मोहब्बत में मिली रजनी को मौत 001 निरुपमा पाठक की मौत का मामला अभी अखबारी सुर्खियों से हटा भी नहीं था कि इलाहाबाद  में ऐसे ही क्रूर कथानक की पुनरावृत्ति हो गयी। इस बार किसी सन्देह या अनुमान की गुन्जाइश भी नहीं है। पुलिस को घटनास्थल पर मिले सबूतों के अनुसार परिवार वालों ने अपने पड़ोसी लड़के से प्रेम कर बैठी रजनी को उसके गर्भवती हो जाने के बाद पीट-पीटकर मार डाला और फिर उसे छत पर एक एंगिल से दुपट्टे के सहारे लटकाकर आत्महत्या का रूप देने की कोशिश की। लेकिन यहाँ पोस्ट मार्टम रिपोर्ट ने सच्चाई से पर्दा उठाने में कोई चूक नहीं की।

रिपोर्ट ने जाहिर किया है कि रजनी को इतना पीटा गया कि शरीर के कई हिस्से काले पड़ गये। सिर में गम्भीर चोट पायी गयी। नाक से खून बहा। गले पर उंगलियों के निशान मिले हैं और सिर दीवार से टकराने की बात आयी है। गर्भवती रजनी के पेट पर वार किये गये थे जिससे उसे अन्दरूनी चोट लगी थी। पुलिस ने रजनी के माता-पिता, दो भाइयों और एक बहन को हिरासत में ले लिया। उसके प्रेमी से भी पुलिस पूछताछ कर रही है।(पूरी रिपोर्ट पढने के लिए अखबारी कतरन को क्लिक करिए)

यह मामला निरुपमा पाठक प्रकरण की तरह पेंचीदा नहीं है। बल्कि अत्यन्त सरल और उजाले की तरह साफ़ है। यहाँ लड़की केवल हाई स्कूल तक पढ़ी थी। निम्न मध्यम वर्ग के साहू परिवार में जन्मी रजनी ने घर वालों की इच्छा के विरुद्ध पड़ोसी केसरवानी परिवार के लड़के से प्रेम किया। घर वाले उसकी शादी की उम्र होने पर अन्यत्र शादी करना चाहते थे जिससे इन्कार करने पर उसे पीट-पीटकर अधमरा कर दिया गया और फिर फाँसी पर लटका दिया गया। यहाँ दलित और सवर्ण जाति के बीच बेमेल रिश्ते का प्रश्‍न भी नहीं था। यह कुकृत्य किसी पिछड़े ग्रामीण इलाके की खाप पंचायत की देखरेख में भी नहीं हुआ। किसी हाई-सोसायटी की परम आधुनिक जीवन शैली में जीने वाली कोई आधुनिका भी नहीं थी रजनी। लेकिन हश्र वही हुआ जो निरुपमा का हुआ था। आखिर क्यों?

व्यक्ति का अस्तित्व किन बातों पर टिका है यह विचारणीय है। परिवार, समाज, राज्य और वैश्विक परिदृश्य के सापेक्ष उसकी निजी हैसियत क्या है? समाज में नाक कट जाने के डर से परिवारी जन घोर अमानवीय कृत्य कर डालते हैं और यही समाज/राज्य उन्हें जेल भेंज देता है। क्या इससे नाक बची रह जाती है? फिर यह वहशीपन क्यों? आखिर इस कुकृत्य की प्रेरक शक्तियाँ कहाँ से संचालित होती हैं। सुधीजन इस पर अपने विचार रखें। बिना किसी अगड़े-पिछड़े, छोटे-बड़े, हिन्दू-मुस्लिम, अमीर-गरीब, वाम-दक्षिण, महिला-पुरुष के चश्में को चढ़ाये इस मुद्दे पर सोच कर देखिए। केवल मनुष्य के रूप में इस विषय पर चर्चा करिए। क्या कुछ निष्कर्ष निकल पा रहा है?

मेरी कोशिश तो फिलहाल असफल हो रही है। मनुष्य ने अपने लिए जो तमाम श्रेणियाँ बना रखी हैं उससे बाहर निकलना सचमुच बड़ा कठिन है। शायद असम्भव सा…।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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