इलाहाबाद की राष्ट्रीय संगोष्ठी के बाद…

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यह पोस्ट सातवें आसमान से लिख रहा हूँ… कारण है आप सभी की जोरदार, शोरदार और बेजोड़दार प्रतिक्रियाओं की सतत्‌ श्रृंखला। वाह, मुझे तो उड़न तश्तरी होने का इल्म हो रहा है… (आदरणीय समीर जी क्षमा याचना सहित)

श्री विभूति नारायण राय जी से २३ अगस्त २००९ को मेरी प्रथम मुलाकात हुई, नितान्त अनौपचारिक और व्यक्तिगत। सत्यार्थमित्र पुस्तक भेंट करने और हिन्दी विश्वविद्यालय द्वारा हिन्दी भाषा और साहित्य से सम्बन्धित पाठ्येत्तर गतिविधियों के सम्बन्ध में कुछ चर्चा कर अपने को अद्यतन कर लेना  ही मेरा उद्देश्य था।

राय साहब ने मेरी पुस्तक पर प्रसन्नता जाहिर की और तत्क्षण ही अपने लैपटॉप पर हिन्दुस्तानी एकेडेमी और सत्यार्थमित्र के ब्लॉग पर विहंगम दृष्टि डालने के बाद अपने विश्वविद्यालय की साइट के दर्शन भी कराये। हिन्दी साहित्य के एक लाख पृष्ठों को नेट पर चढ़ाने की परियोजना के बारे में बताया। मैने भी उन्हें बताया कि पिछली मई में हमने इलाहाबाद वि.वि. के निराला सभागार में एक ब्लॉगिंग की कार्यशाला करायी थी जिसमें इन्टरनेट पर ब्लॉग लेखन के माध्यम से हिन्दी के बढ़ते कदमों की चर्चा की गयी थी। उन्होंने उस कार्यशाला सम्बन्धी पोस्ट के लिंक पर जाकर उसे देखा और उसके बाद उन्होंने मुझसे जो प्रस्ताव रखा उससे मैं सकते में आ गया था-

“इलाहाबाद में हिन्दी ब्लॉगों के बारे में एक राष्ट्रीय स्तर के सेमिनार का आयोजन जिसमें देश के सबसे अच्छे ब्लॉगर्स को बुलाकर इस माध्यम पर दो दिन की चर्चा कराई जाय।” संगोष्ठी स्मृति भेंट

उसके बाद अबतक जो-जो हुआ है वह इतिहास बनता जा रहा है। राय साहब और नामवर जी की व्यस्तता के कारण तिथियों को आगे सरकाए जाने की मजबूरी हो या बर्धा से इलाहाबाद की दूरी और नेट पर सम्पर्क का अभाव रहा हो, विश्वविद्यालय के अधिकारियों के साथ इस नवीन माध्यम पर की जा रही संगोष्ठी के बारे में महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाने की जटिल प्रक्रिया रही हो या मेरे मन में उत्साह और सदाशय का प्राचुर्य और अनुभव की न्यूनता रही हो; इन सभी दिक्कतों और खूबियों-खामियों के बावजूद यह संगोष्ठी जिस रूप में सम्पन्न हुई उससे मेरा मन बल्लियों उछल रहा है। अब प्रायः सभी मान रहे हैं कि यह संगोष्ठी अबतक का सबसे बड़ा आयोजन साबित हुई है।

मेरी अप्रतिम प्रसन्नता मात्र इसलिए नहीं कि हिन्दुस्तानी एकेडेमी द्वारा प्रकाशित मेरी पुस्तक का विमोचन नामवर जी के हाथों होने का जुगाड़ हो गया, वह कार्य तो एकेडेमी पहले भी कराती रही है; बल्कि मैं तो इसलिए अभिभूत हूँ कि मात्र डेढ़ साल पहले बिल्कुल नौसिखिया बनकर इस माध्यम से जुड़ने के बाद मुझे ऐसे अवसर और समर्थन मिलने लगे कि इस माध्यम को व्यक्तिगत कम्प्यूटर कक्षों से बाहर निकालकर  अखबारी सुर्खियाँ बनाने, सभागारों में चर्चा का विषय बनाने, पारम्परिक साहित्य के प्रिण्ट माध्यम से इसे विधिवत जोड़ने के जो प्रयास हो रहे हैं उसमें एक माध्यम मैं भी बन गया। इतना ही नहीं, अन्ततः हिन्दी जगत के शिखर पर विराजने वाले एक ख्यातिनाम हस्ताक्षर को जब इस माध्यम पर गम्भीरता से मनन करने और अपनी राय बदलने या अपडेट करने पर मजबूर होना पड़ा तो मैं इस ऐतिहासिक घटना का न सिर्फ़ प्रत्यक्षदर्शी बना  बल्कि उस हृदय परिवर्तन के प्राकट्य का एक संवाहक भी हो लिया।

मैं इस जोड़-घटाने में कभी नहीं पड़ने वाला कि मुझे इस बात की कितनी क्रेडिट दी गयी है या दी जाती है, लेकिन पिछले एक सप्ताह से जो कुछ घटित हो रहा है उसे देखकर मुझे असीम आनन्द, तृप्ति और आत्मसंतुष्टि ने घेर रखा है। आत्ममुग्ध हो गया हूँ मैं। …अब इससे किसी विघ्नसंतोषी का दिल बैठा जा रहा हो तो मैं क्या कर सकता हूँ? चुपचाप काम निबटाने के बाद ब्लॉग उदधि में उठने वाली ऊँची तरंगों को सुरक्षित दूरी बनाकर शान्ति और कौतूहल के मिश्रित भाव से देखने और मुक्त भाव से उनमें मानसिक गोता लगाने का जो सुख मुझे मिला है वह जीवन भर सँजो कर रखना चाहूंगा।

मेरे वरिष्ठ मित्रों और आदरणीय अग्रजों ने जो स्नेह, समर्थन और आशीर्वाद दिया उससे मुझे आगे बढ़ने का उत्साह मिला। असीम ऊर्जा मिली। (एक अदना सा ‘धन्यवाद’ देकर मैं उस ऋण से उऋण नहीं हो सकता।) लेकिन जिन लोगों ने पूरी शक्ति लगाकर इस संगोष्ठी का छिद्रान्वेषण किया, अनेक कमियों को ढूँढकर  बताया, और बड़े-बुजुर्गों की ऊटपटांग आलोचना की उससे मेरे मन को कुछ ज्यादा मजबूती मिली। अब मुझे विश्वास हो गया है कि किसी अच्छे और बड़े कार्य के लिए आपके पास बहुत लम्बा अनुभव होना या अधिक उम्र का होना बहुत जरूरी नहीं है। यह कोई गारण्टी नहीं देता। अराजकता, अविवेक, अहमन्यता, अधीरता, अति भावुकता और अनाड़ीपन का प्रकोप वहाँ भी हो सकता है। ऐसा बोध कराने के लिए उन सबको तहेदिल से शुक्रिया…।

हिन्दी ब्लॉग-जगत में मेरी छोटी सी यात्रा को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने का निर्णय हिन्दुस्तानी एकेडेमी के सचिव द्वारा जिन उद्देश्यों से किया गया था उसे उन्होने पुस्तक के प्रकाशकीय में स्पष्ट किया है। इसके औचित्य पर प्रश्न उठाने वालों को पुस्तक खरीदकर पढ़नी चाहिए और तभी कोई राय बनानी चाहिए। मैं तो बड़ी विनम्रता से हिन्दुस्तानी एकेडेमी के उच्चाधिकारियों से लेकर अपने आस-पास के आम लोगों को जो मेरी विचार भूमि में बीज समान अंकुरित होते रहे हैं; और घर-परिवार से लेकर इस ब्लॉग-परिवार के सुधीजनों के प्रति हृदय से कृतज्ञता व्यक्त कर चुका हूँ जिनका इस पुस्तक के निर्माण में प्रत्यक्ष या परोक्ष किसी भी प्रकार का योगदान है। एक बार खरीदकर पढ़िए तो सही…।

आप सोच रहे होंगे कि मैं फिरसे विज्ञापन करने लगा…। तो जरूर सोचिए क्योंकि मैं ऐसा ही कुछ कर रहा हूँ और मैं ऐसा करना बुरा नहीं मानता। पुस्तकों का बाजार कितना कमजोर और उपेक्षित है इसका जिक्र अनेकशः कर चुका हूँ। आगे भी इस चिन्ता को जाहिर करता रहूंगा और पुस्तकों के प्रति लोगों में प्रेम भाव जागृत करने के लिए जो बन पड़ेगा वह भी करता ही रहूंगा…।

संगोष्ठी समाप्त होने के बाद मैने सब काम छोड़कर अन्तर्जाल पर पोस्ट के रूप में आने वाली प्रतिक्रियाओं को टिप्पणियों-प्रतिटिप्पणियों  को पढ़ता रहा, मुझे अपनी ओर से किसी सफाई की जरूरत नहीं पड़ी। (एक जगह केवल यह बताना पड़ा कि नामवर जी उस वि.वि. के कुलाधिपति हैं।) इतने समझदार और जानकार लोग इस मंच को आलोकित कर रहे हैं कि सबकुछ शीशे की तरह साफ होता चला गया। कल समीर जी ने जब पुल के उस पार से इलाहाबाद का दर्शन किया तो हठात्‌ मेरे भावों को निरूपित करती कविता निकल पड़ी-

मैं इसलिये हाशिये पर हूँ क्यूँकि

मैं बस मौन रहा और

उनके कृत्यों पर

मंद मंद मुस्कराता रहा!!

-समीर लाल ’समीर’

 

इस मौन ने मुझे ऐसा घेरा कि इस गोष्ठी की अनेक यादगार तस्वीरें आपको दिखाना भूल गया। आज कुछ ऐसे चेहरे लगा रहा हूँ जिन्हें नये-पुराने सभी ब्लॉगर देखना चाहेंगे। कोई मानक क्रम निर्धारित नहीं किया है, बस एलबम से जो जहाँ मिला वहीं से उठा लिया है:

वी.एन.राय प्रो.नामवर सिंह राकेश जी, OSD
अनूप जी ‘फुरसतिया’  प्रियंकर जी.. रवि रतलामी
सिद्धार्थ ‘सत्यार्थमित्र’ हर्षवर्धन त्रिपाठी  अजित बडनेरकर
गिरिजेश राव विनीत कुमार विजेन्द्र चौहान ‘मसिजीवी’
अफ़लातून भूपेन सिंह इरफान
संजय तिवारी ‘विस्फोट’  यशवन्त ‘भड़ासी’ अविनाश ‘मोहल्ला’
हेमन्त कुमार डॉ. अरविन्द मिश्र हिमांशु पाण्डेय
 वर्धा की शोध छात्रा मीनू खरे  मनीषा पांडेय
समरेन्द्र ‘मोहल्ला’ वाले अखिलेश मिश्र ‘बोधिसत्व’ ज़ाकिर अली ‘रजनीश’

इस मौके पर कुछ महारथियों ने अपने ‘लोटपोट’ के साथ त्वरित पोस्ट ठेलने का काम किया और अभय तिवारी की लघु फिल्म सरपत का प्रदर्शन भी हुआ। बेहद उम्दा फिल्म है। जरूर देखने लायक।

त्वरित प्रसारण

चिट्ठाकारी की दुनिया में ‘सरपत’

 लघु फिल्म ‘सरपत’ का प्रसारण अन्त में इतना ही कि २३-२४ अक्टूबर के बाद हिन्दी चिठ्ठाकारी की दुनिया में कुछ नयी बातें होने लगी हैं। मैं यही महसूस कर रहा हूँ कि भविष्य में भी ऐसा कोई आयोजन करने का अवसर मिले तो मैं दुबारा लग जाऊंगा।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

 

ब्लॉगिंग कार्यशाला: पाठ-5 (कुछ गुरुमन्त्र : ज्ञानदत्त पाण्डेय)

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जब हमने इमरान प्रतापगढ़ी के साथ इस कार्यशाला के आयोजन की योजना बनायी थी तो हमारे प्रयास का सबसे बड़ा सम्बल आदरणीय ज्ञानदत्त पाण्डेय जी का इलाहाबाद में उपस्थित होना था। फिर भी जब हम उनकी सहमति लेने उनके आवास पर पहुँचे तो पाँच मिनट के भीतर जो बात हुई उससे हमारा ‘भव्य आयोजन’ खटाई में पड़ता दिखा। उन्होंने कहा कि मैं तो चाहता हूँ कि केवल चुने हुए पच्चीस लोग ही रहें जिनसे सहज ढंग से बातों का आदान-प्रदान किया जा सके। बड़ी सी भीड़ जुटाकर भाषण दिलाना हो तो मुझे घटाकर ही योजना बनाइए।

इमरान ने मुझसे फुसफुसाकर कहा कि सर इतने तो कार्यकर्ता ही हो जाएंगे। मैंने उन्हें मनाते हुए पचास की संख्या पर राजी कर लिया। इसमें आदरणीया रीता भाभी का पूरा सपोर्ट हमारे पक्ष में रहा।

 गुरुमन्त्र

कार्यक्रम के निर्धारित समय से दो मिनट पहले अपने लैपटॉप के साथ पहुँचकर उन्होंने हमें आश्वस्त कर दिया कि सबकुछ अच्छा ही होने वाला है। सबसे वरिष्ठ होने के कारण स्वाभाविक रूप से उन्हें कार्यक्रम के अध्यक्ष की कुर्सी सम्हालनी पड़ी और इसी के फलस्वरुप उन्हे अपनी बात कहने का अवसर सबसे अन्त में मिला। मजे की बात यह रही कि जब कार्यक्रम अपने उत्स पर था तो निराला सभागार ठसाठस भरा हुआ था, लेकिन जब अन्त में ब्लॉगिंग के गुरुमन्त्र जानने की बारी आयी तो हाल में वही पच्चीस-तीस धैर्यवान श्रोता बैठे हुए थे जितने की इच्छा गुरुदेव ने जाहिर की थी।

समर्पित श्रोता  

पीछे की कुर्सियों से उन्हें आगे बुलाया गया और लैप टॉप के की-बोर्ड पर अंगुलिया फिराते हुए ‘पॉवर प्वाइण्ट’ के माध्यम से उन्होंने अपनी सूत्रवत बातें बतानी शुरू कीं। जो सज्जन डॉ. अरविन्द मिश्रा जी की प्रस्तुति अंग्रेजी में होने पर प्रश्न उठा चुके थे वे इस सुन्दर हिन्दीमय झाँकी को देखने के लिए नहीं रहे।

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व्यर्थ का झंझट तो कतई नहीं…  लाभ का आशय अलग-अलग है

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   अपेक्षा के हिसाब से समय और प्रतिभा का निवेश भी जरूरी है।

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   शुरू करना बहुत आसान है लेकिन नियमित बने रहना मुश्किल 

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टिप्पणी पाने के लिए टिप्पणी देना भी जरूरी… वह भी पढ़कर:)

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एक गुरू जरूर तलाश लें …समस्या कभी भी आ सकती है।

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निराला सभागार में यह अंश फास्ट-फॉर्वर्ड का शिकार हुआ

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यही तो यू.एस.पी. है एक सफल ब्लॉगर का

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सबको जानने की कोशिश करें, तब सभी आपको जान पाएंगे

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   भविष्य उज्ज्वल है… और क्या… !?

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बहुत बहुत धन्यवाद…:)

और नमस्कार मेरी ओर से भी… आपने इतने धैर्य से इसे पढ़ने, जानने और समझने के लिए समय निकाला…।

ये शब्द थे दृश्यकला विभाग के मुखिया और इलाहाबादी बकबक नामक ब्लॉग के प्रणेता धनन्जय चोपड़ा जी के जिनके जिम्मे कार्यक्रम के अतिथियों, वार्ताकारों, श्रोताओं, पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और माइक-मंच-फर्नीचर के व्यस्थापकों को धन्यवाद देने का जिम्मा सौंपा गया था।

ज्ञान जी की हड़बड़ प्रस्तुति के बाद जो प्रश्नोत्तर काल निर्धारित था उसमें एक बड़ा मौलिक सवाल किया गया- “आखिर ब्लॉग बनाएं कैसे?” सभी पैनेलिस्ट इसका आसान तरीका और गूगल की साइट का पता बताने लगे। तभी धनन्जय जी ने माइक सम्हाल लिया और बोले-

“गूगल सर्च में टाइप करो blog, एक खिड़की खुलेगी, एक जगह लिखा मिलेगा create new blog, उसे चटकाओ और जो-जो कहे करते जाओ। ब्लॉग बन गया।”

“हाँ इसके पहले जी-मेल का खाता होना जरूरी है। यदि नहीं है तो गूगल सर्च में gmail टाइप करो। एक खिड़की खुलेगी, एक जगह लिखा मिलेगा create new account , उसे चटकाओ और जो-जो कहे करते जाओ। खाता दो मिनट में बन जाएगा।”

(समाप्त)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

ब्लॉगिंग कार्यशाला: पाठ-४ डॉ.कविता वाचक्नवी (हिन्दी कम्प्यूटिंग) द्वितीय भाग

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इस पाठ के प्रथम भाग में हमने जाना कि डॉ.कविता वाचक्नवी ने अपने वक्तव्य में हिन्दी कम्प्यूटिंग के क्षेत्र में होने वाली बड़े कार्यों का उल्लेख किया था। कविता कोष से सम्बन्धित बिन्दु-७ पर उनका स्पष्टीकरण आया है कि नेट पर ख़ुसरो से आज तक के कवियों की कविताओं की कुल संख्या 60 हज़ार से ऊपर है, ना कि केवल कविता कोष की। कविता कोष पर लगभग 18 हज़ार व अनुभूति पर भी लगभग 25 हज़ार से ऊपर कविताएं संकलित की गयी हैं।

हिन्दी कम्प्यूटिंग और अनुप्रयोग इसी कड़ी में अब आगे…

८. साहित्य कोश:

अन्तर्जाल पर हिन्दी साहित्य का विपुल भण्डार उपलब्ध है। गद्य और पद्य दोनो में। प्रेमचन्द जी का लगभग पूरा साहित्य ही नेट पर उपलब्ध है। वागर्थ, नया ज्ञानोदय, तद्भव, हंस, अन्यथा जैसी अनेकानेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के साथ ही साथ १०-२० नेट पत्रिकाएं जैसे: अनुभूति, अभिव्यक्ति, साहित्यकुंज, इन्द्रधनुष आदि भी सुलभ हैं

९.हिन्दी समाचार:

प्रायः सभी हिन्दी समाचार पत्र और साप्ताहिक पत्र पत्रिकाएं जैसे इण्डिया-टुडे, बी.बी.सी. पत्रिका, ऑउटलुक आदि हिन्दी प्रयोक्ताओं के लिए उपलब्ध हैं। बी.बी.सी. रेडियो (हिन्दी समाचार) सेवा से कौन अपरिचित होगा। अब यह ऑन लाइन सुनी जा सकती है।

९.विकीपीडिया:

अंग्रेजी संस्करण की तर्ज पर ही हिन्दी में भी यह मुक्त ज्ञानकोष लगातार बढ़ता जा रहा है। इससे न सिर्फ़ आप दुनिया के किसी भी विषय पर अच्छी जानकारी पा सकते है बल्कि इसमें अपनी जानकारी को जोड़कर इसके भण्डार को और समुन्नत भी बना सकते हैं।

९. चर्चा समूह:

अब हिन्दी में भी अनेक विशिष्ट विषयों पर आधारित चर्चा समूह और फोरम सक्रिय हो चुके हैं। हिन्दीभारत, ई-कविता, हिन्दीफ़ोरम,  तकनीकी व वैज्ञानिक हिन्दी, …..आदि बीसियों सहायता व विमर्श हेतु जालस्थल(sites) उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त ऑर्कुट और फेसबुक जैसी

१०.फॉण्ट परिवर्तक:

फॉण्ट की पारम्परिक समस्या अब नहीं रही। यूनिकोड फॉण्ट में  ऑफ़लाईन/ऑनलाईन टंकड़ के औंजार उपलब्ध हैं।  फ़ोनेटिक औंजार भी सुलभ हैं; जैसे- इंडिक ट्रांसलिट्रेशन व क्विलपैड सीधे देवनागरी में टंकड़ की सुविधा देते हैं।

पुरानी से पुरानी किसी फॉण्ट में  रखी सामग्री को यूनिकोडित करने हेतु २० से  अधिक फॉण्ट परिवर्तक मुफ़्त में उपलब्ध हैं। जिस फॉण्ट का परिवर्तक उपलब्ध नहीं है उसे अधिकतम एक सप्ताह में तैयार कर आपकी सेवा में उपलब्ध कराने के लिए कुछ तकनीकी महारथी सदैव तत्पर हैं। अनुनाद जी, नारायण प्रसाद जी, और हरिराम जी ने इस दिशा में स्तुत्य प्रयास किया है।

११. संकलक (एग्रेगेटर्स):

अब हिन्दी के ब्लॉग्स को उनके प्रकाशन के समय और श्रेणी के अनुसार एक स्थान पर संकलित करके व्यवस्थित ढंग से नेटप्रयोक्ताओं को सुलभ कराने का काम ब्लॉगवाणी, नारद, चिट्ठाजगत आदि कर रहे हैं। निरन्तर शोध और रचनात्मक कौशल द्वारा इन्होंने चिठ्ठाकारी की दुनिया में सहज विचरण को आसान और सुरुचिपूर्ण बना दिया है। ब्लॉग्स की लोकप्रियता और सक्रियता के आँकड़े आसानी से देखे जा सकते हैं।

१२. खोज इन्जन:

नेट पर सबसे बड़े खोज इन्जन गूगलसर्च में भी हिन्दी/देवनागरी  में ‘सर्च’ की सुविधा उपलब्ध हो चुकी है। अब आपकी खोज को पूरा करने के लिए हिन्दी में उपलब्ध सम्पूर्ण सामग्री भी गूगल द्वारा खंगाली जाती है। दूसरे सर्चइन्जन भी हिन्दी आधारित विषयों को उपलब्ध करा रहे हैं।

कविता जी ने उपरोक्त के अलावा यह भी बताया कि वाचान्तर (सीडैक)नाम से एक ‘स्पीच रिकॉग्निशन’ सुविधा है जो पैसा लेकर दी जाने वाली एकमात्र सुविधा है। हिन्दी की शेष सभी सुविधाएँ व संसाधन निःशुल्क हैं।
कई ब्लॉग्स पर हिंदी में प्रौद्योगिकी  विषयक लेखन हो रहा है

इसके अतिरिक्त TTS (text to speech/hindi sceen reader) जैसी दृष्टिबाधित उपयोक्ताओं के लिए हिन्दी में अनेक सुविधाएं विकसित की गयी है।

अब सभी मुख्य ब्रॉउजर हिन्दी में उपलब्ध हो चुके है। ऑनलाइन लाइब्रेरीज, शब्दकोश, तकनीकी शब्दावली कोश, मुहावरा कोश, वर्तनी शुद्धिकरण यन्त्र के साथ ही हिन्दी में बाजार विषयक लेखन भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। सभी बड़ी संस्थाओं की साइट्स हिन्दी में बनायी जा रही है। MSN,google,Yahoo आदि ने हिन्दी में संदेशों के आदान-प्रदान और गप्पे लड़ाने (चैटिंग) की सुविधा दे रखी है।

हिन्दी कम्प्यूटिंग के महत्व को रेखांकित करते हुए कविता जी ने कहा कि वैश्वीकरण के इस दौर में भारत का जो बड़ा बाजार बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की दृष्टि में है उसपर कब्जा जमाने के लिए उन्हें हिन्दी के प्रयोग को बढ़ावा देना अपरिहार्य होगा। इसलिए अब इस दिशा में बदलाव आना शुरू भी हो चुका है।

अब अंग्रेजी पर निर्भर होने की मजबूरी नहीं है। मुझे आजतक ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो अपने बच्चों को इंलिश मीडियम से इसलिए पढ़ाता हो कि उसे अंग्रेजी से बहुत प्यार है। बल्कि वह यह समझता है कि आज के समाज में कैरियर की सफलता के लिए अंग्रेजी का ज्ञान जरूरी है। अब यदि हिन्दी में दक्षता आपको रोजगार उपलब्ध करा दे तो अंग्रेजी पढ़ना एक मजबूरी नहीं रह जाएगी। उन्होंने पूछा कि अमेरिका की सिलिकॉन वैली में जाकर भारतीय बच्चे यदि उनके लिए अंग्रेजी में सॉफ्टवेयर विकसित कर रहे हैं तो वही बच्चे भारत में रहकर हिन्दी में अच्छे सॉफ़्टवेयर क्यों नहीं बना सकते?

अपने वक्तव्य की समाप्ति कविता जी ने एक अपील से की- वह थी सभी हिन्दी प्रेमियों से हिन्दी की सेवा का व्रत लेने की। उन्होंने कहा कि आप सभी अपनी रुचि के अनुसार किसी एक साहित्यकार, कवि या लेखक को चुन लीचिए। उनके रचना संसार को यूनीकोड में टाइप करके इण्टरनेट पर अपलोड करिए। अभी यह सारी सुविधा निःशुल्क है। अपने पसंदीदा साहित्य को अन्तर्जाल पर सुरक्षित कराइए। इससे यह मात्र एक-दो पीढ़ियों तक नहीं बल्कि अनन्त काल तक अक्षुण्ण रह पाएगा।

(पाठ-४ समाप्त)

एक अनुरोध: समयाभाव व तकनीकी कमजोरी के कारण बहुत से उपयोगी लिंक इच्छा रहते हुए भी नहीं दे पाया हूँ। आप इस कमी को पूरा कर सकते हैं। अपनी टिप्पणियों में आप चाहें तो हिन्दी अनुप्रयोगों से सम्बन्धित महत्वपूर्ण लिंक दे सकते हैं जो नये जिज्ञासु पाठकों और चिठ्ठाकार भाइयों-बहनों के लिए उपयोगी हो सकता है।

लिंक देने का तरीका /कोड: <a href="लिंक का युआरएल ">चयनित शब्द जिसपर लिंक देना है</a>

(अगला और अन्तिम पाठ:

कुशल ब्लॉग प्रबन्धन- ज्ञानदत्त पाण्डेय)

ब्लॉगिंग कार्यशाला: पाठ-३ (डॉ.अरविन्द मिश्रा- साइंस ब्लॉगर)

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“हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया” के बारे में जो कार्यशाला इलाहाबाद में हुई उसकी तस्वीरें, विषय-प्रवर्तन, अखबारी चर्चा और अनूप शुक्ल जी की कथा-वार्ता आप पिछली कड़ियों में देख और पढ़ चुके है। अब आगे…

डॉ.अरविन्द मिश्रा.. अनूप जी की कथा-वार्ता के बाद इमरान ने हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में वैज्ञानिक विषयों पर लिखने वाले बनारस के डॉ. अरविन्द मिश्रा जी को आमन्त्रित किया। अरविन्द जी का साईंब्लॉग हिन्दी जगत के चिठ्ठों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। वे पिछले कई दशक से विज्ञान के संचार के क्षेत्र में सक्रिय हैं। 

इन्होंने अपने वैज्ञानिक लेखों की लम्बी श्रृंखला में लोकप्रिय विज्ञान, जानवरों का व्यवहार, सौन्दर्य व सौन्दर्यशास्त्र (beauty and aesthetics), साँप और सर्पदंश, अन्तरिक्ष तथा धर्म और विज्ञान जैसे विषयों पर खोजपरक और उपयोगी लेखन किया है। 

विज्ञान की बात करनी हो और वह भी अन्तर्जाल पर इसके लेखन की बात करनी हो तो जाहिर है कि तकनीक का प्रयोग होना ही था। सो, इन्होंने विषय को ‘पॉवर प्वाइण्ट’ के माध्यम से प्रस्तुत किया। इमरान शायर बार-बार इसे ‘पॉवर प्रेजेण्टेशन’ कहते रहे और मैं दर्शकों की विपरीत प्रतिक्रिया की सम्भावना से शंकाग्रस्त होता रहा। डर था कि कहीं कोई इसे ‘शक्ति-प्रदर्शन’ न समझ बैठे।

खैर इमरान जी ने माइक थमाया तो अरविन्द जी ने भी सबसे पहले यही बताया कि इलाहाबाद के लिए वे मेहमान नहीं हैं। यहीं के विश्वविद्यालय से वर्ष १९८३ में उन्होंने प्राणिशास्त्र में डी.फिल. किया था। यहीं उनका alma mater है। यह अपने घर जैसा लगता है। बोले, “यहाँ लगता है जैसे कि मैं अपने माँ के पास आया हूँ।”

डॉ.अरविन्द मिश्रा

थोड़ी मशक्कत के बाद ही सही लेकिन ज्ञानदत्त पाण्डेयजी के नियन्त्रणाधीन लैपटॉप से निसृत होकर श्रोताओं के  सामने जमायी गयी स्क्रीन (श्‍वेत-पटल ) पर पहली स्लाइड चमक उठी। आगे की प्रत्येक स्लाइड में विषय वस्तु को कुञ्जी रूप में व्यवस्थित किया गया था। अरविन्द जी क्रम से उन विन्दुओं की व्याख्या करते रहे और ज्ञानजी ‘नेक्स्ट’ का निर्देश पाकर माउस से स्लाइड्स आगे बढ़ाते रहे। कहीं कोई भटकाव नहीं, कोई दुहराव नहीं। मुझे प्राइमरी में पढ़ी हुई विज्ञान की परिभाषा याद आने लगी।

यहाँ संक्षेप में इन झलकियों की विषय-वस्तु प्रस्तुत कर रहा हूँ:

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ब्लॉग क्या है?image

  • वेब+लॉग = ब्लॉग
  • १९९७- दुनिया में ब्लॉग्स का आविर्भाव
  • अब प्रत्येक दस सेकेण्ड में एक नया ब्लॉग बन रहा है।
  • वेब लॉग शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम जे.बार्गर ने १९९७ में किया था।
  • इसमें प्रविष्टियाँ या पोस्टें उल्टे समयानुक्रम मेम दिखायी देती हैं- अर्थात्‌ आखिरी पोस्ट सबसे पहले प्रदर्शित होती है।smile_regular

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  • प्रविष्टियों में आलेख, चित्र, वीडियो, और दूसरे जालस्थलों की कड़ियाँ निहित होती हैं।
  • पाठक इन प्रविष्टियों पर टिप्पणी कर सकते हैं जिससे यह दो-तरफा आदान-प्रदान का अनुभव देता है।
  • इसमें आर.एस.एस. की फीड शामिल होती है।

imageब्लॉग बहुत सी भिन्न सामग्रियों से तैयार हो सकता  है…

  • व्यक्तिगत डायरी या पत्रक
  • समाचार और सूचना सेवा
  • चालू प्रोजेक्ट की रिपोर्ट्‍स
  • चित्र वीथिका
  • अन्तर्जाल की कड़ियों का संग्रह
  • इत्यादि… और भी बहुत कुछ

 

  • image विज्ञान की चिठ्ठाकारी
  • एक विज्ञान का चिठ्ठा वह है जिसे कोई विज्ञान-वेत्ता लिखे
  • शोध और व्यक्तिगत डायरी के तत्व शामिल हों
  • प्रायः विज्ञान सम्बन्धी विषयों पर लिखा जाय
  • या दोनो बातें ही हों…।

इसे कैसे खोजें?image

  • ब्लॉगिंग इन्डेक्स और खोजी-इन्जन
  • टेक्नॉराती- http://www.technorati.com/
  • गूगल ब्लॉग खोज-
  • आपका संकलन कर्ता: जैसे- ब्लॉगवाणी, चिठ्ठाजगत, नारद

imageशब्दावली

  • ब्लॉगर: वह व्यक्ति जिसने ब्लॉग बना  रखा है और उसपर लिख-पढ़ रहा है।
  • ब्लॉगिंग: ब्लॉग बनाने और चलाने का कार्॥
  • ब्लॉगरोलिंग: ब्लॉगजगत में एक ब्लॉग से दूसरे ब्लॉग पर विचरण करना।
  • ब्लॉ्ग्‍रोलोडेक्स: दूसरे ब्लॉगों की सूची जो प्रायः अपने ब्लॉग के साइड-बार पर लगायी जाती है।
  • ब्लॉगेरिया: प्रतिदिन सैकड़ों पोस्टें पढ़ने और लिखने की सनक, विषय सबकुछ और कुछ भी।

 आर.एस.एस. क्या है?image

  • यह अन्तर्जाल पर अद्यतन जानकारी बाँटने का जुगाड़ है।
  • रिच साइट समरी
  • रियली सिम्पल सिण्डिकेशन,
  • आर.एस.एस. अन्तर्जाल पर चढ़ाई गयी प्रत्येक सामग्री सबको सुलभ कराता है।

imageसंकलक:

  • ब्लॉग संकलन कर्ता एक्स.एम.एल. जाल स्थलों को पूर्वनिर्धारित समय से संकलित करते हैं ( प्रत्येक मिनट से लेकर केवल अनुरोध के अनुसार अनियमित तौर पर कभी-कभार भी।)
  • शार्प रीडर (?)

विज्ञान चिठ्ठाकारीimage

यहाँ क्या-क्या हो सकता है…?

  • अन्धविश्वासों से भिड़न्त
  • छद्‍म विज्ञान का विरोध
  • वैज्ञानिक विनोदशून्य मशीन की भाँति चलायमान जीव नहीं हैं। उनमें भी सम्वेदनाएं हैं। उनके जीवन में भी ‘रास-रंग’ है।
  • विज्ञान सम्बन्धी विषयों पर आधारित समाचारों पर सजग दृष्टि रखना
  • विज्ञान का इतिहास लेखन
  • विज्ञान का कला विषयों के साथ आमेलन
  • सीधे अपने कार्यक्षेत्र से चिठ्ठाकारी
  • सामुदायिक प्रकाशन: ब्लॉग महोत्सव का आयोजन
  • लोकप्रिय विज्ञान पत्रिकाओं के सम्पादकों द्वारा चिठ्ठाकारी

कुछ लोकप्रिय विज्ञान-विषयक ब्लॉग

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अरविन्द जी ने अपनी वार्ता में उदाहरण देकर समझाया कि किस प्रकार में अन्धविश्वासों ने जड़ जमा रखा है। ब्लॉगिंग के हथियार से इनका मूलोच्छेदन किया जा सकता है। यह सत्य है कि ‘बड़ी माता’ नामक बिमारी का उन्मूलन हो चुका है। लेकिन अभी भी प्रत्येक १०-१५ किलोमीटर पर शीतला माता का मन्दिर बना हुआ है। आज भी समाज कूप-मण्डूकता का शिकार बना हुआ है।

फलित ज्योतिष के नाम पर लोगों को मूर्ख बनाने का काम हो रहा है। यह एक छद्‍म विज्ञान है। बाजारों में अनेक नीम-हकीम [क्वैकायुर्वेदाचार्य :)] लोगों की अशिक्षा और अन्धविश्वास पर पल रहे हैं।

आये दिन अखबारों में अवैज्ञानिक खबरें छपती रहती हैं। प्रायः हम पढ़ते हैं कि तस्करों से चीते की खाल बरामद हुई। जबकि भारत में चीता पाया ही नहीं जाता है। वस्तुतः Tiger का हिन्दी अनुवाद व्याघ्र ( देखें कामिल बुल्के)  है। किन्तु भार्गव की डिक्शनरी ने गलती से इसे चीता बता दिया। अब लिट्टे वाले भी तमिल चीता ही कहलाते हैं जो गलत है।

अरविन्द जी ने यह चर्चा भी किया कि विज्ञान को मानविकी से जोड़कर अनेक अच्छी पुस्तकें लिखी गयी हैं। आजकल चार्ल्स डार्विन की द्विशती मनायी जा रही है। उन्होंने विज्ञान का विशद लेखन किया। विज्ञान गल्प अब धीरे-धीरे डगमग कदमों से चलना शुरू कर रहा है। उन्होंने बताया कि सन्‌ १९०० में पहली विज्ञान कथा ‘चन्द्रलोक की यात्रा’ केशव प्रसाद सिंह जी ने लिखी थी जो तबकी प्रतिष्ठित पत्रिका ‘सरस्वती’ में छपी थी।

यहाँ बताते चलें कि डॉ अरविन्द ने सभी वार्ताकारों को अपनी प्रतिनिधि विज्ञान कथाओं के संग्रह ‘एक और क्रौंच वध’ की प्रतियाँ भेंट कीं। इनमें उनकी लिखी बारह रोचक कहानियों का संकलन किया गया है। अरविन्द जी से अनुरोध है कि इन्हें अपने ब्लॉग पर यदि अबतक पोस्ट न किए हों तो अवश्य कर दें। पहले से मौजूद हो तो लिंक दें।

पोस्ट बहुत लम्बी होती जा रही है। अनूप जी की छाया पड़ गयी लगती है। अन्त में इतना बता दूँ कि इस वार्ता के अन्त में एक बुजुर्ग सज्जन ने यह सवाल दाग दिया था कि हिन्दी ब्लॉगिंग की चर्चा के कार्यक्रम में पॉवर प्वाइण्ट अंग्रेजी में क्यों दिखाया गया? अब इसका सम्यक उत्तर देने की जरूरत वहाँ नहीं समझी गयी, क्यों कि अरविन्द जी ने पूरी चर्चा हिन्दी में ही की थी। स्लाइड्‍स का प्रयोग केवल विषय पर केन्द्रित रहने के लिए किया गया था।

इस प्रकरण पर विस्तृत चर्चा ज्ञान जी की मानसिक हलचल पर हो चुकी है। यहाँ मैने उन स्लाइड्‍स का हिन्दी रूपान्तर करने की कोशिश की है। आशा है उन सज्जन की शिकायत भी दूर हो जाएगी। यहाँ तक पढ़ने के लिए धन्यवाद।

…जारी

अगला पाठ:

डॉ. कविता वाचक्नवी- कम्प्यूटर में हिन्दी अनुप्रयोग

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

ब्लॉगिंग कार्यशाला: पाठ-२ (फुरसतिया उवाच)

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“हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया” में प्रवेशोत्सुक नये कलमकारों को चिठ्ठाकारी के विविध पक्षों से परिचित कराने के लिए जो कार्यशाला आयोजित की गयी उसकी तस्वीरें देखने के बाद विषय-प्रवर्तन सम्बन्धी पहला पाठ और अखबारों में इस कार्यक्रम की चर्चा आप देख चुके हैं। इस कक्षा का दूसरा पीरियड कानपुर से इसी एक काम के लिए इलाहाबाद आये अनूप शुक्ल जी का था। हमें पता चला है कि निराला सभागार में पहुँचने से पहले इन्होंने अनेक खतरों का सामना किया था। लेकिन अपनी वार्ता में इन्होंने उनका कोई जिक्र नहीं किया। वह सब आप यहाँ और यहाँ देख सकते हैं।

हम यहाँ आपको यह बताते हैं कि संचालक इमरान ने इन्हें बुलाने से पहले यह बताया कि हमारे अगले मेहमान कानपुर से चलकर, बहुत कष्ट उठाकर, और अपनी घोर व्यस्तता के बावजूद समय निकालकर यहाँ आये हैं। उन्होने सोचा होगा कि इससे श्रोताओं पर भारी इम्प्रेशन पड़ेगा। लेकिन अनूप जी ने अपनी बात की शुरुआत ही इस भूमिका के खण्डन से की।

प्रमुदित अनूप जी... अनूप जी बोले, ”मित्रों सबसे पहले मैं बताना चाहता हूं कि मैंने इलाहाबाद में अपनी जिन्दगी के सबसे महत्वपूर्ण चार साल बिताये हैं। जब मैं यहां मोतीलाल नेहरू रीजनल इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ता था। सन १९८१ से १९८५ तक। इसलिये इलाहाबाद आना मेरे लिये हमेशा घर आने जैसा लगता है। …जैसे लड़कियां अपने मायके आती हैं और जी भर कर बतियाती हैं उसी तरह से मेरा अनुरोध है कि मुझे मेहमान न समझ कर घर का व्यक्ति समझा जाये ताकि मैं अनौपचारिक होकर बिना संकोच के जो याद आता है , समझ में आता है वह आपके साथ बांट सकूं।”

मैं यह भी कहना चाहता हूं कि मैं कोई ऐसा व्यस्त नहीं हूं। छुट्टी लेकर आया हूं। फ़ुरसतिया मेरा ब्लाग है तो मैं व्यस्त कैसे हो सकता हूं। मेरी समझ में व्यस्त तो वह होता है जिसके पास कोई काम नहीं होता है। मेरे पास ब्लागिंग के अलावा भी और तमाम काम हैं लिहाजा मुझे व्यस्त जैसा न मानकर फ़ुरसतिया ही माना जाये तो मैं ज्यादा सहज रह सकूंगा।

पूरा हाल ठहाकों से गूँज गया जब उन्होंने यह जुमला बोला –

“क्या बात है बहुत बिजी दिख रहे हो…? आज कल कोई काम-धाम नहीं है क्या?”

इतनी इधर-उधर की ठेलने के बाद वे सीधे मुद्दे पर आ गये। ब्लॉगिंग की कहानी का प्रारम्भ करते हुए बोले-

“मेरी जानकारी के अनुसार पहला ब्लाग सन १९९७ में अमेरिका में शुरू किया गया। हिन्दी में पहला ब्लाग लिखने वाले आलोक कुमार आदि चिट्ठाकार के रूप में जाने जाते हैं। सन २००३ में उन्होंने पहली बार हिन्दी ब्लाग शुरू किया। ब्लाग के लिये चिट्ठा शब्द भी उन्होंने ही सुझाया।”

अपनी ब्लॉग यात्रा के बारे में उन्होंने बताया, “मेरी ब्लाग-यात्रा की शुरुआत के पीछे भी अप्रत्यक्ष रूप से इलाहाबाद का ही हाथ है। डा. पूर्णिमा वर्मन इलाहाबाद  की छात्रा रहीं हैं और उन्होंने यहीं से संस्कृत में पी.एच.डी. की है। उनके द्वारा संचाचिल  साप्ताहि्क इंटरनेट पत्रिका अभिव्यक्ति  दुनिया के कई विश्वविद्यालयों में हिंदी के अध्ययन के लिये मानक संदर्भ पत्रिका के रूप में देखी जाती है। मैं नेट से जुड़ने के बाद नियमित रूप से अभिव्यक्ति देखा करता था। इसी में मैंने रविरतलामी जी का लेख  अभिव्यक्ति का नया माध्यम:ब्लाग देखा, शायद १४-१५ अगस्त २००४ को।  इस लेख को पढ़ते ही हम भी अपना ब्लाग शुरू करने को छटपटाने लगे।

 फुरसतिया उवाच
अपना ब्लाग शुरू करने में सबसे बड़ी समस्या की-बोर्ड की थी। कहीं से की-बोर्ड मिल ही नहीं रहा था कि कैसे लिखना शुरू हो। खोजते-खोजते देबाशीष के ब्लाग नुक्ताचीनी पर मौजूद छहरी आन लाइन की-बोर्ड की सहायता से बड़ी मुश्किल से कुल जमा नौ शब्द लिखकर अपने ब्लाग की पहली पोस्ट लिखी। हिंदी ब्लाग जगत में मैं लम्बी पोस्टें लिखने के लिये इतना बदनाम हूं कि लोग लम्बी पोस्टों को फ़ुरसतिया टाइप पोस्ट कहते हैं। लेकिन शुरुआत में कुल नौ शब्द लिखकर की थी:

अब कब तक ई होगा ई कौन जानता है !

इसके बाद धीरे-धीरे लिखने लगे। उस समय कुल जमा पचीस-तीस ब्लागर थे। प्रमुख ब्लागरों में रविरतलामी, देबाशीष, जीतेन्द्र चौधरी, अतुल अरोरा आदि थे। पंकज नरूला जिनको हम लोग मिर्ची सेठ कहते थे अक्षरग्राम का संचालन करते थे। इस चौपाल पर सब लोग अपनी समस्यायें और सूचनाएं रखते थे।

उन दिनों WINDOWS 98 और डायल-अप नेट कनेक्शन का जमाना था। आज की तरह विण्डोज़-एक्सपी नहीं थे जिसमें हिंदी का यूनिकोड फ़ॉण्ट पहले से ही मौजूद रहता है और टाइपिंग में ज्यादा मेहनत नहीं उठानी पड़ती है। हमारे शुरुआती दिनों में WINDOWS 98 पर हिन्दी में टाइप करने के लिये तख्ती का प्रयोग किया जाता था। बजरंगबली के इस प्रसाद तख्ती के द्वारा हम अपने पी.सी. को हिन्दी समझने-बूझने लायक बनाते और फ़िर ‘आन लाइन’ हिन्दी की-बोर्ड छहरी की सहायता से कट-पेस्ट करते हुये पोस्ट लिखने लगे। टिपियाने के लिये भी कट-पेस्ट करते। तख्ती पर निर्भरता बहुत दिन तक रही। इसीलिये हम अपने को तख्ती के जमाने का ब्लागर कहते हैं।

पचीस-तीस लोगों के बीच ब्लाग-पोस्टें पढ़ीं जातीं। चिट्ठाविश्व संकलक देबाशीष चक्रवर्ती ने बनाया था। उसमें पोस्ट एक-दो दिन बाद दिखाई देतीं। हम उसी में खुश रहते। लोग एक-दूसरे की पोस्ट पर टिपियाते। ब्लाग संबंधी किसी भी परेशानी के लिये तकनीक के जानकार सदैव उपलब्ध रहते। उन दिनों ब्लागर जी-मेल से संबद्ध नहीं था। देबाशीष और जीतेन्द्र चौधरी के पास न जाने कितने ब्लागरों के पासवर्ड बने और मौजूद रहते थे। लोग ब्लाग लिखने में अपनी समस्या बताते और बाकी का काम ये और इनके अलावा दूसरे स्वयं-सेवक करते रहते। जीतेन्द्र तो  अपनी टिप्पणियों में लिखते भी  थे-

“आपसे केवल एक ई-मेल की दूरी पर हम हैं। कोई समस्या हो निस्संकोच बतायें।”

लोगों को लिखने के लिये उत्साहित करने के लिये कई उपाय किये गये। देबाशीष का इन गतिविधियों में खास योगदान रहा। बुनो कहानी के तहत एक कहानी को तीन लोगों ने मिलकर लिखने का काम शुरू किया। कहानी की शुरुआत कोई करता, उसका अगला भाग कोई लिखता और कहानी का समापन कोई तीसरा करता। हर लेखक को अपनी मर्जी से कहानी को कोई भी मोड़ देने की स्वतंत्रता थी। कुछ दिन में बुनो कहानी का सिलसिला टूट गया।उत्सुक श्रोता

अनुगूंज मेरी समझ में हिन्दी ब्लाग जगत के सबसे बेहतरीन अनुभवों  में से एक रहा। इसे देबाशीष ने शुरू करवाया। इसमें माहवार ब्लागर साथी किसी दिये विषय पर लेख लिखते और फ़िर जो साथी अनुगूंज का संचालन करता वह सभी लेखों की समीक्षा अक्षरग्राम चौपाल पर करता। मेरे ख्याल में हिन्दी ब्लागजगत के सबसे बेहतरीन लेखों का अगर संकलन किया जाये तो उनमें से काफ़ी कुछ अनुगूंज के दौरान लिखे गये होंगे। दिसंबर २००४ में हुये पहले अनुगूंज का विषय था- क्या देह ही है सब कुछ? संयोग कुछ ऐसा कि काफ़ी दिन चलने के बाद अनुगूंज का आयोजन भी बन्द हो गया।

उन दिनों की एक और याद है। अंग्रेजी ब्लाग वाले भारतीय ब्लाग मेला का आयोजन करते थे। उसमें वे लोग सप्ताह में चुनी हुई पोस्टों का जिक्र करते। हम हिंदी वाले ब्लागर भी वहां जाकर अपनी-अपनी पोस्टों का लिंक देने लगे। जो अंग्रेजी ब्लागर हिंदी समझ लेते थे उन लोगों ने हम लोगों की पोस्टों का जिक्र किया। लेकिन एक बार एक ब्लागर ने हमारी पोस्टों को क्षेत्रीय भाषा (हिन्दी) में  लिखी होने की बात कहकर उनका जिक्र करने से इन्कार कर दिया। फ़िर तो वो दे तेरे की, ले तेरे की हुई कि बेचारे को अपना कमेंट बक्सा बन्द करना पड़ा। इस घटना की  प्रतिक्रिया में २००५ के शुरू में चिट्ठा चर्चा प्रारम्भ किया गया जो संयोगवश अभी तक चल रहा है।

इसके बाद चिट्ठाविश्व के धीमा होने की बात कहकर फ़िर नारद की शुरुआत की गयी। इसे पंकज नरूला उर्फ़ मिर्ची सेठ ने शुरू किया था। बाद में इसका संचालन जीतेन्द्र चौधरी करने लगे। काफ़ी दिनों  तक  नारद हिन्दी ब्लाग जगत का सर्वप्रिय संकलक बना रहा। बीच में नारद पर ट्रैफ़िक बढ़ जाने के कारण इसके बंद होने की नौबत आयी तो ब्लागर साथियों ने चंदा करके इसको फ़िर से शुरू करवाया।

जून २००७ में हिंदी ब्लाग जगत के सबसे देरी तक चलने वाला नारद विवाद शुरू हुआ। एक ब्लागर ने बेंगाणी बंधुओं पर आपत्तिजनक व्यक्तिगत टिप्पणी कर दी थी। हमने आपसी सहमति से उस ब्लाग को नारद  पर  बैन कर दिया। इसके बाद तो शुरू हुआ विवाद बहुत दिन तक चला। सारे ब्लाग जगत के लोग दो खेमों में बंट गये। नारद-समर्थक और नारद-विरोधी। कुछ लोग सामंजस्य बिठाने की बात भी कर रहे थे लेकिन नारद विरोधी लोग हमें तानाशाह और अभिव्यक्ति का दुश्मन बताते हुये प्रतिबंध की तुलना आपातकाल से करते रहे। हम अपने कदम को जायज ठहरा रहे थे। मैंने भी इस पर एक पोस्ट लिखी- नारद पर ब्लाग का प्रतिबंध – अप्रिय हुआ लेकिन गलत नहीं हुआ

बहरहाल काफ़ी दिन विवाद चलने के बाद ब्लागवाणी संकलक भी शुरू हुआ। इसके बाद चिट्ठाजगत आया। अभी  नारद को मिलाकर यही तीन प्रमुख संकलक हैं।

आज की तारीख में हिंदी ब्लाग जगत में लगभग छह हजार से अधिक ब्लाग हैं। हर दिन कम से कम पन्द्रह-बीस ब्लाग नये जुड़ने की सूचना मिलती है। लेकिन जब हमारे ब्लागों की संख्या एक सौ होने वाली थी तो हम एक-एक ब्लाग की राह तकते रहते थे कि आंकड़ा सौ तक पहुंचे। पलक पांवड़े बिछाये हर नये ब्लाग का इंतजार करते। जैसे ही सौ ब्लाग हुये हम लोग बच्चों की तरह अस्सी, नब्बे पूरे सौ कहते हुये खुशी से उछल पड़े थे।

ब्लाग के बारे में अलग-अलग लोग अपने-अपने अनुसार धारणा बनाते हैं। पत्रकार इसे मीडिया के माध्यम के रूप में प्रचलित करना चाहते हैं और साहित्यिक रुचि के लोग इसका साहित्यिकीकरण करना चाहते हैं। मेरी समझ में ब्लाग अभिव्यक्ति का एक माध्यम है। अब यह आप पर है कि आप इसका उपयोग कैसे करते हैं। लेख, कविता, कहानी, डायरी, फोटो, वीडियो, पॉडकास्ट और अन्य तमाम तरीकों से आप ब्लाग की सहायता से अपने को अभिव्यक्त कर सकते हैं।

अभिव्यक्ति के इसी सिलसिले में ब्लाग में कबाड़ से लेकर कंचन तक तक सब कुछ मौजूद है। अगर अस्सी फ़ीसदी कचरा है तो बीस फ़ीसदी कंचन भी मौजूद है। अब यह हम पर है कि हम यहां कंचन की मात्रा कैसे बढ़ाते हैं।

ब्लाग शुरू करना बहुत आसान है। आपका एक जीमेल एकाउन्ट होना चाहिये। इसके बाद आप ब्लागर डाट काम पर जाकर तीन चरणों में अपना ब्लाग शुरू कर सकते हैं। किसी भी किस्म की परेशानी होने पर किसी भी  ब्लाग पर जाकर या मेल लिखकर अपनी परेशानी बतायें वह दूर हो जायेगी। हिंदी के ब्लागर हर जगह मौजूद हैं।

हिंदी ब्लागिंग के इतिहास पर चर्चा के लिये मुझे पन्द्रह मिनट मिले थे। न जाने कितने यादें हैं पिछले चार-साढ़े चार की। सबको पन्द्रह-बीस मिनट की बतकही में समेटना मुश्किल है और आपके साथ अन्याय भी। इसलिये मैं अपनी बात यहीं समाप्त करता हूं। आपने मुझे इतने धैर्य से सुना इसके लिये शुक्रिया।

[नोट: अनूप जी ने अपनी आदत के मुताबिक कानपुर लौटकर स्मरण के आधार पर अपनी वार्ता की स्क्रिप्ट फुरसत से लिखकर मुझे उपलब्ध करा दिया। इसलिए मुझे इस पाठ को ठेलने में प्रायः कुछ भी नहीं करना पड़ा। इसलिए इसे ‘फुरसतिया टाइप पोस्ट’ के बजाय हू-बहू फुरसतिया पोस्ट ही समझा जाय। ]

…जारी

अगला पाठ: डॉ. अरविन्द मिश्रा साइंस ब्लॉगिंग पर

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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ब्लॉगिंग कार्यशाला: समाचार-पत्रों ने की चर्चा

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आज की पोस्ट अनूप शुक्ल जी द्वारा कार्यशाला में उपस्थित नये ब्लॉगोत्सुक श्रोताओं के समक्ष बाँटे गये उनके अनुभव की रिपोर्ट के रूप में आनी थी। लेकिन अखबारों की स्कैनिंग का काम ‘समय से’ (?) पूरा हो जाने के कारण इनका नम्बर पहले लग गया। इस धारणा के साथ कि अखबारी खबरों को बासी होते देर नहीं लगती, मैं इसे यथा सम्भव जल्दी पेश कर रहा हूँ।

अनूप जी वाला पाठ अगली पोस्ट में शीघ्र ही…

राष्ट्रीय सेमिनार-कार्यशाला के आयोजन की सूचना सभी स्थानीय अखबारों में प्रकाशित हुई। एक झलक आपके लिए:

सेमिनार ७

I-Next (जागरण समूह) ४ मई,२००९, इलाहाबाद

सेमिनारकी सूचनाएँ

अमर उजाला, हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण: ७ मई,२००९ इलाहाबाद

आठ मई को कार्यक्रम में शहर के प्रायः सभी प्रतिष्ठित सम्वाददाता स्वयं उपस्थित रहकर ब्लॉगिंग की बातें सुनते रहे और अगले दिन सचित्र समाचार प्रकाशित किए। कुछ ने तो अपना ब्लॉग भी शुरू किया।

सेमिनार १० सेमिनार ९

अमर उजाला, इलाहाबाद ९ मई, २००९

सेमिनार१२

I-Next, ९ मई, २००९

सेमिनार ८

हिन्दुस्तान ९ मई, २००९, इलाहाबाद

हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि अन्तर्जाल की दुनिया पर हम संदेशों के प्रचार-प्रसार के लिए चाहे जितना तेज काम कर लें, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर किसी आयोजन को सफल बनाने के लिए प्रिन्ट मीडिया का योगदान बहुत महत्वपूर्ण है। इसपर विशेष ध्यान देते हुए हमने पत्रकार मित्रों को सादर आमन्त्रित किया था।

इस कार्यक्रम की अच्छी कवरेज से इन्टरनेट से दूर रहने वाले लोग भी इस कार्यक्रम में सम्मिलित हो सके। इस सहयोग के लिए हम उनके प्रति हृदय से आभारी हैं।

(सिद्धार्थ)

ब्लॉगिंग कार्यशाला: पाठ-१ (विषय प्रवर्तन)

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“हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया” में प्रवेशोत्सुक नये कलमकारों को चिठ्ठाकारी के विविध पक्षों से परिचित कराने के लिए जो कार्यशाला आयोजित की गयी उसके चित्र आप देख चुके हैं। अब बारी है रिपोर्टिंग की। अनेक बड़े भाइयों ने विस्तृत जानकारी चाही है। नये लोग भी इसे यहाँ से जानना चाहेंगे कि हमने उन तीन घण्टों में ऐसा क्या किया जो शहर के सभी अखबारों को इसकी चित्रमय रिपोर्टिंग करनी पड़ी। विश्वविद्यालय में फोटो पत्रकारिता और जन संचार की पढ़ाई करने वाले छात्रों और शहर में रहने वाले अन्य बुद्धिजीवियों व पत्रकारों से बने श्रोता समूह को क्या बताया गया, आइए जानते हैं:

सर्वप्रथम भारतीय परम्परा के अनुसार सभी अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ (bouquet) भेंट करके किया गया। प्रदेश के अपर पुलिस महानिदेशक श्री एस.पी. श्रीवास्तव जी ने मुख्य अतिथि की भूमिका निभाते हुए दीप प्रज्ज्वलित करके कार्यक्रम का विधिवत उ्द्‌घाटन किया। पाँच बाती वाले दीप-स्तम्भ में घी के दीपक जलाने में पाँचो वक्ताओं ने हाथ बँटाया। इमरान की शेरो-शायरी ने माहौल को जिन्दा बनाए रखा।

जुगनू भी मेरे घर में चमकने नहीं देते,

कुछ लोग अन्धेरों को सिमटने नहीं देते।

हम हैं कि नयी पौध लगाने पे तुले हैं;

बरगद हैं कि पौधों को पनपने नहीं देते॥

प्रो.अलका अग्रवाल कार्यक्रम विश्वविद्यालय परिसर में था इसलिए विश्वविद्यालय की महिला सलाहकार समिति की अध्यक्ष और अर्थशास्त्र की विभागाध्यक्ष प्रो.अलका अग्रवाल जी अतिथियों का स्वागत करने स्वयं उपस्थित हो गयी थीं। इमरान उन्हें बता नहीं पाये थे कि यहाँ क्या होने वाला है क्योंकि उन्हें भी इनके आगमन की पूर्वसूचना नहीं थी। जब उन्होंने बताया कि वे स्वागत करने आयी हैं तो संचालक की भूमिका निभा रहे उनके शिष्य को माइक थमाना ही था। फिर बकौल ज्ञानजी आगे वही हुआ जो शाश्‍वत है। सबके शुरुआती उत्साह के सूरज पर उनका करीब २० मिनट का माइक-मोह घने बादल के रूप में छाया रहा। देश, काल, वातावरण और राजनीति से सम्बन्धित अनेक बातें होती रहीं और श्रोता किसी खुर्राट ब्लॉगर की भाँति उसे `स्किप’ करते रहे।

आखिरकार संचालक को मौका मिला और असली बातें शुरू करने के लिए सबसे पहले सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी बुलाए गये। इससे यह बात पुष्ट हो गयी कि इमरान को कवि सम्मेलनों और मुशायरों के कुशल संचालन का अच्छा अनुभव है। जहाँ नौसिखिए कवियों को शुरू में निपटाना पड़ता है क्यों कि श्रोता अभी महफिल छोड़ने के बारे में नहीं सोच रहे होते हैं।

विषय प्रवर्तन मैने अपने लिए बहुत साधारण काम ले रखा था- सिर्फ़ यह बताने का कि यहाँ क्या-क्या बताया जाएगा और उसको बताने की जरूरत क्यों है। लेकिन मुझे सबसे पहले यह स्पष्ट करना पड़ा कि यहाँ क्या-क्या नहीं बोलना है। समय के प्रबन्धन की जो बात किसी वार्ताकार को आगे बतानी थी उसका अनुपालन तत्काल करने की विनती मुझे करनी पड़ी। हम पहले ही आधा घण्टा गँवा चुके थे।

मैने मुद्दे पर लौटते हुए सबसे पहले यह बताया कि ब्लॉग आज के जमाने की ऐसी विद्या है जिसे सीखने के लिए किसी गुरू की आवश्यकता ही नहीं है। यहाँ जो लोग आए हुए हैं वो सभी मात्र यही बताने आए हैं कि इसे बहुत टेक्निकल मानकर दूर-दूर न रहिए। केवल इन्टरनेट युक्त कम्प्यूटर के पास बैठने की देर है। यदि हमारे भीतर जिज्ञासा की जरा भी लौ जल रही है तो बाकी सारी पढ़ाई अपने आप हो जाएगी। इक्कीसवी सदी में परवान चढ़ा यह माध्यम हमें विचार अभिव्यक्ति का एक ऐसा मौका देता है जहाँ हम स्वयं रचनाकार-लेखक, सम्पादक, प्रकाशक और मुद्रक सबकी भूमिकाएं निभाते हैं। कोई हमारा हाथ रोकने वाला नहीं है। केवल हमारा अपना विवेक ही है जो हमें कुछ करने या न करने के लिए रास्ता दिखाता है।

यहाँ बैठे अनुभवी लोग आपको यह नहीं बताएंगे कि आप क्या लिखें। बल्कि यह बताएंगे कि अपने मन की कोई भी बात लिखने और दूसरों को बताने से यदि अभी तक आप वंचित रह गये हैं तो अब समय आ गया है कि बिना किसी सम्पादक की कृपा का जुगाड़ खोजे आप अपने मन के उद्‌गार खुलकर व्यक्त कर सकते हैं। घर बैठे-बैठे आप पूरी दुनिया में पढ़े जा सकते हैं और अपने लिखे हुए पर पाठकों की स्वतंत्र टिप्पणी भी पलक झपकते पा सकते हैं। अपरिमित स्वतंत्रता के इस सुलभ माध्यम का आप कैसे प्रयोग करेंगे यह हम नहीं बताएंगे, यह तो आपको ही तय करना है। हम तो यह बताएंगे कि इसका प्रयोग कितने प्रकार से किया जा सकता है। कविता, कहानी, गीत, ग़ज़ल, डायरी, समाचार, व्यंग्य, आदि लिखकर, बोलकर, गाकर, या वीडियो बनाकर चाहे जैसे पूरी दुनिया को पेश कर सकते हैं।

हमने यहाँ इन अनुभवी ब्लॉगर्स को सिर्फ़ इस लिए बुला रखा है कि ये अपने अनुभव से आपको वह सब बताएंगे जो आपके मन के संकोच और संशय को मिटा देगा। एक ब्लॉगर के रूप में आप जो यात्रा शुरू करने वाले हैं उस यात्रापथ पर पहले से ही चलने वाले आपको इस राह की विशेषताओं के बारे में बताएंगे। यहाँ यह पता चलेगा कि यह सड़क कंकड़ीली, पथरीली, ऊबड़-खाबड़ है कि साफ-सुन्दर, चिकनी और रंगी-पुती आकर्षित करने वाली है।

इस यात्रा वृत्तान्त के पहले हमराही कानपुर के श्री अनूप शुक्ल जी  आपको ब्लॉगिंग के शुरुआती दिनों की बात बताते हुए अब तक की यात्रा से परिचित काराएंगे। आपका फुरसतिया नामक ब्लॉग यद्यपि लम्बी पोस्टों के लिए जाना जाता है लेकिन एक बार पढ़ना शुरू करने के बाद इसे बीच में छोड़ा ही नहीं जा सकता। आप हिन्दी भाषा के सभी ब्लॉग्स पर नजर रखते हैं। चिठ्ठाचर्चा नामक ब्लॉग से आजकल छपने वाले सभी चिठ्ठों में से चुनिन्दा पोस्टों की समीक्षा और लिंक्स वहाँ पायी जा सकती हैं। आज की चिठ्ठाकारी की दुनिया में जो रुझान चल रहे हैं ये उनकी नब्ज टटोलते रहते हैं। इनसे हम जानेंगे कि कैसी है हिन्दी चिठ्‌ठाकारी की दुनिया की आम प्रवृत्तियाँ और वे कौन लोग हैं जिन्होंने इसे यहाँ तक पहुँचाने में सक्रिय योगदान किया है।

चिठ्ठाकारी का कार्य एक खास उद्देश्य से किया जाना चाहिए। यह सिर्फ मन बहलाव के लिए करने पर अधिक दूरी तक नहीं जाता। उद्देश्य सामाजिक भी हो सकता है और व्यक्तिगत भी। इसी कड़ी में कुछ विज्ञानप्रेमी लेखकों ने बड़ी गम्भीरता से वैज्ञानिक विषयों पर ब्लॉग लेखन की एक विशिष्ट धारा शुरू की है। इनका प्रकट उद्देश्य समाज में व्याप्त अनेक रूढ़ियों और अन्धविश्वासों को मिटाना और सबके भीतर एक वैज्ञानिक सोच विकसित करने  का है। विज्ञान सम्बन्धी विषयों पर लिखने वाले चिठ्ठाकारों के संगठन साइंस ब्लॉगर्स एसोसिएशन ऑव इण्डिया के अध्यक्ष और क्वचिदन्यतोअपिसांईब्लॉग के लेखक वाराणसी से आए डॉ. अरविन्द मिश्रा जी इस धारा पर प्रकाश डालेंगे।

जब आप हिंदी भाषा का ब्लॉगर बनने का निर्णय लेकर कम्प्यूटर का ‘माउस’ पकड़ेंगे और की-बोर्ड (कुञ्जीपटल) पर केवल अंग्रेजी के अक्षर लिखा पाएंगे तो थोड़ी उलझन हो सकती है। हिन्दी टाइपिंग का ज्ञान इस विद्या के लिए जरूरी तो है नहीं। इसलिए आपको यह जानना होगा कि अपने कम्प्यूटर पर हिन्दी में लिखना-पढ़ना कैसे सम्भव हो पाएगा। मैं इतना बता दूँ कि यह बहुत आसान और सहज है। कैसे? यह आपको कविता जी बताएंगी। हैदराबाद (आन्ध्र प्रदेश) में रहने वाली डॉ.कविता वाचक्नवी आपको यह बताने आयी हैं कि हिन्दी कम्प्यूटिंग कितनी आसान है। आपके दर्जन भर ब्लॉग्स में से हिन्दी-भारत इस दिशा में काफी चर्चित है। इसी नामसे याहू-समूह का संचालन भी आप करती हैं। आप जानेंगे कि किस प्रकार शब्दों की रोमन वर्तनी लिखकर आप देवनागरी में छाप सकते हैं। कम्प्यूटर पर हिन्दी अनुप्रयोगों पर पूरा पैकेज आपको मिलने वाला है।

यहाँ एक बात मैं ही बता दूँ कि हिन्दी ब्लॉगिंग से अभी पैसा कमाने का काम नहीं शुरू हो सका है। अभी यह शैशवकाल में हैं। हम पढ़-लिखकर बड़े हो जाएंगे तभी कमाने के बारे में सोच पाएंगे। अभी तो स्वान्तः सुखाय का मुहावरा ही चलता है। जाहिर है कि जीविका के लिए या उसकी तैयारी के लिए आप कोई अन्य कार्य भी कर रहे होंगे। विश्वविद्यालय की या प्रतियोगी परीक्षाओं की पढ़ाई हो, प्राईवेट या सरकारी नौकरी हो, छोटा या बड़ा व्यवसाय हो, या वकील, डॉक्टर, पत्रकार, अध्यापक आदि का पेशा हो, ये सभी समय माँगते हैं। रोजी रोटी से जुड़े इन कार्यों के साथ आप ढिलाई नहीं बरत सकते। इसके अतिरिक्त कुछ सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियाँ भी हैं जो आपका समय चाहेंगी।

ब्लॉगिंग का नशा ऐसा है कि इसके आगोश में आपकी दिनचर्या गड़बड़ा सकती है। आप स्वास्थ्य को लेकर भी परेशान हो सकते हैं। ऐसे में आपको अपने समय का प्रबन्धन चतुराई और अनुशासन से करना पड़ेगा। हमारे बीच इस कठिन कार्य में अत्यन्त सफल होकर सबको चमत्कृत कर देने वाले हिन्दी ब्लॉगिंग के शीर्षपुरुष मौजूद हैं। ज्ञानदत्त पाण्डेय जी रेल विभाग के बहुत बड़े अफसर हैं। एन.सी.आर. की सभी मालगाड़ियाँ आपका इशारा पाकर ही सामान लादती हैं और गन्तव्य के लिए प्रस्थान करती हैं। नौकरी में चौबीसो घण्टे ऑन लाइन रहने वाले ज्ञानजी अपनी मानसिक हलचल को जितने सातत्य और सुरुचिपूर्ण ढंग से हमारे बीच प्रकाशित करते रहते हैं वह अद्वितीय है। इनसे हम एक सफल ब्लॉगर की सकारात्मक और नकारात्मक सीमाओं के बारे में जानेंगे और ब्लॉग प्रबन्धन के गुर सीखेंगे।

हमारा प्रयास होगा कि जब आप यहाँ से वापस जाएँ तो घर पहुँचते-पहुँचते आप अपने ब्लॉग का नाम तय कर चुके हों और एक दो दिन में आपका लिखा हम ब्लॉगवाणी पर देख सकें।

प्रत्येक वार्ताकार अपनी बातों को पूरा करने के बाद आपसे एक दो प्रश्न ले सकता है। आप अपना प्रश्न लिखकर रख लें। सम्भव है कि चारों वक्तव्य पूरा होने तक आप अपने प्रश्न का उत्तर पा जाएँ। लेकिन यदि फिर भी कुछ छूटा रह जाता है तो उसे आखिरी आधे घण्टे के प्रश्‍नोत्तर काल में निस्संकोच पूछें। यह एक दुर्लभ अवसर है। इसे हाथ से कत्त‍ई न जाने दें।

मैने चलते-चलते अपनी यह व्यक्तिगत राय भी रख दी कि आज इक्कीसवीं सदी में सूचना प्रौद्योगिकी के बढ़ते कदम के साथ कदम मिला कर चलना प्रत्येक पढ़े-लिखे व्यक्ति की पहचान होनी चाहिए। आज के जमाने में यदि आपका कोई ब्लॉग नहीं है तो  आप अपने व्यक्तित्व को सर्वश्रेष्ठ और पूर्ण नहीं मान सकते। ब्लॉग आपके प्रोफ़ाइल को मूल्यवान बनाता है।

!!धन्यवाद!!

(…जारी)

(अगला पाठ: अनूप शुक्ल जी का)

(सिद्धार्थ)