क्षमा प्रार्थना…

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DSC02527 हे मूषक राज,

बहुत भारी मन से आपको विदा कर रहा हूँ। आपको कष्ट देने का मेरा कोई इरादा नहीं था। लेकिन क्या करूँ, आपने हमारे परिवार को ऐसा मानसिक कष्ट दिया कि आपको अपने घर से दूर कर देने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। आपसे विनती करने का कोई माध्यम होता तो मैं आपसे हाथ जोड़कर कहता कि आप इस घर के निरीह प्राणियों पर दया करिए। लेकिन आपको सलाखों के पीछे कैद करने के सिवा हमारे पास कोई दूसरा हल नहीं था। आपको जो कष्ट हुआ उसके लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं।

अपने विचित्र शौक को पूरा करते हुए आपने हमारे घर के किचेन से लेकर ड्राइंग रूम तक और आंगन से लेकर बेड रूम तक क्या-क्या नहीं काट खाया। कितने कपड़े, जूते-चप्पल, और घरेलू सामान आपकी निरन्तर वृद्धिमान दन्तपंक्ति की भेंट चढ़ गये। लेकिन हम यह सब कुछ सहते रहे। एक तो आपकी चंचल गति और दूसरे हमारी धर्म भीरु मति- दोनो आपकी सुरक्षा में सहायक रहे। आप हमारे आराध्य देव प्रथम वंदनीय, प्रातः स्मरणीय, गणपति, गणनायक, विघ्नविनाशक, लम्बोदर, उमासुत श्री गणेश जी के वाहन हैं। आपको किसी प्रकार की क्षति पहुँचाना हमारे लिए पाप की बात है। ऐसे कई अवसर आये जब आप हमारी आँखों के सामने ही हमें चिढ़ाते हुए चलते बने। घर के मन्दिर में चढ़ाया हुआ प्रसाद उठाने से जो हम चूक गये तो उसका भोग आप ही लगाते रहे। कदाचित्‌ मेरी गृहिणी मन ही मन खुश होती रही कि शायद आपकी पीठ पर बैठकर भगवान स्वयं भोग लगाने आते हों।

खुराफ़ात का अन्त आप छत से रोशनदान की ओर आने वाले डिश-टीवी के केबल पर चढ़कर घर के भीतर आते-जाते रहे। भारी देह होने के कारण एकाध बार अचानक ताली की आवाज से विचलित होकर आप फर्श पर आ गिरे तो भी आपका बाल बांका नहीं हुआ। बल्कि हम ही पाप के भागी होने के डर से सहम गये थे।

बचपन में अपने गाँव पर गेंहूँ की कटाई के बाद खाली हुए खेतों में आपका शिकार करने वालों को मैं देखता था। आपके बिल की खुदाई करने पर जमीन के भीतर आपकी बनायी हुई जो सुरंग मिलती थी उसे देखकर हम चौक जाते थे। आपने कितनी सफाई से भीतर ही भीतर गेंहूं की बालियों को इकठ्ठा रखने के लिए बड़े-बडे गोदाम बना रखे होते थे। अपने नवजात बच्चों के लिए सुरंग की सबसे भीतरी छोर पर नर्म मुलायम घास के बिस्तर सजा रखे होते थे। जब ये मुसहर जाति के शिकारी कुदाल से आपका आशियाना खोद रहे होते और आपके पूरे खानदान का सफाया कर रहे होते तो मेरा कलेजा कांप उठता था। आप द्वारा जमा किया हुआ अनाज उनका भोजन बन जाता। लेकिन जिस किसान के खेत पर आपकी कृपा हो जाती वह सिर पकड़ कर बैठ जाता।

मैने देखा था कि आपको पानी से बहुत भय हुआ करता था। आपको बिल से बाहर निकालने के लिए उसमें पानी भर दिया जाता था। आप जब घर में आयी बाढ़ से बचने के लिए बदहवास होकर भाग रहे होते तो आपके पीछे डण्डा लेकर दौड़ते गाँव के लड़के और उनके साथ आपका पीछा करने वाले कुत्ते अपनी पूरी शारीरिक शक्ति झोंक दिया करते थे।  बहुधा आप उन्हें चकमा देने में सफल हो जाते। लेकिन वे जब आपका शिकार कर लेते थे तो आपको आग में भूनकर नमक मिर्च के साथ चटखारे लेकर खाते हुए  वे लोग मेरे मन को घृणा से भर देते थे।

कुत्ते और बिल्लियों के लिए आपका उत्सर्ग तो अब किंवदन्ती बन चुका है। टीवी पर टॉम और जेरी का कार्टून देखते हुए मेरे बच्चे हमेशा आपके चरित्र से सहानुभूति रखते हैं। बिल्ले को हमेशा छकाते हुए आप सदैव तालियाँ बटोरते रहते हैं, लेकिन असली दुनिया आपके लिए इतनी उत्साहजनक नहीं है। शहरी जीवन शैली में आपको बर्दाश्त करने का धैर्य कम ही लोगों में है। आपको मारने के लिए तमाम जहरीले उत्पाद बाजार में लाये गये हैं। अब तो एक ऐसा पदार्थ बिक रहा है जिसे खाकर आप घर से बाहर निकल जाते हैं और खुले स्थान पर काल-कवलित हो लेते हैं।

एक बार गाँव में जब आपकी प्रजाति ने घर में कुहराम मचा रखा था तो एक दवा आँटे में मिलाकर जगह जगह रख दी गयी थी। उसके बाद जो हुआ उसे याद करके हम काँप जाते हैं। पूरे घर में बिखरी हुई लाशें कई दिनों तक इकठ्ठा की जाती रहीं। दो-चार दिन बाद जब दुर्गन्ध के कारण घर में रहना मुश्किल हो गया तो नाक पर पट्टी बाँधकर चींटियों की पंक्ति का सहारा लेते हुए अनेक दुर्गम स्थानों पर अवशेष मृत शरीरों को खोजा गया।   पूरे घर को शुद्ध करने के लिए हवन-अनुष्ठान कराना पड़ा। इसके बाद घर में यदि कोई बीमार हो जाता तो इसे उस हत्या के पाप का प्रतिफल माना जाता रहा। तबसे हम आपका समादर करने के अतिरिक्त कुछ सोच ही नहीं सकते।

हमने आपको कैद करने के बारे में कदापि नहीं सोचा होता यदि आपने शौचालय की सीट में लगे साइफ़न में इकठ्ठा पानी को अपना स्विमिंग पूल न बनाया होता। जाने आपको इस गन्दे पानी में स्नान करने का शौक कहाँ से चढ़ गया? इधर हमने देखा कि आपके पैरों के निशान कमोड से प्रारम्भ होकर वाश बेसिन पर और साबुनदानी को उलटने –पुलटने के बाद बरामदे में रखे सभी सामानों पर अपनी छाप छोड़ते हुए डाइनिंग टेबुल तक पहुँचने लगे थे। आपने हमारे सरकारी मकान के बाथरूम में लगे जीर्ण हो चुके दरवाजे के निचले कोनों पर छेद बना रखा था।

DSC02541 हमने पहली कोशिश तो यही की थी कि आपको ट्वायलेट में जाने से रोका जाय। रात में सोने से पहले हमने उन छेदों को एक बोरे से बन्द करके उसपर ईंट रख दिया था। सुबह हमने देखा कि आपने गुस्से में बोरे को कुतर दिया है और उसकी लुग्दी पूरे बाथरूम में बिखरा दी है। कदाचित इस गुस्से के कारण ही आपने उस रात रोज से ज्यादा लेड़ियाँ भी  भेंट कर दी थीं। हमने अगले दिन उन छिद्रों को टिन की प्लेट से ढँक दिया। लेकिन आप हार मानने वाले हैं ही नहीं। आपने अगली रात को उस टिन के ठीक बगल में दूसरा छेद बना लिया और अपना नरक-स्नान बदस्तूर जारी रखा।  छेद के पास ही दरवाजे के बाहर हमने जो एक चूहेदानी लगा रखी थी उसे भी आपने नहीं छुआ। आपको तो भीतर घुसने की जल्दी रही होगी।एक रास्ता बन्द हुआ तो दूसरा खोल लिया

हमें विश्वास हो गया कि आपको ट्वायलेट के भीतर जाने से नहीं रोका जा सकता है। आप स्नान करने से पहले कुछ और नहीं करते। चूहेदानी में रखे आलू के टुकड़े को आप तभी छुएंगे जब स्नान ध्यान पूरा हो जाएगा। मैने इस बार चूहेदानी को अन्दर ही लगा दिया ताकि जब आप अपने बाथटब से बाहर निकलें तभी भोजन की तलाश में उधर आकर्षित हों। इस बार युक्ति काम कर गयी। रात के करीब एक बजे जब खटाक की आवाज हुई तो मुझे चैन मिला। उठकर मैने तत्क्षण देखा। आप मेरे कैदी हो चुके थे। सद्दाम हुसेन को पकड़ने के बाद राष्ट्रपति बुश के चेहरे पर जो विजयी मुस्कान थी उसे भी मात देती हुई खुशी के साथ मैंने रात बितायी। आपको आपके पसन्दीदा स्थान पर ही कैदबन्द छोड़ दिया था मैने।

DSC02553 जब सुबह उठकर देखा तो आप अपने पिंजड़े के साथ कमोड की सीट में लुढ़के हुए थे। गजब का प्रेम था आपका उस नरक के रस्ते से। मैने एक प्लास से आपको पिजड़े सहित उठाया, आंगन में ले जाकर नल के पानी से विधिवत स्नान कराया और सुबह की ताजी धूप में सुखाने के बाद आपकी यादों को कैमरे में कैद करने के लिए उसी डाइनिंग टेबुल पर रख दिया जिसपर आप प्रायः विचरण करते रहते थे। आपको सलाखों के पीछे बहुत देर तक रखने की मेरी कोई मंशा नहीं थी। लेकिन मेरी श्रीमती जी सोमवती अमावस्या के अवसर पर पीपल देवता की पूजा करने, उनकी १०८ बार परिक्रमा करने गयी हुई थीं और मेरे बच्चे सो रहे थे। उन सबको आपका दर्शन कराये बगैर मैं आपको भला कैसे जाने देता?

अब जबकि मैने आपको अपने घर से एक किलोमीटर दूर इस मन्दिर के प्रांगण में लाकर छोड़ने का निश्चय किया है तो मन में मिश्रित भाव पैदा हो रहे हैं। दुःख और सन्तोष दोनो कुलांचे भर रहे हैं। उम्मीद है कि मन्दिर से सटा हुआ यह हरा-भरा पार्क आपको निश्चित ही अच्छा लगेगा। इस मन्दिर में दक्षिणमुखी हनुमान जी है, भगवान शंकर जी हैं, दुर्गा माँ की छत्रछाया भी है और आपके स्वामी गणेश जी भी पदासीन हैं। देखिए न, यहाँ कितनी धर्मपरायण सुहागिन औरतें पीपल के चबूतरे पर पूजा-परिक्रमा कर रही हैं। बड़ी मात्रा में प्रसाद चढ़ाया जा रहा है। आप इनका आनन्द उठाइए। हाँ, अपना नरक-स्नान का शौक त्याग दीजिएगा तो भला होगा।

आशा है कि मैने आपको जो नया बसेरा दिया है उसको मद्देनज़र रखते हुए आप मुझे माफ़ कर देंगे। मैने आपको पिजड़े में बन्द करके और नल के साफ पानी से स्नान कराके जो कष्ट दिया है और आपकी कैदी हालत में बेचैनी से किए गये क्रिया-कलाप दुनिया को दिखाने के लिए रिकॉर्ड किया है उसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ।

सादर!

आपका एक अनिच्छुक भक्त

(सिद्धार्थ)

विदा से पूर्व मूषक राज के करतब

कैद में खुराफ़ाती
सलाखों के पीछे

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मायके का दर्द…

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अन्ततः आज वो रो पड़ी…। पिछ्ले सात-आठ दिन से इसकी भूमिका बन रही थी। मायके वालों से रोज बातें हो रही थीं। पापा, मम्मी, छोटे भाई, और अपने ससुराल में बैठी बड़ी बहन से लगातार घण्टों चर्चा का एक ही विषय। पतिदेव अपने काम में इतने मशरूफ़ दिखते कि कभी उनके साथ बैठकर विस्तार से विचार-विमर्श नहीं कर सकी। हाँलाकि उनके हूँ-हाँ के बीच उनसे भी सारी बात कई बार बतायी जा चुकी थी। लेकिन जितनी बेचैनी उसके मन में थी उसका अनुमान उसके पति महोदय नहीं कर पाये थे। लेकिन जब मन की व्यथा फफ़क कर आँखों से बाहर आने लगी तो इसकी गम्भीरता के बारे में सोचने को मजबूर हो गए।

यूँ तो अर्चना अपने पिता की पाँच सन्तानों में चौथे नम्बर पर थी लेकिन बचपन में एक बड़े भाई की १०-१२ साल की उम्र में ही अकाल मृत्यु हो जाने से अपने पिता की आँखों में पहली बार आँसू देखकर इतना कातर हुई थी कि सबकी निगाहों में घर की सबसे संवेदनशील सन्तान बन गयी। यह संवेदना एक लड़की होने की प्रास्थिति से उपजी भेद-भाव की कथित ‘दुनियादारी’ के प्रति विरोध के रूप में भी प्रस्फुटित हुई और ग्रामीण वातावरण में भी शहरी लड़कों की तरह शिक्षा-दीक्षा पाने की ललक और जिद के रूप में भी। बाद में जब पिता के ऊपर आने वाली एक से एक कठिन चुनैतियों और उनके द्वारा अथक परिश्रम, धैर्य, और बुद्धिमतापूर्ण ढंग से उनका मुकाबला करते देखती हुई बड़ी होने लगी तो धीरे-धीरे पिता द्वारा परम्परा और आधुनिकता के मिश्रण से पगी परवरिश को स्वीकार भी करने लगी।

mother imagesपापा ने बड़ी दीदी का विवाह एम.ए. पास करते ही एक समृद्ध परिवार में कर दिया था। बड़े भाई को बनारस के बोर्डिंग स्कूल में डाल दिया लेकिन इन्सेफ़्लाइटिस के कहर ने उस होनहार को असमय ही काल के गाल में झोंक दिया था। इसके बाद बच्चों को बाहर भेंजकर पढ़ाने का फैसला लेना कठिन हो गया था। लेकिन गाँव में शिक्षा का कोई भविष्य भी नहीं था। इसलिए पापा ने दोनो बेटों को अच्छी स्कूली शिक्षा के लिए निकट के महानगर में भेज दिया। मम्मी-पापा बीच-बीच में गाँव से शहर जाते, बेटों को देख-सुनकर लौट आते। लेकिन बेटियों को गाँव से बाहर भेंजने की हिम्मत नहीं पड़ी थी। वे वहीं से रोज पढ़ने के लिए पास के कस्बे तक जातीं और शाम ढलने से पहले लौट आतीं। …पापा की दुलारी बेटियाँ।

जल्दी ही बड़ा भाई इन्जिनियरिंग में और छोटा भाई मेडिकल में प्रवेश पाकर अपना-अपना प्रोफेशनल कैरियर चुनने में सफल हो गए। पूरी पढ़ाई घर से दूर रहकर हुई। लेकिन बेटियों के लिए पापा की सोच अच्छे घर में शादी कर देने से आगे नहीं बढ़ सकी। पढ़ाई भी उसी के अनुसार ऐसी ताकि अच्छे रिश्ते  मिल सकें। इस छोटी बिटिया ने फिरभी अपनी जिद से बी.ए. के बजाय बी.एस.सी. और फिर बड़े शहर जाकर एम.एस.सी. में भी दाखिला ले लिया। लेकिन पापा को जाने क्या जल्दी थी कि एम.एस.सी. (फाइनल) की परीक्षा पर शादी को तरज़ीह देते हुए बिटिया के हाथ पीले कर दिए। रेग्यूलर परीक्षा छोड़नी पड़ी। अगले साल दुबारा परीक्षा हुई तो पाँच छः माह के गर्भ का बोझ ढोकर भी ६८ प्रतिशत अंकों के साथ एम.एस.सी. की उपाधि प्राप्त कर लिया। लेकिन माँ-बाप की इच्छा तो जैसे बेटी को ससुराल भेंजकर ही पूरी हो गयी।

इधर भाई जब डॉक्टर (एम.डी.-मेडिसिन) बनकर ‘गोल्ड मेडल’ के साथ गाँव लौटा तो पापा को अपनी तपस्या पूरी होती नजर आयी। झटपट पास के कस्बे में क्लिनिक खुलवा दिया। एक अच्छे डॉक्टर के सभी गुण होने के साथ-साथ समाज में अत्यन्त प्रतिष्ठित पिता के दिए संस्कारों ने अपना रंग दिखाना शुरू किया। मरीजों की बाढ़ आने लगी। सप्ताह में एक दिन निःशुल्क सेवा के संकल्प ने इसमें चार-चाँद लगा दिए। पापा ने बेटे की सफलता के उत्साह में अपनी बढ़ती उम्र को धता बताकर स्वयं खड़ा रहते हुए उसी कस्बे में जो अबतक जिला बन गया था, एक बड़ा सा अस्पताल बनवाना प्रारम्भ कर दिया। family_sketch

भाई की प्रगति को आँखों से देखने के लिए दोनो बहनों ने समय-समय पर मायके की यात्राएं कीं। प्रायः प्रतिदिन क्लिनिक में जुटने वाले मरीजों की संख्या, उनकी प्रतिक्रिया और आम जनश्रुति के किस्सों पर कान लगाये रहतीं। मम्मी को तो जैसे जीवन की अमूल्य निधि मिल गयी। जिन बेटों को उनकी दस साल की उम्र से ही सिर्फ़ छुट्टियों में देखने और अपने हाथ से खाना खिलाने का मौका मिलता था वे अब घर पर रहकर आँखों के सामने सफलता की बुलन्दियाँ छू रहे थे। जिनका अधिकांश समय बेटों की राह तकते बीता था, वह अब उनके सिर पर रोज स्नेहसिक्त हाथ फेरने का सुख पाने लगी थी।

यह बहुत आह्लादकारी समय था। क्लिनिक चलते हुए एक साल कैसे बीत गया पता ही नहीं चला। इस दौरान अपना हॉस्पिटल भी बन कर लगभग तैयार हो गया। मार्बल और पी.ओ.पी. निबटाकर अब पेंटिंग का काम शुरू हो गया था। दो-तीन डॉक्टर्स चैम्बर, ओ.टी., लेबर रूम, जच्चा-बच्चा वार्ड, दवाघर, मरीजों और तीमारदारों के लिए प्रतीक्षा कक्ष, टॉयलेट व स्नानघर, किचेन शेड, पार्किंग।

डॉक्टर की शादी चार-पाँच साल पहले एक डॉक्टरनी से ही हो चुकी थी जो उसी के कॉलेज में जूनियर थी। उसका भी ‘गाइनी’ में पीजी (DNB) का दूसरा साल है। इसे कम्प्लीट करके जब आएगी तो उसे सीधे अपने बने-बनाए हॉस्पिटल के चैम्बर में बैठना होगा। क्षेत्र के लोग तो अभी से मुग्ध और प्रसन्न रहने लगे हैं कि अब बड़े शहरों वाली सुविधा यहीं अपने पिछड़े से शहर में ही मिलने लगेगी। वह भी सभी जरूरतें एक ही छत के नीचे पूरी होने वाली थीं। लेकिन…

पिछले एक सप्ताह में जो घटनाक्रम चला है उसे जानकर तो दिमाग सुन्न हो गया है। डॉक्टर ने अचानक यह निर्णय ले लिया कि वह इस कस्बे की डॉक्टरी छोड़ रहा है। वापस दिल्ली जाएगा जहाँ उसकी पत्नी तीन साल के बेटे के साथ अकेली रहकर पढ़ाई (DNB-OG) कर रही है। अभी दो-तीन साल उसे वहीं लगेंगे। पत्नी और बेटे को छोड़कर अपने पैतृक गाँव में आया तो था अपने क्षेत्र की सेवा करने लेकिन पिछले एक साल के व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर उसे यह कठिन निर्णय लेना पड़ा है।

क्षेत्र के लोग सन्न हैं। जिसने भी सुना दौड़ पड़ा। आखिर क्या बात है? कुछ मरीज तो फूट-फूटकर रो पड़े जिन्हें उसने भगवान बनकर बचाया था। पापा के इष्ट-मित्र, दूर-दूर के रिश्तेदार, और क्लिनिक में साथ रहने वाला सपोर्टिंग स्टाफ, सबको आघात पहुँचा है। लगता है जैसे अपनी कोई अमूल्य सम्पत्ति छीन ली गयी हो। सभी यह जान लेना चाहते हैं कि आखिर किसकी गलती की सजा उन्हें मिल रही है।sketch of family

इस सारी चुभन को अर्चना ने पिछले सात-आठ दिन में फोन से बात कर-करके महसूस किया है। भाई, बड़ी बहन, माँ और बाप से लगातार मोबाइल पर एक-एक बात पर विचार-विमर्श होता रहा। दिल्ली में बैठी अनुजवधू जरूर अपने पति के लौट आने से प्रसन्न है। तीन साल के बेटे को भी अपने पापा का स्नेह मिलने लगेगा। वहाँ जाकर डॉक्टर एक और उच्च स्तरीय उपाधि (DM) पाने की कोशिश करेगा। शायद किसी बड़े अस्पताल का बड़ा डॉक्टर बन जाय। विदेश जाने के रास्ते भी खुल सकते हैं।

लेकिन गाँव पर फिर राह तकते मम्मी पापा…?

आखिर कल प्रस्थान का वह दिन आ ही गया जब मम्मी-पापा से विदा लेकर वह दिल्ली जा बसने के लिए निकल पड़ा। बेटे से बिछुड़ते हुए माँ का धैर्य टूट गया। वह उससे लिपटकर फूट-फूट्कर रो पड़ी। पापा ने कलेजा मजबूत करके उन्हें चुप कराया। हाँलाकि उन्हें खुद ही ढाँढस बधाने वाले की दरकार थी। यह सब मोबाइल पर सुनसुनकर अर्चना का भी बुरा हाल था। पति ने टोका तो आँसू छलक पड़े।

हम बेटियों से मायके का सुख नसीब न हो तो न सही लेकिन अपने माँ-बाप, भाई-बहन के दुःख में दुःखी होने का हक तो न छीना जाय…।

(सिद्धार्थ)

पानी में प्यासे बैठे हैं…

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मेरा एक घर जहाँ मेरे दादाजी ने अपना अधिकांश जीवन बिताया था, बिहार के पश्चिम चम्पारण जिले में नारायणी नदी (बूढ़ी गण्डक) के किनारे है। वहाँ प्रायः प्रत्येक वर्ष घर के आंगन का पवित्रीकरण उफ़नाती नदी के जल से हो ही जाता है। इन दिनों जब बालमन ने समाचारों में बाढ़ की विभीषिका देखी तो उन्हें अपने वो दिन याद आ गये जब वे एक बार हफ़्तों वहाँ पानी से घिरे रहे:

पानी के सैलाबों में से, कुछ जगह दिखाई देती है।
कुछ लोग दिखाई पड़ते है, आवाज सुनाई देती है॥
सब डूब गया, सब नष्ट हुआ,कुछ बचा नहीं खाने को है।
बीवी को बच्चा होना है, और भैंस भी बियाने को है ॥

अम्मा जपती है राम-नाम, दो दिन से भूखी बैठी है।
वो गाँव की बुढिया काकी थी,जो अन्न बिना ही ऐंठी है॥
मोहना की मेहरारु रोती, चिल्लाती है, गुस्से में है।
फूटी किस्मत जो ब्याह हुआ, यह नर्क पड़ा हिस्से में है॥

रघुबर काका बतलाते हैं, अबतक यह बाढ़ नही देखी।
सत्तर वर्षों की उमर गयी, ऐसी मझधार नहीं देखी॥
कल टी.वी. वाले आये थे, सोचा पाएंगे खाने को।
बस पूछ्ताछ कर चले गए,मन तरस गया कुछ पाने को॥

http://www.divyabhaskar.co.in से साभार

पानी में प्यासे बैठे हैं, पर शौच नही करने पाते।
औरत की आफ़त विकट हुई, जो मर्द पेड़ पर निपटाते॥
पानी में बहती लाश यहाँ, चहुँओर दिखाई देती है।
कातर सी देखो गौ-माता, डंकार सुनाई देती है॥

मन में सवाल ये उठता है, काहे को जन्म दिये दाता ?
सच में तू कितना निष्ठुर है, क्यों खेल तुझे ऐसा भाता ?
किस गलती की है मिली सजा,जिसको बेबस होकर काटें।
सब साँस रोककर बैठे हैं, रातों पर दिन – दिन पर रातें॥

हो रहा हवाई सर्वेक्षण, कुछ पैकेट गिरने वाले हैं।
मन्त्री-अफसर ने छोड़ा जो, वो इनके बने निवाले हैं॥
है अंत कहाँ यह पता नहीं, पर यह जिजीविषा कैसी है।
‘कोसी’ उतार देगी गुस्सा, आखिर वो माँ के जैसी है॥

daylife.com से साभार

शब्द-दृश्यांकन: बालमन