वर्धा में पूरा होता गान्धी का एक सपना…

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आप जानते ही होंगे कि सरकारी कोषागार कार्यालय वित्तीय वर्ष की समाप्ति करीब आने पर अत्यधिक व्यस्त हो जाते हैं। इस बार भी स्थिति बदली नहीं थी। पन्द्रह मार्च के बाद ही ऑफिस में कमरतोड़ मेहनत करनी पड़ रही थी। घर आकर ब्लॉगरी करने की हिम्मत नहीं पड़ती। जैसे-तैसे ई-मेल खाता चेक कर पाने की फुर्सत ही निकाल पाये। कोई पोस्ट ठेलने या पढ़ने की तो हम सोच ही नहीं पाये। मेरा मन था इस वार्षिक लेखाबन्दी पर सरकारी दफ़्तरों की कार्य प्रणाली में आने वाले बदलाव पर आपसे विचार बाँटने का लेकिन मन को इधर एकाग्र ही नहीं कर सका। मार्च का महीना पाँच अप्रैल तक समाप्त हो पाया। महालेखाकार (AG) को अन्तिम लेखा-जोखा भिंजवाने के बाद जब हमें फुरसत मिली तो कुछ दिन आराम करने के बाद कम्प्यूटर खोलने का मन हुआ।

मेरे मेल बॉक्स में असंख्य सन्देश जमा हो चुके थे। फ़ेसबुक, ऑर्कुट, ट्वीटर, लिंक्ड-इन, ई-कविता, एस्ट्रोलॉजीडॉट्कॉम, मि.पॉजिटिव, फ्रॉपर, बड्डीटीवी, मॉर्निंग डिस्पैच-एच.टी., चिट्ठाजगत, ब्लॉगवाणी भोजपुरी.कॉम इत्यादि ने अपना दैनिक कोटा भेंज रखा था। अनेक ब्लॉगर भाइयों ने अपनी रचनाएं भी जबरिया ठेल रखी थी। मुझे नहीं पता कि इतनी सामग्री कोई कैसे पढ़ पाता होगा। मैने तो मजबूरी में ‘सेलेक्ट ऑल’ और ‘मार्क ऐज रेड’ का ऑप्शन चुन लिया। अलबत्ता मैने व्यक्तिगत रूप से परिचित मित्रों और परिजनों के सन्देश जरूर पढ़े। 15042010608

इन्ही में से हिन्दी भारत समूह के लिए डॉ. कविता वाचक्नवी जी का एक सन्देश मुझे देखने को मिला जो वर्धा स्थित महात्मा गान्धी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय से सम्बन्धित था। वहाँ के स्थानीय समाचारपत्रों में छपी कुछ रिपोर्ट्स की कतरन किसी शिक्षक द्वारा भेंजी गयी थी जिसे कविता जी ने समूह पर चस्पा कर दिया था। उस सामग्री को देखकर मैं हैरत से भर उठा। इस संस्था की जो छवि मेरे मन में थी उसे चोट पहुँची। लेकिन मुझे सहसा याद आ गया कि मैने पिछले साल इसी संस्था के सौजन्य से एक बड़ा कार्यक्रम इलाहाबाद में कराया था- हिन्दी चिट्ठाकारी की दुनिया पर राष्ट्रीय गोष्ठी। उस समय भी अन्तर्जाल पर अनेक आलोचना के स्वर मुखरित हो गये थे। ये आलोचना एक खास किस्म की नकारात्मक प्रवृत्ति से प्रेरित लगी थी। उस समय की बातों को नजदीक से जानता हूँ इसलिए इन रिपोर्टों की सच्चाई पर मुझे पर्याप्त सन्देह हो चला। बल्कि मेरे मन में इस संस्था को और नजदीक से देखने की इच्छा बलवती हो गयी।

मैंने संस्था के कुलपति जी से बात की और वहाँ आने की इच्छा जतायी। प्रयोजन प्रायः पर्यटन का ही था। उन्होंने सहर्ष आमन्त्रित किया, मैने झटसे टिकट लिया और १३ अप्रैल की दोपहर में सेवाग्राम रेलवे स्टेशन पर पटना-सिकन्दराबाद एक्सप्रेस से उतर गया।  स्टेशन पर उतरते ही प्रथम साक्षात्कार प्रचण्ड गर्मी से हुआ। विश्वविद्यालय की ओर से एक वाहन स्टेशन पर आ चुका था। अपने एक मित्र के साथ मैने उसमें शरण ली। करीब छः किलोमीटर के रास्ते में मुझे पथरीली जमीन पर बड़े जतन से उगाये हुए कुछ पेड़ दिखे, सड़कें प्रायः खाली दिखी, इलाहाबाद की तरह ठेले और खोमचे पर गर्म मौसम से लड़ने वाले उत्पाद उस दोपहरी में वहाँ नहीं दिखायी पड़े। गाड़ी वर्धा शहर से बाहर निकली तो मुझे चारो ओर पसरी हुई वीरानी ने घेर लिया। लेकिन जल्दी ही हमें एक पहाड़ी टीले पर विश्वविद्यालय का नाम लिखा हुआ दिख गया। 

सबकुछ मेरी कल्पना से परे दिख रहा था। बिल्कुल निर्जन और दुर्गम पथरीले पहाड़ को तराशकर शिक्षा का केन्द्र बनाने की कोशिश विलक्षण लग रही थी। हिमालय की कन्दराओं में तपस्वी ऋषियों की साधना के बारे में तो पढ़ रखा था लेकिन उन हरे भरे जंगलों की शीतल छाया में मिलने वाले सुरम्य वातावरण की तुलना विदर्भ क्षेत्र के इस वनस्पति विहीन पत्थरो के पाँच टीलों पर उगायी जा रही शिक्षा की पौधशाला से कैसे की जा सकती है। मेरे मन में जिज्ञासा का ज्वार उठने लगा। आखिर इस स्थान का चयन ही क्यों हुआ? मौका मिलते ही पूछूंगा। गान्धी हिल्स पर स्थापित प्रतिमा

मेरे लिए वि.वि. के गेस्ट हाउस (फादर कामिल बुल्के अन्तरराष्ट्रीय छात्रावास) में रुकने का इन्तजाम किया गया था। सभी ए.सी. कमरे पहले से ही भर चुके थे। हमें कूलर से सन्तोष करना पड़ा। लेकिन वह भी पर्याप्त ठंडक दे रहा था। असली परेशानी स्नान करने में हुई। दोपहर के दो बजे टंकी का पानी लगभग खौल रहा था। उसे बाल्टी में भरकर थोड़ी देर छोड़ दिया गया तो उसकी गर्मी सहने लायक हो गयी। विश्वविद्यालय के कुलपति श्री विभूति नारायण राय जी ने बाद में बताया कि हम रोज सुबह बाल्टियों में पानी इकट्ठा करते हैं और ठण्डा हो जाने के बाद नहाते हैं। मालूम हुआ कि यहाँ पानी ४०-५० किलोमीटर दूर किसी नदी से पाइपलाइन के जरिए लाया जाता है और टंकियों में चढ़ाकर रखा जाता है। लॉन के पौधों को पर्याप्त पानी नहीं दिया जा सकता इसलिए ऐसे पौधे लगाये गये हैं जिन्हें पानी की कम जरूरत पड़े।

फादर कामिल बुल्के अन्तरराष्ट्रीय छात्रावास गर्म मौसम की मार से तो प्रायः पूरा देश ही त्रस्त है, इसलिए यह अकेले वर्धा की परेशानी नहीं कही जा सकती। इसे नजरन्दाज करते हुए मैं उन बातों की चर्चा करना चाहूंगा जो मुझे असीम मानसिक सन्तुष्टि देने वाली साबित हुई। प्रदेश सरकार की नौकरी बजाते हुए मुझे जिन अनचाहे अनुभवों से गुजरना पड़ता है, जिस प्रकार की बेतुकी फाइलों में सिर खपाना पड़ता है और निरर्थक कामों में जीवन का कीमती समय गुजारना पड़ता है उससे परे वहाँ बिताये दो दिनों में मुझे विलक्षण अनुभव प्राप्त हुए। मुझे जिस अद्‍भुत बौद्धिक चर्चा में शामिल होने का अवसर मिला, साहित्य, संगीत और कला की जिस त्रिवेणी में डुबकी लगाने का अवसर मिला,  जिन लोगों के साहचर्य में इस इस अध्ययन केन्द्र के निरन्तर विकसित होते परिसर के सौन्दर्य के साक्षात्कार का सुख मिला उसकी चर्चा इस एक पोस्ट में नहीं की जा सकती।

रेगिस्तान में नखलिस्तान का निर्माण

अगली पोस्ट में मैं बताऊंगा कि वहाँ मुझे कौन-कौन ऐसे लोग मिले जिनकी चर्चा राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर होती रहती है। कौन लोग हैं जो शिक्षा की मशाल जलाये रखने के लिए शान्तिपूर्ण ढंग से अपना व्यक्तिगत सुख त्यागकर इस तपोभूमि में अपनी ऊर्जा का प्रतिदान कर रहे है, वे कौन सी प्रेरक शक्तियाँ हैं   जो महात्मा गान्धी के सेवाग्राम में देखे गये एक सपने को पूरा करने के लिए इस रेगिस्तान में नख़लिस्तान का निर्माण करा रही हैं। बस प्रतीक्षा कीजिए अगली पोस्ट का….

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

ताजा हवाओं ने कहला दी एक ग़जल…

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पिछले दिनों त्रिवेणी महोत्सव की धूम में एक बहुत अच्छे कार्यक्रम की चर्चा करने से चूक गया था। मैने पहले भी आपलोगों का परिचय इमरान प्रतापगढ़ी और उनकी संस्था ताजा हवाएं से कराया था। इस नौजवान शायर में कुछ अलग हटकर अनूठे सांस्कृतिक आयोजन करने का उत्साह देखते ही बनता है। मई २००८ में ब्लॉगरी की कक्षा लगाने का प्रयोग इन्हीं के माध्यम से सफ़ल हो पाया था।

गत २१ फरवरी को रविवार के दिन इन्होंने उत्तर प्रदेश और आसपास के अनेक सरकारी अधिकारियों को इकठ्ठा कर लिया। किसी मीटिंग आदि के लिए नहीं बल्कि उनके भीतर बसे कवि और शायर को सम्मानित करने के लिए तथा उनसे काव्य पाठ सुनवाने के लिए। इसमें नीतिश्वर कुमार जैसे आई.ए.एस. अधिकारी भी थे तो रिज़वान अहमद व एस.पी. श्रीवास्तव जैसे वरिष्ठ आई.पी.एस. अधिकारी भी थे। इन्द्रमणि जैसे रेलवे के विजिलेन्स अफ़सर भी थे राजकुमार सचान जैसे वरिष्ठ पी.सी.एस. अधिकारी भी। प्रशासनिक व्यस्तता के कारण कई अधिकारी अन्तिम क्षणों में न आ सके। इन अधिकारियों की खासियत यह थी कि इन लोगों ने एक मन्च पर पाल्थी मारकर बैठे हुए जूनियर-सीनियर का प्रोटोकॉल दरकिनार करके विशुद्ध काव्यरस का आदान-प्रदान किया। प्रायः सभी अधिकारी कवियों ने अपनी काव्य प्रतिभा से चमत्कृत कर दिया। कुछ चुनिन्दा रचनाओं की रिकॉर्डिंग मैं अगली पोस्टों में सुनवाने का प्रयास करूंगा।

अभी तो मैं यह बताना चाहता हूँ कि इस कार्यक्रम में बजने वाली तालियों ने मुझे कविताई की ओर बड़ी मजबूती से ढकेलना शुरू कर दिया। यमुना तट पर सितारों के जमघट, ट्रेजरी की नौकरी और होली की भागदौड़ के बीच कुछ शब्दों की जोड़-गाँठ रुक-रुककर चलती रही। आज जब होली की छुट्टी पूरी होने के बाद भी इलाहाबाद में एक दिन अतिरिक्त रंग खेला जा रहा है तो मैं घर में दुबका हुआ यह कारनामा पूरा करने में सफ़ल हो गया हूँ। अब गुणी जन इसे पढ़कर बताएं कि मुझे इस क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहिए कि नहीं 🙂

 

दिल की हर बात सरे-राह निकाली नहीं जाती

प्यार की धड़कन पर दिल में दबा ली नहीं जाती

 

हमने देखे हैं बहुत लोग जिन्हें प्यार हुआ

पर ये दौलत सभी लोगों से संभाली नहीं जाती

 

था हुनरमन्द और गैरत-ओ- ईमान का पक्का

फिर भला कैसे उसकी उसकी पगड़ी उछाली नहीं जाती

 

बहुत गरीब था यह जुर्म किया था उसने

वर्ना मासूम उसकी बेटी उठा ली नहीं जाती

 

सितम तमाम दफ़न हैं चमकती खादी में

वर्ना हसरत वज़ीर बनने की पाली नहीं जाती

 

तंग नाले के किनारे जला लिया चूल्हा

कामगारों से भूख अब जरा टाली नहीं जाती

 

लूट, हत्या, गबन, फिरका परस्ती, महंगाई

इनसे अखबार की सुर्खी कभी खाली नहीं जाती

 

देख ‘सत्यार्थमित्र’ अपने रहनुमाओं को

जिनके घर सजते हैं हरहाल दिवाली नहीं जाती

-सिद्धार्थ 

 

चलते-चलते आपको अपने मित्र और उम्दा शायर मनीष शुक्ला की वो ग़जल सुनवाता हूँ जिसने उस प्रशासनिक अधिकारियों के कवि सम्मेलन में खूब तालियाँ बटोरी। मुझे विश्वास है ये आपको जरूर पसन्द आएगी।

 

वादा किया गया था उजालों का क्या हुआ…

अब चाहिए एक हाइब्रिड नेता…।

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parlament2 देश की सबसे बड़ी पंचायत के चुनाव का बिगुल बज चुका है। आदर्श आचार संहिता लागू होने से ठीक पहले सरकारें अपने मतदाताओं को खुश करने के लिए एक से बढ़कर एक घोषणाओं, शिलान्यास, उद्‌घाटन, लोकार्पण और जातीय भाईचारा सम्मेलन जैसे कार्यक्रम पूरी तन्मयता से कर रही थीं। समय कम पड़ गया। आजकल नेताजी जनता की सेवा के लिए दुबले होते जा रहे हैं। इस समय अब मतदाता के सामने सोशल इन्जीनियरिंग के ठेकेदार पैंतरा बदल-बदल कर आ रहे हैं।

वोटर की चाँदी होने वाली है। भारतीय लोकतंत्र का ऐसा बेजोड़ नमूना पूरी दुनिया में नहीं मिलने वाला है। यहाँ राजनीति में अपना कैरियर तलाशने वाले लोग गजब के क्षमतावान होते हैं। इनकी प्रकृति बिलकुल तरल होती है। जिस बरतन में डालिए उसी का आकार धारण कर लेते हैं। जिस दल में जाना होता है उसी की बोली बोलने लगते हैं। पार्टीलाइन पकड़ने में तनिक देर नहीं लगाते।

आज भाजपा में हैं तो रामभक्त, कल सपा में चले गये तो इमामभक्त, परसो बसपा में जगह मिल गयी तो मान्यवर कांशीराम भक्त। कम्युनिष्ट पार्टी थाम ली तो लालसलाम भक्त। शिवसेना में हो जाते कोहराम भक्त, राज ठाकरे के साथ लग लिए तो बेलगाम भक्त। और हाँ, कांग्रेस में तो केवल (madam) मादाम भक्त…!

कुछ मोटे आसामी तो एक साथ कई पार्टियों में टिकट की अर्जी लगाये आला नेता की मर्जी निहार रहे हैं। जहाँ से हरी झण्डी मिली उसी पार्टी का चोला आलमारी से निकालकर पहन लिया। झण्डे बदल लिए। सब तह करके रखे हुए हैं। स्पेशल दर्जी भी फिट कर रखे हैं।

हर पार्टी का अपना यू.एस.पी.है। समाज का एक खास वर्ग उसकी आँखों में बसा हुआ है। जितनी पार्टियाँ हैं उतने अलग-अलग वोटबैंक हैं। सबका अपना-अपना खाता है। राजनीति का मतलब ही है – अपने खाते की रक्षा करना और दूसरे के खाते में सेंध मारने का जुगाड़ भिड़ाना। आजकल पार्टियाँ ज्वाइण्ट खाता खोलने का खेल खेल रही हैं ताकि बैंक-बैलेन्स बढ़ा हुआ लगे। कल के दुश्मन आज गलबहिंयाँ डाले घूम रहे हैं। carcat        कार्टून: शंकर परमार्थी 

नेताजी माने बैठे हैं कि वोटर यही सोच रहा है कि अमुक नेताजी मेरी जाति, धर्म, क्षेत्र, रंग, सम्प्रदाय, व्यवसाय, बोली, भाषा, आदि के करीब हैं तो मेरा वोट उन्हीं को जाएगा। उनसे भले ही हमें कुछ न मिले। दूसरों से ही क्या मिलता था? कम से कम सत्ता की मलाई दूसरे तो नहीं काटेंगे…! अपना ही कोई खून रहे तो क्या कहना?

जो लोग देश के विकास के लिए चिन्तित हैं, राष्ट्र को आगे बढ़ाने के लिए भ्रष्टाचार, अपराध, अशिक्षा, और अराजकता को मिटाने का स्वप्न देखते हैं, वे भकुआ कर इन नेताओं को ताक रहे हैं। इनमें कोई ऐसा नहीं दिखता जो किसी एक जाति, धर्म, क्षेत्र, रंग, सम्प्रदाय, व्यवसाय, भाषा, बोली आदि की पहचान पीछे धकेलकर एक अखिल भारतीय दृष्टिकोण से अपने वोटर को एक आम भारतीय नागरिक के रूप में देखे। उसी के अनुसार अपनी पॉलिसी बनाए। आज यहाँ एक सच्चे भारतीय राष्ट्रनायक का अकाल पड़ गया लगता है।

हमारे यहाँ के मतदाता द्वारा मत डालने का पैटर्न भी एक अबूझ पहेली है। जो महान चुनाव विश्लेषक अब टीवी चैनलों पर अवतरित होंगे वे भी परिणाम घोषित होने के बाद ही इसकी सटीक व्याख्या प्रस्तुत कर सकेंगे। इसके पहले तुक्केबाजी का व्यापार तेज होगा। कई सौ घंटे का एयर टाइम अनिश्चित बातों की चर्चा पर बीतेगा। इसे लोकतन्त्र का पर्व कहा जाएगा।

मेरे मन का वोटर अपने वोट का बटन दबाने से पहले यह जान लेना चाहता है कि क्या कोई एक व्यक्ति ऐसा है जो अपने मनमें सभी जातियों, धर्मों, क्षेत्रों, रंगो, सम्प्रदायों, व्यवसायों, भाषाओं और बोलियों के लोगों के प्रति समान भाव रखता हो? शायद नहीं। ऐसा व्यक्ति इस देश में पैदा ही नहीं हो सकता। इस देश में क्या, किसी देश में नहीं हो सकता।  इस प्रकार के विपरीत लक्षणों का मिश्रण तो हाइब्रिड तकनीक से ही प्राप्त किया जा सकता है।

इस धरती पर भौतिक रूप से कोई एक विन्दु ऐसा ढूँढा ही नहीं जा सकता जहाँ से दूसरी सभी वस्तुएं समान दूरी पर हों। फिर इस बहुरंगी समाज में ऐसा ज्योतिपुञ्ज कहाँ मिलेगा जो अपना प्रकाश सबपर समान रूप से डाल सके?

प्लेटो ने ‘फिलॉस्फर किंग’ की परिकल्पना ऐसे ही नहीं की होगी। उन्होंने जब लोकतंत्र को भीड़तंत्र में बदलते देखा होगा और इसमें पैदा होने वाले अयोग्य नेताओं से भरोसा उठ गया होगा तभी उसने ‘पत्नियों के साम्यवाद’ का प्रस्ताव रखा होगा। यानि ऐ्सी व्यवस्था जिसमें हाइब्रिड के रूप में उत्कृष्ट कोटि की संतति पायी जा सके जिसे अपने माँ-बाप, भाई-बन्धु, नाते रिश्ते, जाति-कुल-गोत्र आदि का पता ही न हो और जिससे वह राज्य पर शासन करते समय इनसे उत्पन्न होने वाले विकारों से दूर रह सके। राजधर्म का पालन कर सके।

आज विज्ञान की तरक्की से उस पावन उद्देश्य की प्राप्ति बिना किसी सामाजिक हलचल के बगैर की जा सकती क्या? …सोचता हूँ, इस दिशा में विचार करने में हर्ज़ ही क्या है?

(सिद्धार्थ)

गान्धीजी नहीं हैं… अच्छा है।

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बापू,

सादर नमन्‍…

ये अच्छा ही है जो आज तुम हमारे बीच नहीं हो…।

यदि होते तो बहुत तकलीफ़ में रहते…।

आसान नहीं है आँख, कान, मुँह बन्द रखना…

कुर्सी में धँसकर गान्धी का कत्ल…

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अभी-अभी इलाहाबाद में एक गान्धी आये थे। …राहुल गान्धी । चर्चा में ‘गान्धी ’ पर बहस हो गयी… राहुल, वरुण, संजय, राजीव, इन्दिरा, फिरोज़, से होते हुए बात ‘असली गान्धी ’ तक पहुँच गयी।

सत्य, अहिंसा, भाईचारा, धार्मिक सहिष्णुता, गरीबी उन्मूलन, दरिद्रनारायण की सेवा, अस्पृश्यता निवारण का ध्येय, गीता के निष्काम-कर्म का प्रेय; यही तो थी गान्धी की राह! …विदेशी दुश्मन के सामने निर्भीक सीना ताने अडिग अपनी टेक पर स्वराज की चाह!

…साम्प्रदायिकता से लड़ाई अकेले लड़ने की धुन …जब पूरा देश स्वतंत्रता का झण्डा फहरा रहा था …तो भी वह संत इन्सानियत के शीतल जल से नोआखाली में हैवानियत की आग बुझा रहा था …

एक वहशी हिन्दू को यह गान्धीगीरी रास न आयी… उसकी गोलियों ने ‘राम-नाम’ के रस में डूबे उस निर्भीक सीने में जगह बनायी…। कानून ने पूरी चुस्ती और फुर्ती से अपना काम दिखाया …उस दरिन्दे को नियमानुसार फाँसी पर लटकाया। देश के नेताओं ने सबको ढाँढस बँधाया… “गान्धी व्यक्ति नहीं विचार है-जो कभी नहीं मरता…” ऐसा समझाया।

लेकिन यह बात समझने में हमारी आत्मा रोज झिझकती है। मन में बारम्बार यह बात खटकती है… गान्धी की तस्वीर को अपने पीछे की दीवार पर टाँगकर, उसके ‘विचारों’ की जघन्य हत्या करने की दुर्घटना रोज ही घटती है…

अखबार पलटता हूँ तो साफ दिखता है, कि आज कश्मीर में, हो रहा है रोज गान्धी का खून सरेआम… इसे अन्जाम देने वाले पहनते हैं गान्धी आश्रम की खादी… काट रहे हैं सत्ता की चाँदी… और उसी की टोपी पहनकर तिरंगे को करते हैं सलाम…

फैलने देते हैं साम्प्रदायिकता का जहर… बैठे हुए सत्ता की मखमली गद्दी में धँसकर… हिंसा को तबतक चलने देते हैं, जबतक न बन न जाये यह आँधी… भले ही कब्र में करवट बदलते-बदलते उकता कर उठ बैठें इनके बापू गान्धी…

अमरनाथ के यात्री भी हो जाते हैं अस्पृश्य, अपने ही देश में नहीं मिलती दो ग़ज जमीन, हो जाती है दुर्लभ, जहाँ बैठकर सुस्ता सकें… बाबा के दर्शन की थकान, घड़ीभर ठहरकर मिटा सकें…

ये संप्रभु राष्ट्र के शासक, जो बन बैठे अपनी कुल मर्यादा के विनाशक…। गान्धी की निर्भीकता और साहस को दफ़न करके डर से सहमते हैं… उन मूर्ख आततायियों से, जो एक ‘तानाशाह’ देश की शह पर, मज़हबी खूँरेज़ी के रास्ते से ‘ख़ुदमुख्तारी’ की बात करते हैं…।

आजादी दिलाने वाली पार्टी का विघटन करना ही उचित, यह मेरा नहीं उसी गान्धी का था विचार… लेकिन कत्ल इसका उसी क्षण हुआ जब बनी पहली भारत सरकार…।

गान्धी के ही नाम पर सत्ता की दुकानदारी चलती रही… देश में मक्कारी, गरीबी, मज़हब की तरफ़दारी, और जात-पात की लड़ाई बदस्तूर पलती रही…

गान्धी के इस देश में, उनके विचारों का यूँ तिल-तिलकर मरना हमें बहुत अँखरता है… हमारे सामने ही गान्धी के इन वंशजों के हाथों, गान्धी जो रोज मरता है…।

indiatimes.com से साभार

सोचिए, और बताइए… कहाँ है वो कानून, कहाँ अटक गया है? …गोडसे को फाँसी देने के बाद किस अन्धेरे गलियारे में भटक गया है?
(सिद्धार्थ)