क्षमा प्रार्थना…

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DSC02527 हे मूषक राज,

बहुत भारी मन से आपको विदा कर रहा हूँ। आपको कष्ट देने का मेरा कोई इरादा नहीं था। लेकिन क्या करूँ, आपने हमारे परिवार को ऐसा मानसिक कष्ट दिया कि आपको अपने घर से दूर कर देने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। आपसे विनती करने का कोई माध्यम होता तो मैं आपसे हाथ जोड़कर कहता कि आप इस घर के निरीह प्राणियों पर दया करिए। लेकिन आपको सलाखों के पीछे कैद करने के सिवा हमारे पास कोई दूसरा हल नहीं था। आपको जो कष्ट हुआ उसके लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं।

अपने विचित्र शौक को पूरा करते हुए आपने हमारे घर के किचेन से लेकर ड्राइंग रूम तक और आंगन से लेकर बेड रूम तक क्या-क्या नहीं काट खाया। कितने कपड़े, जूते-चप्पल, और घरेलू सामान आपकी निरन्तर वृद्धिमान दन्तपंक्ति की भेंट चढ़ गये। लेकिन हम यह सब कुछ सहते रहे। एक तो आपकी चंचल गति और दूसरे हमारी धर्म भीरु मति- दोनो आपकी सुरक्षा में सहायक रहे। आप हमारे आराध्य देव प्रथम वंदनीय, प्रातः स्मरणीय, गणपति, गणनायक, विघ्नविनाशक, लम्बोदर, उमासुत श्री गणेश जी के वाहन हैं। आपको किसी प्रकार की क्षति पहुँचाना हमारे लिए पाप की बात है। ऐसे कई अवसर आये जब आप हमारी आँखों के सामने ही हमें चिढ़ाते हुए चलते बने। घर के मन्दिर में चढ़ाया हुआ प्रसाद उठाने से जो हम चूक गये तो उसका भोग आप ही लगाते रहे। कदाचित्‌ मेरी गृहिणी मन ही मन खुश होती रही कि शायद आपकी पीठ पर बैठकर भगवान स्वयं भोग लगाने आते हों।

खुराफ़ात का अन्त आप छत से रोशनदान की ओर आने वाले डिश-टीवी के केबल पर चढ़कर घर के भीतर आते-जाते रहे। भारी देह होने के कारण एकाध बार अचानक ताली की आवाज से विचलित होकर आप फर्श पर आ गिरे तो भी आपका बाल बांका नहीं हुआ। बल्कि हम ही पाप के भागी होने के डर से सहम गये थे।

बचपन में अपने गाँव पर गेंहूँ की कटाई के बाद खाली हुए खेतों में आपका शिकार करने वालों को मैं देखता था। आपके बिल की खुदाई करने पर जमीन के भीतर आपकी बनायी हुई जो सुरंग मिलती थी उसे देखकर हम चौक जाते थे। आपने कितनी सफाई से भीतर ही भीतर गेंहूं की बालियों को इकठ्ठा रखने के लिए बड़े-बडे गोदाम बना रखे होते थे। अपने नवजात बच्चों के लिए सुरंग की सबसे भीतरी छोर पर नर्म मुलायम घास के बिस्तर सजा रखे होते थे। जब ये मुसहर जाति के शिकारी कुदाल से आपका आशियाना खोद रहे होते और आपके पूरे खानदान का सफाया कर रहे होते तो मेरा कलेजा कांप उठता था। आप द्वारा जमा किया हुआ अनाज उनका भोजन बन जाता। लेकिन जिस किसान के खेत पर आपकी कृपा हो जाती वह सिर पकड़ कर बैठ जाता।

मैने देखा था कि आपको पानी से बहुत भय हुआ करता था। आपको बिल से बाहर निकालने के लिए उसमें पानी भर दिया जाता था। आप जब घर में आयी बाढ़ से बचने के लिए बदहवास होकर भाग रहे होते तो आपके पीछे डण्डा लेकर दौड़ते गाँव के लड़के और उनके साथ आपका पीछा करने वाले कुत्ते अपनी पूरी शारीरिक शक्ति झोंक दिया करते थे।  बहुधा आप उन्हें चकमा देने में सफल हो जाते। लेकिन वे जब आपका शिकार कर लेते थे तो आपको आग में भूनकर नमक मिर्च के साथ चटखारे लेकर खाते हुए  वे लोग मेरे मन को घृणा से भर देते थे।

कुत्ते और बिल्लियों के लिए आपका उत्सर्ग तो अब किंवदन्ती बन चुका है। टीवी पर टॉम और जेरी का कार्टून देखते हुए मेरे बच्चे हमेशा आपके चरित्र से सहानुभूति रखते हैं। बिल्ले को हमेशा छकाते हुए आप सदैव तालियाँ बटोरते रहते हैं, लेकिन असली दुनिया आपके लिए इतनी उत्साहजनक नहीं है। शहरी जीवन शैली में आपको बर्दाश्त करने का धैर्य कम ही लोगों में है। आपको मारने के लिए तमाम जहरीले उत्पाद बाजार में लाये गये हैं। अब तो एक ऐसा पदार्थ बिक रहा है जिसे खाकर आप घर से बाहर निकल जाते हैं और खुले स्थान पर काल-कवलित हो लेते हैं।

एक बार गाँव में जब आपकी प्रजाति ने घर में कुहराम मचा रखा था तो एक दवा आँटे में मिलाकर जगह जगह रख दी गयी थी। उसके बाद जो हुआ उसे याद करके हम काँप जाते हैं। पूरे घर में बिखरी हुई लाशें कई दिनों तक इकठ्ठा की जाती रहीं। दो-चार दिन बाद जब दुर्गन्ध के कारण घर में रहना मुश्किल हो गया तो नाक पर पट्टी बाँधकर चींटियों की पंक्ति का सहारा लेते हुए अनेक दुर्गम स्थानों पर अवशेष मृत शरीरों को खोजा गया।   पूरे घर को शुद्ध करने के लिए हवन-अनुष्ठान कराना पड़ा। इसके बाद घर में यदि कोई बीमार हो जाता तो इसे उस हत्या के पाप का प्रतिफल माना जाता रहा। तबसे हम आपका समादर करने के अतिरिक्त कुछ सोच ही नहीं सकते।

हमने आपको कैद करने के बारे में कदापि नहीं सोचा होता यदि आपने शौचालय की सीट में लगे साइफ़न में इकठ्ठा पानी को अपना स्विमिंग पूल न बनाया होता। जाने आपको इस गन्दे पानी में स्नान करने का शौक कहाँ से चढ़ गया? इधर हमने देखा कि आपके पैरों के निशान कमोड से प्रारम्भ होकर वाश बेसिन पर और साबुनदानी को उलटने –पुलटने के बाद बरामदे में रखे सभी सामानों पर अपनी छाप छोड़ते हुए डाइनिंग टेबुल तक पहुँचने लगे थे। आपने हमारे सरकारी मकान के बाथरूम में लगे जीर्ण हो चुके दरवाजे के निचले कोनों पर छेद बना रखा था।

DSC02541 हमने पहली कोशिश तो यही की थी कि आपको ट्वायलेट में जाने से रोका जाय। रात में सोने से पहले हमने उन छेदों को एक बोरे से बन्द करके उसपर ईंट रख दिया था। सुबह हमने देखा कि आपने गुस्से में बोरे को कुतर दिया है और उसकी लुग्दी पूरे बाथरूम में बिखरा दी है। कदाचित इस गुस्से के कारण ही आपने उस रात रोज से ज्यादा लेड़ियाँ भी  भेंट कर दी थीं। हमने अगले दिन उन छिद्रों को टिन की प्लेट से ढँक दिया। लेकिन आप हार मानने वाले हैं ही नहीं। आपने अगली रात को उस टिन के ठीक बगल में दूसरा छेद बना लिया और अपना नरक-स्नान बदस्तूर जारी रखा।  छेद के पास ही दरवाजे के बाहर हमने जो एक चूहेदानी लगा रखी थी उसे भी आपने नहीं छुआ। आपको तो भीतर घुसने की जल्दी रही होगी।एक रास्ता बन्द हुआ तो दूसरा खोल लिया

हमें विश्वास हो गया कि आपको ट्वायलेट के भीतर जाने से नहीं रोका जा सकता है। आप स्नान करने से पहले कुछ और नहीं करते। चूहेदानी में रखे आलू के टुकड़े को आप तभी छुएंगे जब स्नान ध्यान पूरा हो जाएगा। मैने इस बार चूहेदानी को अन्दर ही लगा दिया ताकि जब आप अपने बाथटब से बाहर निकलें तभी भोजन की तलाश में उधर आकर्षित हों। इस बार युक्ति काम कर गयी। रात के करीब एक बजे जब खटाक की आवाज हुई तो मुझे चैन मिला। उठकर मैने तत्क्षण देखा। आप मेरे कैदी हो चुके थे। सद्दाम हुसेन को पकड़ने के बाद राष्ट्रपति बुश के चेहरे पर जो विजयी मुस्कान थी उसे भी मात देती हुई खुशी के साथ मैंने रात बितायी। आपको आपके पसन्दीदा स्थान पर ही कैदबन्द छोड़ दिया था मैने।

DSC02553 जब सुबह उठकर देखा तो आप अपने पिंजड़े के साथ कमोड की सीट में लुढ़के हुए थे। गजब का प्रेम था आपका उस नरक के रस्ते से। मैने एक प्लास से आपको पिजड़े सहित उठाया, आंगन में ले जाकर नल के पानी से विधिवत स्नान कराया और सुबह की ताजी धूप में सुखाने के बाद आपकी यादों को कैमरे में कैद करने के लिए उसी डाइनिंग टेबुल पर रख दिया जिसपर आप प्रायः विचरण करते रहते थे। आपको सलाखों के पीछे बहुत देर तक रखने की मेरी कोई मंशा नहीं थी। लेकिन मेरी श्रीमती जी सोमवती अमावस्या के अवसर पर पीपल देवता की पूजा करने, उनकी १०८ बार परिक्रमा करने गयी हुई थीं और मेरे बच्चे सो रहे थे। उन सबको आपका दर्शन कराये बगैर मैं आपको भला कैसे जाने देता?

अब जबकि मैने आपको अपने घर से एक किलोमीटर दूर इस मन्दिर के प्रांगण में लाकर छोड़ने का निश्चय किया है तो मन में मिश्रित भाव पैदा हो रहे हैं। दुःख और सन्तोष दोनो कुलांचे भर रहे हैं। उम्मीद है कि मन्दिर से सटा हुआ यह हरा-भरा पार्क आपको निश्चित ही अच्छा लगेगा। इस मन्दिर में दक्षिणमुखी हनुमान जी है, भगवान शंकर जी हैं, दुर्गा माँ की छत्रछाया भी है और आपके स्वामी गणेश जी भी पदासीन हैं। देखिए न, यहाँ कितनी धर्मपरायण सुहागिन औरतें पीपल के चबूतरे पर पूजा-परिक्रमा कर रही हैं। बड़ी मात्रा में प्रसाद चढ़ाया जा रहा है। आप इनका आनन्द उठाइए। हाँ, अपना नरक-स्नान का शौक त्याग दीजिएगा तो भला होगा।

आशा है कि मैने आपको जो नया बसेरा दिया है उसको मद्देनज़र रखते हुए आप मुझे माफ़ कर देंगे। मैने आपको पिजड़े में बन्द करके और नल के साफ पानी से स्नान कराके जो कष्ट दिया है और आपकी कैदी हालत में बेचैनी से किए गये क्रिया-कलाप दुनिया को दिखाने के लिए रिकॉर्ड किया है उसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ।

सादर!

आपका एक अनिच्छुक भक्त

(सिद्धार्थ)

विदा से पूर्व मूषक राज के करतब

कैद में खुराफ़ाती
सलाखों के पीछे

तेली के बैल का गोल-गोल चक्कर…

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इस पूरे प्रकरण पर कुछ नया कहने लायक बचा ही नहीं है। मूल पोस्ट और उसकी चर्चा के बीच अभिमन्यु प्रसंग की याद दिलाती एक अन्य पोस्ट और इन पोस्टों पर आयी टिप्पणियों को आद्योपान्त पढ़ने के बाद मन बड़ा दुविधाग्रस्त हो गया। कुछ बोलें कि न बोलें। जार्ज बुश की प्रसिद्ध उक्ति याद गयी कि आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में आप या तो हमारे साथ हैं या हमारे विरुद्ध हैं। यानि तटस्थता की कोई गुन्जाइश नहीं है।

दोनो ओर से ललकारे जाने के बाद कुछ लोग सफाई देते भी नजर आये। कुछ ऐसा आभास दिया जाने लगा कि अब मानव सभ्यता के इतिहास में कोई युगान्तकारी फैसला होने वाला है। इसके बाद अब दुनिया पहले जैसी नहीं रह जाएगी। अब मानव समाज में केवल दो वर्ग बचेंगे- नर और नारी। बाकी सारे सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक वर्ग-भेद मिट जाएंगे। दलित, पिछड़ा, अगड़ा, अमीर, गरीब, शिक्षित, अशिक्षित, नैतिक, अनैतिक, पारम्परिक, आधुनिक, जैसी टुच्ची धारणाएं इस लैंगिक पहचान की आँधी में उड़ जाएंगी। मुझे तो थोड़ी खुशी भी होने लगी थी। कितना क्रान्तिकारी परिवर्तन हमारी आँखों के सामने मूर्तिमान होने जा रहा था। एक पल को तो मैने सोचा कि अगले दिन के सभी अखबार इस घटना को सबसे बड़ी खबर के रूप में छापेंगे। टीवी चैनेल्स पर बजट की समीक्षा और ढोंगी बाबाओं के कुकर्म की चर्चा से पक चुके दर्शकों को एक ‘बम्फाट’ ब्रेकिंग न्यूज मिलेगी। पैनेल डिस्कशन के लिए समाजशास्त्रियों की पूछ बढ़ जाएगी। विश्वविद्यालयों और शोध संस्थाओं में सेमिनार आयोजित होंगे। पत्रिकाएं विशेषांक निकालेंगी।

इसी खुशी में मुझे रात भर नींद नहीं आयी। ऐसा इसके पहले मेरे साथ सिर्फ़ एक बार हुआ है। जब पहली बार पी.सी.एस. में सेलेक्शन का फाइनल रेजल्ट निकला था [जब लोक सेवा आयोग द्वारा चयनित किये जाने का पहली बार परिणाम घोषित हुआ था- शुद्ध हिन्दी :)]। हॉस्टेल के कमरे में रात भर करवट बदलता रहा था। अगले दिन के अखबार में अपना नाम छपा देखने की उत्सुकता थी।

लेकिन इस बार निराशा हाथ लगी। रविवार की सुबह जस की तस थी। अखबारों में वही हत्या, लूट, बलात्कार, राजनीति, महंगाई, भ्रष्टाचार, दलित उत्पीड़न, प्रशासनिक लापरवाही, प्रेम प्रसंग में फाँसी की सजा, फिल्मी दुनिया, क्रिकेट, व हाँकी विश्वकप की खबरें छायी हुई थीं। विज्ञापनों में भी कमनीय काया की धनी सुन्दरियाँ बदस्तूर मोबाइल से लेकर पुरुष अण्डरवियर, शेविंग क्रीम, कम्प्यूटर, शक्तिवर्द्धक चूर्ण और गाड़ियों के टायर तक बेंच रही थीं। टीवी पर भी एंकर चीख-चीखकर कृपालु महाराज की कृपा से काल-कवलित भक्तगणों के पीछे छूट गये परिवारी जनों का हाल सुना रहा था। राहुल महाजन के स्वयंवर के पटाक्षेप की खबरें ही तारी और जारी थीं। मुझे बड़ा धोखा हुआ जी…

मैने हिन्दी ब्लॉगजगत का दुबारा मुआयना किया। सभी बातें दुबारा पढ़ी। इस बार थोड़ी सावधानी से। उसमें कुछ नया तत्व छाँटने की कोशिश की। इस सारी कोशिश के दौरान मुझे अपने गाँव के सोभई तेली का कोल्हू से तेल पेरना याद आ गया। चूँ..चाँ..चर्र करते लकड़ी के कोल्हू में जुता हुआ बैल गोल-गोल चक्कर लगाता रहता था। सोभई तेली अपने बाकी काम निपटाते हुए बीच-बीच में आकर ‘घानी’ चला दिया करते। बैल की आँख पर मूज की बुनी हुई तश्तरीनुमा डलिया औंधाकर बाँध दी जाती थी ताकि बैल द्वारा पेरी जा रही सरसो खा न ली जाय। वह बैल ढंकी हुई आँखों के साथ उसी गोल दायरे में चक्कर पर चक्कर लगाये जाता था।

यह नर-नारी प्रसंग जिस प्रकार और जितनी बार इस हिन्दी ब्लॉगजगत में उठाया जाता है इसका स्वरूप लगभग उसी गोल-गोल चक्कर वाला ही रहता है। जब कोई नया ब्लॉगर मुद्दे को नये ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास करता है तो कदाचित्‌ अन्य चिठ्ठाकारों के प्रति कोई पूर्वाग्रह मन में रखे बगैर उसकी पोस्ट आती है। लेकिन पहले से तयशुदा खाँचों में फिट दिमाग वाले लोग अपने-अपने हथियारों के साथ या तो उसके संरक्षण का जिम्मा उठा लेते हैं या उसपर पिल पड़ते है। रूढ़ हो चुकी धारणाओं, कुन्द हो चुके तर्कों और प्रगाढ़ हो चुके पूर्वाग्रहों के साथ गोलबन्द हो चुके ब्लॉगरजन अपनी-अपनी भड़ास निकालने वहाँ पहुँच ही जाते हैं। सबकुछ इतना यन्त्रवत्‌ सा लगता है कि आश्चर्य होता है। कोई समाधान दूर-दूर तक नहीं दिखायी देता।

इसबार नया यह हुआ कि माननीयों ने अपनी रही-सही मर्यादा भी ताख पर रख दी और खुलकर दो-दो हाथ कर लेने का उद्‌घोष कर दिया। एक-एक चुनिन्दा शब्दवाण चलाये गये। असली मुद्दा न जाने कहाँ चला गया और ‘दे तेरी की… ले तेरे की’ शुरू हो गयी। वही जाने-पहचाने चेहरे और वही घिसी-पिटी उक्तियाँ, जैसे इस युद्ध में विरोधी को हर हाल में परास्त कर देना है। ऐसे बिगड़े माहौल में एक साझे सत्य को खोजने और पहचानने की मेरी कोशिश कैसे सफल हो? अब यहाँ रवि रतलामी जी अलग-अलग श्रेणियों के टॉप-टेन ब्लॉग की ख्वाहिश भी नहीं कर पा रहे हैं तो इसका दोष हम खुद को न दें तो किसे दें?

मेरी बात पर यदि आपको विश्वास नहीं है तो जुलाई-२००८ में लिखी  हुई मेरी यह कविता पढ़िए। ताजे प्रकरण पर यदि मुझे आज भी लिखना होता तो शायद इसमें कुछ नया जोड़ने की जरूरत न पड़ती:

 

प्रगतिशील स्वातन्त्र्य-प्रेम की लौ जलती है,
समता के अधिकारों की इच्छा पलती है।
इस समाज ने डाल दिये हैं जो भी बन्धन
छिन्न-भिन्न करने देखो,‘नारी’ चलती है॥

घर की देवी, पुण्य-प्रसूता, कुल की रानी,
ममतामयी, सहचरी, प्रिया, बात-बेमानी।
अब दुर्गा, काली का रूप धर रही माया;
करुणा छोड़ ध्वंस करने की इसने ठानी॥

वैवाहिक बंधन अब बेड़ी सा लगता है,
है नर का वर्चस्व, भाव ऐसा जगता है।
इस अन्याय भरी दुनिया के खण्डन से ही;
इनके मन से क्षोभ-कलुष देखो भगता है॥

जंगल के बाहर मनुष्य का वो आ जाना,
नर-नारी के मिलन-प्रणय का नियम बनाना।
घर, परिवार, समाज, देश की रचना करके
कहतीं, “नर ने बुना स्वार्थ का ताना-बाना”॥

पढ़ी ‘सभ्यता के विकास’ की गाथा सबने,
इन्सानी फ़ितरत को अर्स दिया था रब़ ने।
इन कदमों को रोक सकेगी क्या चिन्गारी;
जिसे हवा देती हैं नारीवादी बहनें॥

क्या लम्बी यात्रा पर निकला पुरुष अकेला?
बिन नारी क्या सृजित कर लिया जग का मेला?
इस निसर्ग के कर्णधार से पूछ लीजिये,
जिसने देखी प्रथम-प्रणय की वह शुभ बेला॥

प्रकृति मनुज की है ऐसी, ‘होती गलती है’,
पर विवेक से, संयम से यह भी टलती है।
है ‘सत्यार्थ मित्र’ को पीड़ा चरमपंथ से;
छिन्न-भिन्न करती नारी मन को खलती है॥

(सिद्धार्थ)

पुछल्ला: आज मैं आदरणीय ज्ञान जी के घर गया था। सपरिवार बैठकर खूब गुझिया, नमकीन, सकरपारा, पकौड़ी और कॉफ़ी का आनन्द लिया गया। गुरुदेव अपनी पोस्ट में चाहे जो लिखें लेकिन वे बिल्कुल ठीक-ठाक और सक्रिय हैं। अलबत्ता इस धींगा-मुश्ती से दूरी बनाये हुए हैं। उनकी कुशलता का राज कहीं इस पॉलिसी में ही तो नहीं छिपा हुआ है 🙂
ज्ञानदत्त पाण्डेय जी के साथ DSC02516

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

बुद्धू सा खड़ा मैं…।

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ब्लॉग जगत की हलचल से अलग रहते हुए अपनी सरकारी नौकरी बजाने में ही हलकान हो जाने पर मैने मन को समझा लिया कि इसमें बहुत परेशान होने की जरूरत नहीं है। ऑफ़िस से लौटकर घर आने के बाद शर्ट की बटन खोलने के पहले कम्प्यूटर का बटन ऑन करने की आदत पड़ गयी थी। उसे बड़े जतन से बदल लिया है। आलसी की कुर्सी खाली देख उसे ही हथिया लिया है मैंने।

अहा, निष्क्रियता के भी क्या मजे हैं…! क्या हुआ जो नयी पोस्ट डाले हफ़्ते से ज्यादा हो गये…? क्या फ़र्क पड़ता है जो गूगल रीडर में सैकड़ों पोस्टें पढ़े जाने का इन्तजार कर रहीं हैं…?  मेरी श्रीमती जी जो कम्प्यूटर से मेरी इस बढ़ती दूरी से मन ही मन प्रसन्न रहने लगी थीं, उन्होंने भी लम्बे ब्रेक के लिए टोक दिया तो क्या हुआ..!  मैं तो बस आराम से आराम करने की जिद पर अड़ा अकर्मण्यता के मजे ले रहा था।

मेरा बेटा जो बैट-बॉल के खेल में मुझे अनायास पाकर हर्षित हो रहा था उसने भी अन्ततः मुझे ‘कम्प्यूटर पर पढ़ाई’ करने की सलाह दे डाली। बेटी की परीक्षा की तैयारियों में मेरी अचानक बढ़ती रुचि से वह भी हैरत में पड़ गयी- “डैडी, तुम्हें अब कुछ पोस्ट नहीं करना है?”  लेकिन मैं तो अपने मस्तिष्क को कोई कष्ट देने के मूड में ही नहीं था। ऑफिस के काम से ही दिमाग का दही बन जाय तो घर पर उसकी लस्सी घोंटने की हिम्मत कहाँ बचती है? सोच रहा था कि अब मार्च बीतने तक ऐसा ही रहने वाला है।

अब हम ज्ञान जी जैसी खोजी शक्ति से सम्पन्न तो हैं नहीं कि जहाँ नजर उठायी वहीं से एक पोस्ट का माल जुटा लिया। कुछ अच्छा और नया लिखने के लिए जो पैनी नजर, सृजनात्मकता और घ्राण शक्ति चाहिए वह तो मुझमें  सीमित ही है। केवल उत्साह के दम पर कबतक आस-पास की सर्वविदित बातें ठेलते रहेंगे? हिन्दी चिट्ठों पर भाई लोग कितना कुछ तो लिख रहे हैं। मेरे लिए कुछ छोड़ें तब न…। मन को यही सब समझा-बुझाकर अपनी निष्क्रियता के आनन्द सागर में गोते लगाते हुए मैं दिन काट रहा था तभी ये मुंआ वेलेन्टाइन आ धमका…।

एक दिन पहले से ही तार टूट जाने से मेरे सरकारी मुहल्ले की बिजली गुल थी। किसी ने कॅम्प्लेन्ट नहीं दर्ज करायी क्योंकि साहब लोगों के घर बिजली का आना जाना जल्दी पता ही नहीं चलता। जब रात में इन्वर्टर जवाब दे गया तो पता चला कि बिजली दस घण्टे से गुल थी। कम्प्यूटर भी घूल धूल से नजदीकियाँ बढ़ा रहा था।

सुबह सुबह जब मोबाइल पर ‘एसेमेस’ आने लगे तो हम उन्हें मिटाने लगे। कई तो बिना पढ़े ही। फिर एक फोन आया- एक पुरानी साथी का था।

“हैप्पी वेलेन्टाइन डे”

“थैंक्यू- सेम टू यू…” मैने अचकाते हुए कहा फिर झेंप मिटाते हुए बोला, “अरे, बहुत दिन बाद… अचानक आज के दिन? सब खैरियत तो है?”

“क्यों, ऐसे क्यों पूछ रहे हैं… विश नहीं कर सकते क्या?”

“क्यों नहीं, जरूर करिए… अधिक से अधिक लोगों को कर डालिए, प्यार तो बहुत अच्छी चीज है…”

सामने से मुस्कराती हुई श्रीमती जी ने पूछा किसका फोन है। मेरे जवाब देने से पहले उधर से लाइन कट गयी। फिर मैं यूनिवर्सिटी के दिनों की बातें बताने लगा। कई बार बता चुका था फिर भी नये सन्दर्भ में बताना पड़ा। अब दिनभर सण्डे टाइप काम-धाम होते रहे। तेल में तली हुई लज्जतदार बाटी और आलू-बैगन-टमाटर का भर्ता व चने की तड़का दाल बनी। चटखारें ले-लेकर खाया गया। बनाने वाली की बड़ाई की गयी।

शाम को एक भाभी जी का मेसेज आया। वही भगत सिंह को फाँसी दिए जाने की तिथि को भुलाकर वेलेण्टाइन मनाने को लानत भेंजने वाली। श्रीमती जी ने मुझे दिखाया। मुझे बात खटक गयी। उस समय भौतिकी के एक सेवा निवृत्त प्रोफ़ेसर मेरे घर आये हुए थे। उनसे चर्चा हुई। मैने याद करके बताया कि फाँसी मार्च में हुई थी। उन्होंने समर्थन किया। यह भी कि गान्धी जी को इसके बाद लाहौर जाते समय रास्ते में बहुत गालियाँ पड़ी थी कि उन्होने लॉर्ड इर्विन से समझौते के समय फाँसी की माफी नहीं मांगी। मैने रचना से कहा कि नेट खोलकर चेक कर लो। ये नेट पर तो आयीं लेकिन अपनी ताजी पोस्ट की टिप्पणियाँ देखने लगीं।

जी-मेल पर गिरिजेश भैया मिल गये। चैट पर उनसे ही सवाल दाग दिया- भगत सिंह को फाँसी कब हुई? जवाब आया- २३ मार्च। उसके बाद ‘धन्यवाद’ टाइप करने के बजाय इन्होंने गलती से ‘0’ छाप दिया। भइया ने समझा कि परीक्षा में उन्हें शून्य अंक मिला है। उन्होंने लिखा- मुझे तो यही पता है, सही जवाब आप बताइए।

इसी समय प्रोफ़ेसर साहब को विदा करके मैं कमरे में आया। चैट की कमान मैने सम्हाल ली और विकीपीडिया से कॉपी-पेस्ट किया-  सरदार भगत सिंह (28 सितंबर 190723 मार्च 1931) और बात बिगड़ने से बच गयी, नहीं तो आज जेठ-भवइ के बीच कालिदास और विद्योत्तमा का शास्त्रार्थ शुरू होने वाला था। 🙂

उसके बाद मैने उन भाभी जी को फोन किया और उस मेसेज को दुरुस्त करने की सलाह दी। उन्होंने उस डॉक्टर मित्र को लानत भेंजी जिसने उन्हें यह मेसेज किया था और अधिकाधिक लोगों तक फॉर्वर्ड करने को भी कहा था। मैंने बाद में जब यही कुछ मानसिक हलचल पर देखा तो हैरान रह गया कि किसी एक खुराफ़ाती दिमाग ने कितने भले लोगों की वॉट लगा दी है।

बात ही बात में उन भाभी जी ने मुझे एक संकट में डाल दिया। पूछ लिया कि ‘आपने किसी को वेलेण्टाइन विश किया कि नहीं…।’ मैने झटसे ईमानदारी पूर्वक कह दिया – ‘नहीं’ और यह भी जोड़ दिया कि ‘मेरी तो कोई वेलेण्टाइन है ही नहीं’

लीजिए साहब, सामने खड़ी श्रीमती जी की गहरी मुस्कराहट देखकर मैं घक्‌ से रह गया। मेरी इस सपाटबयानी को जरूर निराशापूर्ण अर्थ में ग्रहण कर लिया गया होगा। सोचने लगा- अब इन्हें कैसे समझाऊँगा…???

तभी भाभी जी ने यह पूछ कर मेरा काम आसान कर दिया- “क्यों? आपकी इतनी अच्छी पत्नी हैं …उन्हें?”

DSC00245 “वो मेरी वेलेण्टाइन कैसे हुई? वो तो मेरी मलकाइन (मालकिन) हैं। उनकी जो हैसियत है उसके पासंग भर भी कोई वेलेण्टाइन नहीं हो सकती… आप सागर  की तुलना एक छोटे तालाब से कर रही हैं। …हम उनसे जो पाते हैं वह कोई वेलेन्टाइन क्या दे पाएगा? …हम एक दिन के चोंचले में विश्वास नहीं करते, हम तो रोज उस अन्दाज में जीते हैं जिसकी आज के दिन पार्कों और क्लबों में घूमने वाले तमाम कृत्रिम जोड़े कल्पना भी नहीं कर सकते।” इस बीच रचना चाय के खाली कप समेटकर वहाँ से जा चुकी थीं।

शाम को मुझे कम्प्यूटर पर बैठने की प्रेरणा हुई। सफ़ेद घर पर बाल्टिआन बाबा को कड़ाही चढ़ायी जा रही थी। गुरुदेव की पोस्ट पर भगत सिंह की फाँसी का मेसेज चिठ्ठाजगत में भी खुराफ़ात करता दिखायी पड़ा। लेकिन उनकी पोस्टेरस की नयी उड़ान और मोबाइल ब्लॉगिंग की हाइटेक शुरुआत की बात पढ़कर मुझे हीनता ग्रन्थि ने घेरना शुरू कर दिया। उसके बाद मैं पहुँचा- आलसी के चिट्ठे पर।

यहाँ जो लिखा हुआ पाया उसे पढ़ने के बाद तो मेरा कान गरम हो गया। रे सिद्धार्थ, लानत है तुझपर। देख, अपनी जीवन संगिनी को देखने का सही ढंग। उस चलते फिरते स्तम्भ को तू क्यों न देख पाया? बड़ा अपने को शब्दशिल्पी समझता रहा। दूसरे भी तुम्हारी शब्दसम्पदा की प्रशंसा करते रहे… लेकिन तुम तो पाजी निकले। तुमसे यह सब क्यों न लिखा गया?

मैने यहाँ लौटकर बहुत कोशिश की कुछ लिखने की। अपने हृदय की गहराइयों में बहुत नीचे तक उतरकर उसे पकड़ने की कोशिश की लेकिन मैं उसे बाहर निकाल नहीं पाया। शब्द बेगाने होकर साथ छोड़ गये हैं। पिछले ग्यारह साल के साथ को याद करके उसकी गर्माहट और आश्वस्ति महसूस तो कर सकता हूँ लेकिन चाह कर भी लिख नहीं पा रहा। जैसे मूढ़मति होकर बहती हुई गंगा की धारा के बीच आँखें बन्द किए खड़ा हूँ। बुद्धू सा।

किनारे एक बड़ा सा बोर्ड लगा है- गंगे तव दर्शनार्थ मुक्तिः।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

घुस पैठी थकान…

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इतवार का बिहान

सिर तक रजाई लिए तान

घर में की खटपट से बन्द किए कान

आंगन में धूप रही नाच

छोटू ककहरा किताब रहा बाँच

फिर भी न आलस पर आने दी आँच

कुंजीपट खूँटी पर टांग

धत्‌ कुर्सी कर्मठता का स्वांग

दफ़्तर में अनसुनी है छुट्टी की मांग

कूड़े का ढेर

फाइल में फैला अंधेर

चिट्ठों में आँख मीच रहे उटकेर

आफ़त में जान

भला है बन बैठो अन्जान

देह नहीं मन में घुस पैठी थकान

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

इलाहाबाद में अमरूद के लिए तरसने का मजा… !?!

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मुझे इलाहाबाद में नौकरी करते हुए ढाई साल हो गये। इसके पहले एक दशक से कुछ ही कम साल विद्यार्थी के रूप में यहाँ गुजार चुका हूँ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सर गंगानाथ झा छात्रावास में रहते हुए हम रोज शाम को लक्ष्मी टाकीज चौराहे पर चाय पीने आते और फलों की दुकान से मौसमी फल ले जाते। जाड़ा शुरू होते ही इलाहाबाद के प्रसिद्ध अमरूद मिलने लगते- बिल्कुल ताजे और स्वादिष्ट। पहली बार में ही इनकी खुशबू और मिठास का दीवाना कौन न हो जाय…! हमें जब गाँव जाना होता तो बैग भरकर अमरूद ही ले जाते। जब डिमाण्ड बढ़ती गयी तो एक बार यहाँ के खुसरूबाग से अमरूद का पौधा ही लेते गये। गाँव पर उसका पेड़ तो तैयार हो गया लेकिन वहाँ फल का स्वाद इलाहाबादी अमरूदों जैसा न रहा।

दुबारा इलाहाबाद की पोस्टिंग मिलने पर हम इस कारण से भी खुश हो लिए थे कि अब सेब से टक्कर लेते लाल-लाल अमरूदों का आनन्द खूब मिलेगा। उसपर जब सरकारी आवास मिला तो यह देखकर खुशी दोगुनी हो गयी कि घर के आगे-पीछे अमरूद के तीन-चार पेड़ लगे हुए थे। पिछवाड़े कोने में लगा पेड़ तो काफी बड़ा था और फलने के लिए पूरी तरह तैयार था। यानि वह अनुपम सुख बिना पैसा खर्च किए मिलने वाला था। मुझे यह भी बताया गया कि साल में इस पेड़ में दो-तीन बार फल लगते हैं।यहाँ हैं शिकारी तोताराम

फिर क्या था- पेड़ में फूल लगे और देखते-देखते फलों में बदलते गये। मैं इनके पकने का इन्तजार करने लगा। इनका आकार भी अच्छा खासा हो गया। असली इलाहाबादी ही थे। लेकिन कई दिनों के बाद भी जब मुझे कोई पका फल नहीं दिखा तो मैने थोड़ी निगरानी की। पता चला कि जब मेरे ऑफिस और बेटी के स्कूल चले जाने के बाद श्रीमती जी घर के भीतर अपनी गृहस्थी सम्हालने में व्यस्त हो जातीं, तो सुनसान देखकर कलेक्ट्रेट कैम्पस में रहने वाले कुछ कर्मचारियों के परिवारों से बच्चों के झुण्ड आते और चारदीवारी पर चढ़कर पेड़ की पूरी पैमाइश कर जाते।

एक बार मुझे अचानक ऑफिस से घर आना हुआ तो मैने देखा- दो बच्चे पेड़ पर, तीन दीवार पर और कुछ नीचे खड़े होकर पेड़ को खंगाल रहे थे। मुझे आता देख नीचे खड़े बच्चे सरपट भाग गये। दीवार वाले सीधे कूद पड़े और लड़खड़ाते हुए भागने लगे। पेड़ की डाल पर चढ़े हुए शूरमा भी हाथ के अमरूद फेंककर तेजी से उतरने लगे। मुझे चिन्ता हुई कि वे कहीं हड़बड़ी में गिरकर चोट न खा बैठें। मैनें हाथ के इशारे से उन्हें आश्वस्त किया कि घबराने की जरूरत नहीं है। (यानि मैं उनका कुछ करने वाला नहीं हूँ।) यह भी कि जो फल तोड़ लिए गये हैं वे उन्हीं के हैं…। मैने उन्हें आराम से उतरकर जाने दिया। बस एक सलाह देकर कि पहले अमरूद पक जाने देते…। गाँव पर बाग से आम की चोरी करते पकड़े गये बच्चों पर पिताजी के नर्म व्यवहार की याद आ गयी थी।

ये फ़सल किस काम की

लेकिन उस दिन मुझसे जो ‘गलती’ हुई उसका खामियाजा अबतक भुगत रहा हूँ।  मेरे पूर्वाधिकारी ने कदाचित्‌ अपने रौब और गार्डों के माध्यम से उन बच्चों के मन में जो डर बनाया होगा वह उसी दिन से काफूर हो गया। …और निःशुल्क ताजे पके अमरुद खाने का मेरा सपना चकनाचूर हो गया। अब तो वे बेधड़क अपनी मर्जी से दीवार के सहारे चढ़कर अमरूद तलाशते रहते हैं।

हमने आशा का दामन फिर भी नहीं छोड़ा था। पेड़ में बहुत से अमरूद छिपे हुए भी होते हैं, जिनपर जल्दबाजी में काम करने वाले शिकारी बच्चों की निगाह नहीं पड़ती। मैं पेड़ों का मालिक होने के कारण आराम से खोज-खोजकर उन बचे-खुचे फलों को तोड़ सकता था। वे मेरे छोटे से परिवार के आनन्द के लिए पर्याप्त होते। चिड़ियों की दावत लेकिन तभी मुझे एक और शिकारी वर्ग से दो-चार होना पड़ा। मैने देखा कि पेड़ के नीचे कच्चे और अधपके फलों के छोटे-छोटे टुकड़े गिरे हुए हैं। ऊपर देखा तो हैरान रह गया। कई फल टहनी से तो लगे हुए थे लेकिन आधा-तिहाई खाये जा चुके थे। यानि कि मेरे सपने पर केवल मनुष्य ही नहीं पक्षी भी तुषारापात करने को कमर कस चुके थे। भूरे रंग की स्थानीय देशी चिड़िया; जिसका नाम मुझे नहीं मालूम (शायद मैना), झुण्ड में आकर पेड़ की एक-एक डाल पर मंडराने लगी। फिर अपने तोताराम कैसे पीछे रहते? ये भी सपरिवार पधारने लगे। बड़ी सफाई से फलों को कुतरा जाने लगा। टहनी से बिना अलग किए अमरूद का ज्यादातर हिस्सा चट हो जाता।

फिर तो मेरे आकर्षण का केन्द्र अमरूद न होकर ये अनोखे मेहमान हो गये। मैं चुपके से छिपकर इनका फल कुतरना देखता। सच में इनकी कारीगरी देखकर मजा आने लगा। मैने जब भी इनकी फोटो खींचनी चाही, जाने कैसे इन्हें पता चल जाता और ये फुर्र हो जाते। फिर भी मेरा प्रयास जारी रहा। अन्ततः आज तोते की एक जोड़ी मेरे कैमरे की पकड़ में आ ही गयी। वह भी ऐसे कि चोरी का माल पंजे में दबाए साबुत बरामद हुआ। अमरूद की हरी-हरी पत्तियों और हरे फलों के बीच बैठे हुए ये हरे पंख और लाल चोंच वाले आकर्षक जीव आँखों को इतनी तृप्ति देते हैं कि मैं इनपर सारे फल खुशी-खुशी न्यौछावर कर दूँ।

पंजे में दबाकर ले उड़े

समाधान के तौर पर मैं एक दिन बाजार से कुछ अमरूद खरीद लाया तो श्रीमती जी का ताना सुनना पड़ा कि घर का अमरूद दूसरे खा रहे हैं और आप बाजार से ला रहे हैं… लानत है। तबसे मैने बाजार के अमरूद की ओर आँख उठाना भी छोड़ दिया है। अब आप ही बताइए मुझे इलाहाबादी अमरूद का सुखद स्वाद कैसे मिलेगा?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

अवकाश-त्रसित मन की आकुलता में समाया क्रिकेट…

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जिलाधिकारी द्वारा प्रकाशित छुट्टियों की लिस्ट अपनी ऑफिस टेबल के शीशे से दबाकर सभी अधिकारियों की तरह मैने भी लगा रखा है। हाँलाकि उसमें दिखने वाली सभी छुट्टियाँ हम ट्रेजरी वालों को नसीब नहीं होती। स्थानीय अवकाश, निर्बन्धित अवकाश और कार्यकारी अवकाश के दिन हमारे लिए बहुत कोफ़्त के होते हैं। इन दिनों दूसरे दफ़्तर जब बन्द रहते हैं तब भी बैंक की तरह हम सरकारी खजाना खोलकर बैठे रहते हैं। महीने का दूसरा शनिवार भी हमें सालता है। महीने के पहले सप्ताह में तनख्वाह लेकर इस दिन सरकारी कर्मचारी बाजार जाते हैं और महीने की खरीदारी करते हैं। लेकिन हम यह काम भी शाम को घर लौटने के बाद ही कर पाते हैं।

इलाहाबाद की ट्रेजरी में एक अतिरिक्त लफ़ड़ा भी है। यहाँ आए दिन कोई न कोई प्रतियोगी परीक्षा होती रहती है जो प्रायः रविवार की छुट्टी के दिन पड़ती है। इन परीक्षाओं के प्रश्नपत्र सीलबन्द लिफाफों में हमारे द्वितालक दृढ़कक्ष (double-lock strong room) में रखे जाते हैं, जिन्हें परीक्षा प्रारम्भ होने के एक घण्टा पहले निकालकर मजिस्ट्रेट के हाथों परीक्षा केन्द्र तक भेंजा जाता है। परीक्षा में दो पारियाँ हों तो डबल-लॉक दो बार खोला जाता है। यानि हमारी साप्ताहिक छुट्टी भी नौकरी के हवाले चली जाती है।

ऐसे अवकाश-त्रसित मन को जब पता चला कि क्रिसमस से लेकर मोहर्रम तक लगातार चार दिन में तीन दिन छुट्टी के हैं और इस बीच कोई परीक्षा भी नहीं है तो मन बल्लियों उछल पड़ा। खूब आराम करेंगे। किसी काम की फिक्र न होगी। बेटी का स्कूल और संगीत क्लास दोनो बन्द रहेगा, इसलिए उसे छोड़ना भी न होगा। मेयोहाल भी दो दिन बन्द रहेगा, इसलिए बैडमिण्टन से भी आराम रहेगा। सुबह जल्दी उठने का कोई टेंशन नहीं। ….ब्लॉगरी में जो काम पिछड़ गये हैं वो सब बैकलॉग पूरा कर लेंगे। फीडरीडर का जाम हटा लेंगे….  ना..ना..ना.., तब तो फिर छुट्टी का मजा जाता रहेगा। ठीक है… ब्लॉगरी को भी नमस्ते कर देंगे। जैसे इतना छूटा है वैसे थोड़ा और सही। इस छुट्टी में तो मन मस्तिष्क को पूरा ‘रेस्ट’ पर रखेंगे। कुछ नहीं सोचेंगे, कुछ नहीं करेंगे… बस देर तक अलसाए बिस्तर पर पड़े रहेंगे… नींद का ओवरडोज लेंगे… खूब निश्चिन्त होकर पड़े रहेंगे… ऐसा दुर्लभ सुख फिर मिले न मिले…!!!

रविवार की सुबह अखबार ने बताया कि भारत-श्रीलंका का आखिरी एकदिवसीय मैच सुबह नौ बजे प्रारम्भ हो जाएगा। ३-१ की अपराजेय बढ़त के साथ उतरने वाली भारतीय टीम की उम्दा बल्लेबाजी  का लुत्फ़ उठाने का ऐसा मौका हाथ से क्यों जाने दूँ। छुट्टी के दिन मैच हो तो क्या कहने। ऑफ़िस मे होने पर तो बार-बार घर से स्कोर पूछता रहता हूँ, आज तो पूरा मैच लाइव देखना है। बस मैं तुरत-फुरत रजाई से बाहर निकला, जल्दी-जल्दी नहा लिया, खड़े-खड़े भन्न से पूजा किया और टन्न से टीवी ऑन कर दिया। ड्राइंग रूम की सेन्ट्रल टेबल किनारे कर कालीन पर गद्दे डालकर चादर बिछायी, मसनद लगाया और कम्बल में पैर डालकर अधलेटा हो लिया। दिनभर सोफ़े पर बैठना मुश्किल जो था। वाह क्या आनन्द था…!Upul Tharanga was cleaned up first ball 

डिश टीवी वाले नियो-क्रिकेट चैनेल नहीं दिखाते इसलिए इसका ‘मैक्सी पैकेज’ लेने के बाद भी मुझे इस एक चैनेल के लिए लोकल केबल वाले से अनुरोध करना पड़ा था। यह बात दीगर है कि जब तक मुझे यह सुविधा मिली तबतक टेस्ट श्रृंखला समाप्त हो चुकी थी और टी-२० तथा ओडीआई का प्रसारण अपने दूरदर्शन पर आने लगा था। फिर भी मैने केबल कनेक्शन चेक कर लिया था, दूरदर्शन का क्या भरोसा… कभी भी खेदप्रकाश की तख्ती नमूदार हो सकती है। आधे घण्टे की समीक्षा ध्यान से सुनने के बाद असली मैच शुरू हुआ। श्रीमती जी इस बीच कई बार मुझे हिकारत से देखकर जा चुकी थीं। चूंकि मेरी यह कमजोरी जानती हैं इसलिए शायद कुछ ऐसा-वैसा नहीं कहा। वर्ना मजाल क्या कि उनके सजाए ड्राइंग रूम में किसी परिवर्तन की गुस्ताखी मैं कर सकूँ।

टॉस जीतने के बाद भारत ने श्रीलंका को बल्लेबाजी की दावत दी थी। सुनील गावस्कर पिच की रिपोर्ट में गोलमोल बता चुके थे कि बहुत अच्छा मैच होगा। पिच में जान है। शुरुआती घण्टे में गेंदबाजों के लिए मददगार रहेगी लेकिन बल्लेबाजों को भी निराश होने की जरूरत नहीं है। बाद में खूब रन बरसेंगे। बहुत जबरदस्त मुकाबला होगा…। पिच को सहलाते हुए कैमरा क्लोजप शॉट ले रहा था। हल्की खुरदरी घास…। गावस्कर बोले- यह किसी गन्जे सिर पर ताजा रोपे गये नकली बालों की तरह दिख रही है। जो गेंद घास पर पड़ेगी उसकी उछाल और दिशा अलग होगी और गन्जे हिस्से पर गिरने वाली गेंद अलग…। मैं इतनी बारीकी नहीं समझता इसलिए पहली गेंद फ़ेंके जाने का इन्तजार करता रहा।

पहला ओवर जहीर खान का था। पहली गेंद फेंकते ही जोरदार शोर हुआ। खब्बू ओपनर उपुल थरंगा अपने पैड को बल्ले से ढंके हुए रक्षात्मक मुद्रा में खड़े थे और उनकी गिल्लियाँ हवा में बिखर चुकी थीं। ओ, व्हाट ए स्टार्ट… !! कमेण्ट्रेटर उत्तेजित थे। इसके बाद तो जो खेल आगे बढ़ा उसे देखकर भारतीय दर्शक खुशी से झूम उठे। जब एक के बाद एक विकेट सस्ते में गिरने लगे तो मेरा मन अजीब उदासी का शिकार होने लगा। ऐसे तो पूरे दिन रोमांच बना ही नहीं रहेगा। चुनौती ही नहीं रहेगी तो इण्डिया बैटिंग क्या करेगी।

Fall of wickets1-0 (Tharanga, 0.1 ov), 2-39 (Dilshan, 10.5 ov), 3-58 (Sangakkara, 15.1 ov), 4-60 (Jayasuriya, 16.4 ov),5-63 (Samaraweera, 17.6 ov)

पहली गेंद पर विकेट, दूसरे ओवर की पहली गेंद पर छूटा कैच, ब्ल्लेबाजों की कुहनी, कन्धे और अंगुलियों पर बार बार लगती चोटें, विकेटों के बीच हड़बड़ी में लगती दौड़, थर्डमैन को छकाती थिक-एज से निकलती सनसनाती गेंदे, जहीर खान, हरभजन सिंह और पहला मैच खेल रहे सुदीप त्यागी को मिलने वाले एक-एक विकेट, दो मैचों का प्रतिबन्ध झेलकर लौटे धोनी की शानदार विकेटकीपिंग, रैना का धारदार क्षेत्ररक्षण और रन आउट… इस पहले सत्र में क्या-क्या नहीं देखने को मिला।

 

लेकिन चौबीसवें ओवर के आते-आते वह हो गया जो किसी को पसन्द नहीं आया होगा। मैच रद्द होने की ओर बढ़ गया। चोटग्रस्त श्रीलंकाई टीम ने पिच की शिकायत की और मैच रेफ़री ने काफी सोच-विचार के बाद मैच को रद्द कर दिया और हमने टीवी से नजर हटाकर कम्बल में मुंह ढंक लिया। अब श्रीमती जी क सब्र टूट चुका था। उन्होंने कम्बल उठाया और लेकर चली गयीं। मने भी मन मसोस कर अपना गद्दा समेट लिया। सेन्ट्रल टेबल अपने स्थान पर आ गयी, और मैं कम्प्यूटर पर अपनी ब्लॉगरी में आधे मन से जुट गया। 

छुट्टी का मजा एक बार फिर किरकिरा हो लिया है। आलसी होने का सपना चूर-चूर हो गया। कल मैच के दौरान गिरिजेश भइया ने फोन पर दरियाफ़्त भी की थी कि कहाँ गायब हो गये हो। मैने बताया कि आपकी आलसी वाली उपाधि हथियाने की फिराक में हूँ। आलसी का चिट्ठा तो गजब की तेजी पकड़ चुका है इसलिए भूमिका हथियाने की राह पर चल पड़ा हूँ। आज बहुत आलस के बाद यह पोस्ट ठेल रहा हूँ।

बीबी-बच्चे भुनभुना रहे हैं, इसलिए यहीं बन्द करता हूँ और चलता हूँ इन्हें थ्री ईडिएट्स दिखाने। मुझे देख-देखकर शायद ये बोर हो चुके हैं।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

पुछल्ला : मजेदार फिल्म रही: थ्री ईडिएट्स। कहकहे और भावुक स्वर (आँसू) दोनो बारी-बारी आते रहे दर्शकों के बीच से। बहुत दिन बाद कोई फिल्म देखा और भरपूर आनन्द उठाया।

आप सब को नये साल की हार्दिक शुभकामनाएं।

(सिद्धार्थ)

 

गृहिणी की कविता

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मन के भीतर उमड़-घुमड़

कुछ बादल सघन

ललक बरसन

पर पछुआ की धार से छितर-बितर

कुछ टुकड़ा इधर

कुछ खाँड़ उधर

 

घर के भीतर की खनखन

कलरव बच्चों का

कि अनबन

घरनी के मन में कुछ तड़पन

फिर ठनगन

उठता नहीं स्वर गगन

बस होती भनभन

मन ही मन

घरवाला अपने में मगन

देख ना सके है अगन

जाने किस बुरी घड़ी

लग गयी थी लगन

मन चाहे अब तोड़कर दीवारें

सरपट भगन

 

निकल नही पाती

मन से सब बात

लिखने को पाती

अब उठते नहीं हाथ

होकर अनाथ

साथ छोड़ रहा साहस

बिलाता एहसास अपनेपन का

दिखता नहीं कुछ भी

मन का

तन का

अब क्या करना

बस पेट भरना

तन कर

अब क्या रहना

बरबस अब है कहना

थाती मिटाती

ये आँधी

युगों ने थी बाँधी

जिस डोर से

चटक रही कैसे

किस ओर से

 

कैसे बतलाए

मन तो सकुचाए

अबतक तो रहे थे अघाए

नहीं….

खेले-खाए-अघाए

जितना भी पाए

उलीच दिया गागर

पर जो थी खाली

सारे मत अभिमत

सिद्ध हुए जाली

रखवाली का भ्रम था

जो करते नहीं थे

बस हो जाती थी

 

एक चिन्गारी लगी

ज्वाला फूटी

निकल पड़ी लेकर लकूटी

टूटी-फूटी…

 

ना ना

यह थी छिद्रहीन साबुत

जिन्दगी से भरी

भरी सी गगरी

न थी पत्थर की बुत

थोड़ी अलसाई

फिर लेती अंगड़ाई

छलक उठी गागर

समोए है सागर

कल-कल झरने की अठकेली

कई नदियों की धारा

लो इनको भी आँचल में लेली

अब खुलती हथेली

  गृहिणी

बन्द हुई मोटी किताबें

दूर धरी थियरी

सीधी सी बतियाँ बस

लाइव कमेन्टरी

घटित हो रहा मन में

जो घर में आँगन में

हस्तामलकवत्‌

चेतन मन कानन में

 

बात बेबात पे लड़ना

घड़ी-घड़ी झगड़ना

क्या दे देगा

किसी और का मुँह ताकते

एक ही लउर से हाँकते

भीतर बाहर झाँकते

आते-जाते को आँकते

हाँफ़ते फाँकते

सब ले लेगा

फिर

चाहिए ही क्या?

जो टाले न टले

हटाये न हटे

उसे यूँ साध लेना

मासूम बच्चा सा

मोहपाश सच्चा सा

डालकर यूँ बाँध लेना

सीखो तो सही

यह प्रेम की भाषा

दूर करेगी सारी निराशा

बोलो तो सही

बसता है ईश्वर

सबके भीतर बनकर

चेतना, दया और करुणा

जगाओ तो सही

 

फिर तो मनुष्य

बुरा कैसे रह जाएगा

सारा मालिन्य

इस अनुपम उजियारे में

झट से बह जाएगा

 

यह वाद वह आन्दोलन

यह भाषण वह सम्मेलन

अपने पूर्वाग्रह गठरी में बाँधकर

धर दो आले पर

मन की गाँठ खोलकर

चोट करो ताले पर

पहले घर से शुरू करो

कर डालो रिहर्सल

रियाज में ही राह दिखेगी

जिन्दा बनो हर पल

अन्धेरे को चीरकर

बन्द दिमागों से टकराएगी

आशा की उजली किरण

चहुँ ओर छा जाएगी।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

खाकी में भी इन्सान बसते हैं और कम्प्यूटर में…!?!

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पिछले रविवार की सुबह बड़ी मायूसी के साथ शुरू हुई थी। शनिवार तक कम्प्यूटर में वायरस का प्रकोप इतना बढ़ चुका था कि उसे अस्पताल ले जाना पड़ा था। डॉक्टर (इन्जीनियर?) ने कहा कि इसे भर्ती करना पड़ेगा। पूरा चेक-अप होगा। तंत्रिका तंत्र में इन्फ़ेक्शन पाये जाने पर पूरी सफाई करनी पड़ेगी। सारा खून बदलना पड़ सकता है। सब का सब पुराना डेटा उड़ जाएगा। मैं तो घबरा ही गया।

वागीशा और सत्यार्थ की पैदाइश से लेकर अबतक खींची गयी सैकड़ों तस्वीरें, मोबाइल, हैण्डीकैम और सोनी डिजिटल से तैयार अनेक यादगार वीडिओ फुटेज, दोस्तों यारों और रिश्तेदारों की शादियों और मेल-मुलाकातों की याद दिलाती तस्वीरें। हिन्दुस्तानी एकेडेमी में आयोजित कार्यक्रमों की चित्रावलियाँ और इलाहाबाद ब्लॉगर सम्मेलन की अविस्मरणीय झाँकी दिखाते मनभावन स्लाइड शो। इसके अतिरिक्त बेटी और मेरे हाथ की ‘पेण्ट’ पर बनायी अनेक कलाकृतियाँ और सबसे बढ़कर मेरे द्वारा लिखे गये एक-एक शब्द का मूल पाठ जो ‘माई डॉक्यूमेण्ट’ फोल्डर में सेव था वह सब उड़ जाएगा।

डीलर ने कहा कि हम किसी का डेटा बचाने का जिम्मा नहीं लेते। आप चाहें तो इसे कहीं कॉपी कर लें। चार जीबी का पेन ड्राइव, दो जीवी का सोनी कैमरा, चार-छः जीबी की डीवीडी आदि जोड़कर भी करीब चालीस जीबी डेटा को सुरक्षित नहीं कर पा रहे थे। इलाहाबाद जैसे शहर में लगभग मोनोपॅली बनाकर रखने वाले एच.पी. के डीलर साहब मुझे टहला रहे थे कि इतना बड़ा डेटा बचाने का उसके पास कोई उपाय नहीं है। वारण्टी के चक्कर में किसी दूसरे जानकार से मशीन खुलवायी भी नहीं जा सकती थी।

…यानि यदि मुझे आगे इस कम्प्यूटर पर काम करना है तो मोह त्याग कर इसकी फॉर्मैटिंग करानी होगी। बड़े जतन से सजोयी गयी उस मुस्कान को अलविदा कहना होगा जो एक महीने के सत्यार्थ के चेहरे पर तब खिल उठती थी जब उसने पहली बार मुझे पहचानना शुरू किया था और मैंने उस नैसर्गिक सुख के लोभ में जैसे-तैसे सीटी बजाना सीख लिया था। उसका पहली बार ‘माँ’ बोलना, पहली बार करवट बदलना, पहली बार सरकना, पहली बार बँकइयाँ चलना, पहली बार खड़ा होना, फिर डग भरना, पहली बार अन्न ग्रहण करना और न जाने क्या-क्या अब केवल यादों में रह जाएगा। बेटी के गाए तोतले गाने, उसका पहला स्कूली बस्ता, लाल रिबन की पहली चोटी, पहला स्कूली ड्रेस, दोनो का साथ-साथ खेलना, लड़ना, झगड़ना, सबकुछ अब वापस तो नहीं आएगा न। ऑफिस के बुजुर्ग पेंशनर्स तो अगले साल फिर आ जाएंगे लेकिन हिरमतिया की माँ जो मर गयी अब कैसे आएगी?

इसी दुश्चिन्ता में जब रविवार की सुबह आँख खुली तो मन भारी था। तकनीकी ज्ञान का अभाव मुझे साल रहा था। निःशुल्क वायरस रोधी सॉफ़्टवेयर के फेर में पड़कर मैने बहुत कीमती सामग्री को संकट में डाल दिया था। रविवार को सिविल लाइन्स बन्द होने के कारण उसदिन कुछ हो भी नहीं सकता था इसलिए खालीपन के एहसास के साथ बाजार और वायरस को कोसता हुआ देर तक बिस्तर पर पड़ा रहा। करीब नौ बजे श्रीमती जी ने याद दिलाया कि मेज पर एक आमन्त्रण-पत्र पड़ा है जो किसी पुस्तक पर चर्चा से सम्बन्धित है।

“आप वहाँ जाएंगे क्या?” प्रश्न ऐसे किया गया जैसे मेरे वहाँ न जाने पर ज्यादा खुशी होती। लेकिन मैं…

“अरे वाह!” मुझे तो जैसे तिनके का सहारा मिल गया। अब रविवार अच्छा कट जाएगा। अच्छा क्या, जबर्दस्त बात हो गयी साहब…।

हुआ यूँ कि के.पी.कम्यूनिटी सेन्टर में जो कार्यक्रम आयोजित था उसके मुख्य अतिथि थे- विभूति नारायण राय जी, जिनके सौजन्य से हमने हिन्दी चिट्ठाकारी की दुनिया पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हाल ही में सम्पन्न कराया था। इलाहाबाद के डी.आई.जी. जो अब जिले के पुलिस कप्तान होते हैं, चन्द्रप्रकाश जी ने अपने एक मित्र और आई.पी.एस.बैचमेट अशोक कुमार जी की हाल ही में प्रकाशित पुस्तक पर भव्य परिचर्चा का आयोजन किया था। उत्तर प्रदेश पुलिस मुख्यालय, इलाहाबाद के अपर पुलिस महानिदेशक एस.पी. श्रीवास्तव जी भी, जो स्वयं एक कवि, शौकिया फोटोग्राफर और ब्लॉगर हैं इस गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे थे। भारत सरकार की ओर से इलाहाबाद में स्थापित उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र के निदेशक आनन्दबर्द्धन शुक्ल जी भी एक आई.पी.एस. अधिकारी रह चुके हैं। वे इस मंच को विशिष्ट अतिथि के रूप में सुशोभित कर रहे थे।

खाकी में इन्सान पर (पुलिस) परिवर्चा

एक मंच पर पाँच-पाँच आई.पी.एस. इकट्ठा होकर यदि हिन्दी की एक पुस्तक पर परिचर्चा कर रहे हों तो सोचिए नजारा कैसा रहा होगा। मजे की बात यह रही कि उस बहुत बड़े हाल में आमन्त्रित साहित्यप्रेमियों की संख्या से कहीं अधिक पुलिस के जवान दिखायी दे रहे थे। लेकिन वर्दी में नहीं, सादे कपड़ों में। पीछे की आधी सीटें तो प्रशिक्षु रंगरूटों से भर गयी थीं। आगे की सीटों पर शहर के प्रतिष्ठित आमजन, व्यापार मंडल के प्रतिनिधि, अधिकारी वर्ग और मीडिया आदि के लोग जमे हुए थे। लेकिन जब चर्चा शुरू हुई तो मुझे लगने लगा कि आज छुट्टी बेकार नहीं गयी है। पुलिस विभाग में होकर भी बेहद संवेदनशील बने रहकर लोकहित के बारे में सोचने वाले एक ऐसे अधिकारी से साक्षात्कार हो रहा था जिसने बीस साल तक पुलिस महकमें में उच्च पदों पर सेवा देने के बाद अपने अनुभवों को बिना किसी लाग-लपेट के दूसरों से बाँटने का उद्यम कर रहा था।

लेखकीय - अशोक कुमार IPS ऐसे में मेरे भीतर का ब्लॉगर खड़ा हो गया। झटपट मोबाइल कैमरे से तस्वीरें ले डाली और पुस्तक के लेखक को ब्लॉग लिखने की मुफ़्त सलाह दे डाली। वे बोले, “सिद्धार्थ जी, आप मेरा ब्लॉग तैयार कर दीजिए, इसपर जो कॉस्ट आती होगी वह मैं तुरन्त दे दूंगा।” मैने जब यह बताया कि ‘यहाँ सबकुछ मुफ़्त में उपलब्ध है’ तो वे खुश हो गये। तुरन्त लान्च करने की बात करने लगे। अब मैंने संकोचवश बताया कि मेरा कम्प्यूटर घर पर है ही नहीं। आपका काम थोड़ा समय ले सकता है। …लेकिन ब्लॉगरी के प्रसार की गुन्जाइश हो तो किसी ब्लॉगर को प्रतीक्षा करने में चैन कहाँ। हिन्दुस्तानी एकेडेमी का ताला खोलवाया, ब्लॉग बना और इस हिन्दी परिवार में एक चमकीले सितारे का अभ्युदय हो गया। आप यह पूरी पोस्ट पढ़ने के बाद वहाँ जाइए  और सराहिए खाकी में इन्सान को।

इसी में यह बता दूँ कि आदरणीय आलसी गिरिजेश राव जी ने मेरी कम्प्यूटरी समस्या का समाधान फोन पर ही कर दिया। बोले, एक पोर्टेबल हार्ड डिस्क में सारा डेटा आसानी से आ जाएगा जो १६०, २५०, ३२० जी.बी. या उससे अधिक क्षमता की भी होती है। मैने डीलर से फोन पर कहा तो उन्होंने कहा कि आप इसपर तीन हजार खर्च करने को तैयार हों तो मुझे कोई ‘प्रॉब्लेम’ नहीं है। मरता क्या न करता। मैने हामी भर दी। जब दुकान पर पहुँचा तो उनके इन्जीनियर ने अपनी पुरानी डिस्क में डेटा कॉपी करके फॉर्मेटिंग शुरू कर दी क्यों कि नई डिस्क वे मंगा नहीं पाये थे।  यानि समस्या केवल मेरे अज्ञान के कारण घनीभूत हुई थी। अन्ततः भारी खर्चे की आशंका से ग्रस्त श्रीमती जी को जब मैने बताया कि मुझे केवल पाँच सौ खर्चने पड़े तो उनके चेहरे पर वही मुस्कान फिर लौट आयी थी जो सुबह विलुप्त हो गयी थी। हाँलाकि कम्प्यूटर को अगले दिन दुबारा अस्पताल जाना पड़ा क्योंकि कोई वायरस छिपा रह गया था। फिलहाल विस्टा स्टार्टर हटाकर वापस एक्सपी डलवा लेने के बाद शायद मामला ठीक हो गया है।

एक अच्छी खबर और है- वी.एन.राय साहब ने अनौपचारिक बात चीत में इलाहाबाद के ब्लॉगर सम्मेलन के बाद का हाल-चाल पूछा। जब मैने सच-सच हाल बयान कर दिया तो खुश होकर बोले कि हिन्दी चिठ्ठाकारी की दुनिया पर विचार-विमर्श के लिए वर्धा विश्वविद्यालय प्रति वर्ष एक वृहद राष्ट्रीय सेमीनार का आयोजन करेगा जो विश्वविद्यालय के रमणीक प्रांगण में अक्टूबर-नवम्बर महीने में सम्पन्न हुआ करेगा। नामवर सिंह जी के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ने वालों की असुविधा का हमें खेद है, लेकिन जबतक वे वहाँ के कुलाधिपति बने रहेंगे तबतक हम उन्हें उद्‍घाटन के लिए बुलाकर सम्मानित करते रहेंगे। अलबत्ता यदि इस पुनीत कार्य के लिए महामहिम राष्ट्रपति हामी भर दें तो बात दीगर हो जाएगी।

आगे-आगे देखिए होता है क्या…!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

एक वी.आई.पी. शादी जयपुर में…।

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विकास परिणय प्रीति आजकल शादियों का मौसम चल रहा है। ज्योतिषियों ने बता दिया कि शादी के लायक शुभ मुहूर्त की तिथियाँ गिनती की ही हैं। इसका नतीजा यह हुआ कि एक ही तिथि में अनेक शादियों के निमन्त्रण मिल जा रहे हैं। अकेले सबको निभा पाना कठिन हो गया है। लेकिन कुछ खास शादियाँ ऐसी होती हैं जिनमें आप जाने को बाध्य होते हैं और कदाचित्‌ स्वयम उत्सुक भी। ऐसी ही एक असाधारण शादी का न्यौता मुझे मिला और मैने दिल्ली से जयपुर जाने वाली बारात में शामिल होने का कार्यक्रम बना लिया। इलाहाबाद से दिल्ली के लिए प्रयागराज एक्सप्रेस और जयपुर से वापस इलाहाबाद के लिए ज़ियारत एक्सप्रेस में आरक्षण महीना भर पहले ही कराया जा चुका था।

शादी तमिलनाडु कैडर के एक आई.पी.एस. अधिकारी की थी जो राजस्थान कैडर की अपनी बैचमेट से ही शादी कर रहा था। यह दूल्हा मेरा साला था इसलिए बारात में मेरी पोजीशन का अन्दाजा आप सहज ही लगा सकते हैं। लगातार जीजाजी… जीजाजी… सुनने का आनन्द ही (और खतरे भी) कुछ और है।:)

बस में बाराती बारात दिल्ली से जयपुर एक बस से जाने वाली थी। मुझे आगे की सीट मिली। बस में दूल्हे के माता-पिता, बड़े भाई, बहन, बहनोई, चार जोड़ी मौसी-मौसा, तीन जोड़ी मामा-मामी और इतने ही चाचा-चाची मौजूद थे। उन सबके बच्चे, बहुएं और दोस्त-मित्र मिलकर बस का माहौल पूरा बाराती बना रहे थे। अधिकांश बाराती मेरी ही तरह पूर्वी उत्तर प्रदेश के बस्ती, गोरखपुर, कुशीनगर, प्रतापगढ़, जौनपुर, सुल्तानपुर, बस्ती, और लखनऊ जैसे शहरों से रात भर ट्रेन की यात्रा करके पधारे थे। सभी अपने-अपने होटल से तैयार होकर प्रातः दस बजे के नियत समय पर बस में इकठ्ठे हो गये। लेकिन जो कुछेक बाराती स्थानीय दिल्ली के निवासी थे उन्होंने उम्मीद के मुताबिक तैयार होकर आने में पूरा समय लिया और बस दोपहर बाद डेढ़ बजे कूच कर सकी।

बस के चलते ही प्यास की पुकार सुनकर बिसलेरी की दो दर्जन बोतलें और बिस्किट वगैरह खरीदने के लिए बस रोकी गयी। फिर आगे बढ़े तो प्रायः सभी परिवारों के कैमरे निकल आये। महौल बारात के बजाय पिकनिक मनाने जैसा बन गया। मेरा सोनी का डिजिटल कैमरा ऐन वक्त पर बैटरी डिस्चार्ज्ड होने का सन्देश देकर बन्द हो गया। चलते समय चेक तो किया था लेकिन शायद कोई कसर रह गयी थी। खैर… मायूस होने का समय नहीं था, क्योंकि ‘जीजाजी’ अन्ताक्षरी खेलने के लिए बीच की सीटों पर बुला लिए गये। नयी उम्र के बच्चों और कुछ कम नयी उम्र की महिलाओं ने ऐसा शमां बाँधा कि हम केवल मूक श्रोता बने रह गये। कभी-कभार इस या उस टीम की गाड़ी फँस जाने पर अपने विद्यार्थी जीवन में याद रहे कुछ गाने सुझाते रहे और महिला बनाम पुरुष टीम की अन्ताक्षरी को  अनीर्णित समाप्त कराने में सफ़ल रहे।

करीब तीन बजे सबको ध्यान आया कि सुबह का हल्का नाश्ता तो बस के प्रस्थान करते समय ही नीचे उतर चुका था और अब बिस्किट-पानी भी लड़ाई हार चुके थे। योजना तो थी जयपुर पहुँचकर भोजन करने की; लेकिन पेट को क्या मालूम की जयपुर अभी काफ़ी दूर है। उसने तो ईंधन खत्म होने की नोटिस सर्व कर दी। फौरन मोबाइल बजने लगे। बस से करीब पन्द्रह मिनट आगे चल रहे दूल्हे मियाँ की टवेरा गाड़ी से सम्पर्क किया गया तो उन्होंने अपने दोस्तों के साथ एक काम लायक ढाबा खोज ही लिया। ‘परम पवित्र भोजनालय’ पर दूल्हे ने पन्द्रह मिनट के भीतर पीछे से आ रही बारात के लिए खाना तैयार करने का फरमान जारी कर दिया था।

दूल्हे के साथ ब्लॉगर

बारात को खिलाना कोई हँसी-खेल तो है नहीं…। लेकिन नये नवेले पुलिस अफ़सर दूल्हे की बात में शायद कोई विशेष प्रभाव रहा हो कि ढाबे पर जब हमारी बस पहुँची तो टेबल सज चुकी थी। सबने प्लेटें भरीं और पनीर, राज़मा, आलू-गोभी, चना-छोला की रसदार सब्जियों और अरहर की तड़का दाल के साथ गर्मागरम रोटियों की धीमी खेप पर हल्ला बोल दिया। अच्छी भूख पर जब गरम और स्वादिष्ट भोजन का जुगाड़ हो गया तो उससे मिलने वाली तृप्ति के क्या कहने…। एक घण्टे में सभी मीठी सौंफ़ फाँकते डकारते हुए बस में सवार हो गये।

इसके बाद जयपुर पहुँचने में आठ बज गये। जहाँ बारात को ठहरना था उस स्थान का लोकेशन किसी को पता नहीं था। कन्या पक्ष को मोबाइल पर बताया गया। एक गाड़ी रास्ता बताने आ पहुँची। लेकिन शायद अन्जान जगह पर समूह की बुद्धि लड़खड़ा जाती है। यहाँ भी उहापोह में करीब एक घण्टा खराब हो गया। ‘होटेल मोज़ैक’ में पहुँचकर हमने अपने आप को धन्य मान लिया। वहाँ की व्यवस्था देखकर ही हमारी आधी थकान जाती रही। एक शानदार कमरे की चाभी काउन्टर से लेकर हम लिफ़्ट से कमरे तक आये। बिस्तर पर बैठते ही उसमें धँसने का एहसास हुआ। फिर सम्हालकर लेट गये। सामने टीवी पर रिमोट चलाया तो भारत-श्रीलंका के बीच हो रहे कानपुर टेस्ट के तीसरे दिन के खेल की झलकियाँ आ रही थीं। इसे देखकर तो खुशी से बल्लियों उछल पड़े। फ़ॉलोऑन के बाद टाइगर्स के दूसरी पारी में भी ५७ रन पर चार विकेट गिर चुके थे। अविश्वसनीय सा लगा।

इसी बीच कमरे में रखे फोन की घण्टी बजी। रिसीवर उठाया तो होटेल स्टाफ़ ने बताया कि नीचे चाय-नाश्ते की टेबल पर प्रतीक्षा की जा रही है। वाह… इन्हें कैसे पता चला कि हमें अभी-अभी चाय की तलब लगी है…? बेसमेन्ट में जाकर नाश्ता करने के बाद ही तैयार होने का निर्णय लिया गया और हमने फौरन लिफ़्ट में घुसकर ‘-1’ दबा दिया। हाल में लगे अनेक किस्म के आइटमों का जोरदार नाश्ता देखकर हम सहम गये और डिनर का अनुमान लगाते ही परेशान से हो लिये। कितनी तो वेरायटी थी। सबका नाम तो अबतक नहीं जान पाया।बारात की प्रतीक्षा में बैण्ड पार्टी

नाश्ते के बाद कमरे में आकर बाथरूम की ओर गये। वहाँ की फिटिंग्स को देखकर उन्हें छूने में सहम से गये। पता नहीं क्या छूने से कहाँ पानी निकल पड़े। आखिर जब सही बटन दबाने पर हल्का गुनगुना पानी बरामद हो गया तो फौरन नहा लेने का मन बन गया। दूधिया सफेदी में चमकता संगमरमर का बाथटब नहाने के लिए आमन्त्रित कर रहा था। करीब आधा दर्जन छोटे-बड़े तौलियों और इतने ही प्रकार के साबुन, क्रीम शैम्पू वगैरह से सुसज्जित स्नानघर में अधिकाधिक समय बिताने का लोभ हो रहा था लेकिन आये तो थे हम बारात करने। इसलिए जल्दी से नहाकर बाहर हो लिए और नये कपड़े में सजधजकर नीचे इन्तजार कर रहे रिश्तेदारों के बीच पहुँच गये।

बाराती नृत्य दूल्हा भी नाच उठा

इस समय तक मेरे भीतर का ब्लॉगर जाग चुका था और डिजिटल कैमरे की बैटरी डिस्चार्ज होने पर मायूस होने लगा था। गनीमत यह थी कि मोबाइल का कैमरा काम कर रहा था जिससे इस बारात में आगे चलकर कुछ शानदार तस्वीरें खींची जा सकीं।

उस समय बारात में  दूल्हे (एम.बी.बी.एस./ आई.पी.एस.) के साथी जिनमें अधिकांश डॉक्टर थे और कुछ नव चयनित अधिकारी थे, बैंड वालों से कुछ चुनिन्दा गीतों की सूची डिस्कस कर रहे थे। महिलाएं अपने साज-श्रृंगार को पूरा करने के बाद बाहर आ गयी थीं लेकिन अभी भी एक दूसरे से पूछकर अन्तिम रूप से आश्वस्त होने की प्रक्रिया में जुटी हुई थीं। दूल्हे की गाड़ी किसी कन्फ़्यूजन में सज नहीं पायी थी लेकिन उस ओर किसी का खास ध्यान नहीं था। सभी अपनी सजावट के सर्वोत्तम रूप को पा लेने का यत्न कर रहे थे। दुल्हा तो राजकुमार जैसा दिख ही रहा था। रात के साढे दस बजे तक बारात पूरी तरह सज नहीं पायी थी। फिर पता चला कि बैण्ड वालों के जाने का समय नजदीक आ रहा है। बस क्या था… लाइट, कैमरा, साउण्ड…

प्रकाश पुंज श्रृंखला

दूल्हे के दोस्त और नजदीकी रिश्तेदार बैण्ड पर झूमने लगे। आतिशबाज अपना काम करने लगे। आज मेरे यार की शादी है… ये देश है बीर जवानों का… नानानानानारे… नारे… नारे…. धमक धमक की आवाज और भांगड़े की धुन की थाप पर धीरे-धीरे सबके पैरों में हरकत आ गयी। थोड़ी देर में ही महिलाओं ने भी मोर्चा सम्हाल लिया। सर्वत्र खुशी और उत्साह से फूटती हँसी और खिलखिलाहट बैण्ड और ताशे की ऊँची ध्वनि में विलीन होती रही, और कैमरों की फ्लैश लाइटें आतिशबाजी के ऊँचे स्फुलिंग की रोशनी में नहाती रहीं। मानो इतना प्रकाश भी कम पड़ जाता इसलिए दर्जनों बल्बों से सज्जित ज्योति कलश भी प्रदीप्त होकर कतारबद्ध चल रहे थे। तभी इस ब्लॉगर की खोजी निगाह इन प्रकाशपुंजों के नीचे चली गयी। धक्‌ से मुहावरा कौंधा- “दीपक तले अंधेरा”

 ज्योति-बाला २
ज्योति-बाला ३
ज्योति-बाला ४
ज्योति-बाला ५
ज्योति-पुंज धारी १
ज्योति पुंज धारी
ज्योति-बाला-१

इन रोशनी के स्तम्भों को अपने सिर, कन्धे और कमर पर थामे हाथ जिन लड़कियों और औरतों के थे उनके चेहरे पर शादी जैसा कोई माहौल ही नहीं था। उनकी आँखें जैसे शून्य में निहार रही थीं। किसी से निगाह मिलाना तो जैसे उन्होंने सीखा ही नहीं था। जिस बारात में शामिल सभी लोग अपना सर्वोत्तम प्रदर्शित करने को आतुर थे उसकी शोभा के लिए रोशनी ढोने वाली ये गरीब मजदूरनें तो बस बीस-पच्चीस रूपये की कमाई के लिए ही इस बारात में शामिल थीं। नंगे या टूटी हवाई चप्पलों वाले  धूल बटोरते पैर, मैली-कुचैली वेश-भूषा, और उलझे हुए धूलधूसरित बालों में खोये हुए ये मलिन चेहरे देखकर मेरा मन कुछ समय के लिए विचलित हो गया। आगे-आगे चलने वाले बैण्ड के सदस्यों को तो फिर भी एक यूनीफॉर्म मिला हुआ है। नाचते-गाते बारातियों द्वारा लुटाये जा रहे नोटों को बटोरने का सुभीता भी इन्हीं को है, लेकिन ये राह रौशन करती बालाएं तो पहलू बदल-बदलकर बारात के विवाह मण्डप तक जल्दी पहुँच जाने की कामना में ही रुक-रुक कर चल रही हैं।

अब आगे का वर्णन ये तस्वीरें ही करेंगी। मैं तो चला अब राजस्थानी अगवानी की रीति देखने जो मेरे लिए बिल्कुल नयी थी।

पारम्परिक स्वागत

जिस परिसर में विवाह मण्डप बना था उसके मुख्य प्रवेश पर बने तोरण द्वार पर लाल फीता बँधा था। उसके उस ओर दुल्हन की सहेलियाँ स्वागत के लिए खड़ी थीं। एक सहेली या दुल्हन की छोटी बहन ने सिर पर कलश ले रखा था। दोस्तों के कन्धे पर चढ़कर आये दूल्हे को दुल्हन की भाभी ने तिलक लगाया, दूल्हे ने फीता काटा और सभी नाचते गाते भीतर प्रवेश कर गये। इस प्रक्रिया में कुछ रूपयों का आदान-प्रदान भी हुआ।

भव्य मन्च

भीतर विशाल प्रांगण में एक भव्य मंच सजा था। वैदिक मन्त्रोच्चार के साथ वेदिका पर तिलक चढ़वाने के बाद दूल्हे ने दूल्हन के साथ मंच पर आसन ग्रहण किया। दूल्हे के दोस्तों और दुल्हन की सहेलियों के बीच कुछ मीठी तकरार के बाद दुल्हन ने ऊँचा उठा दिये गये दूल्हे के गले में उछालकर जयमाला डाल दी। दूल्हा नीचे उतरा और दुल्हन को जयमाल डालकर उसे जीवनसंगिनी बना लिया।

जयमाल सम्पन्न

इस अनुपम सौन्दर्य से विभूषित वैवाहिक कार्यक्रम में इस विन्दु तक शामिल होने के बाद मुझे अपनी अगली यात्रा का ध्यान आया। जयपुर से सीधे इलाहाबाद लौटने के लिए जियारत एक्सप्रेस का समय (२:१५ रात्रि) नजदीक था। मैने सबसे विदा ली और चलते-चलते उस परिसर में स्थापित इस प्रतिमा की तस्वीर लेकर स्टेशन की ओर चल पड़ा।

नयनाभिराम

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