अयोध्या को विराम दे कुछ और सोचा जाय…?

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बुधवार की शाम को जब सारा देश साँस रोके वृहस्पतिवार को आने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले की प्रतीक्षा कर रहा था और चारो ओर आशंका और संशय का वातावरण किसी संभावित विस्फोट  के लिए अपने आपको तैयार कर रहा था उसी समय महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में एक नयी सांस्कृतिक सुगबुगाहट अपना पहला कदम रख रही थी। यहाँ के फिल्म एवं नाट्यकला विभाग द्वारा अब अपने पाठ्यक्रम के अंग के रूप में वास्तविक रगमंचीय प्रस्तुतियों की शृंखला प्रारंभ करने की योजना बनायी गयी है। इसी को कार्यरूप देते हुए यहाँ के एम.ए.(प्रथम छमाही) के विद्यार्थियों ने कामतानाथ की कहानी ‘हल होना एक समस्या का’ के नाट्य रूपांतर ‘दाख़िला’ का मंचन किया। इस नाटक को देखते हुए हम आनंद रस में डूबे रहे और देश की सबसे ज्वलंत समस्या(?) से अपने को कई घंटे तक दूर रख सके।

आज यदि आप कोर्ट के अयोध्या फैसले की खबरों और इसके मीडिया पोस्टमॉर्टेम से उकताकर कोई नया ठौर तलाश रहे हों तो मैं आपको एक हल्की-फुल्की कहानी के शानदार  मंचन की बात बताना और दिखाना चाहता हूँ।

फिल्म व नाट्यकला विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर और रंगकर्मी अखिलेश दीक्षित द्वारा किए गये इस कहानी के नाट्य रूपांतर एवं निर्देशन में यहाँ के एम.ए. नाट्यकला के नवागत छात्रों ने सीमित संसाधनों के बीच जिस लगन और परिश्रम से यह शानदार प्रस्तुति उपस्थित छात्रों, शिक्षक समुदाय व अन्य आमंत्रित दर्शकों के समक्ष दी वह तारीफ़ के का़बिल थी। खचाखच भरे हाल में जब और लोगों के घुसने की जगह नहीं बची तो विभागाध्यक्ष प्रो. रवि चतुर्वेदी को उसी शाम दूसरा शो कराने की घोषणा करनी पड़ी। नाटक के फर्स्ट शो के तत्काल बाद रिपीट शो भी करना पड़ा। आइए पहले आपको संक्षेप में कहानी बता देते हैं-

डब्बू के पिता एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार के मुखिया हैं जिसमें उनकी पत्नी और उनका बेटा है। वो अपने तीन वर्ष के बेटे डब्बू का एड्मिशन शहर के सबसे बड़े व प्रतिष्ठित कॉन्वेंट स्कूल में कराना चाहते हैं। एड्मिशन फॉर्म हासिल करने से लेकर इंटरव्यू तक तमाम गंभीर प्रयास करने के बावजूद उनके बेटे का प्रवेश उस स्कूल तो क्या किसी दूसरे कम प्रतिष्ठित तथाकथित अंग्रेजी स्कूल में भी नहीं होता। दोस्तों की सलाह पर वे अपने एक दूर के रिश्तेदार जो डी.एम. के स्टेनो हैं, के माध्यम से डी.एम. का सिफ़ारिशी पत्र लेकर स्कूल के फ़ादर/प्रिंसिपल से मिलते हैं जो उन्हें उल्टे पाँव लौटा देता है। कई मुलाकातों के बाद और इसके चक्कर में फ़ादर के कुत्ते से गर्दन पर कटवा लेने के बाद डब्बू के पिता से प्रिंसिपल द्वारा डोनेशन की मांग की जाती है। डोनेशन के लिए अपनी सारी जमा पूँजी और बीबी के जेवर से पैसे जुटाकर सौंप देने के बाद भी फादर की डिमांड पूरी नहीं हो पाती और वह निराश होकर बजरंग बली को कोसता हुआ घर लौट रहा होता है।

रास्ते में उसे अपना लंगोटिया यार फुन्नन मिल जाता है जो जरायम पेशा अपनाने के बाद माफ़ियागिरी करते हुए फुन्ननगुरू बन चुका है। शरीफ़ दोस्त की समस्या सुनकर वह मदद करता है और अपने रसूख के दम पर मिनटों में बिना फीस भरे डब्बू का एड्‍मिशन उसी स्कूल में करा देता है। 

कामतानाथ की यह कहानी दिखाती है कि अंग्रेजी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाने की अंधी दौड़ ने एक तरफ़ डोनेशन, कैपिटेशन फीस और ऐसे ही कई भ्रष्ट तरीकों का पोषण तो किया ही है वहीं एक ताकतवर शिक्षा माफ़िया का रास्ता भी बनाया है। निम्न मध्यमवर्ग के प्रायः सभी घरों की यह कमो-बेश वास्तविक कहानी है इसलिए यह दर्शकों से सहज तादात्म्य स्थापित कर लेती है। निर्देशक अखिलेश दीक्षित कहते हैं कि गली-गली में उग आये तथाकथित इंगलिश मीडियम (कॉन्वेंट) स्कूल आम भारतीयों की अंग्रेजी के प्रति गुलामी और अपनी भाषा के प्रति हीन भावना को कैश करते हैं। यह नाटक इसी विडम्बना को चित्रित करता है।

 

यह किसी सिनेमाघर की टिकट-खिड़की पर लगी लाइन नहीं है, बल्कि शहर के सबसे बड़े इंगलिश मीडियम स्कूल में एड्‍मिशन का फ़ॉर्म खरीदने वालों की लाइन है। सबसे पीछे खड़े हैं डब्बू के पापा जिन्हें फ़ॉर्म ब्लैक खरीदना पड़ा। 

डब्बू के पापा

डब्बू का एड्‌मिशन हो गया तो जिंदगी बदल जाएगी। हम भी ‘इंगलिश मीडियम स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे के माँ-बाप’ कहलाएंगे। सोसायटी में इज्जत बढ़ जाएगी।

हाय मेरी किस्मत

अंग्रेजी सीखो नहीं तो मुझे कोई और व्यवस्था करनी पड़ेगी। फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाली किराये की माँए भी मिलने लगी हैं।

रैपीडेक्स का रट्टा

रैपीडेक्स इंगलिश स्पीकिंग कोर्स का रट्टा चालू आहे। आई गो इंगलिस रीडिंग। यू स्लीप विदाउट ईटिंग…

सीट न मिली तो जमीन पर ही आसन

कुछ रीडर और प्रोफ़ेसर राकेश जी (ओ.एस.डी. संस्कृति) के साथ जमीन पर ही जगह पा सके। कवि आलोकधन्वा (छड़ी के साथ) ने भी नाटक देखा।

फादर के कुत्ते ने काट खाया

फ़ॉदर के कुत्ते का धन्यवाद जिसके काट काने से फ़ादर की सहानुभूति जागी। अपने हाथ से फ़र्स्ट-एड देने लगे तो बात चलाने का मौका मिला।

मंत्र मुग्ध दर्शक

फ़िल्म और नाट्यकला विभाग के अध्यक्ष प्रो रवि चतुर्वेदी को इतनी भीड़ की उम्मीद नहीं थी। हाल छोटा पड़ गया। जो लोग जगह नहीं पा सके उनके लिए दूसरा शो तत्काल बाद कराना पड़ा।

डोनेशन दोगे...

डोनेशन की चार सीटों में तीन भर गयी हैं। चौथी तुम्हें मिल सकती है लेकिन इसके लिए कुछ व्यवस्था…

इस नाटक में सूत्रधार की भूमिका निभाने वाले नीरज उपाध्याय ने अलग-अलग दृश्यों को जोड़ने और कहानी के सूत्र को बीच-बीच में जोड़ने के साथ-साथ कुत्ता, हनुमान, और पानवाला बनकर दर्शकों को हँसी से लोट-पोट कर दिया। डब्बू के पिता की भूमिका में रोहित कुमार ने जोरदार अभिनय क्षमता का परिचय दिया। खासकर संवाद अदायगी में  प्रत्येक पंचलाइन पर उन्होंने तालियाँ बटोरी। डब्बू के सामने हिंदी न बोलने कि मजबूरी में पूजा के समय इशारे से आरती का सामान न मांग पाने की मजबूरी का चित्रण गुदगुदाने वाला था। डब्बू की माँ बनी सुनीता थापा ने भी अपने सयाने अभिनय से एक निम्न मध्यमवर्गीय गृहिणी के चरित्र को सजीव कर दिया। शेष पात्रों में स्कूल के चपरासी की भूमिका में मनीष कुमार और ताऊ की भूमिका में रत्नेश मिश्रा भी सराहे गये।

मैंने यू-ट्यूब पर इस नाटक की कुछ झलकियाँ लगायी हैं जिन्हें आप निम्न लिंक्स चटकाकर देख सकते हैं।

१-पास में डब्बू था इसलिए हिंदी नहीं बोल पा रहा था

२-बीबी के जेवर दाखिले के लिए

३-फुन्नन गुरू का परिचय

४-गाँव से आए लालची ताऊ

प्रसंगवश:

वर्धा विश्वविद्यालय के इस शांत प्रांगण में रहकर देश के बड़े हिस्से में चल रही मंदिर-मस्जिद चर्चा और उससे दुष्प्रभावित दिनचर्या से अक्षुण्ण रहते हुए यहाँ दूसरे जरूरी मुद्दों पर सोचने का अवसर मन को सुकून देता है। अगले २-३ अक्टूबर को चार महान कवियों की जन्म शताब्दी का उत्सव कार्यक्रम यहाँ आयोजित है जिसमें देश के शीर्ष साहित्यकार जु्टकर सच्चिदानंद हीरानंद वात्साययन ‘अज्ञेय’, केदार नाथ अग्रवाल, शमशेर, बाबा नागार्जुन और फैज़ अहमद फैज़ की काव्य यात्रा पर गहन चर्चा करेंगे। उद्घाटन भाषण नामवर सिंह का होगा। बाद में वर्ष पर्यंत देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे कार्यक्रम कराये जाएंगे।

ब्लॉगरी की आचार संहिता विषयक विचारगोष्ठी व कार्यशाला भी बस अगले सप्ताहांत (९-१० अक्टूबर को) होगी। आमंत्रण पत्र भेजे जा चुके हैं। बड़ी संख्या में वरिष्ठ ब्लॉगर्स ने रेल आरक्षण कराकर सूचना भेज दी है। कुछेक अभी सो रहे हैं। आशा है जल्दी ही जागकर अपना प्रोग्राम बताएंगे। आप सबका स्नेह पाकर मेरा मन बहुत उत्साहित है। बस अब तैयारी पूरी करनी है।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

साँईं बाबा का प्रसाद और ज्ञानजी की सेहत…

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श्री साँई बाबाआज वृहस्पतिवार है। शिर्डी वाले साँई बाबा के भक्तों का खास दिन। इस दिन व्रत-उपवास रखकर श्रद्धालु जन साँईं मन्दिरों में दर्शन के लिए उमड़ पड़ते हैं। इलाहाबाद का मुख्य मन्दिर भी इस दिन विशेष आकर्षण का केन्द्र हो जाता है। श्रद्धा और सबूरी के बीज मन्त्रों से प्रेरित भक्तजन बड़ी भीड़ के बावजूद पूरी तरह अनुशासित रहकर लम्बी लाइन में अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हुए साँईं मन्त्रों का जप करते हैं और आगे बढ़ते हैं। शाम के वक्त तो इतनी भीड़ हो जाती है कि व्यवस्थापकों को रस्सियाँ तानकर लाइन बनानी पड़ती है जो मन्दिर के भीतर कई चक्रों में घूमने के बाद भी बाहर सड़क तक आ जाती है।

श्रद्धा-सबूरीजब श्रीमती जी के आग्रह पर पहली बार मैं इस मन्दिर में दर्शन करने गया था तो साँईं बाबा के प्रति श्रद्धा से अधिक एक अच्छे पति होने की सदिच्छा के वशीभूत होकर गया था। यहाँ आकर जब मैंने भक्तों की अपार भीड़ देखी और यह अनुमान किया कि भीतर साँईं बाबा की मूर्ति तक पहुँचने में कम से कम दो घण्टे लगेंगे तो मेरे पसीने छूट गये। भीड़ में तिल रखने की जगह नहीं थी इसलिए करीब ढाई साल के बेटे को भी गोद में लेना अपरिहार्य हो गया था। इस दुस्सह परिस्थिति में भी हम लोगों ने धैर्यपूर्वक दर्शन किये थे। वहाँ साँई बाबा के भजनों और उनकी जय-जयकार के बीच इतना अच्छा भक्तिमय माहौल बना हुआ था कि मन में किसी कठिनाई के भाव ने कब्जा नहीं किया।

साँईं प्रसादालयउस प्रथम दर्शन के समय एक ऐसी बात हो गयी थी जो साँईं बाबा के चमत्कारी प्रभाव की पुष्टि करती सी लगी। मेरे लाख सिर हिलाने के बावजूद श्रीमती जी तो इसे चमत्कार ही मानती हैं। हुआ ये कि जब मैं लाइन में लगा था उसी समय मेरा मोबाइल बज उठा। बड़ी मुश्किल से जब मैंने इसे जेब से निकालकर ‘काल रिसीव’ किया तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। यह एक ऐसे व्यक्ति का फोन था जिसे मैं करीब दो साल से ढूँढ रहा था। वह मेरे तीस हजार रुपये लौटाने में लगातार टाल-मटोल करते हुए अबतक मुझे टहलाता रहा था। उसदिन उसने अचानक फोन पर बताया कि रूपयों की व्यवस्था हो गयी है। किसी को भेंज दीजिए, आकर ले जाय। बस क्या था, मेरी पत्नी ने इसे साँईं बाबा का अनुपम प्रसाद मानते हुए उनमें अपना अडिग विश्वास प्रकट किया और आगे ऐसी कुछ अन्य उपलब्धियों को भी साँई बाबा की कृपा मानने सिलसिला शुरू हो गया। ऐसे प्रत्येक अवसर पर हमने साँईं के दर्शन किए। लेकिन मैने समय की अनुपलब्धता के कारण हमेशा वृहस्पतिवार को दर्शन से परहेज किया। मुझे लगता है कि पूजा-अर्चना में शान्तचित्त होकर बैठना और ध्यान करना अधिक महत्वपूर्ण है, न कि भीड़ में गुत्थमगुत्था होकर प्रसाद चढ़ाना।

साँईं इम्पोरियमआज रचना ने वृहस्पति को ही वहाँ जाने की खास वजह बतायी। उन्होंने लगातार नौ गुरुवार साँईं का व्रत रखा था जिसका आज समापन (उद्यापन) करना था। इसके अन्तर्गत गरीबों और लाचारों को भोजन कराना होता है। हलवा और पूड़ी का मीठा भोजन थैलियों में पैक करके हम मन्दिर गये। लेकिन शाम को नहीं, सुबह साढ़े दस बज गये। इस समय भीड़ बहुत कम थी।  मन्दिर और इसके आस-पास का वातावरण दर्शन, पूजन, और दान-पुण्य करने के लिए आवश्यक सभी अवयवों से युक्त है। मन्दिर प्रांगण में ही पूजन और प्रसाद की सामग्री के लिए साँई प्रसादालय है तो वहीं साँईं इम्पोरियम में बाबा से जुड़ी अनेक पुस्तकें, मूर्तियाँ, तस्वीरें, चुनरी, चादरें, ऑडियो कैसेट्स, सीडी, और अन्य प्रयोग की वस्तुएं उपलब्ध हैं। जूते-चप्पल रखने के लिए एक ओर बने स्टैण्ड में दो तीन कर्मचारी मुस्तैद हैं जो अलग-अलग खानों में इसे सुरक्षित रखकर टोकन दे देते हैं। हाथ धुलने के लिए और पीने के लिए स्वच्छ और शीतल पेयजल की व्यवस्था है।

मन्दिर के बाहर वाहन स्टैण्ड भी है और बड़ी संख्या में भिखारी भी। उनमें से अनेक विकलांग, अपंग और लाचार हैं तो कई बिल्कुल ठीकठाक सुविधाभोगी और अकर्मण्य भी। साधुवेश धारी कुछ व्यक्ति कमण्डल लटकाये या रामनामी बिछाए हुए भी मिले जो कदाचित्‌ गुरुवार को ही यहाँ दान बटोरने आते हैं। अनेक महिलाएं अपने झुण्ड के झुण्ड बच्चों के साथ भीख इकट्ठा करने के लिए जमा थीं। सड़क पर भी फूल-माला और प्रसाद की अनेक दुकानें सजी हुई थीं। हर स्तर के भक्तों के लिए अलग-अलग सामग्री यहाँ मौजूद है।

जब हम गाड़ी से उतरकर भोजन की थैलियाँ बाँटने शारीरिक रूप से अक्षम कुछ गरीबों के पास गये तो वहाँ एक व्यक्ति रसीद-बुक लिए खड़ा था। उसने उसे आगे बढ़ाते हुए कहा कि साहब यह रसीद कटा लीजिए। इसका पैसा विकलांगों की सेवा में खर्च होता है। मैंने पूछा- इसकी क्या गारण्टी? वह बोला- साहब आप विश्वास कीजिए। उसकी वेश-भूषा और शैली देखकर मुझे कत्तई विश्वास नहीं हुआ। हमने साक्षात्‌ दरिद्रनारायण की यथासामर्थ्य सेवा की और वहाँ से दर्शन-पूजन करने के बाद प्रसाद लेकर आदरणीय ज्ञानदत्त जी‌ का कुशल क्षेम जानने रेल-अस्पताल की ओर चल पड़े। (मन्दिर के भीतर फोटो खींचने की मनाही है इसलिए हमारा कैमरा ज्यादा कुछ नहीं कर सका।)

    रेलवे अस्पताल के वी.आई.पी. केबिन में आसन जमाए ज्ञानजी किसी भी तरह से मरीज जैसे नहीं लगे। विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और परिवारीजन के साथ बातचीत में मशगूल थे। वागीशा और सत्यार्थ (मेरे बेटी-बेटे) ने उनका पैर छुआ तो प्रमुदित होकर दोनो हाथों से आशीर्वाद दिया। वहाँ ‘बाबूजी’ सबसे सक्रिय और मुस्तैद दिखे। सुबह से शाम तक लगातार अपने बेटे के आस-पास रहते हुए उन्होंने अपना सुख और आराम मुल्तवी कर रखा है। वैसे तो शुभेच्छुओं और तीमारदारों की कोई कमी नहीं है, लेकिन बाबूजी की उपस्थिति पिता-पुत्र के बीच विलक्षण आत्मीय सम्बन्ध को रेखांकित करती हुई भावुक बना देती है।

     एम.आर. आई. रिपोर्ट आ चुकी है। सबकुछ प्रायः सामान्य है। मस्तिष्क के दाहिने हिस्से में हल्की सी सूजन पायी गयी है जो दवा से ठीक हो जाएगी। तीन-चार दिन अस्पताल में ही रहना होगा। आज दूसरा दिन बीत गया है। अगले पन्द्रह दिनों तक दवा चलेगी। उसके बाद सबकुछ वापस पटरी पर आ जाएगा। ज्ञान जी किसी को मोबाइल पर बता रहे हैं – कुछ लोग इसे ब्लॉगिंग से जोड़ रहे हैं लेकिन ऐसा कुछ नहीं है। ब्लॉगिंग तो मेरे लिए केवल टाइम-फिलर है। यह मेन जॉब तो नहीं ही है।

ए.सी. कमरे में एक्स्ट्रा बेड और सोफे पड़े हुए  हैं, और टीवी भी लगी है। लैप-टॉप भी आ गया है जो अभी खोला नहीं गया है, लेकिन मोबाइल पर लगातार हाथ चल रहा है।

    सबकुछ चंगा है जी…

 एक एसएमएस कर लूँ...     DSC02790

मेरी पिछली पोस्ट पर अबतक की सर्वाधिक प्रतिक्रियाएं दर्ज हुईं। ज्ञान जी के लिए आप सबका प्रेम और आदर देखकर अभिभूत हूँ। दद्दा तूसी ग्रेट हो जी…

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

क्षमा प्रार्थना…

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DSC02527 हे मूषक राज,

बहुत भारी मन से आपको विदा कर रहा हूँ। आपको कष्ट देने का मेरा कोई इरादा नहीं था। लेकिन क्या करूँ, आपने हमारे परिवार को ऐसा मानसिक कष्ट दिया कि आपको अपने घर से दूर कर देने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। आपसे विनती करने का कोई माध्यम होता तो मैं आपसे हाथ जोड़कर कहता कि आप इस घर के निरीह प्राणियों पर दया करिए। लेकिन आपको सलाखों के पीछे कैद करने के सिवा हमारे पास कोई दूसरा हल नहीं था। आपको जो कष्ट हुआ उसके लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं।

अपने विचित्र शौक को पूरा करते हुए आपने हमारे घर के किचेन से लेकर ड्राइंग रूम तक और आंगन से लेकर बेड रूम तक क्या-क्या नहीं काट खाया। कितने कपड़े, जूते-चप्पल, और घरेलू सामान आपकी निरन्तर वृद्धिमान दन्तपंक्ति की भेंट चढ़ गये। लेकिन हम यह सब कुछ सहते रहे। एक तो आपकी चंचल गति और दूसरे हमारी धर्म भीरु मति- दोनो आपकी सुरक्षा में सहायक रहे। आप हमारे आराध्य देव प्रथम वंदनीय, प्रातः स्मरणीय, गणपति, गणनायक, विघ्नविनाशक, लम्बोदर, उमासुत श्री गणेश जी के वाहन हैं। आपको किसी प्रकार की क्षति पहुँचाना हमारे लिए पाप की बात है। ऐसे कई अवसर आये जब आप हमारी आँखों के सामने ही हमें चिढ़ाते हुए चलते बने। घर के मन्दिर में चढ़ाया हुआ प्रसाद उठाने से जो हम चूक गये तो उसका भोग आप ही लगाते रहे। कदाचित्‌ मेरी गृहिणी मन ही मन खुश होती रही कि शायद आपकी पीठ पर बैठकर भगवान स्वयं भोग लगाने आते हों।

खुराफ़ात का अन्त आप छत से रोशनदान की ओर आने वाले डिश-टीवी के केबल पर चढ़कर घर के भीतर आते-जाते रहे। भारी देह होने के कारण एकाध बार अचानक ताली की आवाज से विचलित होकर आप फर्श पर आ गिरे तो भी आपका बाल बांका नहीं हुआ। बल्कि हम ही पाप के भागी होने के डर से सहम गये थे।

बचपन में अपने गाँव पर गेंहूँ की कटाई के बाद खाली हुए खेतों में आपका शिकार करने वालों को मैं देखता था। आपके बिल की खुदाई करने पर जमीन के भीतर आपकी बनायी हुई जो सुरंग मिलती थी उसे देखकर हम चौक जाते थे। आपने कितनी सफाई से भीतर ही भीतर गेंहूं की बालियों को इकठ्ठा रखने के लिए बड़े-बडे गोदाम बना रखे होते थे। अपने नवजात बच्चों के लिए सुरंग की सबसे भीतरी छोर पर नर्म मुलायम घास के बिस्तर सजा रखे होते थे। जब ये मुसहर जाति के शिकारी कुदाल से आपका आशियाना खोद रहे होते और आपके पूरे खानदान का सफाया कर रहे होते तो मेरा कलेजा कांप उठता था। आप द्वारा जमा किया हुआ अनाज उनका भोजन बन जाता। लेकिन जिस किसान के खेत पर आपकी कृपा हो जाती वह सिर पकड़ कर बैठ जाता।

मैने देखा था कि आपको पानी से बहुत भय हुआ करता था। आपको बिल से बाहर निकालने के लिए उसमें पानी भर दिया जाता था। आप जब घर में आयी बाढ़ से बचने के लिए बदहवास होकर भाग रहे होते तो आपके पीछे डण्डा लेकर दौड़ते गाँव के लड़के और उनके साथ आपका पीछा करने वाले कुत्ते अपनी पूरी शारीरिक शक्ति झोंक दिया करते थे।  बहुधा आप उन्हें चकमा देने में सफल हो जाते। लेकिन वे जब आपका शिकार कर लेते थे तो आपको आग में भूनकर नमक मिर्च के साथ चटखारे लेकर खाते हुए  वे लोग मेरे मन को घृणा से भर देते थे।

कुत्ते और बिल्लियों के लिए आपका उत्सर्ग तो अब किंवदन्ती बन चुका है। टीवी पर टॉम और जेरी का कार्टून देखते हुए मेरे बच्चे हमेशा आपके चरित्र से सहानुभूति रखते हैं। बिल्ले को हमेशा छकाते हुए आप सदैव तालियाँ बटोरते रहते हैं, लेकिन असली दुनिया आपके लिए इतनी उत्साहजनक नहीं है। शहरी जीवन शैली में आपको बर्दाश्त करने का धैर्य कम ही लोगों में है। आपको मारने के लिए तमाम जहरीले उत्पाद बाजार में लाये गये हैं। अब तो एक ऐसा पदार्थ बिक रहा है जिसे खाकर आप घर से बाहर निकल जाते हैं और खुले स्थान पर काल-कवलित हो लेते हैं।

एक बार गाँव में जब आपकी प्रजाति ने घर में कुहराम मचा रखा था तो एक दवा आँटे में मिलाकर जगह जगह रख दी गयी थी। उसके बाद जो हुआ उसे याद करके हम काँप जाते हैं। पूरे घर में बिखरी हुई लाशें कई दिनों तक इकठ्ठा की जाती रहीं। दो-चार दिन बाद जब दुर्गन्ध के कारण घर में रहना मुश्किल हो गया तो नाक पर पट्टी बाँधकर चींटियों की पंक्ति का सहारा लेते हुए अनेक दुर्गम स्थानों पर अवशेष मृत शरीरों को खोजा गया।   पूरे घर को शुद्ध करने के लिए हवन-अनुष्ठान कराना पड़ा। इसके बाद घर में यदि कोई बीमार हो जाता तो इसे उस हत्या के पाप का प्रतिफल माना जाता रहा। तबसे हम आपका समादर करने के अतिरिक्त कुछ सोच ही नहीं सकते।

हमने आपको कैद करने के बारे में कदापि नहीं सोचा होता यदि आपने शौचालय की सीट में लगे साइफ़न में इकठ्ठा पानी को अपना स्विमिंग पूल न बनाया होता। जाने आपको इस गन्दे पानी में स्नान करने का शौक कहाँ से चढ़ गया? इधर हमने देखा कि आपके पैरों के निशान कमोड से प्रारम्भ होकर वाश बेसिन पर और साबुनदानी को उलटने –पुलटने के बाद बरामदे में रखे सभी सामानों पर अपनी छाप छोड़ते हुए डाइनिंग टेबुल तक पहुँचने लगे थे। आपने हमारे सरकारी मकान के बाथरूम में लगे जीर्ण हो चुके दरवाजे के निचले कोनों पर छेद बना रखा था।

DSC02541 हमने पहली कोशिश तो यही की थी कि आपको ट्वायलेट में जाने से रोका जाय। रात में सोने से पहले हमने उन छेदों को एक बोरे से बन्द करके उसपर ईंट रख दिया था। सुबह हमने देखा कि आपने गुस्से में बोरे को कुतर दिया है और उसकी लुग्दी पूरे बाथरूम में बिखरा दी है। कदाचित इस गुस्से के कारण ही आपने उस रात रोज से ज्यादा लेड़ियाँ भी  भेंट कर दी थीं। हमने अगले दिन उन छिद्रों को टिन की प्लेट से ढँक दिया। लेकिन आप हार मानने वाले हैं ही नहीं। आपने अगली रात को उस टिन के ठीक बगल में दूसरा छेद बना लिया और अपना नरक-स्नान बदस्तूर जारी रखा।  छेद के पास ही दरवाजे के बाहर हमने जो एक चूहेदानी लगा रखी थी उसे भी आपने नहीं छुआ। आपको तो भीतर घुसने की जल्दी रही होगी।एक रास्ता बन्द हुआ तो दूसरा खोल लिया

हमें विश्वास हो गया कि आपको ट्वायलेट के भीतर जाने से नहीं रोका जा सकता है। आप स्नान करने से पहले कुछ और नहीं करते। चूहेदानी में रखे आलू के टुकड़े को आप तभी छुएंगे जब स्नान ध्यान पूरा हो जाएगा। मैने इस बार चूहेदानी को अन्दर ही लगा दिया ताकि जब आप अपने बाथटब से बाहर निकलें तभी भोजन की तलाश में उधर आकर्षित हों। इस बार युक्ति काम कर गयी। रात के करीब एक बजे जब खटाक की आवाज हुई तो मुझे चैन मिला। उठकर मैने तत्क्षण देखा। आप मेरे कैदी हो चुके थे। सद्दाम हुसेन को पकड़ने के बाद राष्ट्रपति बुश के चेहरे पर जो विजयी मुस्कान थी उसे भी मात देती हुई खुशी के साथ मैंने रात बितायी। आपको आपके पसन्दीदा स्थान पर ही कैदबन्द छोड़ दिया था मैने।

DSC02553 जब सुबह उठकर देखा तो आप अपने पिंजड़े के साथ कमोड की सीट में लुढ़के हुए थे। गजब का प्रेम था आपका उस नरक के रस्ते से। मैने एक प्लास से आपको पिजड़े सहित उठाया, आंगन में ले जाकर नल के पानी से विधिवत स्नान कराया और सुबह की ताजी धूप में सुखाने के बाद आपकी यादों को कैमरे में कैद करने के लिए उसी डाइनिंग टेबुल पर रख दिया जिसपर आप प्रायः विचरण करते रहते थे। आपको सलाखों के पीछे बहुत देर तक रखने की मेरी कोई मंशा नहीं थी। लेकिन मेरी श्रीमती जी सोमवती अमावस्या के अवसर पर पीपल देवता की पूजा करने, उनकी १०८ बार परिक्रमा करने गयी हुई थीं और मेरे बच्चे सो रहे थे। उन सबको आपका दर्शन कराये बगैर मैं आपको भला कैसे जाने देता?

अब जबकि मैने आपको अपने घर से एक किलोमीटर दूर इस मन्दिर के प्रांगण में लाकर छोड़ने का निश्चय किया है तो मन में मिश्रित भाव पैदा हो रहे हैं। दुःख और सन्तोष दोनो कुलांचे भर रहे हैं। उम्मीद है कि मन्दिर से सटा हुआ यह हरा-भरा पार्क आपको निश्चित ही अच्छा लगेगा। इस मन्दिर में दक्षिणमुखी हनुमान जी है, भगवान शंकर जी हैं, दुर्गा माँ की छत्रछाया भी है और आपके स्वामी गणेश जी भी पदासीन हैं। देखिए न, यहाँ कितनी धर्मपरायण सुहागिन औरतें पीपल के चबूतरे पर पूजा-परिक्रमा कर रही हैं। बड़ी मात्रा में प्रसाद चढ़ाया जा रहा है। आप इनका आनन्द उठाइए। हाँ, अपना नरक-स्नान का शौक त्याग दीजिएगा तो भला होगा।

आशा है कि मैने आपको जो नया बसेरा दिया है उसको मद्देनज़र रखते हुए आप मुझे माफ़ कर देंगे। मैने आपको पिजड़े में बन्द करके और नल के साफ पानी से स्नान कराके जो कष्ट दिया है और आपकी कैदी हालत में बेचैनी से किए गये क्रिया-कलाप दुनिया को दिखाने के लिए रिकॉर्ड किया है उसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ।

सादर!

आपका एक अनिच्छुक भक्त

(सिद्धार्थ)

विदा से पूर्व मूषक राज के करतब

कैद में खुराफ़ाती
सलाखों के पीछे

घुस पैठी थकान…

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इतवार का बिहान

सिर तक रजाई लिए तान

घर में की खटपट से बन्द किए कान

आंगन में धूप रही नाच

छोटू ककहरा किताब रहा बाँच

फिर भी न आलस पर आने दी आँच

कुंजीपट खूँटी पर टांग

धत्‌ कुर्सी कर्मठता का स्वांग

दफ़्तर में अनसुनी है छुट्टी की मांग

कूड़े का ढेर

फाइल में फैला अंधेर

चिट्ठों में आँख मीच रहे उटकेर

आफ़त में जान

भला है बन बैठो अन्जान

देह नहीं मन में घुस पैठी थकान

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

एक घटिया व्यक्ति को चुनने के लिए इतनी कसरत… बाप रे बाप?

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जनवरी की बेहद सर्द रात… एलार्म की घण्टी भोर में साढ़े चार बजे बज उठी है। घर के तीनो मोबाइल सेट एक साथ बजे हैं। तीनों में एलार्म इस लिए सेट किए कि कहीं कोई चूक न हो जाय। मामला इतना संवेदनशील है कि तैयार होकर साढ़े पाँच बजे तक हर हाल में निकल पड़ना है। सीजन का सबसे ठण्डा दिन… दाँत बज रहे हैं। बाहर कुहरे की मोटी चादर फैली हुई है। गहरी नींद और गर्म रजाई से निकलकर बाथरूम में… ऊफ़्‌ टैप का पानी तो हाथ काटे दे रहा है। इमर्सन रॉड से पानी गरम करने में आधा घण्टा लग जाएगा…. चलो तबतक ब्रश करके सेव करते हैं… किसी तरह ये दिन ठीकठाक बीत जाय …नहाकर पूजा करते हुए यही प्रार्थना मन में चल रही है…।

ड्राइवर का मोबाइल स्विच ऑफ़ है… उफ़्‌। यदि वह समय से नहीं आया तो बहुत गड़बड़ हो जाएगी। सुरक्षाकर्मी न आया तो अकेले ही निकल लूंगा लेकिन ड्राइवर और गाड़ी के बिना तो कुछ भी सम्भव नहीं। रात ग्यारह बजे छोड़ते वक्त मैने उन दोनो को ठीक से समझा दिया था कि सुबह साढ़े पाँच बजे निकलना है… एक मिनट भी देर की तो मैं डीएम साहब के यहाँ जाकर दूसरी गाड़ी ले लूंगा… उसके बाद तुम लोग जेल जाना… मैं तो चुनाव कराने चला ही जाऊंगा…। लेकिन क्या मैं ऐसा कर सकता हूँ? खुद की फसन्त भी तो है। डीएम साहब पूछेंगे कि रात में आए ही क्यों… क्या जवाब दे पाऊंगा। ड्राइवर ने फिर भी मोबाइल बन्द कर लिया है। उफ़्‌…! टेन्शन… टेन्शन…टेन्शन… चुनाव में यह किस-किसको नहीं झेलना पड़ता है…!

पूजा अधूरी छोड़नी पड़ी। भगवान को क्या समझाना… वह तो सब जानता है। चुनाव ड्यूटी के लिए छूट दे ही देगा। लेकिन ५:२५ पर भी ड्राइवर का फोन बन्द होना डरा रहा है। अचानक मुँह जल जाता है तो पता चलता है कि श्रीमती जी गरम चाय हाथ में दे गयी हैं। पहले उस ओर ध्यान नहीं गया। मोबाइल पर अटका हुआ है… अब क्या करूँ…??? सुबह-सुबह टेन्शन…।

ठीक साढ़े-पाँच बजे काल-बेल बज उठती है। दौड़ कर दरवाजा खोलता हूँ…। प्याली की चाय छलक जाती है। बाहर ड्राइवर और गार्ड दोनो मौजूद हैं। जान में जान आती है। चुनाव ड्यूटी का खौफ़ किसे न होगा…? फाइल लेकर गाड़ी में बैठ जाता हूँ।

“तुमने मोबाइल क्यों बन्द कर लिया भाई…?” मन में खुशी है कि समय पर प्रस्थान हो गया है।

“साहब, बैटरी डिस्चार्ज हो गयी है। रात में लाइट नहीं थी…” ओहो, मैने तो इन्हें ग्यारह बजे छोड़ा ही था। इन्हें अपने घर जाकर सोते हुए बारह बज गये होंगे फिर भी सुबह ठीक समय पर हाजिर हैं… इन्हें तो मुझसे भी कम समय सोने को मिला… मन को तसल्ली देता हूँ।

फिर उनके बारे में सोचने लगा जो उस देहात के अन्धेरे में कड़ी ठण्ड से ठिठुरते हुए ब्लॉक में बने बूथ पर टिके हुए हैं। चुनाव कराने गये करीब बीस शहरी लोगों की सुविधा के नाम पर ब्लॉक में लगा एक ‘इण्डिया मार्क-टू हैण्ड पम्प’, खुली खिड़कियों वाले बड़े से हाल में बिछी टेन्ट हाउस की चरर-मरर करती चारपाइयाँ और उनपर बिछे धूलधूसरित गद्दे, बीडिओ और ‘पंचायत साहब’ के सौजन्य से रखी कुछ मटमैली रजाइयाँ। रात में ब्लॉक के स्टाफ़ ने पूरी सेवा भावना से जो गरम-गरम पूड़ी और आलू की मसालेदार सब्जी खिलायी थी उसे खाने के बाद उस शौचालयविहीन परिसर में रुककर सोने की हिम्मत न हुई। वहाँ से मैं रात में दस बजे भाग आया। करीब साठ किलोमीटर की यात्रा वहाँ रुकने से कम दुखदायी थी।

हालाँकि ऑब्जर्वर महोदय की इच्छा थी कि सेक्टर मजिस्ट्रेट भी बूथ पर ही रात्रि विश्राम करें। यह भी कि रात भर इसपर निगरानी रखी जाय कि किसी दल या प्रत्याशी द्वारा पोलिंग पार्टी को प्रभावित करने का प्रयास न हो। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए ‘कुछ भी करेगा’ टाइप तैयारी। …पोलिंग पार्टी जब खा-पीकर सो गयी तब मैं वहाँ से हटा और जब सुबह सात बजे हाजिर हो गया तो पार्टी वाले अभी जगकर पहली चाय की बाट जोह रहे थे।

मतदान आठ बजे से प्रारम्भ होना था… आनन-फानन में हाल खाली करके मतदान की तैयारी कर ली गयी। मतदान के लिए गोपनीय घेरा बना लिया गया था। पुलिस वालों को स्ट्रेट्जिक प्वाइण्ट्स पर तैनात किया गया, वीडियो कैमरा वाले को लगातार आठ घण्टे वोटिंग की रिकॉर्डिंग करने के लिए जरूरी बैटरी बैकअप और कैसेट के साथ तैयार किया गया… पीठासीन अधिकारी अपनी टीम के साथ मुस्तैद होकर माननीय मतदाता की राह देखने लगे… प्रथम वोटर ग्यारह बजे पधारे।

***

“साहब आप बहुत गलत कर रहे हैं, इतनी सख़्ती करेंगे तब तो हम चुनाव ही हार जाएंगे… ‘भाई’ को मुँह दिखाने लायक ही नहीं रह जाएंगे” प्रत्याशियों की ओर से तैनात मतदान अभिकर्ताओं में से एक ने व्यग्र होकर कहा।

प्रत्येक मतदेय स्थल (पोलिंग बूथ) पर प्रत्याशी द्वारा अपना एजेन्ट नियुक्त किया जाता है जो मतदाताओं की पहचान करने में पोलिंग पार्टी की मदद करते हैं और प्रतिद्वन्दी पार्टी द्वारा सम्भावित धाँधली पर भी नजर रखते हैं। इन्हें हाल के भीतर ही कुर्सियाँ दी जाती हैं। ये प्रत्येक मतदाता को देखते हैं और किसी भी फर्जी मतदाता की पहचान को चैलेन्ज कर सकते हैं। जो महोदय शिकायत कर रहे थे उनको मैने वोट डाल रहे मतदाताओं के नजदीक जाकर मतपत्र देखने की कोशिश से रोक दिया था। मतदान की गोपनीयता भंग होने की इजाजत कतई नहीं दी जा सकती थी। हारकर वे हाल से बाहर आ गये थे और मुझे ‘समझाने-बुझाने’ की कोशिश करने लगे

“मैं समझा नहीं, आप चाहते क्या हैं…?” मैने अनभिज्ञता प्रकट की।

“अरे साहब, यदि वोटर को हमें वोट नहीं दिखाने देंगे तब तो वह धोखा दे देगा”

“कैसा धोखा…? मैं समझ नहीं पा रहा हूँ, गुप्त मतदान का तो उसे अधिकार है। इसी की रक्षा के लिए तो यह सारी मशीनरी लगी है”

“कैसा अधिकार साहब…, चार-चार लोगों से पैसा खाकर बैठे हैं सब… अगर ऐसे वोट डलवा देंगे तब तो यह हमारा खाकर भी दूसरे को वोट दे देंगे…”

“नहीं-नहीं, मैं ऐसा नहीं मानता… ये सभी खुद ही जनप्रतिनिधि हैं। जनता के वोट से चुनकर प्रधान और बीडीसी मेम्बर बने हैं। आज ये अपना एम.एल.सी चुनने आये हैं। ये लोकतन्त्र के खिलाफ़ कैसे जा सकते हैं?”

“बेकार की बात कर रहे हैं आप, इसी एलेक्शन की राजनीति में मैने जिन्दगी गुजार दी है साहब… यहाँ हमारी जाति के वोटर नहीं हैं। आपने अगर मदद नहीं की तो यहाँ से तो हम हार ही जाएंगे”

“मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ? मदद तो वोटर ही करेगा। आपके प्रत्याशी खासे लोकप्रिय हैं, मैने सुना है आसानी से जीत रहे हैं…” मैने ढाढस देते हुए कहा।

“बात वो नहीं है। चुनाव तो ‘भाई’ जीत ही रहे हैं, लेकिन इस बूथ से हार हो जाएगी तो मेरी बड़ी फजीहत हो जाएगी। क्या मुँह दिखाऊंगा मैं?”

“मुँह तो मैं नहीं दिखा पाऊंगा अगर यहाँ कोई धाँधली हो गयी… मेरी तो नौकरी ही चली जाएगी” मैने मजबूरी बतायी।

“किसकी मजाल है साहब जो आँख उठाकर देख ले… सख्ती सिर्फ़ आप कर रहे हैं। यहाँ किसी भी एजेण्ट की हिम्मत नहीं है जो हमारे खिलाफ़ खुलकर ऑब्जेक्शन करे। पता नहीं, आप ही क्यों नहीं समझ रहे है?”

“अभी यहाँ जोनल मजिस्ट्रेट, डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट और स्वयं ऑब्जर्वर कभी भी आ सकते हैं… आप किसी अनियमितता की उम्मीद मत करिए। तुरन्त शिकायत हो जाएगी…”

“कोई कुछ नहीं कहेगा साहब, ये साले वोटर एक बार मुझसे आँख मिलाएंगे तो जो मैं चाहूंगा वही करेंगे।”

मैने साफ हाथ जोड़ लिया। मुझसे निराश हो जाने के बाद एजेण्ट महोदय उठकर बेचैनी से टहलने लगे। थोड़ी दूर जाकर मोबाइल मिलाने लगे। दूर से उनका हाव-भाव बता रहा था कि काफ़ी कोशिश के बाद फोन मिल गया है। फोन के उस ओर जो भी था उसे कुछ समझाने लगे… काफ़ी देर तक समझाने के बाद मेरे नजदीक आए और मोबाइल मुझे थमाते हुए बोले-

“लीजिए साहब, बहुत मजबूरी में मुझे यह कदम उठाना पड़ा है… भाई से ही बात कर लीजिए”

“ओहो…! हेलो… कौन साहब बोल रहे हैं?” मैने गर्मजोशी से अभिवादन करते हुए कहा।

“साहब नमस्ते… ‘मैं’ बोल रहा हूँ… कैसे हैं? सब ठीक चल रहा है न…” इस बीच बगल से एजेण्ट महोदय ने इशारे से बता दिया कि फोन पर उनके प्रत्याशी हैं।

“हाँ-हाँ, सब आपकी दुआएं हैं। सब कुछ फ्री एण्ड फेयर चल रहा है। इधर निरक्षर मतदाता अधिक हैं इसलिए प्रिफ़रेन्शियल वोट डालने में समय अधिक लग रहा है। नियमानुसार आवश्यक होने पर वोटिंग हेल्पर की सुविधा दी जा रही है”

“वो तो ठीक है, लेकिन `इनको’ आप कोई सुविधा नहीं दे रहे हैं… ऐसे काम नहीं चलेगा, थोड़ी मदद कर दीजिए…”

“कैसी मदद, पोलिंग पार्टी तो वोटर्स की मदद कर ही रही है… आराम से वोट पड़ रहे हैं। किसी को कोई शिकायत नहीं है”

“अरे, इनकी शिकायत पर तो ध्यान दीजिए… कह रहे हैं कि आप वोट देखने नहीं दे रहे हैं…”

“नेता जी, क्या आप यह कहना चाहते हैं कि मैं मतदान की गोपनीयता भंग हो जाने दूँ”

“नहीं-नहीं, बस इनको देख लेने दीजिए, नहीं तो वोटर टूट जाएंगे, हमारा नुकसान कराकर आप को क्या मिल जाएगा…?”

“भाई साहब, इसके लिए माफ़ करिए। मैं अकेला नहीं हूँ यहाँ। पीठासीन अधिकारी है, माइक्रो ऑब्जर्वर हैम, पुलिस वाले हैं, दूसरे उच्चाधिकारी हैं, आयोग के ऑब्जर्वर हैं और सबके बाद पूरी वोटिंग की वीडियो रिकॉर्डिंग हो रही है जिसे ऑब्जर्वर द्वारा देखकर संतुष्ट होने के बाद ही मतगणना करायी जाएगी। किसी प्रकार की धाँधली मतदान निरस्त करा सकती है। सरकार की और प्रशासन की बड़ी बदनामी हो जाएगी। आप अब भगवान के ऊपर छोड़ दीजिए… जो होगा अच्छा ही होगा।”

एक साँस में अपनी बात कहकर मैने फोन बन्द कर दिया और एजेन्ट महोदय से खेद प्रकट करते हुए उन्हें मोबाइल वापस कर दिया। भाई से हुई बात की जानकारी मैने अपने नजदीकी उच्चाधिकारी को फोन से दे दी। थोड़ी देर में अतिरिक्त फोर्स भी आ गयी। चार बजे की निर्धारित समय सीमा पूरी हो जाने तक एक स्थिर तनाव बना रहा। अन्ततः ९५ प्रतिशत मतदाताओं ने अपना वोट डाला।

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ajit-ninan-024 पंचायतीराज व्यवस्था के लागू होने के बाद ग्राम पंचायत अध्यक्ष (ग्राम-प्रधान) और क्षेत्र पंचायत समिति के सदस्य (बीडीसी मेम्बर) पदों पर अनेक महिलाएं चुनी जा चुकी हैं।  विधान परिषद के स्थानीय प्राधिकारी निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता यही पंचायत प्रतिनिधि होते हैं। मतदान के लिए वहाँ आयी हुई अधिकांश महिलाएं अनपढ़ और निरक्षर थीं। उन्हें जिस वोट का अधिकार मिला था वस्तुतः उसका प्रयोग उनके पति, श्वसुर, देवर या पुत्र द्वारा ही किया जाना प्रतीत होता था। एक रबर स्टैम्प की भाँति उन्होंने बतायी गयी जगह पर ‘१’ की लकीर खींची होगी, शायद कुछ वोट सही जगह न पड़ पाने के कारण निरस्त भी करना पड़े। लोकतन्त्र की दुन्दुभि बजाते ये चुनाव क्या देश के जनमानस का सही प्रतिनिधि दे पा रहे हैं। ऐसा नेता जो हमें आगे की ओर सही दिशा में ले जा सके?

चुनाव के एक दिन पहले सुबह-सुबह कलेक्ट्रेट परिसर से पोलिंग पार्टियों की रवानगी से लेकर अगले दिन शाम तक वापस मतपेटियों के जमा होने तक की प्रक्रिया तो चुनावी महागाथा का बहुत संक्षिप्त अंश है। करदाता से वसूले गये करोड़ो रूपयों को खर्च करने, आम जन-जीवन अस्त-व्यस्त करने और लाखों कर्मचारियों-अधिकारियों द्वारा अपना रुटीन खराब करने के बाद चुनाव की प्रक्रिया सम्पन्न होती है तो एक ऐसे विजयी उम्मीदवार के नाम की घोषणा से जो अगले कुछ सालों में कुछ भी गुल खिला सकता है:

वह सदन में प्रश्न पूछने के लिए पैसा खा सकता है, सरकार चलाने के लिए माफ़िया से हाथ मिला सकता है, सरकार बचाने के लिए दलबदल कर करोड़ो कमा सकता है, कबूतरबाजी कर सकता है, साम्प्रदायिक और जातीय दंगे करवा सकता है, ईमानदार अधिकारियों की हत्या करा सकता है, आत्महत्या के लिए मजबूर कर सकता है, बेईमान अधिकारियों का गोल बनाकर सरकारी खजाना लूट सकता है, सरकारी ठेके दिला सकता है, सरकारी सौदों में दलाली खा सकता है, आम जनता और गरीबों का हक छीन कर अपनी तिजोरी भर सकता है, आतंकवादियों को जेल से छुड़ाकर उनके देश भेंज सकता है, राजभवन में पहुँचकर एय्याशी कर सकता है, मधु कोड़ा बन सकता है, देश बाँटने की साजिश रच सकता है।

ऐसी प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी निभाकर क्या हम उस पाप के भागी नहीं बन रहे हैं?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

छः दिसम्बर का वार्षिक रुदन और मुकाबला बेशर्मी का…

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अयोध्या का एक अर्थ ‘जहाँ युद्ध न हो’ पढ़ा था। लेकिन जब भी छः दिसम्बर की तारीख आती है मीडिया में तलवारें निकल आती हैं। उस त्रासद घटना का विश्लेषण करने के लिए बड़े-बड़े विद्वान, विचारक और राजनेता पत्रकारों द्वारा बुला लिए जाते हैं और टीवी पर पैनेल चर्चा शुरू हो जाती है। हर साल वही बातें दुहरायी जाती हैं। भाजपा, कांग्रेस, व समाजवादी पार्टी के नेता आते हैं और अपनी पार्टी लाइन के अनुसार बातें करके चले जाते हैं। कोई अपनी पाटी लाइन से टस से मस नहीं होना चाहता। उनके सभी तर्क एक दूसरे के लिए बेमानी हो जाते हैं।

लेकिन आश्चर्य होता है जब लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में अपनी पीठ ठोंकने वाले ‘ऐंकर’ भी एक खास विचारधारा के पोषण के लिए हमलावर हो उठते हैं। जिस प्रतिभागी की बातें इनसे मेल नहीं खाती उसको टोक-टोककर बोलने ही नहीं देते, केवल आरोपित करते जाते हैं लेकिन जो पार्टी लाइन इन्हे अपने अनुकूल लगती है उसके प्रतिनिधि को अपनी बात रखने के लिए प्रॉम्प्ट करते रहते हैं। यह सब इतनी निर्लज्जता और आक्रामक अन्दाज में होता है कि देखकर इस पत्रकार बिरादरी से भी अरुचि होने लगी है।

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छः दिसम्बर की पूर्व संध्या पर एन.डी.टी.वी. के कार्यक्रम ‘मुकाबला’ और ‘चक्रव्यूह’ में यही सब देखने को मिला। लोकप्रिय कार्यक्रम मुकाबला के ऐंकर दिबांग ने भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर से प्रश्न तो खूब किए लेकिन उनका उत्तर सुनने का धैर्य उनके पास नही था। वहीं समाजवादी पार्टी के मोहन सिंह को तफ़सील से यह बताने का अवसर दिया कि ‘भारत में भले ही हिन्दुओं की अक्सरियत है लेकिन यदि देश ‘डिस्टर्ब’ हुआ तो सबसे ज्यादा नुकसान हिन्दुओं का ही होगा। इसलिए हमें ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए जिससे देश में मुसलमानों को तकलीफ़ हो और माहौल खराब हो जाय।’ यह भी कि बाबरी मस्जिद की साजिश घटित होने के बाद जो मुम्बई में और अन्य स्थानों पर आतंकी हमले हुए उसके दोषियों को सजा हो गयी। फाँसी और आजीवन कारावास मिल गया। लेकिन बाबरी मस्जिद के गुनाहगारों को आजतक सजा नहीं दी जा सकी। उनके इस कष्ट को दिबांग ने भी भरपूर समर्थन देते हुए सुर में सुर मिलाया।

कांग्रेस के प्रतिनिधि श्रीप्रकाश जायसवाल वीडियोलाइन पर थे। उनसे दिबांग ने कहा कि आप प्रकाश जावड़ेकर से पूछिए कि वे मस्जिद गिराये जाने के गुनहगार हैं कि नहीं। इसपर जायसवाल को प्रश्न नहीं सूझा। बोले- हम क्या पूछें, दुनिया जानती है इनकी करतूतें। प्रकाश जावड़ेकर ने कहा- मेरे पास प्रश्न हैं उसका उत्तर आप लोग दीजिए… ६ दिसम्बर १९९२ क्या अचानक चला आया था? १९४८ में रामलला की मूर्तियों की स्थापना किसने करायी…१९८६ में जो ताला खोला गया था वह मन्दिर का था कि मस्जिद का, …१९८९ में शिलान्यास मन्दिर का हुआ था कि मस्जिद का …इन सारे कार्यों के समय किसकी सरकार थी?  प्रश्न और भी रहे होंगे लेकिन दिबांग ने हाथ उठाकर उन्हें बिल्कुल चुप करा दिया और किसी प्रतिभागी से उन सवालों का जवाब देने को भी नहीं कहा।

बात उस ‘साजिश’ पर होने लगी जो ‘संघियों ने मस्जिद को गिराने के लिए’ रची थी। कांग्रेस, सपा और दिबांग चिल्ला चिल्लाकर इसे एक साजिश करार दे रहे थे । कल्याण ने शपथपत्र देकर आश्वस्त किया था कि मस्जिद सुरक्षित रहेगी, लेकिन उन्होंने साजिश रचकर मस्जिद ढहा दी। पूरा ‘संघ परिवार’ इस झूठ-फरेब की साजिश में शामिल था। श्रीप्रकाश जायसवाल ने कहा कि मुख्यमन्त्री के शपथपत्र पर यकीन करना हमारा कर्तव्य था। भाजपा इसे लाखों श्रद्धालुओं की स्वतःस्फूर्त भावना का प्रस्फुटन बता रही थी। उमा भारती भी वीडियोलाइन पर अवतरित हुईं और साजिश की थियरी को सिरे से नकारते हुए बोलीं कि गान्धी जी कहते थे कि पाकिस्तान मेरी लाश पर बनेगा। लेकिन वे जिन्दा रहे और पाकिस्तान बन गया। इसका मतलब यह तो नहीं कि वे पाकिस्तान बनाने की साजिश कर रहे थे।

पैनेल में एक पूर्व केबिनेट सचिव सुब्रमण्यम साहब भी थे। लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट को उन्होंने लगभग कूड़ा ही बता डाला। बल्कि जाँच आयोग अधिनियम में संशोधन करके केवल कार्यरत न्यायाधीशों का ही आयोग गठित करने का सुझाव दे दिया। उनका आशय शायद यह था कि सेवा निवृत्त न्यायाधीश समय और सुविधा बढ़वाने के जुगाड़ में ही उलझे रह जाते हैं। काम की रफ़्तार धीमी और त्वरित न्याय की आशा क्षीण हो जाती है। समस्या की जड़ में उन्होंने राजनीति को ही माना। यदि राजनीति इससे किनारे होती तो समाधान निकल सकता था।

उधर चक्रव्यूह में कल्याण सिंह घेरे जा रहे थे। ऐंकर ने पूछा- आपको छः दिसम्बर की उस दुर्घटना पर कोई अफ़सोस है? कोई शर्म नहीं… कोई पश्चाताप नहीं… कोई दुःख नहीं… बल्कि हमें इस दिन पर गर्व है। …मैने शपथपत्र दिया था कि ढाँचे की रक्षा करेंगे, पूरा इन्तजाम भी कर रखा था, लेकिन मैंने कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश नहीं दिया। मुझे इसपर कोई खेद नहीं है। मैं रक्षा नहीं कर सका इसलिए तत्काल इस्तीफा दे दिया। …मैं और क्या कर सकता था?  प्रश्नकर्ता ने कहा आपने दो चार सौ लोगों की जान बचाने के लिए करोड़ों हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच बँटवारा हो जाने दिया। गोली चल जाती तो अधिक से अधिक कुछ सौ जानें ही जातीं लेकिन आपने मस्जिद ढहाकर करोड़ों नागरिकों में कटुता फैला दी… घेरा बन्दी और तेज हुई तो कल्याण बस ‘बहुत धन्यवाद’ ‘बहुत धन्यवाद‘ ’बहुत धन्यवाद’ की रट लगाने को मजबूर गये। बेशर्मी मूर्तिमान थी… शायद दोनो ओर।

सोचता हूँ यह वार्षिक रुदन और प्रलाप तो अब रूटीन हो गया है। जिन्दगी उससे काफी आगे निकल चुकी है। पिछले साल इस दिन मैं बड़ा दुःखी हो गया था। मुम्बई हमले के बाद के माहौल में जब अयोध्या काण्ड की बरसी पड़ी तो उसी तारीख को पड़ने वाले अपने बेटे के जन्मदिन पर उत्सव मनाने का मन ही नहीं हुआ। लेकिन अब सोच रहा हूँ कि अपनी छोटी-छोटी खुशियों को इस राजनिति के गन्दे खेल को देखकर कुर्बान करना ठीक नहीं है। इसलिए मैंने आज बेटे को पूरा समय देने का मन बनाया है।

साँई मन्दिर के बाहर

सुबह-सुबह साँईं मन्दिर हो आये हैं। शाम को केक भी कटेगा और बच्चा पार्टी दावत भी उड़ाएगी।

सत्यार्थ (तीन वर्ष)

सत्यार्थ के ब्लॉग पर जन्मदिन की सूचना ब्लॉगजगत को दी जा चुकी है। आप सबका स्नेह और आशीर्वाद उसे मिलने भी लगा है। मैं भी बोलता हूँ “हैप्पी बड्डे”

 (सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

ब्लॉगिंग का राष्ट्रीय सेमिनार जो आज हो न सका…

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यदि तिथि बदली न होती और कार्यक्रम अपरिहार्य परिस्थितियों में टला न होता तो मैं आज १९ सितम्बर को इलाहाबाद में देश के अनेक मूर्धन्य चिठ्ठाकारों का दर्शन लाभ पाकर अभिभूत हो रहा होता। हिन्दी दिवस, हिन्दी सप्ताह, हिन्दी पखवारा, और हिन्दी मास की चर्चा-गोष्ठियों में आजकल जो कुछ हम पढ़-सुन रहे हैं उनमें इस महागोष्ठी की खूब चर्चा हो रही होती।

हिन्दी ब्लॉगों में जो बहसें आजकल नमूँदार हुई हैं उन्हें देखकर मन में अभी से लड्डू फूट रहे हैं। जब पुनः निर्धारित तिथि पर वाकई सेमिनार होगा तब इन महानुभावों के मुखारविन्दु से साक्षात्‌ ऐसी बातें सुनकर कैसा लगेगा? क्या एक दूसरे के बारे में हम वैसा ही कह-सुन पाएंगे जैसा इस आभासी संसार में अपने घर के भीतर बैठे-बैठे दूसरों के बारे में टिप्पणी या पोस्ट के माध्यम से ठेल देते हैं? बेनामी महात्माओं द्वारा जो घटियागीरी यहाँ दिखायी जाती है या फर्जी नाम वाले जैसी खरी-खरी यहाँ कह जाते हैं, क्या वहाँ भी साक्षात्‌ उपस्थित होकर मुँह खोलेंगे?

यहाँ अपने-अपने ज्ञान की शेखी बघारने वाले भी हैं, दूसरों को मूर्ख और पाजी समझने वाले भी हैं, भाषा को अपनी स्वतंत्र इच्छा का दास बनाने की चाह रखने वाले भी हैं, अपने लिखे को पत्थर की लकीर मानकर अड़े रहने वाले भी हैं, दूसरों की मौज लेने के फेर में अपनी मौज लुटाने वाले भी हैं, गलाफाड़ हल्ला मचाने के बाद धीरे-धीरे अनसुना कर दिए जाने के कारण अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर दूसरे व्यापार में लग जाने वाले भी हैं, दूसरे की लकुटी-कमरिया लेकर इस घमासान में नये सिरे से बहादुरी दिखलाने वाले भी है, तुरत-फुरत कविता रचकर वाह-वाह कहलाने वाले भी हैं और रोज़बरोज़ पोस्ट का मसाला जुगाड़ने के लिए डिजिटल कैमरा लेकर मुँह अन्धेरे नदी-तट की सैर को निकल जाने वाले भी हैं। बहुत से धीर-गम्भीर साहित्यानुरागी, हिन्दी सेवी, कविहृदय, सामाजिक चिन्तक, व्यंग्यकार, विज्ञान अन्वेषी, तकनीक के जानकार सुधीजन भी हैं जो इस माध्यम को समृद्ध कर रहे हैं।

ऐसी रंगीन दुनिया के सितारे जब आज के दिन अपने स्थूल शरीर और सूक्ष्म मस्तिष्क के साथ एक छत के नीचे एक साथ बैठकर आपस में बातचीत करते तो नजारा क्या होता? लन्च और डिनर के बर्तन साथ खड़काते तो क्या आनन्द आता?

यूँ तो इस सेमिनार के विषय पहले ही तय किये जा चुके थे, और कई ख्यातिनाम चिठ्ठाकारों को उन विषयों को प्रस्तुत करने की तैयारी करके आने के लिए भी बोल दिया गया था, लेकिन ऐन मौके पर कौन क्या बोलना शुरू कर दे इसका कोई ठिकाना न होने से मन में अनिश्चय का भाव भी बना ही हुआ था। इससे मिलने वा्ले सुख का रोमान्च भी कम न था। अब तो प्रतीक्षा आगे बढ़ गयी है।

कुछ विचारणीय शीर्षक जो सत्र विशेष और वार्ताकार विशेष के लिए आदरणीय अनूप जी, अरविन्द जी और दूसरे आदरणीयों से विचार-विमर्श के बाद निर्धारित किए गये थे-

  1. हिन्दी चिठ्ठाकारी का  इतिहास, स्वरूप और तकनीक
  2. हिन्दी चिठ्ठाकारी की दिशाएं: विज्ञान, राजनीति, समाज, धर्म/दर्शन, मनोरंजन
  3. अन्तर्जाल पर हिन्दी साहित्य और इसकी पठनीयता : कविता, कहानी, व्यंग्य, रेखाचित्र, रिपोर्ताज, संस्मरण और आपबीती
  4. अन्तर्जाल पर हिन्दी भाषा के कुशल प्रयोग के औंजार, ब्लॉग बनाने और तकनीकी प्रबन्धन के तरीके
  5. हिन्दी ब्लॉग जगत की प्रमुख प्रवृत्तियाँ-
  • बहस के सामान्य मुद्दे
  • ब्लॉगिंग की  भाषा में शुद्धता बनाम सम्प्रेषणीयता
  • ब्लॉगजगत में गुटबन्दी और गिरोहबन्दी
  • अभिव्यक्ति की उन्मुक्तता और इसमें निहित खतरे
  • समूह ब्लॉगों की उपादेयता
  • चिठ्ठाकारी में समय प्रबन्धन
  • सामाजिक मुद्दों पर ब्लॉगजगत की प्रतिक्रियाएं
  • ब्लॉगजगत के कुंठासुर/बेनामी या छद्‍मनामी टिप्पणीकार
  • ब्लॉगजगत का आभासी परिवार और आन्तरिक गतिविधियाँ, ब्लॉगर कैम्प आदि।

ये सारी बातें मैं भूतकाल में कर रहा हूँ तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि सब कुछ खत्म हो गया।  आज यह सब मैं इस लिए बता रहा हूँ कि जो कार्यक्रम आज नहीं हो सका वह आगामी २४-२५ अक्टूबर को आयोजित किए जाने का निर्णय लिया जा चुका है।

महात्मा गान्धी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति श्री विभूतिनारायण राय जी ने स्वयं इस सेमिनार की परिकल्पना करते हुए इसके आयोजन का प्रस्ताव रखा था। इलाहाबाद स्थित हिन्दुस्तानी एकेडेमी के साथ मिलकर इस राष्ट्रीय स्तर के आयोजन की रूपरेखा बनायी जा चुकी थी। अतिथि वार्ताकारों और प्रतिभागियों के नाम तय किए जा चुके थे, बस निमन्त्रण पत्र भेंजने की तैयारी हो रही थी तभी कुलपति जी को कतिपय अपरिहार्य परिस्थितियों ने कार्यक्रम की तिथि आगे बढ़ाने पर मजबूर कर दिया। उनका खेद प्रकाश प्राप्त करने के बाद हम कुछ समय के लिए हतप्रभ हो गये थे। लेकिन उन्होंने तत्समय ही अगली तिथि भी निर्धारित कर दी।

MGAHV-logo प्रतीक चिह्न

हमारा उत्साह फिर कम नहीं हुआ है। हम तो अगली निर्धारित तिथि की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जब ऊपर गिनाए गये विषयों पर जोरदार सजीव बहस सुनने और देखने को मिलेगी। ब्लॉगजगत के अनेक भूतपुर्व और अभूतपूर्व लिक्खाड़ों से गलबहिंया डाले फोटू खिंचाने का मौका हाथ लगेगा। एक तरफ पारम्परिक साहित्य के पुरोधा होंगे तो दूसरी तरफ़ अन्तर्जाल पर बाइट बहाने और बटोरने वाले बटोही होंगे। आदरणीय कुलपति जी के औदार्य से कार्यक्रम का वित्तीय परिव्यय विश्वविद्यालय द्वारा वहन किया जाएगा तो हिन्दुस्तानी एकेडेमी का प्रांगण जो अबतक हिन्दी भाषा और साहित्य से जुड़ी प्रायः सभी भूतकालीन और वर्तमान विभूतियों का प्रत्यक्षदर्शी रहा है, अपनी गौरवशाली परम्परा और अहर्निश आतिथेय की भूमिका में पूरी निष्ठा से लगा होगा।

आप सभी अपनी रुचि के अनुसार मन ही मन तैयारी कर लीजिए। कार्यक्रम की सूक्ष्म रूपरेखा तैयार हो जाने और धनराशि का परिव्यय स्वीकृत हो जाने के बाद इसकी विधिवत घोषणा हिन्दुस्तानी एकेडेमी द्वारा अन्तर्जाल पर की जाएगी। मेरी तो इच्छा है कि जिस प्रकार इलाहाबाद के कुम्भमेला में सारा हिन्दुस्तान उमड़ पड़ता है उसी प्रकार यह कार्यक्रम भी एक विशाल ब्लॉगर महाकुम्भ साबित हो जाय। अन्तर्जाल की धारा में अपने-अपने घाट पर डुबकी लगाने वाले विविध चिठेरे प्रयाग की धरती पर आकर अपना अनुभव एक दूसरे से बाँटें और बाकी दुनिया को यह भी बतायें कि इक्कीसवीं सदी में संचार के क्षेत्र में जो तकनीकी क्रान्ति आयी है उसे हिन्दी सेवियों ने भी आत्मसात किया है और अब इस देवनागरी की पहुँच दुनिया के कोने-कोने में होने लगी है।

जब से यह कार्यक्रम टला मुझे निराशा ने ऐसा घेरा कि कुछ लिखते न बना। अब आज जब यह दिन भी बीत गया है तो इसकी चर्चा से ही बात शुरु कर सका हूँ। अभी इतना ही…।

आप सबको शारदीय नवरात्र की हार्दिक शुभकामनाएं और ईद मुबारक।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

प्रगति मैदान के पुस्तक मेले से खबरें अच्छी नहीं हैं…

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किताबों की खुसर-फुसर… भाग-४

“…स्टॉल में रखी किताबें एकदम अकेली हैं। उनका अकेलापन अस्तित्ववादी नयी कविता और नयी कहानी के अकेलेपन से ज्यादा बड़ा सच है और भयावह है। दूर-दूर तक कोई नहीं दिखता। दिखते हैं तो ऊँघते प्रकाशक और उनके कर्मचारी। लोग उनतक नहीं पहुँच रहे हैं। ज्यादा से ज्यादा यही किया जा सकता है कि मेला लगा दिया जाय, लेकिन अगर कोई नहीं आए तो क्या करें?”

यह दृश्य दिल्ली के प्रगति मैदान का है और यह व्यथा बयान कर रहे हैं दैनिक हिन्दुस्तान के सम्पादकीय पृष्ठ पर श्री सुधीश पचौरी जी जो ‘बिन्दास’ नाम से स्तम्भ लिखते हैं। यह पढ़कर मुझे वह खुसर-फुसर फिर याद गयी जो मैने पिछले दिनों सत्यार्थमित्र पर आपसे बाँटना शुरू किया था, लेकिन बात पूरी नहीं हो पायी थी। मैने हिन्दुस्तानी एकेडेमी सभागार में आयोजित एक पुस्तक विमोचन समारोह के समय इस संस्था के बिक्री अनुभाग की आलमारियों में बन्द (कैद) किताबों का कष्ट वहाँ बैठकर देखा और सुना था।

इस संस्था ने अबतक हिन्दी की लगभग डेढ़ सौ और उर्दू की क़रीब तीस पुस्तकों का प्रकाशन किया है। इनमें से कोई पच्चीस किताबें तो पिछले डेढ़-दो वर्ष के भीतर ही आयी हैं। इन्ही नयी नवेली किताबों की आपस में जो बतकही सुनायी दी थी उससे मेरा मन खिन्न हो गया था।

abhidharm1 Bhartiya Jyotish Me Prayag Diye Ka Raag रामकथा और तुलसीदास Vrat aur parva घाघ और भड्डरी

(पुस्तकों को बड़ा करके देखने के लिए उनपर चटका लगाएं)

मैने बिक्री अनुभाग के उस कमरे में देखा कि डॉ. कविता वाचक्नवी की लिखी एक पुस्तक इस बात से तो खुश थी कि पाण्डुलिपि के रूप में लम्बा समय अज्ञातवास के रूप में बिताने के बाद अन्ततः आकर्षक रूप में इसका प्रकाशन हो गया और समारोह पूर्वक लोकार्पण भी करा दिया गया, लेकिन बड़े साहित्यिक मंचों और पत्र-पत्रिकाओं में इस शोधपरक कृति की समीक्षा नहीं होने से निराशा के भाव भी स्पष्ट नजर आ रहे थे। उसे ‘दिये का राग’ ने समझाया कि ऐसी जाने कितनी किताबें इस संस्था की आलमारियों और तहखाने में छापकर रखी गयी हैं जिनको सिर्फ़ लिखने वाला ही भलीभाँति जानता होगा।

ऐसा इसलिए नहीं है कि उनकी गुणवत्ता में कोई कमी है, या उन्हें कोई बेचना नहीं चाहता, बल्कि समस्या यह है कि निजी प्रकाशकों की भाँति बाजार को समझने, प्रचार-प्रसार की आधुनिक तकनीकों का प्रयोग करने और सरकारी विभागों द्वारा थोक खरीद के लिए चयनित कराने की कोई सुविचारित नीति इस संस्था द्वारा न तो बनायी गयी है और न ही उसके क्रियान्वयन का कोई ढाँचा ही खड़ा किया गया है।

PrayagPradeep भारतीय चित्रकला उर्दू साहित्य में हिन्दुस्तानी तहज़ीब ज्ञान कोश सूर्यविमर्श समाज भाषा विज्ञान

कभी देश भर के साहित्यकारों और हिन्दुस्तानी भाषा व साहित्य के अनुरागियों की तीर्थस्थली रही यह संस्था आज योग्य और ऊर्जावान कर्मचारियों तथा पूर्णकालिक पदाधिकारियों की कमी का दंश झेल रही है। शासन ने स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों को इस संस्था को संचालित करने की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंप दी है। संस्था के मनोनीत सचिव द्वारा अपनी व्यक्तिगत अभिरुचि के जोर से अनेक उम्दा पुस्तकों के प्रकाशन कराये गये और कुछ उपयोगी विचार गोष्ठियाँ भी करायी गयीं। लेकिन ऐसे अधिकारी के पास अपने मूल विभाग के प्रशासनिक कार्यों से जो समय बचता है वह इस गुरुतर कार्य के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता।

“तुम्हें क्या लगता है, यह दुकान वृद्ध हो चले दरबारी जी के हाथों में कितने दिन और चल पायेगी..?” प्रयाग प्रदीप ने  विजयदेव नारायण शाही के छँठवा दशक से पूछा।

श्री शालिग्राम श्रीवास्तव की १९३७ में प्रकाशित यह पुस्तक पाठकों की भारी मांग पर पुनर्मुद्रित होकर हाल ही में आयी है। इलाहाबाद से किसी भी रूप में जुड़े होने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह पुस्तक अनिवार्य संग्रह के लायक है, लेकिन पुरानी साख के बावजूद इसकी बिक्री भी बहुत उत्साहजनक नहीं है।

निराला की काव्यदृष्टि Diye Ka Raag Maa ke Liye Chawal Naye-Naye Kavita Ki Jatiyata सूर्यविमर्श

इस अनुभवी प्रश्न का जवाब दिया नये नवेले सूर्य विमर्श ने, “पिछले दिनों यहाँ से  पुस्तकालयाध्यक्ष, बिक्री सहायक, विपणन प्रभारी, प्रकाशन अधिकारी, वेब साइट संचालन विशेषज्ञ, आदि अनेक पदों हेतु प्रस्ताव किया गया है। लेकिन समस्या यह है कि इस स्वायत्तशासी संस्था की शक्तियाँ जिस कार्य परिषद में निहित हैं उसका अस्तित्व ही अधर में लटका हुआ है। कार्यपरिषद के गठन और उसके द्वारा सर्व शक्तिमान कार्य समिति के चुनाव के बाद ही कार्मिक प्रबन्धन किया जा सकता है।”

“फिर तो यह काफी लम्बी प्रक्रिया लगती है… शायद निकट भविष्य में पूरी होती नहीं दिखती…” घाघ और भड्डरी ने सहज अनुमान लगाते हुए बात पूरी की।

फादर (डॉ.) कामिल बुल्के द्वारा १९७६ में दिये गये व्याख्यान पर आधारित लोकप्रिय पुस्तक रामकथा और तुलसीदास के तीसरे संस्करण ने बताया कि जब वह पहली बार १९७७ में छपकर आयी थी तब भी ये कर्मचारी इसी प्रकार एकेडेमी की सेवा कर रहे थे। सरकारी अनुदान से इन्हें जो वेतन तब मिलता था वही वेतन आज भी मिल रहा है।

हिन्दुस्तानी लेख अनुक्रमणिका छठवा दशक Roop Lahariya Deep Dehari Dwar Keshav Granthavali-1 Hai To Hail

(पुस्तकों को बड़ा करके देखने के लिए उनपर चटका लगाएं)

वर्ष १९३३ में पहली बार प्रकाशित भारतीय चित्रकला के दूसरे नवीन संस्करण ने इन कर्मचारियों का जो चित्र खींचा वह मन को दुःखी कर गया। आजादी से पहले के जमाने से संस्था में जुटने वाले बड़े-बड़े साहित्यकारों और विद्वानों की सेवा में अपने किशोरवय से लगे रहने वाले और एकेडेमी को ही अपने जीवन का श्रेय-प्रेय मान चुके श्री ईश्वर शरण अब छिहत्तर साल की उम्र में कार्यालय अधीक्षक तो बने हुए हैं लेकिन इसके बदले उन्हें जो मानदेय मिल रहा है उससे दो जून की रोटी जुटाना ही दूभर है, अपनी बिटिया की शादी का बोझ कैसे उठाएं? दूसरों की हालत भी इनसे कुछ अलग नहीं है।

“…जो उम्र परिवार के बीच आराम करने की है उसमें एकेडेमी की नौकरी क्यों..?” संस्कृति पुरुष पं. विद्यानिवास मिश्र ने पूछा।

“क्योंकि यहाँ के कर्मचारियों को सेवानैवृत्तिक लाभ दिये जाने की कोई व्यवस्था नहीं है…।” मेरे मुँह से यह बरबस निकल पड़ा। लेकिन दूसरों की दृष्टि में अकारण हवा में बात करता जान कर मैने अपने को संयत कर लिया।

अभिधर्म कोश के चार खण्ड एक साथ बोल पड़े, “जाने क्यों १९६५ के बाद किसी परवर्ती वेतन आयोग की संस्तुति  इन कर्मचारियों पर लागू नहीं हुई। आज जो कर्मचारी यहाँ सबसे ज्यादा वेतन पाता है उसको भी किसी सरकारी चपरासी से आधी तनख्वाह ही मिलती है। १९६५ के वेतनमान अभी भी चल रहे हैं। पेंशन आदि की तो कोई बात ही नहीं है…।”

यहाँ बताते चलें कि  १९४२ के भारत छोड़ो आन्दोलन में आचार्य नरेन्द्र देव अहमदनगर किले की जेल में बन्द किए गये थे। वहीं पर उन्होंने वसुबन्धु कृत बौद्ध दर्शन की व्याख्या के ग्रन्थ का फ्रेन्च भाषा से हिन्दी में अनुवाद किया था। इस अनुवाद के आठ अध्यायों को एकेडेमी ने १९५८ में चार खण्डों में प्रकाशित किया था। इसका दूसरा संस्करण २००८ में प्रकाशित कराया गया है। लेकिन इस अमूल्य निधि को भारतवर्ष और दुनिया के दूसरे हिस्सों में जाने की प्रतीक्षा लम्बी होती जा रही है।

बातें तो और भी जारी थीं, …लेकिन एक कर्मचारी ने मेरी तन्द्रा भंग करते हुए बताया कि पुस्तक विमोचन समारोह के मुख्य अतिथि महोदय पधार चुके हैं और काम भर की भीड़ भी इकठ्ठा हो चुकी है…। मैने अपनी डायरी उठायी और सभागार की ओर चल पड़ा। पीछे से खुसर-फुसर की आवाजें तेज होती चली गयीं…।

उन बेबस ध्वनियों ने मेरा पीछा करना जारी रखा है…। मैने अपनी सीमाओं के भीतर रहते हुए कुछ रास्ते तलाशने भी जारी रखे हैं। लेकिन पुस्तक मेले की खबरें पढ़ने के बाद मेरे धैर्य की परीक्षा और कठिन हो गयी है।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

 

हरितालिका व्रतकथा में भय तत्व

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imageहरितालिका तीज का व्रत अभी अभी सम्पन्न हुआ। एक दिन पहले पत्नी के साथ कटरा बाजार में जाकर व्रत सम्बन्धी खरीदारी करा लाया। वहाँ अपने उत्सवप्रधान समाज की छटा देखते ही बनती थी। दान के लिए चूड़ी, आलता, बिन्दी, सिन्दूर, साबुन, तेल, कंघी, शीशा, चोटी, रिबन, आदि सामग्रियों की मौसमी दुकानें ठेले पर सज गयी थीं। प्रायः सभी सुहागिनें इन सामानों के रेडीमेड पैकेट्स खरीद रहीं थीं, लेकिन निजी प्रयोग के लिए वही साजो-सामान ऊपर सजी पक्की दुकानों से पसन्द किये जा रहे थे। सभी ‘रेन्ज’ की दुकानें और सामान, और उतने ही रेन्ज के खरीदार भारी भीड़ के बीच एक दूसरे से कन्धा घिस रहे थे।

मैने भी यथासामर्थ्य अपनी धर्मपत्नी को फल, फूल, बिछुआ, पायल, और श्रृंगार व पूजा की सामग्री खरीद कराया। साथ में सड़क की पटरी पर बिक रही हरितालिका व्रत कथा की किताब भी दस रूपये में खरीद लिया। मेरा अनुमान है कि यह पुस्तक लगभग सभी घरों के लिए खरीदी गयी होगी।

तीज के दिन भोर में साढ़े तीन बजे अलार्म की सहायता से जगकर पत्नी को व्रत के लिए तैयार होता देखता रहा। चार बजे आखिरी चाय की चुस्की लेकर इनका उपवास शुरू हुआ। व्रत की पूजा का मूहूर्त प्रातः साढ़े नौ बजे से पहले ही था। इसीलिए स्नान ध्यान और पूजा का क्रम जल्दी ही प्रारम्भ हो गया था। आमतौर पर इस दिन की पूजा का क्रम शनैः-शनैः आगे बढ़ता है, ताकि मन उसी में रमा रहे और भूख को भूलाए रहे। किन्तु इस बार शुभ-मुहूर्त ने थोड़ी कठिनाई पैदा कर दी। image

शिव मन्दिर में जाकर शिवलिंग और पार्वती जी का पूजन-अभिषेक व घर में वेदिका बनाकर विशेष पूजन करते समय किताब में बतायी गयी पूजन विधि का अक्षरशः पालन करने का प्रयास जारी रहा। इस व्रत में उपवास के साथ व्रत की कथा सुनना भी अनिवार्य बताया गया था। घर से दूर अकेले रहने के कारण बड़े-बुजुर्ग या पण्डीजी की भूमिका मुझे ही निभानी पड़ी। धर्मपत्नी ने हाथ मे फूल अक्षत्‌ लेकर आसन जमाया और मेरे हाथ में पोथी थमा दिया।

व्रत की कथा माँ पार्वती और भगवान शंकर के बीच वार्ता के रूप में प्रस्तुत की गयी है। शिव जी अपनी धर्मपत्नी को उन्हीं की कहानी बता रहे हैं कि उन्होंने कैसे कठिन तपस्या करके शिव जी को वर के रूप में प्राप्त किया। अपने पिता द्वारा विष्णु के साथ उनके विवाह का निर्णय लिए जाने पर कैसे उन्होंने विरोध स्वरूप अपनी सखी (आली) के साथ स्वयं का हरण कराया और घने जंगल में जाकर घोर तपस्या करते हुए शिव जी को प्रसन्न किया, वर पाया और अन्ततः अपने पिता को शिव जी के वरण के लिए राजी किया। भाद्रपद शुक्ल तृतीया को अपनी तपस्या का फल प्राप्त कर चुकी पार्वती जी ने शिवजी से ‘इस व्रत का माहात्म्य पूछा’। (शायद पाठकों और भक्तगणों को सुनाने के लिए उन्होंने ऐसा पुनरावलोकन किया होगा…!)

शिव जी बोले- हे देवि! सभी सुहागिनों को चाहिए कि ‘इन मन्त्रों तथा प्रार्थनाओं के द्वारा मेरे साथ तुम्हारी पूजा करे, तदनन्तर विधिपूर्वक कथा सुने और ब्राह्मण को वस्त्र, गौ, सुवर्ण, आदि प्रदान करे। इस तरह जो स्त्री अपने पति के साथ भक्तियुक्त चित्त से इस सर्वश्रेष्ठ व्रत को सुनती तथा करती है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, और उसे सात जन्म तक सुख तथा सौभाग्य की प्राप्ति होती है। लेकिन जो स्त्री तृतीया तिथि को व्रत न कर अन्न भक्षण करती है, वह सात जन्म तक वन्ध्या रहती है, और उसको बार-बार विधवा होना पड़ता है। वह सदा दरिद्री, पुत्र-शोक से शोकाकुल, कर्कशा स्वभाव की लड़की सदा दुख भोगने वाली होती है। उपवास न करने वाली स्त्री अन्त में घोर नरक में जाती है।’

‘तीज के दिन अन्न खाने से शूकरी, फल खाने से बन्दरिया, पानी पीने से जोंक, दूध पीने से नागिन, मांसाहार करने से बाघिन, दही खाने से बिल्ली, मिठाई खाने से चींटी, और अन्य वस्तुओं को खाने से मक्षिका (मक्खी) के जन्म में आती है। उस दिन सोने से अजगरी और पति को ठगने से कुक्कुटी (मुर्गी) होती है।’

imageइस कथा का यह अन्तिम भाग पढ़ते-पढ़ते मेरा धैर्य जवाब दे गया। मन की आस्था दरकने लगी। घर-घर में निर्जला उपवास कर रही धर्मभीरु गृहिणियों को इस व्रत के लिए तैयार करने तथा दान-पुण्य की ओर प्रवृत्त करने के ऐसे हथकण्डे को देखकर पहले तो थोड़ी हँसी आयी, लेकिन जब इस बकवास को लिखने और बेचने वाले धूर्त और पाखण्डी लोगों की ऐसी करतूत से हमारे समाज को होने वाली हानि की ओर ध्यान गया तो मन रोष से भर गया।

कथा पढ़ने के बाद कल से लेकर आजतक इसके बारे में सोचता रहा। टीवी, इण्टरनेट और अखबारों में सुहागिन स्त्रियों के सजे-सँवरे सुन्दर और उत्साही चित्रों को देखता रहा, मेहदी रचे हाथों को सायास प्रदर्शित करती भाव-भंगिमा को निहारता रहा। उत्सव का ऐसा मनोरम माहौल है कि अपने मन में उमड़ते-घुमड़ते इस विचार को कोई आश्रय नहीं दे पा रहा हूँ। मन में यह खटक रहा है कि इस कठिन व्रत का जितनी पाबन्दी से ये स्त्रियाँ खुशी-खुशी पालन करती दीखती हैं उसके पीछे इस ‘भय तत्व’ का भी कुछ हाथ है क्या?

मैं हृदय से यह मानना चाहता हूँ कि यह सब पति-पत्नी के बीच एक नैसर्गिक प्रेम और विश्वास, पारस्परिक सहयोग व समर्थन तथा मन के भीतर निवास करने वाली श्रद्धा, भक्ति, पूजा और अर्चना की स्वाभाविक प्रवृत्ति के कारण ही हो रहा होगा; लेकिन मन है कि बार-बार उस किताब में लिखी बातों में उलझ जा रहा है जो घर-घर पहुँच कर उसी श्रद्धा से बाँची और सुनी गयी होंगी।

इस उलझन से निकलने में कोई मेरी मदद तो करे…!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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