलिए नहीं जाने देती कि उसके बिना इसकी (हाथी की) रक्षा नहीं हो सकेगी।

उनके पहले के वक्ताओं ने “मिशनरी पत्रकारिता- संदर्भ और प्रासंगिकता” नामक विषय पर बोलते हुए देश में लगातार बढ़ रहे भ्रष्टाचार, माफ़ियागीरी, घोटालों, इत्यादि के परिप्रेक्ष्य में मीडिया की भूमिका पर अनेक सुंदर व्याख्यान दिए थे और भविष्य के मीडियाकर्मियों को उनकी बढ़ती जिम्मेदारियों का बोध कराने का प्रयास किया था। चहुँओर निराशा के घने बादलों के बीच आशा का एक मात्र सूरज समाज के चौथे स्तंभ को बताया गया था। तब प्रबंध सम्पादक जी ने अपनी बात की शुरुआत एक रोचक कहानी से की थी-

बताने लगे- एक वृद्ध मौलवी लैंप पोस्ट के नीचे सड़क पर बहुत देर से कुछ ढूँढ रहा था।  एक नौजवान को उसकी परेशानी देखी नहीं गयी। सहायता करने की गर्ज़ से पूछा- बाबा क्या खोज रहे हो?

“बेटा, मैं अपनी टोपी सी रहा था, अचानक सुई हाथ से गिर गयी। वही ढूँढ रहा हूँ लेकिन मिल नहीं रही है” मौलवी ने तफ़सील से बताया।

“अच्छा बताइए टोपी कहाँ सिल रहे थे और सूई ठीक कहाँ गिरी? मैं खोजता हूँ।” युवक ने सहानुभूति दिखायी।

“बेटा सुई तो मस्ज़िद में गिरी थी लेकिन वहाँ बहुत अंधेरा है इसलिए यहाँ रोशनी में ढूँढ रहा हूँ।”

हाल में ठहाका लगना तय था ही। तालियाँ थमीं तो उक्त वक्ता ने बताया कि आज यहाँ की चर्चा भी कुछ इसी प्रकार की हो रही है। समस्या की असली जड़ जहाँ है उसे कोई नहीं देखना चाहता। सबका समाधान मीडिया से कराना चाहता है। देश की सरकारें भ्रष्ट है, संसद अपना काम नहीं कर पा रही। न्यायालय भी संदेह से परे नहीं रह गये हैं। उद्योगपति तेजी से अपना पैसा बढ़ा रहे हैं। गुप्त गठबंधन हो रहे हैं। हर आदमी लाभ कमाने के उद्यम में लगा है, लेकिन मीडिया को नैतिकता और मिशन का पाठ पढ़ाया जाता है। जब हम मीडिया में प्रोफ़ेशनलिज़्म की बात करते हैं तो इसे गाली समझा जाता है। आजादी से पहले अखबारों ने एक मिशन के साथ काम किया था- देश को गुलामी से मुक्त कराने का मिशन। लेकिन आज स्थिति वैसी नहीं है। आज यह अन्य प्रोफेशन्स की तरह एक पेशा के रूप में क्यों नहीं पहचाना जाना चाहिए? अख़बार या टीवी चैनेल का जो मालिक करोड़ो रुपये का पूँजी निवेश करता है उसे लाभ कमाने के बारे में क्यों नहीं सोचना चाहिए? मात्र दो रूपये में चालीस पृष्ठ का अखबार आपके दरवाजे पर पहुँचाने का प्रबंध करने वाला अखबार मालिक आपके बारे में कितना सोचे जब आप दो रुपये की साबुन की टिकिया पाने के लिए अपना वर्षों पुराना अखबार बदल देते हैं। आपकी कोई प्रतिबद्धता नहीं है तो अखबार चलाने वालों से आप क्या अपेक्षा रखते हैं?

उन्होंने अखबार पहुँचाने वाले हॉकर के प्रति पाठकों के रूखे व्यवहार का वर्णन भी किया कि कैसे वह विपरीत मौसम में भी सुबह छः बजे घर पर अखबार पहुँचाता है और कभी देर हो जाने पर सुबह की चाय का स्वाद खराब कर देने का दोषी बन जाता है। बिना नागा किए तीस दिन अखबार देने के बाद जब वह पैसा लेने पहुँचता है तो महानुभावों को  ‘आज नहीं कल’ का जवाब देते देर नहीं लगती। “ऐसे लोग जब बिना जाने समझे अखबार के मालिक, अखबार के सम्पादक और अखबार के रिपोर्टर पर आरोप लगाते हैं तो मुझे आपत्ति होती है।”

कोई भी व्यवसाय जब प्रारम्भ किया जाता है तो उसकी प्रगति का लक्ष्य निर्धारित किया जाता है। लाभ कमाना एक सर्वमान्य लक्ष्य है। उसके लिए जरूरी उपाय तलाशे जाते हैं और उन्हें अपनाया जाता है। स्वतंत्रता मिलने के बाद पत्रकारिता भी किसी अन्य  व्यवसाय की तरह कुछ लक्ष्यों की पूर्ति के उद्देश्य से आगे बढ़ी। समय के साथ तालमेल बिठा कर चलने वाले सफल हुए। यह कार्य आज भी एक मिशन बना हुआ है, लेकिन इसका स्वरूप बदल गया है। आज पत्रकारिता ‘स्वांतः सुखाय’ नहीं है।

धारा प्रवाह बोलते हुए उन्होंने एक-दो और चुटकुले और आख्यान सुनाये और बोले- यह अजीब स्थिति है कि प्रायः सभी पत्रकार अपने प्रबंधन को कोसते रहते हैं। उनके अनैतिक कार्यों और शोषक प्रवृत्तियों का रोना रोते हैं। लेकिन वे ही जब स्वयं प्रबंधक अर्थात्‌ मालिक बन जाते हैं तो वे सारी मिशनरी बातें हवा हो जाती हैं और वे सभी बुराइयाँ अपना लेते हैं जिन्हें कोसते इनका समय बीता है। फिर उन्होंने जोड़ा कि इन सारी बातों के बावजूद आज भी जब देशहित का मुद्दा उठता है तो देश की पूरी मीडिया एकजुट होकर आवाज उठाती है। उन्होंने इसके कई उदाहरण भी गिना डाले।

अपने को एक अदना सा पत्रकार बताते हुए उन्होंने ‘छोटे-छोटे प्रयासों का महत्व’ रेखांकित करने के लिए उस गिलहरी की कथा सुनायी जिसने समुद्र पर रामसेतु के निर्माण की प्रक्रिया में योगदान कर्ताओं की सूची में अपना नाम लिखाने के लिए बार-बार तट पर लोटपोट कर शरीर में रेत बटोरने और पुल पर जाकर शरीर झाड़ देने का उद्यम किया था। ताकि भविष्य में इतिहास लिखने वाले यह न लिखें कि जब सारा  बानर समाज पुल बना रहा था तो वहाँ मौजूद एक गिलहरी कुछ नहीं कर रही थी। अस्तु कुछ न कुछ यथा सामर्थ्य करते रहना चाहिए। इसके बाद उन्होंने एक जोरदार वीररस की कविता सुनायी। मैं एक ही पंक्ति नोट कर पाया क्योंकि उन्होंने दुहराया नहीं था। हाल को गुँजाने वाली तालियाँ बजीं और अगले वक्ता बुलाये गये।

यहाँ तक तो सब ठीक-ठाक रहा लेकिन जब प्रश्न-उत्तर का दौर चला तो प्रबंध-संपादक महोदय को उठकर सफाई देनी पड़ी। छात्र श्रोताओं के तीखे प्रहार वाकई बेचैन करने वाले थे। अंततः कुलपति जी को अध्यक्षीय भाषण में इस मसले पर अंतिम बात कहनी पड़ी। वह बहुत ही मार्मिक और सजग करने वाली बात थी। लेकिन उसकी चर्चा अगली कड़ी में। अभी तो आप उस वीररस की कविता का आनंद लेते हुए इस ‘चिरकुटई के आरोप’ का जवाब दीजिए।

गूगल महराज ने उस एक लाइन का ‘जामन’ लेकर पल भर में अपने क्षीर सागर के भंडार से पूरी कविता की दही परोस कर रख दी।

वह लाइन थी-

हम वो कलम नहीं हैं जो बिक जाती हों दरबारों में
हम शब्दों की दीप- शिखा हैं अंधियारे चौबारों में

इस लंबी कविता के मूल कवि हैं डॉ. हरिओम पवार। इसके आगे पीछे की कुछ और लाइनें यहाँ आपके लिए। पूरी कविता यहाँ है।

इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

कोई रूप नहीं बदलेगा सत्ता के सिंहासन का
कोई अर्थ नहीं निकलेगा बार-बार निर्वाचन का
एक बड़ा ख़ूनी परिवर्तन होना बहुत जरुरी है
अब तो भूखे पेटों का बागी होना मजबूरी है

जागो कलम पुरोधा जागो मौसम का मजमून लिखो
चम्बल की बागी बंदूकों को ही अब कानून लिखो
हर मजहब के लम्बे-लम्बे खून सने नाखून लिखो
गलियाँ- गलियाँ बस्ती-बस्ती धुआं-गोलियां खून लिखो

हम वो कलम नहीं हैं जो बिक जाती हों दरबारों में
हम शब्दों की दीप- शिखा हैं अंधियारे चौबारों में
हम वाणी के राजदूत हैं सच पर मरने वाले हैं
डाकू को डाकू कहने की हिम्मत करने वाले हैं

जब तक भोली जनता के अधरों पर डर के ताले हैं
तब तक बनकर पांचजन्य हम हर दिन अलख जगायेंगे
बागी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

अगवानी हर परिवर्तन की भेंट चढ़ी बदनामी की
हमने बूढ़े जे.पी. के आँसू की भी नीलामी की
परिवर्तन की पतवारों से केवल एक निवेदन था
भूखी मानवता को रोटी देने का आवेदन था

अब भी रोज कहर के बादल फटते हैं झोपड़ियों पर
कोई संसद बहस नहीं करती भूखी अंतड़ियों पर
अब भी महलों के पहरे हैं पगडण्डी की साँसों पर
शोकसभाएं कहाँ हुई हैं मजदूरों की लाशों पर

निर्धनता का खेल देखिये कालाहांडी में जाकर
बेच रही है माँ बेटी को भूख प्यास से अकुलाकर
यहाँ बचपना और जवानी गम में रोज बुढ़ाती हैं
माँ , बेटे की लाशों पर आँचल का कफ़न उढाती है

जब तक बंद तिजोरी में मेहनतकश की आजादी है
तब तक हम हर सिंहासन को अपराधी बतलायेंगे
बाग़ी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

 

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

इलाहाबाद से वर्धा की ओर…

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मित्रों,

packers and movers अब से करीब ढाई साल पहले जो यात्रा मैंने अन्तर्जाल की दुनिया पर शुरू की थी वह मुझे ऐसे विलक्षण अवसर उपलब्ध कराएगी यह मैने सपने में भी सोचा न था। लेकिन आज जब मैं इलाहाबाद छोड़कर जा रहा हूँ तो मन में अद्‌भुत उपलब्धि का भाव हिलोरें ले रहा है। इसे प्रयाग की पुण्य भूमि की उपलब्धि मानूँ, अपने सरकारी ओहदे की कामयाबी मानूँ या साहित्य के नाम पर सृजित अपनी अनगढ़ ब्लॉग पोस्टों की सफलता मानूँ, यह तय करना मुश्किल है। शायद यह इन सबका मिला-जुला प्रतिफलन हो। मैं तो मानता हूँ कि यह मेरे इष्ट-मित्रों की शुभकामनाओं, वरिष्ठ ब्लॉग लेखकों के मार्गदर्शन, परिवारीजन के सहयोग और समर्थन, बड़े-बुजुर्गों के आशीर्वाद और ईश्वर की कृपा के बिना कत्तई सम्भव नहीं था।

यूँ तो नौकरी में स्थानान्तरण कोई असामान्य घटना नहीं है, लेकिन जिस रूप में यह इसबार मुझे मिला है वह सरकारी कायदे के जानकारों को भी अचम्भित करने वाला है। उत्तर प्रदेश सरकार की कोषागार सेवा (राज्य वित्त एवं लेखा सेवा, उ.प्र.) का एक अधिकारी किसी केन्द्रीय विश्वविद्यालय में अपनी सेवाएं देने का अवसर प्राप्त करे तो यह उसके लिए गौरव की बात है। दुर्लभ तो है ही।

मैं आन्तरिक सम्परीक्षा अधिकारी (Internal Audit Officer)  के पद पर अपनी सेवाएं देने के लिए महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा(महाराष्ट्र) में तीन वर्ष के लिए जा रहा हूँ। अपने मूल प्रोफ़ेशन से मेल खाता यह कार्य मुझे अच्छा तो लगेगा ही, लेकिन असली आकर्षण इस बात में है कि यहाँ हिन्दी भाषा को एक कामकाजी भाषा बनाने व विविध विषयों के ज्ञान भण्डार को हिन्दी में उपलब्ध कराने के जिस अनुष्ठान में यह विश्वविद्यालय लगा हुआ है उसमें कुछ विशेष योगदान करने का अवसर  मुझे भी मिलेगा। हिन्दी ब्लॉग जगत के असंख्य मित्रों से भेंट-मुलाकात और विचार गोष्ठियों में प्रतिभाग के अवसर भी मिलेंगे। विश्वविद्यालय में चिट्ठाकारी पर राष्ट्रीय स्तर का सम्मेलन तो प्रतिवर्ष होगा ही।

इलाहाबाद से मुझे पढ़ाई के दिनों से ही बहुत कुछ मिलता रहा है। नौकरी पाने की जद्दोजहद यहीं से शुरू हुई थी और पिछली बार जब मैने इस शहर से विदा ली थी तो उस समय भी नई नौकरी ज्वाइन करने के लिए ही जाना हुआ था। इस बार भी मैं पुनः एक नयी नौकरी शुरू करने जा रहा हूँ। प्रयाग की धरती को शत्‌-शत्‌ नमन।

मैं अपना घरेलू सामान ट्रक के हवाले करने के बाद अपनी कार से ही सपरिवार वर्धा की यात्रा करने का कार्यक्रम बना चुका हूँ। बाइस जून की सुबह हम चल पड़ेंगे वर्धा की ओर। शाम को जबलपुर पहुँचकर रात्रि विश्राम करने से पहले वहाँ के  चिठ्ठाकार मित्रों के साथ भेंट-मुलाकात का कार्यक्रम भी होगा। National Research Centre for Weed science, Mahrajpur Adhartal Jabalpur  के अतिथिगृह में हमें पहुँचना है। मुझे समीर जी ‘उड़न तश्तरी’ की नगरी में अपने दोस्तों से मुलाकात की बेसब्री प्रतीक्षा है।

अभी फिलहाल इतना ही। शेष बातें वर्धा पहुँचने के बाद होंगी। इलाहाबाद से कदाचित्‌ यह मेरी आखिरी पोस्ट होगी। अब वर्धा में स्थापित होने के बाद जल्द ही इसके आगे के अनुभव आप सबकी सेवा में प्रस्तुत करूंगा।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

अनूप जी, अब सम्हालिए… सेमिनार तय हो गया!!

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पिछली पोस्ट में मैने जिस सेमिनार के न हो पाने की बात बतायी थी उसके आयोजन की तैयारी में आदरणीय अनूप शुक्ल जी ने बहुत समय खर्च किया था। जाने कितने चिठ्ठाकारों से चर्चा में लगे रहे। इन्होंने जाने कितने आदि, अनादि, अनामय, अविचल, अविनाशी चिठ्ठाकार भाइयों, बहनों और दोस्तों को इस राष्ट्रीय सेमिनार के स्वरूप के बारे में बताया होगा। अनेक प्रतिष्ठित और ‘स्टार’ ब्लॉगर जन को न्यौता भी इन्होंने ही दिया था। मैं तो सिर्फ़ इनका पता जानता था सो सारी बातें इन्हीं को बता देता था।

जब अचानक कार्यक्रम टलने की बात प्रकट हुई तो मुझे सबसे बड़ी कठिनाई यह समाचार फुरसतिया जी को बताने में हुई। अपने से अधिक निराश मैने इन्हें पाया था। करीब दो सप्ताह का उत्साह दो मिनट में ठण्डा पड़ गया था। उधर मेरे बड़े भाई डॉ. अरविन्द मिश्र जी ने मुझे पहले ही आगाह किया था कि जब तक सब प्रकार से बात पक्की न हो जाय और बजट की व्यवस्था सुनिश्चित न हो जाय तबतक हाथ न डलियो। इसलिए जब उन्होंने स्थगन का समाचार सुना था तो थोड़े दुखी तो जरूर हुए लेकिन अपनी भविष्यवाणी के सच होने पर उनके मन में एक स्थितिप्रज्ञ का सन्तोष भाव भी जरूर था।

लेकिन अब तो कहानी बदल गयी है। अब “बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेहु…” की पॉलिसी पर चलना है।

अब अनूप जी को अपना पहले का किया श्रम व्यर्थ नहीं लगना चाहिए। कार्यक्रम की रूपरेखा जो हमने तब तय की थी कमोबेश वही रहने वाली है। शीघ्र ही महात्मागांधी अन्तर राष्ट्रीय  हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के अधिकारियों के साथ इलाहाबाद में बैठकर हम कार्यक्रम को अन्तिम रूप देंगे। अतिथियों की सूची भी वहीं तय हो पाएगी, लेकिन हिन्दी ब्लॉगजगत का सच्चा प्रतिनिधित्व कराने का पूरा प्रयास होगा। आदरणीय अनूप जी, अरविन्दजी, ज्ञानदत्तजी, आदि ने सदैव मेरे प्रति जो स्नेह का भाव रखा है उसी की ऊर्जा से मैं यह आयोजन करा पाने का आत्मविश्वास सजो पा रहा हूँ।

हिन्दुस्तानी एकेडेमी द्वारा इस अवसर पर एक महत्वाकांक्षी योजना बनायी गयी है। आप सभी इसमें सक्रिय सहयोग दें। एक अनूठी कृति आकार लेने वाली है। निस्संकोच होकर अपना योगदान सुनिश्चित करें। एकेडेमी के सचिव डॉ.एस.के. पाण्डेय जी ने उस अनुपम प्रकाशन का लोकार्पण २३ अक्टूबर के उद्‌घाटन सत्र में कराने का निश्चय अभी कर लिया है, जबकि प्रकाश्य सामग्री का एक भी शब्द अभी तय नहीं हुआ है। लेकिन हमें पूरा विश्वास है कि एक जोरदार पुस्तक उस तिथि तक आपके सामने होगी। बस आप अपनी प्रविष्टियाँ तत्काल भेंज दीजिए। कहाँ और कैसे? यह जानने के लिए एकेडेमी के ब्लॉग पृष्ठ पर पधारें।

अस्तु, हे अनूप जी! आगे का जिम्मा आपै सम्हारौ। हम त चलै माता रानी का आशीष बटोरै…  अरविन्द जी यदि चुनाव कराने में नहीं लगाये गये तो बाकी सब काम उनके लिए बहुत सरल हो जाएगा।

वैष्णो देवी धाम से लौटकर जब मैं वापस आऊंगा तो एकेडेमी के मेल-बॉक्स में सैकड़ों प्रविष्टियाँ आ चुकी होंगी। उनको छाँटने-बीनने के बाद संपादक मण्डल किताब को अन्तिम रूप देने में अधिकतम सात दिन लेगा और मुद्रक किताब बनाकर देने में सात दिन और लेगा। बस तबतक ब्लॉगिंग का महाकुम्भ भी आ ही जाएगा। किताब का लोकार्पण भी लगे हाथों हो जाएगा।

अब तो हम यह पोस्ट ठेलकर ट्रेन में बैठ जाएंगे। एक सप्ताह बाद लौटकर जुट जाएंगे इस महामेला की तैयारी में। तबतक अनूप जी अपने तरीके से तैयारी पूरी ही कर डालेंगे। बस मौजा ही मौजा… 🙂

ब्लॉग की किताब चल कर आयी…

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मुखपृष्ठ सत्यार्थमित्र... आज स्वतन्त्रता दिवस है, और आज मेरी पुस्तक प्रेस से छूटकर मेरे घर आ गयी है। हिन्दुस्तानी एकेडेमी ने इसे छापकर निश्चित रूप से एक नयी शुरुआत की है। कहना न होगा कि आज मैं बहुत प्रसन्न हूँ।

ब्लॉग की किताब छापना व्यावसायिक रूप से कितना उपयोगी है इसका पता शायद इस किताब पर पाठकों की प्रतिक्रिया से पता चलेगा। अलबत्ता जिस संस्था ने इसका प्रकाशन किया है, उसके पास अपने उत्पादों के विपणन का कोई नेटवर्क नहीं है। पुराने जमाने में देश भर के लब्ध प्रतिष्ठ साहित्यकार यहाँ आते रहते थे और एकेडेमी के बिक्री काउण्टर पर उपलब्ध प्रकाशनों को खरीदते थे और अपने शहर जाकर इसके बारे में बताते थे। इसप्रकार यहाँ की धीर गम्भीर, व शोधपरक पुस्तकें धीरे-धीरे लम्बे समय में बिकती थीं। कुछ खरीद सरकारी पुस्तकालयों द्वारा की जाती थी।

पहली बार लोकप्रिय श्रेणी की एक ऐसी हल्की-फुल्की पुस्तक प्रकाशित हुई है जिसे आमपाठक वर्ग को आकर्षित करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। लेकिन आम पाठकों तक इसे पहुँचाने का सही माध्यम क्या है, इसकी जानकारी हमें नहीं है। एकेडेमी द्वारा भी इस दिशा में कोई स्पष्ट व सुविचारित नीति अपनाये जाने का उदाहरण नहीं मिला है।

अतः मैं यहाँ अपने शुभेच्छुओं, मित्रों और वरिष्ठ चिठ्ठाकारों से अनुरोध करता हूँ कि वे इस सद्यःप्रकाशित ब्लॉग की किताब के प्रचार-प्रसार और बिक्री के कारगर उपाय सुजाने का कष्ट करें।

सत्यार्थमित्र आवरणसत्यार्थमित्र पुस्तक का आवरण 

इस पुस्तक में मेरे ब्लॉग सत्यार्थमित्र पर प्रकाशित अप्रैल-२००८ से मार्च-२००९ तक की कुल १०१ पोस्टों में से चयनित ६५ पोस्टें संकलित की गयी हैं। प्रत्येक पोस्ट के अन्त में कुछ चुनिन्दा टिप्पणियों के अंश भी दिये गये हैं। ऐसी टिप्पणियों को स्थान दिया गया है जिनसे कोई नयी बात विषयवस्तु में जुड़ती हो।

पुस्तक के अन्त में दिए गये परिशिष्ट में हिन्दी ब्लॉगजगत के सर्वाधिक सक्रिय ४० चिठ्ठों का नाम-पता दिया गया है जिनका सक्रियता क्रमांक चिठ्ठाजगत द्वारा निर्धारित है।

कुल २८८ पृष्ठों के इस सजिल्द संस्करण का बिक्री मूल्य रु.१९५/- मात्र रखा गया है। इसपर एकेडेमी की नीति के अनुसार छूट की व्यवस्था भी है।

तो देर किस बात की… आइए प्रिण्ट माध्यम में हिन्दी ब्लॉगजगत का एक झरोखा खोलने के इस अनुष्ठान में अपना भरपूर योगदान करें। इसके बारे में उन्हें बतायें जो अभी अन्तर्जाल की सुविधा से नहीं जुड़ सके हैं। पुस्तक प्राप्त करने का तरीका हिन्दुस्तानी एकेडेमी के जाल पते पर उपलब्ध है।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

लोकतन्त्र के भस्मासुर

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“कृपया मेरे सच बोलने पर नाराज न होइए; कोई भी व्यक्ति जो इस नगर-राज्य में घट रही अनेक अन्यायपूर्ण व गैरकानूनी घटनाओं को रोकने की कोशिश करेगा; और आपका या किसी अन्य ‘भीड़’ का सच्चा विरोध करेगा वह बच नहीं पाएगा। कोई भी व्यक्ति जो न्याय के लिए वास्तविक संघर्ष करता है, उसे यदि जीने की थोड़ी भी इच्छा है तो उसे सार्वजनिक जीवन त्याग कर निजी ज़िन्दगी बितानी होगी।” (एपॉल्जी से)

image यह उद्‍गार ग्रीक दार्शनिक प्लेटो के गुरू सुकरात ने ‘जूरी’ के सामने भरी अदालत में तब व्यक्त किए थे जब उनके विरुद्ध देशद्रोह का मुकदमा चलाया जा रहा था। कुछ ही समय में वह जूरी उन्हें मृत्युदण्ड सुनाने वाली थी। प्लेटो ने अपने गुरू की मौत का कारण जिस राज-व्यवस्था को ठहराया उसे ‘डेमोक्रेसी’ कहा जाता था, जिसमें भींड़ द्वारा नितान्त अविवेकपूर्ण निर्णय लिए जाते थे, और प्रायः अन्यायपूर्ण स्थिति उत्पन्न हो जाती थी। वही डेमोक्रेसी आज दुनिया की सबसे लोकप्रिय, सर्वमान्य और सर्वाधिक व्यहृत शासन व्यवस्था हो गयी है। यह बात अलग है कि राजनीति विज्ञान के जानकार प्राचीन ग्रीक कालीन डेमोक्रेसी और आधुनिक ‘लोकतंत्र’ में जमीन-आसमान का अन्तर बताएंगे।

प्लेटो ने जिस नगर-राज्य को देखा था उसकी जनसंख्या इतनी छोटी होती थी कि राज्य के सभी नागरिक एक स्थान पर एकत्र होकर बहुमत से अपना शासक चुन लेते थे। भीड़ का एक बड़ा हिस्सा जिसे पसन्द करता था वही राजा होता था और उसके फैसले सभी नागरिकों पर बाध्यकारी होते थे। सिद्धान्त रूप में आज भी लोकतंत्र का मतलब यही है- जनता की सरकार, जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों की बहुमत आधारित सरकार।

लेकिन प्लेटो ने इस बहुमत की व्यवस्था का जो विश्लेषण किया, वह इसकी खामियों को उजागर करने वाला है, और कदाचित्‌ सच्चाई के करीब भी है। उन्होंने राज्य की तुलना एक व्यक्ति से की थी, और बताया था कि जिस प्रकार एक व्यक्ति के भीतर इन्द्रियबोध (sensation), चित्तवृत्ति (emotion), और बुद्धि (intelligence) के बीच उचित तालमेल से ही उसका सन्तुलित और स्वस्थ जीवन सम्भव है, उसी प्रकार राज्य के विभिन्न अवयवों के आपसी सामन्जस्य से ही न्यायपूर्ण राज-व्यवस्था स्थापित की जा सकती है। यदि बुद्धि-विवेक के ऊपर मन व शरीर में पलने वाले काम, क्रोध, मद व लोभ जैसे विकार हावी हो जाते हैं, तो व्यक्तित्व दोषयुक्त और अन्या्यपूर्ण हो जाता है। शरीर के ऊपर मन और मन के ऊपर मस्तिष्क का नियन्त्रण बहुत आवश्यक है। यदि नियन्त्रण की यह दिशा उलट-पु्लट जाय तो व्यक्ति नष्ट होने लगता है। पतन अवश्यम्भावी हो जाता है। यही स्थिति उस राज्य की भी होती है, जहाँ विवेक पर उन्माद हावी हो जाता है।

लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सभी व्यक्तियों को एक इकाई के रूप में बराबर माना जाता है। भले ही उनकी मानसिक और शारीरिक क्षमता तथा सामाजिक पृष्ठभूमि में भारी अन्तर हो। यह व्यवस्था इसी सिद्धान्त पर टिकी है कि राज्य/देश की सरकार चुनने में प्रत्येक व्यक्ति के मत का मान बराबर है। कोई किसी से कम या अधिक महत्व नहीं रखता। कुल मतदाताओं में से बहुमत जिसके पक्ष में हो, वही सरकार बनाता है। इस सरकार द्वारा जो भी निर्णय लिए जाते हैं वह उन अल्पमत वाले नागरिकों पर भी प्रभावी होता है जिनका मत इस सरकार के विरुद्ध रहा है।

सिद्धान्त रूप में इस व्यवस्था में कोई कमी नहीं नज़र आती; लेकिन व्यवहार में बहुत कुछ बदला हुआ नजर आता है। प्लेटो ने इन बदलावों पर कुछ प्रकाश डाला था। बहुमत की पसन्द कौन होता है? लोकप्रियता का पैमाना क्या है? व्यक्ति अपना नेता किसे चुनता है? जिसे देश की सम्पूर्ण जनता का ख़्याल रखना है; आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, सामरिक, राजनयिक, वाणिज्यिक आदि विषयों से सम्बन्धित लोकनीति बनानी है, उसका चुनाव करते समय जनता इन विषयों में उसकी प्रवीणता देखने के बजाय उसकी जाति, उसका धर्म व रंग देखती है; उसकी वक्तृता पर मोहित हो जाती है, किसी दूसरे क्षेत्र में उसके कौशल से प्रभावित हो लेती है; और अपना नेता चुन लेती है।

अच्छी भाषण कला में माहिर एक नेता किसी स्वास्थ्य सम्बन्धी मुद्दे पर आम जनता का मत एक डॉक्टर की अपेक्षा अधिक आसानी से बदल सकता है। वह कमजोर और निरीह नागरिकों  को भी शत्रु देश पर हमले के लिए तैयार कर सकता है, जो एक आर्मी-जनरल नहीं कर सकता। जनप्रतिनिधियों द्वारा प्रभावशाली भाषण के माध्यम से बड़े-बड़े जनसमूहों को सम्मोहित कर बेवक़ूफ बनाने और उनके अन्ध-समर्थन से अत्यन्त शक्तिशाली बन जाने के उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है।

फ्रेडरिक नीत्शे कहते थे कि उन्माद, पागलपन, मूर्खता या विक्षिप्तता के लक्षण किसी व्यक्ति के भीतर किंचित्‌ ही पाये जाते हैं; लेकिन एक समूह, दल, राष्ट्र या किसी ऐतिहासिक कालखण्ड में ये लक्षण एक अनिवार्य नियम जैसे मिलते हैं। एक भीड़ या समूह का हिस्सा बन जाने पर व्यक्ति के सोचने समझने का ढंग पूरी तरह बदल जाता है। भीड़ में उसकी मानसिकता भेंड़ जैसी हो जाती है। विवेक भ्रष्ट हो जाता है। इसी भीड़ द्वारा चुने गये प्रतिनिधि जब सरकार चलाते हैं तो सुकरात को जहर का प्याला पीना पड़ता है।

भारतवर्ष में लोकतंत्र का जो मॉडल चलाया जा रहा है, उसमें भी इस उत्कृष्ट सिद्धान्त का व्यावहारिक रूप किसी धोखे से कम नहीं है। यहाँ का समाज भी जाति, धर्म, कुल, गोत्र, क्षेत्र, रंग, रूप, अमीर, गरीब, अगड़े, पिछड़े, दलित, सवर्ण, निर्बल, सबल, शिक्षित, अशिक्षित, शहरी, ग्रामीण, उच्च, मध्यम, निम्न, काले, गोरे, स्त्री, पुरुष, आदि के पैमानों पर इतना खण्ड-खण्ड विभाजित है; और ये पैमाने हमारी लोक संस्कृति में इतनी गहरी पैठ बना चुके हैं, कि किसी भी मुद्दे पर आम सहमति या सर्वसहमति नहीं बनायी जा सकती। राष्ट्र-राज्य की परिकल्पना से हम कोसों दूर हैं। ऐसे में बहुमत का अर्थ मात्र दस-पन्द्रह प्रतिशत मतों तक सिमट जाता है। शेष मत विखण्डित होकर इस आँकड़े से पीछे छूट जाते हैं।

कोई भी राजनेता यदि इस गणित को ठीक से समझ लेता है तो वह उन्हीं दस-पन्द्रह प्रतिशत मतों को अपने पक्ष में सुनिश्चित हुआ जानकर सन्तुष्ट हो लेता है, और यह सन्देश भी देता है कि उनके हितों की रक्षा के लिए वह कुछ भी कर सकता है। सारे नियम-कायदे ताख़ अपर रख सकता है; दूसरे समूहों को सार्वजनिक रूप से गाली दे सकता है; साम्प्रदायिक हिंसा करा सकता है; मार-पीट, झगड़ा-लड़ाई, अभद्रता और गुण्डागर्दी से यदि उनका स्वार्थ सधता है तो उसका सहारा लेने में तनिक भी संकोच नहीं करता है। विरोधी मतवाले वर्ग के विरुद्ध खुलेआम अत्याचार और दुर्व्यवहार करने से यदि उसके पीछे खड़ी उन्मादी भीड़ तालिया पीटती है तो इस तथाकथित जनप्रतिनिधि को वह सब करने में कोई गुरेज़ नहीं है।

ऐसी हालत में लोकतन्त्र के चार उपहार- स्वतंत्रता, समानता, भ्रातृत्व व न्याय एक बड़े वर्ग के हाथ से छीन लिए जा रहे हैं, और इन्हें लोकतन्त्र के भस्मासुर अपनी चेरी बनाकर रखने में सफल हो रहे हैं। आजकल अखबारों की सुर्खिया ऐसे समाचारों से भरी पड़ी हैं जहाँ नेता जी अपनी बात मनवाने के लिए प्रशासन के अधिकारियों को मारने-पीटने से लेकर उनकी हत्या कर देने से भी गु़रेज नहीं करते। राजनैतिक पार्टियों द्वारा आपसी रंजिश में एक दूसरे पर राजनैतिक हमले करना तो अब पुरानी बात हो गयी है। अब तो सीधे आमने-सामने दो-दो हाथ कर लेने और विरोधी के जान-माल को क्षति पहुँचाने का काम भी धड़ल्ले से किया जा रहा है।

क्या हम प्लेटो के मूल्यांकन को आधुनिक सन्दर्भ में भी सही होता नहीं पा रहे हैं? 

ब्लॉगिंग कार्यशाला: पाठ-४ डॉ.कविता वाचक्नवी (हिन्दी कम्प्यूटिंग) द्वितीय भाग

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इस पाठ के प्रथम भाग में हमने जाना कि डॉ.कविता वाचक्नवी ने अपने वक्तव्य में हिन्दी कम्प्यूटिंग के क्षेत्र में होने वाली बड़े कार्यों का उल्लेख किया था। कविता कोष से सम्बन्धित बिन्दु-७ पर उनका स्पष्टीकरण आया है कि नेट पर ख़ुसरो से आज तक के कवियों की कविताओं की कुल संख्या 60 हज़ार से ऊपर है, ना कि केवल कविता कोष की। कविता कोष पर लगभग 18 हज़ार व अनुभूति पर भी लगभग 25 हज़ार से ऊपर कविताएं संकलित की गयी हैं।

हिन्दी कम्प्यूटिंग और अनुप्रयोग इसी कड़ी में अब आगे…

८. साहित्य कोश:

अन्तर्जाल पर हिन्दी साहित्य का विपुल भण्डार उपलब्ध है। गद्य और पद्य दोनो में। प्रेमचन्द जी का लगभग पूरा साहित्य ही नेट पर उपलब्ध है। वागर्थ, नया ज्ञानोदय, तद्भव, हंस, अन्यथा जैसी अनेकानेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के साथ ही साथ १०-२० नेट पत्रिकाएं जैसे: अनुभूति, अभिव्यक्ति, साहित्यकुंज, इन्द्रधनुष आदि भी सुलभ हैं

९.हिन्दी समाचार:

प्रायः सभी हिन्दी समाचार पत्र और साप्ताहिक पत्र पत्रिकाएं जैसे इण्डिया-टुडे, बी.बी.सी. पत्रिका, ऑउटलुक आदि हिन्दी प्रयोक्ताओं के लिए उपलब्ध हैं। बी.बी.सी. रेडियो (हिन्दी समाचार) सेवा से कौन अपरिचित होगा। अब यह ऑन लाइन सुनी जा सकती है।

९.विकीपीडिया:

अंग्रेजी संस्करण की तर्ज पर ही हिन्दी में भी यह मुक्त ज्ञानकोष लगातार बढ़ता जा रहा है। इससे न सिर्फ़ आप दुनिया के किसी भी विषय पर अच्छी जानकारी पा सकते है बल्कि इसमें अपनी जानकारी को जोड़कर इसके भण्डार को और समुन्नत भी बना सकते हैं।

९. चर्चा समूह:

अब हिन्दी में भी अनेक विशिष्ट विषयों पर आधारित चर्चा समूह और फोरम सक्रिय हो चुके हैं। हिन्दीभारत, ई-कविता, हिन्दीफ़ोरम,  तकनीकी व वैज्ञानिक हिन्दी, …..आदि बीसियों सहायता व विमर्श हेतु जालस्थल(sites) उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त ऑर्कुट और फेसबुक जैसी

१०.फॉण्ट परिवर्तक:

फॉण्ट की पारम्परिक समस्या अब नहीं रही। यूनिकोड फॉण्ट में  ऑफ़लाईन/ऑनलाईन टंकड़ के औंजार उपलब्ध हैं।  फ़ोनेटिक औंजार भी सुलभ हैं; जैसे- इंडिक ट्रांसलिट्रेशन व क्विलपैड सीधे देवनागरी में टंकड़ की सुविधा देते हैं।

पुरानी से पुरानी किसी फॉण्ट में  रखी सामग्री को यूनिकोडित करने हेतु २० से  अधिक फॉण्ट परिवर्तक मुफ़्त में उपलब्ध हैं। जिस फॉण्ट का परिवर्तक उपलब्ध नहीं है उसे अधिकतम एक सप्ताह में तैयार कर आपकी सेवा में उपलब्ध कराने के लिए कुछ तकनीकी महारथी सदैव तत्पर हैं। अनुनाद जी, नारायण प्रसाद जी, और हरिराम जी ने इस दिशा में स्तुत्य प्रयास किया है।

११. संकलक (एग्रेगेटर्स):

अब हिन्दी के ब्लॉग्स को उनके प्रकाशन के समय और श्रेणी के अनुसार एक स्थान पर संकलित करके व्यवस्थित ढंग से नेटप्रयोक्ताओं को सुलभ कराने का काम ब्लॉगवाणी, नारद, चिट्ठाजगत आदि कर रहे हैं। निरन्तर शोध और रचनात्मक कौशल द्वारा इन्होंने चिठ्ठाकारी की दुनिया में सहज विचरण को आसान और सुरुचिपूर्ण बना दिया है। ब्लॉग्स की लोकप्रियता और सक्रियता के आँकड़े आसानी से देखे जा सकते हैं।

१२. खोज इन्जन:

नेट पर सबसे बड़े खोज इन्जन गूगलसर्च में भी हिन्दी/देवनागरी  में ‘सर्च’ की सुविधा उपलब्ध हो चुकी है। अब आपकी खोज को पूरा करने के लिए हिन्दी में उपलब्ध सम्पूर्ण सामग्री भी गूगल द्वारा खंगाली जाती है। दूसरे सर्चइन्जन भी हिन्दी आधारित विषयों को उपलब्ध करा रहे हैं।

कविता जी ने उपरोक्त के अलावा यह भी बताया कि वाचान्तर (सीडैक)नाम से एक ‘स्पीच रिकॉग्निशन’ सुविधा है जो पैसा लेकर दी जाने वाली एकमात्र सुविधा है। हिन्दी की शेष सभी सुविधाएँ व संसाधन निःशुल्क हैं।
कई ब्लॉग्स पर हिंदी में प्रौद्योगिकी  विषयक लेखन हो रहा है

इसके अतिरिक्त TTS (text to speech/hindi sceen reader) जैसी दृष्टिबाधित उपयोक्ताओं के लिए हिन्दी में अनेक सुविधाएं विकसित की गयी है।

अब सभी मुख्य ब्रॉउजर हिन्दी में उपलब्ध हो चुके है। ऑनलाइन लाइब्रेरीज, शब्दकोश, तकनीकी शब्दावली कोश, मुहावरा कोश, वर्तनी शुद्धिकरण यन्त्र के साथ ही हिन्दी में बाजार विषयक लेखन भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। सभी बड़ी संस्थाओं की साइट्स हिन्दी में बनायी जा रही है। MSN,google,Yahoo आदि ने हिन्दी में संदेशों के आदान-प्रदान और गप्पे लड़ाने (चैटिंग) की सुविधा दे रखी है।

हिन्दी कम्प्यूटिंग के महत्व को रेखांकित करते हुए कविता जी ने कहा कि वैश्वीकरण के इस दौर में भारत का जो बड़ा बाजार बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की दृष्टि में है उसपर कब्जा जमाने के लिए उन्हें हिन्दी के प्रयोग को बढ़ावा देना अपरिहार्य होगा। इसलिए अब इस दिशा में बदलाव आना शुरू भी हो चुका है।

अब अंग्रेजी पर निर्भर होने की मजबूरी नहीं है। मुझे आजतक ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो अपने बच्चों को इंलिश मीडियम से इसलिए पढ़ाता हो कि उसे अंग्रेजी से बहुत प्यार है। बल्कि वह यह समझता है कि आज के समाज में कैरियर की सफलता के लिए अंग्रेजी का ज्ञान जरूरी है। अब यदि हिन्दी में दक्षता आपको रोजगार उपलब्ध करा दे तो अंग्रेजी पढ़ना एक मजबूरी नहीं रह जाएगी। उन्होंने पूछा कि अमेरिका की सिलिकॉन वैली में जाकर भारतीय बच्चे यदि उनके लिए अंग्रेजी में सॉफ्टवेयर विकसित कर रहे हैं तो वही बच्चे भारत में रहकर हिन्दी में अच्छे सॉफ़्टवेयर क्यों नहीं बना सकते?

अपने वक्तव्य की समाप्ति कविता जी ने एक अपील से की- वह थी सभी हिन्दी प्रेमियों से हिन्दी की सेवा का व्रत लेने की। उन्होंने कहा कि आप सभी अपनी रुचि के अनुसार किसी एक साहित्यकार, कवि या लेखक को चुन लीचिए। उनके रचना संसार को यूनीकोड में टाइप करके इण्टरनेट पर अपलोड करिए। अभी यह सारी सुविधा निःशुल्क है। अपने पसंदीदा साहित्य को अन्तर्जाल पर सुरक्षित कराइए। इससे यह मात्र एक-दो पीढ़ियों तक नहीं बल्कि अनन्त काल तक अक्षुण्ण रह पाएगा।

(पाठ-४ समाप्त)

एक अनुरोध: समयाभाव व तकनीकी कमजोरी के कारण बहुत से उपयोगी लिंक इच्छा रहते हुए भी नहीं दे पाया हूँ। आप इस कमी को पूरा कर सकते हैं। अपनी टिप्पणियों में आप चाहें तो हिन्दी अनुप्रयोगों से सम्बन्धित महत्वपूर्ण लिंक दे सकते हैं जो नये जिज्ञासु पाठकों और चिठ्ठाकार भाइयों-बहनों के लिए उपयोगी हो सकता है।

लिंक देने का तरीका /कोड: <a href="लिंक का युआरएल ">चयनित शब्द जिसपर लिंक देना है</a>

(अगला और अन्तिम पाठ:

कुशल ब्लॉग प्रबन्धन- ज्ञानदत्त पाण्डेय)

ब्लॉगिंग कार्यशाला: पाठ-३ (डॉ.अरविन्द मिश्रा- साइंस ब्लॉगर)

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“हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया” के बारे में जो कार्यशाला इलाहाबाद में हुई उसकी तस्वीरें, विषय-प्रवर्तन, अखबारी चर्चा और अनूप शुक्ल जी की कथा-वार्ता आप पिछली कड़ियों में देख और पढ़ चुके है। अब आगे…

डॉ.अरविन्द मिश्रा.. अनूप जी की कथा-वार्ता के बाद इमरान ने हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में वैज्ञानिक विषयों पर लिखने वाले बनारस के डॉ. अरविन्द मिश्रा जी को आमन्त्रित किया। अरविन्द जी का साईंब्लॉग हिन्दी जगत के चिठ्ठों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। वे पिछले कई दशक से विज्ञान के संचार के क्षेत्र में सक्रिय हैं। 

इन्होंने अपने वैज्ञानिक लेखों की लम्बी श्रृंखला में लोकप्रिय विज्ञान, जानवरों का व्यवहार, सौन्दर्य व सौन्दर्यशास्त्र (beauty and aesthetics), साँप और सर्पदंश, अन्तरिक्ष तथा धर्म और विज्ञान जैसे विषयों पर खोजपरक और उपयोगी लेखन किया है। 

विज्ञान की बात करनी हो और वह भी अन्तर्जाल पर इसके लेखन की बात करनी हो तो जाहिर है कि तकनीक का प्रयोग होना ही था। सो, इन्होंने विषय को ‘पॉवर प्वाइण्ट’ के माध्यम से प्रस्तुत किया। इमरान शायर बार-बार इसे ‘पॉवर प्रेजेण्टेशन’ कहते रहे और मैं दर्शकों की विपरीत प्रतिक्रिया की सम्भावना से शंकाग्रस्त होता रहा। डर था कि कहीं कोई इसे ‘शक्ति-प्रदर्शन’ न समझ बैठे।

खैर इमरान जी ने माइक थमाया तो अरविन्द जी ने भी सबसे पहले यही बताया कि इलाहाबाद के लिए वे मेहमान नहीं हैं। यहीं के विश्वविद्यालय से वर्ष १९८३ में उन्होंने प्राणिशास्त्र में डी.फिल. किया था। यहीं उनका alma mater है। यह अपने घर जैसा लगता है। बोले, “यहाँ लगता है जैसे कि मैं अपने माँ के पास आया हूँ।”

डॉ.अरविन्द मिश्रा

थोड़ी मशक्कत के बाद ही सही लेकिन ज्ञानदत्त पाण्डेयजी के नियन्त्रणाधीन लैपटॉप से निसृत होकर श्रोताओं के  सामने जमायी गयी स्क्रीन (श्‍वेत-पटल ) पर पहली स्लाइड चमक उठी। आगे की प्रत्येक स्लाइड में विषय वस्तु को कुञ्जी रूप में व्यवस्थित किया गया था। अरविन्द जी क्रम से उन विन्दुओं की व्याख्या करते रहे और ज्ञानजी ‘नेक्स्ट’ का निर्देश पाकर माउस से स्लाइड्स आगे बढ़ाते रहे। कहीं कोई भटकाव नहीं, कोई दुहराव नहीं। मुझे प्राइमरी में पढ़ी हुई विज्ञान की परिभाषा याद आने लगी।

यहाँ संक्षेप में इन झलकियों की विषय-वस्तु प्रस्तुत कर रहा हूँ:

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ब्लॉग क्या है?image

  • वेब+लॉग = ब्लॉग
  • १९९७- दुनिया में ब्लॉग्स का आविर्भाव
  • अब प्रत्येक दस सेकेण्ड में एक नया ब्लॉग बन रहा है।
  • वेब लॉग शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम जे.बार्गर ने १९९७ में किया था।
  • इसमें प्रविष्टियाँ या पोस्टें उल्टे समयानुक्रम मेम दिखायी देती हैं- अर्थात्‌ आखिरी पोस्ट सबसे पहले प्रदर्शित होती है।smile_regular

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  • प्रविष्टियों में आलेख, चित्र, वीडियो, और दूसरे जालस्थलों की कड़ियाँ निहित होती हैं।
  • पाठक इन प्रविष्टियों पर टिप्पणी कर सकते हैं जिससे यह दो-तरफा आदान-प्रदान का अनुभव देता है।
  • इसमें आर.एस.एस. की फीड शामिल होती है।

imageब्लॉग बहुत सी भिन्न सामग्रियों से तैयार हो सकता  है…

  • व्यक्तिगत डायरी या पत्रक
  • समाचार और सूचना सेवा
  • चालू प्रोजेक्ट की रिपोर्ट्‍स
  • चित्र वीथिका
  • अन्तर्जाल की कड़ियों का संग्रह
  • इत्यादि… और भी बहुत कुछ

 

  • image विज्ञान की चिठ्ठाकारी
  • एक विज्ञान का चिठ्ठा वह है जिसे कोई विज्ञान-वेत्ता लिखे
  • शोध और व्यक्तिगत डायरी के तत्व शामिल हों
  • प्रायः विज्ञान सम्बन्धी विषयों पर लिखा जाय
  • या दोनो बातें ही हों…।

इसे कैसे खोजें?image

  • ब्लॉगिंग इन्डेक्स और खोजी-इन्जन
  • टेक्नॉराती- http://www.technorati.com/
  • गूगल ब्लॉग खोज-
  • आपका संकलन कर्ता: जैसे- ब्लॉगवाणी, चिठ्ठाजगत, नारद

imageशब्दावली

  • ब्लॉगर: वह व्यक्ति जिसने ब्लॉग बना  रखा है और उसपर लिख-पढ़ रहा है।
  • ब्लॉगिंग: ब्लॉग बनाने और चलाने का कार्॥
  • ब्लॉगरोलिंग: ब्लॉगजगत में एक ब्लॉग से दूसरे ब्लॉग पर विचरण करना।
  • ब्लॉ्ग्‍रोलोडेक्स: दूसरे ब्लॉगों की सूची जो प्रायः अपने ब्लॉग के साइड-बार पर लगायी जाती है।
  • ब्लॉगेरिया: प्रतिदिन सैकड़ों पोस्टें पढ़ने और लिखने की सनक, विषय सबकुछ और कुछ भी।

 आर.एस.एस. क्या है?image

  • यह अन्तर्जाल पर अद्यतन जानकारी बाँटने का जुगाड़ है।
  • रिच साइट समरी
  • रियली सिम्पल सिण्डिकेशन,
  • आर.एस.एस. अन्तर्जाल पर चढ़ाई गयी प्रत्येक सामग्री सबको सुलभ कराता है।

imageसंकलक:

  • ब्लॉग संकलन कर्ता एक्स.एम.एल. जाल स्थलों को पूर्वनिर्धारित समय से संकलित करते हैं ( प्रत्येक मिनट से लेकर केवल अनुरोध के अनुसार अनियमित तौर पर कभी-कभार भी।)
  • शार्प रीडर (?)

विज्ञान चिठ्ठाकारीimage

यहाँ क्या-क्या हो सकता है…?

  • अन्धविश्वासों से भिड़न्त
  • छद्‍म विज्ञान का विरोध
  • वैज्ञानिक विनोदशून्य मशीन की भाँति चलायमान जीव नहीं हैं। उनमें भी सम्वेदनाएं हैं। उनके जीवन में भी ‘रास-रंग’ है।
  • विज्ञान सम्बन्धी विषयों पर आधारित समाचारों पर सजग दृष्टि रखना
  • विज्ञान का इतिहास लेखन
  • विज्ञान का कला विषयों के साथ आमेलन
  • सीधे अपने कार्यक्षेत्र से चिठ्ठाकारी
  • सामुदायिक प्रकाशन: ब्लॉग महोत्सव का आयोजन
  • लोकप्रिय विज्ञान पत्रिकाओं के सम्पादकों द्वारा चिठ्ठाकारी

कुछ लोकप्रिय विज्ञान-विषयक ब्लॉग

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अरविन्द जी ने अपनी वार्ता में उदाहरण देकर समझाया कि किस प्रकार में अन्धविश्वासों ने जड़ जमा रखा है। ब्लॉगिंग के हथियार से इनका मूलोच्छेदन किया जा सकता है। यह सत्य है कि ‘बड़ी माता’ नामक बिमारी का उन्मूलन हो चुका है। लेकिन अभी भी प्रत्येक १०-१५ किलोमीटर पर शीतला माता का मन्दिर बना हुआ है। आज भी समाज कूप-मण्डूकता का शिकार बना हुआ है।

फलित ज्योतिष के नाम पर लोगों को मूर्ख बनाने का काम हो रहा है। यह एक छद्‍म विज्ञान है। बाजारों में अनेक नीम-हकीम [क्वैकायुर्वेदाचार्य :)] लोगों की अशिक्षा और अन्धविश्वास पर पल रहे हैं।

आये दिन अखबारों में अवैज्ञानिक खबरें छपती रहती हैं। प्रायः हम पढ़ते हैं कि तस्करों से चीते की खाल बरामद हुई। जबकि भारत में चीता पाया ही नहीं जाता है। वस्तुतः Tiger का हिन्दी अनुवाद व्याघ्र ( देखें कामिल बुल्के)  है। किन्तु भार्गव की डिक्शनरी ने गलती से इसे चीता बता दिया। अब लिट्टे वाले भी तमिल चीता ही कहलाते हैं जो गलत है।

अरविन्द जी ने यह चर्चा भी किया कि विज्ञान को मानविकी से जोड़कर अनेक अच्छी पुस्तकें लिखी गयी हैं। आजकल चार्ल्स डार्विन की द्विशती मनायी जा रही है। उन्होंने विज्ञान का विशद लेखन किया। विज्ञान गल्प अब धीरे-धीरे डगमग कदमों से चलना शुरू कर रहा है। उन्होंने बताया कि सन्‌ १९०० में पहली विज्ञान कथा ‘चन्द्रलोक की यात्रा’ केशव प्रसाद सिंह जी ने लिखी थी जो तबकी प्रतिष्ठित पत्रिका ‘सरस्वती’ में छपी थी।

यहाँ बताते चलें कि डॉ अरविन्द ने सभी वार्ताकारों को अपनी प्रतिनिधि विज्ञान कथाओं के संग्रह ‘एक और क्रौंच वध’ की प्रतियाँ भेंट कीं। इनमें उनकी लिखी बारह रोचक कहानियों का संकलन किया गया है। अरविन्द जी से अनुरोध है कि इन्हें अपने ब्लॉग पर यदि अबतक पोस्ट न किए हों तो अवश्य कर दें। पहले से मौजूद हो तो लिंक दें।

पोस्ट बहुत लम्बी होती जा रही है। अनूप जी की छाया पड़ गयी लगती है। अन्त में इतना बता दूँ कि इस वार्ता के अन्त में एक बुजुर्ग सज्जन ने यह सवाल दाग दिया था कि हिन्दी ब्लॉगिंग की चर्चा के कार्यक्रम में पॉवर प्वाइण्ट अंग्रेजी में क्यों दिखाया गया? अब इसका सम्यक उत्तर देने की जरूरत वहाँ नहीं समझी गयी, क्यों कि अरविन्द जी ने पूरी चर्चा हिन्दी में ही की थी। स्लाइड्‍स का प्रयोग केवल विषय पर केन्द्रित रहने के लिए किया गया था।

इस प्रकरण पर विस्तृत चर्चा ज्ञान जी की मानसिक हलचल पर हो चुकी है। यहाँ मैने उन स्लाइड्‍स का हिन्दी रूपान्तर करने की कोशिश की है। आशा है उन सज्जन की शिकायत भी दूर हो जाएगी। यहाँ तक पढ़ने के लिए धन्यवाद।

…जारी

अगला पाठ:

डॉ. कविता वाचक्नवी- कम्प्यूटर में हिन्दी अनुप्रयोग

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

ब्लॉगिंग कार्यशाला: समाचार-पत्रों ने की चर्चा

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आज की पोस्ट अनूप शुक्ल जी द्वारा कार्यशाला में उपस्थित नये ब्लॉगोत्सुक श्रोताओं के समक्ष बाँटे गये उनके अनुभव की रिपोर्ट के रूप में आनी थी। लेकिन अखबारों की स्कैनिंग का काम ‘समय से’ (?) पूरा हो जाने के कारण इनका नम्बर पहले लग गया। इस धारणा के साथ कि अखबारी खबरों को बासी होते देर नहीं लगती, मैं इसे यथा सम्भव जल्दी पेश कर रहा हूँ।

अनूप जी वाला पाठ अगली पोस्ट में शीघ्र ही…

राष्ट्रीय सेमिनार-कार्यशाला के आयोजन की सूचना सभी स्थानीय अखबारों में प्रकाशित हुई। एक झलक आपके लिए:

सेमिनार ७

I-Next (जागरण समूह) ४ मई,२००९, इलाहाबाद

सेमिनारकी सूचनाएँ

अमर उजाला, हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण: ७ मई,२००९ इलाहाबाद

आठ मई को कार्यक्रम में शहर के प्रायः सभी प्रतिष्ठित सम्वाददाता स्वयं उपस्थित रहकर ब्लॉगिंग की बातें सुनते रहे और अगले दिन सचित्र समाचार प्रकाशित किए। कुछ ने तो अपना ब्लॉग भी शुरू किया।

सेमिनार १० सेमिनार ९

अमर उजाला, इलाहाबाद ९ मई, २००९

सेमिनार१२

I-Next, ९ मई, २००९

सेमिनार ८

हिन्दुस्तान ९ मई, २००९, इलाहाबाद

हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि अन्तर्जाल की दुनिया पर हम संदेशों के प्रचार-प्रसार के लिए चाहे जितना तेज काम कर लें, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर किसी आयोजन को सफल बनाने के लिए प्रिन्ट मीडिया का योगदान बहुत महत्वपूर्ण है। इसपर विशेष ध्यान देते हुए हमने पत्रकार मित्रों को सादर आमन्त्रित किया था।

इस कार्यक्रम की अच्छी कवरेज से इन्टरनेट से दूर रहने वाले लोग भी इस कार्यक्रम में सम्मिलित हो सके। इस सहयोग के लिए हम उनके प्रति हृदय से आभारी हैं।

(सिद्धार्थ)

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