मेरा मन क्यूँ छला गया…?

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लो अक्टूबर चला गया

मेरा मन क्यूँ छला गया

 

सोचा भ्रष्टाचार मिटेगा सब खुशहाल बनेंगे अब

अन्ना जी की राह पकड़कर मालामाल बनेंगे सब

काला धन वापस आएगा, रामदेव जी बाटेंगे

अति गरीब पिछड़े जन भी अब धन की चाँदी काटेंगे

लेकिन था सब दिवास्वप्‍न जो पलक झपकते टला गया

मेरा मन फिर छला गया।

 

गाँव गया था घर-घर मिलने काका, चाचा, ताई से

बड़की माई, बुढ़िया काकी, भाई से भौजाई से

और दशहरे के मेले में दंगल का भी रेला था

लेकिन जनसमूह के बीच खड़ा मैं निपट अकेला था

ईर्श्या, द्वेष, कमीनेपन के बीच कदम ना चला गया

मेरा मन फिर छला गया

 

एक पड़ोसी के घर देखा एक वृद्ध जी लेटे थे

तन पर मैली धोती के संग विपदा बड़ी लपेटे थे

निःसंतान मर चुकी पत्नी अनुजपुत्रगण ताड़ दिए

जर जमीन सब छीनबाँटकर इनको जिन्दा गाड़ दिए

दीन-हीन थे, शरणागत थे,  सूखा आँसू जला गया

मेरा मन फिर छला गया

 

मन की पीड़ा दुबक गयी फिर घर परिवार सजाने में

जन्मदिवस निज गृहिणी का था खुश हो गये मनाने में

घर के बच्चे हैप्पी-हैप्पी बर्डे बर्डॆ गाते थे

केक, मिठाई, गिफ़्ट, डांस, गाना गाते, चिल्लाते थे

सबको था आनंद प्रचुर, हाँ बटुए से कुछ गला गया

मेरा मन बस छला गया

 

सोच रहा था तिहवारी मौसम में खूब मजे हैं जी

विजयादशमी, दीपपर्व पर घर-बाजार सजे हैं जी

शहर लखनऊ की तहजीबी सुबह शाम भी भली बहुत

फिर भी मन के कोने में क्यूँ रही उदासी पली बहुत

ओहो, मनभावन दरबारी राग गव‍इया चला गया

मेरा मन फिर छला गया।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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हे संविधान जी नमस्कार…

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हे संविधान जी नमस्कार,

इकसठ वर्षों के अनुभव से क्या हो पाये कुछ होशियार?
ऐ संविधान जी नमस्कार…

संप्रभु-समाजवादी-सेकुलर यह लोकतंत्र-जनगण अपना,
क्या पूरा कर पाये अब तक देखा जो गाँधी ने सपना?
बलिदानी अमर शहीदों ने क्या चाहा था बतलाते तुम;  
सबको समान दे आजादी, हो गयी कहाँ वह धारा गुम?
सिद्धांत बघारे बहुत मगर परिपालन में हो बेकरार,
हे संविधान जी नमस्कार…

बाबा साहब ने जुटा दिया दुनियाभर की अच्छी बातें,
दलितों पिछड़ों के लिए दिया धाराओं में भर सौगातें।
मौलिक अधिकारों की झोली लटकाकर चलते आप रहे;
स्तम्भ तीन जो खड़े किए वे अपना कद ही नाप रहे।
स्तर से गिरते जाने की ज्यों होड़ लगी है धुँआधार,
हे संविधान जी नमस्कार…

अब कार्यपालिका चेरी है मंत्री जी की बस सुनती है,
नौकरशाही करबद्ध खड़ी जो हुक्म हुआ वह गुनती है।
माफ़िया निरंकुश ठेका ले अब सारा राज चलाता है;
जिस अफसर ने सिस्टम तोड़ा उसको बेख़ौफ जलाता है।
मिल-जुलकर काम करे, ले-दे, वह अफसर ही है समझदार,
हे संविधान जी नमस्कार…

कानून बनाने वाले अब कानून तोड़ते दिखते हैं,
संसद सदस्य या एम.एल.ए. अपना भविष्य ही लिखते हैं।
जन-गण की बात हवाई है, दकियानूसी, बेमानी है;
यह पाँच वर्ष की कुर्सी तो बस भाग्य भरोसे आनी है।
सरकारी धन है, अवसर है, दोनो हाथों से करें पार,
हे संविधान जी नमस्कार…

क्या न्याय पालिका अडिग खड़ी कर्तव्य वहन कर पाती है?
जज-अंकल घुस आये तो क्या यह इसमें तनिक लजाती है?
क्या जिला कचहरी, तहसीलों में न्याय सुलभ हो पाया है?
क्या मजिस्ट्रेट से, मुंसिफ़ से यह भ्रष्ट तंत्र घबराया है?
अफ़सोस तुम्हारी देहरी पर यह जन-गण-मन है गया हार
हे संविधान जी नमस्कार…

आप सबको गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ…!!!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

तेली के बैल का गोल-गोल चक्कर…

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इस पूरे प्रकरण पर कुछ नया कहने लायक बचा ही नहीं है। मूल पोस्ट और उसकी चर्चा के बीच अभिमन्यु प्रसंग की याद दिलाती एक अन्य पोस्ट और इन पोस्टों पर आयी टिप्पणियों को आद्योपान्त पढ़ने के बाद मन बड़ा दुविधाग्रस्त हो गया। कुछ बोलें कि न बोलें। जार्ज बुश की प्रसिद्ध उक्ति याद गयी कि आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में आप या तो हमारे साथ हैं या हमारे विरुद्ध हैं। यानि तटस्थता की कोई गुन्जाइश नहीं है।

दोनो ओर से ललकारे जाने के बाद कुछ लोग सफाई देते भी नजर आये। कुछ ऐसा आभास दिया जाने लगा कि अब मानव सभ्यता के इतिहास में कोई युगान्तकारी फैसला होने वाला है। इसके बाद अब दुनिया पहले जैसी नहीं रह जाएगी। अब मानव समाज में केवल दो वर्ग बचेंगे- नर और नारी। बाकी सारे सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक वर्ग-भेद मिट जाएंगे। दलित, पिछड़ा, अगड़ा, अमीर, गरीब, शिक्षित, अशिक्षित, नैतिक, अनैतिक, पारम्परिक, आधुनिक, जैसी टुच्ची धारणाएं इस लैंगिक पहचान की आँधी में उड़ जाएंगी। मुझे तो थोड़ी खुशी भी होने लगी थी। कितना क्रान्तिकारी परिवर्तन हमारी आँखों के सामने मूर्तिमान होने जा रहा था। एक पल को तो मैने सोचा कि अगले दिन के सभी अखबार इस घटना को सबसे बड़ी खबर के रूप में छापेंगे। टीवी चैनेल्स पर बजट की समीक्षा और ढोंगी बाबाओं के कुकर्म की चर्चा से पक चुके दर्शकों को एक ‘बम्फाट’ ब्रेकिंग न्यूज मिलेगी। पैनेल डिस्कशन के लिए समाजशास्त्रियों की पूछ बढ़ जाएगी। विश्वविद्यालयों और शोध संस्थाओं में सेमिनार आयोजित होंगे। पत्रिकाएं विशेषांक निकालेंगी।

इसी खुशी में मुझे रात भर नींद नहीं आयी। ऐसा इसके पहले मेरे साथ सिर्फ़ एक बार हुआ है। जब पहली बार पी.सी.एस. में सेलेक्शन का फाइनल रेजल्ट निकला था [जब लोक सेवा आयोग द्वारा चयनित किये जाने का पहली बार परिणाम घोषित हुआ था- शुद्ध हिन्दी :)]। हॉस्टेल के कमरे में रात भर करवट बदलता रहा था। अगले दिन के अखबार में अपना नाम छपा देखने की उत्सुकता थी।

लेकिन इस बार निराशा हाथ लगी। रविवार की सुबह जस की तस थी। अखबारों में वही हत्या, लूट, बलात्कार, राजनीति, महंगाई, भ्रष्टाचार, दलित उत्पीड़न, प्रशासनिक लापरवाही, प्रेम प्रसंग में फाँसी की सजा, फिल्मी दुनिया, क्रिकेट, व हाँकी विश्वकप की खबरें छायी हुई थीं। विज्ञापनों में भी कमनीय काया की धनी सुन्दरियाँ बदस्तूर मोबाइल से लेकर पुरुष अण्डरवियर, शेविंग क्रीम, कम्प्यूटर, शक्तिवर्द्धक चूर्ण और गाड़ियों के टायर तक बेंच रही थीं। टीवी पर भी एंकर चीख-चीखकर कृपालु महाराज की कृपा से काल-कवलित भक्तगणों के पीछे छूट गये परिवारी जनों का हाल सुना रहा था। राहुल महाजन के स्वयंवर के पटाक्षेप की खबरें ही तारी और जारी थीं। मुझे बड़ा धोखा हुआ जी…

मैने हिन्दी ब्लॉगजगत का दुबारा मुआयना किया। सभी बातें दुबारा पढ़ी। इस बार थोड़ी सावधानी से। उसमें कुछ नया तत्व छाँटने की कोशिश की। इस सारी कोशिश के दौरान मुझे अपने गाँव के सोभई तेली का कोल्हू से तेल पेरना याद आ गया। चूँ..चाँ..चर्र करते लकड़ी के कोल्हू में जुता हुआ बैल गोल-गोल चक्कर लगाता रहता था। सोभई तेली अपने बाकी काम निपटाते हुए बीच-बीच में आकर ‘घानी’ चला दिया करते। बैल की आँख पर मूज की बुनी हुई तश्तरीनुमा डलिया औंधाकर बाँध दी जाती थी ताकि बैल द्वारा पेरी जा रही सरसो खा न ली जाय। वह बैल ढंकी हुई आँखों के साथ उसी गोल दायरे में चक्कर पर चक्कर लगाये जाता था।

यह नर-नारी प्रसंग जिस प्रकार और जितनी बार इस हिन्दी ब्लॉगजगत में उठाया जाता है इसका स्वरूप लगभग उसी गोल-गोल चक्कर वाला ही रहता है। जब कोई नया ब्लॉगर मुद्दे को नये ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास करता है तो कदाचित्‌ अन्य चिठ्ठाकारों के प्रति कोई पूर्वाग्रह मन में रखे बगैर उसकी पोस्ट आती है। लेकिन पहले से तयशुदा खाँचों में फिट दिमाग वाले लोग अपने-अपने हथियारों के साथ या तो उसके संरक्षण का जिम्मा उठा लेते हैं या उसपर पिल पड़ते है। रूढ़ हो चुकी धारणाओं, कुन्द हो चुके तर्कों और प्रगाढ़ हो चुके पूर्वाग्रहों के साथ गोलबन्द हो चुके ब्लॉगरजन अपनी-अपनी भड़ास निकालने वहाँ पहुँच ही जाते हैं। सबकुछ इतना यन्त्रवत्‌ सा लगता है कि आश्चर्य होता है। कोई समाधान दूर-दूर तक नहीं दिखायी देता।

इसबार नया यह हुआ कि माननीयों ने अपनी रही-सही मर्यादा भी ताख पर रख दी और खुलकर दो-दो हाथ कर लेने का उद्‌घोष कर दिया। एक-एक चुनिन्दा शब्दवाण चलाये गये। असली मुद्दा न जाने कहाँ चला गया और ‘दे तेरी की… ले तेरे की’ शुरू हो गयी। वही जाने-पहचाने चेहरे और वही घिसी-पिटी उक्तियाँ, जैसे इस युद्ध में विरोधी को हर हाल में परास्त कर देना है। ऐसे बिगड़े माहौल में एक साझे सत्य को खोजने और पहचानने की मेरी कोशिश कैसे सफल हो? अब यहाँ रवि रतलामी जी अलग-अलग श्रेणियों के टॉप-टेन ब्लॉग की ख्वाहिश भी नहीं कर पा रहे हैं तो इसका दोष हम खुद को न दें तो किसे दें?

मेरी बात पर यदि आपको विश्वास नहीं है तो जुलाई-२००८ में लिखी  हुई मेरी यह कविता पढ़िए। ताजे प्रकरण पर यदि मुझे आज भी लिखना होता तो शायद इसमें कुछ नया जोड़ने की जरूरत न पड़ती:

 

प्रगतिशील स्वातन्त्र्य-प्रेम की लौ जलती है,
समता के अधिकारों की इच्छा पलती है।
इस समाज ने डाल दिये हैं जो भी बन्धन
छिन्न-भिन्न करने देखो,‘नारी’ चलती है॥

घर की देवी, पुण्य-प्रसूता, कुल की रानी,
ममतामयी, सहचरी, प्रिया, बात-बेमानी।
अब दुर्गा, काली का रूप धर रही माया;
करुणा छोड़ ध्वंस करने की इसने ठानी॥

वैवाहिक बंधन अब बेड़ी सा लगता है,
है नर का वर्चस्व, भाव ऐसा जगता है।
इस अन्याय भरी दुनिया के खण्डन से ही;
इनके मन से क्षोभ-कलुष देखो भगता है॥

जंगल के बाहर मनुष्य का वो आ जाना,
नर-नारी के मिलन-प्रणय का नियम बनाना।
घर, परिवार, समाज, देश की रचना करके
कहतीं, “नर ने बुना स्वार्थ का ताना-बाना”॥

पढ़ी ‘सभ्यता के विकास’ की गाथा सबने,
इन्सानी फ़ितरत को अर्स दिया था रब़ ने।
इन कदमों को रोक सकेगी क्या चिन्गारी;
जिसे हवा देती हैं नारीवादी बहनें॥

क्या लम्बी यात्रा पर निकला पुरुष अकेला?
बिन नारी क्या सृजित कर लिया जग का मेला?
इस निसर्ग के कर्णधार से पूछ लीजिये,
जिसने देखी प्रथम-प्रणय की वह शुभ बेला॥

प्रकृति मनुज की है ऐसी, ‘होती गलती है’,
पर विवेक से, संयम से यह भी टलती है।
है ‘सत्यार्थ मित्र’ को पीड़ा चरमपंथ से;
छिन्न-भिन्न करती नारी मन को खलती है॥

(सिद्धार्थ)

पुछल्ला: आज मैं आदरणीय ज्ञान जी के घर गया था। सपरिवार बैठकर खूब गुझिया, नमकीन, सकरपारा, पकौड़ी और कॉफ़ी का आनन्द लिया गया। गुरुदेव अपनी पोस्ट में चाहे जो लिखें लेकिन वे बिल्कुल ठीक-ठाक और सक्रिय हैं। अलबत्ता इस धींगा-मुश्ती से दूरी बनाये हुए हैं। उनकी कुशलता का राज कहीं इस पॉलिसी में ही तो नहीं छिपा हुआ है 🙂
ज्ञानदत्त पाण्डेय जी के साथ DSC02516

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

राम रसोई हुई मुखर…|

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बुरा हो इस ब्लॉगजगत का जो चैन से आलस्य भी नहीं करने देता। एक स्वघोषित आलसी महाराज तुरत-फुरत कविता रचने और ठेलने की फैक्ट्री लगा रखे हैं। इधर-उधर झाँकते हुए टिपियाते रह्ते हैं। रहस्यमय प्रश्न उछालते हैं और वहीं से कोई सूत्र निकालकर कविता का एक नया प्रयोग ठेल देते हैं। उधर बेचैन आत्मा ने एक बसन्त का गीत लिखा- महज दो घण्टे में। उसपर आलसी महाराज ने दो मिनट में एक टिप्पणी लिखी होगी। उसके बाद क्या देखता हूँ कि उनके कविता ब्लॉग पर एक नयी सजधज के साथ कुछ नमूदार हुआ है। पता नहीं कविता ही है या कुछ और।

इस अबूझ आइटम की दो लाइनें ही मेरी समझ में आ सकीं। उन लाइनों पर सवार होकर मैं अपने गाँव चला गया। मिट्टी के चूल्हे में जलती लकड़ी के आँच पर बड़ी बटुली में भात और छोटी बटुली में दाल बनाती माँ दिख गयी। लकड़ी की आँच की लालच में वहीं सटकर बैठ गया हूँ। मैं पहँसुल पर तेजी से चलते उसके हाथों को देखता हूँ जो तरकारी काट रहे हैं। बड़ी दीदी सिलबट्टे पर चटनी पीस रही है। कान में कई मधुर आवाजों का संगीत बज रहा है जिसमें गजब का ‘स्वाद’ है। यह सब मुश्किल से पाँच मिनट में रच गया क्यों कि संगीत की गति अनोखी है:

 

अदहन खदकत भदर-भदर
ढक्कन खड़कत खड़र-खड़र
करछुल टनकत टनर-टनर
लौना लहकत लपर-लपर

बटुली महकत महर-महर
पहँसुल कतरत खचर-खचर
सिलबट रगड़त चटर-पटर
लहसुन गमकत उदर-अधर

राम रसोई हुई मुखर
कविता बोली देख इधर

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

घुस पैठी थकान…

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इतवार का बिहान

सिर तक रजाई लिए तान

घर में की खटपट से बन्द किए कान

आंगन में धूप रही नाच

छोटू ककहरा किताब रहा बाँच

फिर भी न आलस पर आने दी आँच

कुंजीपट खूँटी पर टांग

धत्‌ कुर्सी कर्मठता का स्वांग

दफ़्तर में अनसुनी है छुट्टी की मांग

कूड़े का ढेर

फाइल में फैला अंधेर

चिट्ठों में आँख मीच रहे उटकेर

आफ़त में जान

भला है बन बैठो अन्जान

देह नहीं मन में घुस पैठी थकान

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

इलाहाबाद की राष्ट्रीय ब्लॉगर गोष्ठी से पहले…

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(१)

भाव हमारे शब्द उधार के…

पाँच दिनों की ट्रेनिंग पूरी करके लखनऊ से इलाहाबाद लौटा हूँ। पत्नी और बच्चे बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे थे। दीपावली की छुट्टी मनाने मेरे दो भाई भी अपने-अपने हॉस्टेल से आ चुके थे। घर में एक जन्मदिन भी था। लेकिन मुझे इसकी खुशी मनाने के लिए कोई उपहार खरीदने या अन्य तैयारी का कोई समय नहीं मिल पाया था। बस रात के नौ बजे तक घर पहुँच जाना ही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि रही। रिक्शे से उतरकर सबसे पहले पड़ोसी के लॉन से गुलाब के फूल माँग लाया और घर में प्रवेश करते ही उन्ही फूलों को पेश करते हुए  यह उधार का शेर सुना डाला-

तमाम उम्र तुम्हें जिन्दगी का प्यार मिले।

खु़दा करे ये खुशी तुमको बार-बार मिले॥

“हैप्पी बड्डे” का काम पूरा हो लिया था। तभी मेरे एक दोस्त ने चार खूबसूरत लाइनें बता दीं। तड़ से मैने एक सुनहले कार्ड पर उन्हें लिखा और चुपके से वहाँ रख दिया जहाँ उनकी नजर जल्दी से पहुँच जाय-

चन्द मासूम अदाओं के सिवा कुछ भी नहीं।
महकी-महकी सी हवाओं के सिवा कुछ भी नहीं॥
आज के प्यार भरे दिन पे तुम्हें देने को,
पास में मेरे दुआओं के सिवा कुछ भी नहीं।

फिर क्या था। आनन्द आ गया। भाव जम गया था। मेरी भावनाएं पूरी तरह से संचारित हो गयीं। दोनो तरफ़ सन्तुष्टि का भाव था। मेरे मन को बहुत तसल्ली मिल गयी और कुछ न कर पाने का मलाल थोड़ा मद्धिम हुआ।

(२)

कहानी कुछ यूँ पलटी:

अब मैं अगली चिन्ता की ओर से बरबस मोड़े हुए मन को दुबारा उस ओर ले जाने का उपक्रम करने लगा। कम्प्यूटर पर बैठकर आगामी कार्यक्रम की तैयारियों की प्रगति समीक्षा के उद्देश्य से मेलबॉक्स चेक करना था। कार्यक्रम के संयोजक श्री सन्तोष भदौरिया जी से बात करनी थी। अपने छोटे भाइयों से कम्प्यूटर तकनीक पर कुछ नया सीखना था, और अपने ब्लॉग पर एक नयी पोस्ट लिखने का मन भी था।

राष्ट्रीय सेमिनार के आयोजन में हमारे चिठ्ठाकार बन्धुओं ने जिस उत्साह और सौजन्यता से प्रतिभाग करने हेतु अपनी सहमति भेंजी है उसका धन्यवाद ज्ञापन भी करना था और ज्योतिपर्व दीपावली की शुभकामनाएं भी प्रेषित करनी थीं। इन सभी कार्यों पर एक के बाद एक ध्यान दौड़ाता रहा, लेकिन एकाग्र नहीं हो सका।

तभी एक जबरदस्त तुकबन्दी मेरे कानों से टकरायी। मेरी गृहिणी को यह सब अच्छा नहीं लग रहा था। उन्हें मुझसे शिकायत हो ली थी और वह तुकबन्दी उसी का बयान कर रही थी।

मैने पीछे मुड़कर पूछा, “इसके आगे भी कुछ जोड़ोगी कि यहीं अटकी रहोगी?”

“इसके आगे आप जोड़िए… मेरे भाव से तो आप भली भाँति परिचित हैं ही। …मैं चली सोने।” यह कहकर वो सही में चली गयीं।

अब मेरा सारा प्रोग्राम चौपट हो गया। पत्नी का आदेश पालन करना अपना धर्म समझते हुए मैने उस दो लाइन की तुकबन्दी को यथावत्‌ रखते हुए आगे की पंक्तियाँ जोड़ डाली हैं। इनमें व्यक्त भावों का कॉपीराइट मेरा नहीं है और इनसे मेरा सहमत होना भी जरूरी नहीं है। अस्तु…।

(३)

भाव तुम्हारे शब्द हमारे…

सोच रही हूँ, काश! मैं कम्प्यूटर होती।

तब अपने पतिदेव के दिल के भीतर होती॥

 

मैं सहचरी नहीं रह पायी अब उनकी जी।

इस निशिचर ने चुरा लिया है अब उनका जी॥

घर में मुझसे अधिक समय उसको देते हैं।

आते ही अब हाल-चाल उसका लेते हैं॥

चिन्ता नहीं उन्हें मेरी जो ना घर होती।

सोच रही हूँ, काश! मैं कम्प्यूटर होती….

 

सुबह शाम औ दिन रातें बस एक तपस्या।

नहीं दीखती घर में कोई अन्य समस्या॥

बतियाना औ हँसना, गाना कम्प्यूटर से।

रूठ जाय तो उसे मनाना है जी भर के॥

चिन्ता नहीं उन्हें चाहे मैं ठनकर रोती।

सोच रही हूँ, काश! मैं कम्प्यूटर होती॥

 

घर की दुनिया भले प्रतीक्षा कर ले भाई।

कम्प्यूटर की दुनिया की जमती प्रभुताई॥

‘घर का मेल’ बने, बिगड़े या पटरी छोड़े।

पर ‘ई-मेल’ बॉक्स खुलकर नित सरपट दौड़े।

वैसी अपलक दृष्टि कभी ना मुझपर होती।

सोच रही हूँ, काश! मैं कम्प्यूटर होती॥

 

शादी के अरमान सुनहरे धरे रह गये।

‘दो जिस्म मगर एक जान’ ख़तों में भरे रह गये॥

कम्प्यूटर ने श्रीमन्‌ की गलबहिंयाँ ले ली।

दो बच्चों की देखभाल, मैं निपट अकेली॥

लगे डाह सौतन को इच्छा जीभर होती।

सोच रही हूँ, काश! मैं कम्प्यूटर होती॥

 

(४)

शुभकामनाएं

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आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। सपरिवार सानन्द रहें। पति-पत्नी और बच्चों को महालक्ष्मी जी अपार खुशियाँ दें। सभी राजी खुशी रहें। हमपर भी देवी-देवता ऐसे ही प्रसन्न रहें, इसकी दुआ कीजिए। २३-२४ अक्टूबर को ब्लॉगर महाकुम्भ में यहाँ या वहाँ आप सबसे मुलाकात होगी ही।

!!!जय हो लक्ष्मी म‍इया की!!!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

ब्लॉग की किताब चल कर आयी…

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मुखपृष्ठ सत्यार्थमित्र... आज स्वतन्त्रता दिवस है, और आज मेरी पुस्तक प्रेस से छूटकर मेरे घर आ गयी है। हिन्दुस्तानी एकेडेमी ने इसे छापकर निश्चित रूप से एक नयी शुरुआत की है। कहना न होगा कि आज मैं बहुत प्रसन्न हूँ।

ब्लॉग की किताब छापना व्यावसायिक रूप से कितना उपयोगी है इसका पता शायद इस किताब पर पाठकों की प्रतिक्रिया से पता चलेगा। अलबत्ता जिस संस्था ने इसका प्रकाशन किया है, उसके पास अपने उत्पादों के विपणन का कोई नेटवर्क नहीं है। पुराने जमाने में देश भर के लब्ध प्रतिष्ठ साहित्यकार यहाँ आते रहते थे और एकेडेमी के बिक्री काउण्टर पर उपलब्ध प्रकाशनों को खरीदते थे और अपने शहर जाकर इसके बारे में बताते थे। इसप्रकार यहाँ की धीर गम्भीर, व शोधपरक पुस्तकें धीरे-धीरे लम्बे समय में बिकती थीं। कुछ खरीद सरकारी पुस्तकालयों द्वारा की जाती थी।

पहली बार लोकप्रिय श्रेणी की एक ऐसी हल्की-फुल्की पुस्तक प्रकाशित हुई है जिसे आमपाठक वर्ग को आकर्षित करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। लेकिन आम पाठकों तक इसे पहुँचाने का सही माध्यम क्या है, इसकी जानकारी हमें नहीं है। एकेडेमी द्वारा भी इस दिशा में कोई स्पष्ट व सुविचारित नीति अपनाये जाने का उदाहरण नहीं मिला है।

अतः मैं यहाँ अपने शुभेच्छुओं, मित्रों और वरिष्ठ चिठ्ठाकारों से अनुरोध करता हूँ कि वे इस सद्यःप्रकाशित ब्लॉग की किताब के प्रचार-प्रसार और बिक्री के कारगर उपाय सुजाने का कष्ट करें।

सत्यार्थमित्र आवरणसत्यार्थमित्र पुस्तक का आवरण 

इस पुस्तक में मेरे ब्लॉग सत्यार्थमित्र पर प्रकाशित अप्रैल-२००८ से मार्च-२००९ तक की कुल १०१ पोस्टों में से चयनित ६५ पोस्टें संकलित की गयी हैं। प्रत्येक पोस्ट के अन्त में कुछ चुनिन्दा टिप्पणियों के अंश भी दिये गये हैं। ऐसी टिप्पणियों को स्थान दिया गया है जिनसे कोई नयी बात विषयवस्तु में जुड़ती हो।

पुस्तक के अन्त में दिए गये परिशिष्ट में हिन्दी ब्लॉगजगत के सर्वाधिक सक्रिय ४० चिठ्ठों का नाम-पता दिया गया है जिनका सक्रियता क्रमांक चिठ्ठाजगत द्वारा निर्धारित है।

कुल २८८ पृष्ठों के इस सजिल्द संस्करण का बिक्री मूल्य रु.१९५/- मात्र रखा गया है। इसपर एकेडेमी की नीति के अनुसार छूट की व्यवस्था भी है।

तो देर किस बात की… आइए प्रिण्ट माध्यम में हिन्दी ब्लॉगजगत का एक झरोखा खोलने के इस अनुष्ठान में अपना भरपूर योगदान करें। इसके बारे में उन्हें बतायें जो अभी अन्तर्जाल की सुविधा से नहीं जुड़ सके हैं। पुस्तक प्राप्त करने का तरीका हिन्दुस्तानी एकेडेमी के जाल पते पर उपलब्ध है।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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