क्षमा प्रार्थना…

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DSC02527 हे मूषक राज,

बहुत भारी मन से आपको विदा कर रहा हूँ। आपको कष्ट देने का मेरा कोई इरादा नहीं था। लेकिन क्या करूँ, आपने हमारे परिवार को ऐसा मानसिक कष्ट दिया कि आपको अपने घर से दूर कर देने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। आपसे विनती करने का कोई माध्यम होता तो मैं आपसे हाथ जोड़कर कहता कि आप इस घर के निरीह प्राणियों पर दया करिए। लेकिन आपको सलाखों के पीछे कैद करने के सिवा हमारे पास कोई दूसरा हल नहीं था। आपको जो कष्ट हुआ उसके लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं।

अपने विचित्र शौक को पूरा करते हुए आपने हमारे घर के किचेन से लेकर ड्राइंग रूम तक और आंगन से लेकर बेड रूम तक क्या-क्या नहीं काट खाया। कितने कपड़े, जूते-चप्पल, और घरेलू सामान आपकी निरन्तर वृद्धिमान दन्तपंक्ति की भेंट चढ़ गये। लेकिन हम यह सब कुछ सहते रहे। एक तो आपकी चंचल गति और दूसरे हमारी धर्म भीरु मति- दोनो आपकी सुरक्षा में सहायक रहे। आप हमारे आराध्य देव प्रथम वंदनीय, प्रातः स्मरणीय, गणपति, गणनायक, विघ्नविनाशक, लम्बोदर, उमासुत श्री गणेश जी के वाहन हैं। आपको किसी प्रकार की क्षति पहुँचाना हमारे लिए पाप की बात है। ऐसे कई अवसर आये जब आप हमारी आँखों के सामने ही हमें चिढ़ाते हुए चलते बने। घर के मन्दिर में चढ़ाया हुआ प्रसाद उठाने से जो हम चूक गये तो उसका भोग आप ही लगाते रहे। कदाचित्‌ मेरी गृहिणी मन ही मन खुश होती रही कि शायद आपकी पीठ पर बैठकर भगवान स्वयं भोग लगाने आते हों।

खुराफ़ात का अन्त आप छत से रोशनदान की ओर आने वाले डिश-टीवी के केबल पर चढ़कर घर के भीतर आते-जाते रहे। भारी देह होने के कारण एकाध बार अचानक ताली की आवाज से विचलित होकर आप फर्श पर आ गिरे तो भी आपका बाल बांका नहीं हुआ। बल्कि हम ही पाप के भागी होने के डर से सहम गये थे।

बचपन में अपने गाँव पर गेंहूँ की कटाई के बाद खाली हुए खेतों में आपका शिकार करने वालों को मैं देखता था। आपके बिल की खुदाई करने पर जमीन के भीतर आपकी बनायी हुई जो सुरंग मिलती थी उसे देखकर हम चौक जाते थे। आपने कितनी सफाई से भीतर ही भीतर गेंहूं की बालियों को इकठ्ठा रखने के लिए बड़े-बडे गोदाम बना रखे होते थे। अपने नवजात बच्चों के लिए सुरंग की सबसे भीतरी छोर पर नर्म मुलायम घास के बिस्तर सजा रखे होते थे। जब ये मुसहर जाति के शिकारी कुदाल से आपका आशियाना खोद रहे होते और आपके पूरे खानदान का सफाया कर रहे होते तो मेरा कलेजा कांप उठता था। आप द्वारा जमा किया हुआ अनाज उनका भोजन बन जाता। लेकिन जिस किसान के खेत पर आपकी कृपा हो जाती वह सिर पकड़ कर बैठ जाता।

मैने देखा था कि आपको पानी से बहुत भय हुआ करता था। आपको बिल से बाहर निकालने के लिए उसमें पानी भर दिया जाता था। आप जब घर में आयी बाढ़ से बचने के लिए बदहवास होकर भाग रहे होते तो आपके पीछे डण्डा लेकर दौड़ते गाँव के लड़के और उनके साथ आपका पीछा करने वाले कुत्ते अपनी पूरी शारीरिक शक्ति झोंक दिया करते थे।  बहुधा आप उन्हें चकमा देने में सफल हो जाते। लेकिन वे जब आपका शिकार कर लेते थे तो आपको आग में भूनकर नमक मिर्च के साथ चटखारे लेकर खाते हुए  वे लोग मेरे मन को घृणा से भर देते थे।

कुत्ते और बिल्लियों के लिए आपका उत्सर्ग तो अब किंवदन्ती बन चुका है। टीवी पर टॉम और जेरी का कार्टून देखते हुए मेरे बच्चे हमेशा आपके चरित्र से सहानुभूति रखते हैं। बिल्ले को हमेशा छकाते हुए आप सदैव तालियाँ बटोरते रहते हैं, लेकिन असली दुनिया आपके लिए इतनी उत्साहजनक नहीं है। शहरी जीवन शैली में आपको बर्दाश्त करने का धैर्य कम ही लोगों में है। आपको मारने के लिए तमाम जहरीले उत्पाद बाजार में लाये गये हैं। अब तो एक ऐसा पदार्थ बिक रहा है जिसे खाकर आप घर से बाहर निकल जाते हैं और खुले स्थान पर काल-कवलित हो लेते हैं।

एक बार गाँव में जब आपकी प्रजाति ने घर में कुहराम मचा रखा था तो एक दवा आँटे में मिलाकर जगह जगह रख दी गयी थी। उसके बाद जो हुआ उसे याद करके हम काँप जाते हैं। पूरे घर में बिखरी हुई लाशें कई दिनों तक इकठ्ठा की जाती रहीं। दो-चार दिन बाद जब दुर्गन्ध के कारण घर में रहना मुश्किल हो गया तो नाक पर पट्टी बाँधकर चींटियों की पंक्ति का सहारा लेते हुए अनेक दुर्गम स्थानों पर अवशेष मृत शरीरों को खोजा गया।   पूरे घर को शुद्ध करने के लिए हवन-अनुष्ठान कराना पड़ा। इसके बाद घर में यदि कोई बीमार हो जाता तो इसे उस हत्या के पाप का प्रतिफल माना जाता रहा। तबसे हम आपका समादर करने के अतिरिक्त कुछ सोच ही नहीं सकते।

हमने आपको कैद करने के बारे में कदापि नहीं सोचा होता यदि आपने शौचालय की सीट में लगे साइफ़न में इकठ्ठा पानी को अपना स्विमिंग पूल न बनाया होता। जाने आपको इस गन्दे पानी में स्नान करने का शौक कहाँ से चढ़ गया? इधर हमने देखा कि आपके पैरों के निशान कमोड से प्रारम्भ होकर वाश बेसिन पर और साबुनदानी को उलटने –पुलटने के बाद बरामदे में रखे सभी सामानों पर अपनी छाप छोड़ते हुए डाइनिंग टेबुल तक पहुँचने लगे थे। आपने हमारे सरकारी मकान के बाथरूम में लगे जीर्ण हो चुके दरवाजे के निचले कोनों पर छेद बना रखा था।

DSC02541 हमने पहली कोशिश तो यही की थी कि आपको ट्वायलेट में जाने से रोका जाय। रात में सोने से पहले हमने उन छेदों को एक बोरे से बन्द करके उसपर ईंट रख दिया था। सुबह हमने देखा कि आपने गुस्से में बोरे को कुतर दिया है और उसकी लुग्दी पूरे बाथरूम में बिखरा दी है। कदाचित इस गुस्से के कारण ही आपने उस रात रोज से ज्यादा लेड़ियाँ भी  भेंट कर दी थीं। हमने अगले दिन उन छिद्रों को टिन की प्लेट से ढँक दिया। लेकिन आप हार मानने वाले हैं ही नहीं। आपने अगली रात को उस टिन के ठीक बगल में दूसरा छेद बना लिया और अपना नरक-स्नान बदस्तूर जारी रखा।  छेद के पास ही दरवाजे के बाहर हमने जो एक चूहेदानी लगा रखी थी उसे भी आपने नहीं छुआ। आपको तो भीतर घुसने की जल्दी रही होगी।एक रास्ता बन्द हुआ तो दूसरा खोल लिया

हमें विश्वास हो गया कि आपको ट्वायलेट के भीतर जाने से नहीं रोका जा सकता है। आप स्नान करने से पहले कुछ और नहीं करते। चूहेदानी में रखे आलू के टुकड़े को आप तभी छुएंगे जब स्नान ध्यान पूरा हो जाएगा। मैने इस बार चूहेदानी को अन्दर ही लगा दिया ताकि जब आप अपने बाथटब से बाहर निकलें तभी भोजन की तलाश में उधर आकर्षित हों। इस बार युक्ति काम कर गयी। रात के करीब एक बजे जब खटाक की आवाज हुई तो मुझे चैन मिला। उठकर मैने तत्क्षण देखा। आप मेरे कैदी हो चुके थे। सद्दाम हुसेन को पकड़ने के बाद राष्ट्रपति बुश के चेहरे पर जो विजयी मुस्कान थी उसे भी मात देती हुई खुशी के साथ मैंने रात बितायी। आपको आपके पसन्दीदा स्थान पर ही कैदबन्द छोड़ दिया था मैने।

DSC02553 जब सुबह उठकर देखा तो आप अपने पिंजड़े के साथ कमोड की सीट में लुढ़के हुए थे। गजब का प्रेम था आपका उस नरक के रस्ते से। मैने एक प्लास से आपको पिजड़े सहित उठाया, आंगन में ले जाकर नल के पानी से विधिवत स्नान कराया और सुबह की ताजी धूप में सुखाने के बाद आपकी यादों को कैमरे में कैद करने के लिए उसी डाइनिंग टेबुल पर रख दिया जिसपर आप प्रायः विचरण करते रहते थे। आपको सलाखों के पीछे बहुत देर तक रखने की मेरी कोई मंशा नहीं थी। लेकिन मेरी श्रीमती जी सोमवती अमावस्या के अवसर पर पीपल देवता की पूजा करने, उनकी १०८ बार परिक्रमा करने गयी हुई थीं और मेरे बच्चे सो रहे थे। उन सबको आपका दर्शन कराये बगैर मैं आपको भला कैसे जाने देता?

अब जबकि मैने आपको अपने घर से एक किलोमीटर दूर इस मन्दिर के प्रांगण में लाकर छोड़ने का निश्चय किया है तो मन में मिश्रित भाव पैदा हो रहे हैं। दुःख और सन्तोष दोनो कुलांचे भर रहे हैं। उम्मीद है कि मन्दिर से सटा हुआ यह हरा-भरा पार्क आपको निश्चित ही अच्छा लगेगा। इस मन्दिर में दक्षिणमुखी हनुमान जी है, भगवान शंकर जी हैं, दुर्गा माँ की छत्रछाया भी है और आपके स्वामी गणेश जी भी पदासीन हैं। देखिए न, यहाँ कितनी धर्मपरायण सुहागिन औरतें पीपल के चबूतरे पर पूजा-परिक्रमा कर रही हैं। बड़ी मात्रा में प्रसाद चढ़ाया जा रहा है। आप इनका आनन्द उठाइए। हाँ, अपना नरक-स्नान का शौक त्याग दीजिएगा तो भला होगा।

आशा है कि मैने आपको जो नया बसेरा दिया है उसको मद्देनज़र रखते हुए आप मुझे माफ़ कर देंगे। मैने आपको पिजड़े में बन्द करके और नल के साफ पानी से स्नान कराके जो कष्ट दिया है और आपकी कैदी हालत में बेचैनी से किए गये क्रिया-कलाप दुनिया को दिखाने के लिए रिकॉर्ड किया है उसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ।

सादर!

आपका एक अनिच्छुक भक्त

(सिद्धार्थ)

विदा से पूर्व मूषक राज के करतब

कैद में खुराफ़ाती
सलाखों के पीछे

घुस पैठी थकान…

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इतवार का बिहान

सिर तक रजाई लिए तान

घर में की खटपट से बन्द किए कान

आंगन में धूप रही नाच

छोटू ककहरा किताब रहा बाँच

फिर भी न आलस पर आने दी आँच

कुंजीपट खूँटी पर टांग

धत्‌ कुर्सी कर्मठता का स्वांग

दफ़्तर में अनसुनी है छुट्टी की मांग

कूड़े का ढेर

फाइल में फैला अंधेर

चिट्ठों में आँख मीच रहे उटकेर

आफ़त में जान

भला है बन बैठो अन्जान

देह नहीं मन में घुस पैठी थकान

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

पुण्यदायी व्यवसाय- तीर्थयात्रा कम्पनी…!

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भारत की सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने हेतु आदि शंकराचार्य नें भारत की चार दिशाओं में चार धामों की स्थापना की। उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम , पूरब में जगन्नाथपुरी एवं पश्चिम में द्वारका, हिन्दुओं के चार धाम हैं। आस्थावान हिन्दू इन धामों की यात्रा करना अपना पवित्र कर्तव्य मानते थे। शंकराचार्य से पूर्व पौराणिक काल से बद्रीनाथ, केदारनाथ, जमुनोत्री और गंगोत्री को चार धामों की प्रतिष्ठा प्राप्त है।  कालान्तर में हिन्दुओं के नये तीर्थ आते गये हैं। बद्रीनाथ, द्वारका, रामेश्वरम, जगन्नाथपुरी के चार धामों के अतिरिक्त केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री, ऋषिकेष, हरिद्वार, वैष्णो देवी, वाराणसी, प्रयाग, अयोध्या बैजनाथधाम, तिरुपति, शिरडी, गंगासागर, पशुपतिनाथ (काठमाण्डू) आदि तीर्थस्थल आस्थावान हिन्दुओं द्वारा विशेष श्रद्धा के साथ भ्रमण किये जाते हैं। शक्ति की देवी दुर्गाजी के अनेक रूपों के मन्दिर प्रायः पहाड़ों की चोटियों व दुर्गम स्थानों पर स्थापित है। लेकिन भक्तगण दुर्गम रास्तों की परवाह किए बिना माँ का आशीर्वाद प्राप्त करने निकल पड़ते हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रतिष्ठित भगवान शंकर से संबन्धित द्वादश ज्योतिर्लिंग भी हिन्दू आस्था और भक्ति के अनन्य केन्द्र हैं:

सौराष्ट्रे सोमनाथम्‌ च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्‌

उज्जयिन्याम्‌ महाकालम्‌ ओंकाराममलेश्वरम्‌

केदारम्‌ हिमवत्पृष्ठे डाकिन्याम्‌ भीमशंकरम्‌

वाराणास्यान्तु विश्वेशम् त्र्यम्बकम् गौतमीतटे

बैद्यनाथम्‌ चिताभूमौ नागेशम्‌ दारुकावने

सेतुबन्धेतु रामेश्वरम्‌ द्युश्मेशं च शिवालये

द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्‌

सर्वयाय विनिर्मुक्तः सर्वसिद्धिः फलंलभेत्‌

इन पवित्र तीर्थस्थलों का दर्शन करने और पवित्र नदियों में स्नान करने से समस्त पापों का नाश होने और पुण्य के अर्जन का विश्वास प्रायः सभी हिन्दुओं को तीर्थयात्रा के लिए प्रेरित करता है। मार्ग की तमाम कठिनाइयों का सामना करते हुए प्राचीन काल में चारों धाम की यात्रा हिन्दुओं द्वारा देश की सांस्कृतिक एकता का दर्शन करने के लिये नहीं वरन्‌ अपना परलोक सुधारने के लिये ही की जाती होगी। इसी प्रकार गंगा का दर्शन करने लोग इस भाव से नहीं जाते कि वे सांस्कृतिक दृष्टि से भावविभोर हो जायें वरन्‌ इस भाव से जाते होंगे कि गंगा स्वयं शिव की जटा से निकली हैं और इसमें स्नान करने से उनके पापों का मोचन होगा।

पुराने जमाने में ये तीर्थयात्राएं बहुत कष्टकारी होती थीं। घर से बाहर निकलते ही कष्ट सहयात्री बन जाता था। कच्चे और दुर्गम मार्ग, दुर्लभ और धीमी सवारियाँ, प्रायः पैदल यात्रा की मजबूरी, खान-पान में कठिनाई और ठहरने के स्थानों का अभाव साधारण हैसियत वालों को यात्रा से रोकते थे। बहुत कम हिन्दू चारोधाम की यात्रा कर पाते थे। सुना जाता है कि भविष्य अनिश्चित्‌ जान बहुत से लोग यात्रा पर निकलने से पहले ही मृत्यु के बाद कराये जाने वाले कर्मकाण्ड और अनुष्ठान सम्पन्न कराकर जाते थे। जो भाग्यशाली होते थे और सकुशल यात्रा समाप्त कर लौट आते थे उनके दर्शन को भी पुण्यदायी माना जाता था। उनके पाँव पखारने और सेवा करने वालों की लाइन लग जाती थी।

पाप-पुण्य का विचार हमारे जनमानस में बहुत गहराई तक पैठा हुआ है। अच्छी और संस्कारित शिक्षा से हमारे मन को अच्छे और बुरे का भेद करना आता है। कम से कम हमारी आत्मा तो जानती ही है कि क्या गलत है और क्या सही। लेकिन लाख पढ़े-लिखे होकर भी ऐसे कम ही लोग हैं जो अपने सदाचरण पर टिके रहने को ही सबसे बड़ा पुण्य मानें। बहुतायत तो उन्हीं की है  जो इसके बजाय पहले काम, क्रोध, मद और लोभ के वशीभूत होकर निरन्तर अनैतिक कार्य करते जाते हैं और उसके बाद विश्वास रखते हैं कि पुरोहित द्वारा बताये गये कर्मकाण्डों के आयोजन और पवित्र तीर्थों के दर्शन द्वारा अपने एकाउण्ट से पाप की liability घटा लेंगे और पुण्य का asset बढ़ा लेंगे। इसी बैलेन्स शीट को कृत्रिम रूप से प्रभावशाली बनाने के प्रयास में  नये जमाने के लोग भी अपने पाप धोने के लिए संगम सहित तमाम नदियों व सरोवरों में खास मूहूर्त पर स्नान करने के लिए उमड़े जाते हैं और मन्दिरों में दर्शनार्थियों की भीड़ साल-दर-साल बढ़ती जा रही है।

इस पाप-पुण्य के व्यापार में बहुत से असली व्यापारियों ने व्यावसायिक पूँजी निवेश किया है। अब यात्रा की अनेकानेक सुविधाएं बढ़ती जा रही हैं। अब तो घर से ज्यादा बाहर की यात्रा खुशगवार होती जा रही है। पैकेज टूर ऑपरेटर्स, ट्रैवेल एजेन्सियाँ और सरकारी संस्थान, जैसे- रेलवे और पर्यटन विभाग द्वारा भी यात्रियों की जरूरत के अनुसार सुविधाए उपलब्ध करायी जा रही हैं। अब पुण्य कमाने निकले यात्रियों को सेवा देकर आर्थिक लाभ अर्जित करने वाली एजेन्सियों की भरमार होती जा रही है। मुझे यह सब चर्चा करने का मन इसलिए हुआ है कि हाल ही में मुझे एक ऐसी सुविधा से साक्षात्कार हुआ जो अत्यन्त सस्ते दर पर भारत के अधिकांश महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों की सैर लगातार पैंतीस दिनों तक कराती है। वह भी ऐसे कि यात्री को न तो अपने ठहरने का स्थान बदलना पड़ता और न ही सोने का बिस्तर। अपने सामान की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी नहीं, उसे यहाँ से वहाँ ढोने की फिक्र भी नहीं और खाने-पीने के लिए गर्म व ताजे घरेलू भोजन को मिस करने की मजबूरी भी नहीं है। मुझे तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं लगा।

रेलगाड़ी की चार बोगियों को विशेष रूप से तैयार कराकर  इस बड़ी यात्रा के लिए तीर्थयात्रा कम्पनी को उपलब्ध करा दिया जाता है। तीर्थयात्री को उसकी जो आरक्षित बर्थ यात्रा के प्रारम्भ में मिलती है वही अगले पैंतीस दिनों तक उसका बिस्तर होता है और वही कम्पार्टमेण्ट उसका घर बन जाता है। कम्पार्टमेण्ट की अन्य बर्थों के यात्री उसके परिवार के सदस्य बन जाते हैं और बगल का कम्पार्टमेण्ट उसका पड़ोसी घर हो जाता है। पूरी बोगी एक मुहल्ला और चार-पाँच बोगियाँ मिलकर एक शहर बना देती हैं। एक ऐसा शहर जिसमें देश के अलग-अलग राज्यों से आकर लोग बसे हुए हैं। सच में ‘भारत-दर्शन’ को निकले ये लोग स्वयं भारत का दर्शन कराते हैं। ये चारो डिब्बे अलग-अलग मार्गों पर अलग-अलग ट्रेनों से जुड़ते और टूटते हुए एक साथ देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुँचते रहते हैं।

मुझे यह सब देखने और जानने का सुअवसर तब मिला जब एक ऐसी ही यात्रा मण्डली बसन्त पञ्चमी के दिन इलाहाबाद पहुँची। इस यात्रा दल में मेरे गाँव के आठ लोगों की टोली में मेरे माता-पिता भी शामिल थे। उत्सुकतावश मैं सुबह सोकर उठने के बाद जल्दी-जल्दी तैयार होकर आठ बजे स्टेशन पहुँच गया। इलाहाबाद जंक्शन पर मजार वाली प्लैटफ़ॉर्म के दोनो ओर यात्री दल के दो-दो डिब्बे खड़े थे लेकिन उनमें ताला बन्द था। कम्पनी के स्टिकर से पहचान हुई जिसके कर्मचारियों ने बताया कि यात्रा बनारस से रात में ही यहाँ आ गयी थी। प्रातःकाल सभी यात्री लक्जरी कोच बसों से संगम क्षेत्र की ओर चले गये हैं। गंगा स्नान करके बड़े हनुमान जी, अक्षयबट आदि का दर्शन करके आनन्द भवन जाएंगे। वहाँ से भारद्वाज आश्रम देखने के बाद  बसें उन्हें करीब बारह बजे स्टेशन छोड़ जाएगी। प्लैटफ़ॉर्म पर यात्रियों का भोजन कम्पनी के रसोइए तैयार कर रहे थे।

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मैं फौरन लौटकर घर आया। कार्यालय में बॉस से मिलकर छुट्टी लिया और बच्चों को तैयार कराकर श्रीमती जी के साथ स्टेशन पर पहुँच गया। अपने सास-ससुर की पसन्द का भोजन तैयार करने में श्रीमती जी सुबह से ही व्यस्त रही थीं। चम्पा की मदद से हरे मटर की पूड़ियाँ, गोभी, लौकी, आलू और टमाटर की पकौड़ियाँ और पिताजी की पसन्दीदा खीर अपने हाथों तैयार कर डिब्बे में भर लिया था और झोले में अन्य जरूरी सामान डालकर हम स्टेशन पहुँच गये। ठोड़ी देर बाद यात्रियों का समूह प्लेटफ़ॉर्म पर आने लगा। प्रायः सबकी उम्र पचास के ऊपर थी। सबके चेहरे पर सन्तुष्टि का भाव तैर रहा था। लम्बी यात्रा की थकान जैसा कुछ भी नहीं दिखा। सबके गले में लटका परिचय पत्र जरूर ध्यान आकर्षित कर रहा था।

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एक चादर बिछाकर मैने अपने गाँव की यात्रा मण्डली को बिठाया। श्रीमती जी ने डिब्बा खोलकर अपने घर का पकवान परोसना शुरू किया और मैने इस यात्रा के प्रबन्धक को खोजना। वे निकट ही मिल गये। इतनी बड़ी यात्रा को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित करने वाला व्यक्ति निश्चित ही बहुत जानकार और गुणी होगा यह अनुमान पहले से कर चुका था।

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लाला लक्ष्मीनारायण अग्रवाल को देखकर कोई सहज ही अन्दाज लगा सकता है कि उन्होंने किसी मैनेजमेण्ट स्कूल से इवेन्ट मैनेजमेण्ट का कोई कोर्स नही किया है। न ही उन्होंने उन्होंने कोई प्रोफ़ेशनल डिग्री ही हासिल की होगी। लोहे की एक फोल्डिंग चेयर पर बैठे हुए वे अपने स्टाफ़ को जरूरी हिदायतें दे रहे थे। बीच-बीच में देश के अन्य हिस्सों में चल रही उनकी कम्पनी की अन्य तीर्थयात्रा बोगियों से आने वाले फोन काल्स भी सुनते जा रहे थे। अगली यात्रा की बुकिंग भी करते जा रहे थे, और टूर-पैकेज के बारे में भी बताते जा रहे थे। मल्टी-टास्किंग का बेजोड़ नमूना थे लालाजी।

“लालाजी, कबसे हैं आप इस धन्धे में…?” मैने उनका मोबाइल बन्द होते ही पूछ लिया।

“सरसठ से चल रहा है जी… बयालीस साल हो गये है” उन्होंने सहजता से उत्तर दिया।

मुझे अपनी अल्पज्ञता पर लज्जा आयी। जो काम १९६७ से वर्षानुवर्ष हो रहा है मुझे उसका पता अब जाकर चल पाया है। मैने झेंप छिपाते हुए आश्चर्य से पूछा, “लगातार बयालिस साल से आप यह वार्षिक यात्रा आयोजित कराते है…?”

“नहीं जी, …यह तो साल भर चलता रहता है। …अगला टूर एक हफ्ते बाद रवाना होगा। वह सत्रह दिन का है। साल में चार-पाँच हो जाते हैं”

“कैसे करते हैं आप यह सब?” मैने अपना कौतूहल छिपाते हुए पूछा।

“स्टाफ़ लगा रखा है जी। बाकी तो ऊपर वाला सब कराता है…सारा सामान हम साथ लेकर चलते हैं। लोकल केवल सब्जियाँ खरीदते हैं। हमारा स्टाफ़ अब ट्रेण्ड है। …सब प्रभु का आशीर्वाद है”

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मैने जब यात्रा के रूट और प्रमुख दर्शनीय स्थलों का व्यौरा जानना चाहा तो उन्होंने एक गुलाबी पर्चा थमा दिया। इस पर्चे में यात्रियों की जानकारी के लिए बहुत स्पष्ट और सूक्ष्म तरीके से सभी जरूरी बातें बतायी गयी थीं। नीचे सारणी में यात्रापथ का विवरण दूंगा। (अभी देर रात हो गयी है इसलिए इसे टालता हूँ)

वहीं पर गर्मागरम रोटियाँ सेंकी जा रही थीं। चार लोग मिलकर जिस कुशलता से लकड़ी की आग पर फुलके बना रहे थे उन्हें देखकर मैं लोभसंवरण न कर सका। आप यह वीडियो देखिए:

 

खाने में लहसुन-प्याज का प्रयोग नहीं होता। तेल, मिर्च और मसाला का प्रयोग भी बुजुर्गों की सहूलियत के हिसाब से कम किया जाता है। यात्री की उम्र, पसन्द और डाक्टरी सलाह का ध्यान रखते हुए सुबह की चाय, नाश्ता और दोपहर व शाम के भोजन को तैयार किया जाता था। हमारे गाँव के लोगों ने कहा कि ‘बहूजी’ ने इतना खिला दिया है कि अब कम्पनी का खाना हम नहीं खा सकते। हमें दावत दी गयी। हमने सहर्ष दावत कबूल की और सपरिवार डिब्बे में बैठ गये। डिब्बा क्या था बम्बई की किसी चाल का कमरा लग रहा था। ऊपर बाँधी गयी रस्सियों पर कपड़े झूल रहे थे। ऑलआउट मशीन और मोबाइल चार्जर की व्यवस्था सभी कूपों में थी। दवाइयाँ, चश्मे, और मोबाइल सबके सिरहाने रखे हुए। किसी चोर उचक्के या उठाई गीर के खतरे निश्चिन्त सबकुछ खुला हुआ जैसे घर में रखा हुआ हो। यात्रियों की आपसी बातचीत में घरेलू परिचय का पुट। इलाहाबाद में हम उनलोगों से मिलने वाले हैं यह पूरी बोगी के लोग जानते थे। वे सभी पिछले महीने भर से साथ जो थे।DSC02250

भोजन परोसने के लिए दक्ष कर्मचारी थे। सभी यात्रियों को उनकी बर्थ पर थालियाँ थमा दी गयीं। सादी सब्जी, तीखी-मसालेदार सब्जी, सादा चावल, मीठा चावल, मटर-पनीर स्पेशल (दाल के बदले) आदि बाल्टियों में भर-भरकर एक ओर से आते और जरूरत के हिसाब से थालियों में डालते हुए दूसरी ओर निकलते जाते। दस-पन्द्रह मिनट में ही स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्द्धक भोजन का काम पूरा हो गया।

वहाँ से लौटकर आया तो यही सोचता रहा कि स कम्पनी के बारे में आप सबको बताऊंगा। घर आकर गुलाबी पर्चा खोला तो उसमें सबसे पहले यही बताया गया था कि-

‘हमारी संस्था की सफलता को देखते हुए अन्य बहुत से अनुभवहीन व्यक्तियों ने नाम के आरम्भिक ‘श्री’ के स्थान पर अन्य नाम डिजाइन जोड़कर अपना नाम रख लिया है।और वे मिलते-जुलते नामों से VIP ए.सी. कोच से यात्रा करने के प्रलोभन द्वारा यात्रियों को भ्रमित कर रहे हैं। कृपया उनसे दस वर्ष पुराने यात्रियों की सूची रिकार्ड मांगे व उनके पुराने यात्रियों से सम्पर्क करके सुविधा, व्यवस्था की जानकारी करें तभी आपको वास्तविकता ज्ञात होगी। चूँकि हम यात्रियों को पूरी-पूरी सुविधा प्रधान करते हैं इसलिए हमारा खर्चा अन्य संस्थाओं से ज्यादा है। कृअपया आप हमारे पुराने यात्रियों से सुविधा व्यवस्था की जानकारी प्राप्त कर्रें व सन्तुष्ट होने के बाद हि सीट बुक कराएं।’ 

मुझे महसूस हुआ कि इस क्षेत्र में भी प्रतिस्पर्धा का दखल हो गया है। ग्राहकों (यात्रियों) को इससे लाभ मिलना ही है। धार्मिक आस्था के वशीभूत हिन्दुओं को चारोधाम व द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से अधिकांश की यात्रा एक मुश्त कराने वाली यह योजना इन कम्पनियों को आर्थिक लाभ चाहे जो दे रही हो लेकिन प्रतिवर्ष हजारों लोगों को पुण्य अर्जन में सहयोग और सेवा प्रदान करने वाली कम्पनी के कर्मचारी और प्रबन्धक पुण्य का लाभ जरूर कमा रहे हैं। आप क्या सोचते हैं?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

वीडिओ पता:  http://www.youtube.com/watch?v=4vIE27ViX4o

गृहिणी की कविता

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मन के भीतर उमड़-घुमड़

कुछ बादल सघन

ललक बरसन

पर पछुआ की धार से छितर-बितर

कुछ टुकड़ा इधर

कुछ खाँड़ उधर

 

घर के भीतर की खनखन

कलरव बच्चों का

कि अनबन

घरनी के मन में कुछ तड़पन

फिर ठनगन

उठता नहीं स्वर गगन

बस होती भनभन

मन ही मन

घरवाला अपने में मगन

देख ना सके है अगन

जाने किस बुरी घड़ी

लग गयी थी लगन

मन चाहे अब तोड़कर दीवारें

सरपट भगन

 

निकल नही पाती

मन से सब बात

लिखने को पाती

अब उठते नहीं हाथ

होकर अनाथ

साथ छोड़ रहा साहस

बिलाता एहसास अपनेपन का

दिखता नहीं कुछ भी

मन का

तन का

अब क्या करना

बस पेट भरना

तन कर

अब क्या रहना

बरबस अब है कहना

थाती मिटाती

ये आँधी

युगों ने थी बाँधी

जिस डोर से

चटक रही कैसे

किस ओर से

 

कैसे बतलाए

मन तो सकुचाए

अबतक तो रहे थे अघाए

नहीं….

खेले-खाए-अघाए

जितना भी पाए

उलीच दिया गागर

पर जो थी खाली

सारे मत अभिमत

सिद्ध हुए जाली

रखवाली का भ्रम था

जो करते नहीं थे

बस हो जाती थी

 

एक चिन्गारी लगी

ज्वाला फूटी

निकल पड़ी लेकर लकूटी

टूटी-फूटी…

 

ना ना

यह थी छिद्रहीन साबुत

जिन्दगी से भरी

भरी सी गगरी

न थी पत्थर की बुत

थोड़ी अलसाई

फिर लेती अंगड़ाई

छलक उठी गागर

समोए है सागर

कल-कल झरने की अठकेली

कई नदियों की धारा

लो इनको भी आँचल में लेली

अब खुलती हथेली

  गृहिणी

बन्द हुई मोटी किताबें

दूर धरी थियरी

सीधी सी बतियाँ बस

लाइव कमेन्टरी

घटित हो रहा मन में

जो घर में आँगन में

हस्तामलकवत्‌

चेतन मन कानन में

 

बात बेबात पे लड़ना

घड़ी-घड़ी झगड़ना

क्या दे देगा

किसी और का मुँह ताकते

एक ही लउर से हाँकते

भीतर बाहर झाँकते

आते-जाते को आँकते

हाँफ़ते फाँकते

सब ले लेगा

फिर

चाहिए ही क्या?

जो टाले न टले

हटाये न हटे

उसे यूँ साध लेना

मासूम बच्चा सा

मोहपाश सच्चा सा

डालकर यूँ बाँध लेना

सीखो तो सही

यह प्रेम की भाषा

दूर करेगी सारी निराशा

बोलो तो सही

बसता है ईश्वर

सबके भीतर बनकर

चेतना, दया और करुणा

जगाओ तो सही

 

फिर तो मनुष्य

बुरा कैसे रह जाएगा

सारा मालिन्य

इस अनुपम उजियारे में

झट से बह जाएगा

 

यह वाद वह आन्दोलन

यह भाषण वह सम्मेलन

अपने पूर्वाग्रह गठरी में बाँधकर

धर दो आले पर

मन की गाँठ खोलकर

चोट करो ताले पर

पहले घर से शुरू करो

कर डालो रिहर्सल

रियाज में ही राह दिखेगी

जिन्दा बनो हर पल

अन्धेरे को चीरकर

बन्द दिमागों से टकराएगी

आशा की उजली किरण

चहुँ ओर छा जाएगी।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

खाकी में भी इन्सान बसते हैं और कम्प्यूटर में…!?!

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पिछले रविवार की सुबह बड़ी मायूसी के साथ शुरू हुई थी। शनिवार तक कम्प्यूटर में वायरस का प्रकोप इतना बढ़ चुका था कि उसे अस्पताल ले जाना पड़ा था। डॉक्टर (इन्जीनियर?) ने कहा कि इसे भर्ती करना पड़ेगा। पूरा चेक-अप होगा। तंत्रिका तंत्र में इन्फ़ेक्शन पाये जाने पर पूरी सफाई करनी पड़ेगी। सारा खून बदलना पड़ सकता है। सब का सब पुराना डेटा उड़ जाएगा। मैं तो घबरा ही गया।

वागीशा और सत्यार्थ की पैदाइश से लेकर अबतक खींची गयी सैकड़ों तस्वीरें, मोबाइल, हैण्डीकैम और सोनी डिजिटल से तैयार अनेक यादगार वीडिओ फुटेज, दोस्तों यारों और रिश्तेदारों की शादियों और मेल-मुलाकातों की याद दिलाती तस्वीरें। हिन्दुस्तानी एकेडेमी में आयोजित कार्यक्रमों की चित्रावलियाँ और इलाहाबाद ब्लॉगर सम्मेलन की अविस्मरणीय झाँकी दिखाते मनभावन स्लाइड शो। इसके अतिरिक्त बेटी और मेरे हाथ की ‘पेण्ट’ पर बनायी अनेक कलाकृतियाँ और सबसे बढ़कर मेरे द्वारा लिखे गये एक-एक शब्द का मूल पाठ जो ‘माई डॉक्यूमेण्ट’ फोल्डर में सेव था वह सब उड़ जाएगा।

डीलर ने कहा कि हम किसी का डेटा बचाने का जिम्मा नहीं लेते। आप चाहें तो इसे कहीं कॉपी कर लें। चार जीबी का पेन ड्राइव, दो जीवी का सोनी कैमरा, चार-छः जीबी की डीवीडी आदि जोड़कर भी करीब चालीस जीबी डेटा को सुरक्षित नहीं कर पा रहे थे। इलाहाबाद जैसे शहर में लगभग मोनोपॅली बनाकर रखने वाले एच.पी. के डीलर साहब मुझे टहला रहे थे कि इतना बड़ा डेटा बचाने का उसके पास कोई उपाय नहीं है। वारण्टी के चक्कर में किसी दूसरे जानकार से मशीन खुलवायी भी नहीं जा सकती थी।

…यानि यदि मुझे आगे इस कम्प्यूटर पर काम करना है तो मोह त्याग कर इसकी फॉर्मैटिंग करानी होगी। बड़े जतन से सजोयी गयी उस मुस्कान को अलविदा कहना होगा जो एक महीने के सत्यार्थ के चेहरे पर तब खिल उठती थी जब उसने पहली बार मुझे पहचानना शुरू किया था और मैंने उस नैसर्गिक सुख के लोभ में जैसे-तैसे सीटी बजाना सीख लिया था। उसका पहली बार ‘माँ’ बोलना, पहली बार करवट बदलना, पहली बार सरकना, पहली बार बँकइयाँ चलना, पहली बार खड़ा होना, फिर डग भरना, पहली बार अन्न ग्रहण करना और न जाने क्या-क्या अब केवल यादों में रह जाएगा। बेटी के गाए तोतले गाने, उसका पहला स्कूली बस्ता, लाल रिबन की पहली चोटी, पहला स्कूली ड्रेस, दोनो का साथ-साथ खेलना, लड़ना, झगड़ना, सबकुछ अब वापस तो नहीं आएगा न। ऑफिस के बुजुर्ग पेंशनर्स तो अगले साल फिर आ जाएंगे लेकिन हिरमतिया की माँ जो मर गयी अब कैसे आएगी?

इसी दुश्चिन्ता में जब रविवार की सुबह आँख खुली तो मन भारी था। तकनीकी ज्ञान का अभाव मुझे साल रहा था। निःशुल्क वायरस रोधी सॉफ़्टवेयर के फेर में पड़कर मैने बहुत कीमती सामग्री को संकट में डाल दिया था। रविवार को सिविल लाइन्स बन्द होने के कारण उसदिन कुछ हो भी नहीं सकता था इसलिए खालीपन के एहसास के साथ बाजार और वायरस को कोसता हुआ देर तक बिस्तर पर पड़ा रहा। करीब नौ बजे श्रीमती जी ने याद दिलाया कि मेज पर एक आमन्त्रण-पत्र पड़ा है जो किसी पुस्तक पर चर्चा से सम्बन्धित है।

“आप वहाँ जाएंगे क्या?” प्रश्न ऐसे किया गया जैसे मेरे वहाँ न जाने पर ज्यादा खुशी होती। लेकिन मैं…

“अरे वाह!” मुझे तो जैसे तिनके का सहारा मिल गया। अब रविवार अच्छा कट जाएगा। अच्छा क्या, जबर्दस्त बात हो गयी साहब…।

हुआ यूँ कि के.पी.कम्यूनिटी सेन्टर में जो कार्यक्रम आयोजित था उसके मुख्य अतिथि थे- विभूति नारायण राय जी, जिनके सौजन्य से हमने हिन्दी चिट्ठाकारी की दुनिया पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हाल ही में सम्पन्न कराया था। इलाहाबाद के डी.आई.जी. जो अब जिले के पुलिस कप्तान होते हैं, चन्द्रप्रकाश जी ने अपने एक मित्र और आई.पी.एस.बैचमेट अशोक कुमार जी की हाल ही में प्रकाशित पुस्तक पर भव्य परिचर्चा का आयोजन किया था। उत्तर प्रदेश पुलिस मुख्यालय, इलाहाबाद के अपर पुलिस महानिदेशक एस.पी. श्रीवास्तव जी भी, जो स्वयं एक कवि, शौकिया फोटोग्राफर और ब्लॉगर हैं इस गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे थे। भारत सरकार की ओर से इलाहाबाद में स्थापित उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र के निदेशक आनन्दबर्द्धन शुक्ल जी भी एक आई.पी.एस. अधिकारी रह चुके हैं। वे इस मंच को विशिष्ट अतिथि के रूप में सुशोभित कर रहे थे।

खाकी में इन्सान पर (पुलिस) परिवर्चा

एक मंच पर पाँच-पाँच आई.पी.एस. इकट्ठा होकर यदि हिन्दी की एक पुस्तक पर परिचर्चा कर रहे हों तो सोचिए नजारा कैसा रहा होगा। मजे की बात यह रही कि उस बहुत बड़े हाल में आमन्त्रित साहित्यप्रेमियों की संख्या से कहीं अधिक पुलिस के जवान दिखायी दे रहे थे। लेकिन वर्दी में नहीं, सादे कपड़ों में। पीछे की आधी सीटें तो प्रशिक्षु रंगरूटों से भर गयी थीं। आगे की सीटों पर शहर के प्रतिष्ठित आमजन, व्यापार मंडल के प्रतिनिधि, अधिकारी वर्ग और मीडिया आदि के लोग जमे हुए थे। लेकिन जब चर्चा शुरू हुई तो मुझे लगने लगा कि आज छुट्टी बेकार नहीं गयी है। पुलिस विभाग में होकर भी बेहद संवेदनशील बने रहकर लोकहित के बारे में सोचने वाले एक ऐसे अधिकारी से साक्षात्कार हो रहा था जिसने बीस साल तक पुलिस महकमें में उच्च पदों पर सेवा देने के बाद अपने अनुभवों को बिना किसी लाग-लपेट के दूसरों से बाँटने का उद्यम कर रहा था।

लेखकीय - अशोक कुमार IPS ऐसे में मेरे भीतर का ब्लॉगर खड़ा हो गया। झटपट मोबाइल कैमरे से तस्वीरें ले डाली और पुस्तक के लेखक को ब्लॉग लिखने की मुफ़्त सलाह दे डाली। वे बोले, “सिद्धार्थ जी, आप मेरा ब्लॉग तैयार कर दीजिए, इसपर जो कॉस्ट आती होगी वह मैं तुरन्त दे दूंगा।” मैने जब यह बताया कि ‘यहाँ सबकुछ मुफ़्त में उपलब्ध है’ तो वे खुश हो गये। तुरन्त लान्च करने की बात करने लगे। अब मैंने संकोचवश बताया कि मेरा कम्प्यूटर घर पर है ही नहीं। आपका काम थोड़ा समय ले सकता है। …लेकिन ब्लॉगरी के प्रसार की गुन्जाइश हो तो किसी ब्लॉगर को प्रतीक्षा करने में चैन कहाँ। हिन्दुस्तानी एकेडेमी का ताला खोलवाया, ब्लॉग बना और इस हिन्दी परिवार में एक चमकीले सितारे का अभ्युदय हो गया। आप यह पूरी पोस्ट पढ़ने के बाद वहाँ जाइए  और सराहिए खाकी में इन्सान को।

इसी में यह बता दूँ कि आदरणीय आलसी गिरिजेश राव जी ने मेरी कम्प्यूटरी समस्या का समाधान फोन पर ही कर दिया। बोले, एक पोर्टेबल हार्ड डिस्क में सारा डेटा आसानी से आ जाएगा जो १६०, २५०, ३२० जी.बी. या उससे अधिक क्षमता की भी होती है। मैने डीलर से फोन पर कहा तो उन्होंने कहा कि आप इसपर तीन हजार खर्च करने को तैयार हों तो मुझे कोई ‘प्रॉब्लेम’ नहीं है। मरता क्या न करता। मैने हामी भर दी। जब दुकान पर पहुँचा तो उनके इन्जीनियर ने अपनी पुरानी डिस्क में डेटा कॉपी करके फॉर्मेटिंग शुरू कर दी क्यों कि नई डिस्क वे मंगा नहीं पाये थे।  यानि समस्या केवल मेरे अज्ञान के कारण घनीभूत हुई थी। अन्ततः भारी खर्चे की आशंका से ग्रस्त श्रीमती जी को जब मैने बताया कि मुझे केवल पाँच सौ खर्चने पड़े तो उनके चेहरे पर वही मुस्कान फिर लौट आयी थी जो सुबह विलुप्त हो गयी थी। हाँलाकि कम्प्यूटर को अगले दिन दुबारा अस्पताल जाना पड़ा क्योंकि कोई वायरस छिपा रह गया था। फिलहाल विस्टा स्टार्टर हटाकर वापस एक्सपी डलवा लेने के बाद शायद मामला ठीक हो गया है।

एक अच्छी खबर और है- वी.एन.राय साहब ने अनौपचारिक बात चीत में इलाहाबाद के ब्लॉगर सम्मेलन के बाद का हाल-चाल पूछा। जब मैने सच-सच हाल बयान कर दिया तो खुश होकर बोले कि हिन्दी चिठ्ठाकारी की दुनिया पर विचार-विमर्श के लिए वर्धा विश्वविद्यालय प्रति वर्ष एक वृहद राष्ट्रीय सेमीनार का आयोजन करेगा जो विश्वविद्यालय के रमणीक प्रांगण में अक्टूबर-नवम्बर महीने में सम्पन्न हुआ करेगा। नामवर सिंह जी के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ने वालों की असुविधा का हमें खेद है, लेकिन जबतक वे वहाँ के कुलाधिपति बने रहेंगे तबतक हम उन्हें उद्‍घाटन के लिए बुलाकर सम्मानित करते रहेंगे। अलबत्ता यदि इस पुनीत कार्य के लिए महामहिम राष्ट्रपति हामी भर दें तो बात दीगर हो जाएगी।

आगे-आगे देखिए होता है क्या…!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

छः दिसम्बर का वार्षिक रुदन और मुकाबला बेशर्मी का…

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अयोध्या का एक अर्थ ‘जहाँ युद्ध न हो’ पढ़ा था। लेकिन जब भी छः दिसम्बर की तारीख आती है मीडिया में तलवारें निकल आती हैं। उस त्रासद घटना का विश्लेषण करने के लिए बड़े-बड़े विद्वान, विचारक और राजनेता पत्रकारों द्वारा बुला लिए जाते हैं और टीवी पर पैनेल चर्चा शुरू हो जाती है। हर साल वही बातें दुहरायी जाती हैं। भाजपा, कांग्रेस, व समाजवादी पार्टी के नेता आते हैं और अपनी पार्टी लाइन के अनुसार बातें करके चले जाते हैं। कोई अपनी पाटी लाइन से टस से मस नहीं होना चाहता। उनके सभी तर्क एक दूसरे के लिए बेमानी हो जाते हैं।

लेकिन आश्चर्य होता है जब लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में अपनी पीठ ठोंकने वाले ‘ऐंकर’ भी एक खास विचारधारा के पोषण के लिए हमलावर हो उठते हैं। जिस प्रतिभागी की बातें इनसे मेल नहीं खाती उसको टोक-टोककर बोलने ही नहीं देते, केवल आरोपित करते जाते हैं लेकिन जो पार्टी लाइन इन्हे अपने अनुकूल लगती है उसके प्रतिनिधि को अपनी बात रखने के लिए प्रॉम्प्ट करते रहते हैं। यह सब इतनी निर्लज्जता और आक्रामक अन्दाज में होता है कि देखकर इस पत्रकार बिरादरी से भी अरुचि होने लगी है।

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छः दिसम्बर की पूर्व संध्या पर एन.डी.टी.वी. के कार्यक्रम ‘मुकाबला’ और ‘चक्रव्यूह’ में यही सब देखने को मिला। लोकप्रिय कार्यक्रम मुकाबला के ऐंकर दिबांग ने भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर से प्रश्न तो खूब किए लेकिन उनका उत्तर सुनने का धैर्य उनके पास नही था। वहीं समाजवादी पार्टी के मोहन सिंह को तफ़सील से यह बताने का अवसर दिया कि ‘भारत में भले ही हिन्दुओं की अक्सरियत है लेकिन यदि देश ‘डिस्टर्ब’ हुआ तो सबसे ज्यादा नुकसान हिन्दुओं का ही होगा। इसलिए हमें ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए जिससे देश में मुसलमानों को तकलीफ़ हो और माहौल खराब हो जाय।’ यह भी कि बाबरी मस्जिद की साजिश घटित होने के बाद जो मुम्बई में और अन्य स्थानों पर आतंकी हमले हुए उसके दोषियों को सजा हो गयी। फाँसी और आजीवन कारावास मिल गया। लेकिन बाबरी मस्जिद के गुनाहगारों को आजतक सजा नहीं दी जा सकी। उनके इस कष्ट को दिबांग ने भी भरपूर समर्थन देते हुए सुर में सुर मिलाया।

कांग्रेस के प्रतिनिधि श्रीप्रकाश जायसवाल वीडियोलाइन पर थे। उनसे दिबांग ने कहा कि आप प्रकाश जावड़ेकर से पूछिए कि वे मस्जिद गिराये जाने के गुनहगार हैं कि नहीं। इसपर जायसवाल को प्रश्न नहीं सूझा। बोले- हम क्या पूछें, दुनिया जानती है इनकी करतूतें। प्रकाश जावड़ेकर ने कहा- मेरे पास प्रश्न हैं उसका उत्तर आप लोग दीजिए… ६ दिसम्बर १९९२ क्या अचानक चला आया था? १९४८ में रामलला की मूर्तियों की स्थापना किसने करायी…१९८६ में जो ताला खोला गया था वह मन्दिर का था कि मस्जिद का, …१९८९ में शिलान्यास मन्दिर का हुआ था कि मस्जिद का …इन सारे कार्यों के समय किसकी सरकार थी?  प्रश्न और भी रहे होंगे लेकिन दिबांग ने हाथ उठाकर उन्हें बिल्कुल चुप करा दिया और किसी प्रतिभागी से उन सवालों का जवाब देने को भी नहीं कहा।

बात उस ‘साजिश’ पर होने लगी जो ‘संघियों ने मस्जिद को गिराने के लिए’ रची थी। कांग्रेस, सपा और दिबांग चिल्ला चिल्लाकर इसे एक साजिश करार दे रहे थे । कल्याण ने शपथपत्र देकर आश्वस्त किया था कि मस्जिद सुरक्षित रहेगी, लेकिन उन्होंने साजिश रचकर मस्जिद ढहा दी। पूरा ‘संघ परिवार’ इस झूठ-फरेब की साजिश में शामिल था। श्रीप्रकाश जायसवाल ने कहा कि मुख्यमन्त्री के शपथपत्र पर यकीन करना हमारा कर्तव्य था। भाजपा इसे लाखों श्रद्धालुओं की स्वतःस्फूर्त भावना का प्रस्फुटन बता रही थी। उमा भारती भी वीडियोलाइन पर अवतरित हुईं और साजिश की थियरी को सिरे से नकारते हुए बोलीं कि गान्धी जी कहते थे कि पाकिस्तान मेरी लाश पर बनेगा। लेकिन वे जिन्दा रहे और पाकिस्तान बन गया। इसका मतलब यह तो नहीं कि वे पाकिस्तान बनाने की साजिश कर रहे थे।

पैनेल में एक पूर्व केबिनेट सचिव सुब्रमण्यम साहब भी थे। लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट को उन्होंने लगभग कूड़ा ही बता डाला। बल्कि जाँच आयोग अधिनियम में संशोधन करके केवल कार्यरत न्यायाधीशों का ही आयोग गठित करने का सुझाव दे दिया। उनका आशय शायद यह था कि सेवा निवृत्त न्यायाधीश समय और सुविधा बढ़वाने के जुगाड़ में ही उलझे रह जाते हैं। काम की रफ़्तार धीमी और त्वरित न्याय की आशा क्षीण हो जाती है। समस्या की जड़ में उन्होंने राजनीति को ही माना। यदि राजनीति इससे किनारे होती तो समाधान निकल सकता था।

उधर चक्रव्यूह में कल्याण सिंह घेरे जा रहे थे। ऐंकर ने पूछा- आपको छः दिसम्बर की उस दुर्घटना पर कोई अफ़सोस है? कोई शर्म नहीं… कोई पश्चाताप नहीं… कोई दुःख नहीं… बल्कि हमें इस दिन पर गर्व है। …मैने शपथपत्र दिया था कि ढाँचे की रक्षा करेंगे, पूरा इन्तजाम भी कर रखा था, लेकिन मैंने कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश नहीं दिया। मुझे इसपर कोई खेद नहीं है। मैं रक्षा नहीं कर सका इसलिए तत्काल इस्तीफा दे दिया। …मैं और क्या कर सकता था?  प्रश्नकर्ता ने कहा आपने दो चार सौ लोगों की जान बचाने के लिए करोड़ों हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच बँटवारा हो जाने दिया। गोली चल जाती तो अधिक से अधिक कुछ सौ जानें ही जातीं लेकिन आपने मस्जिद ढहाकर करोड़ों नागरिकों में कटुता फैला दी… घेरा बन्दी और तेज हुई तो कल्याण बस ‘बहुत धन्यवाद’ ‘बहुत धन्यवाद‘ ’बहुत धन्यवाद’ की रट लगाने को मजबूर गये। बेशर्मी मूर्तिमान थी… शायद दोनो ओर।

सोचता हूँ यह वार्षिक रुदन और प्रलाप तो अब रूटीन हो गया है। जिन्दगी उससे काफी आगे निकल चुकी है। पिछले साल इस दिन मैं बड़ा दुःखी हो गया था। मुम्बई हमले के बाद के माहौल में जब अयोध्या काण्ड की बरसी पड़ी तो उसी तारीख को पड़ने वाले अपने बेटे के जन्मदिन पर उत्सव मनाने का मन ही नहीं हुआ। लेकिन अब सोच रहा हूँ कि अपनी छोटी-छोटी खुशियों को इस राजनिति के गन्दे खेल को देखकर कुर्बान करना ठीक नहीं है। इसलिए मैंने आज बेटे को पूरा समय देने का मन बनाया है।

साँई मन्दिर के बाहर

सुबह-सुबह साँईं मन्दिर हो आये हैं। शाम को केक भी कटेगा और बच्चा पार्टी दावत भी उड़ाएगी।

सत्यार्थ (तीन वर्ष)

सत्यार्थ के ब्लॉग पर जन्मदिन की सूचना ब्लॉगजगत को दी जा चुकी है। आप सबका स्नेह और आशीर्वाद उसे मिलने भी लगा है। मैं भी बोलता हूँ “हैप्पी बड्डे”

 (सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

एक वी.आई.पी. शादी जयपुर में…।

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विकास परिणय प्रीति आजकल शादियों का मौसम चल रहा है। ज्योतिषियों ने बता दिया कि शादी के लायक शुभ मुहूर्त की तिथियाँ गिनती की ही हैं। इसका नतीजा यह हुआ कि एक ही तिथि में अनेक शादियों के निमन्त्रण मिल जा रहे हैं। अकेले सबको निभा पाना कठिन हो गया है। लेकिन कुछ खास शादियाँ ऐसी होती हैं जिनमें आप जाने को बाध्य होते हैं और कदाचित्‌ स्वयम उत्सुक भी। ऐसी ही एक असाधारण शादी का न्यौता मुझे मिला और मैने दिल्ली से जयपुर जाने वाली बारात में शामिल होने का कार्यक्रम बना लिया। इलाहाबाद से दिल्ली के लिए प्रयागराज एक्सप्रेस और जयपुर से वापस इलाहाबाद के लिए ज़ियारत एक्सप्रेस में आरक्षण महीना भर पहले ही कराया जा चुका था।

शादी तमिलनाडु कैडर के एक आई.पी.एस. अधिकारी की थी जो राजस्थान कैडर की अपनी बैचमेट से ही शादी कर रहा था। यह दूल्हा मेरा साला था इसलिए बारात में मेरी पोजीशन का अन्दाजा आप सहज ही लगा सकते हैं। लगातार जीजाजी… जीजाजी… सुनने का आनन्द ही (और खतरे भी) कुछ और है।:)

बस में बाराती बारात दिल्ली से जयपुर एक बस से जाने वाली थी। मुझे आगे की सीट मिली। बस में दूल्हे के माता-पिता, बड़े भाई, बहन, बहनोई, चार जोड़ी मौसी-मौसा, तीन जोड़ी मामा-मामी और इतने ही चाचा-चाची मौजूद थे। उन सबके बच्चे, बहुएं और दोस्त-मित्र मिलकर बस का माहौल पूरा बाराती बना रहे थे। अधिकांश बाराती मेरी ही तरह पूर्वी उत्तर प्रदेश के बस्ती, गोरखपुर, कुशीनगर, प्रतापगढ़, जौनपुर, सुल्तानपुर, बस्ती, और लखनऊ जैसे शहरों से रात भर ट्रेन की यात्रा करके पधारे थे। सभी अपने-अपने होटल से तैयार होकर प्रातः दस बजे के नियत समय पर बस में इकठ्ठे हो गये। लेकिन जो कुछेक बाराती स्थानीय दिल्ली के निवासी थे उन्होंने उम्मीद के मुताबिक तैयार होकर आने में पूरा समय लिया और बस दोपहर बाद डेढ़ बजे कूच कर सकी।

बस के चलते ही प्यास की पुकार सुनकर बिसलेरी की दो दर्जन बोतलें और बिस्किट वगैरह खरीदने के लिए बस रोकी गयी। फिर आगे बढ़े तो प्रायः सभी परिवारों के कैमरे निकल आये। महौल बारात के बजाय पिकनिक मनाने जैसा बन गया। मेरा सोनी का डिजिटल कैमरा ऐन वक्त पर बैटरी डिस्चार्ज्ड होने का सन्देश देकर बन्द हो गया। चलते समय चेक तो किया था लेकिन शायद कोई कसर रह गयी थी। खैर… मायूस होने का समय नहीं था, क्योंकि ‘जीजाजी’ अन्ताक्षरी खेलने के लिए बीच की सीटों पर बुला लिए गये। नयी उम्र के बच्चों और कुछ कम नयी उम्र की महिलाओं ने ऐसा शमां बाँधा कि हम केवल मूक श्रोता बने रह गये। कभी-कभार इस या उस टीम की गाड़ी फँस जाने पर अपने विद्यार्थी जीवन में याद रहे कुछ गाने सुझाते रहे और महिला बनाम पुरुष टीम की अन्ताक्षरी को  अनीर्णित समाप्त कराने में सफ़ल रहे।

करीब तीन बजे सबको ध्यान आया कि सुबह का हल्का नाश्ता तो बस के प्रस्थान करते समय ही नीचे उतर चुका था और अब बिस्किट-पानी भी लड़ाई हार चुके थे। योजना तो थी जयपुर पहुँचकर भोजन करने की; लेकिन पेट को क्या मालूम की जयपुर अभी काफ़ी दूर है। उसने तो ईंधन खत्म होने की नोटिस सर्व कर दी। फौरन मोबाइल बजने लगे। बस से करीब पन्द्रह मिनट आगे चल रहे दूल्हे मियाँ की टवेरा गाड़ी से सम्पर्क किया गया तो उन्होंने अपने दोस्तों के साथ एक काम लायक ढाबा खोज ही लिया। ‘परम पवित्र भोजनालय’ पर दूल्हे ने पन्द्रह मिनट के भीतर पीछे से आ रही बारात के लिए खाना तैयार करने का फरमान जारी कर दिया था।

दूल्हे के साथ ब्लॉगर

बारात को खिलाना कोई हँसी-खेल तो है नहीं…। लेकिन नये नवेले पुलिस अफ़सर दूल्हे की बात में शायद कोई विशेष प्रभाव रहा हो कि ढाबे पर जब हमारी बस पहुँची तो टेबल सज चुकी थी। सबने प्लेटें भरीं और पनीर, राज़मा, आलू-गोभी, चना-छोला की रसदार सब्जियों और अरहर की तड़का दाल के साथ गर्मागरम रोटियों की धीमी खेप पर हल्ला बोल दिया। अच्छी भूख पर जब गरम और स्वादिष्ट भोजन का जुगाड़ हो गया तो उससे मिलने वाली तृप्ति के क्या कहने…। एक घण्टे में सभी मीठी सौंफ़ फाँकते डकारते हुए बस में सवार हो गये।

इसके बाद जयपुर पहुँचने में आठ बज गये। जहाँ बारात को ठहरना था उस स्थान का लोकेशन किसी को पता नहीं था। कन्या पक्ष को मोबाइल पर बताया गया। एक गाड़ी रास्ता बताने आ पहुँची। लेकिन शायद अन्जान जगह पर समूह की बुद्धि लड़खड़ा जाती है। यहाँ भी उहापोह में करीब एक घण्टा खराब हो गया। ‘होटेल मोज़ैक’ में पहुँचकर हमने अपने आप को धन्य मान लिया। वहाँ की व्यवस्था देखकर ही हमारी आधी थकान जाती रही। एक शानदार कमरे की चाभी काउन्टर से लेकर हम लिफ़्ट से कमरे तक आये। बिस्तर पर बैठते ही उसमें धँसने का एहसास हुआ। फिर सम्हालकर लेट गये। सामने टीवी पर रिमोट चलाया तो भारत-श्रीलंका के बीच हो रहे कानपुर टेस्ट के तीसरे दिन के खेल की झलकियाँ आ रही थीं। इसे देखकर तो खुशी से बल्लियों उछल पड़े। फ़ॉलोऑन के बाद टाइगर्स के दूसरी पारी में भी ५७ रन पर चार विकेट गिर चुके थे। अविश्वसनीय सा लगा।

इसी बीच कमरे में रखे फोन की घण्टी बजी। रिसीवर उठाया तो होटेल स्टाफ़ ने बताया कि नीचे चाय-नाश्ते की टेबल पर प्रतीक्षा की जा रही है। वाह… इन्हें कैसे पता चला कि हमें अभी-अभी चाय की तलब लगी है…? बेसमेन्ट में जाकर नाश्ता करने के बाद ही तैयार होने का निर्णय लिया गया और हमने फौरन लिफ़्ट में घुसकर ‘-1’ दबा दिया। हाल में लगे अनेक किस्म के आइटमों का जोरदार नाश्ता देखकर हम सहम गये और डिनर का अनुमान लगाते ही परेशान से हो लिये। कितनी तो वेरायटी थी। सबका नाम तो अबतक नहीं जान पाया।बारात की प्रतीक्षा में बैण्ड पार्टी

नाश्ते के बाद कमरे में आकर बाथरूम की ओर गये। वहाँ की फिटिंग्स को देखकर उन्हें छूने में सहम से गये। पता नहीं क्या छूने से कहाँ पानी निकल पड़े। आखिर जब सही बटन दबाने पर हल्का गुनगुना पानी बरामद हो गया तो फौरन नहा लेने का मन बन गया। दूधिया सफेदी में चमकता संगमरमर का बाथटब नहाने के लिए आमन्त्रित कर रहा था। करीब आधा दर्जन छोटे-बड़े तौलियों और इतने ही प्रकार के साबुन, क्रीम शैम्पू वगैरह से सुसज्जित स्नानघर में अधिकाधिक समय बिताने का लोभ हो रहा था लेकिन आये तो थे हम बारात करने। इसलिए जल्दी से नहाकर बाहर हो लिए और नये कपड़े में सजधजकर नीचे इन्तजार कर रहे रिश्तेदारों के बीच पहुँच गये।

बाराती नृत्य दूल्हा भी नाच उठा

इस समय तक मेरे भीतर का ब्लॉगर जाग चुका था और डिजिटल कैमरे की बैटरी डिस्चार्ज होने पर मायूस होने लगा था। गनीमत यह थी कि मोबाइल का कैमरा काम कर रहा था जिससे इस बारात में आगे चलकर कुछ शानदार तस्वीरें खींची जा सकीं।

उस समय बारात में  दूल्हे (एम.बी.बी.एस./ आई.पी.एस.) के साथी जिनमें अधिकांश डॉक्टर थे और कुछ नव चयनित अधिकारी थे, बैंड वालों से कुछ चुनिन्दा गीतों की सूची डिस्कस कर रहे थे। महिलाएं अपने साज-श्रृंगार को पूरा करने के बाद बाहर आ गयी थीं लेकिन अभी भी एक दूसरे से पूछकर अन्तिम रूप से आश्वस्त होने की प्रक्रिया में जुटी हुई थीं। दूल्हे की गाड़ी किसी कन्फ़्यूजन में सज नहीं पायी थी लेकिन उस ओर किसी का खास ध्यान नहीं था। सभी अपनी सजावट के सर्वोत्तम रूप को पा लेने का यत्न कर रहे थे। दुल्हा तो राजकुमार जैसा दिख ही रहा था। रात के साढे दस बजे तक बारात पूरी तरह सज नहीं पायी थी। फिर पता चला कि बैण्ड वालों के जाने का समय नजदीक आ रहा है। बस क्या था… लाइट, कैमरा, साउण्ड…

प्रकाश पुंज श्रृंखला

दूल्हे के दोस्त और नजदीकी रिश्तेदार बैण्ड पर झूमने लगे। आतिशबाज अपना काम करने लगे। आज मेरे यार की शादी है… ये देश है बीर जवानों का… नानानानानारे… नारे… नारे…. धमक धमक की आवाज और भांगड़े की धुन की थाप पर धीरे-धीरे सबके पैरों में हरकत आ गयी। थोड़ी देर में ही महिलाओं ने भी मोर्चा सम्हाल लिया। सर्वत्र खुशी और उत्साह से फूटती हँसी और खिलखिलाहट बैण्ड और ताशे की ऊँची ध्वनि में विलीन होती रही, और कैमरों की फ्लैश लाइटें आतिशबाजी के ऊँचे स्फुलिंग की रोशनी में नहाती रहीं। मानो इतना प्रकाश भी कम पड़ जाता इसलिए दर्जनों बल्बों से सज्जित ज्योति कलश भी प्रदीप्त होकर कतारबद्ध चल रहे थे। तभी इस ब्लॉगर की खोजी निगाह इन प्रकाशपुंजों के नीचे चली गयी। धक्‌ से मुहावरा कौंधा- “दीपक तले अंधेरा”

 ज्योति-बाला २
ज्योति-बाला ३
ज्योति-बाला ४
ज्योति-बाला ५
ज्योति-पुंज धारी १
ज्योति पुंज धारी
ज्योति-बाला-१

इन रोशनी के स्तम्भों को अपने सिर, कन्धे और कमर पर थामे हाथ जिन लड़कियों और औरतों के थे उनके चेहरे पर शादी जैसा कोई माहौल ही नहीं था। उनकी आँखें जैसे शून्य में निहार रही थीं। किसी से निगाह मिलाना तो जैसे उन्होंने सीखा ही नहीं था। जिस बारात में शामिल सभी लोग अपना सर्वोत्तम प्रदर्शित करने को आतुर थे उसकी शोभा के लिए रोशनी ढोने वाली ये गरीब मजदूरनें तो बस बीस-पच्चीस रूपये की कमाई के लिए ही इस बारात में शामिल थीं। नंगे या टूटी हवाई चप्पलों वाले  धूल बटोरते पैर, मैली-कुचैली वेश-भूषा, और उलझे हुए धूलधूसरित बालों में खोये हुए ये मलिन चेहरे देखकर मेरा मन कुछ समय के लिए विचलित हो गया। आगे-आगे चलने वाले बैण्ड के सदस्यों को तो फिर भी एक यूनीफॉर्म मिला हुआ है। नाचते-गाते बारातियों द्वारा लुटाये जा रहे नोटों को बटोरने का सुभीता भी इन्हीं को है, लेकिन ये राह रौशन करती बालाएं तो पहलू बदल-बदलकर बारात के विवाह मण्डप तक जल्दी पहुँच जाने की कामना में ही रुक-रुक कर चल रही हैं।

अब आगे का वर्णन ये तस्वीरें ही करेंगी। मैं तो चला अब राजस्थानी अगवानी की रीति देखने जो मेरे लिए बिल्कुल नयी थी।

पारम्परिक स्वागत

जिस परिसर में विवाह मण्डप बना था उसके मुख्य प्रवेश पर बने तोरण द्वार पर लाल फीता बँधा था। उसके उस ओर दुल्हन की सहेलियाँ स्वागत के लिए खड़ी थीं। एक सहेली या दुल्हन की छोटी बहन ने सिर पर कलश ले रखा था। दोस्तों के कन्धे पर चढ़कर आये दूल्हे को दुल्हन की भाभी ने तिलक लगाया, दूल्हे ने फीता काटा और सभी नाचते गाते भीतर प्रवेश कर गये। इस प्रक्रिया में कुछ रूपयों का आदान-प्रदान भी हुआ।

भव्य मन्च

भीतर विशाल प्रांगण में एक भव्य मंच सजा था। वैदिक मन्त्रोच्चार के साथ वेदिका पर तिलक चढ़वाने के बाद दूल्हे ने दूल्हन के साथ मंच पर आसन ग्रहण किया। दूल्हे के दोस्तों और दुल्हन की सहेलियों के बीच कुछ मीठी तकरार के बाद दुल्हन ने ऊँचा उठा दिये गये दूल्हे के गले में उछालकर जयमाला डाल दी। दूल्हा नीचे उतरा और दुल्हन को जयमाल डालकर उसे जीवनसंगिनी बना लिया।

जयमाल सम्पन्न

इस अनुपम सौन्दर्य से विभूषित वैवाहिक कार्यक्रम में इस विन्दु तक शामिल होने के बाद मुझे अपनी अगली यात्रा का ध्यान आया। जयपुर से सीधे इलाहाबाद लौटने के लिए जियारत एक्सप्रेस का समय (२:१५ रात्रि) नजदीक था। मैने सबसे विदा ली और चलते-चलते उस परिसर में स्थापित इस प्रतिमा की तस्वीर लेकर स्टेशन की ओर चल पड़ा।

नयनाभिराम

कौन कहता है कि राजनीति का पतन हो रहा है…?

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दस साल पहले संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के साक्षात्कार में एक सदस्य ने मुझसे पूछा था कि भारत के राजनेताओं और पश्चिमी देशों के राजनेताओं में मौलिक अन्तर क्या है? मेरे बायोडेटा में शायद यह देखकर कि मैं पत्रकारिता का विद्यार्थी रह चुका हूँ उन्होंने मुझसे यह मुश्किल सवाल पूछ दिया था। तब सरकारी सेवा में दो साल तक रह लेने के बाद मुझे नेता नामक जीव के बारे में जो अनुभव हुआ था उसके आधार पर मैने कुछ स्पष्ट टिप्पणी न करना ही उचित समझा। अकस्मात् मुझे कोई सटीक अन्तर सूझ भी नहीं रहा था।

…फिर उन्होंने ही बताया कि भारत में राजनीति पेशेवर नहीं है। इसमें एक खास पारिवारिक पृष्ठभूमि के लोग ही आगे बढ़ पाते हैं। भकुआकर मैं उनकी बात सुनता रहा… कह रहे थे कि यदि आप किसी दूसरे पेशे में लगे हुए हैं तो  आप नेता नहीं हो सकते और यदि आप नेता हैं तो किसी दूसरे पेशे में नहीं जा सकते। लेकिन पश्चिमी लोकतन्त्रों में आप किसी भी पेशे में रहते हुए चुनाव लड़ सकते हैं, जीत सकते हैं, मन्त्री बन सकते हैं और फिर वापस अपने काम पर लौट सकते हैं।

मुझे उनकी बातें तब बिल्कुल ‘हट के’ लगी थीं लेकिन बाद में जब मैने इस पर विचार किया तो उनकी बात ठीक ही लगी। यहाँ आप अच्छे डॉक्टर, वकील, शिक्षक, इन्जीनियर, मैनेजर, प्रशासक, कलाकार, फौजी, नर्तक, चित्रकार, वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री  आदि हैं तो अच्छी नेतागीरी नहीं कर सकते। सरकारी नौकरी करने वाले तो बाकायदा इस काम से प्रतिबन्धित हैं। यहाँ जो नेता है वह सिर्फ नेता ही है। वह चुनाव लड़ने-लड़वाने, जीतने-हारने, और विधायक, सांसद और मन्त्री बनने या न बन पाने   के अलावा कुछ नहीं कर सकता। अनेक परिवार पूरी तरह इस राजनीति कर्म को ही समर्पित हैं।

मुझे यह सोचकर मन ही मन कोफ़्त सी होने लगी थी कि एक स्वतंत्र पेशा  के रूप में राजनीति का  कैरियर चुनने का विकल्प सबके पास मौजूद नहीं है। अपनी निजी प्रतिभा, अभिरुचि और परिश्रम से अन्य सभी व्यवसाय अपनाए जा सकते हैं लेकिन किसी व्यक्ति में इन गुणों की प्रचुरता के बावजूद राजनीति के क्षेत्र में सफलता की गारण्टी नहीं है।  देश में कितनी प्रतिभाएं भरी पड़ी हैं लेकिन राजनीति के क्षेत्र में वही लोग पीढ़ी दर पीढ़ी चलते आ रहे हैं। टाइम्स ऑफ़ इण्डिया का लीड इण्डिया कैम्पेन भी शायद इसी सोच के आधार पर शुरू किया गया था लेकिन अपेक्षित बदलाव दिखायी नहीं दिये।

लेकिन जरा ठहरिए…  पिछले दस बारह साल में राजनीतिक पटल पर जो कुछ घटित हुआ है उसे देखकर आप क्या कहेंगे? अपने देश में एक उच्च कोटि का वैज्ञानिक राष्ट्रपति बना और प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री प्रधानमन्त्री बन गया। विडम्बना देखिए कि यह सब तभी सम्भव हुआ जब इस प्रकार का निर्णय किसी खानदानी राजनैतिक परिवार द्वारा लि्या गया। इन विभूतियों ने अपने जीवन के उद्देश्य तय करते समय कभी नहीं सोचा होगा कि उन्हें राजनैतिक सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचना है। न ही इन्होंने इस दिशा में कोई स्वतन्त्र प्रयास किया होगा। वस्तुतः इनका राजनीति में आना और टिके रहना इनके असली आका के प्रसादपर्यन्त ही सम्भव हुआ। कलाम साहब को जब पूरा देश चाहता था तब भी वो हटा दिये गये थे। इसलिए इन दो उदाहरणों को अपवाद ही माना जाना चाहिए।

ये सारी बातें आज मेरे मन में आने की एक खास वजह है। मेरी मुलाकात एक ऐसे दुर्लभ प्राचीन कालीन नेता जी से हुई जो उत्तर प्रदेश में विधायक रह चुके हैं। उत्तर प्रदेश राज्य की विधान सभा के माननीय सदस्य जो अत्यन्त गरीब और बदहाल हैं…।

 

पूर्व विधायक श्री रामदेव जी

श्री रामदेव

पुत्र-रामनाथ

ग्राम-पुरा लच्छन

पोस्ट/तहसील-मेजा

कांगेसी बिधायक-मेजा

(१९७४-१९७७)

आजकल एक बार विधायक हो जाने का मतलब  आप सहज ही जान सकते हैं। मधु कोड़ा जी का उदाहरण तरोताजा है। कुल जमा चार पाँच सालों में आर्थिक विकास की जो गंगा उन्होंने बहायी है उसका वर्णन यहाँ करना जरूरी नहीं है। सभी कोड़ा साहब की तरह मधु ही मधु तो इकठ्ठा नहीं कर पाएंगे लेकिन किसी भी विधायक के लिए अब देखते-देखते करोड़ों जुटा लेना सामान्य बात हो गयी है। बड़ी सी चमचमाती गाड़ी में चार-चार बन्दूकधारियों के साथ घूमते, नौकरशाहों पर रोब गाँठते ये जनता के नुमाइन्दे जिस ओर निकल पड़ते हैं उस ओर तीमारदारों की लाइन लग जाती है। एक बार विधायकी का दाँव लग गया तो पूरी जिन्दगी के पौ-बारह हो जाते हैं। पीढ़ियाँ निहाल हो जाती हैं।

ऐसे में यदि आपको एक ऐसा पूर्व विधायक मिल जाय जिसको अपनी रोजी-रोटी के लिए खेत में मजदूरी करनी पड़ रही हो, तहसील में जाकर किसी वकील का बस्ता ढोना पड़ रहा हो और १०-२० रूपए लेकर दस्तावेज नवीसी करनी पड़ रही हो तो क्या कहेंगे? जी हाँ, इलाहाबाद की मेजा विधान सभा का प्रतिनिधित्व १९७४ से १९७६ तक करने वाले विधायक रामदेव जी आज भी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले भूमिहीन दलित परिवार के मुखिया हैं। उनके तीन बेटों को शिक्षा नसीब न हो सकी। खेतों में मेहनत मजदूरी करना और बैलों के साथ हल चलाना उनका जीविका का साधन है।

“आपने बच्चों को पढ़ाया नहीं…?”

“कहाँ साहब, हम गरीब आदमी ठहरे… बच्चों का पेट पालें कि स्कूल भेंजें…?”

बात बात में दोनो हाथ जोड़कर अपनी सरलता का परिचय देते  रामदेव जी ने जब अपनी राम कहानी बतायी तो मेरे मन में एक हूक सी उठने लगी। खुद भी मुश्किल से दर्जा पाँच पास कर सके थे। कांग्रेस पार्टी के जलसों में आया जाया करते थे। बहुगुणा जी ने हरिजन सुरक्षित सीट से टिकट दे दिया तो विधायक बन गये लेकिन अपने घर परिवार के लिए कोई संसाधन नहीं जुटा सके। लखनऊ की सत्ता की गलियों में पहुँच जाने के बावजूद बच्चों को गाँव के प्राइमरी स्कूल से आगे नहीं ले जा सके।

तीनो बेटों की कम उम्र में शादी कर दी। स्थानीय अनपढ़ समाज से बाहर कोई रिश्ता नहीं हुआ। बेटों ने खेतों में मजदूरी की और घर में बच्चे पैदा किए। तीनो के मिलाकर बारह लड़कियाँ और एक लड़का। सभी अशिक्षित रहे और मजदूर  बन गये। पैतृक सम्पत्ति के नाम पर खेत का जो छोटा टुकड़ा मिला उस पथरीली जमीन पर थोड़ी सी ज्वार, बाजरा और मक्का की फसल अपने श्रम से उगा लेते हैं, लेकिन चावल गेहूँ दाल तो खरीदना ही पड़ता है।

“बी.पी.एल. कार्ड बनवा लिए हैं कि नहीं…?” सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान से खरीदारी की सुविधा देने वाले इस कार्ड की बावत पूछने पर सकुचा जाते हैं।

“है तो साहब, लेकिन कहाँ मिल पाता है…। राशन का खर्चा बहुत है… वहाँ से कभी-कभार दस-बीस किलो चुपके से ले आता हूँ… थोड़ी लाज भी लगती है साहब… बड़ी कठिनाई है… ” उनके बार-बार हाथ जोड़ने से मुझे उलझन होने लगती है।

“आपका मकान कैसा है?” ब्लॉगर ने साहस करके पूछ ही लिया।

“कच्चा है साहब… हम बहुत गरीब हैं”…चेहरे पर वही संकोच तारी है।

“भूतपूर्व विधायक को तो सरकार अनेक सुविधाएं देती है। आपने कोशिश नहीं की…?” मेरा आशय राजनैतिक पेंशन, मुफ़्त  की यात्रा सुविधा इत्यादि से था।

“साहब ट्रेन और बस का ‘पास’ तो है लेकिन हमें खेत-खलिहान और तहसील तक ही जाना होता है… उसके लिए साइकिल या पैदल से काम चल जाता है। कभी लखनऊ या इलाहाबाद जाना होता है तभी पास का काम पड़ता है।”

“पेंशन तो मिल रही है न…?”

“डेढ़ हजार में क्या होता है साहब?”

“बस डेढ़ हजार…?” मुझे आश्चर्य हुआ।

“असल में साहब, मैं टाइम पर फॉर्म नहीं भर पाया था… सरकार का कोई दोष नहीं है” विनम्रता में हाथ बदस्तूर जुड़ा हुआ है।

मैने सम्बन्धित बाबू को बुलाकर पूछा तो पता चला कि समय-समय पर पेंशन पुनरीक्षण (revision) की प्रक्रिया का लाभ इन्हें मिला ही नहीं है। मई ’९७ से इनकी मूल पेंशन १४५०/- रूपये पर अटकी हुई है। कांग्रेस छोड़कर भाजपा में पहुँच चुके रामदेव जी की खराब माली हालत पर जब यहाँ के सांसद प्रत्याशी की निगाह पड़ी तो उन्होंने विधान सभा सचिवालय में पैरवी करके इनकी पेंशन में सुधार करा दिया था। उसी प्राधिकार पत्र के अनुसार भुगतान शुरू कराने के लिए रामदेव जी ने कोषागार की राह पकड़ी थी।

मैने देखा कि इनकी पेंशन सितम्बर-९८ से १९००/-, अप्रैल-२००४ से २५००/-, अगस्त-२००५ से ३६००/- और दिसम्बर-२००७ से ७०००/- कर दिए जाने का आदेश एक साथ जारी हुआ था। यानि विधायक जी अपनी मेहनत मजदूरी, और तहसील की मुंशीगीरी में इतना उलझे रहे कि अपनी पेंशन भी समय से नहीं बढ़वा सके। मूल पेंशन पर देय महंगाई भत्ता जोड़कर एकमुश्त एरियर की धनराशि लाखों में मिलने की बात सुनकर उनके चेहरे पर जो खुशी उतर आयी उसका बयान करना मुश्किल है। बार बार हाथ जोड़कर ऊपर वाले के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते रहे। आँखों की कोर से नमी झँकने लगी थी।

क्या आज का कोई विधायक या टुटपुँजिया नेता भी इस दारुण दशा का शिकार हो सकता है?  किसी विधायक के इर्द-गिर्द चलने वाले लटकन भी ठेकेदारी और रंगदारी का धन्धा चमकाकर मालदार और रौबदार हो लेते हैं। राजनीति के क्षेत्र में उतरने वाले अब इतना विकास तो आसानी से कर लेते हैं कि उन्हें कभी रामदेव जी जैसे दिन न देखने पड़े। मधु कोड़ाओं के तो कहने ही क्या…।

फिर कौन कहता है कि राजनीति का पतन हो रहा है…? 🙂

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

गर्ज़ू नचनिया तेल दै दै नाचे…!

20 टिप्पणियाँ

 

ग्रामीण परिवेश में बिताए बचपन के दिनों से मेरे मन में अमिट रूप में जो चरित्र अंकित हैं उनमें ‘नाच पार्टी’ में स्त्री पात्रों की भूमिका निभाने वाले मर्दों की छवि विशेष कौतूहल का विषय रही है। यह ‘नाच’ शादी-विवाह के अवसर पर बारातियों के मनोरंजन के लिए आती थी। बारात के मालिक की प्रतिष्ठा इस ‘नाच’ की ख्याति के स्तर से भी नापी जाती थी। इस नाट्यदल पार्टी की ख्याति उसमें शामिल ‘पुरुष नर्तकियों’ की संख्या और गुणवत्ता के आधार पर तय होती थी।

image कमनीय काया, पतली लोचदार कमर, लम्बे-काले-असली बाल, सुरीला गला, गोरा-चिकना चेहरा और उसपर फिल्मी हिरोइनों की नकल करते हुए देर तक नाचने की क्षमता इत्यादि इस पेशे की मांग हुआ करती थी। एक मर्द के भीतर इतने स्त्रैण गुणों का एक साथ मिलना दुर्लभ तो था ही, यदि कोई ‘लवण्डा’ इस कोटी का मिल जाता था तो उसकी नाच देखने दूर-दूर से ‘नचदेखवा’ टूट पड़ते थे।

अलग-अलग गाँवों से आने वाले ये समूह इस नाच कार्यक्रम को अपने अनुसार चलाने की होड़ में कभी-कभार भिड़ भी जाते थे। यहाँ तक कि लाठियाँ निकल आतीं और सिर-फुटौवल की नौबत भी आ जाती। एक नामी ‘नचनिया’ को उसके डान्स पर खुश होकर ईनाम देने वालों की होड़ भी लग जाती। बारात में आये दूल्हे के रिश्तेदार एक दूसरे के नाम से रूपया न्यौछावर करते और स्त्री के श्रृंगार में नाचने वाला लवण्डा ढोलक और नगाड़े की थाप पर एक खास शैली में उन्हें ‘शुक्रिया अदा’ करता। अचानक दर्शक दीर्घा में बैठे किसी खास रिश्तेदार (दूल्हे के बहनोई, फूफा आदि) के पास पहुँचकर उसके ऊपर साड़ी का पल्लू फेंक देने और बदले में जबरिया ईनाम ऐंठ लेने की कला भी इनको खास अकर्षक बनाती और तालियाँ बटोरने के काम आती।

मुझे याद है जब बिजली के लिए जेनरेटर का चलन गाँवो में नहीं था, तो शादी-विवाह या अन्य बड़े आयोजनों पर पेट्रोमेक्स जलाए जाते थे। मिट्टी के तेल से चलने वाला यह ‘पंचलाइट’ ही रात के अंधेरे को दूर करने वाला उत्कृष्ट साधन माना जाता था। इस गैसलाइट को संक्षेप में ‘गैस’ ही कहा जाता था। नाच के आयोजन में इसकी भूमिका भी महत्वपूर्ण थी। मंच के सामने ऊपर बाँस या बल्ली में दो ‘गैस’ लटकाये जाते थे। जमें-जमाये कार्यक्रम के दौरान अचानक जब प्रेशर कम हो जाने पर गैस से रोशनी के बजाये आग की लपटें निकलने लगतीं तो सभी ‘गैसड़ी’ को पुकारने लगते। वह सबकी लानत-मलानत सुनता हुआ गैस को नीचे उतारता, तेल डालता, गैस में हवा भरता और दुबारा टांग कर नीचे आ जाता। इस दौरान नाच का जोकर मंच से लोगों को अपनी ठिठोली से सम्हालता।

imageगाँव के  छोटे बच्चे नाच देखने के बजाय नाच पार्टी की तैयारी और कलाकारों के सजने-सवँरने की प्रक्रिया को ताकने- झाँकने में अधिक रुचि लेते थे। नाच की ‘हिरोइन’ को दाढ़ी बनवाते, मूँछ साफ कराते और लुंगी लपेटकर बींड़ी पीते देखना उन्हें ज्यादा रोमांचक लगता। ये राजा हरिश्चन्द्र,  तारामती, मन्त्री, राजकुमारी विद्यावती, उसकी  सहेली,  रानी सारंगा, जोकर, सिपाही, साधू, फकीर, पागल, देवी, देवता, सेठ, मुनीब, कर्जदार, गब्बर, बसन्ती, बीरू और जय इत्यादि स्टेज के पीछे बने एक छोटे से घेरे में अपना मेक-अप करते तो बच्चे उस घेरे की कनात में छेद ढूँढकर या बनाकर  उनकी एक झलक पा जाने को आतुर दिखायी पड़ते। स्त्री पात्र का साज-श्रृंगार तो जैसे किसी बड़े रहस्य की बात थी। इससे पर्दा उठाने की फिराक में कुछ किशोर वय के बच्चे भी लगे रहते थे।

image किसी भी नाच का यूएसपी उसका मुख्य नर्तक ही होता था। इस कलाकार को एक खास तरह की इज्जत मिलती थी। कदाचित्‌ इसी इज्जत की लालच में बहुतेरे लड़के तरुणाई में साड़ी चढ़ाने को तैयार हो जाते थे। आर्थिक और सामाजिक कारण चाहे जो रहे हों लेकिन जिसके शरीर में नचनिया के हार्मोन्स का स्राव होने लगता वह किसी नाच के मंच तक अपना रास्ता बनाने के लिए चल ही पड़ता।

जैसा कि साहित्य, संगीत और कला के क्षेत्र में प्रायः देखा जाता है, इसमें प्रतिभा और क्षमता के अनेक स्तर पाये जाते हैं। विविधता तो होती ही है। इसमें अच्छे और खराब का कोई सर्वमान्य वस्तुनिष्ठ पैमाना न होने से इस क्षेत्र में उतरने के लिए किसी को मनाही नहीं है। कोई भी व्यक्ति कवि, गीतकार, कहानीकार, लेखक, चित्रकार, गायक, नर्तक या वादक होने के बारे में सोच सकता है और इस दिशा में शुरुआत कर सकता है। लेकिन आगे बढ़ने के लिए उसकी स्वीकार्यता पाठकों, दर्शकों, श्रोताओं और रसग्राहियों के बीच होनी जरूरी हो जाती है। अपने ब्लॉगजगत में भी यह सब खूब साफ-साफ दिखायी देता है। यहाँ भी अनेक कवि और लेखक बहती गंगा में हाथ धोते मिल जाएंगे। टीवी चैनेल्स के रियलिटी शो के माध्यम से अपनी किस्मत आजमाने के मौके नये कलाकारों को भी अब काफी मिलने लगे हैं।

लेकिन ऐसी सुविधा ग्रामीण कलाकारों के पास नहीं थी। नाचने का कीड़ा काट लेने के बाद उन्हे किसी नाचपार्टी में शामिल होने के लिए अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन का मौका मिलना बहुत कठिन था। नचदेखवों की भीड़ जिसकी नाच देखने आयी होती उसके अलावा किसी नौसिखिए को मंच पर देखना उन्हें गँवारा नहीं था। अपनी रेखिया मूँछ और शुरुआती दाढ़ी को उगना शुरू होते ही सफाचट कराकर किशोरी का वेश बनाए हुए नवोढ़ा जब बहुत मिन्नत करता तो उसे दो-चार मिनट असली नाच की शुरुआत से पहले नाचने को दे दिए जाते।

जब झुण्ड के झुण्ड अलग-अलग गाँवों से आने वाले नचदेखवों के बीच बैठने के स्थान को लेकर नोंक-झोंक हो रही होती, बारातियों को जनवासे से खाने-पीने के लिए बिटिहा के घर पर बुलाया जा रहा होता, क्षेत्र के कुछ बड़े आदमी थोड़ी देर के लिए ‘मेन आर्टिस्ट’ का एकाध नाच-गाना देकने के लिए आसन जमा रहे होते; उसी शोर-शराबे के बीच अपनी कला का प्रदर्शन करने के लिए इस नये लवण्डे को मंच दे दिया जाता। तैयारी पूरी होते ही उसे बाद में या अन्त में नाचने का वादा करके उतार दिया जाता। फिर वह पूरी रात साड़ी चढ़ाए नेपथ्य में इस आस में बैठा रहता कि नाटक पूरा हो जाने के बाद वह फिर नाचेगा।

रात के अन्तिम प्रहर में जब नाच समाप्त होने को होती और भीड़ लगभग छँट चुकी होती तब उसकी नाच कौन देखता। नाच का मालिक उसे समझाता कि अब तो गैस का तेल समाप्त हो चला है। गर्ज का मारा कलाकार इस मौके के लिए मानों पहले से तैयार बैठा हो। तेल का गैलन हाजिर…। यही वो दृश्य रहा होगा जब यह कहावत प्रचलित  हुई होगी-

“गर्जू नचनिया तेल दै दै नाचे”

एक दिन ऑफिस के लन्च रुम में जब विनोदी स्वभाव के मेरे बॉस ने अपनी खास शैली में यह लोकोक्ति सुनायी थी तो अचानक छूटी हँसी ने मेरे मुँह का जिगराफ़िया बिगाड़ दिया था। साथ बैठे कुछ दूसरे लोग जिन्हें पूरब की गऊ-पट्टी का देहाती ‘लवंडा नाच’ देखने का कोई अनुभव नहीं था वे हक्का-बक्का थे। मेरी श्वांस नली में फँस गये भुने हुए चने के टुकड़े से जब राहत मिली तब मैंने संयत होकर उन्हें कुछ बताने की कोशिश की।

चर्चा में एक साथी ने जब कहा कि यह हाल कुछ-कुछ उन तथाकथित कवियों जैसा ही है जो अपनी जेब में ताजी कविता की पाण्डुलिपि लिए घूमते रहते हैं और कोई शिकार नजर में आते ही उसे चाय-पानी का न्यौता देकर फाँस लेते हैं, तो सभी उनका समर्थन करते दिखे। जबरिया कवि से पीड़ित होने का अपना-अपना अनुभव बाँटने लगे।

अब सोच रहा हूँ कि  कुछ ऐसा ही भाव उन लेखकों और कवियों के भीतर भी पैठा रहा होगा जो अपनी मेहनत से लिखी किताब को किसी प्रकाशक से पैसा देकर छपवाते हैं और फिर अपने  लोगों के बीच उसकी प्रतियाँ सादर, सप्रेम या सस्नेह भेंट करते हैं। जेब से पैसा खर्च करके पढ़ने की आदत हमारे समाज में कम तो हुई ही है लेकिन ‘तेल देकर नाचने’ को तैयार लोगों ने भी इस प्रवृत्ति को खाद-पानी देकर मजबूत बनाया है।

इसी विचित्र मनःस्थिति से उत्पन्न दुविधा के कारण मैने अपने खर्च से  किसी इष्टमित्र या रिश्तेदार को ‘सत्यार्थमित्र’ पुस्तक की प्रति मुफ़्त भेंट नहीं की। कुछ लोग शायद नाराज भी हों।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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