‘निर्वासन’ में स्त्री विमर्श – प्रेमचंद

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      पिछली पोस्ट में मैने वादा किया था कि आपको प्रेमचंद की एक विलक्षण कहानी पढ़वाऊंगा। लीजिए, कहानी पढ़िए जिसका शीर्षक है – निर्वासन। यह पूरी कहानी संवाद शैली में लिखी गयी है। कहानीकार ने अपनी ओर से कुछ भी नहीं बताया है; लेकिन इस बात-चीत से तत्कालीन समाज में स्त्री की नाजुक स्थिति का जैसा चित्र उभर कर आया है वह मन को विदीर्ण कर देता है। हम उस परंपरा को ढो रहे हैं जिसमें अग्निपरीक्षा देने के बावजूद सीता को जंगल में निर्वासित जीवन बिताना पड़ा। आज भी स्थितियाँ बहुत नहीं सुधरी हैं। क्या आधुनिक स्त्री-विमर्श इस मानसिकता को बदल पाएगा?

निर्वासन

कहानी- प्रेमचंद

   परशुराम- वहीं-वहीं, दालान में ठहरो!

   मर्यादा- क्यों, क्या मुझमें कुछ छूत लग गयी?

   परशुराम- पहले यह बताओ तुम इतने दिनों कहाँ रहीं, किसके साथ रहीं, किस तरह रहीं और फिर यहाँ किसके साथ आयीं? तब, तब विचार… देखी जायगी।

   मर्यादा- क्या इन बातों के पूछने का यही वक्त है; फिर अवसर न मिलेगा?

   परशुराम- हाँ, यही बात है। तुम स्नान करके नदी से तो मेरे साथ ही निकली थीं। मेरे पीछे-पीछे कुछ देर तक आयीं भी; मैं पीछे फिर-फिरकर तुम्हें देखता जाता था, फिर एकाएक तुम कहाँ गायब हो गयीं?

   मर्यादा- तुमने देखा नहीं, नागा साधुओं का एक दल सामने से आ गया। सब आदमी इधर-उधर दौड़ने लगे। मैं भी धक्के में पड़कर जाने किधर चली गयी। जरा भीड़ कम हुई तो तुम्हें ढूँढ़ने लगी। बासू का नाम ले-लेकर पुकारने लगी, पर तुम न दिखायी दिये।

   परशुराम- अच्छा तब?

   मर्यादा- तब मैं एक किनारे बैठकर रोने लगी, कुछ सूझ ही न पड़ता कि कहाँ जाऊँ, किससे कहूँ, आदमियों से डर लगता था। संध्या तक वहीं बैठी रोती रही।

   परशुराम- इतना तूल क्यों देती हो? वहाँ से फिर कहाँ गयीं?

   मर्यादा- संध्या को एक युवक ने आकर मुझसे पूछा, तुम्हारे घर के लोग खो तो नहीं गये हैं? मैंने कहा- हाँ। तब उसने तुम्हारा नाम, पता ठिकाना पूछा। उसने सब एक किताब पर लिख लिया और मुझसे बोला- मेरे साथ आओ, मैं तुम्हें तुम्हारे घर भेज दूँगा।

   परशुराम- वह आदमी कौन था?

   मर्यादा- वहाँ की सेवा-समिति का स्वयंसेवक था।

   परशुराम- तो तुम उसके साथ हो लीं?

   मर्यादा- और क्या करती ? वह मुझे समिति के कार्यालय में ले गया। वहाँ एक शामियाने में एक लम्बी दाढ़ीवाला मनुष्य बैठा हुआ कुछ लिख रहा था। वही उन सेवकों का अध्यक्ष था। और भी कितने ही सेवक वहाँ खड़े थे। उसने मेरा पता-ठिकाना रजिस्टर में लिखकर मुझे एक अलग शामियाने में भेज दिया, जहाँ और भी कितनी खोयी हुई स्त्रियाँ बैठी हुई थीं।

   परशुराम- तुमने उसी वक्त अध्यक्ष से क्यों न कहा कि मुझे पहुँचा दीजिए?

   मर्यादा- मैंने एक बार नहीं सैकड़ों बार कहा; लेकिन वह यही कहते रहे, जब तक मेला न खत्म हो जाय और सब खोयी हुई स्त्रियाँ एकत्र न हो जायँ, मैं भेजने का प्रबन्ध नहीं कर सकता। मेरे पास न इतने आदमी हैं, न इतना धन।

   परशुराम- धन की तुम्हें क्या कमी थी, कोई एक सोने की चीज बेच देती तो काफी रुपये मिल जाते।

   मर्यादा- आदमी तो नहीं थे।

   परशुराम- तुमने यह कहा था कि खर्च की कुछ चिंता न कीजिए, मैं अपना गहना बेचकर अदा कर दूँगी?

   मर्यादा- नहीं, यह तो मैंने नहीं कहा।

   परशुराम- तुम्हें उस दशा में भी गहने इतने प्रिय थे?

   मर्यादा- सब स्त्रियाँ कहने लगीं, घबरायी क्यों जाती हो? यहाँ किस बात का डर है। हम सभी जल्द से जल्द अपने घर पहुँचना चाहती हैं; मगर क्या करें? तब मैं भी चुप हो रही।

   परशुराम- और सब स्त्रियाँ कुएँ में गिर पड़तीं तो तुम भी गिर पड़तीं?

   मर्यादा- जानती तो थी कि यह लोग धर्म के नाते मेरी रक्षा कर रहे हैं, कुछ मेरे नौकर या मजूर नहीं हैं, फिर आग्रह किस मुँह से करती? यह बात भी है कि बहुत-सी स्त्रियों को वहाँ देखकर मुझे कुछ तसल्ली हो गयी।

   परशुराम- हाँ, इससे बढ़कर तस्कीन की और क्या बात हो सकती थी? अच्छा, वहाँ कै दिन तस्कीन का आनन्द उठाती रहीं? मेला तो दूसरे ही दिन उठ गया होगा?

   मर्यादा- रात-भर मैं स्त्रियों के साथ उसी शामियाने में रही।

   परशुराम- अच्छा, तुमने मुझे तार क्यों न दिलवा दिया?

   मर्यादा- मैंने समझा, जब यह लोग पहुँचाने को कहते ही हैं तो तार क्यों दूँ?

   परशुराम- खैर, रात को तुम वहीं रहीं। युवक बार-बार भीतर आते-जाते रहे होंगे।

   मर्यादा- केवल एक बार एक सेवक भोजन के लिए पूछने आया था, जब हम सबों ने खाने से इनकार कर दिया तो वह चला गया और फिर कोई न आया। मैं रात-भर जागती ही रही।

   परशुराम- यह मैं कभी न मानूँगा कि इतने युवक वहाँ थे और कोई अंदर न गया होगा। समिति के युवक आकाश के देवता नहीं होते। खैर, वह दाढ़ीवाला अध्यक्ष तो जरूर ही देखभाल करने गया होगा?

   मर्यादा- हाँ, वह आते थे; पर द्वार पर से पूछ-पूछकर लौट जाते थे। हाँ, जब एक महिला के पेट में दर्द होने लगा था तो दो-तीन बार दवाएँ पिलाने आये थे।

   परशुराम- निकली न वही बात! मैं इन धूर्तों की नस-नस पहचानता हूँ। विशेषकर तिलक-मालाधारी दढ़ियलों को मैं गुरुघंटाल ही समझता हूँ। तो वह महाशय कई बार दवाएँ देने गये? क्यों, तुम्हारे पेट में तो दर्द नहीं होने लगा था?

   मर्यादा- तुम एक साधु पर आक्षेप कर रहे हो। वह बेचारे एक तो मेरे बाप के बराबर थे, दूसरे आँखें नीची किये रहने के सिवाय कभी किसी पर सीधी निगाह नहीं करते थे।

   परशुराम- हाँ, वहाँ सब देवता ही देवता जमा थे। खैर, तुम रात-भर वहाँ रहीं। दूसरे दिन क्या हुआ?

   मर्यादा- दूसरे दिन भी वहीं रही। एक स्वयंसेवक हम सब स्त्रियों को साथ लेकर मुख्य-मुख्य पवित्र स्थानों का दर्शन कराने गया। दोपहर को लौट कर सबों ने भोजन किया।

   परशुराम- तो वहाँ तुमने सैर-सपाटा भी खूब किया, कोई कष्ट न होने पाया। भोजन के बाद गाना-बजाना हुआ होगा?

   मर्यादा- गाना-बजाना तो नहीं; हाँ, सब अपना-अपना दुखड़ा रोती रहीं। शाम तक मेला उठ गया तो दो सेवक हम लोगों को लेकर स्टेशन पर आये।

   परशुराम- मगर तुम तो आज सातवें दिन आ रही हो और वह भी अकेली?

   मर्यादा- स्टेशन पर एक दुर्घटना हो गयी।

   परशुराम- हाँ, यह तो मैं समझ ही रहा था। क्या दुर्घटना हुई?

   मर्यादा- जब सेवक टिकट लेने जा रहा था, तो एक आदमी ने आकर उससे कहा- यहाँ गोपीनाथ की धर्मशाला में एक बाबूजी ठहरे हुए हैं, उनकी स्त्री खो गयी है, उनका भला-सा नाम है, गोरे-गोरे लम्बे-से खूबसूरत आदमी हैं, लखनऊ मकान है, झबाई टीले में। तुम्हारा हुलिया उसने ऐसा ठीक बयान किया कि मुझे उस पर विश्वास आ गया। मैं सामने आकर बोली, तुम बाबू जी को जानते हो? वह हँसकर बोला, जानता नहीं हूँ तो तुम्हें तलाश क्यों करता फिरता हूँ। तुम्हारा बच्चा रो-रोकर हलाकान हो रहा है। सब औरतें कहने लगीं, चली जाओ, तुम्हारे स्वामीजी घबरा रहे होंगे। स्वयंसेवक ने उससे दो-चार बातें पूछकर मुझे उसके साथ कर दिया। मुझे क्या मालूम था कि मैं किसी नर-पिशाच के हाथों में पड़ी जाती हूँ। दिल में खुशी थी कि अब बासू को देखूँगी, तुम्हारे दर्शन करूँगी। शायद इसी उत्सुकता ने मुझे असावधान कर दिया।

   परशुराम- तो तुम उस आदमी के साथ चल दीं? वह कौन था?

   मर्यादा- क्या बतलाऊँ कौन था? मैं तो समझती हूँ, कोई दलाल था?

   परशुराम- तुम्हें यह न सूझी कि उससे कहतीं, जाकर बाबूजी को भेज दो?

   मर्यादा- अदिन आते हैं तो बुध्दि भ्रष्ट हो जाती है।

   परशुराम- कोई आ रहा है।

   मर्यादा- मैं गुसलखाने में छिपी जाती हूँ।

   परशुराम- आओ भाभी, क्या अभी सोयी नहीं, दस तो बज गये होंगे।

   भाभी- वासुदेव को देखने को जी चाहता था भैया, क्या सो गया?

   परशुराम- हाँ, वह तो अभी रोते-रोते सो गया है।

   भाभी- कुछ मर्यादा का पता मिला? अब पता मिले तो भी तुम्हारे किस काम की। घर से निकली हुई स्त्रियाँ थान से छूटी हुई घोड़ी है जिसका कुछ भरोसा नहीं।

   परशुराम- कहाँ से कहाँ मैं उसे लेकर नहाने गया।

   भाभी- होनहार है भैया, होनहार! अच्छा तो मैं जाती हूँ।

   मर्यादा- (बाहर आकर) होनहार नहीं है, तुम्हारी चाल है। वासुदेव को प्यार करने के बहाने तुम इस घर पर अधिकार जमाना चाहती हो।

   परशुराम- बको मत! वह दलाल तुम्हें कहाँ ले गया?

   मर्यादा- स्वामी, यह न पूछिए, मुझे कहते लज्जा आती है।

   परशुराम- यहाँ आते तो और भी लज्जा आनी चाहिए थी।

   मर्यादा- मैं परमात्मा को साक्षी देती हूँ, कि मैंने उसे अपना अंग भी स्पर्श नहीं करने दिया।

   परशुराम- उसका हुलिया बयान कर सकती हो?

   मर्यादा- साँवला-सा छोटे डील का आदमी था। नीचा कुरता पहने हुए था।

   परशुराम- गले में ताबीजें भी थीं?

   मर्यादा- हाँ, थीं तो।

   परशुराम- वह धर्मशाले का मेहतर था। मैंने उससे तुम्हारे गुम हो जाने की चर्चा की थी। उस दुष्ट ने उसका वह स्वाँग रचा।

   मर्यादा- मुझे तो वह कोई ब्राह्मण मालूम होता था।

   परशुराम- नहीं मेहतर था। वह तुम्हें अपने घर ले गया?

   मर्यादा- हाँ, उसने मुझे ताँगे पर बैठाया और एक तंग गली में, एक छोटे-से मकान के अंदर ले जाकर बोला, तुम यहीं बैठो, तुम्हारे बाबूजी यहीं आयेंगे। अब मुझे विदित हुआ कि मुझे धोखा दिया गया। रोने लगी। वह आदमी थोड़ी देर के बाद चला गया और एक बुढ़िया आकर मुझे भाँति-भाँति के प्रलोभन देने लगी। सारी रात रोकर काटी। दूसरे दिन दोनों फिर मुझे समझाने लगे कि रो-रोकर जान दे दोगी, मगर यहाँ कोई तुम्हारी मदद को न आयेगा। तुम्हारा एक घर छूट गया। हम तुम्हें उससे कहीं अच्छा घर देंगे जहाँ तुम सोने के कौर खाओगी और सोने से लद जाओगी। जब मैंने देखा कि यहाँ से किसी तरह नहीं निकल सकती तो मैंने कौशल करने का निश्चय किया।

   परशुराम- खैर,सुन चुका। मैं तुम्हारा ही कहना मान लेता हूँ कि तुमने अपने सतीत्व की रक्षा की, पर मेरा हृदय तुमसे घृणा करता है, तुम मेरे लिए फिर वह नहीं हो सकती जो पहले थीं। इस घर में तुम्हारे लिए स्थान नहीं है।

   मर्यादा- स्वामीजी, यह अन्याय न कीजिए, मैं आपकी वही स्त्री हूँ जो पहले थी। सोचिए, मेरी क्या दशा होगी?

   परशुराम- मैं यह सब सोच चुका और निश्चय कर चुका। आज छ: दिन से यही सोच रहा हूँ। तुम जानती हो कि मुझे समाज का भय नहीं है। छूत-विचार को मैंने पहले ही तिलांजलि दे दी, देवी-देवताओं को पहले ही विदा कर चुका; पर जिस स्त्री पर दूसरी निगाहें पड़ चुकीं, जो एक सप्ताह तक न-जाने कहाँ और किस दशा में रही, उसे अंगीकार करना मेरे लिए असम्भव है। अगर यह अन्याय है तो ईश्वर की ओर से है, मेरा दोष नहीं।

   मर्यादा- मेरी विवशता पर आपको जरा भी दया नहीं आती?

   परशुराम- जहाँ घृणा है वहाँ दया कहाँ? मैं अब भी तुम्हारा भरण-पोषण करने को तैयार हूँ। जब तक जीऊँगा, तुम्हें अन्न-वस्त्र का कष्ट न होगा। पर तुम मेरी स्त्री नहीं हो सकतीं।

   मर्यादा- मैं अपने पुत्र का मुँह न देखूँ अगर किसी ने मुझे स्पर्श भी किया हो।

   परशुराम- तुम्हारा किसी अन्य पुरुष के साथ क्षण-भर भी एकांत में रहना तुम्हारे पतिव्रत को नष्ट करने के लिए बहुत है। यह विचित्र बंधन है, रहे तो जन्म-जन्मांतर तक रहे; टूटे तो क्षण-भर में टूट जाय। तुम्हीं बताओ, किसी मुसलमान ने जबरदस्ती मुझे अपना उच्छिष्ट भोजन खिला दिया होता तो तुम मुझे स्वीकार करतीं?

   मर्यादा- वह…वह…तो दूसरी बात है।

   परशुराम- नहीं, एक ही बात है। जहाँ भावों का संबंध है, वहाँ तर्क और न्याय से काम नहीं चलता। यहाँ तक कि अगर कोई कह दे कि तुम्हारे पानी को मेहतर ने छू लिया है तब भी उसे ग्रहण करने से तुम्हें घृणा आयेगी। अपने ही दिल से सोचो कि तुम्हारे साथ न्याय कर रहा हूँ या अन्याय?

   मर्यादा- मैं तुम्हारी छुई हुई चीजें न खाती, तुमसे पृथक् रहती, पर तुम्हें घर से तो न निकाल सकती थी। मुझे इसीलिए न दुत्कार रहे हो कि तुम घर के स्वामी हो और समझते हो कि मैं इसका पालन करता हूँ।

   परशुराम- यह बात नहीं है। मैं इतना नीच नहीं हूँ।

   मर्यादा- तो तुम्हारा यह अंतिम निश्चय है?

   परशुराम- हाँ, अंतिम।

   मर्यादा- जानते हो इसका परिणाम क्या होगा?

   परशुराम- जानता भी हूँ और नहीं भी जानता।

   मर्यादा- मुझे वासुदेव को ले जाने दोगे?

   परशुराम- वासुदेव मेरा पुत्र है।

   मर्यादा- उसे एक बार प्यार कर लेने दोगे?

   परशुराम- अपनी इच्छा से नहीं, तुम्हारी इच्छा हो तो दूर से देख सकती हो।

   मर्यादा तो जाने दो, न देखूँगी। समझ लूँगी कि विधवा भी हूँ और बाँझ भी। चलो मन! अब इस घर में तुम्हारा निबाह नहीं। चलो जहाँ भाग्य ले जाय!

 

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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हिंदी में लिखा जा रहा साहित्य प्रायः प्रासंगिक नहीं है

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प्रोफेसर गंगा प्रसाद विमल ने ‘शुक्रवारी’ में रखी बेबाक राय…

शुक्रवारी चर्चा आजकल जबर्दस्त फॉर्म में है। माहिर लोग जुटते जा रहे हैं और हम यहाँ बैठे लपक लेते हैं उनके विचार और उद्‌गार। इस विश्वविद्यालय की किसी कक्षा में मैं नहीं गया ; क्योंकि न यहाँ का विद्यार्थी हूँ और न ही शिक्षक हूँ। लेकिन एक से एक आला अध्यापकों को सुनने का मौका मिल रहा है जो देश और विदेश के अलग-अलग विश्वविद्यालयों और दूसरे शिक्षा केंद्रों में लंबे समय तक पढ़ाते रहे हैं। विषय भी देश की नब्ज टटोलने वाले। पिछले दिन अशोक चक्रधर जी आये तो कंप्यूटर और इंटरनेट पर हिंदी की दशा और दिशा पर अपने तीस-चालीस साल के अनुभव बताकर गये। पूरी तरह अपडेटेड लग रहे थे। रिपोर्ट यहाँ है। उसके पहले विनायक सेन को हुई सजा के बहाने नक्सलवादी आंदोलन के हिंसक स्वरूप और मानवाधिकार संबंधी मूल्यों की चर्चा गांधी हिल के मुक्तांगन में हुई। राजकिशोर जी ने अपनी कविता के साथ विनायक सेन का भरपूर समर्थन व्यक्त किया तो कुलपति विभूतिनारायण राय ने स्पष्ट किया कि उनके साथ सहानुभूति रखते हुए भी हम इतना जरूर याद दिलाना चाहेंगे कि आज के जमाने में राजसत्ता को हिंसा के भय से दबाया नहीं जा सकता। किसी हिंसक आंदोलन को समर्थन देना उचित नहीं है। हाँ, मनुष्यता की रक्षा के लिए जरूरी है कि विनायक सेन जैसे लोग जेल से बाहर रहें और स्वतंत्र होकर समाज के दबे-कुचले लोगों के लिए कार्य कर सकें।

इस बार शुक्रवारी के संयोजक राजकिशोर जी ने चर्चा का विषय रखा था- वर्तमान समय में साहित्य की प्रासंगिकता; और बिशिष्ट वक्ता के रूप में बुलाया था प्रो. गंगा प्रसाद विमल को।

प्रो.गंगा प्रसाद विमल जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इसके पहले वे केंद्रीय हिंदी निदेशालय में निदेशक पद पर भी कार्यरत थे। आप एक सुपरिचित कवि और उपन्यासकार के रूप में जाने जाते हैं। विमल जी के एक उपन्यास ‘मृगांतर’ पर हॉलीवुड में एक फिल्म भी बन चुकी है और इसका जर्मन भाषा में अनुवाद भी छप चुका है। चाय की चुस्कियों के बीच आपने हल्के मूड में जो बातें कहीं वो बहुत गम्भीर किस्म की थीं।

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बाएँ से:राजकिशोर,ए.अरविंदाक्षन,विमल

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बोले- साहित्य की प्रासंगिकता सदा से रही है। आज भी बनी हुई है। इसका सबूत यह है कि आज भी साहित्य का डर मौजूद है। समाज का प्रभु वर्ग आज भी साहित्य के प्रभाव के प्रति सतर्क रहता है। एक अमेरिकी लेखक ने उपन्यास लिखा- ‘पैलेस ऑफ़ मिरर्स’। इसमें उन्होंने चार बड़े अमेरिकी व्यावसायिक घरानों की पोल पट्टी खोल कर रख दी थी।  इसपर उनके प्राण संकट में पड़ गये। उन्हें मार डालने के लिए माफ़िया ने सुपारी दे दी। किताब का प्रकाशक बहादुर और जिम्मेदार निकला। लेखक को पाताल में छिपा दिया। उनकी रॉयल्टी पाबंदी से भेज देता है और सुरक्षा जरूरतों को पूरा करता है। लेखक गुमनाम और भूमिगत है, लेकिन उसका रचा साहित्य खलबली मचा रहा है।

सलमान रुश्दी की किताब का नाम भी उन्होंने लिया। बोले- इसके चालीस पृष्ठ पढ़कर मैने छोड़ दिया था। कलात्मक दृष्टि से मुझे यह उपन्यास बहुत घटिया लगा। इसके रूपक भद्दे और बेकार लगे। फिर जब इसकी चर्चा बहुत हो ली तो मैने ‘मनुष्य जाति को इस्लाम का योगदान’ विषयक एम.एन.रॉय की पुस्तक पढ़ने के बाद इसे दुबारा पढ़ा। तब मुझे यह किताब कुछ समझ में आनी शुरू हुई। उन्होंने इस पुस्तक में बहुत बारीकी से मनुष्यता विरोधी विचारण को निरूपित किया है। यह विचारण किसी धर्म की रचना नहीं कर सकता। जिन लोगों ने उसे अपने धर्म का दुश्मन मान लिया वे मूर्ख हैं। वे ऐसे लोग हैं जो सत्य से डरते हैं। सलमान रुश्दी मनुष्यता का दुश्मन नहीं है बल्कि मूर्खों को उससे दुश्मनी है।

ये उदाहरण बताते हैं कि साहित्य कितना बड़ा प्रभाव छोड़ सकता है। लेकिन हिंदी के साहित्य जगत पर दृष्टिपात करें तो निराशा ही हाथ लगती है। यहाँ ऐसी प्रासंगिक रचनाये प्रायः नहीं लिखी जा रही हैं। मनुष्यता के जो सही सवाल हैं उन्हें ठीक से नहीं उठाया जा रहा है। यह साहित्य पढ़कर मन में बेचैनी नहीं उठती। कोई एक्सटेसी महसूस नहीं होती। यहाँ प्रायोजित लेखन अधिक हो रहा है। एक खास समूह और वर्ग में रहकर उसके अनुकूल साहित्य रचा जा रहा है। पुरस्कारों के लिए लिखा जा रहा है। आपकी साहित्यिक प्रतिभा का मूल्यांकन इस या उस गुट की सदस्यता के आधार पर किया जा रहा है।

यहाँ भी शोषक और शोषित का समाजशास्त्र विकसित हो चुका है। जो लोग सबसे अधिक दबे-कुचले वर्ग की बात करते हैं वे ही मौका मिलने पर शोषक वर्ग में शामिल हो जाते हैं। केरल और पश्चिम बंगाल में सबसे पहले वामपंथी सरकारें बनी। बंगाल में तो एक अरसा हो गया। लेकिन विडम्बना देखिए कि आज भी कलकत्ते में हाथगाड़ी पर ‘आदमी को खींचता आदमी’ मिल जाएगा। मार्क्स का नाम जपने वाले वामपंथी सत्ता प्राप्त करने के बाद कांग्रेस की तरह व्यवहार करने लगे और पूँजीपतियों को लाभ पहुँचाने वाली नीतियाँ बनाने लगे। यह दो-मुँहापन यहीं देखने को मिलता है। साहित्य जगत में भी ऐसी ही प्रवृत्तियाँ व्याप्त हैं।

ऐसी निराशाजनक स्थिति हिंदी साहित्य के क्षेत्र में खूब मिलती है। विरोधी खेमे को घेरकर चारो ओर से हमला किया जाता है। लेकिन यूरोप में स्थिति दूसरी है। फ्रांस में द’ गाल के शासनकाल में सार्त्र द्वारा उनका विरोध बड़े आंदोलन का रूप ले रहा था। सार्त्र को जेल में डाल देने की सलाह पर द’ गाल ने कहा कि मैं फ्रांस को गिरफ़्तार नहीं कर सकता। विरोधी विचार का सम्मान करना हिंदी पट्टी ने नहीं सीखा है। यहाँ पार्टी लाइन पर चलकर जो विरोध होता है वह भोथरे किस्म का होता हैं। तलवार की धार कुंद हो चुकी है। गदा जैसा प्रहार हो रहा है। प्राणहीन सा। हिंदी में जो कृतियाँ आ रही हैं वे निष्प्राण सी हैं। मन को उद्वेलित करने वाला कुछ नहीं आ रहा है।

वे पूछते हैं कि क्या स्वतंत्रता के बाद के साठ साल में ऐसी कोई घटना नहीं हुई जिसपर उत्कृष्ट साहित्य रचा जा सके। इंदिरा गांधी द्वारा लगाया गया आपात काल हो या पाकिस्तान के साथ लड़े गये युद्ध हों; या चीन के साथ हुआ संघर्ष। इन घटनाओं ने हिंदी साहित्यकारों को उद्वेलित नहीं किया। इनपर कोई बड़ी कृति सामने नहीं आयी। सुनामी जैसी प्राकृतिक विपदा भी मनुष्यता के पक्ष में साहित्यकारों को खड़ा नहीं कर सकी। क्या कारण है कि बड़ी से बड़ी घटनाएँ हमें विचलित नहीं करती। कड़वे यथार्थ से तालमेल बिठाने में हिंदी साहित्य असफल सा रहा है।

इतनी निराशा भरी बातें कहने के बाद उन्होंने पहलू बदला और बोले कि ऐसा नहीं है कि अच्छी प्रतिभाएँ हमारे बीच नहीं है। मुश्किल बस ये है कि उनका लिखा सामने नहीं आ पाता। आलोचना के जो बड़े मठ हैं वे इसे आने नहीं देते। उनकी देहरी पर माथा टेकने वाला ही पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पाता है। समीक्षा उसी की हो पाती है जो उस परिवार का अंग बनने को तैयार होता है। राजकिशोर जी ने गुटबंदी की बात का समर्थन करते हुए विनोदपूर्वक कहा कि ‘यदि आप हमारे किरायेदार हैं तो आप सच्चे साहित्यकार हैं; यदि आप दूसरे के घर में हैं या अपना स्वतंत्र घर जमाने की कोशिश में हैं तो आपका साहित्य दो कौड़ी का भी नहीं है। एक खास विचारधारा का पोषण यदि आप नहीं करते तो आप अप्रासंगिक हैं।

मीडिया ने भी साहित्य जगत का और हिंदी भाषा का बड़ा नुकसान किया है। शब्द बदल गये हैं, शैली दूषित हो गयी है, वाक्य रचना अंग्रेजी की कार्बन कॉपी जैसी हो गयी है। कृतियों पर अंग्रेजी प्रभाव होता जा रहा है। नकल के आरोप भी खुलकर आ रहे हैं। मौलिकता समाप्त सी होती जा रही है।

आज हम सबका दायित्व है कि हम हिंदी में लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य को सामने लायें। मनुष्यता के मुद्दे उठाने वाली रचनाओं को तलाशें। संकुचित सोच के दायरे से बाहर आकर विराट धरातल पर विचार करें। मैं हद दर्जे का आशावादी भी हूँ। कुछ लोग बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं। लेकिन उनकी संख्या अत्यल्प है। इसे कैसे बढ़ाया जाय इसपर विचार किया जाना चाहिए।

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विमल जी की बात समाप्त होने के बाद प्रश्न उत्तर का दौर चला। कई लोगों ने कई कारण गिनाए। मैंने पिछले दिनों श्रीप्रकाश जी की शुक्रवारी वार्ता के हवाले से बताया कि अच्छी रचना तब निकल कर आती है जब कोई बड़ा आंदोलन चल रहा हो। क्रांति का समय हो। शांतिकाल में तो साधारण बैद्धिक जुगाली ही होती रहती है। मुद्दों को तलाशना पड़ता है। इसपर जर्मनी से आये एक हिंदी अध्यापक ने अनेक ताजा मुद्दे गिनाये। दलित और स्त्री संबंधी विमर्श की चर्चा की। प्रायः सबने इसका समर्थन किया। लेकिन इन मुद्दों पर भी अच्छी रचनाओं की दरकार से प्रायः सभी सहमत थे। विदेशी मेहमान ने यह भी बताया कि यूरोप में हिंदी रचनाओं को ‘पश्चिम की नकल’ पर आधारित ही माना जाता है।

विमल जी ने हिंदी साहित्य के पाठकों की भी कमी के प्रति चिंता जाहिर की। बोले कि अब अच्छी रचनाओं के लिए भी पाठक नहीं मिलते। जेब से पैसा खर्च करके हिंदी की किताबें खरीदने और पढ़ने वालों की संख्या बहुत कम है। इसके लिए वे ‘अध्यापक समाज’ को दोषी ठहराते हैं। कह रहे थे कि आजकल के अध्यापक न तो अपना पैसा खर्च करके किताबें खरीदते हैं, न पढ़ते हैं और न ही अपने छात्रों व दूसरे लोगों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। उन्होंने बताया कि यदि उन्हें कोई अच्छी किताब मिल जाती है तो कम से कम सौ लोगों को उसे पढ़ने के लिए बताते हैं।

अन्य के साथ राजकिशोर जी ने अच्छी रचनाओं की कमी होने की बात का प्रतिवाद किया। बोले- मैं आपको हिंदी की कुछ मौलिक कृतियों का नाम बताता हूँ। आप इनके मुकाबले खड़ा हो सकने लायक एक भी अंग्रेजी पुस्तक का नाम बता पाइए तो बोलिएगा…। उन्होंने नाम बताने शुरू किए जिसमें दूसरे लोगों ने भी जोड़ा- श्रीलाल शुक्ल की `राग दरबारी’, रेणु का `मैला आँचल’, रांगेय राघव का `कब तक पुकारूँ’, यशपाल की `दिव्या’, अज्ञेय का `नदी के द्वीप’, अमृतलाल नागर का `बूँद और समुद्र’, भगवतीचरण वर्मा की `चित्रलेखा’, हजारी प्रसाद द्विवेदी की `बाणभट्ट की आत्मकथा’, आदि-आदि। किसी ने चुनौती देते हुए जोड़ा कि निराला की कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ यदि नकल पर आधारित है तो इसका असल अंग्रेजी रूप ही दिखा दीजिए। इसकी पहली पंद्रह पंक्तियों का अनुवाद ही करके कोई दिखा दे। इसके बाद और भी अनेक रचनाओं का नाम लिया जाने लगा।

अंततः मुझे विमल जी से उनके प्रारम्भिक वक्तव्य की पुष्टि करानी पड़ी। उन्होंने माना कि अपनी इस बात को स्वीकार करने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं है कि साहित्य की प्रासंगिकता बनी हुई है लेकिन हिंदी में जो लिखा जा रहा है उसमें अधिकांश प्रासंगिक नहीं है। उन्होंने पहले यह भी बताया था कि वे एक नियमित स्तंभ लिखते रहे हैं जिसका नाम है ‘अप्रासंगिक’।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

ऎ बहुरिया साँस लऽ, ढेंका छोड़ि दऽ जाँत लऽ

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आज गिरिजेश भैया ने अपनी पोस्ट से गाँव की याद दिला दी। गाँव को याद तो हम हमेशा करते रहते हैं लेकिन आज वो दिन याद आये जब हम गर्मी की छुट्टियों में वहाँ बचपन बिताया करते थे। अपनी ताजी पोस्ट में उन्होंने पुरानी दुपहरी के कुछ बिम्ब उकेरे हैं। एक बिम्ब देखकर सहसा मेरे सामने वह पूरा दृश्य उपस्थित हो गया जो वैशाख-जेठ की दुपहरी में सास-बहू की तू-तू मैं-मैं से उत्पन्न हो सकता है। ये रहा उनकी कविता में रेखांकित बिम्ब और उसके आगे है उसकी पड़ताल-

हुई रड़हो पुतहो
घर में सास पतोहू लड़ीं।
भरी दुपहरी
मर्दों को अगोर रही
दुआरे खटिया खड़ी

इसके पीछे की कहानी यह रही–

धर दिया सिलबट पर
टिकोरा को छीलकर
सास बोल गई
लहसुन संग पीस दे पतोहू
मरिचा मिलाय दई
खोंट ला पुदीना…

बहू जम्हियाय
उठ के न आय

तो…
वहीं शुरू हुआ
रड़हो-पुतहो

धनकुट्टी की टिक टिक हमने भी सुनी है, धान कुटाने को साइकिल के बीच में बोरा लादकर गये भी हैं। ये बात दीगर है कि बहुत छोटी उम्र के कारण हमें धान कुटाने के लिए शारीरिक श्रम नहीं करना पड़ता। दरवाजे पर का आदमी  साथ होता। हम तो केवल उस मशीनी गतिविधि को देखने जाते थे। इंजन की आवाज इतनी तेज कि सभी एक दूसरे से इशारे में ही बात कर पाते। लेकिन वह एक बहुत बड़ी सुविधा थी जो आम गृहस्थ के घर की औरतों को ढेंका और जाँत से मुक्त होने की राह दिखा रही थी। इन्जन मशीन से चलने वाली चक्की और ‘हालर’ ने गाँव की रंगत बदल दी। अब तो हमारी भाषा से कुछ चुटीले मुहावरे इस मशीनी क्रान्ति की भेंट चढ़ गये लगते हैं। आइए देखें कैसे…!

पहले हर बड़े घर में एक ढेंकाघर होता था। ढेंका से कूटकर धान का चावल बनाया जाता था। असल में यह कूटने की क्रिया ही इस यन्त्र से निकली हुई है। आजकल धान की ‘कुटाई’ तो होती ही नहीं। अब तो धान को ‘रगड़कर’ उसकी भूसी छुड़ाई जाती है। ढेंका के रूप में लकड़ी का एक लम्बा सुडौल बोटा दो खूंटों के बीच क्षैतिज आलम्ब पर टिका होता था जो लीवर के सिद्धान्त पर काम करता था। इसके एक सिरे पर मूसल जड़ा होता था जिसका निचला सिरा धातु से मढ़ा हुआ होता था। इस मूसल के ठीक नीचे जमीन की सतह पर ओखली का मुँह होता। आलम्ब के दूसरी ओर ढेंका का छोटा हिस्सा होता जिसपर पैर रखकर नीचे दबाया जाता था। नीचे दबाने पर इसका अगला हिस्सा ऊपर उठ जाता और छोड़ देने पर मूसल तेजी से ओखली में चोट करता। ओखली में रखे धान पर बार-बार के प्रहार से चावल और भूसी अलग-अलग हो जाते। इसे बाद में निकाल कर सूप से फटक लिया जाता।

मूसल के अग्र भाग को थोड़ा भोथरा रखते हुए इसी ढेंका से चिउड़ा कूटने का काम भी हो जाता था। धान को कुछ घण्टॆ पानी में भिगोकर निकाल लिया जाता है। फिर उसे कड़ाही में भूनकर गर्म स्थिति में ही ओखली में डालकर कूट लिया जाता है। चलते हुए मूसल के साथ ताल-मेल बनाकर ओखली के अनाज को चलाते रहना भी एक कमाल का कौशल मांगता है। मूसल की चोट से नौसिखिए की अंगुलियाँ कट जाने या टूट जाने की दुर्घटना प्रायः होती रहती थी। ओखली से अनाज बाहर निकालते समय ढेंका को ऊपर टिकाए रखने के लिए एक मुग्‌दर जैसी लकड़ी का प्रयोग होता था जिसे उसके नीचे खड़ा कर उसीपर ढेंका टिका दिया जाता था।

गेंहूँ से आटा बनाने के लिए भी हाथ से चलने वाली चक्की अर्थात्‌ ‘जाँता’ का प्रयोग किया जाता था। जाँता की मुठिया पकड़कर महिलाएं भारी भरकम चक्की को घुमातीं और गेंहूँ इत्यादि ऊपर बने छेद से डालते हुए उसका आटा तैयार करती। चक्की से बाहर निकलते आटे को सहेजने के लिए कच्ची मिट्टी का घेरा बना होता था। इसे बनाने के लिए दक्ष औरतों द्वारा तालाब की गीली मिट्टी से इसकी आकृति तैयार कर धूप में सुखा लिया जाता था। जाँता चलाते हुए इस अवसर पर पाराम्परिक लोकगीत भी गाये जाते जिन्हें जँतसार कहते थे। पं. विद्यानिवास मिश्र ने इन गीतों का बहुत अच्छा संकलन अपनी एक पुस्तक में किया है।

ढेंका-जाँत

ये दोनो यन्त्र गृहस्थी के बहुत जरूरी अंग हुआ करते थे। जिन गरीब घरों में ये उपलब्ध नहीं थे उन्हें अपने पड़ोसी से इसकी सेवा निःशुल्क मिल जाती थी। घर की बड़ी बूढ़ी औरतें इन यन्त्रों की देखभाल करती। बहुओं को भी बहुत जल्द इनका प्रयोग करना सीखना पड़ता था। जिन घरों में नौकर-चाकर होते उन घरों में यह काम वे ही करते। यहाँ तक आते-आते मेरी ही तरह आप के दिमाग में भी दो-तीन मुहावरे और लोकोक्तियाँ आ ही गयी होंगी। नयी पीढ़ी के बच्चों को शायद यह किताब से रटना पड़े कि ‘ओखली में सिर दिया तो मूसलॊं से क्या डरना’ का मतलब क्या हुआ। लेकिन जिसने ओखली में धुँआधार मूसल गिरते देखा हो उसे कुछ समझाने की जरूरत नहीं। गेंहूँ के साथ घुन भी कैसे पिस जाते हैं यह समझाने की जरूरत नहीं है।

कबीर दास जी ने यही चक्की देखी थी जब वे इस संसार की नश्वरता पर रो पड़े थे।

चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोय।

दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय॥

आपको अपने आस-पास ऐसे लोग मिल जाएंगे जो कोई भी काम करने में कमजोरी जाहिर कर देते हैं। किसी काम में लगा देने पर बार-बार उसके समाप्त होने की प्रतीक्षा करते हैं और ऐसे उपाय अपनाते हैं कि कम से कम मेहनत में काम पूरा हो जाय। ऐसे लोगों के लिए एक भोजपुरी कहावत है- “अब्बर कुटवैया हाली-हाली फटके” अब इस लोकोक्ति का अर्थ तभी जाना जा सकता है जब ढेंका से धान कूटने की प्रक्रिया पता हो। ढेंका चलाने में काफी मेहनत लगती है। कमजोर आदमी लगातार इसे नहीं चला सकता, इसलिए वह सुस्ताने के लिए धान से भूसी फटक कर अलग करने का काम जल्दी-जल्दी यानि कम अन्तराल पर ही करता रहता है।

आपने सौ प्याज या सौ जूते खाने की बोधकथा सुनी होगी। इसका प्रयोग तब होता है जब दो समान रूप से कठिन विकल्पों में से एक चुनने की बात हो और यह तय करना मुश्किल हो कि कौन वाला विकल्प कम कष्टदायक है। ऐसे में हश्र यह होता है कि अदल-बदलकर दोनो काम करने पड़ते हैं। इसी सन्दर्भ में हमारे ग्रामीण वातावरण में यह कहावत पैदा हुई होगी जब बहू को बहुत देर से ढेंका चलाते हुए देखकर उसकी सास प्यार से कहती है कि ऐ बहू, थोड़ा ब्रेक ले लो। तुम थक गयी होगी इसलिए ढेंका चलाना छोड़ दो और जाँता चलाना शुरू कर दो यानि धान कूटने के बजाय गेंहूँ पीस डालो।

ऎ बहुरिया साँस लऽ, ढेंका छोड़ि दऽ जाँत लऽ

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

तेली के बैल का गोल-गोल चक्कर…

9 टिप्पणियाँ

 

इस पूरे प्रकरण पर कुछ नया कहने लायक बचा ही नहीं है। मूल पोस्ट और उसकी चर्चा के बीच अभिमन्यु प्रसंग की याद दिलाती एक अन्य पोस्ट और इन पोस्टों पर आयी टिप्पणियों को आद्योपान्त पढ़ने के बाद मन बड़ा दुविधाग्रस्त हो गया। कुछ बोलें कि न बोलें। जार्ज बुश की प्रसिद्ध उक्ति याद गयी कि आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में आप या तो हमारे साथ हैं या हमारे विरुद्ध हैं। यानि तटस्थता की कोई गुन्जाइश नहीं है।

दोनो ओर से ललकारे जाने के बाद कुछ लोग सफाई देते भी नजर आये। कुछ ऐसा आभास दिया जाने लगा कि अब मानव सभ्यता के इतिहास में कोई युगान्तकारी फैसला होने वाला है। इसके बाद अब दुनिया पहले जैसी नहीं रह जाएगी। अब मानव समाज में केवल दो वर्ग बचेंगे- नर और नारी। बाकी सारे सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक वर्ग-भेद मिट जाएंगे। दलित, पिछड़ा, अगड़ा, अमीर, गरीब, शिक्षित, अशिक्षित, नैतिक, अनैतिक, पारम्परिक, आधुनिक, जैसी टुच्ची धारणाएं इस लैंगिक पहचान की आँधी में उड़ जाएंगी। मुझे तो थोड़ी खुशी भी होने लगी थी। कितना क्रान्तिकारी परिवर्तन हमारी आँखों के सामने मूर्तिमान होने जा रहा था। एक पल को तो मैने सोचा कि अगले दिन के सभी अखबार इस घटना को सबसे बड़ी खबर के रूप में छापेंगे। टीवी चैनेल्स पर बजट की समीक्षा और ढोंगी बाबाओं के कुकर्म की चर्चा से पक चुके दर्शकों को एक ‘बम्फाट’ ब्रेकिंग न्यूज मिलेगी। पैनेल डिस्कशन के लिए समाजशास्त्रियों की पूछ बढ़ जाएगी। विश्वविद्यालयों और शोध संस्थाओं में सेमिनार आयोजित होंगे। पत्रिकाएं विशेषांक निकालेंगी।

इसी खुशी में मुझे रात भर नींद नहीं आयी। ऐसा इसके पहले मेरे साथ सिर्फ़ एक बार हुआ है। जब पहली बार पी.सी.एस. में सेलेक्शन का फाइनल रेजल्ट निकला था [जब लोक सेवा आयोग द्वारा चयनित किये जाने का पहली बार परिणाम घोषित हुआ था- शुद्ध हिन्दी :)]। हॉस्टेल के कमरे में रात भर करवट बदलता रहा था। अगले दिन के अखबार में अपना नाम छपा देखने की उत्सुकता थी।

लेकिन इस बार निराशा हाथ लगी। रविवार की सुबह जस की तस थी। अखबारों में वही हत्या, लूट, बलात्कार, राजनीति, महंगाई, भ्रष्टाचार, दलित उत्पीड़न, प्रशासनिक लापरवाही, प्रेम प्रसंग में फाँसी की सजा, फिल्मी दुनिया, क्रिकेट, व हाँकी विश्वकप की खबरें छायी हुई थीं। विज्ञापनों में भी कमनीय काया की धनी सुन्दरियाँ बदस्तूर मोबाइल से लेकर पुरुष अण्डरवियर, शेविंग क्रीम, कम्प्यूटर, शक्तिवर्द्धक चूर्ण और गाड़ियों के टायर तक बेंच रही थीं। टीवी पर भी एंकर चीख-चीखकर कृपालु महाराज की कृपा से काल-कवलित भक्तगणों के पीछे छूट गये परिवारी जनों का हाल सुना रहा था। राहुल महाजन के स्वयंवर के पटाक्षेप की खबरें ही तारी और जारी थीं। मुझे बड़ा धोखा हुआ जी…

मैने हिन्दी ब्लॉगजगत का दुबारा मुआयना किया। सभी बातें दुबारा पढ़ी। इस बार थोड़ी सावधानी से। उसमें कुछ नया तत्व छाँटने की कोशिश की। इस सारी कोशिश के दौरान मुझे अपने गाँव के सोभई तेली का कोल्हू से तेल पेरना याद आ गया। चूँ..चाँ..चर्र करते लकड़ी के कोल्हू में जुता हुआ बैल गोल-गोल चक्कर लगाता रहता था। सोभई तेली अपने बाकी काम निपटाते हुए बीच-बीच में आकर ‘घानी’ चला दिया करते। बैल की आँख पर मूज की बुनी हुई तश्तरीनुमा डलिया औंधाकर बाँध दी जाती थी ताकि बैल द्वारा पेरी जा रही सरसो खा न ली जाय। वह बैल ढंकी हुई आँखों के साथ उसी गोल दायरे में चक्कर पर चक्कर लगाये जाता था।

यह नर-नारी प्रसंग जिस प्रकार और जितनी बार इस हिन्दी ब्लॉगजगत में उठाया जाता है इसका स्वरूप लगभग उसी गोल-गोल चक्कर वाला ही रहता है। जब कोई नया ब्लॉगर मुद्दे को नये ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास करता है तो कदाचित्‌ अन्य चिठ्ठाकारों के प्रति कोई पूर्वाग्रह मन में रखे बगैर उसकी पोस्ट आती है। लेकिन पहले से तयशुदा खाँचों में फिट दिमाग वाले लोग अपने-अपने हथियारों के साथ या तो उसके संरक्षण का जिम्मा उठा लेते हैं या उसपर पिल पड़ते है। रूढ़ हो चुकी धारणाओं, कुन्द हो चुके तर्कों और प्रगाढ़ हो चुके पूर्वाग्रहों के साथ गोलबन्द हो चुके ब्लॉगरजन अपनी-अपनी भड़ास निकालने वहाँ पहुँच ही जाते हैं। सबकुछ इतना यन्त्रवत्‌ सा लगता है कि आश्चर्य होता है। कोई समाधान दूर-दूर तक नहीं दिखायी देता।

इसबार नया यह हुआ कि माननीयों ने अपनी रही-सही मर्यादा भी ताख पर रख दी और खुलकर दो-दो हाथ कर लेने का उद्‌घोष कर दिया। एक-एक चुनिन्दा शब्दवाण चलाये गये। असली मुद्दा न जाने कहाँ चला गया और ‘दे तेरी की… ले तेरे की’ शुरू हो गयी। वही जाने-पहचाने चेहरे और वही घिसी-पिटी उक्तियाँ, जैसे इस युद्ध में विरोधी को हर हाल में परास्त कर देना है। ऐसे बिगड़े माहौल में एक साझे सत्य को खोजने और पहचानने की मेरी कोशिश कैसे सफल हो? अब यहाँ रवि रतलामी जी अलग-अलग श्रेणियों के टॉप-टेन ब्लॉग की ख्वाहिश भी नहीं कर पा रहे हैं तो इसका दोष हम खुद को न दें तो किसे दें?

मेरी बात पर यदि आपको विश्वास नहीं है तो जुलाई-२००८ में लिखी  हुई मेरी यह कविता पढ़िए। ताजे प्रकरण पर यदि मुझे आज भी लिखना होता तो शायद इसमें कुछ नया जोड़ने की जरूरत न पड़ती:

 

प्रगतिशील स्वातन्त्र्य-प्रेम की लौ जलती है,
समता के अधिकारों की इच्छा पलती है।
इस समाज ने डाल दिये हैं जो भी बन्धन
छिन्न-भिन्न करने देखो,‘नारी’ चलती है॥

घर की देवी, पुण्य-प्रसूता, कुल की रानी,
ममतामयी, सहचरी, प्रिया, बात-बेमानी।
अब दुर्गा, काली का रूप धर रही माया;
करुणा छोड़ ध्वंस करने की इसने ठानी॥

वैवाहिक बंधन अब बेड़ी सा लगता है,
है नर का वर्चस्व, भाव ऐसा जगता है।
इस अन्याय भरी दुनिया के खण्डन से ही;
इनके मन से क्षोभ-कलुष देखो भगता है॥

जंगल के बाहर मनुष्य का वो आ जाना,
नर-नारी के मिलन-प्रणय का नियम बनाना।
घर, परिवार, समाज, देश की रचना करके
कहतीं, “नर ने बुना स्वार्थ का ताना-बाना”॥

पढ़ी ‘सभ्यता के विकास’ की गाथा सबने,
इन्सानी फ़ितरत को अर्स दिया था रब़ ने।
इन कदमों को रोक सकेगी क्या चिन्गारी;
जिसे हवा देती हैं नारीवादी बहनें॥

क्या लम्बी यात्रा पर निकला पुरुष अकेला?
बिन नारी क्या सृजित कर लिया जग का मेला?
इस निसर्ग के कर्णधार से पूछ लीजिये,
जिसने देखी प्रथम-प्रणय की वह शुभ बेला॥

प्रकृति मनुज की है ऐसी, ‘होती गलती है’,
पर विवेक से, संयम से यह भी टलती है।
है ‘सत्यार्थ मित्र’ को पीड़ा चरमपंथ से;
छिन्न-भिन्न करती नारी मन को खलती है॥

(सिद्धार्थ)

पुछल्ला: आज मैं आदरणीय ज्ञान जी के घर गया था। सपरिवार बैठकर खूब गुझिया, नमकीन, सकरपारा, पकौड़ी और कॉफ़ी का आनन्द लिया गया। गुरुदेव अपनी पोस्ट में चाहे जो लिखें लेकिन वे बिल्कुल ठीक-ठाक और सक्रिय हैं। अलबत्ता इस धींगा-मुश्ती से दूरी बनाये हुए हैं। उनकी कुशलता का राज कहीं इस पॉलिसी में ही तो नहीं छिपा हुआ है 🙂
ज्ञानदत्त पाण्डेय जी के साथ DSC02516

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

गृहिणी की कविता

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मन के भीतर उमड़-घुमड़

कुछ बादल सघन

ललक बरसन

पर पछुआ की धार से छितर-बितर

कुछ टुकड़ा इधर

कुछ खाँड़ उधर

 

घर के भीतर की खनखन

कलरव बच्चों का

कि अनबन

घरनी के मन में कुछ तड़पन

फिर ठनगन

उठता नहीं स्वर गगन

बस होती भनभन

मन ही मन

घरवाला अपने में मगन

देख ना सके है अगन

जाने किस बुरी घड़ी

लग गयी थी लगन

मन चाहे अब तोड़कर दीवारें

सरपट भगन

 

निकल नही पाती

मन से सब बात

लिखने को पाती

अब उठते नहीं हाथ

होकर अनाथ

साथ छोड़ रहा साहस

बिलाता एहसास अपनेपन का

दिखता नहीं कुछ भी

मन का

तन का

अब क्या करना

बस पेट भरना

तन कर

अब क्या रहना

बरबस अब है कहना

थाती मिटाती

ये आँधी

युगों ने थी बाँधी

जिस डोर से

चटक रही कैसे

किस ओर से

 

कैसे बतलाए

मन तो सकुचाए

अबतक तो रहे थे अघाए

नहीं….

खेले-खाए-अघाए

जितना भी पाए

उलीच दिया गागर

पर जो थी खाली

सारे मत अभिमत

सिद्ध हुए जाली

रखवाली का भ्रम था

जो करते नहीं थे

बस हो जाती थी

 

एक चिन्गारी लगी

ज्वाला फूटी

निकल पड़ी लेकर लकूटी

टूटी-फूटी…

 

ना ना

यह थी छिद्रहीन साबुत

जिन्दगी से भरी

भरी सी गगरी

न थी पत्थर की बुत

थोड़ी अलसाई

फिर लेती अंगड़ाई

छलक उठी गागर

समोए है सागर

कल-कल झरने की अठकेली

कई नदियों की धारा

लो इनको भी आँचल में लेली

अब खुलती हथेली

  गृहिणी

बन्द हुई मोटी किताबें

दूर धरी थियरी

सीधी सी बतियाँ बस

लाइव कमेन्टरी

घटित हो रहा मन में

जो घर में आँगन में

हस्तामलकवत्‌

चेतन मन कानन में

 

बात बेबात पे लड़ना

घड़ी-घड़ी झगड़ना

क्या दे देगा

किसी और का मुँह ताकते

एक ही लउर से हाँकते

भीतर बाहर झाँकते

आते-जाते को आँकते

हाँफ़ते फाँकते

सब ले लेगा

फिर

चाहिए ही क्या?

जो टाले न टले

हटाये न हटे

उसे यूँ साध लेना

मासूम बच्चा सा

मोहपाश सच्चा सा

डालकर यूँ बाँध लेना

सीखो तो सही

यह प्रेम की भाषा

दूर करेगी सारी निराशा

बोलो तो सही

बसता है ईश्वर

सबके भीतर बनकर

चेतना, दया और करुणा

जगाओ तो सही

 

फिर तो मनुष्य

बुरा कैसे रह जाएगा

सारा मालिन्य

इस अनुपम उजियारे में

झट से बह जाएगा

 

यह वाद वह आन्दोलन

यह भाषण वह सम्मेलन

अपने पूर्वाग्रह गठरी में बाँधकर

धर दो आले पर

मन की गाँठ खोलकर

चोट करो ताले पर

पहले घर से शुरू करो

कर डालो रिहर्सल

रियाज में ही राह दिखेगी

जिन्दा बनो हर पल

अन्धेरे को चीरकर

बन्द दिमागों से टकराएगी

आशा की उजली किरण

चहुँ ओर छा जाएगी।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

इलाहाबाद की राष्ट्रीय ब्लॉगर गोष्ठी से पहले…

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(१)

भाव हमारे शब्द उधार के…

पाँच दिनों की ट्रेनिंग पूरी करके लखनऊ से इलाहाबाद लौटा हूँ। पत्नी और बच्चे बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे थे। दीपावली की छुट्टी मनाने मेरे दो भाई भी अपने-अपने हॉस्टेल से आ चुके थे। घर में एक जन्मदिन भी था। लेकिन मुझे इसकी खुशी मनाने के लिए कोई उपहार खरीदने या अन्य तैयारी का कोई समय नहीं मिल पाया था। बस रात के नौ बजे तक घर पहुँच जाना ही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि रही। रिक्शे से उतरकर सबसे पहले पड़ोसी के लॉन से गुलाब के फूल माँग लाया और घर में प्रवेश करते ही उन्ही फूलों को पेश करते हुए  यह उधार का शेर सुना डाला-

तमाम उम्र तुम्हें जिन्दगी का प्यार मिले।

खु़दा करे ये खुशी तुमको बार-बार मिले॥

“हैप्पी बड्डे” का काम पूरा हो लिया था। तभी मेरे एक दोस्त ने चार खूबसूरत लाइनें बता दीं। तड़ से मैने एक सुनहले कार्ड पर उन्हें लिखा और चुपके से वहाँ रख दिया जहाँ उनकी नजर जल्दी से पहुँच जाय-

चन्द मासूम अदाओं के सिवा कुछ भी नहीं।
महकी-महकी सी हवाओं के सिवा कुछ भी नहीं॥
आज के प्यार भरे दिन पे तुम्हें देने को,
पास में मेरे दुआओं के सिवा कुछ भी नहीं।

फिर क्या था। आनन्द आ गया। भाव जम गया था। मेरी भावनाएं पूरी तरह से संचारित हो गयीं। दोनो तरफ़ सन्तुष्टि का भाव था। मेरे मन को बहुत तसल्ली मिल गयी और कुछ न कर पाने का मलाल थोड़ा मद्धिम हुआ।

(२)

कहानी कुछ यूँ पलटी:

अब मैं अगली चिन्ता की ओर से बरबस मोड़े हुए मन को दुबारा उस ओर ले जाने का उपक्रम करने लगा। कम्प्यूटर पर बैठकर आगामी कार्यक्रम की तैयारियों की प्रगति समीक्षा के उद्देश्य से मेलबॉक्स चेक करना था। कार्यक्रम के संयोजक श्री सन्तोष भदौरिया जी से बात करनी थी। अपने छोटे भाइयों से कम्प्यूटर तकनीक पर कुछ नया सीखना था, और अपने ब्लॉग पर एक नयी पोस्ट लिखने का मन भी था।

राष्ट्रीय सेमिनार के आयोजन में हमारे चिठ्ठाकार बन्धुओं ने जिस उत्साह और सौजन्यता से प्रतिभाग करने हेतु अपनी सहमति भेंजी है उसका धन्यवाद ज्ञापन भी करना था और ज्योतिपर्व दीपावली की शुभकामनाएं भी प्रेषित करनी थीं। इन सभी कार्यों पर एक के बाद एक ध्यान दौड़ाता रहा, लेकिन एकाग्र नहीं हो सका।

तभी एक जबरदस्त तुकबन्दी मेरे कानों से टकरायी। मेरी गृहिणी को यह सब अच्छा नहीं लग रहा था। उन्हें मुझसे शिकायत हो ली थी और वह तुकबन्दी उसी का बयान कर रही थी।

मैने पीछे मुड़कर पूछा, “इसके आगे भी कुछ जोड़ोगी कि यहीं अटकी रहोगी?”

“इसके आगे आप जोड़िए… मेरे भाव से तो आप भली भाँति परिचित हैं ही। …मैं चली सोने।” यह कहकर वो सही में चली गयीं।

अब मेरा सारा प्रोग्राम चौपट हो गया। पत्नी का आदेश पालन करना अपना धर्म समझते हुए मैने उस दो लाइन की तुकबन्दी को यथावत्‌ रखते हुए आगे की पंक्तियाँ जोड़ डाली हैं। इनमें व्यक्त भावों का कॉपीराइट मेरा नहीं है और इनसे मेरा सहमत होना भी जरूरी नहीं है। अस्तु…।

(३)

भाव तुम्हारे शब्द हमारे…

सोच रही हूँ, काश! मैं कम्प्यूटर होती।

तब अपने पतिदेव के दिल के भीतर होती॥

 

मैं सहचरी नहीं रह पायी अब उनकी जी।

इस निशिचर ने चुरा लिया है अब उनका जी॥

घर में मुझसे अधिक समय उसको देते हैं।

आते ही अब हाल-चाल उसका लेते हैं॥

चिन्ता नहीं उन्हें मेरी जो ना घर होती।

सोच रही हूँ, काश! मैं कम्प्यूटर होती….

 

सुबह शाम औ दिन रातें बस एक तपस्या।

नहीं दीखती घर में कोई अन्य समस्या॥

बतियाना औ हँसना, गाना कम्प्यूटर से।

रूठ जाय तो उसे मनाना है जी भर के॥

चिन्ता नहीं उन्हें चाहे मैं ठनकर रोती।

सोच रही हूँ, काश! मैं कम्प्यूटर होती॥

 

घर की दुनिया भले प्रतीक्षा कर ले भाई।

कम्प्यूटर की दुनिया की जमती प्रभुताई॥

‘घर का मेल’ बने, बिगड़े या पटरी छोड़े।

पर ‘ई-मेल’ बॉक्स खुलकर नित सरपट दौड़े।

वैसी अपलक दृष्टि कभी ना मुझपर होती।

सोच रही हूँ, काश! मैं कम्प्यूटर होती॥

 

शादी के अरमान सुनहरे धरे रह गये।

‘दो जिस्म मगर एक जान’ ख़तों में भरे रह गये॥

कम्प्यूटर ने श्रीमन्‌ की गलबहिंयाँ ले ली।

दो बच्चों की देखभाल, मैं निपट अकेली॥

लगे डाह सौतन को इच्छा जीभर होती।

सोच रही हूँ, काश! मैं कम्प्यूटर होती॥

 

(४)

शुभकामनाएं

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आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। सपरिवार सानन्द रहें। पति-पत्नी और बच्चों को महालक्ष्मी जी अपार खुशियाँ दें। सभी राजी खुशी रहें। हमपर भी देवी-देवता ऐसे ही प्रसन्न रहें, इसकी दुआ कीजिए। २३-२४ अक्टूबर को ब्लॉगर महाकुम्भ में यहाँ या वहाँ आप सबसे मुलाकात होगी ही।

!!!जय हो लक्ष्मी म‍इया की!!!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

हाय रे तेरी किस्मत…

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 DSC00173

तीर्थयात्रा से लौटकर दुबारा कामकाज सम्हालने को जब मैने ऑफिस में प्रवेश किया तो पाया कि नये बॉस ने कदम रखते ही यहाँ रंग-रोगन लगवाकर, गमले रखवाकर, सुनहले अक्षरों में नामपट्टिका लगवाकर और ‘फेसलिफ्ट’ के दूसरे तमाम उपायों द्वारा यह संकेत दे दिया है कि अब हमारा कोषागार किसी कॉर्पोरेट ऑफिस की तरह ही चाकचौबन्द  और समय की पाबन्दी से काम करेगा। सब कुछ चमकता-दमकता हमारे कॉन्फिडेन्स को बढ़ाने वाला था।

अपने कक्ष में जाकर मैने मेज पर लगी फाइलों, बिलों व चेकों के अम्बार को एक-एक कर निपटाना शुरू किया। बीच-बीच में बुजुर्ग पेंशनर्स का आना-जाना भी होता रहा। करीब तीन घण्टे तक लगातार दस्तख़त बनाने के बाद मेज साफ हुई और मुझे यह सोचने की फुर्सत मिली कि घर से क्या-क्या काम सोचकर चले थे।

वायरल हमले से त्रस्त बच्चों व पत्नी की दवा, खराब हो गये घर के कम्प्यूटर को ठीक कराने के लिए किसी तकनीकी विशेषज्ञ की खोज, हिन्दुस्तानी एकेडेमी में जाकर वहाँ होने वाले आगामी कार्यक्रम की तैयारी की समीक्षा, वहाँ से प्रकाशन हेतु प्रस्तावित पुस्तक के लिए ब्लॉगजगत से प्राप्त प्रविष्टियों का प्रिन्ट लेकर उसे कम्पोजिंग के लिए भेंजना, इसी बीच ट्रेनिंग के लिए परिवार छोड़कर एक सप्ताह के लिए लखनऊ जाने की चिन्ता और अपनी गृहस्थी के तमाम छोटे-छोटे लम्बित कार्य मेरे मन में उमड़-घुमड़ मचाने लगे। मेज पर हाल ही में लगा पुराना कम्प्यूटर कच्छप गति से बूट हो रहा था। नेट का सम्पर्क बार-बार कट जा रहा था। लैन(LAN) की खराबी बदस्तूर कष्ट दे रही थी। चारो ओर से घिर आयी परेशानियों का ध्यान आते ही मन में झुँझलाहट ने डेरा डाल दिया।

तभी एक नौजवान कमरे में दाखिल हुआ। चेहरा कुछ जाना-पहचाना लगा। उसने जब एक कागज मेरे सामने सरकाया तो ध्यान आया कि दो-तीन सप्ताह पहले यह एक विकलांग लड़की को पहिए वाली कुर्सी पर बिठाकर ले आया था। उस लड़की को अपने पिता की मृत्यु के बाद पारिवारिक पेंशन स्वीकृत हुई थी। उसी पेंशन के प्रथम भुगतान से पहले दो गवाहों के माध्यम से की जाने वाली औपचारिक पहचान के लिए वह लड़की मेरे सामने लायी गयी थी।

imageइस लड़के की चचेरी बहन थी वह लड़की। मुझे याद आया कि इसने उसकी पेंशन दिलाने में जो मदद की थी उसके लिए मैने इसे  शाबासी दी थी, और पेंशन का चेक उस लड़की के बैंक खाते में तत्काल भिजवा दिया था। वही लड़का आज कुछ परेशान सा जब मुझसे मिला तो मैने पूछा-

“क्या हुआ? पेंशन तो मिल गयी न…?”

“नहीं सर, बैंक वाले बहुत परेशान कर रहे हैं” उसके स्वर में अजीब शान्ति थी।

“क्यों, क्या कह रहे हैं…?”

“आपने तो देखा ही था… वह बोल नहीं पाती है। अनपढ़ है। हाथ-पैर भी सीधे नहीं हैं। सिग्नेचर बना नहीं सकती है।”

“बैंक वालों ने उसका खाता तो खोल ही दिया था न…। शायद उसकी बड़ी बहन के साथ संयुक्त खाता था…?” मैने मस्तिष्क पर जोर देते हुए पूछा।

“जी सर, खाते में पैसा भी चला गया है। …लेकिन जब पैसा निकालने गये तो बोले कि यह पेंशन का पैसा है इसलिए इसे बड़ी बहन के दस्तख़त से नहीं निकाला जा सकता।”

“फिर उसका अंगूठा क्यों नहीं लगवा लेते? …अपने सामने अंगूठा निशान लगवाकर प्रमाणित करें और भुगतान कर दें।” मैने आसान हल सुझाया।

“नहीं सर, वो कहते हैं कि जब तक लड़की से पूछने पर वह बताएगी नहीं कि वह फलाँ है, और अमुक धनराशि निकालना चाहती है तबतक कोई बैंक अधिकारी उसका अंगूठा निशान प्रमाणित नहीं करेगा।” उसने परेशानी बतायी।

“…तो फिर अभिभावक के रूप में बड़ी बहन के साथ संयुक्त खाता इसीलिए तो खोला गया होगा कि वह पैसा निकाल सके और अपनी विकलांग बहन का भरण-पोषण कर सके?”

मैने पूछा तो उसने बताया कि मैनेजर साहब इसे बैंककर्मी की गलती से खोला गया खाता बता रहे हैं और पेंशन का पैसा वापस भेंजने को कह रहे हैं। कहते हैं कि अक्षम बच्चे के लिए केवल माँ-बाप ही गार्जियन हो सकते हैं। दूसरा कोई तभी अभिभावक बन सकता है जब उसे सक्षम न्यायालय अधिकृत करे।

“…वैसे उसके परिवार में और कौन लोग हैं?” मैने उत्सुकतावश पूछ लिया।

“कोई नहीं सर…। चाचा-चाची दोनो मर चुके हैं, तभी तो उसे फेमिली पेंशन मंजूर हुई है। केवल यही दोनो अकेले शहर में रहती हैं। चाचा ने हम लोगों से अलग होकर यहाँ एक छोटा सा मकान बनवा लिया था। हम लोग गाँव पर रहते हैं। इन लोगों का अब गाँव पर कुछ नहीं है।”

“क्यों? तुम्हारे चाचा का हिस्सा तो खेती-बाड़ी में रहा होगा।” मैने उससे कुछ और जानने के उद्देश्य से पूछा।

“ऐसा है सर, चाचा बहुत दारू पीते थे। पुलिस में सिपाही थे। केवल दो बेटियाँ थीं जिसमें एक विकलांग ही थी। इसलिए सब कुछ बेंच-बेंचकर पीते गये। कहते थे- किसके लिए बचाकर रखूंगा…” वह बेहद भावशून्य चेहरे से बता रहा था।

“जब रिटायर हुए तो पता चला कि चाची को कैंसर है। उनके इलाज में भी बाकी जमीनें बिक गयीं। …अन्ततः चाची मर भी गयीं और चाचाजी कंगाल हो गये।” उसका चेहरा बेहद शान्त था।

मैने पूछा कि जब वे रिटायर हुए होंगे तो तीन-चार लाख रूपये तो मिले ही होंगे। उनका क्या हुआ?

“चाची के मरने के तुरन्त बाद चाचा को पता चला कि उनके गले में भी कैंसर है। …तीन बार ऑपरेशन कराया गया। बहुत महंगा इलाज चला…, लेकिन तीसरे ऑपरेशन के आठ दिन बाद वे भी मर गये।” वह यन्त्रवत्‌ बताता जा रहा था।

“उफ़्फ़्‌” मेरे मन में पीड़ा भर गयी। मैं उसकी ओर देख नहीं पा रहा था, “फिर तो कोर्ट का ही सहारा लेना पड़ेगा उसकी बड़ी बहन को अभिभावक बनाने के लिए…”

“सर मैं कोर्ट से भी लौट आया हूँ। …जज साहब ने कहा कि किसी को इसका गार्जियन तभी बनाया जा सकता है जब यह पुष्ट हो जाय कि यह पागल और मानसिक दिवालिया है। इसके लिए सी.एम.ओ. (Chief Medical Officer) से लिखवाकर लाना होगा।”

“तो क्या सी.एम.ओ. के यहाँ गये थे?”

“जी सर, लेकिन वहाँ भी काफी दौड़ने के बाद डॉक्टर साहब ने कह दिया कि यह लड़की जब पागल ही नहीं है तो कैसे लिख दें कि पागल है। …कह रहे थे कि विकलांग होने में और पागल होने में बहुत अन्तर है।”

“उनसे कहो कि यह लिख दें कि इसकी शारीरिक विकलांगता और मानसिक अक्षमता इस प्रकार की है कि बैंक खाते का संचालन नहीं कर सकती…। इसके आधार पर तो जजसाहब को उसका अभिभावक बड़ी बहन को बना देना चाहिए।” मैने आशा जतायी।

“अब मैं बिल्कुल हार चुका हूँ साहब… मैं खुद ही गरीब परिवार का हूँ। इस चक्कर में मेरे अपने बड़े भाई ने मुझे अलग कर दिया है क्योंकि मैं चाचा की लड़कियों की सहायता में अपने घर से पैसा खर्च करता हूँ। …बोले कि अपना हिस्सा बाँट लो और उसी में से खर्च करो इनके ऊपर… मैं अपना नहीं लगाने वाला…।”

अब मैं निरुत्तर हो चुका था। उस लड़के की परिस्थितियाँ विकट थीं… और उससे भी अधिक कठिन उस विकलांग बालिका व उसकी बड़ी बहन की जिन्दगी थी जिनकी बीस व बाइस की उम्र के आगे पीछे कोई नहीं था। इस लड़के का धीरज जवाब दे रहा था। उसने बताया कि पेंशन के एरियर से बड़ी वाली की शादी करना चाहता था और उसके बाद मासिक पेंशन से छोटी वाली का गुजारा हो जाता लेकिन…

मैने बैंक मैनेजर को फोन मिलाया तो उन्होंने यह साफ़ कर दिया कि माँ-बाप के अलावा ‘नेचुरल गार्जियन’ केवल कोर्ट के ऑर्डर से ही बनाया जा सकता है। बिना उस ऍथारिटी के हम पेंशन का पेमेण्ट नहीं कर सकते।

…इसके बाद मुझे अपनी छोटी-मोटी परेशानियाँ क़ाफूर होती नजर आयीं। अब तो उस लड़की की कठिनाई में मन उलझ सा गया है।

अन्ततः हम इस उलझन को सुलझाने के लिए विशेषज्ञों की राय आमन्त्रित करने को मजबूर हुए हैं, मामला अभी लम्बित है। ध्यान रहे कोषागार से पेंशन का भुगतान शत-प्रतिशत पेंशनर के बैंक खाते में ही किए जाने का प्राविधान है।

किसी उचित समाधान के लिए आप अपनी राय देना चाहेंगे क्या?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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