अच्छाई को सजोना पड़ता है जबकि बुराई अपने आप फैलती है…।

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पिछले दिनों विश्वविद्यालय प्रांगण में आयोजित ब्लॉगिंग संगोष्ठी में दिल्ली से श्री जय कुमार झा जी पधारे थे। ‘ऑनेस्टी प्रोजेक्ट डेमोक्रेसी’  के अलावा उनके दूसरे भी ब्लॉग हैं। ब्लॉगरी को सामाजिक सरोकारों से जोड़ने पर झा जी का बहुत जोर है। इतना कि उनसे चाहे जिस मुद्दे पर बात करिए उनका हर तीसरा वाक्य ‘सामाजिक सरोकार’ की ओर ही मोड़ कर ले जाता है। उनसे हमें जब भी कुछ चर्चा का मौका मिला वे ‘सोशल ऑडिट’ पर जोर देते दिखे। मुझे थोड़ा विस्मय हुआ कि घूम-फिरकर इन्हीं दो बातों के इर्द-गिर्द परिक्रमा करने से ये थकते क्यों नहीं। उनका कहना था कि हमारे समाज की गड़बड़ियों को दूर करने का सबसे कारगर तरीका है सोशल ऑडिट यानि सामाजिक जाँच।

जय कुमार झा जी ने संगोष्ठी समाप्त होने पर बताया कि वे वर्धा प्रांगण में एक दिन और रुकेंगे। यहाँ संपन्न हुई कार्यशाला में ब्लॉगिंग से जुड़ने वाले नये ब्लॉगर विद्यार्थियों व अन्य छात्रों से अलग से मिलकर कुछ संदेश देना चाहेंगे। संभव हो तो कुलपति जी को भी यह प्रस्ताव देंगे कि वे अपने छात्रों की टीम बनाकर सुदूर गाँवों में सोशल ऑडिट के लिए भेजें। राष्ट्रीय स्तर पर जो लोग इस प्रकार के अभियान में लगे हुए हैं उनकी मदद से इन टीमों को प्रशिक्षित कराया जाय आदि-आदि।

दो-दिवसीय संगोष्ठी की समाप्ति पर मैं थकान मिटाने के नाम पर आराम की मुद्रा में जाना चाहता था लेकिन उनकी ऊर्जा और सामाजिक सरोकार के प्रति अदम्य आग्रह को देखकर मुझे जन संचार विभाग के अध्यक्ष प्रो. अनिल राय ‘अंकित’ से बात करके झा जी की कक्षा का आयोजन करना पड़ा। विभागाध्यक्ष ने सहर्ष रुचि दिखायी और हम झा जी को लेकर पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे छात्रों के बीच एक क्लास-रूम में पहुँच गये। विभाग में उपस्थित सभी कक्षाओं के छात्र कुछ शिक्षकों के साथ वहाँ इकठ्ठा थे। मैने सबसे पहले वहाँ उपस्थित विद्यार्थियों को संगोष्ठी के आयोजन में सहयोग देने हेतु धन्यवाद दिया और फिर अतिथि वार्ताकार का संक्षिप्त परिचय देकर पोडियम पर झा जी को आमंत्रित कर दिया। झा जी ने अपनी बात सामाजिक सरोकार, सोशल ऑडिट, ग्रास रूट लेवेल, सिटिजेन जर्नलिस्ट इत्यादि के माध्यम से रखी। झा जी ने India Rejuvenation Initiative (iri.org.in) नामक संगठन के बारे में बताया जो प्रायः सेवानिवृत्त हो चुके ऐसे प्रभावशाली और अनुभवी नौकरशाहों, न्यायाधीशों, पुलिस अधिकारियों इत्यादि द्वारा खड़ा किया गया है जो समाज में सच्चाई और ईमानदारी को बढ़ावा देना चाहते हैं।

उनकी वार्ता सुनकर मैंने जो समझा उसका सार यह था कि समाज के जागरूक लोगों द्वारा अपने आस-पास हो रहे प्रत्येक कार्य पर न सिर्फ़ निगरानी रखना चाहिए बल्कि कुछ भी गड़बड़ पाने पर सक्षम प्राधिकारियों तक उसकी शिकायत भी पहुँचानी चाहिए। जबतक हर पढ़ा लिखा आदमी सबसे निचले स्तर (grass-root level) पर सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर सतर्क निगाह रखकर धाँधली करने वाले लाभार्थियों, कर्मचारियों और अधिकारियों को गलत करने से रोकने व टोकने के लिए कुछ कष्ट नहीं उठाएगा तबतक हम एक ईमानदार और पारदर्शी समाज की रचना नहीं कर सकेंगे। आज स्थिति बिल्कुल उल्टी और भयावह है। सरेआम लूट और भ्रष्टाचार होते देखकर भी हम चुप रह जाते हैं और अपराधी निर्द्वंद्व होकर अपने कारनामें करता रहता है। ऐसा इसलिए कि हम केवल अपने सुकून और स्वार्थ की पूर्ति की चिंता में ही रमे हुए हैं। किसी ऐसे काम को झंझटी समझ कर किनारा कर लेते हैं जिसमें कुछ व्यक्तिगत स्वार्थ न सधता हो। सामाजिक सरोकारों पर ध्यान देने की फुर्सत किसी के पास नहीं है। उन्होंने सबसे अपील की कि हमें अपने कीमती समय में से कुछ समय समाज के गरीब और असहाय तबके की सहायता के लिए निकालना चाहिए।

झा जी की बातें सबने बड़े ध्यान से सुनीं। बीच-बीच में अनेक छात्र-छात्राओं ने उनसे सवाल दागने शुरू कर दिए। उन युवा चेहरों पर व्यवस्था के प्रति अत्यन्त रोष दिखा। उनकी बातों से ऐसा लगा कि ये सब आदर्श की बातें हैं जो केवल गोष्ठियों और सभाओं में अच्छी लगती हैं। व्यावहारिक दुनिया की सच्चाई बहुत कठोर और कड़वी है। जो लोग सत्ता और शक्ति के शिखर पर बैठे हैं उन्हें किसी तरह से डिगा पाना लगभग असम्भव है। जिनके पास अवसर हैं वे इसका प्रयोग अपनी तिजोरियाँ भरने के लिए कर रहे हैं। अपराधी प्रवृत्ति के लोग गिरोहबंद होकर देश और समाज को लूट रहे हैं। ईमानदार और सच्चे लोगों को कदम-कदम पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। वे असहाय होकर किनारे खड़े हैं। हम युवाओं को ऐसे उपदेश खूब दिये जाते हैं। लेकिन हमारे सामने सबसे बड़ी समस्या तो जीविका का सहारा ढूँढना है। नौकरियाँ दुर्लभ होती जा रही हैं। जो थोड़ी बहुत हैं भी वे भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जा रही हैं। सरकारी धन की लूट मची हुई है। प्रायः सभी इस प्रयास में लगे हैं कि उस लूट में हिस्सेदारी पाने का कोई जुगाड़ खोज लिया जाय। जिन्हें हिस्सा मिल गया वो यथास्थिति बनाये रखने का इन्तजाम सोचते हैं और जो बाहर हैं वे विरोध, धरना, प्रदर्शन, आंदोलन की राह चुनते हैं या चुप होकर अपनी नियति का दोष मानकर घर बैठ जाते हैं।

मुझे लगा कि यह नयी पीढ़ी यथार्थ के धरातल पर कुछ ज्यादा ही पैर जमाकर चलने को तैयार है। आदर्श की बातें सुनने के लिए भी इनके पास धैर्य नहीं है। झा जी उत्साहपूर्वक अपनी ‘ऑनेस्टी प्रोजेक्ट डेमोक्रेसी’ की बात बढ़ाते रहे और छात्रगण उनसे रोटी का सवाल उछालते रहे। एक छात्र ने विश्वविद्यालय के विरुद्ध नाना प्रकार के अनर्गल कुप्रचार में लगी एक वेबसाइट का उदाहरण देते हुए कहा कि यहाँ बहुत से अच्छे कार्य हो रहे हैं लेकिन बाहर वालों के सामने यहाँ की जो छवि बनी है उसे देखकर हमें इस कैम्पस से बाहर जाने पर शर्म महसूस होती है। इस शरारत के पीछे जिनका हाथ है उन्हे सभी पहचानते भी हैं लेकिन फिर भी हम हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। उनके विरुद्ध तो हम कुछ कर नहीं रहे हैं, बल्कि कुछ कर ही नहीं पा रहे हैं तो बाकी दुनिया को सुधारने की बात करने का क्या औचित्य है? मतलब यह कि बुराई अपने पाँव पसारती जाएगी। उसे रोकने वाला कोई नहीं है। किसी के पास इसकी फुर्सत ही नहीं है। इस बहस के बीच मैने ह्वाइट बोर्ड (अब ब्लैक-बोर्ड नहीं रहे) पर इस प्रकार का रेखाचित्र बना दिया-

good&evil

मैने सबका ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा कि आपलोगों के हिसाब से आज के समाज में अच्छाई और बुराई की तुलनात्मक स्थिति कुछ इस प्रकार की है। बुराई का दानव विकराल रूप लेता जा रहा है और सच्चाई और ईमानदारी जैसी अच्छी बातें अल्पमत में आ गयी हैं। बुराई को कम करने के सभी प्रयास प्रायः विफल होते जा रहे हैं। कोई शरीफ़ आदमी गुंडे-मवाली से उलझना नहीं चाहता। झंझट मोल नहीं लेना चाहता। ‘संघे शक्तिः कलियु्गे’ – अपराधियों का गिरोह बहुत एकजुट होकर काम करता है जबकि सच्चे और ईमानदार लोग अकेले पड़ जाते हैं। ऐसे में शायद आप यह मान चुके हैं कि बायीं ओर के स्तम्भ को छोटा नहीं किया जा सकता। लगभग सभी ने मेरी इस बात पर हामी भरी। मैने कहा कि आप सबकी बात मानकर मैं भी स्वीकार कर लेता हूँ कि बुराई को कम नहीं किया जा सकता। लेकिन आप लोगों को अच्छाई की मात्रा बढ़ाने से किसने रोका है? अधिक से अधिक लोग यदि अपने आप में  सद्‍गुणों का विकास कर लें तो यह अंतर उलट सकता है। कुछ इस प्रकार से-

good&evil2

बुराई को उसके हाल पर छोड़ दें, और अच्छाई का अवगाहन करें तो आप दूसरी स्थिति पैदा कर सकते हैं। इस पर वे शांत होकर कुछ सोचने लगे। मैने आगे कहा – लेकिन यह इतना आसान काम नहीं है। क्योंकि प्रकृति आपके विरुद्ध खड़ी है। यह दुनिया जिस रूप में आज है उसमें बुराई स्वाभाविक रूप से अपने आप फैलती जाएगी लेकिन अच्छाई की मात्रा बढ़ाने के लिए मनुष्य को सकारात्मक कदम उठाने पड़ेंगे। प्राकृतिक रूप से  हमारा वातावरण ऐसा ही है। किसान अपने खेत की जुताई करके यत्न पूर्वक खर-पतवार की जड़ सहित सफाई कर लेने के बाद साफ़-सुथरी मिट्टी में अनाज के बीज डालता है। लेकिन बीज के साथ अवांछित घास-फूस अपने आप उग आती है। यदि खेत की निराई-गुड़ाई समय-समय पर न की जाय तो ये खर-पतवार अनाज के पौधों को अच्छादित कर देंगे और खेत की फसल चौपट हो जाएगी। थोड़ी सी असावधानी हुई नहीं कि बीज की बढ़वार रुक जाएगी और सारी मेहनत चौपट हो जाएगी। इसलिए सद्‌गुणों को अपने भीतर सावधानी से सजो कर रखना पड़ता है जबकि दुर्गुण अपने आप घर बना लेते हैं।

इस बात को सिद्ध करने के लिए कुछ और भी उदाहरण मेरे मन में आये। दाँतों को साफ़ रखने के लिए हमें नित्य उनकी सफाई करनी पड़ती है। लेकिन यदि उनका हम कुछ न करें, बस यूँ ही छोड़ दें तो जल्दी ही गंदगी जमती जाएगी। शरीर को साफ़ रखने के लिए रोज साबुन लगाकर नहाना पड़ता है, लेकिन इसे गंदा रखने के लिए किसी प्रयास की जरूरत नहीं है। हमारे वातावरण से आकर गंदगी अपने आप शरीर पर आसन जमा लेती है। घर को साफ रखने के लिए रोज झाड़ू-पोछा करना पड़ता है लेकिन गंदगी जाने कहाँ से अपने आप पधार जाती है। हमारे वातावरण में नकारात्मकता की विषबेल फैलने के अनुकूल अवसर बहुत हैं लेकिन सकारात्मक सुगंध का फूल खिलाने के लिए अच्छा माली बनकर कठिन परिश्रम करना पड़ेगा।

ऊपर के कई उदाहरण मुझे वहाँ कक्षा में नहीं देने पड़े। शायद नयी पीढ़ी को यह बात आसानी से समझ में आ गयी। कम से कम जोरदार तालियों से प्रकट होता उनका समर्थन तो यही कह रहा था।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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प्रयाग का पाठ वर्धा में काम आया… शुक्रिया।

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वर्धा में जो कुछ हुआ वह आप ब्लॉगजगत की रिपोर्टों से जान चुके हैं। मैं भी अपने ब्लॉगर अतिथियों को विदा करने के बाद लगातार उनकी पोस्टें ही पढ़ रहा हूँ। उनकी स्नेहिल भाव-धारा में डूब-उतरा रहा हूँ। कृतज्ञता ज्ञापन के लिए शब्दों की मेरी झोली रिक्त हो चुकी है। मेरे लिए जैसी सद्‍भावनापूर्ण टिप्पणियाँ और उत्साहवर्द्धक बातें लिखीं गयी हैं उसके बाद तो मन में नयी ऊर्जा का संचार हो गया है। लगता है कि मौका मिले तो बार-बार उन अविस्मरणीय क्षणों को जीवन में उतारना चाहूँगा।

बीच-बीच में एक-दो महानुभावों की टिप्पणियाँ देखकर मन विचलित होता है तो पिछले साल के इलाहाबाद महासम्मेलन की याद ताजा कर अपना आत्मविश्वास मजबूत कर लेता हूँ।

पहला सम्मेलन विश्वविद्यालय के वर्धा मुख्यालय से दूर इलाहाबाद में था, यहाँ जैसा संसाधन व ‘लॉजिस्टिक सपोर्ट’ वहाँ उपलब्ध न था, अनुभव की कमी थी और ब्लॉग जगत का स्वभाव प्रायः अपरिचित था। लेकिन वहाँ भी जमावड़ा अच्छा हुआ था। खूब सार्थक बहस हुई। गरमा-गरमी भी हुई। एक जीवंत गोष्ठी का सफलता पूर्वक समापन कराकर जब हम घर लौटे तो अंतर्जाल पर हमारे प्रयत्नों को तार-तार करती कुछ पोस्टें हमारा स्वागत (काले झंडे से) करती मिलीं। हमने धैर्य से सबकुछ पढ़ा। …इसे बुलाया, उसे छोड़ दिया, इन्हें ये मिला, उन्हें वो नहीं मिला, यहाँ ये कमी वहाँ वो कमी। पब्लिक का पैसा बहा दिया गया,  …पारदर्शिता नहीं बरती गयी, आदि-आदि।

इन सब के बीच मेरा सौभाग्य यह रहा कि उस समय भी नकारात्मक आलोचनाओं से अधिक मात्रा में सम्मेलन की सकारात्मक बातों ने अन्तर्जाल पर स्थान बनाया। दुनिया को सही तस्वीर का पता चल गया। अंततः मेरा विश्वास पक्का हो गया कि हिंदी ब्लॉगिंग को प्रत्येक पढ़े-लिखे व्यक्ति से जोड़ने और इस अनूठे माध्यम की स्वतंत्रता और सहजता से सबको परिचित कराने के लिए इस आभासी दुनिया के स्थापित हस्ताक्षरों को सेमिनारों, गोष्ठियों व सम्मेलनों के माध्यम से एक दूसरे से व अन्य विद्यार्थियों और बुद्धिजीवियों से मिलने-मिलाने का सिलसिला चलते रहना चाहिए।

मैंने वर्धा में संपन्न इस कार्यक्रम की तैयारी के समय आदरणीय अरविंद जी द्वारा वर्ष पर्यन्त दी गयी सलाह के आधार पर कुछ मोटी-मोटी बातें नोट करके रख ली थीं लेकिन ऐन वक्त पर वह नोट ही गायब हो गया। अब जैसा कि सभी लोग कार्यक्रम को सफल बता रहे हैं तो स्मृति के आधार पर उन बातों को लिखने की कोशिश करता हूँ –

  1. आमंत्रितों की सूची अपने निजी संपर्क के आधार पर नहीं बल्कि ऐसी रीति से तैयार की जाय जिसमें इस माध्यम से गंभीरता पूर्वक जुड़ने वाले प्रत्येक ब्लॉगर को अपनी पहल पर यहाँ आने का मौका मिल सके।
  2. बजट की सीमा के अनुसार अतिथियों की जो भी सीमा तय हो उसको पूरा करने के लिए ‘प्रथम आगत-प्रथम स्वागत’ का नियम अपनाया जाय।
  3. आमंत्रित अतिथियों के लिए समान शिष्टाचार व उपलब्धता के आलोक में यथासम्भव समान संसाधन व सुविधाएँ उपलब्ध कराये जाय।
  4. सभाकक्ष में समय-प्रबंधन के उद्देश्य से बोलने वालों की संख्या नियंत्रित करने के लिए समूह-चर्चा की विधि अपनायी जाय जिसमें अलग-अलग मुद्दों पर चर्चा करने के लिए छोटे-छोटे समूह बनाकर गहनता से अलग-अलग चर्चा करा ली जाय और समूह के निष्कर्षों को उनके द्वारा नामित प्रतिनिधि द्वारा सभाकक्ष में प्रस्तुत किया जाय।
  5. अतिथियों के आवागमन, सुबह की चाय, नाश्ता, भोजन व शयन को निर्बाध बनाने के लिए अलग-अलग कर्मचारियों की लिखित ड्यूटी लगाकर उनका अनुश्रवण किया जाय।
  6. सभाकक्ष में परिचय-पत्र, कलम-कागज, कम्प्यूटर, इंटरनेट, माइक, ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग, फोटोग्राफी, प्रेस-रिपोर्ट इत्यादि की जिम्मेदारी दूसरे कुशल विशेषज्ञों के हाथ में दे दिया जाय।
  7. प्रत्येक सत्र में संपन्न कराये जाने वाले कार्यक्रम की रूपरेखा पहले ही तय कर ली जाय और उसका समयबद्ध अनुपालन प्रत्येक दशा में किया जाय।
  8. किसी भी ब्लॉगर को अपने मन से बक-बक करने की इजाजत न दी जाय। विषय से इतर न कुछ कहने दिया जाय और न ही कुछ करने दिया जाय। इधर-उधर घूमने और टंकी इत्यादि खोजने का मौका तो कतई नहीं।:)

इस प्रकार सारे काम दूसरों के सुपुर्द कर मैने अपना कैमरा उठाया और एक विचित्र संयोजक बनकर अनूप जी को एक बार फिर शिकायत का मौका देता हुआ गेस्ट हाउस पहुँच गया। शिकायत यह कि मैं एक संयोजक की तरह परेशान हाल, सिर खुजाता हुआ और बेचैनी से टहलता हुआ क्यों नहीं दिखायी दे रहा था।

जब पंचों की यही राय है कि संगोष्ठी सफल रही तो मैं यह क्यों बताऊँ कि ऊपर गिनाये गये किसी भी बिन्दु का अनुपालन ठीक-ठीक नहीं हो पाया? साथ ही कुछ दूसरी कमियाँ भी अपना मुँह लटकाये इधर-उधर ताकती रहीं तो उन्हें चर्चा का विषय मैं क्यों बनाऊँ? …लेकिन एक भारी समस्या है। यह बात लिखकर मैं आफ़त मोल ले रहा हूँ। शुचिता और पारदर्शिता के रखवाले मुझे जीने नहीं देंगे। यदि कमियाँ थीं तो उन्हें सामने आना चाहिए। अनूप जी ने यह कई बार कहा कि सिद्धार्थ अपना नमक खिला-खिलाकर लोगों को सेट कर रहा है। तो क्या मानूँ कि नमक अपना असर कर रहा है? छी-छी मैं भी कैसा अहमक  हूँ… अनूप जी की बात पर जा रहा हूँ जो खुले आम यह कहते हुए पाये गये कि आओ एक दूसरे की झूठी तारीफ़ें करें…।

तो मित्रों, मैं पूरे होशो-हवाश में पारदर्शिता के तकाजे से यह बताना चाहता हूँ कि ऊपर तय की गयी पॉलिसी शुरुआत से ही फेल होती रही, और मैं अपने को जबरिया पास करता रहा। उद्‍घाटन सत्र में ही अनूप जी ने स्पष्ट भी कर दिया कि सिद्धार्थ के ‘साहस’ की दाद देनी पड़ेगी कि इलाहाबाद सम्मेलन पर इतनी गालियाँ खाने के बाद भी साल भर के भीतर ही फिर से सबको दुबारा बुला लिया। इस कथन को भी मैने सकारात्मक मान लिया है जबकि आप इसका अर्थ समझ ही रहे होंगे। बहरहाल ऊपर गिनाये गये नियमों पर बिंदुवार आख्या निम्नवत है:

  1. मैने अपने ब्लॉग सत्यार्थमित्र व विश्वविद्यालय की दोनो साइट्स पर यह सूचना पोस्ट कर दी कि अमुक तिथियों को संगोष्ठी होगी। उसमें जो भी सज्जन शामिल होना चाहें वे ‘ब्लॉगिंग इथिक्स’ की थीम पर एक आलेख लिखकर उसे अपनी प्रविष्टि के रूप में हमें भेजें। चयनित होने पर उन्हें प्रतिभाग हेतु आमंत्रण पत्र भेजा जाएगा। कार्यशाला में प्रशिक्षण प्राप्त करने के इच्छुक अभ्यर्थियों से  निर्धारित प्रारूप पर आवेदन/पंजीकरण प्रपत्र भरने का अनुरोध किया गया था। सुरेश चिपलूनकर जी के एक टिप्पणी रूपी प्रश्न के जवाब में ‘प्रतिभागी’ और ‘अभ्यर्थी’ का अंतर भी बताया गया। इस सूचना के आधार पर जिस किसी ने अपनी प्रविष्टि भेजी उसको आमंत्रण पत्र भेज दिए गये। कोई आलेख अस्वीकृत नहीं हुआ। लेकिन हमारी उम्मीद के उलट यह संख्या बहुत कम थी। इस खुले आमंत्रण से संख्या पूरी न होते देखकर हमें सामूहिक चर्चा से कुछ नाम तय करने पड़े। करीब पचास बड़े और अनुभवी ब्लॉगर्स से संपर्क किया गया। इनमें से अनेक अपनी निजी व्यस्तता के कारण असमर्थता व्यक्त करते गये। अंततः करीब पैतीस लोगों ने आने की सहमति जतायी। अंतिम क्षण तक आकस्मिक कारणों से लोगों की यात्राएँ रद्द होती रहीं। प्रमुख कारणों में स्वयं अथवा किसी परिजन की तबियत खराब होना, अथवा नौकरी से छुट्टी न मिल पाना रहा। इस प्रकार हमने अवसर सबको दिया लेकिन उसे लपक लेने का ख्याल कम ही लोगों के मन में आया। जो आ गये उन्हें ही पाकर हम धन्य हो गये। जिन्होंने न बुलाने का स्पष्टीकरण मांगा उन्होंने अपनी भाषा और शैली से जतला भी दिया कि उन्हें न बुलाकार इस कार्यक्रम का कोई नुकसान नहीं हुआ।
  2. अंतिम समय तक लोगों के नाम कटते रहे इसलिए दूसरे नियम के पालन की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। जिसने भी चाहा उसे आने दिया गया। हम सभी आने वालों से उनके आलेख अंतिम समय तक माँगते रहे। जिन्हें नहीं देना था उन्होंने नहीं ही दिया। कुछ लोगों का ‘न आना’ तय था लेकिन उन्होंने आलेख पाबंदी से भेज दिया। इसमें इस बात की पुष्टि हुई कि ब्लॉगर अपने मन का राजा है। जब मूड होगा तभी लिखेगा। किसी के कहने से नहीं।
  3. संसाधनों-सुविधाओं की समानता के बजाय उनकी उपलब्धता ने तीसरे नियम को ज्यादा प्रभावित किया। ए.सी.-नॉन-ए.सी., उत्तर-दक्षिण, ऊपर-नीचे, सिंगल-डबल इत्यादि मानकों के कमरों की उपलब्धता सीमित थी इसलिए जिसे जैसा बन पड़ा उसे वैसा टिका दिया गया। लेकिन सौभाग्य से इस बार कोई ब्लॉगर ऐसा नहीं निकला जो इन बातों की तुलना करके अपना दिन खराब करे। सबने हमारी वाह-वाह की और हम सच्ची में खुश होते रहे।
  4. समूहों का गठन भी हुआ, चर्चा भी हुई और प्रतिनिधियों का प्रस्तुतिकरण भी हुआ। लेकिन इस चक्कर में कई अच्छे वक्ता बोलने से रह गये। तकनीकी रूप से उनके विचार उनके समूह प्रतिनिधि ने व्यक्त कर दिए, लेकिन कलकत्ता से आये प्रियंकर जी, मुम्बई से आयी अनीता जी, रायपुर से आये संजीत जी अपने समूह के बाहर बोलने का मौका ही नहीं पा सके। इनको सुनना निश्चित रूप से बहुत लाभकारी होता, लेकिन समय-प्रबंधन की नयी तकनीक के आगे यह नुकसान हो गया।
  5. पाँचवें नियम के आलोक में ड्य़ूटी तो लगा दी गयी लेकिन कर्मचारियों ने यदि कोई ढिलाई बरती होगी तो उसका पता नहीं चल पाया। हमारे अतिथि इतने अच्छे थे कि उन्होंने मुझे खुश देखने के लिए किसी कमी की ओर इशारा ही नहीं किया। खुद आगे बढ़कर चाय माँगकर पीते रहे और लाइव रिपोर्ट में हमारा नाम रौशन करते रहे। एक बाथरूम में पानी ही नहीं आ रहा था। अविनाश जी गमछा कन्धे पर डालकर दूसरे ब्लॉगर के बाथरूम में हो लिए। किसी कर्मचारी ने एक दिन पहले टंकी का ओवरफ़्लो रोकने के उद्देश्य से गेटवाल की चकरी बंद करने के बाद उसे दुबारा खोलना जरूरी नहीं समझा था। पहले दिन रात के दस बजे ‘आल-आउट’ का जुगाड़ हो सका लेकिन सुनते हैं कि मच्छरों ने पहले ही अपना प्लान पोस्टपोन कर दिया था।
  6. सभाकक्ष में लॉजिस्टिक सपोर्ट निश्चित ही अच्छा रहा होगा लेकिन इसका प्रमुख कारण यह है कि उसमें मेरा कोई हाथ नहीं था। विश्वविद्यालय के कर्मचारियों, पत्रकारिता विभाग के विद्यार्थियों व तकनीकी विशेषज्ञों ने कोई कसर नहीं रखी। जिससे काम बिगड़ने का डर था वह अपने निजी कैमरे से ब्लॉगर्स की फोटो खींचने में व्यस्त था। बाद में पता चला कि कैमरे की सेटिंग ऐसी हो रखी थी कि सभी तस्वीरें सबसे कम (AVG) क्वालिटी की ही आ सकीं। केवल नेट पर चढ़ाने लायक।:(
  7. कार्यक्रम की रूपरेखा ऐसी तय हुई कि पहले सत्र को छोड़कर बाकी सत्रों में मंच पर कुर्सियाँ खाली ही रह गयीं। प्रत्येक सत्र के लिए औपचारिक अध्यक्ष और वार्ताकार तय कर मंच पर नहीं बैठाये गये। ब्लॉगर्स मंच के सामने लगी दर्शक-दीर्घा की कुर्सियों पर ही आसीन रहे और पवन दुग्गल को छोड़कर शेष वक्ता नीचे से सीधे पोडियम पर आते रहे। बाद में श्रीमती रचना त्रिपाठी ने बताया कि मंच खाली-खाली लग रहा था। लेकिन कार्यक्रम के दौरान किसी ने इस ओर इशारा नहीं किया। वहाँ उपस्थित कुलपति जी ने भी नहीं। बाद में उन्होंने बताया कि आप संचालक कम और हेडमास्टर ज्यादा लग रहे थे। ईल्ल्यौ… 😦
  8. यदि यशवंत जी की भड़ास का अपवाद जबरिया निकाल दें तो विषय से हटकर बिना इजाजत बोलने वालों को मौका न देने का नतीजा यह हुआ कि चर्चा घूम-फिरकर इसी मुद्दे पर केंद्रित रही कि ब्लॉग लिखने वाले किसी आचार-संहिता के बारे में न सोचें तो ही ठीक है। किसी ने सामान्य सामाजिक नियमों को पर्याप्त बताया तो किसी ने स्व- नियंत्रण की बात की, कोई संहिता को गोली मारने के लिए ललकार रहा था तो कोई साइबर कानून की सीमाएँ बता रहा था। कुलपति जी ने भी अपनी लक्ष्मण रेखा खुद खींचने की ही सलाह दी। कुछ लोगों ने ब्लॉगर के उचित आचरण गिनाये तो किसी ने इसे उद्यमिता के परिप्रेक्ष्य में जोड़ते हुए यह कहा कि जो जिम्मेदार नहीं बनेगा वह यहाँ ज्यादा दिन नहीं टिकेगा। लफ़्फ़ाजी और घटिया प्रपंच की मार्केटिंग बहुत दिनों तक नहीं चलने वाली है। ब्लॉगरों को थोड़ा घूमने का मौका क्या दिया वे बस लेकर गांधी जी के आश्रम के बाद विनोबा जी के द्वार तक चले गये। वहाँ पवनार नदी की उजली धारा देखकर उसमें कुछ लोग कूदने को उतारू थे। लेकिन जिस विधाता ने गोष्ठी की सफलता  का वरदान दे रखा था उसी ने उन लोगों को कूदने से रोक लिया और सभी सकुशल ठीक समय से सभाकक्ष तक लौट आये। 

कहीं यह निष्कर्ष निकाला गया है कि “और जो कुछ भी हुआ हो मगर प्रवर्तित विषय ही भलीभांति विवेचित नहीं हो सका सारी रिपोर्टें यही बताती हैं ……बस छिछला सा निर्वाह …..बस जुमले दागे गए …..” हजार किलोमीटर दूर पंचायत चुनाव कराते हुए भी इतना गहरा अध्ययन करके तुरत-फुरत निष्कर्ष प्रस्तुत करने की क्षमता वाला कोई दूसरा ब्लॉगर यहाँ था ही नहीं जो गहराई तक निर्वाह कर सके और जुमलों से बाहर निकल सके। पवन दुग्गल भी वह गहराई नहीं पा सके। हैरत है कि फिर भी चारो ओर जय-जयकार मची है इस संगोष्ठी की। मन चकरा रहा है।

मुझे तो लग रहा था कि निम्न चार विषयों पर उनके समूहों द्वारा जो चर्चा की गयी वह गहन भी थी और सार्थक भी लेकिन कदाचित्‌ इसका संदेश सभाकक्ष के बाहर अंतर्जाल पर पूरा नहीं गया।

१- ब्लॉगिंग में नैतिकता व सभ्याचरण (etiquettes)

श्री सुरेश चिपलूनकर, श्री विवेक सिंह, श्री संजीत त्रिपाठी, डॉ.महेश सिन्हा, डॉ. (श्रीमती) अजित गुप्ता,

२- हिंदी ब्लॉग और उद्यमिता (व्यावसायिकता)

श्री हर्षवर्धन त्रिपाठी, श्री शैलेश भारतवासी, श्री संजय वेंगाणी, श्री अविनाश वाचस्पति, श्री अशोक कुमार मिश्र, श्रीमती रचना त्रिपाठी, श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, श्री विनोद शुक्ल

३-आचार संहिता क्यों व किसके लिए?

श्री रवीन्द्र प्रभात, श्रीमती अनिता कुमार, श्री प्रवीण पांडेय, प्रो. ऋषभदेव शर्मा, डॉ कविता वाचक्नवी, डॉ. प्रियंकर पालीवाल

४- हिंदी ब्लॉग और सामाजिक सरोकार

-श्री जय कुमार झा, श्री यशवंत सिंह, श्री अनूप शुक्ल, श्री जाकिर अली रजनीश, सुश्री गायत्री शर्मा

अब समूह के प्रतिनिधि अपनी लाज रखने के लिए पूरी बात अपने ब्लॉग पर लिखकर सबको लिंक भेजें तब शायद बात बने। 

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि मेरी लाख न्यूनताओं के बावजूद ईश्वर ने मुझसे एक जानदार, शानदार और अविस्मरणीय कार्यक्रम करा दिया तो यह निश्चित रूप से मेरे पूर्व जन्म के सद‌कर्मों का पल रहा होगा जिससे मुझे इस बार अत्यंत सुलझे हुए और सकारात्मक दृ्ष्टि के सम्मानित ब्लॉगर्स के साथ संगोष्ठी के आयोजन का सुअवसर मिला। कुलपति श्री विभूति नारायण राय जी ने बड़ी सहजता से पूरे कार्यक्रम के दौरान मेरी गलतियों को नजर अंदाज कर मेरा हौसला बढ़ाये रखा, पूरा विश्वविद्यालय परिवार मुझे हर प्रकार से सहयोग करता रहा, और ब्लॉगजगत में मेरे शुभेच्छुओं की दुआओं ने ऐसा रंग दिखाया कि कुछ खल शक्तियाँ अपने आप किनारे हो गयीं वर्ना बुलावा तो सबके लिए था। इसे भाग्य न मानूँ तो क्या?

एक बात जरूर कहूँगा कि प्रयाग के सम्मेलन से जो सीखा था वह वर्धा में काम आया। यहाँ भी अपनी गलतियों से कुछ सीखने को मिला है। निश्चित ही वे आगे मार्गदर्शन करेंगी।

शेष बातें जानने के लिए इन लिंक्स पर जाना उपयोगी होगा-

  1. कई अनुत्तरित प्रश्नों को छोड़ गयी वर्धा में आयोजित संगोष्ठी (रवीन्द्र प्रभात)
  2. कैमरे में कैद वर्धा में आयोजित संगोष्ठी की सच्चाई (रवीन्द्र प्रभात)
  3. अविस्मरणीय रहा वर्धा में आयोजित संगोष्ठी का दूसरा दिन (रवीन्द्र प्रभात)
  4. वर्धा में केवल विचार मंथन ही नहीं मस्ती की पाठशाला भी (रवीन्द्र प्रभात)
  5. हिन्दी ब्लॉगिंग पर आधारित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला और संगोष्ठी पूरी भव्यता के साथ संपन्न (रवीन्द्र प्रभात)
  6. वर्धा सम्मेलन: कुछ खट्टा कुछ मीठा (जाकिर अली रजनीश)
  7. वर्धा यात्रा ने बना दिया गाय, वर्ना आदमी तो हम भी थे काम के.(अनीता कुमार)
  8. बर्धा ब्लॉगर सम्मेलन की रिपोर्ट “जरा हटके” (सुरेश चिपलूनकर)
  9. स्वतंत्र वार्ता हैदराबाद: ब्लॉगरों को अपनी लक्ष्मण रेखा खुद बनानी पड़ेगी- विभूति नारायण राय
  10. वी.एन.राय, ब्लॉगिंग और मेरी वर्धा यात्रा (भड़ास पर यशवंत)
  11. वर्धा की शानदार तस्वीरें (पिकासा पर सुरेश चिपलूनकर)
  12. वर्धा में दो दिवसीय राष्‍ट्रीय कार्यशाला एवं संगोष्‍ठी संपन्न (डॉ.कविता वाचक्नवी)
  13. वर्धा ब्लॉगर मिलन से वापसी, बाल बाल बचे (डॉ. महेश सिन्हा)
  14. ब्लोगिंग के जरिये गणतंत्र को आगे बढाने का एक अभूतपूर्व आयोजन का सार्थक प्रयास..(जय कुमार झा)
  15. ब्लोगर संगोष्ठी वर्धा चित्रों क़ी नजर से ..(जय कुमार झा)
  16. वर्धा संगोष्ठी और कुछ अभूतपूर्व अनुभव व मुलाकातें ….(जय कुमार झा)
  17. ब्लोगिंग का उपयोग सामाजिक सरोकार तथा मानवीय मूल्यों को सार्थकता क़ी ओर ले जाने केलिए किये जाने क़ी संभावनाएं बढ़ गयी है …..(जय कुमार झा)
  18. वर्धा में मिले ब्लॉगर (विवेक सिंह)
  19. वर्धा के गलियारों से (कुछ झूठ कुछ सच ) (विवेक सिंह)
  20. "ब्‍लोगिंग की कार्यशाला – अभी छाछ को बिलौना बाकी है – डॉ. (श्रीमती)अजित गुप्‍ता
  21. वर्धा सम्‍मेलन की तीन अविस्‍मरणीय बातें (संजय बेंगाणी)
  22. साला न कहें भाई साहब कहें चर्चाकारः अनूप शुक्ल
  23. ब्लॉगिंग सबसे कम पाखंड वाली विधा है चर्चाकारः अनूप शुक्ल
  24. ब्लॉगिंग की आचार संहिता की बात खामख्याली है चर्चाकारः अनूप शुक्ल
  25. वर्धा में भाषण जारी चर्चाकारः अनूप शुक्ल
  26. वर्धा में ब्लागर सम्मेलन चर्चाकारः अनूप शुक्ल
  27. नदी उदास नहीं थी  (डॉ. कविता वाचक्नवी)
  28. गांधी जी सफलतम ब्लॉगर हुए होते : वर्धा आयोजन का भरत वाक्य  (डॉ.ऋषभदेव शर्मा)
  29. "वर्धति सर्वम् स वर्धा – 1 (प्रवीण पांडेय)
  30. वर्धा ब्लोगर संगोष्ठी के पर्दे के पीछे के असल हीरो … (जय कुमार झा)
  31. वर्धा संगोष्ठी में उपस्थित थे गांधी, निराला, शमशेर और अज्ञेय भी … (रवीन्द्र प्रभात)
  32. हिंदी ब्लॉगिंग-आचार संहिता-देश के ब्लॉगर और कुछ बातें, एक रपट जैसा कुछ (संजीत त्रिपाठी)
  33. महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय,वर्धा से लौटकर …. हिन्‍दी ब्‍लॉगरों की एक महारैली का आयोजन देश की राजधानी दिल्‍ली के इंडिया गेट पर करें (अविनाश वाचस्पति)
  34. ब्‍लागिंग में आना और कार्यशाला में पहचाना एक-दूसरे को डॉ.(श्रीमती) अजित गुप्ता
  35. तनिक रुको भाई, आ रहे हैं बताते हैं बताते हैं (अनीता कुमार)
  36. महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में… (गायत्री शर्मा)
  37. वर्धा और बिरयानी घर (राम त्यागी)
  38. वर्धा से आप लोग क्यों चले गये… ? (मास्टर सत्यार्थ)
  39. …अथ वर्धा ब्लॉगर सम्मेलन कथा (अनूप शुक्ल)
  40. वर्धा – कंचन मृग जैसा वाई-फ़ाई (अनूप शुक्ल)

अभी इतना ही। कुछ लिंक्स छूट गये हों तो टिप्पणियों के माध्यम से या मेल से बताएँ। (हम कोशिश करेंगे कि इस सूची को समय-समय पर आगे बढ़ाते रहें)

    (सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) 

अयोध्या को विराम दे कुछ और सोचा जाय…?

18 टिप्पणियाँ

 

बुधवार की शाम को जब सारा देश साँस रोके वृहस्पतिवार को आने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले की प्रतीक्षा कर रहा था और चारो ओर आशंका और संशय का वातावरण किसी संभावित विस्फोट  के लिए अपने आपको तैयार कर रहा था उसी समय महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में एक नयी सांस्कृतिक सुगबुगाहट अपना पहला कदम रख रही थी। यहाँ के फिल्म एवं नाट्यकला विभाग द्वारा अब अपने पाठ्यक्रम के अंग के रूप में वास्तविक रगमंचीय प्रस्तुतियों की शृंखला प्रारंभ करने की योजना बनायी गयी है। इसी को कार्यरूप देते हुए यहाँ के एम.ए.(प्रथम छमाही) के विद्यार्थियों ने कामतानाथ की कहानी ‘हल होना एक समस्या का’ के नाट्य रूपांतर ‘दाख़िला’ का मंचन किया। इस नाटक को देखते हुए हम आनंद रस में डूबे रहे और देश की सबसे ज्वलंत समस्या(?) से अपने को कई घंटे तक दूर रख सके।

आज यदि आप कोर्ट के अयोध्या फैसले की खबरों और इसके मीडिया पोस्टमॉर्टेम से उकताकर कोई नया ठौर तलाश रहे हों तो मैं आपको एक हल्की-फुल्की कहानी के शानदार  मंचन की बात बताना और दिखाना चाहता हूँ।

फिल्म व नाट्यकला विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर और रंगकर्मी अखिलेश दीक्षित द्वारा किए गये इस कहानी के नाट्य रूपांतर एवं निर्देशन में यहाँ के एम.ए. नाट्यकला के नवागत छात्रों ने सीमित संसाधनों के बीच जिस लगन और परिश्रम से यह शानदार प्रस्तुति उपस्थित छात्रों, शिक्षक समुदाय व अन्य आमंत्रित दर्शकों के समक्ष दी वह तारीफ़ के का़बिल थी। खचाखच भरे हाल में जब और लोगों के घुसने की जगह नहीं बची तो विभागाध्यक्ष प्रो. रवि चतुर्वेदी को उसी शाम दूसरा शो कराने की घोषणा करनी पड़ी। नाटक के फर्स्ट शो के तत्काल बाद रिपीट शो भी करना पड़ा। आइए पहले आपको संक्षेप में कहानी बता देते हैं-

डब्बू के पिता एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार के मुखिया हैं जिसमें उनकी पत्नी और उनका बेटा है। वो अपने तीन वर्ष के बेटे डब्बू का एड्मिशन शहर के सबसे बड़े व प्रतिष्ठित कॉन्वेंट स्कूल में कराना चाहते हैं। एड्मिशन फॉर्म हासिल करने से लेकर इंटरव्यू तक तमाम गंभीर प्रयास करने के बावजूद उनके बेटे का प्रवेश उस स्कूल तो क्या किसी दूसरे कम प्रतिष्ठित तथाकथित अंग्रेजी स्कूल में भी नहीं होता। दोस्तों की सलाह पर वे अपने एक दूर के रिश्तेदार जो डी.एम. के स्टेनो हैं, के माध्यम से डी.एम. का सिफ़ारिशी पत्र लेकर स्कूल के फ़ादर/प्रिंसिपल से मिलते हैं जो उन्हें उल्टे पाँव लौटा देता है। कई मुलाकातों के बाद और इसके चक्कर में फ़ादर के कुत्ते से गर्दन पर कटवा लेने के बाद डब्बू के पिता से प्रिंसिपल द्वारा डोनेशन की मांग की जाती है। डोनेशन के लिए अपनी सारी जमा पूँजी और बीबी के जेवर से पैसे जुटाकर सौंप देने के बाद भी फादर की डिमांड पूरी नहीं हो पाती और वह निराश होकर बजरंग बली को कोसता हुआ घर लौट रहा होता है।

रास्ते में उसे अपना लंगोटिया यार फुन्नन मिल जाता है जो जरायम पेशा अपनाने के बाद माफ़ियागिरी करते हुए फुन्ननगुरू बन चुका है। शरीफ़ दोस्त की समस्या सुनकर वह मदद करता है और अपने रसूख के दम पर मिनटों में बिना फीस भरे डब्बू का एड्‍मिशन उसी स्कूल में करा देता है। 

कामतानाथ की यह कहानी दिखाती है कि अंग्रेजी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाने की अंधी दौड़ ने एक तरफ़ डोनेशन, कैपिटेशन फीस और ऐसे ही कई भ्रष्ट तरीकों का पोषण तो किया ही है वहीं एक ताकतवर शिक्षा माफ़िया का रास्ता भी बनाया है। निम्न मध्यमवर्ग के प्रायः सभी घरों की यह कमो-बेश वास्तविक कहानी है इसलिए यह दर्शकों से सहज तादात्म्य स्थापित कर लेती है। निर्देशक अखिलेश दीक्षित कहते हैं कि गली-गली में उग आये तथाकथित इंगलिश मीडियम (कॉन्वेंट) स्कूल आम भारतीयों की अंग्रेजी के प्रति गुलामी और अपनी भाषा के प्रति हीन भावना को कैश करते हैं। यह नाटक इसी विडम्बना को चित्रित करता है।

 

यह किसी सिनेमाघर की टिकट-खिड़की पर लगी लाइन नहीं है, बल्कि शहर के सबसे बड़े इंगलिश मीडियम स्कूल में एड्‍मिशन का फ़ॉर्म खरीदने वालों की लाइन है। सबसे पीछे खड़े हैं डब्बू के पापा जिन्हें फ़ॉर्म ब्लैक खरीदना पड़ा। 

डब्बू के पापा

डब्बू का एड्‌मिशन हो गया तो जिंदगी बदल जाएगी। हम भी ‘इंगलिश मीडियम स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे के माँ-बाप’ कहलाएंगे। सोसायटी में इज्जत बढ़ जाएगी।

हाय मेरी किस्मत

अंग्रेजी सीखो नहीं तो मुझे कोई और व्यवस्था करनी पड़ेगी। फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाली किराये की माँए भी मिलने लगी हैं।

रैपीडेक्स का रट्टा

रैपीडेक्स इंगलिश स्पीकिंग कोर्स का रट्टा चालू आहे। आई गो इंगलिस रीडिंग। यू स्लीप विदाउट ईटिंग…

सीट न मिली तो जमीन पर ही आसन

कुछ रीडर और प्रोफ़ेसर राकेश जी (ओ.एस.डी. संस्कृति) के साथ जमीन पर ही जगह पा सके। कवि आलोकधन्वा (छड़ी के साथ) ने भी नाटक देखा।

फादर के कुत्ते ने काट खाया

फ़ॉदर के कुत्ते का धन्यवाद जिसके काट काने से फ़ादर की सहानुभूति जागी। अपने हाथ से फ़र्स्ट-एड देने लगे तो बात चलाने का मौका मिला।

मंत्र मुग्ध दर्शक

फ़िल्म और नाट्यकला विभाग के अध्यक्ष प्रो रवि चतुर्वेदी को इतनी भीड़ की उम्मीद नहीं थी। हाल छोटा पड़ गया। जो लोग जगह नहीं पा सके उनके लिए दूसरा शो तत्काल बाद कराना पड़ा।

डोनेशन दोगे...

डोनेशन की चार सीटों में तीन भर गयी हैं। चौथी तुम्हें मिल सकती है लेकिन इसके लिए कुछ व्यवस्था…

इस नाटक में सूत्रधार की भूमिका निभाने वाले नीरज उपाध्याय ने अलग-अलग दृश्यों को जोड़ने और कहानी के सूत्र को बीच-बीच में जोड़ने के साथ-साथ कुत्ता, हनुमान, और पानवाला बनकर दर्शकों को हँसी से लोट-पोट कर दिया। डब्बू के पिता की भूमिका में रोहित कुमार ने जोरदार अभिनय क्षमता का परिचय दिया। खासकर संवाद अदायगी में  प्रत्येक पंचलाइन पर उन्होंने तालियाँ बटोरी। डब्बू के सामने हिंदी न बोलने कि मजबूरी में पूजा के समय इशारे से आरती का सामान न मांग पाने की मजबूरी का चित्रण गुदगुदाने वाला था। डब्बू की माँ बनी सुनीता थापा ने भी अपने सयाने अभिनय से एक निम्न मध्यमवर्गीय गृहिणी के चरित्र को सजीव कर दिया। शेष पात्रों में स्कूल के चपरासी की भूमिका में मनीष कुमार और ताऊ की भूमिका में रत्नेश मिश्रा भी सराहे गये।

मैंने यू-ट्यूब पर इस नाटक की कुछ झलकियाँ लगायी हैं जिन्हें आप निम्न लिंक्स चटकाकर देख सकते हैं।

१-पास में डब्बू था इसलिए हिंदी नहीं बोल पा रहा था

२-बीबी के जेवर दाखिले के लिए

३-फुन्नन गुरू का परिचय

४-गाँव से आए लालची ताऊ

प्रसंगवश:

वर्धा विश्वविद्यालय के इस शांत प्रांगण में रहकर देश के बड़े हिस्से में चल रही मंदिर-मस्जिद चर्चा और उससे दुष्प्रभावित दिनचर्या से अक्षुण्ण रहते हुए यहाँ दूसरे जरूरी मुद्दों पर सोचने का अवसर मन को सुकून देता है। अगले २-३ अक्टूबर को चार महान कवियों की जन्म शताब्दी का उत्सव कार्यक्रम यहाँ आयोजित है जिसमें देश के शीर्ष साहित्यकार जु्टकर सच्चिदानंद हीरानंद वात्साययन ‘अज्ञेय’, केदार नाथ अग्रवाल, शमशेर, बाबा नागार्जुन और फैज़ अहमद फैज़ की काव्य यात्रा पर गहन चर्चा करेंगे। उद्घाटन भाषण नामवर सिंह का होगा। बाद में वर्ष पर्यंत देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे कार्यक्रम कराये जाएंगे।

ब्लॉगरी की आचार संहिता विषयक विचारगोष्ठी व कार्यशाला भी बस अगले सप्ताहांत (९-१० अक्टूबर को) होगी। आमंत्रण पत्र भेजे जा चुके हैं। बड़ी संख्या में वरिष्ठ ब्लॉगर्स ने रेल आरक्षण कराकर सूचना भेज दी है। कुछेक अभी सो रहे हैं। आशा है जल्दी ही जागकर अपना प्रोग्राम बताएंगे। आप सबका स्नेह पाकर मेरा मन बहुत उत्साहित है। बस अब तैयारी पूरी करनी है।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

रेल में पकवान और कार्यशाला वीरान… लखनऊ के ब्लॉगर नदारद…?

20 टिप्पणियाँ

 

जब मैंने वर्धा से लखनऊ आने के लिए टिकट बुक कराया तो मन में यह उत्साह था कि हिंदी ब्लॉगरी की यात्रा मुझे एक ऐसे मुकाम पर ले जाने वाली है जहाँ अपनी तहज़ीबों और नफ़ासत के लिए मशहूर शहर की एक शानदार शाम अपने् प्रिय ब्लॉगर मित्रों की खुशगवार सोहबत में बीतेगी। मैंने कुलपति जी से अनुमति माँगी और उन्होंने सहर्ष दे दी। एक आदरणीय ब्लॉगर मित्र ने ही टिकट पक्का कराया और मैं सेवाग्राम से लखनऊ के लिए राप्तीसागर एक्सप्रेस पर सवार हो लिया।

जब मैं अपने टिकट पर अंकित बर्थ संख्या पर पहुँचा तो देखा कि मेरे कूपे में तमिलभाषी तीर्थयात्रियों के एक बहुत बड़े समूह का एक हिस्सा भरा हुआ था। नीचे की मेरी बर्थ पर एक प्रौढ़ा महिला सो रही थीं। उनकी गहरी नींद में खलल डालने में मुझे संकोच हुआ। थोड़ी देर मैं चुपचाप खड़ा होकर सोचता रहा। अगल-बगल की बर्थों पर भी तीर्थयात्री या तो जमकर बैठे हुए थे, सो रहे थे या उनका सामान लदा हुआ था। मैने अपना बैग उठाकर दुबारा पटका ताकि उसकी आवाज से मेरे आने की सूचना उनके कानों तक पहुँच सके। (बाद में मैंने ध्यान दिया कि अधिकांश ने अपने कानों में सचमुच की रूई डाल रखी थी। खैर…) दोपहर के भोजन के बाद की नींद थी, शायद ज्यादा गहरी नहीं थी। सामने की बर्थ पर लेटी हुई दूसरी महिला ने आँखें खोल दीं। उन्होंने मेरी सीट वाली महिला को हल्की आवाज देकर कुछ कहा- शायद यह कि अब उठ जाओ, जिसके आने का अंदेशा था वह आ चुका है- इन्होंने आँखें खोल दी। मुझे खड़ा देखकर झटपट अपने को समेटने की कोशिश करने लगीं। 

लेकिन यह इतना आसान नहीं था। ईश्वर ने उन्हें कुछ ज्यादा ही आराम की जिंदगी दी थी। जिसका भरपूर लाभ उठाते हुए उन्होंने काफ़ी वजन इकठ्ठा कर लिया था। वजन तो उस समूह की प्रायः सभी महिलाओं और पुरुषों का असामान्य था। कोई भी फुर्ती से उठने-बैठने लायक नहीं था। मुझे मन हुआ कि कह दूँ- आप यूँ ही लेटी रहिए, मैं कोई और बर्थ खोजता हूँ। उनकी आँखों में भी कुछ ऐसी ही अपेक्षा झाँक रही थी तभी बगल की बर्थ पर लेटे एक भीमकाय बुजुर्ग ने टूटी हिंदी में कहा कि ‘वो ऊपर चढ़ नहीं सकता’। मैंने ऊपर की साइड वाली सीट देखी- खाली थी। मैंने झट ऊपर अपना लैपटॉप का बैग चढ़ाया, प्रौढ़ा माता जी को लेटे रहने का इशारा किया और अपना ट्रेवेल बैग खिड़की वाली बर्थ के नीचे फिट करने लगा। उनकी आँखों में धन्यवाद और आशीर्वाद के भाव देखकर मैं भावुक हो लिया, बल्कि मेरी अपनी माँ याद आ गयी जो बहुत दिनों बाद मेरे पास रहने का समय निकालकर वर्धा आ पायी हैं।

आयोजकों ने ए.सी.थ्री की सीमा पहले ही समझा दी थी। ऐसे में लगातार लेटकर यात्रा करने की कल्पना से मैं परेशान था। लेकिन जब मुझे साइड की ऊपरी सीट मिल गयी तो मन खुश हो लिया। उसपर तुर्रा यह कि सहयात्रियों ने मुझे बड़े दिल वाला भी समझ लिया। अब तो ऊपर बैठकर, लेटकर, करवट बदल-बदलकर, आधा लेटकर, तिरछा होकर, चाहे जैसे भी यात्रा करने को मैं स्वतंत्र था। किसी का कोई हस्तक्षेप नहीं होने वाला था। लेकिन इस अवसर का ज्यादा हिस्सा मैने एक मौन अध्ययन में बिताया। चेतन भगत की पुस्तक ‘टू स्टेट्स’ हाल की दिल्ली यात्रा में पढ़ने को मिली थी। उसमें मद्रासी (तमिल) परिवार के खान-पान और आचार-व्यवहार का बहुत सूक्ष्म वर्णन किया गया है। मैंने उस रोचक वर्णन का सत्यापन करने के उद्देश्य से इनपर चुपके से नजर रखनी शुरू की।

उस कहानी के पात्रों के विपरीत मैने यह पाया कि वे तमिल बुजुर्ग् बड़े खुशमिजाज़ और शौकीन लोग थे। जिन माताजी को मैने अपनी बर्थ दी थी उन्होंने तो मानो मुझे अपना बेटा ही मान लिया। भाषा की प्रबल बाधा के बावजूद (उन्हें हिंदी/अंग्रेजी नहीं आती थी और मैं तमिल का ‘त’ भी नहीं जानता था) उन्होंने बार-बार मुझे अपनी दर्जनों गठरियों में रखे खाद्य पदार्थ (मैं उनके नाम नहीं ले पा रहा- बहुतेरे थे) ऑफर किए। मैंने हाथ जोड़कर मना करने के संकेत के साथ धन्यवाद  कहा जो उन्हें समझ में नहीं आया। डिब्बे का मुँह खोलकर मेरी ओर उठाए उनके हाथ वापस नहीं जा रहे थे तो मैँने एक टुकड़ा उठाकर ‘थैंक्यू’ कहा और आगे के लिए मना किया, लेकिन वो समझ नहीं रही थीं या समझना नहीं चाहती थी। नतीजा यह हुआ कि उन लोगों के खाने के अनन्त सिलसिले का मैं न सिर्फ़ प्रत्यक्षदर्शी रहा बल्कि उसमें शामिल होता रहा। सुबह के वक्त तो उन्होंने मुझसे पूछना भी जरूरी नहीं समझा और मेरे रेल की रसोई (Pantry) से आये नाश्ते के ऊपर से अपनी जमात का उपमा, साँभर, इडली और ‘बड़ा’ एक साथ लाद दिया। मैंने जिंदगी में पहली बार ये चार सामग्रियाँ एक साथ खायीं।

वे लोग मेरे बारे में जाने क्या-क्या बात करते रहे। मैं समझ नहीं पा रहा था, इसलिए थोड़ी झुँझलाहट भी हो रही थी। एक लुंगीधारी बुजुर्ग ने मुझसे मेरा नाम और काम पूछा था। मैंने जो बताया था वही शब्द उनकी तमिल के बीच-बीच में सुनायी दे रहे थे। जो इस बात के गवाह थे कि उनकी चर्चा का एक् विषय मैं भी था। तभी उन माता जी ने मुझसे कुछ पूछा। मैं तमिल् समझ न सका। दूसरे बुजुर्गवार ने अनुवादक बन कर कहा- तुमरा कितना बड़ा बच्चा है? मैंने बताया- एक बेटी दस साल की और एक बेटा चार साल का। उम्र समझाने के लिए उंगलियों का प्रयोग करना पड़ा। इस पर उनके बीच आश्चर्य व कौतूहल मिश्रित हँसी का फव्वारा फूट पड़ा। जो दूसरे कूपे तक भी गया। मैं चकराकर दुभाषिया ढूँढने लगा।

इस बातचीत का रस लेने ऊपर की बर्थ पर लेटा एक तमिल नौजवान भी नीचे चला आया था। मैंने उससे परिचय चलाया तो पता चला कि वह भैरहवा (नेपाल) से एम.बी.बी.एस. कर रहा था। नीचे वाले बुजुर्ग ने उसकी पीठ ठोकते हुए तस्दीक किया था। मैने उससे पूछा- “what were they talking about me?”

उसने मुस्करा कर कहा – “They said that you have got two children, still you look so young.’’

मैं मन ही मन खुश हो लिया लेकिन चेहरे पर थोड़ी शर्म आ ही गयी। मैंने अपनी ओर उठी हुई उन सबकी प्रश्नवाचक निगाहों को जवाब दिया – “Thanks a lot to all of you… this is one of the rarest complements for me as here I am told to have an older look of face than my actual age” महिलाओं ने तमिल में नकारा और पुरुषों ने मुस्कराकर चुप्पी लगा ली।

गाड़ी जब लखनऊ पहुँची तो मुझे ध्यान आया कि मैं ब्लॉग लेखन की पाँच दिवसीय कार्यशाला में भाग लेने आया हूँ और मुझे पहली बार किसी सत्र की अध्यक्षता करनी है। मैंने सबको एक बार फिर धन्यवाद दिया, अच्छी यात्रा के लिए और दक्षिण भारतीय व्यंजनों के लिए। स्टेशन से बाहर आकर ऑटो लिया और गेस्ट हाउस की ओर चल पड़ा। रास्ते में यहाँ का गर्म मौसम देखकर रमजान के रोजेदारों का ध्यान हो आया।

(२)

Invitationदूर-दूर तक भेंजा गया था निमंत्रण-पत्र 

राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्यौगिकी संचार परिषद(NCSTC), नई दिल्ली और लखनऊ की ‘तस्लीम’ संस्था द्वारा एक पाँच दिवसीय कार्यशाला ‘ब्लॉग लेखन के द्वारा विज्ञान संचार’ विषय पर आयोजित थी। तस्लीम ब्लॉग पर इसकी सूचना अनेकशः प्रकाशित हुई थी। जाकिर भाई और बड़े भाई डॉ. अरविंद जी मिश्र ने मुझसे और मेरे जैसे अनेक ब्लॉगर्स को लखनऊ पहुँचने के लिए कहा था। मेरी यात्रा सुखद रही थी इसलिए आगे भी मामला चकाचक रहने की पूरी आशा थी। मैंने गेस्ट हाउस पहुँचकर नहाने और तैयार होने में बहुत कम समय लगाया। आभासी दुनिया के साथियों से प्रत्यक्ष मुलाकात का सुख पाने की लालसा जोर मार रही थी। ज़ाकिर भाई घटनास्थल… सॉरी कार्यक्रम स्थल से पल-पल की सूचना मोबाइल पर दे रहे थे। मुझे लेने कोई गाड़ी आने वाली थी। उसके खोजे जाने, चल पड़ने और गेस्ट हाउस पहुँच जाने के बीच तीन-चार बार फोन आ गये। मैं घबराकर नीचे उतरकर रिसेप्शन पर जाकर खड़ा हो गया। जो ही दो-चार मिनट बचा लिए जाते।

मैं ठीक दो बजे वहाँ पहुँच गया। अरविंद जी तैयारियों को अंतिम रूप में बुरी तरह व्यस्त थे। शायद उन्होंने ज़ाकिर भाई से कमान अपने हाथों में ले ली थी। ज़ाकिर भाई रमजान के महीने में पसीने से तर-बतर दिखायी पड़े। मैने गर्मजोशी से हाथ मिलाया। वे बोले- “बस दस मिनट में लंच आ रहा है। खा लीजिए फिर शुरू करते हैं।” मैं सोचने लगा कि कार्यक्रम की शुरुआत में सिर्फ़ मेरे खा लेने की प्रतीक्षा आड़े आ रही है तो उसे टाल देते हैं। तभी अरविंद जी ने संयोजक महोदय को झिड़की दी- “मुख्य अतिथि को बैठाकर आप खाना खिलाने की बात कर रहे हैं? चलिए कार्यक्रम शुरू करते हैं” मैं उनसे सहमत होने के एक मात्र उपलब्ध विकल्प पर सिर हिलाते हुए आगे बढ़ गया।

“लेकिन दूसरे भाई लोग कहाँ हैं?” मैंने ज़ाकिर से पूछा। हाल में अभी तीन-चार छात्र टाइप प्रतिभागी दिखा्यी दे रहे थे। कुछ पंजीकरण काउंटर पर अपना नाम लिखा रहे थे। मेरी उम्मीद से उलट वहाँ एक भी ऐसा ब्लॉगर चेहरा नहीं दिखा जो मुझसे पहले न मिला हो। वहाँ थे तो बस अरविंद जी और ज़ाकिर भाई। जाहिर है कि तीसरा सुपरिचित बड़ा नाम मेरा ही था 🙂

‘अवध रिसर्च फाउंडेशन’  नामक निजी संस्था के कार्यालय में ही कार्यशाला आयोजित थी। ज़ाकिर भाई उन खाली कुर्सियों की ओर देख रहे थे जो वर्तमान और भविष्य के ब्लॉगर्स की राह देख रही थीं। आमद बहुत धीमी और क्षीण थी। पूर्व कुलपति प्रो. महेंद्र सोढ़ा जी ठीक समय पर पधार चुके थे। अरविंद जी भी समय की पाबंदी पर जोर देने लगे और कार्यक्रम तत्काल शुरू करने का निर्णय हुआ। मैने मन ही मन ट्रेन वाली उन माता जी को एक बार फिर धन्यवाद दिया जिन्होंने सुबह नाश्ते के नाम पर मुझे दिन भर के लिए भूख से मुक्त कर दिया था। हमने उद्‍घाटन सत्र प्रारम्भ किया। इसका हाल आप यहाँ और यहाँ पढ़ सकते हैं।

उद्‍घाटन सत्र के बाद हमने लजीज व्यंजनों से भरा लंच पैकेट खोला और तृप्त हुए। अरविंद जी ने दो बार बताया कि वे बहुत जिद्दी इंसान हैं और जो बात एक बार तय कर लेते हैं उसे करवाकर मानते हैं। हम उनकी इसकी बात का लोहा मानते हुए खाना खाते रहे। समय की पाबंदी को जबतक जिद्द का विषय न बनाया जाय तबतक उसका भारत में अनुपालन असंभव है। इस बीच NCSTC के प्रेक्षक महोदय भी आ चुके थे और उद्घाटन सत्र की सफलता से गदगद हो रहे थे। सबकी भूख प्रायः शांतिपथ पर चल पड़ी थी।

लेकिन कदाचित्‌ मेरी दूसरी भूख अतृप्त ही रहने वाली थी। मैंने आखिरकार पूछ ही लिया- “भाई साहब, आप ये बताइए कि आपने किस-किसको बुलाया था जो नहीं आये?” ज़ाकिर भाई एक से एक नाम गिनाने लगे और उनके न आने के ज्ञात-अज्ञात कारण बताने लगे। मैं निराश होकर सुनता रहा। हद तो तब हो गयी जब उन्होंने यह बताया कि आज के प्रथम तकनीकी सत्र के मुख्य वक्ता ज़ीशान हैदर ज़ैदी और वक्ता अमित ओम के आने में भी संदेह उत्पन्न हो गया है। सारांशक अमित कुमार का न आना तो पक्का ही है। मैंने अरविंद जी से पूछा कि मेरी ज़िंदगी की ‘पहली अध्यक्षी’ मंच पर अकेले ही गुजरेगी क्या? वे इस सत्र में जाकिर भाई के साथ किनारे बैठकर उद्‌घाटन सत्र पर एक ब्लॉग पोस्ट तैयार करके तुरंत ठेलने की योजना बना रह थे। बोले- “यह सत्र आपके हाथ में है। जैसे चाहिए संचालित करिए।” मैंने कहा- “अध्यक्ष की भूमिका तो चुपचाप बैठने और सबसे अंत में यह बोलने की होती है कि किसने क्या बोला? अब यहाँ तो सीधे स्लॉग ओवर की नौबत आ गयी है।”

इसपर उन्होंने ‘आधुनिक सेमिनारों में अध्यक्ष की बढ़ती भूमिका’ विषय पर  एक लम्बी व्याख्या प्रस्तुत कर दी जिसका सारांश यह था कि अध्यक्ष को पूरा सेमिनार हाइजैक करने का पावर होता है। उसे शुरुआत से लेकर अंत तक वे सारे काम खुद करने पड़ते हैं जो करने वाला कोई और नहीं होता है। दीपक जलाने के लिए पंखा बंद करने से लेकर तेल की बत्ती से अतिरिक्त तेल निचोड़ने तक और अतिथियों व प्रतिभागियों के स्वागत से लेकर धन्यवाद ज्ञापन तक उसे हर उस तत्वज्ञान से गुजरना पड़ता है जो किसी सेमीनार की सफलता के लिए आवश्यक होते हैं। मुझे शरद जोशी द्वारा बताये गये ‘अध्यक्ष बनने के नुस्खे’ बेमानी लगने लगे।

अपनी नैया किनारे पर ही डूबती देख मैंने भगवान को स्मरण किया। बाईचान्स भगवान ने मेरी प्रार्थना सुन भी ली। सत्र प्रारम्भ होने के ठीक पहले ओम जी भागते हुए पहुँच ही तो गये। मैंने उनके लिए फ़ौरन चाय-पानी का इंतजाम करने को कहा। पता चला कि उन्होंने जिंदगी में कभी चाय पी ही नहीं। यह मजाक नहीं सच कह रहा हूँ। मेरे सामने एक ऐसा निर्दोष सुदर्शन नौजवान खड़ा था जिसके शरीर में चाय नामक बुराई का लेशमात्र भी प्रवेश नहीं हो पाया था। ऐसे पवित्र आत्मा के आ जाने के बाद सफलता पक्की थी। अब मेरी भगवान में आस्था और बढ़ गयी।

मैंने एक बार हाल में झाँककर प्रतिभागियों का मुआयना किया। दिल जोर से धड़क गया। कुल जमा पाँच विद्यार्थी यह जानने बैठे हैं कि ‘साइंस ब्लॉगिंग’ क्या है…! इन्हें यह समझाने में दो घंटे लगाने हैं। वह भी तब जब इसी बिन्दु पर अरविंद जी अपना पॉवर-प्वाइंट शो एक घंटा पहले ही प्रस्तुत कर चुके हैं। मैं भी थोड़ा बहुत जो कुछ पता था वह उद्घाटन सत्र में ही उद्घाटित कर चुका हूँ। नये वक्ता ओम जी पर सारा दारोमदार था। इसी उधेड़-बुन में लगा रहा कि पसीना बहाते एक दढ़ियल नौजवान नमूदार हुआ। मानो खुदा ने कोई फ़रिश्ता भेंज दिेया हो। परिचय हुआ तो पता चला कि ये ही जनाब जीशान हैदर ज़ैदी साहब हैं। ये साइंस फिक्शन के माहिर लेखक हैं और वैज्ञानिक विषयों को रोचक शैली में प्रस्तुत करने का हुनर रखते हैं। आप रोजे से थे और अपने मेडिकल कॉलेज में परीक्षा कराकर भागते चले आये थे।

बस फिर क्या था। तकनीकी सत्र शुरू हुआ। लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता और जनसंचार विभाग के बच्चों ने पंजीकरण करा रखा था जिनके आने से हाल भरा-भरा सा लगने लगा। मैने माइक संभाला। सबसे संक्षिप्त परिचय लिया, उनका मन टटोलने के लिए। सभी उत्सुक लगे। जिज्ञासु  विद्यार्थी किसे नहीं भाते? जीशान ने अपनी कुशलता का परिचय दिया। मैंने दुतरफ़ा संवाद सुनिश्चित करने के लिए सभी प्रतिभागियों को टिप्पणी करना अनिवार्य कर दिया। अध्यक्षीय फरमान था। पूरा अनुपालन हुआ। प्रश्नोत्तर का दौर कुछ लम्बा ही हो गया। कुछ प्रश्न अगले सत्रों के लिए टालने पड़े। …सब आज ही जान लोगे तो अगले चार दिन क्या करोगे भाई…? मैने उनका हौसला बढ़ाते हुए पहले हि कह दिया था कि जब मेरे जैसा कोरा आर्ट्स साइड का विद्यार्थी साइंस ब्लॉगिंग सेमिनार में अध्यक्षता कर सकता है तो आप लोग तो बहुतै विद्वान हो। उनका उत्साह बहुत बढ़ गया। अरविंद जी ने उद्‍घाटन के समय कह ही दिया था कि ब्लॉग बनाने में केवल तीन मिनट लगते हैं।

मुझे अंदेशा हुआ कि कहीं ये ऐसा न समझ लें कि ब्लॉग सच्ची में तीन मिनट का खेल है। मैंने फिर संशोधित सूचना दी। ब्लॉग बना लेना उतना भर का काम है जितना एक भारी-भरकम किताब खरीदकर ले आना और पहला पन्ना खोल लेना। असली मेहनत तो उसके बाद शुरू होती है जिसका कोई अंत ही नहीं है। अगर पन्ना पलट-पलत कर पढ़ाई नहीं की गयी तो किताब पर धूल जम जाएगी और खरीदना बेकार हो जाएगा। वही हाल ब्लॉग का है….

अंत में अमित ओम ने सारांशक की भूमिका निभाते हुए सारी बातें दुबारा बताना शुरू कर दिया। बच्चे तबतक काफी कुछ सीख चुके थे इसलिए उठकर जाने लगे। मौके की नज़ाकत भाँपते हुए मैने फिर पतवार थामी और नाव को सीधा किनारे लगाकर खूँटे से बाँध दिया। अब कल खुलेगी।  कल के नाविक कोई और हैं। लेकिन वह बहुत अनुभवी, मेहनतकश और मजेदार बातें करने वालों की टीम है। हम भी नाव में बैठकर यात्रा करेंगे। शायद कल कुछ लखनवी ब्लॉगर्स के दर्शन भी हो जाय।

समय: ११:५५ रात्रि (२७ अगस्त,२०१०)

स्थान: २१३, एन.बी.आर.आई. गेस्टहाउस, गोखले मार्ग, लखनऊ।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

वर्धा में ब्लॉगर सम्मेलन की तिथि दुबारा नोट कीजिए…

26 टिप्पणियाँ

ब्लॉगर सेमिनार की तिथि याद है न आपको? अरे वही जो मैने यहाँ आपको बतायी थी, और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की वेब साइट पर भी इसकी सूचना चिपकायी गयी थी। हिंदीसमय डॉट कॉम पर भी इस वार्षिक सम्मेलन का सूचना-पत्र प्रकाशित हुआ था। इतने जतन के बाद भी यदि आपको इस तिथि की जानकारी नहीं है तो हम इतना ही कर सकते हैं कि ……….आपको दुबारा इस तिथि की याद दिला दें।
हमें अफ़सोस तो है लेकिन क्या करें। मामला ही कुछ ऐसा बन पड़ा कि पिछले साल की ही तरह इस साल भी इसका मुहूर्त ठीक से नहीं देखा जा सका। कुलपति जी ने इसे जल्दी से जल्दी कराने के उद्देश्य से चटपट तारीख तय कर दी थी। लेकिन नतीजा एक बार फिर पिछले साल की ही तरह निकला। जी हाँ, इस बार भी इसकी तिथि एक बार आगे खिसकाने की नौबत आ गयी है। इसलिए जिन्हें पूर्व घोषित तिथि याद नहीं है उन्हें चिन्ता करने की कोई जरूरत नहीं। अब नयी तिथि सोच समझकर तय कर ली गयी है। इसे जरूर याद रखिएगा।
ढूँढिए- फुरसतिया, छींटे और बौछार,सुदर्शन, आलसी, क्वचिदन्यतोऽपि, शब्दों का सफर, प्राइमरी का मास्टर, अनन्त अन्वेषि, अनामिका प्रकाशन आदि-आदिइलाहाबाद का ब्लॉगर सम्मेलन- मील का पत्थर 
दरअसल, इस बार पहले जो तारीख तय की गयी थी वह बहुत अच्छी और शानदार थी। कुछ ज्यादा शानदार, इतनी शानदार कि हम इस दिन की सारी खुशियों को यहाँ वर्धा में समेट ही नहीं पाते। यह बात अलग है कि इसके इतना शानदार होने का ध्यान हमें बाद में आया। यह तारीख इतनी मुकद्दस और खुशियाँ लाने वाली थी कि हम घबरा कर पीछे हट गये। जी हाँ, मुझे कहने में और आपको पढ़ने में थोड़ा अजीब जरूर लगेगा, लेकिन बात ऐसी ही है कि हमें इस मुबारक तारीख की नेमत इतनी बड़ी लगी कि हमने इसे सम्हाल पाने में अपने को नाकाबिल पाया और दूसरी तारीख खोजने चल पड़े।
आप तो समझ ही गये होंगे कि मैं ११-१२ सितंबर की बात कर रहा हूँ जो पहले की तय तारीख थी। अब हमें पता चला है कि उस समय रमजान का आखिरी दिन होगा और सारा देश ईद मुबारक की खुशियों में डूबा रहेगा। ऐसे में यहाँ ब्लॉगरी का मजमा लगाकर अपनी भद्द पिटवाने का इन्तजाम भला कौन करेगा? सो उस समय हम भी घूम-घामकर ईद मनाएंगे। सेवइयाँ खाएंगे और जब यह निपट जाएगा तो नये जोशोखरोश से नयी तारीख पर ब्लॉगरी का सम्मेलन भी कराएंगे। कोशिश होगी कि यह इलाहाबाद सम्मेलन से भी बड़ा हो और ऊंचा उठे।

मित्रों, अब बता ही देता हूँ कि ईद मुबारक की तारीख से टकराने के कारण ब्लॉगर गोष्ठी की तारीख टालकर नयी तारीख तय कर ली गयी है। अब यह सम्मेलन ९-१० अक्टूबर, २०१० को आयोजित होगा। कुलपति जी ने इस तिथि की पुष्टि करते हुए आवश्यक तैयारियों का निर्देश जारी कर दिया है। तिथि परिवर्तन के अतिरिक्त बाकी सब बातें पूर्ववत रहेंगी। ……बाकी बातें क्या? …अच्छा, लीजिए फिर एक बार दुहराए देते हैं:

  • यह कि हिन्दी ब्लॉगरी का राष्ट्रीय सम्मेलन महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा आयोजित किया जा रहा है।
  • सम्मेलन स्थल वर्धा विश्वविद्यालय का प्रांगण होगा, जो महाराष्ट्र में नागपुर से सत्तर किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
  • दो दिवसीय कार्यक्रम के पहले दिन अनुभवी विशेषज्ञों के माध्यम से एक कार्यशाला आयोजित कर हिन्दी चिठ्ठाकारी के तकनीकी कौशल और ब्लॉग प्रबन्धन के उपयोगी सूत्र इच्छुक विद्यार्थियों और अन्य पंजीकृत अभ्यर्थियों  को सिखाये जाएंगे।
  • कार्यशाला में प्रतिभाग के इच्छुक अभ्यर्थियों को निर्धारित प्रारूप पर सूचना प्रेषित करते हुए अपना पंजीकरण कराना होगा। पंजीकरण का कार्य सामान्यतः पहले आओ-पहले पाओ नियम के आधार पर किया जाएगा। निर्धारित संख्या पूरी हो जाने पर पंजीकरण का कार्य कभी भी बन्द किया जा सकता है।
  • प्रत्येक पंजीकृत अभ्यर्थी को रु. १००/- मात्र पंजीकरण शुल्क कार्यशाला प्रारम्भ होने से पहले जमा करना होगा। पंजीकृत अभ्यर्थियों को उनके पंजीकरण के सम्बन्ध में सूचना उनके द्वारा बताये गये ई-मेल पते पर भेंजी जाएगी। पंजीकरण फॉर्म डाक द्वारा अथवा ई-मेल द्वारा सीधे संयोजक को प्रेषित किए जा सकते हैं। बाकी सूचना यहाँ अथवा यहाँ से प्राप्त की जा सकती है।
  • कार्यक्रम के दूसरे दिन देश भर के नामचीन ब्लॉगर्स का सम्मेलन होगा। कम से कम चार अध्ययन पत्र पढ़े जाएंगे और उनपर खुली बहस होगी।
  • इस बार जिस विषय पर चर्चा होगी वह है- ब्लॉगरी की आचार संहिता (blogging ethics)
  • इस विषय के विभिन्न पहलुओं पर अध्ययन पत्र आमन्त्रित किए जा रहे हैं। आशा है हमारे सुधी ब्लोगर्स इस विषय पर अपने विचारों को सुव्यवस्थित ढंग से लिपिबद्ध करके पूरी तैयारी से आएंगे और इस सम्मेलन को एक गम्भीर बहस का मंच बनाएंगे। यदि आप अपनी प्रस्तावित विषयवस्तु की जानकारी पहले से उपलब्ध करा दें तो हमें वार्ताकार और विषय के अनुसार कार्यक्रम निर्धारित करने में सुविधा होगी। अंतिम समय में किसी प्रकार की आकस्मिक प्रस्तुति के प्रस्ताव पर विचार किया जाना सम्भव नहीं होगा। प्रथम आगत-प्रथम स्वागत का सिद्धान्त भी हमारा मार्गदर्शन करेगा।
  • सम्मेलन में विश्वविद्यालय द्वारा आमन्त्रित प्रतिभागियों को आने-जाने हेतु अधिकतम ए.सी. तृतीय श्रेणी के किराये और वर्धा में ठहरने व भोजन इत्यादि की व्यवस्था वि.वि. द्वारा की जाएगी।
  • संयोजक से सम्पर्क का पता:
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
आंतरिक संपरीक्षा अधिकारी
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय
पोस्ट-मानस मंदिर, वर्धा (महाराष्ट्र) 442001
फोन-07152-230912 मोबा.09561646096
ई-मेल: sstwardha@gmail.com
  • आयोजन तिथि दुबारा नोट कीजिए- ९-१० अक्टूबर, २०१०, शनिवार-रविवार।

आशा है कि यह सम्मेलन एक बार फिर हिंदी ब्लॉगिंग की दुनिया में निरंतर हो रही प्रगति का साक्षी बनेगा और यहाँ होने वाला विचार मंथन हिंदी चिठ्ठाकारी की दिशा बताने वाला एक मील का पत्थर साबित होगा। सम्मेलन के संबंध में आपके सुझाव हमारा अमूल्य मार्गदर्शन कर सकते हैं। इस पोस्ट पर आपकी  टिप्पणियों, ई-मेल संदेशों व फोन के माध्यम से  आपके विचारों का स्वागत है।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

गृहस्थी जमती रहेगी, अब काम की बात…

20 टिप्पणियाँ

 

पिछले पन्द्रह दिनों से मैं अपने घर को स्थान्तरित करने की जद्दोजहद में लगा रहा। इस दौरान पोस्ट करने लायक अनेक सामग्री हाथ लगी, बहुत अच्छे आप सबसे बाँटने लायक अनुभव हुए, नये-नये लोगों से मुलाकात हुई और बिल्कुल नये वातावरण में स्थापित होने के अनेक खट्टे-मीठे अनुभव भी हुए। इन सब बातों को मौका देखकर आपसे बताऊंगा। लेकिन अभी तो एक गम्भीर कार्यक्रम आ पड़ा है। इसलिए सबसे पहले यह काम की बात बता दूँ।

वर्धा में पाँव रखते ही कुलपति जी ने मुझे उस राष्ट्रीय ब्लॉगर गोष्ठी की याद दिलायी जो पिछले वर्ष इलाहाबाद में जबरदस्त सफलता के साथ सम्पन्न की गयी थी। (जो नये साथी हैं उन्हें यहाँ और यहाँ भी उस गोष्ठी की रिपोर्ट मिल जाएगी। फुरसतिया रिपोर्ट की गुदगुदी यहाँ है।) जैसा कि आप जानते हैं, वर्धा वि.वि. द्वारा इसे एक नियमित वार्षिक आयोजन बनाने का फैसला लिया गया था। इसी क्रम में कल कुलपति जी ने विशेष कर्तव्य अधिकारी राकेश जी को इस वर्ष के आयोजन की हरी झण्डी दिखा दी। फौरन राकेश जी ने एक विज्ञप्ति जारी कर मुझे इसकी कमान सौंप दी है। आप इसे देखिए-

ब्लॉगर गोष्ठी २०१०
ब्लॉगर गोष्ठी २०१० 001 

मुझे पूरा विश्वास है कि इस गोष्ठी को सफल बनाने के लिए आप सबका भरपूर सहयोग मुझे मिलेगा। आप की राय की प्रतीक्षा रहेगी। आप अपने सुझाव और प्रस्ताव अपनी टिप्पणियों से या सीधे मुझे ई-मेल से भेंज सकते हैं।

नोट: वर्धा आने के बाद मुझे आगाह किया गया कि बरसात की शुरुआत होने पर शुष्क पहाड़ों के ‘पंचटीला’ पर बसे इस विश्वविद्यालय के परिसर में प्रायः साँप और बिच्छू निकलते रहते हैं, जो जहरीले भी होते हैं। इसलिए सावधानी बरतना बहुत जरूरी है। मुझे वे जीवधारी तो अबतक दिखायी नहीं पड़े हैं, लेकिन मेरी पिछली पोस्ट पर आयी एक अनामी टिप्पणी ने यह भान करा दिया कि वह चेतावनी सिर्फ़ उन भौतिक जीवों के बारे में नहीं थी। परिणाम स्वरूप मुझे यहाँ भी सुरक्षा बरतते हुए टिप्पणियों पर मॉडरेशन का विकल्प चुनना पड़ा है। आशा है आप थोड़ा कष्ट उठाकर भी अपनी राय से हमें अवगत कराते रहेंगे। सादर!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)