राजा क्या करता है… घोटाला?

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सप्ताहांत अवकाश था तो बच्चों के साथ थोड़ा समय बिताने का मौका मिला। वैसे तो मैं इस छुट्टी के दिन का सदुपयोग मन भर सो लेने के लिए करना चाहता हूँ लेकिन बच्चों की दुनिया सामने हो तो बाकी सबकुछ भूल सा जाता है। सत्यार्थ अभी अपना पाँचवाँ जन्मदिन मनाने वाले हैं लेकिन उनका खाली समय जिस प्रकार के कम्प्यूटरी खेलों में बीतता है उसे देखकर मुझे रा.वन, जी.वन और ‘रोबोट’ फिल्म के वशीकरण और चिट्टी के सपने आने लगते हैं। मुझे कभी-कभी चिन्ता होने लगती है कि इस जमाने की हवा कहीं उनका बचपन जल्दी ही न छीन ले। छोटी सी उम्र में इतनी बड़ी-बड़ी हाई-टेक बातें निकलती हैं; ऐसे-ऐसे एक्शन होते हैं कि मैं चकरा जाता हूँ।

मेरी कोशिश होती है कि उनका ध्यान टीवी के कार्टून चैनेल्स और कम्प्यूटर के ऑनलाइन गेम्स की दुनिया से बाहर खींचकर कुछ पारंपरिक और देशज खेलों की ओर ले जाऊँ। लेकिन लूडो और साँप सीढ़ी के खेल उन्हें बोर करते हैं। अब ‘मोनॉपली’ और ‘प्लॉट-फोर’ में वे बड़ों-बड़ों को हराने का आनंद लेते हैं। इसमें वे अपने दादा जी के साथ-साथ मुझे भी मात दे चुके हैं। अब अपने से छः साल बड़ी दीदी के साथ उसके स्तर के खेल पूरी निपुणता से खेलते हैं। कम्प्यूटर पर रोज नया गेम सर्च कर लेते हैं और घंटों ‘की-बोर्ड’ के माध्यम से उछल-कूद, मार-धाड़, लुका-छिपी और निशानेबाजी करते रहते हैं। इसके नुकसान से बचाने के लिए घर में कम्प्यूटर का समय सीमित करने के लिए नियम बनाने पड़े हैं।

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इस शनिवार मैंने टीवी और कम्प्यूटर बन्द रखा। इन्हें अपने पास बुलाया और दुनिया भर की बातें करने की कोशिश की। स्कूल का हाल-चाल पूछा। क्लास टीचर मै’म कैसी लगती हैं, कैसा पढ़ाती हैं, यह भी पूछ लिया। लेकिन ये मायूस थे। इनकी दीदी अपनी दोस्त के घर चली गयी थी। वह दोस्त जो बीमारी में स्कूल नहीं जा सकी थी और उसका क्लास वर्क पिछड़ गया था। वागीशा उसी की मदद के लिए कुछ घंटे इनसे दूर चली गयी थी; और ये बुरी तरह से बोर हो रहे थे। जब मैंने दूसरों की मदद करने को अच्छा काम बताया और इन्हें यह सब समझ पाने में ‘समर्थ’ होने के लिए प्रशंसा की और बधाई दी तो ये खुश हो गये। फिर बोले- तो ये तो बताओ, मैं अकेले कौन सा खेल खेलूँ?

मैंने कहा- मोनोएक्टिंग करिए। एकल अभिनय। थोड़े संकेत में ही ये समझ गये। डबल बेड पर खड़ा होकर सबसे पहले हनुमान जी की तरह हवा में गदा भाँजने लगे। फिर रोबोट फिल्म के चिट्टी की तरह मशीनी चाल चलने लगे। एक-एक कदम की सटीक नकल देखकर मैं हैरत में पड़ गया। मैं उन्हें यह खेल थमाकर वहीं एक किनारे लेट गया। ये तल्लीन होकर विविध पात्रों की एक्टिंग करने लगे।

इसी शृंखला में एक पात्र राजा का आया जो अपने अनुचर से तमाम फरमाइशें कर रहा था; और अनुचर अपने ‘आका’ के हुक्म की तामील कर रहा था। प्रत्येक संवाद पर पात्र की स्थिति के अनुसार स्थान परिवर्तन हो रहा था। राजा एक काल्पनिक सिंहासन से बोल रहा था और अनुचर नीचे घुटना टेककर बैठे हुए।

-सिपाही…
-हुक्म मेरे आका…
-जाओ मिठाई ले आओ…
-जो हुक्म मेरे आका…
-जाओ, बिस्कुट लाओ…
-जो हुक्म मेरे आका…
-जाओ, सेब लाओ…
-जो हुक्म मेरे आका…
-जाओ, मैगी लाओ…
-जो हुक्म मेरे आका…
-जाओ, चॉकलेट लाओ…
-जो हुक्म मेरे आका…
-जाओ, कुरकुरे लाओ…
-जो हुक्म मेरे आका…
-जाओ, एप्पल लाओ…
-जो हुक्म मेरे आका…
-जाओ, बनाना लाओ…
-जो हुक्म मेरे आका…
-जाओ, किंडर-जॉय लाओ…
-जो हुक्म मेरे आका…
-जाओ, ….

अब फरमाइशी सामग्री का नाम नहीं सूझ रहा था। इसलिए प्रवाह थमने लगा। मेरी भीतरी मुस्कान अब हँसी बनकर बाहर आने लगी थी। मैंने चुहल की- अरे राजा केवल खाता ही रहेगा कि कोई काम भी करेगा?

वे विस्मय छिपाते हुए पूरा आत्मविश्वास सहेजकर बोले- राजा क्या करता है? वह तो बस खाता-पीता और आराम ही करता है।

मैंने कहा- नहीं, ऐसी बात नहीं है। वह अपने राज्य में बड़े-बड़े काम करता है।

उन्होंने पूछा- राजा कौन से बड़े काम करता है?

मुझे मजाक सूझा, मैने कहा- ‘राजा’ बड़े-बड़े घोटाले करता है।

‘घोटाला’ शब्द उनके लिए बिल्कुल नया था। वे सोच में पड़ गये।

थोड़ी देर उधेड़-बुन करने के बाद  मुझसे ही पूछ लिया- डैडी, यह घोटाला कैसे किया जाता है?

अब झेंपने की बारी मेरी थी। कैसे समझाऊँ कि कैसे किया जाता है। वे घोटाला करने का अभिनय करने को उतावले थे। मेरी बात पकड़कर बैठ गये। “बताओ न डैडी….”

मैने समझाया- बेटा, जब देश का राजा जनता की मेहनत से कमाया हुआ पैसा हड़प लेता है और उसे जनता की भलाई के लिए खर्च नहीं करता है तो उसे घोटाला करना कहते हैं।

-हड़पने का मतलब क्या होता है?

-मतलब यह कि जो चीज अपनी नहीं है, दूसरे की है उसे जबरदस्ती ले लेना या चुरा लेना।

-अच्छा, तो अब मैं चला दूसरों का पैसा चुराने…

इसके बाद वे बिस्तर से कूदकर नीचे आये और एक काल्पनिक गठरी बगल में दबाए दौड़ते हुए बाहर भाग गये।

उफ़्फ़्‌, खेल-खेल में मैंने यह क्या सिखा दिया?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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घर में जंग की नौबत : टालिए न…!

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आज मेरे घर में बात-बात में एक बहस छिड़ गयी। बहस आगे बढ़कर गर्मा-गर्मी तक पहुँच गयी है। घर में दो धड़े बन गये हैं। दोनो अड़े हुए हैं कि उनकी बात ही सही है। दोनो एक दूसरे को जिद्दी, कुतर्की, जब्बर, दबंग और जाने क्या-क्या बताने पर उतारू हैं। दोनो पक्ष अपना समर्थन बढ़ाने के लिए लामबन्दी करने लगे हैं। मोबाइल फोन से अपने-अपने पक्ष में समर्थन जुटाने का काम चालू हो गया है। अपने-अपने परिचितों, इष्ट-मित्रों व रिश्तेदारों से बात करके अपनी बात को सही सिद्ध करने का प्रमाण और सबूत इकठ्ठा कर रहे हैं। अब आप जानना चाहेंगे कि मुद्दा क्या है…?

तो मुद्दा सिर्फ़ इतना सा है कि यदि कोई व्यक्ति स्कूटी, स्कूटर, मोटरसाइकिल इत्यादि दुपहिया वाहन चलाना सीखना चाहे तो इसके लिए उसे पहले साइकिल चलाना आना चाहिए कि नहीं?

प्रथम पक्ष का कहना है कि जब तक कोई साइकिल चलाना नहीं सीख ले तबतक वह अन्य मोटर चालित दुपहिया वाहन नहीं सीख सकता। इसके समर्थन में उसका तर्क यह है कि दुपहिया सवारी पर संतुलन बनाये रखने का कार्य पूरे शरीर को करना पड़ता है जिसका अभ्यास साइकिल सीखने पर होता है। साइकिल चलाने आ जाती है तो शरीर अपने आप आवश्यकतानुसार दायें या बायें झुक-झुककर दुपहिया सवारी पर संतुलन साधना सीख जाती है। शरीर को यह अभ्यास न हो तो अन्य मोटरचालित दुपहिया वाहन सीख पाना सम्भव नहीं तो अत्यन्त कठिन अवश्य है। इसलिए पहले साइकिल सीखना जरूरी है।

द्वितीय पक्ष का कहना है कि साइकिल चलाने में असंतुलित होने की समस्या ज्यादा इसलिए होती है कि उसमें पैडल मारना पड़ता है। जब पैर दायें पैडल को दबाता है तो साइकिल दाहिनी ओर झुकने लगती है और जब बायें पैडल को दबाता है तो बायीं ओर झुकती है। इस झुकाव को संतुलित करने के लिए शरीर को क्रमशः बायीं और दायीं ओर झुकाना पड़ता है। लेकिन मोटरचालित दुपहिया में यह समस्या नहीं आयेगी क्योंकि उसमें पैर स्थिर रहेगा और पैडल नहीं दबाना होगा। जब एक बार गाड़ी चल पड़ेगी तो उसमें संतुलन अपने आप स्थापित हो जाएगा। इसलिए स्कूटी सीखने के लिए साइकिल चलाने का ज्ञान कत्तई आवश्यक नहीं है।

फोटोसर्च.कॉम से साभार

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इन दो पक्षों में सुलह की गुन्जाइश फिलहाल नहीं दिखती। प्रथम पक्ष का कहना है कि यदि द्वितीय पक्ष एक भी ऐसे व्यक्ति को सामने ला दे जो बिना साइकिल सीखे ही स्कूटी/ मोटरसाइकिल चलाना सीख गया हो तो वह हार मान जाएगा और उस ‘दिव्य आत्मा’ का शागिर्द बन जाएगा। दूसरे पक्ष को किसी ने फोन पर आश्वासन दिया है कि वह ऐसे आम आदमियों, औरतों व लड़के-लड़कियों की लाइन लगा देंगे जिन्होंने ‘डाइरेक्ट’ मोटरसाइकिल- स्कूटर चलाना सीख लिया है।

अब प्रथम पक्ष दिल थामे उस लाइन की प्रतीक्षा में है जो उसके घर के सामने लगने वाली है। लेकिन समय बीतने के साथ अभी उसके आत्मविश्वास में कोई कमी नहीं आयी है क्योंकि अभी कोई उदाहरण सामने नहीं आया है। मुद्दा अभी गरम है। सबूतों और गवाहों की प्रतीक्षा है।

इस मुद्दे को यहाँ लाने का उद्देश्य तो स्पष्ट हो ही गया है कि कुछ जानकारी यहाँ भी इकठ्ठी की जाय। ब्लॉग-जगत में भी तमाम (अधिकांश प्राय) लोग ऐसे हैं जो दुपहिया चलाना जानते हैं। आप यहाँ बताइए कि आपका केस क्या रहा है- पहले साइकिल या ‘डाइरेक्ट’ मोटर साइकिल? निजी अनुभव तो वास्तविक तथ्य के अनुसार बताइए लेकिन इस मुद्दे का व्यावहारिक, वैज्ञानिक और सैद्धान्तिक विवेचन करने की भी पूरी छूट है।

(नोट : घर के भीतर प्रथम पक्ष का प्रतिनिधित्व कौन कर रहा है व दूसरे पक्ष का कौन, यह स्वतःस्पष्ट कारण से गोपनीय रखा जा रहा है।)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)  

रेलवे की जुगाड़ सुविधा…

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समय: प्रातःकाल 6:30 बजे

स्थान: बर्थ सं.18 – A1, पटना-सिकंदराबाद एक्सप्रेस

इस पोस्ट को लिखने का तात्कालिक कारण तो इस ए.सी. कोच का वह ट्वॉएलेट है जिससे निकलकर मैं अभी-अभी आ रहा हूँ और जिसके दरवाजे पर लिखा है- ‘पाश्चात्य शैली’। लेकिन उसकी चर्चा से पहले बात वहाँ से शुरू करूँगा जहाँ पिछली पोस्ट में छोड़ रखा था।

आप जान चुके हैं कि वर्धा से कार में इलाहाबाद के लिए चला था तो एक चौथाई रास्ता टायर की तलाश में बीता। जबलपुर में टायर मिला तो साथ में एक पोस्ट भी अवतरित हो ली। आगे की राह भी आसान न थी। रीवा से इलाहाबाद की ओर जाने वाला नेशनल हाई-वे पिछले सालों से ही टूटा हुआ है। अब इसकी मरम्मत का काम हो रहा है। नतीज़तन पूरी सड़क बलुआ पत्थर, पथरीली मिट्टी और बेतरतीब गढ्ढों का समुच्चय बनी हुई है। पिछले साल इसी रास्ते से वर्धा जाते समय मुझे करीब चालीस किमी. की दूरी पार करने में ढाई घंटे लग गये थे। इसलिए इस बार मैं सावधान था।

मैंने अपने एक मित्र से वैकल्पिक रास्ता पूछ लिया था जो रीवा से सिरमौर की ओर जाता था; और काफी घूमने-फिरने के बाद रीवा-इलाहाबाद मार्ग पर करीब साठ किमी आगे कटरा नामक बाजार में आकर मिल जाता था। रीवा से सिरमौर तक चिकनी-चुपड़ी सड़क पर चलने के बाद हमें देहाती सड़क मिली जो क्यौटी होते हुए कटरा तक जाती थी। हमें दर्जनों बार रुक-रुककर लोगों से आगे की दिशा पूछनी पड़ी। एक गाँव के बाहर तिराहे पर भ्रम पैदा हो गया जिसे दूर करने के लिए हमें पीछे लौटकर गाँव के भीतर जाना पड़ा। अँधेरा हो चुका था। कोई आदमी बाहर नहीं दिखा। एक घर के सामने गाड़ी रोककर ड्राइवर रास्ता पूछने के लिए उस दरवाजे पर गया। दो मिनट के भीतर कई घरों के आदमी हाथ में टॉर्च लिए गाड़ी के पास इकठ्ठा हो गये। फिर हमें रास्ता बताने वालों की होड़ लग गयी। कम उम्र वालों को चुप कराकर एक बुजुर्गवार ने हमें तफ़्सील से पूरा रास्ता समझा दिया। उनके भीतर हमारी मदद का ऐसा जज़्बा था कि यदि हम चाहते तो वे हमारे साथ हाइ-वे तक चले आते।

खैर, आगे का करीब चालीस किमी. का सर्पाकार देहाती रास्ता प्रायः गढ्ढामुक्त था। रात का समय था इसलिए इक्का-दुक्का सवारी ही सामने से आती मिली। सड़क इतनी पतली थी कि किसी दुपहिया सवारी को पार करने के लिए भी किसी एक को सड़क छोड़ने की नौबत आ जाती। जब हम हाइ-वे पर निकल कर आ गये तो वही क्षत-विक्षत धूल-मिट्टी से अटी पड़ी सड़क सामने थी। उफ़्‌… हम हिचकोले खाते आगे बढ़ते जा रहे थे और सोचते जा रहे थे कि शायद हमारा वैकल्पिक रास्ते का चुनाव काम नहीं आया। खराब सड़क तो फिर भी मिल गयी। हमने कटरा बाजार में गाड़ी रुकवायी। सड़क किनारे दो किशोर आपस में तल्लीनता से बात कर रहे थे। उनमें से एक साइकिल पर था। जमीन से पैर टिकाए। दूसरा मोबाइल पर कमेंट्री सुन रहा था और अपने साथी को बता रहा था।

मैंने पूछा- भाई, यह बताओ यह सड़क अभी कितनी दूर तक ऐसे ही खराब है?

लड़का मुस्कराया- “अंकल जी, अब तो आप ‘कढ़’ आये हैं। पाँच सौ मीटर के बाद तो क्या पूछना। गाड़ी हवा की तरह चलेगी।” उसने अपने दोनो हाथों को हवा में ऐसे लहराया जैसे पानी में मछली के तैरने का प्रदर्शन कर रहा हो। जब हमने बताया कि हम हाई-वे से होकर नहीं आ रहे हैं बल्कि सिरमौर होकर आ रहे हैं तो उसने हमें शाबासी दी और बुद्धिमान बता दिया। बोला- जो लोग हाई-वे से आ रहे हैं उनकी गाड़ी लाल हो जाती है। गेरुए मिट्टी-पत्थर की धूल से। आप अपनी कार  ‘चीन्ह’  नहीं पाते। हमें समझ में आ गया कि आगे का रास्ता बन चुका है। हम खुश हो लिए और आगे चल दिए। इलाहाबाद तक कोई व्यवधान नही हुआ।

इलाहाबाद में सरकारी काम निपटाने के अलावा अनेक लोगों से मिलने का सुख मिला। आदरणीय ज्ञानदत्त पांडेय जी के घर गया। श्रद्धेया रीता भाभी के दर्शन हुए। सपरिवार वर्धा जाकर नौकरी करने के हानि-लाभ पर चर्चा हुई। गुरुदेव के स्वास्थ्य की जानकारी मिली। लम्बे समय तक चिकित्सकीय निगरानी में रहने और लगातार दवाएँ लेते रहने की मजबूरी चेहरे पर स्थिर भाव के रूप में झलक रही थी। वे इस बार कुछ ज्यादा ही गम्भीर दिखे।

प्रयाग में मेरे पूर्व कार्यस्थल-कोषागार से जुड़े जितने भी अधिकारी-कर्मचारी और इष्टमित्र मिले उन सबका मत यही था कि मुझे अपना प्रदेश और इलाहाबाद छोड़कर बाहर नहीं जाना चाहिए था। इस विषय पर फिर कभी चर्चा होगी।

वर्धा वापस लौटने का कार्यक्रम रेलगाड़ी से बना। दिन भर मंगल-व्रत का फलाहार लेने के बाद शाम को एक मित्र की गृहिणी के हाथ की बनी रोटी और दही से व्रत का समाहार करके मैं स्टेशन आ गया। अनामिका प्रकाशन के विनोद शुक्ल और वचन पत्रिका के संपादक प्रकाश त्रिपाठी गाड़ी तक विदा करने आये। उन्हें हार्दिक धन्यवाद देकर हम विदा हुए। रात में अच्छी नींद आयी।

आज सुबह जब हम ‘पाश्चात्य शैली’ के शौचालय में गये तो वहाँ का अद्‌भुत नजारा देखकर मुस्कराए बिना न रह सके। साथ ही पछताने लगे कि काश कैमरा साथ होता। फिलहाल ट्वॉएलेट की देखभाल करने वालों के बुद्धि-कौशल और गरीबी में भी काम चला लेने की भारतीय प्रतिभा का नमूना पेश करते इस ए.सी. कोच के पश्चिमी बनावट वाले शौचालय की कुछ तस्वीरें मैंने अपने मोबाइल से ही खींच डाली हैं। खास आपके लिए। देखिए न…

IMG0069A भारत की एक बड़ी आबादी जैसे स्थानों पर शौच आदि से निवृत्त होती है उससे बेहतर सफाई है यहाँ। यह दीगर बात है कि सीट को ट्‍वाएलेट पेपर से अपने हाथों साफ़ करने के बाद फोटो लेने का विचार आया।
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IMG0070A ट्‍वाएलेट पेपर …? पूरा बंडल उपलब्ध है जी। भले ही इसे रखे जाने का मूल बक्सा बेकार हो गया है लेकिन ठेकेदार ने इसे पॉलीथीन से बाँधकर वहीं लटका छोड़ा है। इसे प्रयोगार्थ निकालने के लिए थोड़ी ही मशक्कत करनी पड़ी।
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IMG0061A हाथ धुलने के लिए पेपर सोप रखने की कोई जरूरत नहीं। रेलवे द्वारा लिक्विड सोप की सुविधा गारंटीड है। इसे रखने की डिबिया अपने स्थान से उखड़ गयी तो भी कोई बात नहीं।  ‘रेलनीर’  की बोतल तो है। साबुन भरकर बेसिन के बगल में ही लटका रखा है। जी भर इस्तेमाल करें।
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IMG0062A ट्‍वाएलेट पेपर रोल को पॉलीथीन से बाँध कर रखने का काम बहुत बुद्धिमानी से किया गया है। स्टील फ्रेम में न होने के बावजूद यह नाचता भी है और थोड़ी  मेहनत करने पर टुकड़ों में निकल भी आता है। मनोरंजक भी है और स्किल टेस्टिंग भी…
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IMG0068A येजो चमक रहे हैं उनमें एक स्टील का जग है, पानी की टोटी है, और स्वयं पानी है जो नीचे जमा है। जो नहीं चमक रही है वह लोहे की जंजीर है जिससे जग बँधा हुआ है। कौन जाने यह कीमती जग किसी को भा जाय और दूसरे यात्रियों को परेशानी उठानी पड़े। इसीलिए बाँध के डाल दिया होगा।
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IMG0066A यदि आप पेपर का प्रयोग नहीं कर पाते और संयोग से टंकी का पानी खत्म होने के बाद आपकी बारी आयी तो क्या करेंगे? चिंता मत करिए…। एक बोतल एक्स्ट्रा पानी भी में डाल दिया गया है उधर कोने में…
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रेल  हमारी सुविधाओं का कितना
ख्याल रखती है

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

दास्ताने स्कूटर… बहुत कठिन है डगर।

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पिछली कड़ी में आपने पढ़ा…

…तभी एक हँसमुख डॉक्टर साहब ने मुस्कराते हुए कहा- “मुझे इसका बहुत अच्छा अनुभव है। आपकी समस्या का जो पक्का समाधान है वह मैं बताता हूँ…। ऐसा कीजिए इसे जल्दी से जल्दी बेंच दीजिए…। जो भी दो-तीन हजार मिल जाय उसे लेकर खुश हो जाइए और मेरी तरह शेल्फ़-स्टार्ट वाली स्कूटी ले लीजिए…” वहाँ उपस्थित सभी लोग ठठाकर हँस पड़े, इनका चेहरा उतर गया और मेरे पहियों के नीचे से जमीन खिसक गयी…।

अब आगे…

लेकिन इन्होंने धैर्य नहीं खोया। बोले- “बेंचने का तो मैंने कभी सोचा ही नहीं; अधिक से अधिक मैं इसे वापस उत्तर प्रदेश भेज दूंगा। वहाँ पर इसके स्पेयर पार्ट्स मिल जाएंगे। …आपलोग बस इतना कन्फ़र्म कर दीजिए कि उद्योगपति जमनालालाल बजाज के मूलस्थान वर्धा में बजाज स्कूटर का एक भी मिस्त्री नहीं है। दीपक तले अंधेरा की इस मिसाल को मैं पूरी दुनिया को बता लूँगा उसके बाद ही हार मानूंगा।” इतना सुनने के बाद वहाँ के डिप्टी स्पोर्ट्स ऑफीसर ने कहा कि आप घबराइए नहीं; मैं आपको एक एक्सपर्ट के पास ले चलता हूँ। मेरे मुहल्ले में रहता है। इन्होंने मुझे उनकी बाइक के पीछे लगा दिया। कई चौराहों, तिराहों और अंधे मोड़ों को पार करते हुए, मोटी-पतली गलियों से गुजरते हुए हम अंततः एक मिस्त्री के दरवाजे पर जा पहुँचे। सुबह आठ बजे का वक्त था और उसके छोटे से अहाते से लेकर बाहर सड़क तक पंद्रह-बीस मोटरसाइकिलें आड़े-तिरछे खड़ी हुईं थीं। इन्होंने उचक-उचक कर देखा, उस भीड़ में एक भी स्कूटर नहीं दिखा।

‘नितिन मिस्त्री’ ने अभी काम शुरू नहीं किया था। ये सभी गाड़ियाँ पिछले दिन इलाज के लिए भर्ती हुईं थीं। उस भीड़ की ओर देखते हुए स्पोर्ट्स ऑफीसर ने भावपूर्ण मुस्कान बिखेरी। मानो कह रहे हों- “देखा, कितना बड़ा मिस्त्री है… गाड़ियों की लाइन लगी है। एक दिन जमा करो तो दूसरे-तीसरे दिन नम्बर लगता है”

मुझे उस मुस्कान में कोई आशा की किरण नहीं दिखी। यदि बोल पाता तो मैं कहता- “हाँ देख रहा हूँ… कितना चिरकुट मिस्त्री है। आठ-गुणा-आठ फुट के कमरे में तीन-चार बच्चो और पत्नी के साथ रह रहा है और साथ में शायद एक छोटा भाई भी है। इतनी ही कमाई होती तो एक बड़ा गैरेज न बना लेता…!! काम अधिक है तो असिस्टेंट रख लेता, स्टाफ़ बढ़ा लेता…!!!”  दर‌असल मुझे वहाँ ‘प्रोफ़ेसनलिज़्म’ का घोर अभाव दिखायी दे रहा था।

स्पोर्ट्स ऑफीसर ने नितिन मिस्त्री को बुलाया जो ब्रश करते हुए बाहर निकला। आपस में दोनो ने मराठी में कुछ बात की। वे शायद हम नये ग्राहकों का परिचय बता रहे थे। कुछ देर बाद मिस्त्री मेरे मालिक से मुखातिब हुआ, “सर जी, हम इसको देख तो लेंगा लेकिन इसमें कोई स्पेयर पार्ट ‘लगेंगा’ तो यहाँ नहीं मिल ‘पायेंगा’।  नागपुर से आपको मँगाना पड़ेंगा…” हमें इस बात की उम्मीद तो पहले से ही थी इसलिए उसके बाद तय यह हुआ कि मिस्त्री मेरी जनरल सर्विसिंग करेगा। मेरी हेड लाइट का स्विच जाम हो गया है उसकी ऑयलिंग-ग्रीसिंग करेगा, पुरानी हो चुकी बैटरी बदल देगा ताकि हॉर्न और लाइट तेज हो सके, लेकिन ‘चोक-वायर’ की समस्या ठीक होने की गारंटी नहीं होगी। कोई जुगाड़ आजमाने की कोशिश करेगा लेकिन सफलता की संभावना क्षीण ही है। इन्होंने जब संभावित समय पूछा तो मध्यस्थ महोदय के दबाव में उसने मुझे ‘अगले दिन भर्ती कर लेने’ पर सहमति दे दी।

अगले दिन स्टेडियम से हम दुबारा उसकी दुकान पर पहुँचे। मिस्त्री ने इन्हें घर तक छोड़ा और मुझे वापस अपने घर/दुकान/गैरेज पर ले जाकर खड़ा कर दिया। मैं दिन भर दूसरी बाइक्स का आना-जाना देखता रहा। मिस्त्री वास्तव में बहुत बिजी था। उसकी मेहनत की तुलना में उसका मेहनताना बहुत कम था। ज्यादातर ग्राहक उसके परिचित टाइप थे जो छोटी-मोटी गड़बड़ियाँ मुफ़्त में ठीक कराने की फिराक में लगे रहते थे। पिछले दिन से भर्ती गाड़ियाँ एक-एक कर जाती रहीं और शाम तक उतनी दूसरी गाड़ियाँ आकर जमा हो गयीं। मेरी पैरवी करने वाला कोई नहीं था, इसलिए मुझे शाम होने तक उसने हाथ नहीं लगाया। शाम को छः बजे मेरे मालिक का फोन आया कि काम पूरा हो गया हो तो मुझे लेने आ जाँय। ऑफिस से छूटते वक्त इन्होंने फोन किया होगा। इधर से मिस्त्री ने जवाब दिया कि अभी थोड़ा काम बाकी रह गया है। एकाध घंटे बाद हो पाएगा। फोन पर मिस्त्री के हाव-भाव से लगा कि वे इस समय मुझे लेने नहीं आ रहे हैं, क्योंकि उसने उस फोन के बाद भी मुझे छुआ नहीं था।

अगले दिन सुबह आठ बजे ये स्टेडियम से खेलकर कार से गैरेज पर  आये तो मेरी बारी आ चुकी थी। हेडलाइट का स्विच ठीक हो चुका था लेकिन असली समस्या जस की तस थी। मिस्त्री ने उन्हें बताया कि स्कूटर के लिए ‘ओरिजिनल बैटरी’ कल मिल नहीं पायी थी। आज मँगाया है। शाम तक मैं चोक का भी कुछ कर दूँगा। ये चले गये तो उसने दूसरी गाड़ियों का काम शुरू कर दिया। आखिरकार दोपहर बाद बैटरी बदली गयी। शाम को ये आये तो मिस्त्री ने चोक की समस्या न ठीक कर पाने के कई कारण गिनाने शुरू किए। इन्होंने उससे पारिश्रमिक पूछकर डेढ़ हजार रूपये थमाए और मुझे लेकर घर आ गये।

अगले दिन से इन्होंने चोक वायर की खोज शुरू की। इनके एक मित्र इलाहाबाद से वर्धा आने वाले थे। उनसे इन्होंने कहा कि बजाज-लीजेंड में जितने किस्म के ‘वायर’ लगते हों सभी वहाँ से लेते आयें। एक सप्ताह बाद क्लच-वायर, एक्सीलरेटर-वायर और चोक वायर इलाहाबाद से वर्धा की यात्रा करके आ गये। अगले दिन चोक वायर के साथ मुझे नितिन के गैरेज़ भेजा गया। एक बार फिर चौबीस घंटे की प्रतीक्षा के बाद नम्बर आया। लेकिन दुर्भाग्य के क्षण अभी समाप्त नहीं हुए थे…Sad smile

पुराना केबल निकालकर नया केबल डालने में उसके पसीने छूट गये। अंततः उसने हार मान ली। फोन करके इसने बता दिया कि इलाहाबाद से मँगाया हुआ चोक-वायर इस मॉडल का नहीं हैं इसलिए नहीं लग सकता। फिर एक विचित्र जुगाड़ लगाने का काम शुरू हुआ। चोक वायर के दोनो सिरों पर घुंडियाँ होती हैं। एक सिरा दाहिनी हैंडिल के पास बने लीवर के खाँचे में फिट होता है और दूसरा सिरा कार्ब्यूरेटर में जाता है जहाँ एक स्प्रिंग के साथ जोड़कर इसे खास तरीके से फिट किया जाता है। नितिन मिस्त्री ने एक पुराने तार के घुंडी वाले सिरे को नीचे कार्ब्यूरेटर में तो फिट कर दिया लेकिन दूसरे सिरे को उसके सही रूट से हैंडिल तक ले जाने के बजाय सीट के नीचे से दाहिनी ओर बाहर निकाल दिया और उसमें एक छल्ला बना दिया। इस प्रकार चोक लेने के लिए सीट के नीचे छिपे छल्ले को बाहर निकालकर उसमें उंगली फसाते हुए जोर से खींचना होता था और फिर इसी स्थिति में किक मारना होता था।

जुगाड़ वाला चोक लगवाकर हम घर आये। लेकिन इसमें एक बड़ी खामी रह गयी थी। छल्ला पकड़कर जोर से खींचने पर चोक लेने की प्रक्रिया तो पूरी हो गयी लेकिन छोड़ने पर तार ठीक से वापस नहीं हो पा रहा था। नतीजा यह हुआ कि एक बार चोक में ही तार अटका रह गया और मेरे मालिक मुझे चोक में ही हाँकते रहे। अलस्सुबह जब पहली किक में ही मैं भरभराकर स्टार्ट हो गया तो इन्हें कुछ संदेह तो हुआ लेकिन एक दो बार उस तार की पूँछ उल्टा घुसेड़ने के अलावा ये कुछ न कर सके। इनका संदेह यकीन में तब बदला जब मेरी टंकी का पेट्रोल सम्भावित समय से बहुत पहले ही खत्म हो गया। मुझे एक बार फिर उसी नितिन के पास जाना पड़ा। उसने ढ‌क्‌कन खोलकर फँसा हुआ तार छुड़ा दिया और तार को ‘आहिस्ता खींचने’ की ट्रेनिंग देकर चलता कर दिया।

अब दो-चार दिन के अभ्यास से काम आसान होता गया और जुगाड़ चल निकला। लेकिन एक दूसरी समस्या तैयार खड़ी थी।  अचानक क्लच वायर की घुंडी भी तीन-चार साल की सेवा देकर चल बसी। गनीमत थी कि यह दुर्घटना घर पर ही हुई, इसलिए मुझे ठेलकर चलाने की जरुरत नहीं पड़ी। वैसे तो नया क्लच वायर डालने में पाँच से दस मिनट ही लगते हैं लेकिन मिस्त्री की तलाश में ही तीन दिन लग गये। मुझको बिना क्लच के स्टार्ट करके दुकान तक ले जाना संभव नहीं था। इन्होंने नितिन मिस्त्री को फोन मिलाया तो उसने असमर्थता जताते हुए ‘ऑउट ऑफ़ स्टेशन’ होने की बात बतायी। दूसरी कई दुकानों पर संपर्क किया गया तो सबने कहा कि दुकान छोड़कर नहीं जाएंगे। गाड़ी यहीं लाइए, यह भी कि गाड़ी देखकर ही बता पाएंगे कि काम हो पाएगा कि नहीं। रोज़ शाम को ये घर आते और अपनी असफलता की कहानी मालकिन को सुनाते। मैं  उत्सुकता पूर्वक रोज किसी मिस्त्री की प्रतीक्षा करता रहा।

अंततः इन्होंने विश्वविद्यालय के इंजीनियर साहब को, जो यहाँ का स्थानीय निवासी ही हैं, मेरी समस्या बताकर एक मिस्त्री का जुगाड़ करने का अनुरोध किया। उन्होंने विश्वास दिलाया कि बहुत जल्द मेरा काम हो जाएगा। दो-दिन और बीते तब अचानक इनके ऑफ़िस का एक कर्मचारी एक मिस्त्री को लेकर आया और उसने दस मिनट में एक क्लच वायर फिट कर दिया। इलाहाबाद से आया क्लच-वायर का केबल पड़ा रह गया। इन्होंने उस मिस्त्री से अनुरोध किया कि यदि हो सके तो चोक वायर को उसके सही स्थान पर फिट कर दो। इसपर उसने कहा कि किसी दिन फुर्सत से गाड़ी दुकान पर भेज दीजिएगा। ठीक करा दूँगा।

अगले इतवार को इन्होंने स्वयं उसकी दुकान पर जाकर चोक वायर डलवाने का निश्चय किया। लेकिन जब इन्होंने मोबाइल पर आने की अनुमति माँगी तो उसने टरकाते हुए कहा कि आज वह मिस्त्री आया ही नहीं है जो इस काम का एक्सपर्ट है।

इतना सुनने के बाद कोई भी झुँझलाकर सिर पीट लेता। लेकिन दाद देनी पड़ेगी इनके धैर्य की और काम पूरा कराने की जिद्दी धुन की। ये चोक वायर की केबिल डिक्की में डाल मुझे लेकर शहर की ओर निकल पड़े। पूछते-पू्छते बजाज कंपनी की अधिकृत वर्कशॉप पर जा पहुँचे। वही वर्कशॉप जहाँ से बहुत पहले मुझे बैरंग लौटाया जा चुका था। उसबार इनके चपरासी ने मुझे वहाँ ले जाकर सर्विसिंग कराने की असफल कोशिश की थी। तब किसी मिस्त्री ने मुझे घास नहीं डाली थी। कहते थे कि इस शहर में यह गाड़ी है ही नहीं इसलिए हम इसका स्पेयर पार्ट नहीं रखते। कंपनी के नियमों के अनुसार हम बाहर से मँगाकर कोई स्पेयरपार्ट डाल भी नहीं सकते।

इस बार भी यही टका सा जवाब इन्हें मिला। लेकिन इन्होंने मैनेजर से बहस करनी शुरू की। बोले- यदि बजाज कंपनी ने मुझे यह स्कूटर बेचा है और आपको सर्विस सेंटर चलाने का लाइसेंस दिया है तो आपको इसे ठीक करना ही चाहिए…। यह कैसे होगा यह आप जानिए, लेकिन आप बिना सर्विस दिए लौटा नहीं सकते…। मैं इसके लिए ‘राहुल बजाज’ को भी एप्रोच कर सकता हूँ…। आपकी कम्पलेंण्ट करके कुछ नुकसान तो करा ही सकता हूँ। आप अपने उत्तरदायित्व से भाग नहीं सकते… कुछ तो संवेदनशील होना सीखिए आप लोग…  आदि-आदि। मैनेजर भौचक होकर देख रहा था। …फिर इनका पूरा परिचय पूछने लगा।

एक मिस्त्री ने इनको किनारे ले जाकर प्रस्ताव रखा कि सामने जो प्राइवेट मिस्त्री ने दुकान खोल रखी है वह स्कूटर का स्पेशलिस्ट  है। मैं उससे बोल देता हूँ कि आपका चोक वायर डाल दे। लेकिन इन्होंने ठान लिया था कि काम यहीं से कराकर जाना है। अब और भटकने को तैयार नहीं थे ये। इनकी मंशा भाँपकर वहाँ सबने आपस में बात की और भीतर काम कर रहे एक मिस्त्री को बुलाया गया। उस मिस्त्री ने मुझे देखकर पहचान लिया। उसी ने पिछली बार मुझे छू-छाकर छोड़ दिया था। लेकिन इस बार उसे मैनेजर द्वारा समझाया गया कि काम करना ही है, चाहे जैसे हो। जनार्दन मिस्त्री ने बेमन से तैयार होते हुए आखिरी दाँव चला। साहब जी, इसे छोड़कर जाना पड़ेगा। तीन-चार घण्टे लगेंगे। न हो तो कल सुबह लेकर आ जाओ।

लेकिन ये टस से मस न हुए। बोले- आज मेरी छुट्टी है। मैं पूरा दिन यहीं बैठने को तैयार हूँ। बस अब आगे के लिए नहीं टाल सकता। देखते-देखते सभी मिस्त्री वहाँ से चले गये, एक आदमी दुकान का शटर गिराने लगा। इन्होंने पूछा तो बताया गया कि लंच ब्रेक हो गया है अब तीन बजे से काम शुरू होगा। ये अड़े रहे कि मैं काम पूरा कराकर ही जाऊँगा, आपलोग लंच करके आइए। इसपर उस मिस्त्री ने मुझे स्टैंड से उतारा और भीतर की ओर लेकर चला गया। इनको पिछले दरवाजे से आने के लिए कह दिया।

जब ये पिछले दरवाजे से भीतरी अहाते में पहुँचे तो जनार्दन मिस्त्री अपना टिफिन समाप्त करने वाला था। हाथ धोकर उसने मेरी डिक्की से केबल निकाला, दोनो सिरों की घुंडियों का मुआइना किया और इंजन का ढक्कन उतारकर पुरानी केबल के उपरी सिरे से नयी केबल का निचला सिरा एक पतले तार से बाँध दिया। फिर पुरानी केबल के निचले सिरे को धीरे-धीरे खींचकर बाहर निकालने लगा। इस प्रकार दो-तीन मिनट में ही पुरानी केबल का स्थान नयी केबल ने ले लिया। केबल के भीतर दौड़ रहे चोक-वायर के दोनो सिरों को उनके जायज स्थानों में फिट करने में पाँच मिनट और लगे। इस प्रकार पूरा काम पंद्रह मिनट का ही निकला।

मेरे मालिक इस टुच्चे से काम पर इतना समय और दौड़-धूप करने के बाद मन ही मन कुढ़ तो रहे ही थे लेकिन अंततः मिली अपनी सफलता पर प्रसन्न भी हो गये थे। इन्होंने उस मिस्त्री को पचास रूपये देने का मन बनाया था, लेकिन देने से पहले आदतन उससे ही पूछ लिया। पहले तो उसने संकोच किया लेकिन जब इन्होंने कहा कि ‘काम मेरे मनमाफ़िक और दाम तुम्हारी इच्छानुसार’ तो उसने अपनी फीस माँगी- 20/- रूपये।

प्रस्तुति : सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

तेरा बिछड़ना फिर मिलना…

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हे तात,

आज तुम वापस घर लौट आये। मन को जो राहत मिली है उसका बयान नहीं कर पा रहा हूँ। तुम्हारा साथ वापस पाकर मुझे उस टाइप की खुशी मिल रही है जैसी सीमा पार गुमशुदा मान लिए गये सैनिक की देशवापसी पर उसके घर वालों को होती है। कोई उम्मीद नहीं कर रहा था कि तुम सकुशल अपने घर वापस आ जाओगे। वह भी जिस बुरी हालत में तुमने घर छोड़ा था और जिस तरह से तुम्हारा परिचय पत्र भी खो चुका था, मुझे कत्तई उम्मीद नहीं थी कि इतनी बड़ी दुनिया में कोई तुम्हें पहचानने को तैयार होगा, तुम्हारी सेवा-सुश्रुषा करेगा, तुम्हारी बीमारी की मुकम्मल दवा करेगा और फिर पूरी तरह स्वस्थ हो जाने पर हवाई टिकट कटाकर तुम्हें मेरे घर तक पहुँचवा देगा।

मैने सोचा कि तुम्हें वापस भेजने वाले को धन्यवाद दूँ, लेकिन इस पूरी कहानी में इतने अधिक लोग सहयोगी रहे हैं और उनमें अधिकांश को मैं जान-पहचान भी नहीं पा रहा हूँ इसलिए इस सार्वजनिक मंच से एक बार ही उन सबको सामूहिक धन्यवाद ज्ञापित कर देता हूँ।

तुम्हारे साथ मैंने जो किया वह कत्तई अच्छा व्यवहार नहीं कहा जा सकता। अपने सुख के लिए मैंने तुम्हारे साथ बहुत नाइंसाफी की। जब भी कभी हम साथ चले मैं अपना सारा बोझ तुम्हारे कंधे पर डाल देता और खुद मस्ती से इतराता चला करता। तुम इतने निष्ठावान और सेवाधर्मी निकले कि कभी उफ़्‌ तक नहीं की, कोई शिकायत नहीं की। शायद तुमने अपना माथा ठोंक लिया कि जब मैंने तुम्हें तुम्हारे जन्मदाता से रूपयों के बदले खरीदा है तो आखिरी साँस तक मेरी सेवा करना ही तुम्हारा कर्तव्य है, तुम्हारी नियति है। बिल्कुल गूंगा गुलाम बनकर रहे तुम मेरे साथ। जरूरत पड़ने पर तुमने मेरे भाइयों की सेवा भी उसी तत्परता से की। कोई भेद नहीं रखा।

एक बार तो तुम मेरे एक मित्र को लोक सेवा आयोग तक इंटरव्यू दिलाने चले गये। उसने पता नहीं तुममें क्या खूबी देखी कि एक दिन के लिए तुम्हें मुझसे मांगकर अपने साथ ले गया। मैने समझाया भी कि यह तो अभी बिल्कुल नया-नया आया है, मै भी इसके व्यवहार से भली भाँति परिचित नहीं हूँ। तुम्हें पता नहीं रास आये या न आये। वह बोला- “यह नया है तभी तो ले जा रहा हूँ। मुझे अनुभवी और पुराने साथियों के साथ ही तो परेशानी होती है। जब तक साथ रहेंगे, रास्ते भर पता नहीं क्या-क्या चर्र-पर्र करते रहेंगे। बार-बार मूड डिस्टर्ब होने की आशंका रहेगी। कॉन्फिडेन्स गड़बड़ाने का डर बना रहेगा। इंटरव्यू तो अपने दिमाग से देना है, फिर रास्ते भर इनकी सिखाइश और बक-बक की ओर ध्यान क्यों बँटाना? यह नया है तो मुझमें कोई खामी तो नहीं दिखाएगा। इसके चेहरे पर जो चमक है वह आत्म विश्वास बढ़ाने वाली है। यह खुशी से शांतिपूर्वक साथ चलेगा और सुकून से बिना कोई खटपट किए वापस आएगा। मुझे कुछ आराम ही रहेगा।” मैंने बिना कुछ कहे तुम्हें उसके साथ भेज दिया। तुम्हें तो घूमने का बहाना चाहिए। और क्या?

तुमने मुझसे कभी कुछ मुँह खोलकर नहीं मांगा। तुम दरवाजे के बाहर बैठे रहते या घर के कोने में चुपचाप दुबके रहते। टकटकी लगाये रहते कि मैं कब तुम्हें अपने साथ ले चलने वाला हूँ। तुमने खुद अपना खयाल कभी नहीं रखा। मुझे ही जब तुम्हारी दीन-हीन शक्ल-सूरत पर तरस आती तो थोड़ी बहुत साफ़-सफाई के लिए किसीसे कह देता या खुद ही हाथ लगा देता। वैसे मुझे यह तरस भी अपने स्वार्थ में ही आती। तुम्हें मेरे साथ चलना होता था, इसलिए तुम्हें मैली-कुचैली हालत में रखता तो अपनी ही नाक कटती न! जब किसी अच्छी शादी-व्याह, जन्मदिन पार्टी, सालगिरह इत्यादि का निमन्त्रण हो या खास सरकारी मीटिंग में बड़े अधिकारियों से मिलने जाना हो तो मैं तुम्हे कुछ ज्यादा ही महत्व देता। तुम्हारी सादगी और गरिमापूर्ण उपस्थिति से मुझमें आत्मविश्वास बढ़ जाता। तुम बोल नहीं पाते वर्ना मैं पूछता कि जिस दिन मेरी ही तरह तुम्हारी विशेष साज-सज्जा होती उस दिन तुम जरूर गेस कर लेते होगे कि किसी खास मौके पर बाहर निकलना है।

तुमने जब भी मेरे साथ कोई यात्रा की मुझे सुख देने का पूरा प्रयास किया। मेरी सुविधाओं का ख़याल रखते रहे। मेरा बोझ ढोते रहे। ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर तुम आगे-आगे चलकर मेरे लिए उसकी तकलीफ़ कम करने का जतन करते रहे। तुमने इतना तक खयाल रखा कि मेरे पाँव में काँटे न चुभने पाये। मुझसे पहले तुम जमीन पर पाँव रखते ताकि काँटे हों भी तो तुम्हे पता चल जाय और मुझे कोई धोखा न हो। सड़क जल रही हो तो मुझे उसपर नंगे पाँव नहीं चलने देते। तुमने अपने लिए कीचड़ भरा रास्ता चुन लिया होगा लेकिन मेरे पाँव कभी गीले नहीं होने दिया। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ कि मैं निरा स्वार्थी और अहंकारी बनकर तुम्हारा खरीदार होने के दंभ में तुम्हारी चमड़ी से एक-एक पैसा वसूल कर लेने की फिराक़ में लगा रहा जबकि तुमने बिना कोई शिकायत किए मेरी सेवा को अपना धर्म समझा। मैने तुम्हे जैसे चाहा वैसे इस्तेमाल किया। तुम्हारी राय या सहमति लेने की जरुरत भी नहीं समझी। लेकिन हद तो हद होती है। मैने एक बार हद पार की और तुमसे हाथ धोने की नौबत आ गयी।

हुआ यों कि एक बार मैं एक पहाड़ी इलाके में यात्रा पर गया। किसी ठंडी पहाड़ी का इलाका नहीं था बल्कि वहाँ कुछ पथरीले शुष्क टीले थे जिनके ऊपर एक वैश्विक शिक्षण संस्था आकार ले रही थी। उसी संस्था के मुखिया ने मुझे बुला भेंजा था। सुबह-सुबह हम टीले पर बने पथरीले रास्ते से ऊपर की ओर टहलते हुए जा रहे थे। तभी मुझे दूर चोटी पर कुछ परिचित लोग दिखायी दिए। वे लोग भी आगे की ओर बढ़ रहे थे। दूरी इतनी थी कि उन्हें आवाज देकर रोका नहीं जा सकता था। वे लोग आपस में बात करते हुए तेज कदमों से बढ़े जा रहे थे। मैने आव देखा न ताव, उन्हें पाने के लिए दौड़ लगाने लगा। मुझे तुम्हारा भरोसा कुछ ज्यादा ही था। लेकिन शायद तुम दौड़ने के लिए बने ही नहीं थे। संकोच में तुम कुछ बोल न सके। मेरे साथ दौड़ लगाते रहे। हमने उन लोगों को करीब एक किलोमीटर की दौड़ लगाकर पकड़ तो लिया लेकिन जल्द ही मुझे तुम्हारी तकलीफ़ का पता चल गया। मेरी ऊँखड़ी हुई साँस तो कुछ देर में स्थिर हो गयी लेकिन तुम्हारा हुलिया जो बिगड़ा तो सुधरने का नाम नहीं ले रहा था। लगभग कराहने की आवाज करने लगे तुम। मैंने तुम्हें सम्हालते हुए चलने में मदद की और गेस्ट हाउस में आने के बाद लिटाकर छोड़ दिया। फिर बाकी समय तुम मेरा साथ नहीं दे सके। तुम्हारे तलवे में फ्रैक्चर सा कुछ हो गया था। मुझे वापसी यात्रा में तुम्हें टांग कर चलना पड़ा।

जब हम घर वापस लौट गये तो तुम्हारी दुरवस्था देखकर मुझे लगा कि अब तुम मेरे किसी काम के नहीं हो। मुझे तुम्हारे ऊपर दया तो आ रही थी लेकिन उससे ज्यादा मुझे अपने हजार रूपए बेकार चले जाने का अफ़सोस होने लगा। तुम कोने में पड़े रहते मुझे आते-जाते देखते रहते। तुम्हारी देख-भाल में कमी आ गयी और तुम्हारा स्वास्थ्य और बिगड़ता गया। घर में एक बेकार का बोझ बन गये तुम। श्रीमती जी ने एक बार संकेत किया कि इसे किसी मंदिर या अनाथालय पर छोड़ आइए। किसी भिखारी के हाथ लग जाएगा तो शायद उसके काम आए। सुनकर मेरा कलेजा काँप गया। मुझे चिंता होने लगी कि मेरी अनुपस्थिति में कहीं तुम्हें ठिकाने न लगा दिया जाय। मैं तुम्हारे साथ पैदा हुई समस्या के एक सम्मानजनक निपटारे का रास्ता ढूँढने लगा।

(2)

एक दिन बाजार में घूमते हुए मुझे वही आदमी मिल गया जिससे मैने तुम्हें खरीदा था। मैं फौरन उसके पीछे लपक लिया। भीड़-भाड़ के बीच उससे बात करना मुश्किल था। उसने मुझे पहचान तो लिया लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा था कि उससे कैसे बात करूँ। उसने शायद मेरे असमंजस को भाँप लिया। वह बातचीत में गजब का चालाक था। उसी ने शुरुआत की- “ कहिए साहब, जो सामान मैने आपको दिया था वह अच्छा चल रहा है न? कोई शिकायत वाली बात तो नहीं है?” मुझे अब तरकीब सूझी। मैने चेहरे पर निराशा के भाव मुखर किए और बोला- “तुम्हारा सामान तो वैसे बड़े काम का था, लेकिन अब खराब हो गया है। घर में बेकार पड़ा रहता है। कहीं आने-जाने लायक नहीं रह गया है। अगर उसे वापस ले लेते तो ठीक रहता। जिस बुरी हालत में वह है उसको अब उसे बनाने वाले (जन्म देने वाले) ही ठीक कर सकते हैं। उसे उसकी कम्पनी को (अपनी माँ के पास) भेज दिया जाय तो शायद उसे नयी जिन्दगी मिल जाय।”

जानते हो, तुम्हें मेरे हाथों बेंचते समय उसने यह कहा था कि दो-तीन महीने में कोई शिकायत हो तो वापस लाइएगा, दूसरा ले जाइएगा। मेरे पास बहुत से हैं। मैंने उसे इस ‘वारण्टी’ की याद दिलायी। हाँलाकि उसका चेहरा यह साफ शक़ करता दीख रहा था कि यह खरीद-फ़रोख्त तीन महीने के भीतर की नहीं है। लेकिन मैने जब यह कहा कि इस सामान की रसीद तो है नहीं कि  सबूत के तौर पर पेश कर दूँ। तुम्हें अगर मेरी बात पर भरोसा हो तो उसे वापस ले लो नहीं तो मेरा घाटा तो हो ही रहा है। वह जब किसी काम का नहीं रह जाएगा तो हम कबतक उसे ढोते रहेंगे।

मेरी इस बात का जाने क्या असर हुआ कि वह तुम्हें वापस लेने पर राजी हो गया। बस एक शर्त रख दी कि तुम्हारे असली जन्मदाता जो निर्णय लेंगे उसे ही सबको मानना पड़ेगा। पैसा वापस होने की कोई उम्मीद न करें। उसने साफ़ कहा कि मैं तो दो पैसे के लिए केवल मध्यस्थ की भुमिका निभाता हूँ। माल कोई और बनाता है, इस्तेमाल कोई और करता है। मैं उन्हें केवल मिलवा देता हूँ। …उस दिन मैंने सिर्फ़ इस बात पर संतोष किया था कि घर में बेकार हो चुकी एक चीज हट गयी। तुम चूँकि अपने मूल स्थान वापस जा रहे थे इसलिए एक प्रकार के अपराधबोध से मुक्त होने का भाव तो मन में था ही, लेकिन अपने रूपये डूब जाने की आशंका से मन दुखी भी था।

आज जो तुम पूरी तरह से स्वस्थ होकर वापस मेरे घर मेरी सेवा करने के लिए भेंज दिए गये हो तो मुझे अजीब से भावों ने घेर लिया है। तुम्हें देखकर यह लगता ही नहीं है कि मेरे साथ उस पथरीली दौड़ में तुम्हारे पाँव जाया हो गये थे। तुम्हारा  यह लिम्ब ट्रान्सप्लांट किसी कुशल सर्जन का किया लगता है। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं है। सोच रहा हूँ कि मेरे कारण तुम विकलांग हो गये, लेकिन तुम्हारी चिकित्सा में मुझे दमड़ी भी नहीं लगानी पड़ी। मैंने बड़ी चतुराई से उस बाजार की साख पर प्रश्नचिह्न लगा दिया जिस बाजार से मैने तुम्हें खरीदा था। इसका असर यह हुआ कि अगले ने अपनी जबान की रक्षा के लिए सबकुछ दाँव पर लगा दिया।

वह चाहता तो मुझसे टाल-मटोल कर यूँही टहला देता। वह भी तब जब मैने उस शहर से अपने ट्रान्सपर की जानकारी भी उसे दे दी थी। लेकिन वह बन्दा या तो अपनी जबान का बहुत पक्का था या मेरी लानत-मलानत का असर इतना जबर्दस्त था कि उसने मेरा नया पता नोट किया और अपना मोबाइल नम्बर दिया। एक गुप्त कोड नम्बर भी बताया जिसका उल्लेख कर देने भर से वह पूरी बात समझ जाता और संकेत में ही तुम्हारी ‘लेटेस्ट कंडीशन’ बताता रहता। कब तुम अपनी माँ के पास पहुँचे। कब तुम्हारी जाँच करायी गयी, कब ऑपरेशन हुआ। कब अस्पताल से बाहर आये। मुझे पता चला कि तुम्हारे घर वाले तुम्हें हमेशा के लिए वापस रखने को राजी नहीं हुए। यह तय हुआ कि जिसने तुम्हें एक बार खरीद लिया उसी की सेवा में तुम्हें जाना चाहिए। भले ही तुम्हें सेवा के लायक बनाने में उन्हें बड़ा खर्च उठाना पड़े। डॉक्टर ने कहा कि खराब हो चुके अंग को पूरा ही बदलना पड़ेगा। परिवार बड़ा था। जाने कैसे स्पेयर अंग का जुगाड़ हो गया। यदि यह कृत्रिम अंग प्रत्यारोपण है तो अद्‌भुत है। बिल्कुल ओरिजिनल जैसा।

मुझे क्या, मैं तो बहुत खुश हूँ। खोयी पूँजी लौट आयी है। वह भी घर बैठे ही। बस फोन कर-करके उस मध्यस्थ को ललकारता रहा। उसने भी अपनी जबान पूरी करने की कसम खा ली थी। उसने तुम्हारे परिवार को फोन कर-करके तुम्हारे ठीक हो जाने के बाद अपने पास बुला ही लिया। तुम बोल नहीं सकते इसलिए तुम्हारे गले में मेरे नये घर का पता लिखकर टाँग दिया और रवाना कर दिया। तुम्हें पहुँचाने वह खुद तो नहीं आया लेकिन वहाँ से यहाँ तक पड़ने वाले हर स्टेशन पर उसके भाड़े के आदमी मौजूद थे। मुझे पता चला कि उस आदमी ने तुम्हारी बीमार हालत में तुम्हें तुम्हारे जन्मस्थान तक हवाई जहाज से भेंजा। तुम्हारी वापसी यात्रा भी हवाई मार्ग से हुई है।

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मुझे दो सप्ताह से तुम्हारा इन्तजार था। इंटरनेट बता रहा था कि तुम दिल्ली से नागपुर ्के लिए २६ तारीख को उड़ चुके हो। बाद में २७ ता. को  नागपुर से वर्धा भी चले आये हो। लेकिन वर्धा स्टेशन से मेरे घर तक आने में तुम्हें पन्द्रह दिन लग गये। आज पता चला कि जिस आदमी को तुम्हें पहुँचाने की जिम्मेदारी दी गयी थी वह बीमार हो गया था। तुम्हें अपने घर पर ही रखे हुए था।  आज पूछताछ करवाने पर वह तुम्हें लेकर आया।14092010912

आज जब तुम मेरे घर वापस आये हो तो लम्बी यात्रा की थकान तुम्हारे चेहरे पर साफ झलक रही है। तुम्हारी `बेडिंग’ के भी चीथड़े हो गये हैं। जाने कितने लोगों के हत्थे चढ़ने के बाद तुम अपने असली ग्राहक के पास वापस आ गये। अब सबकुछ ठीक हो जाएगा।

अब मैं तुम्हारे साथ कोई बुरा बर्ताव नहीं कर सकता। अपने पिछले दुर्व्यवहार पर पछता रहा हूँ। अब तुम्हें उस तरह तंग करने की सोच भी नहीं सकता। कल सुबह तुम्हारी मालिस-पॉलिश अपने हाथ से करूंगा। तुम्हारी आज जो सूरत है वह मेरी उस गलती की याद दिला रही है। उसे हमेशा याद रखने के लिए तुम्हारी एक तस्वीर खींच लेता हूँ। बुरा मत मानना। अब तो मैं तुम्हें बहुत लाड़-प्यार से रखने की सोच रहा हूँ। चिंता मत करना इस बीच अपनी सेवा के लिए मैने कुछ और ‘साधन’ जुटा लिए हैं। सारा बोझ अकेले तुमपर नहीं डालूंगा। तुमको दौड़ पर साथ ले जाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। अब तुम अपनी जमात के वी.आई.पी. हो चुके हो। बस, अब इतना ही। तुम्हारा बोधप्राप्त हितचिंतक…

 

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

रेल में पकवान और कार्यशाला वीरान… लखनऊ के ब्लॉगर नदारद…?

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जब मैंने वर्धा से लखनऊ आने के लिए टिकट बुक कराया तो मन में यह उत्साह था कि हिंदी ब्लॉगरी की यात्रा मुझे एक ऐसे मुकाम पर ले जाने वाली है जहाँ अपनी तहज़ीबों और नफ़ासत के लिए मशहूर शहर की एक शानदार शाम अपने् प्रिय ब्लॉगर मित्रों की खुशगवार सोहबत में बीतेगी। मैंने कुलपति जी से अनुमति माँगी और उन्होंने सहर्ष दे दी। एक आदरणीय ब्लॉगर मित्र ने ही टिकट पक्का कराया और मैं सेवाग्राम से लखनऊ के लिए राप्तीसागर एक्सप्रेस पर सवार हो लिया।

जब मैं अपने टिकट पर अंकित बर्थ संख्या पर पहुँचा तो देखा कि मेरे कूपे में तमिलभाषी तीर्थयात्रियों के एक बहुत बड़े समूह का एक हिस्सा भरा हुआ था। नीचे की मेरी बर्थ पर एक प्रौढ़ा महिला सो रही थीं। उनकी गहरी नींद में खलल डालने में मुझे संकोच हुआ। थोड़ी देर मैं चुपचाप खड़ा होकर सोचता रहा। अगल-बगल की बर्थों पर भी तीर्थयात्री या तो जमकर बैठे हुए थे, सो रहे थे या उनका सामान लदा हुआ था। मैने अपना बैग उठाकर दुबारा पटका ताकि उसकी आवाज से मेरे आने की सूचना उनके कानों तक पहुँच सके। (बाद में मैंने ध्यान दिया कि अधिकांश ने अपने कानों में सचमुच की रूई डाल रखी थी। खैर…) दोपहर के भोजन के बाद की नींद थी, शायद ज्यादा गहरी नहीं थी। सामने की बर्थ पर लेटी हुई दूसरी महिला ने आँखें खोल दीं। उन्होंने मेरी सीट वाली महिला को हल्की आवाज देकर कुछ कहा- शायद यह कि अब उठ जाओ, जिसके आने का अंदेशा था वह आ चुका है- इन्होंने आँखें खोल दी। मुझे खड़ा देखकर झटपट अपने को समेटने की कोशिश करने लगीं। 

लेकिन यह इतना आसान नहीं था। ईश्वर ने उन्हें कुछ ज्यादा ही आराम की जिंदगी दी थी। जिसका भरपूर लाभ उठाते हुए उन्होंने काफ़ी वजन इकठ्ठा कर लिया था। वजन तो उस समूह की प्रायः सभी महिलाओं और पुरुषों का असामान्य था। कोई भी फुर्ती से उठने-बैठने लायक नहीं था। मुझे मन हुआ कि कह दूँ- आप यूँ ही लेटी रहिए, मैं कोई और बर्थ खोजता हूँ। उनकी आँखों में भी कुछ ऐसी ही अपेक्षा झाँक रही थी तभी बगल की बर्थ पर लेटे एक भीमकाय बुजुर्ग ने टूटी हिंदी में कहा कि ‘वो ऊपर चढ़ नहीं सकता’। मैंने ऊपर की साइड वाली सीट देखी- खाली थी। मैंने झट ऊपर अपना लैपटॉप का बैग चढ़ाया, प्रौढ़ा माता जी को लेटे रहने का इशारा किया और अपना ट्रेवेल बैग खिड़की वाली बर्थ के नीचे फिट करने लगा। उनकी आँखों में धन्यवाद और आशीर्वाद के भाव देखकर मैं भावुक हो लिया, बल्कि मेरी अपनी माँ याद आ गयी जो बहुत दिनों बाद मेरे पास रहने का समय निकालकर वर्धा आ पायी हैं।

आयोजकों ने ए.सी.थ्री की सीमा पहले ही समझा दी थी। ऐसे में लगातार लेटकर यात्रा करने की कल्पना से मैं परेशान था। लेकिन जब मुझे साइड की ऊपरी सीट मिल गयी तो मन खुश हो लिया। उसपर तुर्रा यह कि सहयात्रियों ने मुझे बड़े दिल वाला भी समझ लिया। अब तो ऊपर बैठकर, लेटकर, करवट बदल-बदलकर, आधा लेटकर, तिरछा होकर, चाहे जैसे भी यात्रा करने को मैं स्वतंत्र था। किसी का कोई हस्तक्षेप नहीं होने वाला था। लेकिन इस अवसर का ज्यादा हिस्सा मैने एक मौन अध्ययन में बिताया। चेतन भगत की पुस्तक ‘टू स्टेट्स’ हाल की दिल्ली यात्रा में पढ़ने को मिली थी। उसमें मद्रासी (तमिल) परिवार के खान-पान और आचार-व्यवहार का बहुत सूक्ष्म वर्णन किया गया है। मैंने उस रोचक वर्णन का सत्यापन करने के उद्देश्य से इनपर चुपके से नजर रखनी शुरू की।

उस कहानी के पात्रों के विपरीत मैने यह पाया कि वे तमिल बुजुर्ग् बड़े खुशमिजाज़ और शौकीन लोग थे। जिन माताजी को मैने अपनी बर्थ दी थी उन्होंने तो मानो मुझे अपना बेटा ही मान लिया। भाषा की प्रबल बाधा के बावजूद (उन्हें हिंदी/अंग्रेजी नहीं आती थी और मैं तमिल का ‘त’ भी नहीं जानता था) उन्होंने बार-बार मुझे अपनी दर्जनों गठरियों में रखे खाद्य पदार्थ (मैं उनके नाम नहीं ले पा रहा- बहुतेरे थे) ऑफर किए। मैंने हाथ जोड़कर मना करने के संकेत के साथ धन्यवाद  कहा जो उन्हें समझ में नहीं आया। डिब्बे का मुँह खोलकर मेरी ओर उठाए उनके हाथ वापस नहीं जा रहे थे तो मैँने एक टुकड़ा उठाकर ‘थैंक्यू’ कहा और आगे के लिए मना किया, लेकिन वो समझ नहीं रही थीं या समझना नहीं चाहती थी। नतीजा यह हुआ कि उन लोगों के खाने के अनन्त सिलसिले का मैं न सिर्फ़ प्रत्यक्षदर्शी रहा बल्कि उसमें शामिल होता रहा। सुबह के वक्त तो उन्होंने मुझसे पूछना भी जरूरी नहीं समझा और मेरे रेल की रसोई (Pantry) से आये नाश्ते के ऊपर से अपनी जमात का उपमा, साँभर, इडली और ‘बड़ा’ एक साथ लाद दिया। मैंने जिंदगी में पहली बार ये चार सामग्रियाँ एक साथ खायीं।

वे लोग मेरे बारे में जाने क्या-क्या बात करते रहे। मैं समझ नहीं पा रहा था, इसलिए थोड़ी झुँझलाहट भी हो रही थी। एक लुंगीधारी बुजुर्ग ने मुझसे मेरा नाम और काम पूछा था। मैंने जो बताया था वही शब्द उनकी तमिल के बीच-बीच में सुनायी दे रहे थे। जो इस बात के गवाह थे कि उनकी चर्चा का एक् विषय मैं भी था। तभी उन माता जी ने मुझसे कुछ पूछा। मैं तमिल् समझ न सका। दूसरे बुजुर्गवार ने अनुवादक बन कर कहा- तुमरा कितना बड़ा बच्चा है? मैंने बताया- एक बेटी दस साल की और एक बेटा चार साल का। उम्र समझाने के लिए उंगलियों का प्रयोग करना पड़ा। इस पर उनके बीच आश्चर्य व कौतूहल मिश्रित हँसी का फव्वारा फूट पड़ा। जो दूसरे कूपे तक भी गया। मैं चकराकर दुभाषिया ढूँढने लगा।

इस बातचीत का रस लेने ऊपर की बर्थ पर लेटा एक तमिल नौजवान भी नीचे चला आया था। मैंने उससे परिचय चलाया तो पता चला कि वह भैरहवा (नेपाल) से एम.बी.बी.एस. कर रहा था। नीचे वाले बुजुर्ग ने उसकी पीठ ठोकते हुए तस्दीक किया था। मैने उससे पूछा- “what were they talking about me?”

उसने मुस्करा कर कहा – “They said that you have got two children, still you look so young.’’

मैं मन ही मन खुश हो लिया लेकिन चेहरे पर थोड़ी शर्म आ ही गयी। मैंने अपनी ओर उठी हुई उन सबकी प्रश्नवाचक निगाहों को जवाब दिया – “Thanks a lot to all of you… this is one of the rarest complements for me as here I am told to have an older look of face than my actual age” महिलाओं ने तमिल में नकारा और पुरुषों ने मुस्कराकर चुप्पी लगा ली।

गाड़ी जब लखनऊ पहुँची तो मुझे ध्यान आया कि मैं ब्लॉग लेखन की पाँच दिवसीय कार्यशाला में भाग लेने आया हूँ और मुझे पहली बार किसी सत्र की अध्यक्षता करनी है। मैंने सबको एक बार फिर धन्यवाद दिया, अच्छी यात्रा के लिए और दक्षिण भारतीय व्यंजनों के लिए। स्टेशन से बाहर आकर ऑटो लिया और गेस्ट हाउस की ओर चल पड़ा। रास्ते में यहाँ का गर्म मौसम देखकर रमजान के रोजेदारों का ध्यान हो आया।

(२)

Invitationदूर-दूर तक भेंजा गया था निमंत्रण-पत्र 

राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्यौगिकी संचार परिषद(NCSTC), नई दिल्ली और लखनऊ की ‘तस्लीम’ संस्था द्वारा एक पाँच दिवसीय कार्यशाला ‘ब्लॉग लेखन के द्वारा विज्ञान संचार’ विषय पर आयोजित थी। तस्लीम ब्लॉग पर इसकी सूचना अनेकशः प्रकाशित हुई थी। जाकिर भाई और बड़े भाई डॉ. अरविंद जी मिश्र ने मुझसे और मेरे जैसे अनेक ब्लॉगर्स को लखनऊ पहुँचने के लिए कहा था। मेरी यात्रा सुखद रही थी इसलिए आगे भी मामला चकाचक रहने की पूरी आशा थी। मैंने गेस्ट हाउस पहुँचकर नहाने और तैयार होने में बहुत कम समय लगाया। आभासी दुनिया के साथियों से प्रत्यक्ष मुलाकात का सुख पाने की लालसा जोर मार रही थी। ज़ाकिर भाई घटनास्थल… सॉरी कार्यक्रम स्थल से पल-पल की सूचना मोबाइल पर दे रहे थे। मुझे लेने कोई गाड़ी आने वाली थी। उसके खोजे जाने, चल पड़ने और गेस्ट हाउस पहुँच जाने के बीच तीन-चार बार फोन आ गये। मैं घबराकर नीचे उतरकर रिसेप्शन पर जाकर खड़ा हो गया। जो ही दो-चार मिनट बचा लिए जाते।

मैं ठीक दो बजे वहाँ पहुँच गया। अरविंद जी तैयारियों को अंतिम रूप में बुरी तरह व्यस्त थे। शायद उन्होंने ज़ाकिर भाई से कमान अपने हाथों में ले ली थी। ज़ाकिर भाई रमजान के महीने में पसीने से तर-बतर दिखायी पड़े। मैने गर्मजोशी से हाथ मिलाया। वे बोले- “बस दस मिनट में लंच आ रहा है। खा लीजिए फिर शुरू करते हैं।” मैं सोचने लगा कि कार्यक्रम की शुरुआत में सिर्फ़ मेरे खा लेने की प्रतीक्षा आड़े आ रही है तो उसे टाल देते हैं। तभी अरविंद जी ने संयोजक महोदय को झिड़की दी- “मुख्य अतिथि को बैठाकर आप खाना खिलाने की बात कर रहे हैं? चलिए कार्यक्रम शुरू करते हैं” मैं उनसे सहमत होने के एक मात्र उपलब्ध विकल्प पर सिर हिलाते हुए आगे बढ़ गया।

“लेकिन दूसरे भाई लोग कहाँ हैं?” मैंने ज़ाकिर से पूछा। हाल में अभी तीन-चार छात्र टाइप प्रतिभागी दिखा्यी दे रहे थे। कुछ पंजीकरण काउंटर पर अपना नाम लिखा रहे थे। मेरी उम्मीद से उलट वहाँ एक भी ऐसा ब्लॉगर चेहरा नहीं दिखा जो मुझसे पहले न मिला हो। वहाँ थे तो बस अरविंद जी और ज़ाकिर भाई। जाहिर है कि तीसरा सुपरिचित बड़ा नाम मेरा ही था 🙂

‘अवध रिसर्च फाउंडेशन’  नामक निजी संस्था के कार्यालय में ही कार्यशाला आयोजित थी। ज़ाकिर भाई उन खाली कुर्सियों की ओर देख रहे थे जो वर्तमान और भविष्य के ब्लॉगर्स की राह देख रही थीं। आमद बहुत धीमी और क्षीण थी। पूर्व कुलपति प्रो. महेंद्र सोढ़ा जी ठीक समय पर पधार चुके थे। अरविंद जी भी समय की पाबंदी पर जोर देने लगे और कार्यक्रम तत्काल शुरू करने का निर्णय हुआ। मैने मन ही मन ट्रेन वाली उन माता जी को एक बार फिर धन्यवाद दिया जिन्होंने सुबह नाश्ते के नाम पर मुझे दिन भर के लिए भूख से मुक्त कर दिया था। हमने उद्‍घाटन सत्र प्रारम्भ किया। इसका हाल आप यहाँ और यहाँ पढ़ सकते हैं।

उद्‍घाटन सत्र के बाद हमने लजीज व्यंजनों से भरा लंच पैकेट खोला और तृप्त हुए। अरविंद जी ने दो बार बताया कि वे बहुत जिद्दी इंसान हैं और जो बात एक बार तय कर लेते हैं उसे करवाकर मानते हैं। हम उनकी इसकी बात का लोहा मानते हुए खाना खाते रहे। समय की पाबंदी को जबतक जिद्द का विषय न बनाया जाय तबतक उसका भारत में अनुपालन असंभव है। इस बीच NCSTC के प्रेक्षक महोदय भी आ चुके थे और उद्घाटन सत्र की सफलता से गदगद हो रहे थे। सबकी भूख प्रायः शांतिपथ पर चल पड़ी थी।

लेकिन कदाचित्‌ मेरी दूसरी भूख अतृप्त ही रहने वाली थी। मैंने आखिरकार पूछ ही लिया- “भाई साहब, आप ये बताइए कि आपने किस-किसको बुलाया था जो नहीं आये?” ज़ाकिर भाई एक से एक नाम गिनाने लगे और उनके न आने के ज्ञात-अज्ञात कारण बताने लगे। मैं निराश होकर सुनता रहा। हद तो तब हो गयी जब उन्होंने यह बताया कि आज के प्रथम तकनीकी सत्र के मुख्य वक्ता ज़ीशान हैदर ज़ैदी और वक्ता अमित ओम के आने में भी संदेह उत्पन्न हो गया है। सारांशक अमित कुमार का न आना तो पक्का ही है। मैंने अरविंद जी से पूछा कि मेरी ज़िंदगी की ‘पहली अध्यक्षी’ मंच पर अकेले ही गुजरेगी क्या? वे इस सत्र में जाकिर भाई के साथ किनारे बैठकर उद्‌घाटन सत्र पर एक ब्लॉग पोस्ट तैयार करके तुरंत ठेलने की योजना बना रह थे। बोले- “यह सत्र आपके हाथ में है। जैसे चाहिए संचालित करिए।” मैंने कहा- “अध्यक्ष की भूमिका तो चुपचाप बैठने और सबसे अंत में यह बोलने की होती है कि किसने क्या बोला? अब यहाँ तो सीधे स्लॉग ओवर की नौबत आ गयी है।”

इसपर उन्होंने ‘आधुनिक सेमिनारों में अध्यक्ष की बढ़ती भूमिका’ विषय पर  एक लम्बी व्याख्या प्रस्तुत कर दी जिसका सारांश यह था कि अध्यक्ष को पूरा सेमिनार हाइजैक करने का पावर होता है। उसे शुरुआत से लेकर अंत तक वे सारे काम खुद करने पड़ते हैं जो करने वाला कोई और नहीं होता है। दीपक जलाने के लिए पंखा बंद करने से लेकर तेल की बत्ती से अतिरिक्त तेल निचोड़ने तक और अतिथियों व प्रतिभागियों के स्वागत से लेकर धन्यवाद ज्ञापन तक उसे हर उस तत्वज्ञान से गुजरना पड़ता है जो किसी सेमीनार की सफलता के लिए आवश्यक होते हैं। मुझे शरद जोशी द्वारा बताये गये ‘अध्यक्ष बनने के नुस्खे’ बेमानी लगने लगे।

अपनी नैया किनारे पर ही डूबती देख मैंने भगवान को स्मरण किया। बाईचान्स भगवान ने मेरी प्रार्थना सुन भी ली। सत्र प्रारम्भ होने के ठीक पहले ओम जी भागते हुए पहुँच ही तो गये। मैंने उनके लिए फ़ौरन चाय-पानी का इंतजाम करने को कहा। पता चला कि उन्होंने जिंदगी में कभी चाय पी ही नहीं। यह मजाक नहीं सच कह रहा हूँ। मेरे सामने एक ऐसा निर्दोष सुदर्शन नौजवान खड़ा था जिसके शरीर में चाय नामक बुराई का लेशमात्र भी प्रवेश नहीं हो पाया था। ऐसे पवित्र आत्मा के आ जाने के बाद सफलता पक्की थी। अब मेरी भगवान में आस्था और बढ़ गयी।

मैंने एक बार हाल में झाँककर प्रतिभागियों का मुआयना किया। दिल जोर से धड़क गया। कुल जमा पाँच विद्यार्थी यह जानने बैठे हैं कि ‘साइंस ब्लॉगिंग’ क्या है…! इन्हें यह समझाने में दो घंटे लगाने हैं। वह भी तब जब इसी बिन्दु पर अरविंद जी अपना पॉवर-प्वाइंट शो एक घंटा पहले ही प्रस्तुत कर चुके हैं। मैं भी थोड़ा बहुत जो कुछ पता था वह उद्घाटन सत्र में ही उद्घाटित कर चुका हूँ। नये वक्ता ओम जी पर सारा दारोमदार था। इसी उधेड़-बुन में लगा रहा कि पसीना बहाते एक दढ़ियल नौजवान नमूदार हुआ। मानो खुदा ने कोई फ़रिश्ता भेंज दिेया हो। परिचय हुआ तो पता चला कि ये ही जनाब जीशान हैदर ज़ैदी साहब हैं। ये साइंस फिक्शन के माहिर लेखक हैं और वैज्ञानिक विषयों को रोचक शैली में प्रस्तुत करने का हुनर रखते हैं। आप रोजे से थे और अपने मेडिकल कॉलेज में परीक्षा कराकर भागते चले आये थे।

बस फिर क्या था। तकनीकी सत्र शुरू हुआ। लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता और जनसंचार विभाग के बच्चों ने पंजीकरण करा रखा था जिनके आने से हाल भरा-भरा सा लगने लगा। मैने माइक संभाला। सबसे संक्षिप्त परिचय लिया, उनका मन टटोलने के लिए। सभी उत्सुक लगे। जिज्ञासु  विद्यार्थी किसे नहीं भाते? जीशान ने अपनी कुशलता का परिचय दिया। मैंने दुतरफ़ा संवाद सुनिश्चित करने के लिए सभी प्रतिभागियों को टिप्पणी करना अनिवार्य कर दिया। अध्यक्षीय फरमान था। पूरा अनुपालन हुआ। प्रश्नोत्तर का दौर कुछ लम्बा ही हो गया। कुछ प्रश्न अगले सत्रों के लिए टालने पड़े। …सब आज ही जान लोगे तो अगले चार दिन क्या करोगे भाई…? मैने उनका हौसला बढ़ाते हुए पहले हि कह दिया था कि जब मेरे जैसा कोरा आर्ट्स साइड का विद्यार्थी साइंस ब्लॉगिंग सेमिनार में अध्यक्षता कर सकता है तो आप लोग तो बहुतै विद्वान हो। उनका उत्साह बहुत बढ़ गया। अरविंद जी ने उद्‍घाटन के समय कह ही दिया था कि ब्लॉग बनाने में केवल तीन मिनट लगते हैं।

मुझे अंदेशा हुआ कि कहीं ये ऐसा न समझ लें कि ब्लॉग सच्ची में तीन मिनट का खेल है। मैंने फिर संशोधित सूचना दी। ब्लॉग बना लेना उतना भर का काम है जितना एक भारी-भरकम किताब खरीदकर ले आना और पहला पन्ना खोल लेना। असली मेहनत तो उसके बाद शुरू होती है जिसका कोई अंत ही नहीं है। अगर पन्ना पलट-पलत कर पढ़ाई नहीं की गयी तो किताब पर धूल जम जाएगी और खरीदना बेकार हो जाएगा। वही हाल ब्लॉग का है….

अंत में अमित ओम ने सारांशक की भूमिका निभाते हुए सारी बातें दुबारा बताना शुरू कर दिया। बच्चे तबतक काफी कुछ सीख चुके थे इसलिए उठकर जाने लगे। मौके की नज़ाकत भाँपते हुए मैने फिर पतवार थामी और नाव को सीधा किनारे लगाकर खूँटे से बाँध दिया। अब कल खुलेगी।  कल के नाविक कोई और हैं। लेकिन वह बहुत अनुभवी, मेहनतकश और मजेदार बातें करने वालों की टीम है। हम भी नाव में बैठकर यात्रा करेंगे। शायद कल कुछ लखनवी ब्लॉगर्स के दर्शन भी हो जाय।

समय: ११:५५ रात्रि (२७ अगस्त,२०१०)

स्थान: २१३, एन.बी.आर.आई. गेस्टहाउस, गोखले मार्ग, लखनऊ।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

हाय, मैं फुटबॉल का दीवाना न हुआ… पर हिंदी का हूँ !!

24 टिप्पणियाँ

 

इलाहाबाद से वर्धा आकर नये घर में गृहस्थी जमाने के दौरान फुटबॉल विश्वकप के मैच न देख पाने का अफ़सोस तो मुझे था लेकिन जब मैने इसका प्रसारण समय जाना तो मन को थोड़ी राहत मिल गयी। यदि मेरा टीवी चालू रहता और केबल वाला कनेक्शन भी जोड़ चुका होता तबभी देर रात जागकर मैच देखना मेरे वश की बात नहीं होती। इस खेल के लिए मेरे मन में वैसा जुनून कभी नहीं रहा कि अपनी दिनचर्या को बुरी तरह बिगाड़ लूँ। जैसे-जैसे टुर्नामेण्ट आगे बढ़ता गया इसकी चर्चा का दायरा भी फैलता गया। ऑफ़िस से लेकर कैंटीन तक और गेस्ट हाउस से लेकर घर के नुक्कड़ तक जहाँ देखिए वहीं चर्चा फुटबॉल की। मैं इसमें सक्रिय रूप से शामिल नहीं हो पाता क्योंकि मैं कोई मैच देख ही नहीं पा रहा था।कांस्य पदक के साथ जर्मन खिलाड़ी

हमारे कुलपति जी रात में मैच भी देखते और सुबह हम लोगों के साथ साढ़े पाँच बजे टहलने के लिए भी निकल पड़ते। आदरणीय दिनेश जी ने तो रतजगा करने के बाद मैच की रिपोर्ट ठेलना भी शुरू कर दिया। मैने अखबारों से लेकर न्यूज चैनेलों तक जब इस खेल का बुखार चढ़ा हुआ देखा तो मुझे अपने भीतर कुछ कमी नजर आने लगी। कैसा मूढ़ हूँ कि दुनिया के सबसे बड़े उत्सव के प्रति उदासीन हूँ। मैंने तुरन्त टीवी सेट तैयार किया और केबल वाले को आनन-फानन में ढूँढकर कनेक्शन ले लिया। यह सब होने तक क्वार्टर फाइनल मैच पूरे हो चुके थे। नेट पर देखकर पता चला कि सेमी फाइनल मैच सात और आठ जुलाई को खेले जाने हैं। मैंने रतजगे की तैयारी कर ली।

शाम को ऑफिस से आया तो पता चला कि दोपहर की बारिश के बाद टीवी बन्द पड़ा है। ऑन ही नहीं हो रहा है। मैने देखा तो टीवी का पावर इन्डीकेटर जल ही नहीं रहा है। मैने बिजली का तार चेक किया। इसमें एक छोटी सी खरोंच पर सन्देह करते हुए नया तार लगा दिया। फिर भी लाइट नहीं जली। मैने टीवी का पिछला ढक्कन खोलकर चेक किया तो इनपुट प्वाइण्ट पर बिजली थी लेकिन उसके अन्दरूनी हिस्से में कहीं कोई गड़बड़ थी। यह सब करने में पसीना भी बहा। सुबह तो अच्छा भला चलता छोड़कर गया था… फिर यह अचानक खराब कैसे हो गयी?

श्रीमती जी बताया कि दोपहर में बारिश के समय जोर की गर्जना हुई थी। कहीं आसपास ही बिजली गिरी होगी शायद। मुझे सन्देह हुआ कि केबल के रास्ते बिद्युत तड़ित की उर्जा टीवी में जा समायी होगी और किसी पुर्जे का सत्यानाश हो गया होगा। मैंने फौरन इसे गाड़ी में लादा और दुकान पर ले गया। वहाँ बिजली से आहत कुछ और टीवी सेट रखे हुए थे। दुकानदार ने बताया कि नागपुर से मिस्त्री आएगा तब चेक करके बताएगा कि क्या खराबी है? मैने पूछा कि कितना समय और पैसा लगेगा तो उसने मेरा मोबाइल नम्बर मांग लिया। बोला कि मिस्त्री के चेक करने के बाद ही बता पाऊंगा। यदि जला हुआ स्पेयर पार्ट यहाँ मिल गया तब तो तत्काल ठीक करा लूंगा नहीं तो उसे नागपुर से मंगाने में दो-तीन दिन लग जाएंगे।

मुझे न चाहते हुए भी इलाहाबाद छोड़ने का पछतावा होने लगा। श्रीमती जी कि फब्तियाँ सुनना तो तय जान पड़ा- अच्छा भला शहर और काम छोड़कर इस वीराने में यही पाने के लिए आये थे- बच्चों का स्कूल सात किलोमीटर, सब्जी बाजार आठ किलोमीटर, किराना स्टोर पाँच किलोमीटर, दूध की डेयरी छः किलोमीटर… हद है, नजदीक के नाम पर है तो बस ईंट पत्थर और सूखा- ठिगना पहाड़… ले देकर एक पार्क है तो वह भी पहाड़ी पर चढ़ाई करने के बाद मिलता है। वहाँ भी रोज नहीं जा सकते…

मैं अपने को यह सब पुनः सुनने के लिए तैयार करता हुआ घर लौट आया। यह भी पक्का हो गया कि अब दोनो सेमी फाइनल भी नहीं देख पाऊंगा। मन मसोस कर रह गया। आखिरकार अगले दिन मिस्त्री ने खबर दी कि सामान नागपुर से आएगा औए साढ़े नौ सौ रूपए लगेंगे। मरता क्या न करता। मैने फौरन हामी भरी। टीवी बनकर आ गयी। मैने पता किया कि तीसरे-चौथे स्थान का मैच १०-११ की रात में होगा। मैने शनिवार की छुट्टी को दिन में सोकर बिताया ताकि रात में जागकर मैच देख सकूँ। दस बजे रात को परिवार के अन्य सदस्य सोने चले गये और मैं बारह बजने का इन्तजार करता रहा। इस दौरान टीवी पर कुछ फालतू कार्यक्रम भी देखने पड़े। स्टार प्लस पर ‘जरा नच के दिखा’ का ग्रैण्ड फ़िनाले चल रहा था जिसमें नाच से ज्यादा नखरा और उससे भी ज्यादा विज्ञापन देखना पड़ा।

नींद के डर से प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठा रहा लेकिन जब पहलू में कष्ट हुआ तो भारी भरकम सोफ़ा उठाकर टीवी के सामने ले आया। गावतकिया लगाकर आराम से देखने का इन्तजाम हो गया। मैच शुरू हुआ। जर्मनी ने पहला गोल दागा और जब बोर्ड पर यह स्कोर लिख कर आया तब मैंने पक्के तौर पर जाना कि काली जर्सी वाले खिलाड़ी जर्मन टीम के हैं। इसके बाद युरुग्वे ने गोल उतारा फिर बढ़त ले ली। अब मुझे ऑक्टोपस पॉल की जान सांसत में नजर आने लगी। तभी जर्मनी ने बराबरी कर ली। मैच में जोश आया हुआ था लेकिन सोफ़े पर आराम से पसरा हुआ मैं जाने कब सो गया। जब नींद खुली तो खिलाड़ियो को मैदान से बाहर जाते देखा और चट से विज्ञापन शुरू हो गया। अन्तिम परिणाम देखने के लिए न्यूज चैनेल पर जाना पड़ा। वहाँ की हेडलाइन थी- ऑक्टोपस पॉल की भविष्यवाणी एक बार फिर सही साबित हुई। जर्मनी तीसरे स्थान पर। युरुग्वे को ३-२ से हराया।

***

अफ़सोस है कि मैं दूसरों की तरह फुटबॉल का दीवाना नहीं बन पाया। कुछ लोग मुझे जरूर कोसेंगे कि कैसा अहमक है। चलिए कोई बात नहीं…। मेरी दीवानगी कहीं और तो है। आज स्वप्नलोक पर विवेक जी ने एक कविता ठेल दी लेकिन कविता अंग्रेजी में देखकर मुझे ताव आ गया। मैने आनन-फानन में उसका हिन्दी तर्जुमा करके टिप्पणी में पेश कर दिया है। मेरी दीवानगी का आलम यहीं देख लीजिए। स्वप्नलोक तक बाद में जाइएगा 🙂

“Though I have done no mistake,
Excuse me for God’s sake.
I am poor, you are great.
You are master of my fate.

गलती मेरी नहीं है काफी

प्रभुजी दे दो फिर भी माफी

मैं गरीब तू बड़ा महान

भाग्यविधाता लूँ मैं मान

But remember always that,
human, lion, dog or cat,
all creatures are same for God.
No sound is, in his rod.

पर इतना तुम रखना ध्यान

नर नाहर बिल्ली और श्वान

सबको समझे एक समान

मौन प्रहार करे भगवान

He, who will afflict others,
will be facing horrid curse.
Killing weak is not correct.
This is universal fact.”

जिसने परपीड़ा पहुँचाई

वह अभिशप्त रहेगा भाई

निर्बल को मारन है पाप

दुनिया कहती सुन लो आप

Listening this the hunter said,
“Don’t teach me good and bad.”
Gun fire ! but no scream ?
Thank God it was a dream !

सुन उपदेश शिकारी भड़का

ले बन्दूक जोर से कड़का

धाँय-धाँय… पर नहीं तड़पना

शुक्र खुदा का यह था सपना

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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