हे संविधान जी नमस्कार…

25 टिप्पणियाँ

 

हे संविधान जी नमस्कार,

इकसठ वर्षों के अनुभव से क्या हो पाये कुछ होशियार?
ऐ संविधान जी नमस्कार…

संप्रभु-समाजवादी-सेकुलर यह लोकतंत्र-जनगण अपना,
क्या पूरा कर पाये अब तक देखा जो गाँधी ने सपना?
बलिदानी अमर शहीदों ने क्या चाहा था बतलाते तुम;  
सबको समान दे आजादी, हो गयी कहाँ वह धारा गुम?
सिद्धांत बघारे बहुत मगर परिपालन में हो बेकरार,
हे संविधान जी नमस्कार…

बाबा साहब ने जुटा दिया दुनियाभर की अच्छी बातें,
दलितों पिछड़ों के लिए दिया धाराओं में भर सौगातें।
मौलिक अधिकारों की झोली लटकाकर चलते आप रहे;
स्तम्भ तीन जो खड़े किए वे अपना कद ही नाप रहे।
स्तर से गिरते जाने की ज्यों होड़ लगी है धुँआधार,
हे संविधान जी नमस्कार…

अब कार्यपालिका चेरी है मंत्री जी की बस सुनती है,
नौकरशाही करबद्ध खड़ी जो हुक्म हुआ वह गुनती है।
माफ़िया निरंकुश ठेका ले अब सारा राज चलाता है;
जिस अफसर ने सिस्टम तोड़ा उसको बेख़ौफ जलाता है।
मिल-जुलकर काम करे, ले-दे, वह अफसर ही है समझदार,
हे संविधान जी नमस्कार…

कानून बनाने वाले अब कानून तोड़ते दिखते हैं,
संसद सदस्य या एम.एल.ए. अपना भविष्य ही लिखते हैं।
जन-गण की बात हवाई है, दकियानूसी, बेमानी है;
यह पाँच वर्ष की कुर्सी तो बस भाग्य भरोसे आनी है।
सरकारी धन है, अवसर है, दोनो हाथों से करें पार,
हे संविधान जी नमस्कार…

क्या न्याय पालिका अडिग खड़ी कर्तव्य वहन कर पाती है?
जज-अंकल घुस आये तो क्या यह इसमें तनिक लजाती है?
क्या जिला कचहरी, तहसीलों में न्याय सुलभ हो पाया है?
क्या मजिस्ट्रेट से, मुंसिफ़ से यह भ्रष्ट तंत्र घबराया है?
अफ़सोस तुम्हारी देहरी पर यह जन-गण-मन है गया हार
हे संविधान जी नमस्कार…

आप सबको गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ…!!!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

परदुःखकातर… :(

23 टिप्पणियाँ

 

वैशाख की दुपहरी में सूर्य देवता आग बरसा रहे हैं… ऑफ़िस की बिजली बार-बार आ-जा रही है। जनरेटर से कूलर/ए.सी. नहीं चलता…। अपनी बूढ़ी उम्र पाकर खटर-खटर करता पंखा शोर अधिक करता है और हवा कम देता है। मन और शरीर में बेचैनी होती है…। कलेक्ट्रेट परिसर में ही दो ‘मीटिंग्स’ में शामिल होना है। कार्यालय से निकलकर पैदल ही चल पड़ता हूँ। गलियारे में कुछ लोग छाया तलाशते जमा हो गये हैं। बरामदे की सीलिंग में लगे पंखे  से लू जैसी गर्म हवा निकल रही है। लेकिन बाहर की तेज धूप से बचकर यहाँ खड़े लोग अपना पसीना सुखाकर ही सुकून पा रहे हैं। …काले बुरके में ढकी-छुपी एक बूढ़ी औरत फर्श पर ही पसर कर बैठी है। शायद अकेली आयी है। ….बाहर गेट पर लगी चाय की दुकान से पॉलीथिन में चाय लेकर एक महिला चपरासी कलेक्ट्रेट की ओर जा रही है। पसीने से भींगी उसकी पीठ पर पड़ती तीखी धूप से भाप उड़ती जान पड़ रही है…। बाबू लोगों की चाय लाना ही इस विधवा की ड्यूटी है। पति की अकाल मृत्यु के बाद उसे अनुकम्पा की नौकरी मिली है…। उसे देखकर मुझे अपने कमरे का माहौल बेहतर लगने लगता है…।

चुनाव आयोग ने ईवीएम (Electronic Voting Machine) के उचित रखरखाव के लिए कुछ सख़्त आदेश जारी किए हैं। उसी के अनुपालन के लिए डी.एम. साहब ने कमेटी बनाकर बैठक बुलायी है। डबल लॉक स्ट्रोंग रूम सिस्टम (द्वितालक दृढ़कक्ष) में इन मशीनों को रखकर उनकी लॉगबुक बनानी है। एक-एक मशीन का सत्यापन होना है। चार-पाँच बड़े अधिकारी जमा हो गये हैं। आयोग के निर्देश के अनुसार कमेटी के गठन का जो आदेश ए.डी.एम. के हस्ताक्षर से जारी हुआ है वह त्रुटिपूर्ण हो गया है। उस ओर ध्यान दिलाने पर ए.डी.एम. साहब बाबू को बुलाकर जोर से बिगड़ते हैं। “क्या गलत-सलत दस्तख़त करा लेते हो? कुछ भी अक़्ल नहीं है क्या?” …बाबू पलटकर सफाई देता है “साहब आदेश टाइप करके आपके सामने ही तो रखा था। आपने पढ़कर ही साइन किया था…”

“दरअसल कल शाम को बिजली चली गयी थी, उसी समय अन्धेरे में इसने उल्टा-सीधा साइन करा लिया” साहब की कैफ़ियत पर सभी मुस्कराते हैं, भीषण गर्मी और उससे उत्पन्न बिजली संकट की चर्चा होती है, लस्सी मंगायी जाती है, एक बेहतरीन स्वाद का चरपरा नमकीन खाया जाता है और नया आदेश बनाने की सलाह के साथ बैठक समाप्त होती है… सभी सदस्यों को किसी न किसी अगली बैठक में जाने की जल्दी है। मैं भी जिला सैनिक बन्धु की मासिक बैठक में शामिल होने चल देता हूँ।

परिसर में गुजरते हुए उधर देखता हूँ जहाँ एक तरफ़ पेशी पर लाये गये बन्दियों को दिन में ठहराने का लॉक-अप है। जेल की गाड़ी उन्हें यहाँ सुबह ले आती है और सुनवायी के बाद शाम को गिनती करके ले जाती है। गाड़ी से उतरकर लॉक-अप में घुसते, अपनी बारी आने पर लॉक-अप से निकलकर कोर्ट तक जाते फिर लौटते और दुबारा जेल वापसी के लिए गाड़ी में जानवरों की तरह भरे जाते समय उन कैदियों की एक झलक पाने के लिए और उनसे दो शब्द बात कर लेने के लिए सुबह से शाम तक टकटकी लगाये धूप में खड़ी उनकी बूढ़ी माँ, पत्नी, बेटे-बेटियाँ या बुजुर्ग बाप दिनभर अवसर की तलाश करते रहते हैं। बड़ी संख्या में पुलिस वाले उन्हें पास फटकने नहीं देते। हट्ट-हट्ट की दुत्कार के बीच वे जैसे-तैसे अपनी बातों के साथ कुछ खाने पीने के सामान की गठरी अपने स्वजन को थमा ही देते हैं। अधिकांश कैदी गरीब, कमजोर और फटेहाल से हैं। उनके मुलाकाती भी दीन-हीन, लज्जित और म्लानमुख…। यह सब टीवी पर दिखाये जाने वाले हाई-प्रोफाइल कैदियों से बिल्कुल अलग सा है। image

चित्रांकन- सिद्धार्थ ‘सत्यार्थमित्र’

जिस दिन कोई अमीर और मजबूत कैदी आता है उस दिन सुरक्षा और बढ़ा दी जाती है। वे इस ‘कैटिल क्लास’ की गाड़ी में ठूस कर नहीं लाये जाते। …घण्टों से धूप में खड़ी मासूम औरतों और बच्चों को देखकर मुझे गर्मी का एहसास कम होने लगता है। फौजियों की बैठक में समय की पाबन्दी जरूरी है…। मैं तेज कदमों से मीटिंग हॉल में प्रवेश करता हूँ।

एक सेवा निवृत्त कर्नल साहब ने जब से जिला सैनिक कल्याण और पुनर्वास अधिकारी का पद सम्हाला है तबसे यह बैठक माह के प्रत्येक तीसरे शनिवार को नियमित रूप से होने लगी है। जिलाधिकारी द्वारा आहूत इस बैठक में पूरे जिले से सेवानिवृत्त फौजी स्वयं अथवा अपने ब्लॉक प्रतिनिधि के माध्यम से अपनी समस्याओं के निपटारे के लिए यहाँ इकठ्ठा होते हैं। औपचारिक परिचय और उपस्थिति पंजिका पर हस्ताक्षर का काम जल्दी से निपटाकर कार्यवाही शुरू होती है। देश की सेना में जवान, सिपाही, सूबेदार हवलदार आदि पदों पर सेवा कर चुके ये लोग अब ‘सिविलियन’ हो गये हैं और अपनी जिन्दगी को नये सिरे से बसाने की कोशिश में लगे हैं। सरकार ने इन्हें सहारा देने के लिए तमाम इन्तजाम किये हैं, लेकिन इस बैठक को देखने के बाद लगता है कि सेवा निवृत्ति के बाद इन फौजियों के ऊपर मुसीबत का अन्तहीन सिलसिला शुरू हो गया है…।

इनकी जमीन पर अवैध कब्जा, माफ़िया और गुण्डों द्वारा धमकी, शस्त्र लाइसेन्स मिलने या उसके नवीनीकरण में लालफीताशाही, सरकारी दफ़्तरों में धक्के खाने और न पहचाने जाने का संकट इन फौजियों के मुंह से ज्वार की तरह फूट पड़ा। पुलिस और प्रशासन के अधिकारी उन्हें समझाने-बुझाने और जाँच का आश्वासन देकर चुप कराने की कोशिश कर रहे थे।

एक फौजी की बेटी को शरेआम उठा लिया गया था। उसने अपनी बात कहनी शुरू की। वह वास्तव में हकला रहा था कि उसकी पीड़ा उसकी जुबान को लड़खड़ाने पर मजबूर कर रही थी यह मैं अन्त तक नहीं समझ पाया। साहब… मैं सबको जानता हूँ। उन लोगों ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा… पुलिस भी उनको जानती है… दरोगा जी उन लोगों से कहाँ मिलते हैं यह भी जानता हूँ… महीने भर से परेशान हूँ लेकिन मेरी लड़की को मेरे सामने नहीं ला रहे हैं… जब जाता हूँ तो मुझे ही उल्टा समझाने लगते हैं… कहते हैं कि लड़की अठ्ठारह साल की है… अपनी मर्जी से गयी है… मैं कहता हूँ कि एक बार मेरी लड़की को मेरे सामने लाकर दिखा दो तो मैं मान जाऊँगा। लेकिन वे कुछ नहीं कर रहे हैं। डिप्टी एस.पी. साहब मोबाइल पर थानेदार से बात करके दरियाफ़्त करते हैं और बताते हैं कि लड़की ने उस मुस्लिम लड़के के साथ कोर्ट मैरिज कर लिया है… फौजी के चेहरे पर दर्द और घना हो जाता है। साहब, मैं तो बस चाहता हूँ कि एक बार मेरी बच्ची को मेरे सामने ला दो… मैं उसे देख लूंगा तो संतोष कर लूंगा… वह ऐसी नहीं है…. हमारी बच्ची को जबरिया उठाया गया है… मुझे सब मालूम है… वह ऐसा कर ही नहीं सकती… कोई मुझे समझ नहीं रहा है…

पुलिस अधिकारी समझाने की कोशिश करते हैं… देखिए जब आपकी लड़की बालिग हो चुकी है तो वह अपनी मर्जी से जहाँ चाहे वहाँ रह सकती है। हम इसमें कुछ नहीं कर सकते…. नहीं साहब, मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है कि वह ऐसा कैसे कर सकती है… मैं यह नहीं मान सकता… फौजी की आवाज काँप रही है। …असल में आपने अपनी बेटी को तालीम ठीक नहीं दी है। उसने आपको छोड़कर उस लड़के के साथ रहने का निर्णय ले लिया है… इसमें हम क्या कर सकते हैं… ठीक है, तो आपभी मुझे वही समझा रहे हैं जो दरोगा जी समझा रहे थे। हार कर अब मैं अपनी जान दे दूंगा… लेकिन उसके पहले उन दुश्मनों से बदला लेकर रहूंगा… अब मैं खुद ही कुछ करूंगा… मेरी कोई सुनने वाला नहीं है… मेरी बेटी को उन लोगों ने अगवा कर लिया है…। बार-बार यह सब दुहराता है। उसे अपनी सीट पर बैठ जाने का हुक्म होता है। अगला केस बताया जाय…

दूसरा फौजी खड़ा होता है। मेरी बेटी तो सिर्फ़ पन्द्रह साल की है। मैं दो महीने से भटक रहा हूँ। दरोगा जी केवल दौड़ा रहे हैं। मैने नामजद रिपोर्ट लिखवायी है। उन लोगों ने ‘अरेस्ट स्टे’ ले रखा था। मैने हाईकोर्ट से उसे खारिज करवा दिया है… फिर भी पुलिस उन्हें गिरफ़्तार नहीं कर रही है। वे बहुत बड़े माफ़िया हैं। मुझे डर है कि मेरी बेटी को उन लोगों ने कहीं बाहर भेंज दिया है या उसके साथ कोई गलत काम हो रहा है…। वे लोग रोज हाईकोर्ट आ-जा रहे हैं। मैं उन्हें रोज देखता हूँ लेकिन पुलिस को दिखायी नहीं पड़ते। दरोगा जी कह रहे थे कि आई.जी. साहब ने गिरफ़्तार करने से मना किया है…। डिप्टी एस.पी. तुरन्त प्रतिवाद करते हैं। यह सब गलत बात है। आप कप्तान साहब (डी.आई.जी.) से मिलकर अपनी बात कहिए। गिरफ़्तारी तो अब हो जानी चाहिए। लेकिन उनकी बात में विश्वास कम और सान्त्वना अधिक देखकर फौजी विफ़र पड़ते हैं। साहब, थानेदार को तलब कर लिया जाय… मोबाइल पर बात होती है। थानेदार किसी कोर्ट में चल रही बहस में व्यस्त हैं। अभी नहीं आ सकते…। उनसे बात करके बाद में आपको सूचना दे दी जाएगी…। आश्वासन मिलता है।

आगे समोसा, मिठाई, नमकीन की प्लेटें लगायी जा चुकी हैं। फ्रिज का ठण्डा पानी गिलासों में भरकर रखा जा चुका है, जिनकी बाहरी सतह पर छोटी-छोटी बूँदें उभर आयी हैं। सबके सामने कपों में चाय रखी जा रही है। …किसी और की कोई समस्या हो तो बताये। कोषागार से या वित्त सम्बन्धी कोई परेशानी हो तो इन्हें नोट करा दें। यह बात नाश्ता प्रारम्भ होने की भुनभुनाहट में दब जाती है। कोई शिकायत नहीं आती है। कर्नल साहब सबको धन्यवाद देते हैं। बैठक ‘सकुशल’ समाप्त होती है…

मेरा मन ए.सी. की ठण्डी हवा में भी उद्विग्न होकर गर्मी महसूस करने लगता है। सीने पर कुछ बोझ सा महसूस होता है। एक लोक कल्याणकारी राज्य का यह सारा शासन प्रशासन किसकी सेवा में लगा हुआ है…?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

एक घटिया व्यक्ति को चुनने के लिए इतनी कसरत… बाप रे बाप?

25 टिप्पणियाँ

 

जनवरी की बेहद सर्द रात… एलार्म की घण्टी भोर में साढ़े चार बजे बज उठी है। घर के तीनो मोबाइल सेट एक साथ बजे हैं। तीनों में एलार्म इस लिए सेट किए कि कहीं कोई चूक न हो जाय। मामला इतना संवेदनशील है कि तैयार होकर साढ़े पाँच बजे तक हर हाल में निकल पड़ना है। सीजन का सबसे ठण्डा दिन… दाँत बज रहे हैं। बाहर कुहरे की मोटी चादर फैली हुई है। गहरी नींद और गर्म रजाई से निकलकर बाथरूम में… ऊफ़्‌ टैप का पानी तो हाथ काटे दे रहा है। इमर्सन रॉड से पानी गरम करने में आधा घण्टा लग जाएगा…. चलो तबतक ब्रश करके सेव करते हैं… किसी तरह ये दिन ठीकठाक बीत जाय …नहाकर पूजा करते हुए यही प्रार्थना मन में चल रही है…।

ड्राइवर का मोबाइल स्विच ऑफ़ है… उफ़्‌। यदि वह समय से नहीं आया तो बहुत गड़बड़ हो जाएगी। सुरक्षाकर्मी न आया तो अकेले ही निकल लूंगा लेकिन ड्राइवर और गाड़ी के बिना तो कुछ भी सम्भव नहीं। रात ग्यारह बजे छोड़ते वक्त मैने उन दोनो को ठीक से समझा दिया था कि सुबह साढ़े पाँच बजे निकलना है… एक मिनट भी देर की तो मैं डीएम साहब के यहाँ जाकर दूसरी गाड़ी ले लूंगा… उसके बाद तुम लोग जेल जाना… मैं तो चुनाव कराने चला ही जाऊंगा…। लेकिन क्या मैं ऐसा कर सकता हूँ? खुद की फसन्त भी तो है। डीएम साहब पूछेंगे कि रात में आए ही क्यों… क्या जवाब दे पाऊंगा। ड्राइवर ने फिर भी मोबाइल बन्द कर लिया है। उफ़्‌…! टेन्शन… टेन्शन…टेन्शन… चुनाव में यह किस-किसको नहीं झेलना पड़ता है…!

पूजा अधूरी छोड़नी पड़ी। भगवान को क्या समझाना… वह तो सब जानता है। चुनाव ड्यूटी के लिए छूट दे ही देगा। लेकिन ५:२५ पर भी ड्राइवर का फोन बन्द होना डरा रहा है। अचानक मुँह जल जाता है तो पता चलता है कि श्रीमती जी गरम चाय हाथ में दे गयी हैं। पहले उस ओर ध्यान नहीं गया। मोबाइल पर अटका हुआ है… अब क्या करूँ…??? सुबह-सुबह टेन्शन…।

ठीक साढ़े-पाँच बजे काल-बेल बज उठती है। दौड़ कर दरवाजा खोलता हूँ…। प्याली की चाय छलक जाती है। बाहर ड्राइवर और गार्ड दोनो मौजूद हैं। जान में जान आती है। चुनाव ड्यूटी का खौफ़ किसे न होगा…? फाइल लेकर गाड़ी में बैठ जाता हूँ।

“तुमने मोबाइल क्यों बन्द कर लिया भाई…?” मन में खुशी है कि समय पर प्रस्थान हो गया है।

“साहब, बैटरी डिस्चार्ज हो गयी है। रात में लाइट नहीं थी…” ओहो, मैने तो इन्हें ग्यारह बजे छोड़ा ही था। इन्हें अपने घर जाकर सोते हुए बारह बज गये होंगे फिर भी सुबह ठीक समय पर हाजिर हैं… इन्हें तो मुझसे भी कम समय सोने को मिला… मन को तसल्ली देता हूँ।

फिर उनके बारे में सोचने लगा जो उस देहात के अन्धेरे में कड़ी ठण्ड से ठिठुरते हुए ब्लॉक में बने बूथ पर टिके हुए हैं। चुनाव कराने गये करीब बीस शहरी लोगों की सुविधा के नाम पर ब्लॉक में लगा एक ‘इण्डिया मार्क-टू हैण्ड पम्प’, खुली खिड़कियों वाले बड़े से हाल में बिछी टेन्ट हाउस की चरर-मरर करती चारपाइयाँ और उनपर बिछे धूलधूसरित गद्दे, बीडिओ और ‘पंचायत साहब’ के सौजन्य से रखी कुछ मटमैली रजाइयाँ। रात में ब्लॉक के स्टाफ़ ने पूरी सेवा भावना से जो गरम-गरम पूड़ी और आलू की मसालेदार सब्जी खिलायी थी उसे खाने के बाद उस शौचालयविहीन परिसर में रुककर सोने की हिम्मत न हुई। वहाँ से मैं रात में दस बजे भाग आया। करीब साठ किलोमीटर की यात्रा वहाँ रुकने से कम दुखदायी थी।

हालाँकि ऑब्जर्वर महोदय की इच्छा थी कि सेक्टर मजिस्ट्रेट भी बूथ पर ही रात्रि विश्राम करें। यह भी कि रात भर इसपर निगरानी रखी जाय कि किसी दल या प्रत्याशी द्वारा पोलिंग पार्टी को प्रभावित करने का प्रयास न हो। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए ‘कुछ भी करेगा’ टाइप तैयारी। …पोलिंग पार्टी जब खा-पीकर सो गयी तब मैं वहाँ से हटा और जब सुबह सात बजे हाजिर हो गया तो पार्टी वाले अभी जगकर पहली चाय की बाट जोह रहे थे।

मतदान आठ बजे से प्रारम्भ होना था… आनन-फानन में हाल खाली करके मतदान की तैयारी कर ली गयी। मतदान के लिए गोपनीय घेरा बना लिया गया था। पुलिस वालों को स्ट्रेट्जिक प्वाइण्ट्स पर तैनात किया गया, वीडियो कैमरा वाले को लगातार आठ घण्टे वोटिंग की रिकॉर्डिंग करने के लिए जरूरी बैटरी बैकअप और कैसेट के साथ तैयार किया गया… पीठासीन अधिकारी अपनी टीम के साथ मुस्तैद होकर माननीय मतदाता की राह देखने लगे… प्रथम वोटर ग्यारह बजे पधारे।

***

“साहब आप बहुत गलत कर रहे हैं, इतनी सख़्ती करेंगे तब तो हम चुनाव ही हार जाएंगे… ‘भाई’ को मुँह दिखाने लायक ही नहीं रह जाएंगे” प्रत्याशियों की ओर से तैनात मतदान अभिकर्ताओं में से एक ने व्यग्र होकर कहा।

प्रत्येक मतदेय स्थल (पोलिंग बूथ) पर प्रत्याशी द्वारा अपना एजेन्ट नियुक्त किया जाता है जो मतदाताओं की पहचान करने में पोलिंग पार्टी की मदद करते हैं और प्रतिद्वन्दी पार्टी द्वारा सम्भावित धाँधली पर भी नजर रखते हैं। इन्हें हाल के भीतर ही कुर्सियाँ दी जाती हैं। ये प्रत्येक मतदाता को देखते हैं और किसी भी फर्जी मतदाता की पहचान को चैलेन्ज कर सकते हैं। जो महोदय शिकायत कर रहे थे उनको मैने वोट डाल रहे मतदाताओं के नजदीक जाकर मतपत्र देखने की कोशिश से रोक दिया था। मतदान की गोपनीयता भंग होने की इजाजत कतई नहीं दी जा सकती थी। हारकर वे हाल से बाहर आ गये थे और मुझे ‘समझाने-बुझाने’ की कोशिश करने लगे

“मैं समझा नहीं, आप चाहते क्या हैं…?” मैने अनभिज्ञता प्रकट की।

“अरे साहब, यदि वोटर को हमें वोट नहीं दिखाने देंगे तब तो वह धोखा दे देगा”

“कैसा धोखा…? मैं समझ नहीं पा रहा हूँ, गुप्त मतदान का तो उसे अधिकार है। इसी की रक्षा के लिए तो यह सारी मशीनरी लगी है”

“कैसा अधिकार साहब…, चार-चार लोगों से पैसा खाकर बैठे हैं सब… अगर ऐसे वोट डलवा देंगे तब तो यह हमारा खाकर भी दूसरे को वोट दे देंगे…”

“नहीं-नहीं, मैं ऐसा नहीं मानता… ये सभी खुद ही जनप्रतिनिधि हैं। जनता के वोट से चुनकर प्रधान और बीडीसी मेम्बर बने हैं। आज ये अपना एम.एल.सी चुनने आये हैं। ये लोकतन्त्र के खिलाफ़ कैसे जा सकते हैं?”

“बेकार की बात कर रहे हैं आप, इसी एलेक्शन की राजनीति में मैने जिन्दगी गुजार दी है साहब… यहाँ हमारी जाति के वोटर नहीं हैं। आपने अगर मदद नहीं की तो यहाँ से तो हम हार ही जाएंगे”

“मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ? मदद तो वोटर ही करेगा। आपके प्रत्याशी खासे लोकप्रिय हैं, मैने सुना है आसानी से जीत रहे हैं…” मैने ढाढस देते हुए कहा।

“बात वो नहीं है। चुनाव तो ‘भाई’ जीत ही रहे हैं, लेकिन इस बूथ से हार हो जाएगी तो मेरी बड़ी फजीहत हो जाएगी। क्या मुँह दिखाऊंगा मैं?”

“मुँह तो मैं नहीं दिखा पाऊंगा अगर यहाँ कोई धाँधली हो गयी… मेरी तो नौकरी ही चली जाएगी” मैने मजबूरी बतायी।

“किसकी मजाल है साहब जो आँख उठाकर देख ले… सख्ती सिर्फ़ आप कर रहे हैं। यहाँ किसी भी एजेण्ट की हिम्मत नहीं है जो हमारे खिलाफ़ खुलकर ऑब्जेक्शन करे। पता नहीं, आप ही क्यों नहीं समझ रहे है?”

“अभी यहाँ जोनल मजिस्ट्रेट, डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट और स्वयं ऑब्जर्वर कभी भी आ सकते हैं… आप किसी अनियमितता की उम्मीद मत करिए। तुरन्त शिकायत हो जाएगी…”

“कोई कुछ नहीं कहेगा साहब, ये साले वोटर एक बार मुझसे आँख मिलाएंगे तो जो मैं चाहूंगा वही करेंगे।”

मैने साफ हाथ जोड़ लिया। मुझसे निराश हो जाने के बाद एजेण्ट महोदय उठकर बेचैनी से टहलने लगे। थोड़ी दूर जाकर मोबाइल मिलाने लगे। दूर से उनका हाव-भाव बता रहा था कि काफ़ी कोशिश के बाद फोन मिल गया है। फोन के उस ओर जो भी था उसे कुछ समझाने लगे… काफ़ी देर तक समझाने के बाद मेरे नजदीक आए और मोबाइल मुझे थमाते हुए बोले-

“लीजिए साहब, बहुत मजबूरी में मुझे यह कदम उठाना पड़ा है… भाई से ही बात कर लीजिए”

“ओहो…! हेलो… कौन साहब बोल रहे हैं?” मैने गर्मजोशी से अभिवादन करते हुए कहा।

“साहब नमस्ते… ‘मैं’ बोल रहा हूँ… कैसे हैं? सब ठीक चल रहा है न…” इस बीच बगल से एजेण्ट महोदय ने इशारे से बता दिया कि फोन पर उनके प्रत्याशी हैं।

“हाँ-हाँ, सब आपकी दुआएं हैं। सब कुछ फ्री एण्ड फेयर चल रहा है। इधर निरक्षर मतदाता अधिक हैं इसलिए प्रिफ़रेन्शियल वोट डालने में समय अधिक लग रहा है। नियमानुसार आवश्यक होने पर वोटिंग हेल्पर की सुविधा दी जा रही है”

“वो तो ठीक है, लेकिन `इनको’ आप कोई सुविधा नहीं दे रहे हैं… ऐसे काम नहीं चलेगा, थोड़ी मदद कर दीजिए…”

“कैसी मदद, पोलिंग पार्टी तो वोटर्स की मदद कर ही रही है… आराम से वोट पड़ रहे हैं। किसी को कोई शिकायत नहीं है”

“अरे, इनकी शिकायत पर तो ध्यान दीजिए… कह रहे हैं कि आप वोट देखने नहीं दे रहे हैं…”

“नेता जी, क्या आप यह कहना चाहते हैं कि मैं मतदान की गोपनीयता भंग हो जाने दूँ”

“नहीं-नहीं, बस इनको देख लेने दीजिए, नहीं तो वोटर टूट जाएंगे, हमारा नुकसान कराकर आप को क्या मिल जाएगा…?”

“भाई साहब, इसके लिए माफ़ करिए। मैं अकेला नहीं हूँ यहाँ। पीठासीन अधिकारी है, माइक्रो ऑब्जर्वर हैम, पुलिस वाले हैं, दूसरे उच्चाधिकारी हैं, आयोग के ऑब्जर्वर हैं और सबके बाद पूरी वोटिंग की वीडियो रिकॉर्डिंग हो रही है जिसे ऑब्जर्वर द्वारा देखकर संतुष्ट होने के बाद ही मतगणना करायी जाएगी। किसी प्रकार की धाँधली मतदान निरस्त करा सकती है। सरकार की और प्रशासन की बड़ी बदनामी हो जाएगी। आप अब भगवान के ऊपर छोड़ दीजिए… जो होगा अच्छा ही होगा।”

एक साँस में अपनी बात कहकर मैने फोन बन्द कर दिया और एजेन्ट महोदय से खेद प्रकट करते हुए उन्हें मोबाइल वापस कर दिया। भाई से हुई बात की जानकारी मैने अपने नजदीकी उच्चाधिकारी को फोन से दे दी। थोड़ी देर में अतिरिक्त फोर्स भी आ गयी। चार बजे की निर्धारित समय सीमा पूरी हो जाने तक एक स्थिर तनाव बना रहा। अन्ततः ९५ प्रतिशत मतदाताओं ने अपना वोट डाला।

***

ajit-ninan-024 पंचायतीराज व्यवस्था के लागू होने के बाद ग्राम पंचायत अध्यक्ष (ग्राम-प्रधान) और क्षेत्र पंचायत समिति के सदस्य (बीडीसी मेम्बर) पदों पर अनेक महिलाएं चुनी जा चुकी हैं।  विधान परिषद के स्थानीय प्राधिकारी निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता यही पंचायत प्रतिनिधि होते हैं। मतदान के लिए वहाँ आयी हुई अधिकांश महिलाएं अनपढ़ और निरक्षर थीं। उन्हें जिस वोट का अधिकार मिला था वस्तुतः उसका प्रयोग उनके पति, श्वसुर, देवर या पुत्र द्वारा ही किया जाना प्रतीत होता था। एक रबर स्टैम्प की भाँति उन्होंने बतायी गयी जगह पर ‘१’ की लकीर खींची होगी, शायद कुछ वोट सही जगह न पड़ पाने के कारण निरस्त भी करना पड़े। लोकतन्त्र की दुन्दुभि बजाते ये चुनाव क्या देश के जनमानस का सही प्रतिनिधि दे पा रहे हैं। ऐसा नेता जो हमें आगे की ओर सही दिशा में ले जा सके?

चुनाव के एक दिन पहले सुबह-सुबह कलेक्ट्रेट परिसर से पोलिंग पार्टियों की रवानगी से लेकर अगले दिन शाम तक वापस मतपेटियों के जमा होने तक की प्रक्रिया तो चुनावी महागाथा का बहुत संक्षिप्त अंश है। करदाता से वसूले गये करोड़ो रूपयों को खर्च करने, आम जन-जीवन अस्त-व्यस्त करने और लाखों कर्मचारियों-अधिकारियों द्वारा अपना रुटीन खराब करने के बाद चुनाव की प्रक्रिया सम्पन्न होती है तो एक ऐसे विजयी उम्मीदवार के नाम की घोषणा से जो अगले कुछ सालों में कुछ भी गुल खिला सकता है:

वह सदन में प्रश्न पूछने के लिए पैसा खा सकता है, सरकार चलाने के लिए माफ़िया से हाथ मिला सकता है, सरकार बचाने के लिए दलबदल कर करोड़ो कमा सकता है, कबूतरबाजी कर सकता है, साम्प्रदायिक और जातीय दंगे करवा सकता है, ईमानदार अधिकारियों की हत्या करा सकता है, आत्महत्या के लिए मजबूर कर सकता है, बेईमान अधिकारियों का गोल बनाकर सरकारी खजाना लूट सकता है, सरकारी ठेके दिला सकता है, सरकारी सौदों में दलाली खा सकता है, आम जनता और गरीबों का हक छीन कर अपनी तिजोरी भर सकता है, आतंकवादियों को जेल से छुड़ाकर उनके देश भेंज सकता है, राजभवन में पहुँचकर एय्याशी कर सकता है, मधु कोड़ा बन सकता है, देश बाँटने की साजिश रच सकता है।

ऐसी प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी निभाकर क्या हम उस पाप के भागी नहीं बन रहे हैं?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

कौन कहता है कि राजनीति का पतन हो रहा है…?

28 टिप्पणियाँ

 

दस साल पहले संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के साक्षात्कार में एक सदस्य ने मुझसे पूछा था कि भारत के राजनेताओं और पश्चिमी देशों के राजनेताओं में मौलिक अन्तर क्या है? मेरे बायोडेटा में शायद यह देखकर कि मैं पत्रकारिता का विद्यार्थी रह चुका हूँ उन्होंने मुझसे यह मुश्किल सवाल पूछ दिया था। तब सरकारी सेवा में दो साल तक रह लेने के बाद मुझे नेता नामक जीव के बारे में जो अनुभव हुआ था उसके आधार पर मैने कुछ स्पष्ट टिप्पणी न करना ही उचित समझा। अकस्मात् मुझे कोई सटीक अन्तर सूझ भी नहीं रहा था।

…फिर उन्होंने ही बताया कि भारत में राजनीति पेशेवर नहीं है। इसमें एक खास पारिवारिक पृष्ठभूमि के लोग ही आगे बढ़ पाते हैं। भकुआकर मैं उनकी बात सुनता रहा… कह रहे थे कि यदि आप किसी दूसरे पेशे में लगे हुए हैं तो  आप नेता नहीं हो सकते और यदि आप नेता हैं तो किसी दूसरे पेशे में नहीं जा सकते। लेकिन पश्चिमी लोकतन्त्रों में आप किसी भी पेशे में रहते हुए चुनाव लड़ सकते हैं, जीत सकते हैं, मन्त्री बन सकते हैं और फिर वापस अपने काम पर लौट सकते हैं।

मुझे उनकी बातें तब बिल्कुल ‘हट के’ लगी थीं लेकिन बाद में जब मैने इस पर विचार किया तो उनकी बात ठीक ही लगी। यहाँ आप अच्छे डॉक्टर, वकील, शिक्षक, इन्जीनियर, मैनेजर, प्रशासक, कलाकार, फौजी, नर्तक, चित्रकार, वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री  आदि हैं तो अच्छी नेतागीरी नहीं कर सकते। सरकारी नौकरी करने वाले तो बाकायदा इस काम से प्रतिबन्धित हैं। यहाँ जो नेता है वह सिर्फ नेता ही है। वह चुनाव लड़ने-लड़वाने, जीतने-हारने, और विधायक, सांसद और मन्त्री बनने या न बन पाने   के अलावा कुछ नहीं कर सकता। अनेक परिवार पूरी तरह इस राजनीति कर्म को ही समर्पित हैं।

मुझे यह सोचकर मन ही मन कोफ़्त सी होने लगी थी कि एक स्वतंत्र पेशा  के रूप में राजनीति का  कैरियर चुनने का विकल्प सबके पास मौजूद नहीं है। अपनी निजी प्रतिभा, अभिरुचि और परिश्रम से अन्य सभी व्यवसाय अपनाए जा सकते हैं लेकिन किसी व्यक्ति में इन गुणों की प्रचुरता के बावजूद राजनीति के क्षेत्र में सफलता की गारण्टी नहीं है।  देश में कितनी प्रतिभाएं भरी पड़ी हैं लेकिन राजनीति के क्षेत्र में वही लोग पीढ़ी दर पीढ़ी चलते आ रहे हैं। टाइम्स ऑफ़ इण्डिया का लीड इण्डिया कैम्पेन भी शायद इसी सोच के आधार पर शुरू किया गया था लेकिन अपेक्षित बदलाव दिखायी नहीं दिये।

लेकिन जरा ठहरिए…  पिछले दस बारह साल में राजनीतिक पटल पर जो कुछ घटित हुआ है उसे देखकर आप क्या कहेंगे? अपने देश में एक उच्च कोटि का वैज्ञानिक राष्ट्रपति बना और प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री प्रधानमन्त्री बन गया। विडम्बना देखिए कि यह सब तभी सम्भव हुआ जब इस प्रकार का निर्णय किसी खानदानी राजनैतिक परिवार द्वारा लि्या गया। इन विभूतियों ने अपने जीवन के उद्देश्य तय करते समय कभी नहीं सोचा होगा कि उन्हें राजनैतिक सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचना है। न ही इन्होंने इस दिशा में कोई स्वतन्त्र प्रयास किया होगा। वस्तुतः इनका राजनीति में आना और टिके रहना इनके असली आका के प्रसादपर्यन्त ही सम्भव हुआ। कलाम साहब को जब पूरा देश चाहता था तब भी वो हटा दिये गये थे। इसलिए इन दो उदाहरणों को अपवाद ही माना जाना चाहिए।

ये सारी बातें आज मेरे मन में आने की एक खास वजह है। मेरी मुलाकात एक ऐसे दुर्लभ प्राचीन कालीन नेता जी से हुई जो उत्तर प्रदेश में विधायक रह चुके हैं। उत्तर प्रदेश राज्य की विधान सभा के माननीय सदस्य जो अत्यन्त गरीब और बदहाल हैं…।

 

पूर्व विधायक श्री रामदेव जी

श्री रामदेव

पुत्र-रामनाथ

ग्राम-पुरा लच्छन

पोस्ट/तहसील-मेजा

कांगेसी बिधायक-मेजा

(१९७४-१९७७)

आजकल एक बार विधायक हो जाने का मतलब  आप सहज ही जान सकते हैं। मधु कोड़ा जी का उदाहरण तरोताजा है। कुल जमा चार पाँच सालों में आर्थिक विकास की जो गंगा उन्होंने बहायी है उसका वर्णन यहाँ करना जरूरी नहीं है। सभी कोड़ा साहब की तरह मधु ही मधु तो इकठ्ठा नहीं कर पाएंगे लेकिन किसी भी विधायक के लिए अब देखते-देखते करोड़ों जुटा लेना सामान्य बात हो गयी है। बड़ी सी चमचमाती गाड़ी में चार-चार बन्दूकधारियों के साथ घूमते, नौकरशाहों पर रोब गाँठते ये जनता के नुमाइन्दे जिस ओर निकल पड़ते हैं उस ओर तीमारदारों की लाइन लग जाती है। एक बार विधायकी का दाँव लग गया तो पूरी जिन्दगी के पौ-बारह हो जाते हैं। पीढ़ियाँ निहाल हो जाती हैं।

ऐसे में यदि आपको एक ऐसा पूर्व विधायक मिल जाय जिसको अपनी रोजी-रोटी के लिए खेत में मजदूरी करनी पड़ रही हो, तहसील में जाकर किसी वकील का बस्ता ढोना पड़ रहा हो और १०-२० रूपए लेकर दस्तावेज नवीसी करनी पड़ रही हो तो क्या कहेंगे? जी हाँ, इलाहाबाद की मेजा विधान सभा का प्रतिनिधित्व १९७४ से १९७६ तक करने वाले विधायक रामदेव जी आज भी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले भूमिहीन दलित परिवार के मुखिया हैं। उनके तीन बेटों को शिक्षा नसीब न हो सकी। खेतों में मेहनत मजदूरी करना और बैलों के साथ हल चलाना उनका जीविका का साधन है।

“आपने बच्चों को पढ़ाया नहीं…?”

“कहाँ साहब, हम गरीब आदमी ठहरे… बच्चों का पेट पालें कि स्कूल भेंजें…?”

बात बात में दोनो हाथ जोड़कर अपनी सरलता का परिचय देते  रामदेव जी ने जब अपनी राम कहानी बतायी तो मेरे मन में एक हूक सी उठने लगी। खुद भी मुश्किल से दर्जा पाँच पास कर सके थे। कांग्रेस पार्टी के जलसों में आया जाया करते थे। बहुगुणा जी ने हरिजन सुरक्षित सीट से टिकट दे दिया तो विधायक बन गये लेकिन अपने घर परिवार के लिए कोई संसाधन नहीं जुटा सके। लखनऊ की सत्ता की गलियों में पहुँच जाने के बावजूद बच्चों को गाँव के प्राइमरी स्कूल से आगे नहीं ले जा सके।

तीनो बेटों की कम उम्र में शादी कर दी। स्थानीय अनपढ़ समाज से बाहर कोई रिश्ता नहीं हुआ। बेटों ने खेतों में मजदूरी की और घर में बच्चे पैदा किए। तीनो के मिलाकर बारह लड़कियाँ और एक लड़का। सभी अशिक्षित रहे और मजदूर  बन गये। पैतृक सम्पत्ति के नाम पर खेत का जो छोटा टुकड़ा मिला उस पथरीली जमीन पर थोड़ी सी ज्वार, बाजरा और मक्का की फसल अपने श्रम से उगा लेते हैं, लेकिन चावल गेहूँ दाल तो खरीदना ही पड़ता है।

“बी.पी.एल. कार्ड बनवा लिए हैं कि नहीं…?” सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान से खरीदारी की सुविधा देने वाले इस कार्ड की बावत पूछने पर सकुचा जाते हैं।

“है तो साहब, लेकिन कहाँ मिल पाता है…। राशन का खर्चा बहुत है… वहाँ से कभी-कभार दस-बीस किलो चुपके से ले आता हूँ… थोड़ी लाज भी लगती है साहब… बड़ी कठिनाई है… ” उनके बार-बार हाथ जोड़ने से मुझे उलझन होने लगती है।

“आपका मकान कैसा है?” ब्लॉगर ने साहस करके पूछ ही लिया।

“कच्चा है साहब… हम बहुत गरीब हैं”…चेहरे पर वही संकोच तारी है।

“भूतपूर्व विधायक को तो सरकार अनेक सुविधाएं देती है। आपने कोशिश नहीं की…?” मेरा आशय राजनैतिक पेंशन, मुफ़्त  की यात्रा सुविधा इत्यादि से था।

“साहब ट्रेन और बस का ‘पास’ तो है लेकिन हमें खेत-खलिहान और तहसील तक ही जाना होता है… उसके लिए साइकिल या पैदल से काम चल जाता है। कभी लखनऊ या इलाहाबाद जाना होता है तभी पास का काम पड़ता है।”

“पेंशन तो मिल रही है न…?”

“डेढ़ हजार में क्या होता है साहब?”

“बस डेढ़ हजार…?” मुझे आश्चर्य हुआ।

“असल में साहब, मैं टाइम पर फॉर्म नहीं भर पाया था… सरकार का कोई दोष नहीं है” विनम्रता में हाथ बदस्तूर जुड़ा हुआ है।

मैने सम्बन्धित बाबू को बुलाकर पूछा तो पता चला कि समय-समय पर पेंशन पुनरीक्षण (revision) की प्रक्रिया का लाभ इन्हें मिला ही नहीं है। मई ’९७ से इनकी मूल पेंशन १४५०/- रूपये पर अटकी हुई है। कांग्रेस छोड़कर भाजपा में पहुँच चुके रामदेव जी की खराब माली हालत पर जब यहाँ के सांसद प्रत्याशी की निगाह पड़ी तो उन्होंने विधान सभा सचिवालय में पैरवी करके इनकी पेंशन में सुधार करा दिया था। उसी प्राधिकार पत्र के अनुसार भुगतान शुरू कराने के लिए रामदेव जी ने कोषागार की राह पकड़ी थी।

मैने देखा कि इनकी पेंशन सितम्बर-९८ से १९००/-, अप्रैल-२००४ से २५००/-, अगस्त-२००५ से ३६००/- और दिसम्बर-२००७ से ७०००/- कर दिए जाने का आदेश एक साथ जारी हुआ था। यानि विधायक जी अपनी मेहनत मजदूरी, और तहसील की मुंशीगीरी में इतना उलझे रहे कि अपनी पेंशन भी समय से नहीं बढ़वा सके। मूल पेंशन पर देय महंगाई भत्ता जोड़कर एकमुश्त एरियर की धनराशि लाखों में मिलने की बात सुनकर उनके चेहरे पर जो खुशी उतर आयी उसका बयान करना मुश्किल है। बार बार हाथ जोड़कर ऊपर वाले के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते रहे। आँखों की कोर से नमी झँकने लगी थी।

क्या आज का कोई विधायक या टुटपुँजिया नेता भी इस दारुण दशा का शिकार हो सकता है?  किसी विधायक के इर्द-गिर्द चलने वाले लटकन भी ठेकेदारी और रंगदारी का धन्धा चमकाकर मालदार और रौबदार हो लेते हैं। राजनीति के क्षेत्र में उतरने वाले अब इतना विकास तो आसानी से कर लेते हैं कि उन्हें कभी रामदेव जी जैसे दिन न देखने पड़े। मधु कोड़ाओं के तो कहने ही क्या…।

फिर कौन कहता है कि राजनीति का पतन हो रहा है…? 🙂

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

अनूप जी, अब सम्हालिए… सेमिनार तय हो गया!!

15 टिप्पणियाँ

 

पिछली पोस्ट में मैने जिस सेमिनार के न हो पाने की बात बतायी थी उसके आयोजन की तैयारी में आदरणीय अनूप शुक्ल जी ने बहुत समय खर्च किया था। जाने कितने चिठ्ठाकारों से चर्चा में लगे रहे। इन्होंने जाने कितने आदि, अनादि, अनामय, अविचल, अविनाशी चिठ्ठाकार भाइयों, बहनों और दोस्तों को इस राष्ट्रीय सेमिनार के स्वरूप के बारे में बताया होगा। अनेक प्रतिष्ठित और ‘स्टार’ ब्लॉगर जन को न्यौता भी इन्होंने ही दिया था। मैं तो सिर्फ़ इनका पता जानता था सो सारी बातें इन्हीं को बता देता था।

जब अचानक कार्यक्रम टलने की बात प्रकट हुई तो मुझे सबसे बड़ी कठिनाई यह समाचार फुरसतिया जी को बताने में हुई। अपने से अधिक निराश मैने इन्हें पाया था। करीब दो सप्ताह का उत्साह दो मिनट में ठण्डा पड़ गया था। उधर मेरे बड़े भाई डॉ. अरविन्द मिश्र जी ने मुझे पहले ही आगाह किया था कि जब तक सब प्रकार से बात पक्की न हो जाय और बजट की व्यवस्था सुनिश्चित न हो जाय तबतक हाथ न डलियो। इसलिए जब उन्होंने स्थगन का समाचार सुना था तो थोड़े दुखी तो जरूर हुए लेकिन अपनी भविष्यवाणी के सच होने पर उनके मन में एक स्थितिप्रज्ञ का सन्तोष भाव भी जरूर था।

लेकिन अब तो कहानी बदल गयी है। अब “बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेहु…” की पॉलिसी पर चलना है।

अब अनूप जी को अपना पहले का किया श्रम व्यर्थ नहीं लगना चाहिए। कार्यक्रम की रूपरेखा जो हमने तब तय की थी कमोबेश वही रहने वाली है। शीघ्र ही महात्मागांधी अन्तर राष्ट्रीय  हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के अधिकारियों के साथ इलाहाबाद में बैठकर हम कार्यक्रम को अन्तिम रूप देंगे। अतिथियों की सूची भी वहीं तय हो पाएगी, लेकिन हिन्दी ब्लॉगजगत का सच्चा प्रतिनिधित्व कराने का पूरा प्रयास होगा। आदरणीय अनूप जी, अरविन्दजी, ज्ञानदत्तजी, आदि ने सदैव मेरे प्रति जो स्नेह का भाव रखा है उसी की ऊर्जा से मैं यह आयोजन करा पाने का आत्मविश्वास सजो पा रहा हूँ।

हिन्दुस्तानी एकेडेमी द्वारा इस अवसर पर एक महत्वाकांक्षी योजना बनायी गयी है। आप सभी इसमें सक्रिय सहयोग दें। एक अनूठी कृति आकार लेने वाली है। निस्संकोच होकर अपना योगदान सुनिश्चित करें। एकेडेमी के सचिव डॉ.एस.के. पाण्डेय जी ने उस अनुपम प्रकाशन का लोकार्पण २३ अक्टूबर के उद्‌घाटन सत्र में कराने का निश्चय अभी कर लिया है, जबकि प्रकाश्य सामग्री का एक भी शब्द अभी तय नहीं हुआ है। लेकिन हमें पूरा विश्वास है कि एक जोरदार पुस्तक उस तिथि तक आपके सामने होगी। बस आप अपनी प्रविष्टियाँ तत्काल भेंज दीजिए। कहाँ और कैसे? यह जानने के लिए एकेडेमी के ब्लॉग पृष्ठ पर पधारें।

अस्तु, हे अनूप जी! आगे का जिम्मा आपै सम्हारौ। हम त चलै माता रानी का आशीष बटोरै…  अरविन्द जी यदि चुनाव कराने में नहीं लगाये गये तो बाकी सब काम उनके लिए बहुत सरल हो जाएगा।

वैष्णो देवी धाम से लौटकर जब मैं वापस आऊंगा तो एकेडेमी के मेल-बॉक्स में सैकड़ों प्रविष्टियाँ आ चुकी होंगी। उनको छाँटने-बीनने के बाद संपादक मण्डल किताब को अन्तिम रूप देने में अधिकतम सात दिन लेगा और मुद्रक किताब बनाकर देने में सात दिन और लेगा। बस तबतक ब्लॉगिंग का महाकुम्भ भी आ ही जाएगा। किताब का लोकार्पण भी लगे हाथों हो जाएगा।

अब तो हम यह पोस्ट ठेलकर ट्रेन में बैठ जाएंगे। एक सप्ताह बाद लौटकर जुट जाएंगे इस महामेला की तैयारी में। तबतक अनूप जी अपने तरीके से तैयारी पूरी ही कर डालेंगे। बस मौजा ही मौजा… 🙂

लोकतन्त्र के भस्मासुर

27 टिप्पणियाँ

 

“कृपया मेरे सच बोलने पर नाराज न होइए; कोई भी व्यक्ति जो इस नगर-राज्य में घट रही अनेक अन्यायपूर्ण व गैरकानूनी घटनाओं को रोकने की कोशिश करेगा; और आपका या किसी अन्य ‘भीड़’ का सच्चा विरोध करेगा वह बच नहीं पाएगा। कोई भी व्यक्ति जो न्याय के लिए वास्तविक संघर्ष करता है, उसे यदि जीने की थोड़ी भी इच्छा है तो उसे सार्वजनिक जीवन त्याग कर निजी ज़िन्दगी बितानी होगी।” (एपॉल्जी से)

image यह उद्‍गार ग्रीक दार्शनिक प्लेटो के गुरू सुकरात ने ‘जूरी’ के सामने भरी अदालत में तब व्यक्त किए थे जब उनके विरुद्ध देशद्रोह का मुकदमा चलाया जा रहा था। कुछ ही समय में वह जूरी उन्हें मृत्युदण्ड सुनाने वाली थी। प्लेटो ने अपने गुरू की मौत का कारण जिस राज-व्यवस्था को ठहराया उसे ‘डेमोक्रेसी’ कहा जाता था, जिसमें भींड़ द्वारा नितान्त अविवेकपूर्ण निर्णय लिए जाते थे, और प्रायः अन्यायपूर्ण स्थिति उत्पन्न हो जाती थी। वही डेमोक्रेसी आज दुनिया की सबसे लोकप्रिय, सर्वमान्य और सर्वाधिक व्यहृत शासन व्यवस्था हो गयी है। यह बात अलग है कि राजनीति विज्ञान के जानकार प्राचीन ग्रीक कालीन डेमोक्रेसी और आधुनिक ‘लोकतंत्र’ में जमीन-आसमान का अन्तर बताएंगे।

प्लेटो ने जिस नगर-राज्य को देखा था उसकी जनसंख्या इतनी छोटी होती थी कि राज्य के सभी नागरिक एक स्थान पर एकत्र होकर बहुमत से अपना शासक चुन लेते थे। भीड़ का एक बड़ा हिस्सा जिसे पसन्द करता था वही राजा होता था और उसके फैसले सभी नागरिकों पर बाध्यकारी होते थे। सिद्धान्त रूप में आज भी लोकतंत्र का मतलब यही है- जनता की सरकार, जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों की बहुमत आधारित सरकार।

लेकिन प्लेटो ने इस बहुमत की व्यवस्था का जो विश्लेषण किया, वह इसकी खामियों को उजागर करने वाला है, और कदाचित्‌ सच्चाई के करीब भी है। उन्होंने राज्य की तुलना एक व्यक्ति से की थी, और बताया था कि जिस प्रकार एक व्यक्ति के भीतर इन्द्रियबोध (sensation), चित्तवृत्ति (emotion), और बुद्धि (intelligence) के बीच उचित तालमेल से ही उसका सन्तुलित और स्वस्थ जीवन सम्भव है, उसी प्रकार राज्य के विभिन्न अवयवों के आपसी सामन्जस्य से ही न्यायपूर्ण राज-व्यवस्था स्थापित की जा सकती है। यदि बुद्धि-विवेक के ऊपर मन व शरीर में पलने वाले काम, क्रोध, मद व लोभ जैसे विकार हावी हो जाते हैं, तो व्यक्तित्व दोषयुक्त और अन्या्यपूर्ण हो जाता है। शरीर के ऊपर मन और मन के ऊपर मस्तिष्क का नियन्त्रण बहुत आवश्यक है। यदि नियन्त्रण की यह दिशा उलट-पु्लट जाय तो व्यक्ति नष्ट होने लगता है। पतन अवश्यम्भावी हो जाता है। यही स्थिति उस राज्य की भी होती है, जहाँ विवेक पर उन्माद हावी हो जाता है।

लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सभी व्यक्तियों को एक इकाई के रूप में बराबर माना जाता है। भले ही उनकी मानसिक और शारीरिक क्षमता तथा सामाजिक पृष्ठभूमि में भारी अन्तर हो। यह व्यवस्था इसी सिद्धान्त पर टिकी है कि राज्य/देश की सरकार चुनने में प्रत्येक व्यक्ति के मत का मान बराबर है। कोई किसी से कम या अधिक महत्व नहीं रखता। कुल मतदाताओं में से बहुमत जिसके पक्ष में हो, वही सरकार बनाता है। इस सरकार द्वारा जो भी निर्णय लिए जाते हैं वह उन अल्पमत वाले नागरिकों पर भी प्रभावी होता है जिनका मत इस सरकार के विरुद्ध रहा है।

सिद्धान्त रूप में इस व्यवस्था में कोई कमी नहीं नज़र आती; लेकिन व्यवहार में बहुत कुछ बदला हुआ नजर आता है। प्लेटो ने इन बदलावों पर कुछ प्रकाश डाला था। बहुमत की पसन्द कौन होता है? लोकप्रियता का पैमाना क्या है? व्यक्ति अपना नेता किसे चुनता है? जिसे देश की सम्पूर्ण जनता का ख़्याल रखना है; आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, सामरिक, राजनयिक, वाणिज्यिक आदि विषयों से सम्बन्धित लोकनीति बनानी है, उसका चुनाव करते समय जनता इन विषयों में उसकी प्रवीणता देखने के बजाय उसकी जाति, उसका धर्म व रंग देखती है; उसकी वक्तृता पर मोहित हो जाती है, किसी दूसरे क्षेत्र में उसके कौशल से प्रभावित हो लेती है; और अपना नेता चुन लेती है।

अच्छी भाषण कला में माहिर एक नेता किसी स्वास्थ्य सम्बन्धी मुद्दे पर आम जनता का मत एक डॉक्टर की अपेक्षा अधिक आसानी से बदल सकता है। वह कमजोर और निरीह नागरिकों  को भी शत्रु देश पर हमले के लिए तैयार कर सकता है, जो एक आर्मी-जनरल नहीं कर सकता। जनप्रतिनिधियों द्वारा प्रभावशाली भाषण के माध्यम से बड़े-बड़े जनसमूहों को सम्मोहित कर बेवक़ूफ बनाने और उनके अन्ध-समर्थन से अत्यन्त शक्तिशाली बन जाने के उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है।

फ्रेडरिक नीत्शे कहते थे कि उन्माद, पागलपन, मूर्खता या विक्षिप्तता के लक्षण किसी व्यक्ति के भीतर किंचित्‌ ही पाये जाते हैं; लेकिन एक समूह, दल, राष्ट्र या किसी ऐतिहासिक कालखण्ड में ये लक्षण एक अनिवार्य नियम जैसे मिलते हैं। एक भीड़ या समूह का हिस्सा बन जाने पर व्यक्ति के सोचने समझने का ढंग पूरी तरह बदल जाता है। भीड़ में उसकी मानसिकता भेंड़ जैसी हो जाती है। विवेक भ्रष्ट हो जाता है। इसी भीड़ द्वारा चुने गये प्रतिनिधि जब सरकार चलाते हैं तो सुकरात को जहर का प्याला पीना पड़ता है।

भारतवर्ष में लोकतंत्र का जो मॉडल चलाया जा रहा है, उसमें भी इस उत्कृष्ट सिद्धान्त का व्यावहारिक रूप किसी धोखे से कम नहीं है। यहाँ का समाज भी जाति, धर्म, कुल, गोत्र, क्षेत्र, रंग, रूप, अमीर, गरीब, अगड़े, पिछड़े, दलित, सवर्ण, निर्बल, सबल, शिक्षित, अशिक्षित, शहरी, ग्रामीण, उच्च, मध्यम, निम्न, काले, गोरे, स्त्री, पुरुष, आदि के पैमानों पर इतना खण्ड-खण्ड विभाजित है; और ये पैमाने हमारी लोक संस्कृति में इतनी गहरी पैठ बना चुके हैं, कि किसी भी मुद्दे पर आम सहमति या सर्वसहमति नहीं बनायी जा सकती। राष्ट्र-राज्य की परिकल्पना से हम कोसों दूर हैं। ऐसे में बहुमत का अर्थ मात्र दस-पन्द्रह प्रतिशत मतों तक सिमट जाता है। शेष मत विखण्डित होकर इस आँकड़े से पीछे छूट जाते हैं।

कोई भी राजनेता यदि इस गणित को ठीक से समझ लेता है तो वह उन्हीं दस-पन्द्रह प्रतिशत मतों को अपने पक्ष में सुनिश्चित हुआ जानकर सन्तुष्ट हो लेता है, और यह सन्देश भी देता है कि उनके हितों की रक्षा के लिए वह कुछ भी कर सकता है। सारे नियम-कायदे ताख़ अपर रख सकता है; दूसरे समूहों को सार्वजनिक रूप से गाली दे सकता है; साम्प्रदायिक हिंसा करा सकता है; मार-पीट, झगड़ा-लड़ाई, अभद्रता और गुण्डागर्दी से यदि उनका स्वार्थ सधता है तो उसका सहारा लेने में तनिक भी संकोच नहीं करता है। विरोधी मतवाले वर्ग के विरुद्ध खुलेआम अत्याचार और दुर्व्यवहार करने से यदि उसके पीछे खड़ी उन्मादी भीड़ तालिया पीटती है तो इस तथाकथित जनप्रतिनिधि को वह सब करने में कोई गुरेज़ नहीं है।

ऐसी हालत में लोकतन्त्र के चार उपहार- स्वतंत्रता, समानता, भ्रातृत्व व न्याय एक बड़े वर्ग के हाथ से छीन लिए जा रहे हैं, और इन्हें लोकतन्त्र के भस्मासुर अपनी चेरी बनाकर रखने में सफल हो रहे हैं। आजकल अखबारों की सुर्खिया ऐसे समाचारों से भरी पड़ी हैं जहाँ नेता जी अपनी बात मनवाने के लिए प्रशासन के अधिकारियों को मारने-पीटने से लेकर उनकी हत्या कर देने से भी गु़रेज नहीं करते। राजनैतिक पार्टियों द्वारा आपसी रंजिश में एक दूसरे पर राजनैतिक हमले करना तो अब पुरानी बात हो गयी है। अब तो सीधे आमने-सामने दो-दो हाथ कर लेने और विरोधी के जान-माल को क्षति पहुँचाने का काम भी धड़ल्ले से किया जा रहा है।

क्या हम प्लेटो के मूल्यांकन को आधुनिक सन्दर्भ में भी सही होता नहीं पा रहे हैं? 

क्या लिखूँ…? बताइए न…!

24 टिप्पणियाँ

 

ब्लॉगरी भी अजीब फितरत है। इसमें लगे रहो तो मुसीबत और न लग पाओ तो और मुसीबत। अभी एक पखवारे तक जो लोग इसमें लगे रहे वे निरापद लेखन की खोज में हलकान होते रहे और मैं इस चिन्ता में दुबला होता रहा कि मैं तो कुछ लिख ही नहीं पा रहा हूँ।

28052009306 बेटे के मुण्डन में गाँव जाना क्या हुआ मैने उसकी व्यस्तता की आड़ में खूब आलस्य का मजा लिया। कार्यक्रम की फोटुएं भी भतीजे की तगड़ी मोबाइल में वहीं छोड़ आया। घर-परिवार वालों ने सलाह दी कि बच्चे को ज्यादा एक्सपोजर दोगे तो नज़र लग जाएगी। बस मेरे आलस्य की बेल इस सलाह की डाल का सहारा पाकर लहलहा उठी। आज ही कुछ तस्वीरें मेरे हाथ लगी हैं लेकिन कौन सी लगाऊँ समझ नहीं पा रहा। …चलिए कोट माई के चरणों में खड़े सत्यार्थ की मुस्कान का आनन्द लीजिए।

इधर सत्यार्थ की मौसी श्रीमती रागिनी शुक्ला जी से भी भेंट हुई। उन्होंने एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की विधवा की करुण सत्यकथा हमें भेंट की। सोचा था पिछली दो कहानियों की कड़ी में उनकी तीसरी कहानी भी यहाँ पोस्ट कर दूंगा। लेकिन यहाँ घर में ही मात खा गया। श्रीमती जी ने अपनी दीदी की कहानी पर पहला हक़ जता दिया और वह भी टूटी-फूटी पर जा लगी।

उधर छ्ठे वेतन आयोग ने बुजुर्गों के साथ थोक भाव से सहानुभूति दिखायी है। अस्सी साल की उम्र पाते ही उन्हें २० प्रतिशत अधिक पेंशन दिए जाने और उसके बाद प्रत्येक पाँच साल पर इतना ही और बढ़ा देने का निर्णय ले लिया गया है। सौ साल पार करते ही वेतन के बराबर पेंशन हो जाएगी। इसमें अपने पति के स्थान पर पारिवारिक पेंशन पाने वाली अनेक बुजुर्ग और अनपढ़ महिलाएं ऐसी हैं जिन्हें स्वयं अपनी उम्र नहीं मालूम, और न ही कोई अभिलेख ऐसे हैं जो ठीक-ठीक उम्र बता सकें। सी.एम.ओ.(Chief Medical Officer) दफ़्तर आयु बताने का काउण्टर खोलकर बैठा है; जहाँ फौरन आयु का प्रमाणपत्र बन जा रहा है। शरीर पर ‘आला’ (Stethoscope) लगा कर और जीभ-मुँह देखकर आयु का निर्धारण कर दिया जा रहा है। सुना था कि किसी खास हड्डी का एक्स-रे लेकर सही आयु बतायी जा सकती है। लेकिन वहाँ शायद इसकी जरूरत नहीं पड़ रही।  विज्ञ पाठक इसपर प्रकाश डाल सकते हैं। डॉक्टर ब्लॉगर्स से विशेष अनुरोध है।

सावित्री देवी हाई स्कूल १९४४ऐसे में सावित्री देवी जैसी पेंशनर से मन प्रसन्न हो गया जिन्होंने १९४४ में हाई स्कूल की परीक्षा पास करके अपना प्रमाणपत्र सजो कर रखा है और आज उसका लाभ ८२ साल की उम्र में पाने जा रही हैं।

गाँव में लगभग सभी बच्चे बोर्ड परीक्षाओं में अच्छे अंको के साथ सफल रहे। वे भी जिन्हें खुद ही अपनी सफलता की आशा नहीं थी। नकल महायज्ञ की घनघोर सफलता ने सारे रिकार्ड पीछे छोड़ दिए। लड़कियाँ एक बार फिर लड़कों से आगे रहीं। इस शीर्षक की वार्षिक पुनरावृत्ति अखबारों में इस बार भी पूरे जोश से हुई। इसमें छिपी विडम्बना पर कुछ कहने की इच्छा थी, लेकिन संयोग से मेरी नज़र एक अज्ञेय ब्लॉगर की पोस्ट पर पड़ गई जहाँ इन साहब ने इस विषय पर काफी कुछ कह दिया है। सो यह प्रोजेक्ट भी जाता रहा।

Image039एक दिन के लिए ससुराल जाना हुआ। आम के बाग में बन्दरों की सेना समायी हुई थी। गाँव भर के लड़के बन्दरों को भगाने के बहाने गुलेल लेकर वहाँ जमा थे। उनकी निगाह बन्दरों द्वारा काटकर या तोड़कर गिराये जा रहे आमों पर अधिक थी। लेकिन जिस नन्हें और लुप्तप्राय जीव ने वहाँ मेरा मन मोहा वह थी वहाँ के पुराने मकान में जहाँ-तहाँ घोसला बनाकर रहने वाली नन्हीं गौरैया। घर के कोने-कोने में निर्भय होकर चहकने वाली और चुहू-चुहू की आवाज से पूरा घर गुंजायमान करने वाली गौरैया का बड़ा सा परिवार मुझे एक दुर्लभ आनन्द दे गया। मोबाइल से कठिनाई पूर्वक खींचे गये फोटू तो अभी भी सुरक्षित हैं लेकिन इस लुप्त होती प्रजाति पर एक खोजी और वैज्ञानिक रिपोर्ट बनाने के सपने ने इसपर भी एक पोस्ट को रोक रखा है। डॉ. अरविन्द जी या तसलीम जी कुछ मदद करें तो अच्छा हो।

लोकसभा चुनावों के परिणामों से मायावती जी को अपने खिसकते जनाधार का अंदेशा हुआ तो उन्होंने सत्ता की पकड़ मजबूत करने के लिए कई बड़े प्रशासनिक फैसले कर डाले। उस समय जब सरकारी अफसर ट्रान्सफर सीजन की तैयारी कर रहे थे और अच्छी पोस्टिंग के लिए अपने मन्त्रीजी को प्रसन्न करने के रास्ते तलाश रहे थे तभी मैडम ने शून्य स्थानान्तरण की नीति घोषित कर दी। कहते हैं कि कितनों के हाथ के तोते उड़ गये। लेकिन मैं स्वयं एक सरकारी मुलाजिम होने के नाते इन सुनी-सुनायी बातों पर चर्चा करने से बचता रहा।

28052009324

गाँव पर इस बार सन्ताइन और उनकी हिरमतिया से भेंट हुई। जब हम ‘कोट माई’ के स्थान पर बाबू के बाल चढ़ाने गये तो देखा कि वहीं पंचायत भवन के बरामदे में दोनो माँ-बेटी परित्यक्त और नारकीय जीवन जी रहे है। डिस्कवरी चैनेल पर दिखने वाला सोमालिया का भुखमरी का दृश्य वहाँ साक्षात्‌ उपस्थित था। मेरे कुछ मित्र और रिश्तेदार जिन्होंने हिरमतिया की कहानी पढ़ रखी थी वे भी उन्हें सजीव देककर आहत हो गये। लेकिन यहाँ सच कहूँ तो चाहकर भी मुझे इस दारुण कथा का अग्र भाग लिखने की हिम्मत नहीं हुई।

शशि पाण्डेय उधर इलाहाबाद संसदीय सीट की निर्दल प्रत्याशी शशि पाण्डेय ने सबसे कम वोट पाने के बाद अगले पाँच साल के लिए जो लक्ष्य निर्धारित किया है उसमें सबसे पहला लक्ष्य है- एक दूल्हा तलाशकर उससे शादी रचाना, उसके साथ देश विदेश घूमकर मजे करना और घर-गृहस्थी बस जाने के बाद पुनः जनसेवा के मैदान में कूद जाना। यह सब मुझे तब पता चला जब वो परिणाम घोषित होने के बाद अपने चुनावी खर्च का आखिरी हिसाब जमा करने के सिलसिले में मेरे कार्यालय आयी थीं। कल मुझे फोन करके पूछ रही थीं संसद में महिला आरक्षण बिल के बारे में मेरा क्या नजरिया है। मैने उनका नजरिया पू्छा तो बोलीं कि ‘आइ अपोज इट टूथ एण्ड नेल’ कह रहीं थीं कि इससे तो अगड़े कांग्रेसियों की बहुएं और बेटियाँ ही संसद में भर जाएंगी। …एक बार फिर उनके साहसी कदम की चर्चा करना चाहता था लेकिन उन्हीं के डर से आइडिया ड्रॉप कर दिया। निरापद लिखने का दौर जो चल पड़ा है इन दिनों…। 🙂

अभी एक शादी में शामिल होने के लिए गोरखपुर तक ट्रेन से जाना-आना हुआ। सफर के दौरान लालू जी की चमत्कारी सेवाओं से लेकर उनके निर्णयों को पलटने वाली ममता बनर्जी की खूब गर्मागर्म चर्चा सुनने को मिली। लालूजी के साइड मिडिल बर्थ की खोज पर लानत भेंजने वालों के कष्ट को स्वयं महसूस करने का मौका मिला। लेकिन जो बर्थें अब निकाली जा चुकी हैं उनकी चर्चा बेमानी लगती है। साइड अपर बर्थ को भी ऊपर सरकाकर जो छत से सटा दिया गया था वो अभी वहीं अटकी हुईं हैं और मुसल्सल कष्ट देती जा रही हैं। यह सब लिखकर मैं उस जनादेश का अनादर नहीं करना चाहता जो लालूजी को इतिहास की वस्तु बना चुका है। अब लालू ब्रैण्ड की टी.आर.पी. नीचे हो चली है।

तो मित्रों, ये सभी मुद्दे मेरे मन में पिछले एक पखवारे से उमड़-घुमड़ रहे थे लेकिन एक पूरी पोस्ट के रूप में नहीं आ सके। अभी कल जब मैने एक शत-प्रतिशत निरापद पोस्ट देखा तो मन में हुलास जगा कि एक अदद पोस्ट तो चाहे जैसे निकाली जा सकती है। लेकिन बाद में किसी ने मेरे कान में बताया कि यह निरापद पोस्ट भी हटाये जाने के आसन्न संकट से दो-चार है तो मेरे होश गु़म हो गये।

अब तो यह सोच ही नहीं पा रहा हूँ कि क्या लिखूँ…! आप विषय बताकर मेरी मदद करिए न…! सादर!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

Older Entries