पुराण चर्चा: लिंग पुराण (क्रोधी दुर्वासा और अंबरीष की कथा) भाग-२

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भाग-१: लिंग पुराण का संक्षिप्त परिचय

भाग-२: क्रोधी दुर्वासा और अंबरीष की कथा:

durvasaप्राचीन समय की बात है। राजा नाभाग के अंबरीष नामक एक प्रतापी पुत्र थे। वे बड़े बीर, बुद्धिमान व तपस्वी राजा थे। वे जानते थे कि जिस धन-वैभव के लोभ में पड़कर प्राणी घोर नरक में जाते हैं वह कुछ ही दिनों का सुख है, इसलिए उनका मन सदैव भगवत भक्ति व दीनों की सेवा में लगा रहता था। राज्याभिषेक के बाद राजा अंबरीष ने अनेक यज्ञ करके भगवान विष्णु की पूजा-उपासना की जिन्होंने प्रसन्न होकर उनकी रक्षा के लिए अपने ‘सुदर्शन चक्र’ को नियुक्त कर दिया।

एक बार अंबरीष ने अपनी पत्नी के साथ द्वादशी प्रधान एकादशी व्रत करने का निश्चय किया। उन्होंने भगवान विष्णु का पूजन किया और ब्राह्मणों को अन्न-धन का भरपूर दान दिया। तभी वहाँ दुर्वासा ऋषि का आगमन हो गया। वे परम तपस्वी व अलौकिक शक्तियों से युक्त थे किंतु क्रोधी स्वभाव के कारण उनकी सेवा-सुश्रुसा में विशेष सावधानी अपेक्षित थी।

अंबरीष ने उनका स्वागत किया और उन्हें श्रेष्ठ आसन पर बिठाया। तत्पश्चात् दुर्वासा ऋषि की पूजा करके उसने प्रेमपूर्वक भोजन ग्रहण करने का आग्रह किया। दुर्वासा ऋषि ने उनका आग्रह स्वीकार कर लिया। किंतु भोजन से पूर्व नित्य कर्मों से निवृत्त होने के लिये वे यमुना नदी के तट पर चले गये। वे परब्रह्म का ध्यान कर यमुना के जल में स्नान करने लगे।

इधर द्वादशी केवल कुछ ही क्षण शेष रह गयी थी। स्वयं को धर्मसंकट में देख राजा अम्बरीष ब्राह्मणों से परामर्श करते हुए बोले – “मान्यवरों ! ब्राह्मण को बिना भोजन करवाए स्वयं खा लेना और द्वादशी रहते भोजन न करना – दोनो ही मनुष्य को पाप का भागी बनाते हैं। इसलिये इस समय आप मुझे ऐसा उपाय बताएँ, जिससे कि मैं पाप का भागी न बन सकूँ।”

ब्राह्मण बोले – “राजन ! शास्त्रों मे कहा गया है कि पानी भोजन करने के समान है भी और समान नहीं भी है। इसलिये इस समय आप जल पी कर द्वादशी का नियम पूर्ण कीजिये।” यह सुनकर अंबरीष ने जल पी लिया और दुर्वासा ऋषि की प्रतीक्षा करने लगे।

जब दुर्वासा ऋषि लौटे तो उन्होंने तपोबल से जान लिया कि अंबरीष भोजन कर चुके हैं। अत: वे क्रोधित हो उठे और कटु स्वर में बोले – “ दुष्ट अंबरीष ! तू धन के मद में चूर होकर स्वयं को बहुत बड़ा मानता है। तूने मेरा तिरस्कार किया है। मुझे भोजन का निमंत्रण दिया लेकिन मुझसे पहले स्वयं भोजन कर लिया। अब देख मैं तुझे तेरी दुष्टता का दंड देता हूँ।”

क्रोधित दुर्वासा ने अपनी एक जटा उखाड़ी और अंबरीष को मारने के लिए एक भयंकर और विकराल कृत्या उत्पन्न की। कृत्या तलवार लेकर अंबरीष की ओर बढ़ी किंतु वे बिना विचलित हुए मन ही मन भगवान विष्णु का स्मरण करते रहे। जैसे ही कृत्या ने उनके ऊपर आक्रमण करना चाहा; अंबरीष का रक्षक सुदर्शन चक्र सक्रिय हो गया और पल भर में उसने कृत्या को जलाकर भस्म कर दिया।

जब दुर्वासा ऋषि ने देखा कि कि चक्र तेजी से उन्हीं की ओर बढ़ रहा है तो वे भयभीत हो गये। अपने प्राणों की रक्षा के लिए वे आकाश, पाताल,पृथ्वी,समुद्र, पर्वत, वन आदि अनेक स्थानों पर शरण लेने गये किंतु सुदर्शन चक्र ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। घबराकर उन्होंने ब्रह्मा जी से रक्षा की गुहार लगायी।

ब्रह्मा जी प्रकट हुए किंतु असमर्थ होकर बोले, “वत्स, भगवान विष्णु द्वारा बनाये गये नियमों से मैं बँधा हुआ हूँ। प्रजापति, इंद्र, सूर्य आदि सभी देवगण भी इन नियमों का उल्लंघन नहीं कर सकते। हम नारायण की आज्ञा के अनुसार ही सृष्टि के प्राणियों का कल्याण करते हैं। इस प्रकार भगवान विष्णु के भक्त के शत्रु की रक्षा करना हमारे वश में नहीं है।”durvasa1

ब्रह्माजी की बातों से निराश होकर दुर्वासा ऋषि भगवान शंकर की शरण में गये। पूरा वृत्तांत सुनने के बाद महादेव जी ने उन्हें समझाया, “ऋषिवर ! यह सुदर्शन चक्र भगवान विष्णु का शस्त्र है जो उनके भक्तजन की रक्षा करता है। इसका तेज सभी के लिए असहनीय है। अतः उचित होगा कि आप स्वयं भगवान विष्णु की शरण में जाएँ। केवल वे ही इस दिव्य शस्त्र से आपकी रक्षा कर सकते हैं और आपका मंगल हो सकता है।”

वहाँ से भी निराश होकर दुर्वासा ऋषि भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे और उनके चरणों में सिर नवाकर दया की गुहार लगायी। आर्त स्वर में दुर्वासा बोले, “भगवन मैं आपका अपराधी हूँ। आपके प्रभाव से अनभिज्ञ होकर मैंने आपके परम भक्त राजा अंबरीष को मारने का प्रयास किया। हे दयानिधि, कृपा करके मेरी इस धृष्टता को क्षमा कर मेरे प्राणों की रक्षा कीजिए।”

भगवान नारायण ने दुर्वासा ऋषि को उठाया और समझाया, “मुनिवर ! मैं सर्वदा भक्तों के अधीन हूँ। मेरे सीधे-सादे भक्तों ने अपने प्रेमपाश में मुझे बाँध रखा है। भक्तों का एकमात्र आश्रय मैं ही हूँ। अतः मैं स्वयं अपने व देवी लक्ष्मी से भी बढ़कर अपने भक्तों को चाहता हूँ। जो भक्त अपने बंधु-बांधव और समस्त भोग-विलास त्यागकर मेरी शरण में आ गये हैं उन्हें किसी प्रकार छोड़ने का विचार मैं कदापि नहीं कर सकता। यदि आप इस विपत्ति से बचना चाहते हैं तो मेरे परम भक्त अंबरीष के पास ही जाइए। उसके प्रसन्न होने पर आपकी कठिनाई अवश्य दूर हो जाएगी।”

नारायण की सलाह पाकर दुर्वासा अंबरीष के पास पहुँचे और अपने अपराध के लिए क्षमा माँगने लगे। परम तपस्वी महर्षि दुर्वासा की यह दुर्दशा देखकर अंबरीष को अत्यंत दुख हुआ। उन्होंने सुदर्शन चक्र की स्तुति की और प्रार्थना पूर्वक आग्रह किया कि वह अब लौट जाय। उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर सुदर्शन चक्र ने अपनी दिशा बदल ली और दुर्वासा ऋषि को भयमुक्त कर दिया।

जबसे दुर्वासा ऋषि वहाँ से गये थे तबसे राजा अम्बरीष ने भोजन ग्रहण नहीं किया था। वे ऋषि को भोजन कराने की प्रतीक्षा करते रहे। उनके लौटकर आ जाने व भयमुक्त हो जाने के बाद अम्बरीष ने सबसे पहले उन्हें आदर पूर्वक बैठाकर उनकी विधि सहित पूजा की और प्रेम पूर्वक भोजन कराया। राजा के इस व्यवहार से ऋषि दुर्वासा अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें अनेकशः आशीर्वाद देकर वहाँ से विदा लिये।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

पुराण चर्चा: लिंग पुराण (क्रोधी दुर्वासा और अंबरीष की कथा) भाग-१

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भाग-१: लिंग पुराण का संक्षिप्त परिचय:

ग्यारह हजार श्लोकों व १६३ अध्यायों में विभक्त इस पुराण में भगवान शिव से संबंधित विभिन्न पौराणिक आख्यानों, उपाख्यानों व घटनाओं का वर्णन करते हुए शैव सिद्धांतों का प्रतिपादन अत्यंत सहज, सरल और तर्कसंगत रीति से किया गया है।

यद्यपि लिंग का एक अर्थ जननेंद्रिय भी होता है, लेकिन इस पुराण में इसका तात्पर्य ‘ॐकार’ से है। समस्त पुराणों में यह माना गया है कि सृष्टि की उत्पत्ति निर्गुण निराकार ‘परब्रह्म’ से हुई है। उसी निर्गुण परब्रह्म के स्वरूप को व्यक्त करने का प्रतीक है ‘लिंग’। लिंग पुराण में भगवान शिव के तीन रूपों को निम्नवत्‌ परिभाषित किया गया है।

“एकेनैव हृतं विश्वं व्याप्त त्वेन शिवेन तु।

अलिंग चैव लिंगं च लिंगालिंगानि मूर्तयः॥”

अर्थात्‌ भगवान इस सृष्टि से पूर्व ही अव्यक्त लिंग अर्थात्‌ ब्रह्म स्वरूप में सदा विद्यमान रहते हैं। तत्पश्चात्‌ वे ही व्यक्त लिंग के रूप में प्रकट होकर सृष्टि की रचना करते हैं। इस प्रकार वे अव्यक्त (निर्गुण) व व्यक्त (सगुण) दोनो स्वरूपों से सृष्टि में विद्यमान हैं।

लिंग पुराण के अनुसार जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना का विचार किया तो उन्होंने सर्वप्रथम अहम (अविद्या) को उत्पन्न किया। इस अहंकार से क्रमशः पाँच तन्मात्राएँ उत्पन्न हुईं- शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गंध। इन पाँच गुणविशेष ने पंचतत्वों को उत्पन्न किया- आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी। इस प्रकार तन्मात्राएँ सूक्ष्म तथा तत्व स्थूल कहे जाते हैं।

इस उत्पत्ति का क्रम निम्नवत्‌ समझाया गया है: अहंकार से शब्द नामक तन्मात्रा, शब्द से आकाश रूपी तत्व, आकाश तत्व से स्पर्श तन्मात्रा, स्पर्श से वायु तत्व, वायु से रूप तन्मात्रा, रूप से अग्नि तत्व, अग्नि से रस तन्मात्रा, रस से जल तत्व, जल से गंध तन्मात्रा व गंध से पृथ्वी रूपी तत्व का प्रादुर्भाव हुआ। तत्वों और तन्मात्राओं के इसी उत्पत्ति क्रम से सृष्टि का प्राकट्य होता है।

इस पुराण में धर्म की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि इस चराचर जगत की रचना भगवान द्वारा ही की गयी है।  इसलिए मनुष्य को ऊँच-नीच, जाति-पाँति, तथा वर्ण संकीर्णता को त्यागकर अपने हृदय में समस्त प्राणियों के प्रति आत्मीयता तथा दया का भाव रखना चाहिए। वस्तुतः यही मनुष्य का धर्म है।

इस पुराण में सदाचार का वर्णन करते हुए साररूप में कहा गया है कि संयमी, धार्मिक, दयावान, तपस्वी, सत्यवादी तथा सभी प्राणियों के लिए हृदय में प्रेम का भाव रखने वाले मनुष्य ही भगवान शिव को प्रिय हैं। जो  मनुष्य अपने जीवन में इन गुणों को उतार लेता है उसे ईश्वर सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करते हैं।

इस पुरान में अंधकासुर नामक दैत्य की उत्पत्ति व भगवान शिव द्वारा उसके पराभव  की कथा, विष्णु भगवान द्वारा वाराहावतार धारणकर पृथ्वी के उद्धार की कथा तथा दैत्य जलंधर के उद्धार की कथा वर्णित है। इन सभी कथाओं द्वारा यह समझाने का प्रयास किया गया है कि एक सदाचारी मनुष्य के सद्कर्म उसकी उन्नति के तथा  तथा दुराचारी व्यक्ति के दुष्कर्म उसके पराभव का कारण बनते हैं। ईश्वर इस न्यायपूर्ण व्यवस्था का नियामक है।

लिंग पुराण में दक्ष प्रजापति की कथा, पार्वती जन्म, कामदेव दहन, शिव-पार्वती विवाह, गणेश जन्म, शिव तांडव, तथा उपमन्यु चरित्र का वर्णन बहुत रोचक शैली में किया गया गया है। ये सभी प्रसंग किसी न किसी सकारात्मक उद्देश्य की ओर भी ले जाते हैं। जम्बू-प्लक्ष आदि सात द्वीपों सहित भारतवर्ष का वर्णन, क्षुप-दधीचि की कथा, ध्रुव की कथा व काशी माहात्म्य इत्यादि देखकर लगता है जैसे यह पुस्तक अपने जमाने की ट्रेवेल गाइड के रूप में भी लिखी गयी होगी।

लिंग पुराण के अंतिम भाग में राजा अंबरीष व महाक्रोधी दुर्वासा ऋषि की रोचक कथा का वर्णन है जिसके माध्यम से सदाचार एकादशी व्रत के माहात्म्य का निरूपण किया गया है।

भाग-२: क्रोधी दुर्वासा और अंबरीष की कथा:

प्राचीन समय की बात है। राजा नाभाग के अंबरीष नामक एक प्रतापी पुत्र थे। वे बड़े बीर, बुद्धिमान व तपस्वी राजा थे। वे जानते थे कि जिस धन-वैभव के लोभ में पड़कर प्राणी घोर नरक में जाते हैं वह कुछ ही दिनों का सुख है, इसलिए उनका मन सदैव भगवत भक्ति व दीनों की सेवा में लगा रहता था। राज्याभिषेक के बाद राजा अंबरीष ने अनेक यज्ञ करके भगवान विष्णु की पूजा-उपासना की जिन्होंने प्रसन्न होकर उनकी रक्षा के लिए अपन्ने ‘सुदर्शन चक्र’ को नियुक्त कर दिया।

एक बार अंबरीष ने अपनी पत्नी के साथ द्वादशी प्रधान एकादशी व्रत करने का निश्चय किया। उन्होंने भगवान विष्णु का पूजन किया और ब्राह्मणों को अन्न-धन का भरपूर दान दिया। तभी वहाँ दुर्वासा ऋषि का आगमन हो गया। वे परम तपस्वी व अलौकिक शक्तियों से युक्त थे किंतु क्रोधी स्वभाव के कारण उनकी सेवा-सुश्रुशा में विशेष सावधानी अपेक्षित थी…(जारी)