रेलवे की जुगाड़ सुविधा…

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समय: प्रातःकाल 6:30 बजे

स्थान: बर्थ सं.18 – A1, पटना-सिकंदराबाद एक्सप्रेस

इस पोस्ट को लिखने का तात्कालिक कारण तो इस ए.सी. कोच का वह ट्वॉएलेट है जिससे निकलकर मैं अभी-अभी आ रहा हूँ और जिसके दरवाजे पर लिखा है- ‘पाश्चात्य शैली’। लेकिन उसकी चर्चा से पहले बात वहाँ से शुरू करूँगा जहाँ पिछली पोस्ट में छोड़ रखा था।

आप जान चुके हैं कि वर्धा से कार में इलाहाबाद के लिए चला था तो एक चौथाई रास्ता टायर की तलाश में बीता। जबलपुर में टायर मिला तो साथ में एक पोस्ट भी अवतरित हो ली। आगे की राह भी आसान न थी। रीवा से इलाहाबाद की ओर जाने वाला नेशनल हाई-वे पिछले सालों से ही टूटा हुआ है। अब इसकी मरम्मत का काम हो रहा है। नतीज़तन पूरी सड़क बलुआ पत्थर, पथरीली मिट्टी और बेतरतीब गढ्ढों का समुच्चय बनी हुई है। पिछले साल इसी रास्ते से वर्धा जाते समय मुझे करीब चालीस किमी. की दूरी पार करने में ढाई घंटे लग गये थे। इसलिए इस बार मैं सावधान था।

मैंने अपने एक मित्र से वैकल्पिक रास्ता पूछ लिया था जो रीवा से सिरमौर की ओर जाता था; और काफी घूमने-फिरने के बाद रीवा-इलाहाबाद मार्ग पर करीब साठ किमी आगे कटरा नामक बाजार में आकर मिल जाता था। रीवा से सिरमौर तक चिकनी-चुपड़ी सड़क पर चलने के बाद हमें देहाती सड़क मिली जो क्यौटी होते हुए कटरा तक जाती थी। हमें दर्जनों बार रुक-रुककर लोगों से आगे की दिशा पूछनी पड़ी। एक गाँव के बाहर तिराहे पर भ्रम पैदा हो गया जिसे दूर करने के लिए हमें पीछे लौटकर गाँव के भीतर जाना पड़ा। अँधेरा हो चुका था। कोई आदमी बाहर नहीं दिखा। एक घर के सामने गाड़ी रोककर ड्राइवर रास्ता पूछने के लिए उस दरवाजे पर गया। दो मिनट के भीतर कई घरों के आदमी हाथ में टॉर्च लिए गाड़ी के पास इकठ्ठा हो गये। फिर हमें रास्ता बताने वालों की होड़ लग गयी। कम उम्र वालों को चुप कराकर एक बुजुर्गवार ने हमें तफ़्सील से पूरा रास्ता समझा दिया। उनके भीतर हमारी मदद का ऐसा जज़्बा था कि यदि हम चाहते तो वे हमारे साथ हाइ-वे तक चले आते।

खैर, आगे का करीब चालीस किमी. का सर्पाकार देहाती रास्ता प्रायः गढ्ढामुक्त था। रात का समय था इसलिए इक्का-दुक्का सवारी ही सामने से आती मिली। सड़क इतनी पतली थी कि किसी दुपहिया सवारी को पार करने के लिए भी किसी एक को सड़क छोड़ने की नौबत आ जाती। जब हम हाइ-वे पर निकल कर आ गये तो वही क्षत-विक्षत धूल-मिट्टी से अटी पड़ी सड़क सामने थी। उफ़्‌… हम हिचकोले खाते आगे बढ़ते जा रहे थे और सोचते जा रहे थे कि शायद हमारा वैकल्पिक रास्ते का चुनाव काम नहीं आया। खराब सड़क तो फिर भी मिल गयी। हमने कटरा बाजार में गाड़ी रुकवायी। सड़क किनारे दो किशोर आपस में तल्लीनता से बात कर रहे थे। उनमें से एक साइकिल पर था। जमीन से पैर टिकाए। दूसरा मोबाइल पर कमेंट्री सुन रहा था और अपने साथी को बता रहा था।

मैंने पूछा- भाई, यह बताओ यह सड़क अभी कितनी दूर तक ऐसे ही खराब है?

लड़का मुस्कराया- “अंकल जी, अब तो आप ‘कढ़’ आये हैं। पाँच सौ मीटर के बाद तो क्या पूछना। गाड़ी हवा की तरह चलेगी।” उसने अपने दोनो हाथों को हवा में ऐसे लहराया जैसे पानी में मछली के तैरने का प्रदर्शन कर रहा हो। जब हमने बताया कि हम हाई-वे से होकर नहीं आ रहे हैं बल्कि सिरमौर होकर आ रहे हैं तो उसने हमें शाबासी दी और बुद्धिमान बता दिया। बोला- जो लोग हाई-वे से आ रहे हैं उनकी गाड़ी लाल हो जाती है। गेरुए मिट्टी-पत्थर की धूल से। आप अपनी कार  ‘चीन्ह’  नहीं पाते। हमें समझ में आ गया कि आगे का रास्ता बन चुका है। हम खुश हो लिए और आगे चल दिए। इलाहाबाद तक कोई व्यवधान नही हुआ।

इलाहाबाद में सरकारी काम निपटाने के अलावा अनेक लोगों से मिलने का सुख मिला। आदरणीय ज्ञानदत्त पांडेय जी के घर गया। श्रद्धेया रीता भाभी के दर्शन हुए। सपरिवार वर्धा जाकर नौकरी करने के हानि-लाभ पर चर्चा हुई। गुरुदेव के स्वास्थ्य की जानकारी मिली। लम्बे समय तक चिकित्सकीय निगरानी में रहने और लगातार दवाएँ लेते रहने की मजबूरी चेहरे पर स्थिर भाव के रूप में झलक रही थी। वे इस बार कुछ ज्यादा ही गम्भीर दिखे।

प्रयाग में मेरे पूर्व कार्यस्थल-कोषागार से जुड़े जितने भी अधिकारी-कर्मचारी और इष्टमित्र मिले उन सबका मत यही था कि मुझे अपना प्रदेश और इलाहाबाद छोड़कर बाहर नहीं जाना चाहिए था। इस विषय पर फिर कभी चर्चा होगी।

वर्धा वापस लौटने का कार्यक्रम रेलगाड़ी से बना। दिन भर मंगल-व्रत का फलाहार लेने के बाद शाम को एक मित्र की गृहिणी के हाथ की बनी रोटी और दही से व्रत का समाहार करके मैं स्टेशन आ गया। अनामिका प्रकाशन के विनोद शुक्ल और वचन पत्रिका के संपादक प्रकाश त्रिपाठी गाड़ी तक विदा करने आये। उन्हें हार्दिक धन्यवाद देकर हम विदा हुए। रात में अच्छी नींद आयी।

आज सुबह जब हम ‘पाश्चात्य शैली’ के शौचालय में गये तो वहाँ का अद्‌भुत नजारा देखकर मुस्कराए बिना न रह सके। साथ ही पछताने लगे कि काश कैमरा साथ होता। फिलहाल ट्वॉएलेट की देखभाल करने वालों के बुद्धि-कौशल और गरीबी में भी काम चला लेने की भारतीय प्रतिभा का नमूना पेश करते इस ए.सी. कोच के पश्चिमी बनावट वाले शौचालय की कुछ तस्वीरें मैंने अपने मोबाइल से ही खींच डाली हैं। खास आपके लिए। देखिए न…

IMG0069A भारत की एक बड़ी आबादी जैसे स्थानों पर शौच आदि से निवृत्त होती है उससे बेहतर सफाई है यहाँ। यह दीगर बात है कि सीट को ट्‍वाएलेट पेपर से अपने हाथों साफ़ करने के बाद फोटो लेने का विचार आया।
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IMG0070A ट्‍वाएलेट पेपर …? पूरा बंडल उपलब्ध है जी। भले ही इसे रखे जाने का मूल बक्सा बेकार हो गया है लेकिन ठेकेदार ने इसे पॉलीथीन से बाँधकर वहीं लटका छोड़ा है। इसे प्रयोगार्थ निकालने के लिए थोड़ी ही मशक्कत करनी पड़ी।
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IMG0061A हाथ धुलने के लिए पेपर सोप रखने की कोई जरूरत नहीं। रेलवे द्वारा लिक्विड सोप की सुविधा गारंटीड है। इसे रखने की डिबिया अपने स्थान से उखड़ गयी तो भी कोई बात नहीं।  ‘रेलनीर’  की बोतल तो है। साबुन भरकर बेसिन के बगल में ही लटका रखा है। जी भर इस्तेमाल करें।
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IMG0062A ट्‍वाएलेट पेपर रोल को पॉलीथीन से बाँध कर रखने का काम बहुत बुद्धिमानी से किया गया है। स्टील फ्रेम में न होने के बावजूद यह नाचता भी है और थोड़ी  मेहनत करने पर टुकड़ों में निकल भी आता है। मनोरंजक भी है और स्किल टेस्टिंग भी…
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IMG0068A येजो चमक रहे हैं उनमें एक स्टील का जग है, पानी की टोटी है, और स्वयं पानी है जो नीचे जमा है। जो नहीं चमक रही है वह लोहे की जंजीर है जिससे जग बँधा हुआ है। कौन जाने यह कीमती जग किसी को भा जाय और दूसरे यात्रियों को परेशानी उठानी पड़े। इसीलिए बाँध के डाल दिया होगा।
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IMG0066A यदि आप पेपर का प्रयोग नहीं कर पाते और संयोग से टंकी का पानी खत्म होने के बाद आपकी बारी आयी तो क्या करेंगे? चिंता मत करिए…। एक बोतल एक्स्ट्रा पानी भी में डाल दिया गया है उधर कोने में…
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रेल  हमारी सुविधाओं का कितना
ख्याल रखती है

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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तेरा बिछड़ना फिर मिलना…

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हे तात,

आज तुम वापस घर लौट आये। मन को जो राहत मिली है उसका बयान नहीं कर पा रहा हूँ। तुम्हारा साथ वापस पाकर मुझे उस टाइप की खुशी मिल रही है जैसी सीमा पार गुमशुदा मान लिए गये सैनिक की देशवापसी पर उसके घर वालों को होती है। कोई उम्मीद नहीं कर रहा था कि तुम सकुशल अपने घर वापस आ जाओगे। वह भी जिस बुरी हालत में तुमने घर छोड़ा था और जिस तरह से तुम्हारा परिचय पत्र भी खो चुका था, मुझे कत्तई उम्मीद नहीं थी कि इतनी बड़ी दुनिया में कोई तुम्हें पहचानने को तैयार होगा, तुम्हारी सेवा-सुश्रुषा करेगा, तुम्हारी बीमारी की मुकम्मल दवा करेगा और फिर पूरी तरह स्वस्थ हो जाने पर हवाई टिकट कटाकर तुम्हें मेरे घर तक पहुँचवा देगा।

मैने सोचा कि तुम्हें वापस भेजने वाले को धन्यवाद दूँ, लेकिन इस पूरी कहानी में इतने अधिक लोग सहयोगी रहे हैं और उनमें अधिकांश को मैं जान-पहचान भी नहीं पा रहा हूँ इसलिए इस सार्वजनिक मंच से एक बार ही उन सबको सामूहिक धन्यवाद ज्ञापित कर देता हूँ।

तुम्हारे साथ मैंने जो किया वह कत्तई अच्छा व्यवहार नहीं कहा जा सकता। अपने सुख के लिए मैंने तुम्हारे साथ बहुत नाइंसाफी की। जब भी कभी हम साथ चले मैं अपना सारा बोझ तुम्हारे कंधे पर डाल देता और खुद मस्ती से इतराता चला करता। तुम इतने निष्ठावान और सेवाधर्मी निकले कि कभी उफ़्‌ तक नहीं की, कोई शिकायत नहीं की। शायद तुमने अपना माथा ठोंक लिया कि जब मैंने तुम्हें तुम्हारे जन्मदाता से रूपयों के बदले खरीदा है तो आखिरी साँस तक मेरी सेवा करना ही तुम्हारा कर्तव्य है, तुम्हारी नियति है। बिल्कुल गूंगा गुलाम बनकर रहे तुम मेरे साथ। जरूरत पड़ने पर तुमने मेरे भाइयों की सेवा भी उसी तत्परता से की। कोई भेद नहीं रखा।

एक बार तो तुम मेरे एक मित्र को लोक सेवा आयोग तक इंटरव्यू दिलाने चले गये। उसने पता नहीं तुममें क्या खूबी देखी कि एक दिन के लिए तुम्हें मुझसे मांगकर अपने साथ ले गया। मैने समझाया भी कि यह तो अभी बिल्कुल नया-नया आया है, मै भी इसके व्यवहार से भली भाँति परिचित नहीं हूँ। तुम्हें पता नहीं रास आये या न आये। वह बोला- “यह नया है तभी तो ले जा रहा हूँ। मुझे अनुभवी और पुराने साथियों के साथ ही तो परेशानी होती है। जब तक साथ रहेंगे, रास्ते भर पता नहीं क्या-क्या चर्र-पर्र करते रहेंगे। बार-बार मूड डिस्टर्ब होने की आशंका रहेगी। कॉन्फिडेन्स गड़बड़ाने का डर बना रहेगा। इंटरव्यू तो अपने दिमाग से देना है, फिर रास्ते भर इनकी सिखाइश और बक-बक की ओर ध्यान क्यों बँटाना? यह नया है तो मुझमें कोई खामी तो नहीं दिखाएगा। इसके चेहरे पर जो चमक है वह आत्म विश्वास बढ़ाने वाली है। यह खुशी से शांतिपूर्वक साथ चलेगा और सुकून से बिना कोई खटपट किए वापस आएगा। मुझे कुछ आराम ही रहेगा।” मैंने बिना कुछ कहे तुम्हें उसके साथ भेज दिया। तुम्हें तो घूमने का बहाना चाहिए। और क्या?

तुमने मुझसे कभी कुछ मुँह खोलकर नहीं मांगा। तुम दरवाजे के बाहर बैठे रहते या घर के कोने में चुपचाप दुबके रहते। टकटकी लगाये रहते कि मैं कब तुम्हें अपने साथ ले चलने वाला हूँ। तुमने खुद अपना खयाल कभी नहीं रखा। मुझे ही जब तुम्हारी दीन-हीन शक्ल-सूरत पर तरस आती तो थोड़ी बहुत साफ़-सफाई के लिए किसीसे कह देता या खुद ही हाथ लगा देता। वैसे मुझे यह तरस भी अपने स्वार्थ में ही आती। तुम्हें मेरे साथ चलना होता था, इसलिए तुम्हें मैली-कुचैली हालत में रखता तो अपनी ही नाक कटती न! जब किसी अच्छी शादी-व्याह, जन्मदिन पार्टी, सालगिरह इत्यादि का निमन्त्रण हो या खास सरकारी मीटिंग में बड़े अधिकारियों से मिलने जाना हो तो मैं तुम्हे कुछ ज्यादा ही महत्व देता। तुम्हारी सादगी और गरिमापूर्ण उपस्थिति से मुझमें आत्मविश्वास बढ़ जाता। तुम बोल नहीं पाते वर्ना मैं पूछता कि जिस दिन मेरी ही तरह तुम्हारी विशेष साज-सज्जा होती उस दिन तुम जरूर गेस कर लेते होगे कि किसी खास मौके पर बाहर निकलना है।

तुमने जब भी मेरे साथ कोई यात्रा की मुझे सुख देने का पूरा प्रयास किया। मेरी सुविधाओं का ख़याल रखते रहे। मेरा बोझ ढोते रहे। ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर तुम आगे-आगे चलकर मेरे लिए उसकी तकलीफ़ कम करने का जतन करते रहे। तुमने इतना तक खयाल रखा कि मेरे पाँव में काँटे न चुभने पाये। मुझसे पहले तुम जमीन पर पाँव रखते ताकि काँटे हों भी तो तुम्हे पता चल जाय और मुझे कोई धोखा न हो। सड़क जल रही हो तो मुझे उसपर नंगे पाँव नहीं चलने देते। तुमने अपने लिए कीचड़ भरा रास्ता चुन लिया होगा लेकिन मेरे पाँव कभी गीले नहीं होने दिया। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ कि मैं निरा स्वार्थी और अहंकारी बनकर तुम्हारा खरीदार होने के दंभ में तुम्हारी चमड़ी से एक-एक पैसा वसूल कर लेने की फिराक़ में लगा रहा जबकि तुमने बिना कोई शिकायत किए मेरी सेवा को अपना धर्म समझा। मैने तुम्हे जैसे चाहा वैसे इस्तेमाल किया। तुम्हारी राय या सहमति लेने की जरुरत भी नहीं समझी। लेकिन हद तो हद होती है। मैने एक बार हद पार की और तुमसे हाथ धोने की नौबत आ गयी।

हुआ यों कि एक बार मैं एक पहाड़ी इलाके में यात्रा पर गया। किसी ठंडी पहाड़ी का इलाका नहीं था बल्कि वहाँ कुछ पथरीले शुष्क टीले थे जिनके ऊपर एक वैश्विक शिक्षण संस्था आकार ले रही थी। उसी संस्था के मुखिया ने मुझे बुला भेंजा था। सुबह-सुबह हम टीले पर बने पथरीले रास्ते से ऊपर की ओर टहलते हुए जा रहे थे। तभी मुझे दूर चोटी पर कुछ परिचित लोग दिखायी दिए। वे लोग भी आगे की ओर बढ़ रहे थे। दूरी इतनी थी कि उन्हें आवाज देकर रोका नहीं जा सकता था। वे लोग आपस में बात करते हुए तेज कदमों से बढ़े जा रहे थे। मैने आव देखा न ताव, उन्हें पाने के लिए दौड़ लगाने लगा। मुझे तुम्हारा भरोसा कुछ ज्यादा ही था। लेकिन शायद तुम दौड़ने के लिए बने ही नहीं थे। संकोच में तुम कुछ बोल न सके। मेरे साथ दौड़ लगाते रहे। हमने उन लोगों को करीब एक किलोमीटर की दौड़ लगाकर पकड़ तो लिया लेकिन जल्द ही मुझे तुम्हारी तकलीफ़ का पता चल गया। मेरी ऊँखड़ी हुई साँस तो कुछ देर में स्थिर हो गयी लेकिन तुम्हारा हुलिया जो बिगड़ा तो सुधरने का नाम नहीं ले रहा था। लगभग कराहने की आवाज करने लगे तुम। मैंने तुम्हें सम्हालते हुए चलने में मदद की और गेस्ट हाउस में आने के बाद लिटाकर छोड़ दिया। फिर बाकी समय तुम मेरा साथ नहीं दे सके। तुम्हारे तलवे में फ्रैक्चर सा कुछ हो गया था। मुझे वापसी यात्रा में तुम्हें टांग कर चलना पड़ा।

जब हम घर वापस लौट गये तो तुम्हारी दुरवस्था देखकर मुझे लगा कि अब तुम मेरे किसी काम के नहीं हो। मुझे तुम्हारे ऊपर दया तो आ रही थी लेकिन उससे ज्यादा मुझे अपने हजार रूपए बेकार चले जाने का अफ़सोस होने लगा। तुम कोने में पड़े रहते मुझे आते-जाते देखते रहते। तुम्हारी देख-भाल में कमी आ गयी और तुम्हारा स्वास्थ्य और बिगड़ता गया। घर में एक बेकार का बोझ बन गये तुम। श्रीमती जी ने एक बार संकेत किया कि इसे किसी मंदिर या अनाथालय पर छोड़ आइए। किसी भिखारी के हाथ लग जाएगा तो शायद उसके काम आए। सुनकर मेरा कलेजा काँप गया। मुझे चिंता होने लगी कि मेरी अनुपस्थिति में कहीं तुम्हें ठिकाने न लगा दिया जाय। मैं तुम्हारे साथ पैदा हुई समस्या के एक सम्मानजनक निपटारे का रास्ता ढूँढने लगा।

(2)

एक दिन बाजार में घूमते हुए मुझे वही आदमी मिल गया जिससे मैने तुम्हें खरीदा था। मैं फौरन उसके पीछे लपक लिया। भीड़-भाड़ के बीच उससे बात करना मुश्किल था। उसने मुझे पहचान तो लिया लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा था कि उससे कैसे बात करूँ। उसने शायद मेरे असमंजस को भाँप लिया। वह बातचीत में गजब का चालाक था। उसी ने शुरुआत की- “ कहिए साहब, जो सामान मैने आपको दिया था वह अच्छा चल रहा है न? कोई शिकायत वाली बात तो नहीं है?” मुझे अब तरकीब सूझी। मैने चेहरे पर निराशा के भाव मुखर किए और बोला- “तुम्हारा सामान तो वैसे बड़े काम का था, लेकिन अब खराब हो गया है। घर में बेकार पड़ा रहता है। कहीं आने-जाने लायक नहीं रह गया है। अगर उसे वापस ले लेते तो ठीक रहता। जिस बुरी हालत में वह है उसको अब उसे बनाने वाले (जन्म देने वाले) ही ठीक कर सकते हैं। उसे उसकी कम्पनी को (अपनी माँ के पास) भेज दिया जाय तो शायद उसे नयी जिन्दगी मिल जाय।”

जानते हो, तुम्हें मेरे हाथों बेंचते समय उसने यह कहा था कि दो-तीन महीने में कोई शिकायत हो तो वापस लाइएगा, दूसरा ले जाइएगा। मेरे पास बहुत से हैं। मैंने उसे इस ‘वारण्टी’ की याद दिलायी। हाँलाकि उसका चेहरा यह साफ शक़ करता दीख रहा था कि यह खरीद-फ़रोख्त तीन महीने के भीतर की नहीं है। लेकिन मैने जब यह कहा कि इस सामान की रसीद तो है नहीं कि  सबूत के तौर पर पेश कर दूँ। तुम्हें अगर मेरी बात पर भरोसा हो तो उसे वापस ले लो नहीं तो मेरा घाटा तो हो ही रहा है। वह जब किसी काम का नहीं रह जाएगा तो हम कबतक उसे ढोते रहेंगे।

मेरी इस बात का जाने क्या असर हुआ कि वह तुम्हें वापस लेने पर राजी हो गया। बस एक शर्त रख दी कि तुम्हारे असली जन्मदाता जो निर्णय लेंगे उसे ही सबको मानना पड़ेगा। पैसा वापस होने की कोई उम्मीद न करें। उसने साफ़ कहा कि मैं तो दो पैसे के लिए केवल मध्यस्थ की भुमिका निभाता हूँ। माल कोई और बनाता है, इस्तेमाल कोई और करता है। मैं उन्हें केवल मिलवा देता हूँ। …उस दिन मैंने सिर्फ़ इस बात पर संतोष किया था कि घर में बेकार हो चुकी एक चीज हट गयी। तुम चूँकि अपने मूल स्थान वापस जा रहे थे इसलिए एक प्रकार के अपराधबोध से मुक्त होने का भाव तो मन में था ही, लेकिन अपने रूपये डूब जाने की आशंका से मन दुखी भी था।

आज जो तुम पूरी तरह से स्वस्थ होकर वापस मेरे घर मेरी सेवा करने के लिए भेंज दिए गये हो तो मुझे अजीब से भावों ने घेर लिया है। तुम्हें देखकर यह लगता ही नहीं है कि मेरे साथ उस पथरीली दौड़ में तुम्हारे पाँव जाया हो गये थे। तुम्हारा  यह लिम्ब ट्रान्सप्लांट किसी कुशल सर्जन का किया लगता है। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं है। सोच रहा हूँ कि मेरे कारण तुम विकलांग हो गये, लेकिन तुम्हारी चिकित्सा में मुझे दमड़ी भी नहीं लगानी पड़ी। मैंने बड़ी चतुराई से उस बाजार की साख पर प्रश्नचिह्न लगा दिया जिस बाजार से मैने तुम्हें खरीदा था। इसका असर यह हुआ कि अगले ने अपनी जबान की रक्षा के लिए सबकुछ दाँव पर लगा दिया।

वह चाहता तो मुझसे टाल-मटोल कर यूँही टहला देता। वह भी तब जब मैने उस शहर से अपने ट्रान्सपर की जानकारी भी उसे दे दी थी। लेकिन वह बन्दा या तो अपनी जबान का बहुत पक्का था या मेरी लानत-मलानत का असर इतना जबर्दस्त था कि उसने मेरा नया पता नोट किया और अपना मोबाइल नम्बर दिया। एक गुप्त कोड नम्बर भी बताया जिसका उल्लेख कर देने भर से वह पूरी बात समझ जाता और संकेत में ही तुम्हारी ‘लेटेस्ट कंडीशन’ बताता रहता। कब तुम अपनी माँ के पास पहुँचे। कब तुम्हारी जाँच करायी गयी, कब ऑपरेशन हुआ। कब अस्पताल से बाहर आये। मुझे पता चला कि तुम्हारे घर वाले तुम्हें हमेशा के लिए वापस रखने को राजी नहीं हुए। यह तय हुआ कि जिसने तुम्हें एक बार खरीद लिया उसी की सेवा में तुम्हें जाना चाहिए। भले ही तुम्हें सेवा के लायक बनाने में उन्हें बड़ा खर्च उठाना पड़े। डॉक्टर ने कहा कि खराब हो चुके अंग को पूरा ही बदलना पड़ेगा। परिवार बड़ा था। जाने कैसे स्पेयर अंग का जुगाड़ हो गया। यदि यह कृत्रिम अंग प्रत्यारोपण है तो अद्‌भुत है। बिल्कुल ओरिजिनल जैसा।

मुझे क्या, मैं तो बहुत खुश हूँ। खोयी पूँजी लौट आयी है। वह भी घर बैठे ही। बस फोन कर-करके उस मध्यस्थ को ललकारता रहा। उसने भी अपनी जबान पूरी करने की कसम खा ली थी। उसने तुम्हारे परिवार को फोन कर-करके तुम्हारे ठीक हो जाने के बाद अपने पास बुला ही लिया। तुम बोल नहीं सकते इसलिए तुम्हारे गले में मेरे नये घर का पता लिखकर टाँग दिया और रवाना कर दिया। तुम्हें पहुँचाने वह खुद तो नहीं आया लेकिन वहाँ से यहाँ तक पड़ने वाले हर स्टेशन पर उसके भाड़े के आदमी मौजूद थे। मुझे पता चला कि उस आदमी ने तुम्हारी बीमार हालत में तुम्हें तुम्हारे जन्मस्थान तक हवाई जहाज से भेंजा। तुम्हारी वापसी यात्रा भी हवाई मार्ग से हुई है।

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मुझे दो सप्ताह से तुम्हारा इन्तजार था। इंटरनेट बता रहा था कि तुम दिल्ली से नागपुर ्के लिए २६ तारीख को उड़ चुके हो। बाद में २७ ता. को  नागपुर से वर्धा भी चले आये हो। लेकिन वर्धा स्टेशन से मेरे घर तक आने में तुम्हें पन्द्रह दिन लग गये। आज पता चला कि जिस आदमी को तुम्हें पहुँचाने की जिम्मेदारी दी गयी थी वह बीमार हो गया था। तुम्हें अपने घर पर ही रखे हुए था।  आज पूछताछ करवाने पर वह तुम्हें लेकर आया।14092010912

आज जब तुम मेरे घर वापस आये हो तो लम्बी यात्रा की थकान तुम्हारे चेहरे पर साफ झलक रही है। तुम्हारी `बेडिंग’ के भी चीथड़े हो गये हैं। जाने कितने लोगों के हत्थे चढ़ने के बाद तुम अपने असली ग्राहक के पास वापस आ गये। अब सबकुछ ठीक हो जाएगा।

अब मैं तुम्हारे साथ कोई बुरा बर्ताव नहीं कर सकता। अपने पिछले दुर्व्यवहार पर पछता रहा हूँ। अब तुम्हें उस तरह तंग करने की सोच भी नहीं सकता। कल सुबह तुम्हारी मालिस-पॉलिश अपने हाथ से करूंगा। तुम्हारी आज जो सूरत है वह मेरी उस गलती की याद दिला रही है। उसे हमेशा याद रखने के लिए तुम्हारी एक तस्वीर खींच लेता हूँ। बुरा मत मानना। अब तो मैं तुम्हें बहुत लाड़-प्यार से रखने की सोच रहा हूँ। चिंता मत करना इस बीच अपनी सेवा के लिए मैने कुछ और ‘साधन’ जुटा लिए हैं। सारा बोझ अकेले तुमपर नहीं डालूंगा। तुमको दौड़ पर साथ ले जाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। अब तुम अपनी जमात के वी.आई.पी. हो चुके हो। बस, अब इतना ही। तुम्हारा बोधप्राप्त हितचिंतक…

 

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

रेल में पकवान और कार्यशाला वीरान… लखनऊ के ब्लॉगर नदारद…?

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जब मैंने वर्धा से लखनऊ आने के लिए टिकट बुक कराया तो मन में यह उत्साह था कि हिंदी ब्लॉगरी की यात्रा मुझे एक ऐसे मुकाम पर ले जाने वाली है जहाँ अपनी तहज़ीबों और नफ़ासत के लिए मशहूर शहर की एक शानदार शाम अपने् प्रिय ब्लॉगर मित्रों की खुशगवार सोहबत में बीतेगी। मैंने कुलपति जी से अनुमति माँगी और उन्होंने सहर्ष दे दी। एक आदरणीय ब्लॉगर मित्र ने ही टिकट पक्का कराया और मैं सेवाग्राम से लखनऊ के लिए राप्तीसागर एक्सप्रेस पर सवार हो लिया।

जब मैं अपने टिकट पर अंकित बर्थ संख्या पर पहुँचा तो देखा कि मेरे कूपे में तमिलभाषी तीर्थयात्रियों के एक बहुत बड़े समूह का एक हिस्सा भरा हुआ था। नीचे की मेरी बर्थ पर एक प्रौढ़ा महिला सो रही थीं। उनकी गहरी नींद में खलल डालने में मुझे संकोच हुआ। थोड़ी देर मैं चुपचाप खड़ा होकर सोचता रहा। अगल-बगल की बर्थों पर भी तीर्थयात्री या तो जमकर बैठे हुए थे, सो रहे थे या उनका सामान लदा हुआ था। मैने अपना बैग उठाकर दुबारा पटका ताकि उसकी आवाज से मेरे आने की सूचना उनके कानों तक पहुँच सके। (बाद में मैंने ध्यान दिया कि अधिकांश ने अपने कानों में सचमुच की रूई डाल रखी थी। खैर…) दोपहर के भोजन के बाद की नींद थी, शायद ज्यादा गहरी नहीं थी। सामने की बर्थ पर लेटी हुई दूसरी महिला ने आँखें खोल दीं। उन्होंने मेरी सीट वाली महिला को हल्की आवाज देकर कुछ कहा- शायद यह कि अब उठ जाओ, जिसके आने का अंदेशा था वह आ चुका है- इन्होंने आँखें खोल दी। मुझे खड़ा देखकर झटपट अपने को समेटने की कोशिश करने लगीं। 

लेकिन यह इतना आसान नहीं था। ईश्वर ने उन्हें कुछ ज्यादा ही आराम की जिंदगी दी थी। जिसका भरपूर लाभ उठाते हुए उन्होंने काफ़ी वजन इकठ्ठा कर लिया था। वजन तो उस समूह की प्रायः सभी महिलाओं और पुरुषों का असामान्य था। कोई भी फुर्ती से उठने-बैठने लायक नहीं था। मुझे मन हुआ कि कह दूँ- आप यूँ ही लेटी रहिए, मैं कोई और बर्थ खोजता हूँ। उनकी आँखों में भी कुछ ऐसी ही अपेक्षा झाँक रही थी तभी बगल की बर्थ पर लेटे एक भीमकाय बुजुर्ग ने टूटी हिंदी में कहा कि ‘वो ऊपर चढ़ नहीं सकता’। मैंने ऊपर की साइड वाली सीट देखी- खाली थी। मैंने झट ऊपर अपना लैपटॉप का बैग चढ़ाया, प्रौढ़ा माता जी को लेटे रहने का इशारा किया और अपना ट्रेवेल बैग खिड़की वाली बर्थ के नीचे फिट करने लगा। उनकी आँखों में धन्यवाद और आशीर्वाद के भाव देखकर मैं भावुक हो लिया, बल्कि मेरी अपनी माँ याद आ गयी जो बहुत दिनों बाद मेरे पास रहने का समय निकालकर वर्धा आ पायी हैं।

आयोजकों ने ए.सी.थ्री की सीमा पहले ही समझा दी थी। ऐसे में लगातार लेटकर यात्रा करने की कल्पना से मैं परेशान था। लेकिन जब मुझे साइड की ऊपरी सीट मिल गयी तो मन खुश हो लिया। उसपर तुर्रा यह कि सहयात्रियों ने मुझे बड़े दिल वाला भी समझ लिया। अब तो ऊपर बैठकर, लेटकर, करवट बदल-बदलकर, आधा लेटकर, तिरछा होकर, चाहे जैसे भी यात्रा करने को मैं स्वतंत्र था। किसी का कोई हस्तक्षेप नहीं होने वाला था। लेकिन इस अवसर का ज्यादा हिस्सा मैने एक मौन अध्ययन में बिताया। चेतन भगत की पुस्तक ‘टू स्टेट्स’ हाल की दिल्ली यात्रा में पढ़ने को मिली थी। उसमें मद्रासी (तमिल) परिवार के खान-पान और आचार-व्यवहार का बहुत सूक्ष्म वर्णन किया गया है। मैंने उस रोचक वर्णन का सत्यापन करने के उद्देश्य से इनपर चुपके से नजर रखनी शुरू की।

उस कहानी के पात्रों के विपरीत मैने यह पाया कि वे तमिल बुजुर्ग् बड़े खुशमिजाज़ और शौकीन लोग थे। जिन माताजी को मैने अपनी बर्थ दी थी उन्होंने तो मानो मुझे अपना बेटा ही मान लिया। भाषा की प्रबल बाधा के बावजूद (उन्हें हिंदी/अंग्रेजी नहीं आती थी और मैं तमिल का ‘त’ भी नहीं जानता था) उन्होंने बार-बार मुझे अपनी दर्जनों गठरियों में रखे खाद्य पदार्थ (मैं उनके नाम नहीं ले पा रहा- बहुतेरे थे) ऑफर किए। मैंने हाथ जोड़कर मना करने के संकेत के साथ धन्यवाद  कहा जो उन्हें समझ में नहीं आया। डिब्बे का मुँह खोलकर मेरी ओर उठाए उनके हाथ वापस नहीं जा रहे थे तो मैँने एक टुकड़ा उठाकर ‘थैंक्यू’ कहा और आगे के लिए मना किया, लेकिन वो समझ नहीं रही थीं या समझना नहीं चाहती थी। नतीजा यह हुआ कि उन लोगों के खाने के अनन्त सिलसिले का मैं न सिर्फ़ प्रत्यक्षदर्शी रहा बल्कि उसमें शामिल होता रहा। सुबह के वक्त तो उन्होंने मुझसे पूछना भी जरूरी नहीं समझा और मेरे रेल की रसोई (Pantry) से आये नाश्ते के ऊपर से अपनी जमात का उपमा, साँभर, इडली और ‘बड़ा’ एक साथ लाद दिया। मैंने जिंदगी में पहली बार ये चार सामग्रियाँ एक साथ खायीं।

वे लोग मेरे बारे में जाने क्या-क्या बात करते रहे। मैं समझ नहीं पा रहा था, इसलिए थोड़ी झुँझलाहट भी हो रही थी। एक लुंगीधारी बुजुर्ग ने मुझसे मेरा नाम और काम पूछा था। मैंने जो बताया था वही शब्द उनकी तमिल के बीच-बीच में सुनायी दे रहे थे। जो इस बात के गवाह थे कि उनकी चर्चा का एक् विषय मैं भी था। तभी उन माता जी ने मुझसे कुछ पूछा। मैं तमिल् समझ न सका। दूसरे बुजुर्गवार ने अनुवादक बन कर कहा- तुमरा कितना बड़ा बच्चा है? मैंने बताया- एक बेटी दस साल की और एक बेटा चार साल का। उम्र समझाने के लिए उंगलियों का प्रयोग करना पड़ा। इस पर उनके बीच आश्चर्य व कौतूहल मिश्रित हँसी का फव्वारा फूट पड़ा। जो दूसरे कूपे तक भी गया। मैं चकराकर दुभाषिया ढूँढने लगा।

इस बातचीत का रस लेने ऊपर की बर्थ पर लेटा एक तमिल नौजवान भी नीचे चला आया था। मैंने उससे परिचय चलाया तो पता चला कि वह भैरहवा (नेपाल) से एम.बी.बी.एस. कर रहा था। नीचे वाले बुजुर्ग ने उसकी पीठ ठोकते हुए तस्दीक किया था। मैने उससे पूछा- “what were they talking about me?”

उसने मुस्करा कर कहा – “They said that you have got two children, still you look so young.’’

मैं मन ही मन खुश हो लिया लेकिन चेहरे पर थोड़ी शर्म आ ही गयी। मैंने अपनी ओर उठी हुई उन सबकी प्रश्नवाचक निगाहों को जवाब दिया – “Thanks a lot to all of you… this is one of the rarest complements for me as here I am told to have an older look of face than my actual age” महिलाओं ने तमिल में नकारा और पुरुषों ने मुस्कराकर चुप्पी लगा ली।

गाड़ी जब लखनऊ पहुँची तो मुझे ध्यान आया कि मैं ब्लॉग लेखन की पाँच दिवसीय कार्यशाला में भाग लेने आया हूँ और मुझे पहली बार किसी सत्र की अध्यक्षता करनी है। मैंने सबको एक बार फिर धन्यवाद दिया, अच्छी यात्रा के लिए और दक्षिण भारतीय व्यंजनों के लिए। स्टेशन से बाहर आकर ऑटो लिया और गेस्ट हाउस की ओर चल पड़ा। रास्ते में यहाँ का गर्म मौसम देखकर रमजान के रोजेदारों का ध्यान हो आया।

(२)

Invitationदूर-दूर तक भेंजा गया था निमंत्रण-पत्र 

राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्यौगिकी संचार परिषद(NCSTC), नई दिल्ली और लखनऊ की ‘तस्लीम’ संस्था द्वारा एक पाँच दिवसीय कार्यशाला ‘ब्लॉग लेखन के द्वारा विज्ञान संचार’ विषय पर आयोजित थी। तस्लीम ब्लॉग पर इसकी सूचना अनेकशः प्रकाशित हुई थी। जाकिर भाई और बड़े भाई डॉ. अरविंद जी मिश्र ने मुझसे और मेरे जैसे अनेक ब्लॉगर्स को लखनऊ पहुँचने के लिए कहा था। मेरी यात्रा सुखद रही थी इसलिए आगे भी मामला चकाचक रहने की पूरी आशा थी। मैंने गेस्ट हाउस पहुँचकर नहाने और तैयार होने में बहुत कम समय लगाया। आभासी दुनिया के साथियों से प्रत्यक्ष मुलाकात का सुख पाने की लालसा जोर मार रही थी। ज़ाकिर भाई घटनास्थल… सॉरी कार्यक्रम स्थल से पल-पल की सूचना मोबाइल पर दे रहे थे। मुझे लेने कोई गाड़ी आने वाली थी। उसके खोजे जाने, चल पड़ने और गेस्ट हाउस पहुँच जाने के बीच तीन-चार बार फोन आ गये। मैं घबराकर नीचे उतरकर रिसेप्शन पर जाकर खड़ा हो गया। जो ही दो-चार मिनट बचा लिए जाते।

मैं ठीक दो बजे वहाँ पहुँच गया। अरविंद जी तैयारियों को अंतिम रूप में बुरी तरह व्यस्त थे। शायद उन्होंने ज़ाकिर भाई से कमान अपने हाथों में ले ली थी। ज़ाकिर भाई रमजान के महीने में पसीने से तर-बतर दिखायी पड़े। मैने गर्मजोशी से हाथ मिलाया। वे बोले- “बस दस मिनट में लंच आ रहा है। खा लीजिए फिर शुरू करते हैं।” मैं सोचने लगा कि कार्यक्रम की शुरुआत में सिर्फ़ मेरे खा लेने की प्रतीक्षा आड़े आ रही है तो उसे टाल देते हैं। तभी अरविंद जी ने संयोजक महोदय को झिड़की दी- “मुख्य अतिथि को बैठाकर आप खाना खिलाने की बात कर रहे हैं? चलिए कार्यक्रम शुरू करते हैं” मैं उनसे सहमत होने के एक मात्र उपलब्ध विकल्प पर सिर हिलाते हुए आगे बढ़ गया।

“लेकिन दूसरे भाई लोग कहाँ हैं?” मैंने ज़ाकिर से पूछा। हाल में अभी तीन-चार छात्र टाइप प्रतिभागी दिखा्यी दे रहे थे। कुछ पंजीकरण काउंटर पर अपना नाम लिखा रहे थे। मेरी उम्मीद से उलट वहाँ एक भी ऐसा ब्लॉगर चेहरा नहीं दिखा जो मुझसे पहले न मिला हो। वहाँ थे तो बस अरविंद जी और ज़ाकिर भाई। जाहिर है कि तीसरा सुपरिचित बड़ा नाम मेरा ही था 🙂

‘अवध रिसर्च फाउंडेशन’  नामक निजी संस्था के कार्यालय में ही कार्यशाला आयोजित थी। ज़ाकिर भाई उन खाली कुर्सियों की ओर देख रहे थे जो वर्तमान और भविष्य के ब्लॉगर्स की राह देख रही थीं। आमद बहुत धीमी और क्षीण थी। पूर्व कुलपति प्रो. महेंद्र सोढ़ा जी ठीक समय पर पधार चुके थे। अरविंद जी भी समय की पाबंदी पर जोर देने लगे और कार्यक्रम तत्काल शुरू करने का निर्णय हुआ। मैने मन ही मन ट्रेन वाली उन माता जी को एक बार फिर धन्यवाद दिया जिन्होंने सुबह नाश्ते के नाम पर मुझे दिन भर के लिए भूख से मुक्त कर दिया था। हमने उद्‍घाटन सत्र प्रारम्भ किया। इसका हाल आप यहाँ और यहाँ पढ़ सकते हैं।

उद्‍घाटन सत्र के बाद हमने लजीज व्यंजनों से भरा लंच पैकेट खोला और तृप्त हुए। अरविंद जी ने दो बार बताया कि वे बहुत जिद्दी इंसान हैं और जो बात एक बार तय कर लेते हैं उसे करवाकर मानते हैं। हम उनकी इसकी बात का लोहा मानते हुए खाना खाते रहे। समय की पाबंदी को जबतक जिद्द का विषय न बनाया जाय तबतक उसका भारत में अनुपालन असंभव है। इस बीच NCSTC के प्रेक्षक महोदय भी आ चुके थे और उद्घाटन सत्र की सफलता से गदगद हो रहे थे। सबकी भूख प्रायः शांतिपथ पर चल पड़ी थी।

लेकिन कदाचित्‌ मेरी दूसरी भूख अतृप्त ही रहने वाली थी। मैंने आखिरकार पूछ ही लिया- “भाई साहब, आप ये बताइए कि आपने किस-किसको बुलाया था जो नहीं आये?” ज़ाकिर भाई एक से एक नाम गिनाने लगे और उनके न आने के ज्ञात-अज्ञात कारण बताने लगे। मैं निराश होकर सुनता रहा। हद तो तब हो गयी जब उन्होंने यह बताया कि आज के प्रथम तकनीकी सत्र के मुख्य वक्ता ज़ीशान हैदर ज़ैदी और वक्ता अमित ओम के आने में भी संदेह उत्पन्न हो गया है। सारांशक अमित कुमार का न आना तो पक्का ही है। मैंने अरविंद जी से पूछा कि मेरी ज़िंदगी की ‘पहली अध्यक्षी’ मंच पर अकेले ही गुजरेगी क्या? वे इस सत्र में जाकिर भाई के साथ किनारे बैठकर उद्‌घाटन सत्र पर एक ब्लॉग पोस्ट तैयार करके तुरंत ठेलने की योजना बना रह थे। बोले- “यह सत्र आपके हाथ में है। जैसे चाहिए संचालित करिए।” मैंने कहा- “अध्यक्ष की भूमिका तो चुपचाप बैठने और सबसे अंत में यह बोलने की होती है कि किसने क्या बोला? अब यहाँ तो सीधे स्लॉग ओवर की नौबत आ गयी है।”

इसपर उन्होंने ‘आधुनिक सेमिनारों में अध्यक्ष की बढ़ती भूमिका’ विषय पर  एक लम्बी व्याख्या प्रस्तुत कर दी जिसका सारांश यह था कि अध्यक्ष को पूरा सेमिनार हाइजैक करने का पावर होता है। उसे शुरुआत से लेकर अंत तक वे सारे काम खुद करने पड़ते हैं जो करने वाला कोई और नहीं होता है। दीपक जलाने के लिए पंखा बंद करने से लेकर तेल की बत्ती से अतिरिक्त तेल निचोड़ने तक और अतिथियों व प्रतिभागियों के स्वागत से लेकर धन्यवाद ज्ञापन तक उसे हर उस तत्वज्ञान से गुजरना पड़ता है जो किसी सेमीनार की सफलता के लिए आवश्यक होते हैं। मुझे शरद जोशी द्वारा बताये गये ‘अध्यक्ष बनने के नुस्खे’ बेमानी लगने लगे।

अपनी नैया किनारे पर ही डूबती देख मैंने भगवान को स्मरण किया। बाईचान्स भगवान ने मेरी प्रार्थना सुन भी ली। सत्र प्रारम्भ होने के ठीक पहले ओम जी भागते हुए पहुँच ही तो गये। मैंने उनके लिए फ़ौरन चाय-पानी का इंतजाम करने को कहा। पता चला कि उन्होंने जिंदगी में कभी चाय पी ही नहीं। यह मजाक नहीं सच कह रहा हूँ। मेरे सामने एक ऐसा निर्दोष सुदर्शन नौजवान खड़ा था जिसके शरीर में चाय नामक बुराई का लेशमात्र भी प्रवेश नहीं हो पाया था। ऐसे पवित्र आत्मा के आ जाने के बाद सफलता पक्की थी। अब मेरी भगवान में आस्था और बढ़ गयी।

मैंने एक बार हाल में झाँककर प्रतिभागियों का मुआयना किया। दिल जोर से धड़क गया। कुल जमा पाँच विद्यार्थी यह जानने बैठे हैं कि ‘साइंस ब्लॉगिंग’ क्या है…! इन्हें यह समझाने में दो घंटे लगाने हैं। वह भी तब जब इसी बिन्दु पर अरविंद जी अपना पॉवर-प्वाइंट शो एक घंटा पहले ही प्रस्तुत कर चुके हैं। मैं भी थोड़ा बहुत जो कुछ पता था वह उद्घाटन सत्र में ही उद्घाटित कर चुका हूँ। नये वक्ता ओम जी पर सारा दारोमदार था। इसी उधेड़-बुन में लगा रहा कि पसीना बहाते एक दढ़ियल नौजवान नमूदार हुआ। मानो खुदा ने कोई फ़रिश्ता भेंज दिेया हो। परिचय हुआ तो पता चला कि ये ही जनाब जीशान हैदर ज़ैदी साहब हैं। ये साइंस फिक्शन के माहिर लेखक हैं और वैज्ञानिक विषयों को रोचक शैली में प्रस्तुत करने का हुनर रखते हैं। आप रोजे से थे और अपने मेडिकल कॉलेज में परीक्षा कराकर भागते चले आये थे।

बस फिर क्या था। तकनीकी सत्र शुरू हुआ। लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता और जनसंचार विभाग के बच्चों ने पंजीकरण करा रखा था जिनके आने से हाल भरा-भरा सा लगने लगा। मैने माइक संभाला। सबसे संक्षिप्त परिचय लिया, उनका मन टटोलने के लिए। सभी उत्सुक लगे। जिज्ञासु  विद्यार्थी किसे नहीं भाते? जीशान ने अपनी कुशलता का परिचय दिया। मैंने दुतरफ़ा संवाद सुनिश्चित करने के लिए सभी प्रतिभागियों को टिप्पणी करना अनिवार्य कर दिया। अध्यक्षीय फरमान था। पूरा अनुपालन हुआ। प्रश्नोत्तर का दौर कुछ लम्बा ही हो गया। कुछ प्रश्न अगले सत्रों के लिए टालने पड़े। …सब आज ही जान लोगे तो अगले चार दिन क्या करोगे भाई…? मैने उनका हौसला बढ़ाते हुए पहले हि कह दिया था कि जब मेरे जैसा कोरा आर्ट्स साइड का विद्यार्थी साइंस ब्लॉगिंग सेमिनार में अध्यक्षता कर सकता है तो आप लोग तो बहुतै विद्वान हो। उनका उत्साह बहुत बढ़ गया। अरविंद जी ने उद्‍घाटन के समय कह ही दिया था कि ब्लॉग बनाने में केवल तीन मिनट लगते हैं।

मुझे अंदेशा हुआ कि कहीं ये ऐसा न समझ लें कि ब्लॉग सच्ची में तीन मिनट का खेल है। मैंने फिर संशोधित सूचना दी। ब्लॉग बना लेना उतना भर का काम है जितना एक भारी-भरकम किताब खरीदकर ले आना और पहला पन्ना खोल लेना। असली मेहनत तो उसके बाद शुरू होती है जिसका कोई अंत ही नहीं है। अगर पन्ना पलट-पलत कर पढ़ाई नहीं की गयी तो किताब पर धूल जम जाएगी और खरीदना बेकार हो जाएगा। वही हाल ब्लॉग का है….

अंत में अमित ओम ने सारांशक की भूमिका निभाते हुए सारी बातें दुबारा बताना शुरू कर दिया। बच्चे तबतक काफी कुछ सीख चुके थे इसलिए उठकर जाने लगे। मौके की नज़ाकत भाँपते हुए मैने फिर पतवार थामी और नाव को सीधा किनारे लगाकर खूँटे से बाँध दिया। अब कल खुलेगी।  कल के नाविक कोई और हैं। लेकिन वह बहुत अनुभवी, मेहनतकश और मजेदार बातें करने वालों की टीम है। हम भी नाव में बैठकर यात्रा करेंगे। शायद कल कुछ लखनवी ब्लॉगर्स के दर्शन भी हो जाय।

समय: ११:५५ रात्रि (२७ अगस्त,२०१०)

स्थान: २१३, एन.बी.आर.आई. गेस्टहाउस, गोखले मार्ग, लखनऊ।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

साँईं बाबा का प्रसाद और ज्ञानजी की सेहत…

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श्री साँई बाबाआज वृहस्पतिवार है। शिर्डी वाले साँई बाबा के भक्तों का खास दिन। इस दिन व्रत-उपवास रखकर श्रद्धालु जन साँईं मन्दिरों में दर्शन के लिए उमड़ पड़ते हैं। इलाहाबाद का मुख्य मन्दिर भी इस दिन विशेष आकर्षण का केन्द्र हो जाता है। श्रद्धा और सबूरी के बीज मन्त्रों से प्रेरित भक्तजन बड़ी भीड़ के बावजूद पूरी तरह अनुशासित रहकर लम्बी लाइन में अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हुए साँईं मन्त्रों का जप करते हैं और आगे बढ़ते हैं। शाम के वक्त तो इतनी भीड़ हो जाती है कि व्यवस्थापकों को रस्सियाँ तानकर लाइन बनानी पड़ती है जो मन्दिर के भीतर कई चक्रों में घूमने के बाद भी बाहर सड़क तक आ जाती है।

श्रद्धा-सबूरीजब श्रीमती जी के आग्रह पर पहली बार मैं इस मन्दिर में दर्शन करने गया था तो साँईं बाबा के प्रति श्रद्धा से अधिक एक अच्छे पति होने की सदिच्छा के वशीभूत होकर गया था। यहाँ आकर जब मैंने भक्तों की अपार भीड़ देखी और यह अनुमान किया कि भीतर साँईं बाबा की मूर्ति तक पहुँचने में कम से कम दो घण्टे लगेंगे तो मेरे पसीने छूट गये। भीड़ में तिल रखने की जगह नहीं थी इसलिए करीब ढाई साल के बेटे को भी गोद में लेना अपरिहार्य हो गया था। इस दुस्सह परिस्थिति में भी हम लोगों ने धैर्यपूर्वक दर्शन किये थे। वहाँ साँई बाबा के भजनों और उनकी जय-जयकार के बीच इतना अच्छा भक्तिमय माहौल बना हुआ था कि मन में किसी कठिनाई के भाव ने कब्जा नहीं किया।

साँईं प्रसादालयउस प्रथम दर्शन के समय एक ऐसी बात हो गयी थी जो साँईं बाबा के चमत्कारी प्रभाव की पुष्टि करती सी लगी। मेरे लाख सिर हिलाने के बावजूद श्रीमती जी तो इसे चमत्कार ही मानती हैं। हुआ ये कि जब मैं लाइन में लगा था उसी समय मेरा मोबाइल बज उठा। बड़ी मुश्किल से जब मैंने इसे जेब से निकालकर ‘काल रिसीव’ किया तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। यह एक ऐसे व्यक्ति का फोन था जिसे मैं करीब दो साल से ढूँढ रहा था। वह मेरे तीस हजार रुपये लौटाने में लगातार टाल-मटोल करते हुए अबतक मुझे टहलाता रहा था। उसदिन उसने अचानक फोन पर बताया कि रूपयों की व्यवस्था हो गयी है। किसी को भेंज दीजिए, आकर ले जाय। बस क्या था, मेरी पत्नी ने इसे साँईं बाबा का अनुपम प्रसाद मानते हुए उनमें अपना अडिग विश्वास प्रकट किया और आगे ऐसी कुछ अन्य उपलब्धियों को भी साँई बाबा की कृपा मानने सिलसिला शुरू हो गया। ऐसे प्रत्येक अवसर पर हमने साँईं के दर्शन किए। लेकिन मैने समय की अनुपलब्धता के कारण हमेशा वृहस्पतिवार को दर्शन से परहेज किया। मुझे लगता है कि पूजा-अर्चना में शान्तचित्त होकर बैठना और ध्यान करना अधिक महत्वपूर्ण है, न कि भीड़ में गुत्थमगुत्था होकर प्रसाद चढ़ाना।

साँईं इम्पोरियमआज रचना ने वृहस्पति को ही वहाँ जाने की खास वजह बतायी। उन्होंने लगातार नौ गुरुवार साँईं का व्रत रखा था जिसका आज समापन (उद्यापन) करना था। इसके अन्तर्गत गरीबों और लाचारों को भोजन कराना होता है। हलवा और पूड़ी का मीठा भोजन थैलियों में पैक करके हम मन्दिर गये। लेकिन शाम को नहीं, सुबह साढ़े दस बज गये। इस समय भीड़ बहुत कम थी।  मन्दिर और इसके आस-पास का वातावरण दर्शन, पूजन, और दान-पुण्य करने के लिए आवश्यक सभी अवयवों से युक्त है। मन्दिर प्रांगण में ही पूजन और प्रसाद की सामग्री के लिए साँई प्रसादालय है तो वहीं साँईं इम्पोरियम में बाबा से जुड़ी अनेक पुस्तकें, मूर्तियाँ, तस्वीरें, चुनरी, चादरें, ऑडियो कैसेट्स, सीडी, और अन्य प्रयोग की वस्तुएं उपलब्ध हैं। जूते-चप्पल रखने के लिए एक ओर बने स्टैण्ड में दो तीन कर्मचारी मुस्तैद हैं जो अलग-अलग खानों में इसे सुरक्षित रखकर टोकन दे देते हैं। हाथ धुलने के लिए और पीने के लिए स्वच्छ और शीतल पेयजल की व्यवस्था है।

मन्दिर के बाहर वाहन स्टैण्ड भी है और बड़ी संख्या में भिखारी भी। उनमें से अनेक विकलांग, अपंग और लाचार हैं तो कई बिल्कुल ठीकठाक सुविधाभोगी और अकर्मण्य भी। साधुवेश धारी कुछ व्यक्ति कमण्डल लटकाये या रामनामी बिछाए हुए भी मिले जो कदाचित्‌ गुरुवार को ही यहाँ दान बटोरने आते हैं। अनेक महिलाएं अपने झुण्ड के झुण्ड बच्चों के साथ भीख इकट्ठा करने के लिए जमा थीं। सड़क पर भी फूल-माला और प्रसाद की अनेक दुकानें सजी हुई थीं। हर स्तर के भक्तों के लिए अलग-अलग सामग्री यहाँ मौजूद है।

जब हम गाड़ी से उतरकर भोजन की थैलियाँ बाँटने शारीरिक रूप से अक्षम कुछ गरीबों के पास गये तो वहाँ एक व्यक्ति रसीद-बुक लिए खड़ा था। उसने उसे आगे बढ़ाते हुए कहा कि साहब यह रसीद कटा लीजिए। इसका पैसा विकलांगों की सेवा में खर्च होता है। मैंने पूछा- इसकी क्या गारण्टी? वह बोला- साहब आप विश्वास कीजिए। उसकी वेश-भूषा और शैली देखकर मुझे कत्तई विश्वास नहीं हुआ। हमने साक्षात्‌ दरिद्रनारायण की यथासामर्थ्य सेवा की और वहाँ से दर्शन-पूजन करने के बाद प्रसाद लेकर आदरणीय ज्ञानदत्त जी‌ का कुशल क्षेम जानने रेल-अस्पताल की ओर चल पड़े। (मन्दिर के भीतर फोटो खींचने की मनाही है इसलिए हमारा कैमरा ज्यादा कुछ नहीं कर सका।)

    रेलवे अस्पताल के वी.आई.पी. केबिन में आसन जमाए ज्ञानजी किसी भी तरह से मरीज जैसे नहीं लगे। विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और परिवारीजन के साथ बातचीत में मशगूल थे। वागीशा और सत्यार्थ (मेरे बेटी-बेटे) ने उनका पैर छुआ तो प्रमुदित होकर दोनो हाथों से आशीर्वाद दिया। वहाँ ‘बाबूजी’ सबसे सक्रिय और मुस्तैद दिखे। सुबह से शाम तक लगातार अपने बेटे के आस-पास रहते हुए उन्होंने अपना सुख और आराम मुल्तवी कर रखा है। वैसे तो शुभेच्छुओं और तीमारदारों की कोई कमी नहीं है, लेकिन बाबूजी की उपस्थिति पिता-पुत्र के बीच विलक्षण आत्मीय सम्बन्ध को रेखांकित करती हुई भावुक बना देती है।

     एम.आर. आई. रिपोर्ट आ चुकी है। सबकुछ प्रायः सामान्य है। मस्तिष्क के दाहिने हिस्से में हल्की सी सूजन पायी गयी है जो दवा से ठीक हो जाएगी। तीन-चार दिन अस्पताल में ही रहना होगा। आज दूसरा दिन बीत गया है। अगले पन्द्रह दिनों तक दवा चलेगी। उसके बाद सबकुछ वापस पटरी पर आ जाएगा। ज्ञान जी किसी को मोबाइल पर बता रहे हैं – कुछ लोग इसे ब्लॉगिंग से जोड़ रहे हैं लेकिन ऐसा कुछ नहीं है। ब्लॉगिंग तो मेरे लिए केवल टाइम-फिलर है। यह मेन जॉब तो नहीं ही है।

ए.सी. कमरे में एक्स्ट्रा बेड और सोफे पड़े हुए  हैं, और टीवी भी लगी है। लैप-टॉप भी आ गया है जो अभी खोला नहीं गया है, लेकिन मोबाइल पर लगातार हाथ चल रहा है।

    सबकुछ चंगा है जी…

 एक एसएमएस कर लूँ...     DSC02790

मेरी पिछली पोस्ट पर अबतक की सर्वाधिक प्रतिक्रियाएं दर्ज हुईं। ज्ञान जी के लिए आप सबका प्रेम और आदर देखकर अभिभूत हूँ। दद्दा तूसी ग्रेट हो जी…

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

वर्धा परिसर का परिक्रमण और चाय पर चर्चा…

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MGAHV-logo कुलपति जी के आवास से रात का भोजन लेने के बाद राजकिशोर जी, अब्दुल बिस्मिल्लाह, प्रो.सचिन तिवारी, प्रो. सुवास कुमार के साथ हम गेस्ट हाउस लौट आये। वहाँ खुले आसमान के नीचे चबूतरे पर कुर्सियाँ डाल रखी गयीं थी। दो बुजुर्गवार लोग तो सोने के लिए अपने कमरे में चले गये लेकिन राजकिशोर जी और प्रो. सुवास कुमार के साथ मैं वही पर कुर्सियाँ खींच कर बैठ गया। कारण यह कि वहाँ प्रियंकर जी पहले से मौजूद थे। हम दोनो हिन्दी ब्लॉगजगत के माध्यम से पहले ही एक दूसरे से परिचित थे। हिन्दी चिट्ठाकारी की दुनिया विषयक राष्ट्रीय गोष्ठी में वे इलाहाबाद आये थे तब उनसे भेंट हुई थी। यहाँ दुबारा मिलकर मन में सखा-भाव उमड़ पड़ा और हम भावुक सा महसूस करने लगे।

प्रियंकर जी ने हिन्दीसमय.कॉम के कोर-ग्रुप की बैठक की कुछ और जानकारी दी। इसके तीन सदस्यों के आगरा, लखनऊ और कोलकाता में बसे होने के कारण क्या कुछ कठिनाइयाँ नहीं आतीं? मैने इस आशय का सवाल किया तो उन्होंने बताया कि सभी नेट के माध्यम से जुड़े रहते हैं और एक-दो महीने पर किसी एक के शहर में या वर्धा में बैठक कर अगली रणनीति तय कर ली जाती है। कुलपति जी द्वारा इस महत्वाकांक्षी योजना को नई ऊँचाइयों पर ले जाने के लिए और भी जतन किए जा रहे हैं। नेट पर उत्कृष्ट साहित्य अपलोड करने में कॉपीराइट सम्बन्धी अड़चनों की चर्चा भी हुई। कुछ प्रकाशकों ने तो सहर्ष सहमति दे दी है लेकिन कुछ अन्य प्रकाशक पूरी सामग्री नेट पर निःशुल्क सुलभ कराने में अपनी व्यावसायिक क्षति देख रहे हैं।

अनुवाद एवं निर्वचन विभाग

इसी बीच राजकिशोर जी को अपने करीब बैठा देख मुझे अपने मन में उठे एक सवाल का निराकरण करा लेने की इच्छा हुई। सभ्यता के भविष्य पर बोलते हुए उन्होंने सामुदायिक जीवन (commune life) का महिमा मण्डन किया था। इस पुरानी सभ्यता की ओर लौट जाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा था कि आजका अन्धाधुन्ध मशीनी विकास हमें सामाजिक गैर बराबरी की ओर ले जा रहा है। इससे विश्व समाज में तमाम युद्ध और उन्माद की स्थिति उत्पन्न हो रही है। अमीर लगातार और अमीर होते जा रहे हैं और गरीब भुखमरी का शिकार हो रहे हैं। इसके विपरीत कम्यून में सभी बराबर हुआ करते थे। सभी श्रम करते थे और उत्पादन पर सबका सामूहिक अधिकार था। मनुष्य को शान्ति और सन्तुष्टि तभी मिल सकती है जब वह इस प्रकार के सामुदायिक जीवन को अपना ले।

मैने उनसे पूछा कि आप व्यक्ति की निजी प्रतिभा और उद्यम को कितना महत्व देते हैं। मनुष्य अपने निजी परिश्रम और प्रतिभा के दम पर जो उपलब्धियाँ हासिल करता है उनपर उसका अधिकार होना चाहिए कि नहीं? यदि वह उसका प्रयोग निजीतौर पर करने का अधिकार नहीं पाएगा तो अतिरिक्त प्रयास (extra effort) करने के लिए आवश्यक अभिप्रेरणा (motivation) उसे कहाँ से मिलेगी? फिर मानव सभ्यता के विकास की गाड़ी आगे कैसे बढ़ेगी?

राजकिशोर जी ने कहा कि individual effort तो महत्वपूर्ण है ही लेकिन उसका प्रयोग कम्यून के लिए होना चाहिए। उपलब्धियों का लाभ सबको बराबर मिलना चाहिए। चर्चा में प्रो.सुवास कुमार ने हस्तक्षेप किया, बोले- मुझे लगता है कि सारी समस्या की जड़ ही ‘प्राइवेट प्रॉपर्टी’ है। सम्पत्ति के पीछे भागते लोग सभ्यता भूल जाते हैं। मुझे लगा कि मैं बी.ए. की कक्षा में बैठा मार्क्सवाद का पाठ पढ़ रहा हूँ। दोनो मनीषियों ने मुझे कम्यूनिष्ट विचारधारा के मोटे-मोटे वाक्य सुनाये। इस चर्चा के बीच में ही मेरे साथी विनोद शुक्ला जी उठते हुए याद दिलाया कि बारह बज चुके हैं, सुबह कुलपति जी ने साढ़े पाँच बजे टहलने के लिए तैयार रहने को कहा है। वे सोने चले गये। लेकिन मुझे तो कुछ दूसरा ही आनन्द मिल रहा था। गान्धी हिल्स पर सूर्योदय (१५.४.२०१०)

मैने प्रो. सुवास कुमार की बात को लपकते हुए कहा कि सर, मुझे तो लगता है कि समस्या सिर्फ़ प्राइवेट प्रॉपर्टी में नहीं है। सम्पत्ति चाहे निजी हाथों में रहे या सार्वजनिक नियन्त्रण में उसको लेकर समस्या पैदा होती रहेगी। पूँजीवाद के विरुद्ध जो रूसी क्रान्ति हुई और साम्यवादी सरकार गठित हुई उसने भी क्या किया? सम्पत्ति सरकारी हाथों में गयी और जो लोग सरकार के मालिक थे उनकी दासी बन गयी। एक प्रकार का स्टेट कैपिटलिज्म स्थापित हो गया। किसी निजी पूँजीवादी में जो बुराइयाँ देखी जाती थीं वही सब इन साम्यवादी सरकारों में आ गयीं जो अन्ततः इनके पतन का कारण बनीं। इसलिए आवश्यकता से अधिक सम्पत्ति अपने आप में बुराई की जड़ है।

राजकिशोर जी मुस्करा रहे थे। बोले- यह सम्पत्ति तो माया है और इसे महा ठगिनी कहा गया है। हमने उनका समर्थन किया। वे फिर बोले- इस माया का श्रोत क्या है? सुवास जी बोले- माया तो हमारे मन की बनायी हुई है। फिर राजकिशोर जी ने कहा कि ईश्वर को भी तो हमारे मन ने ही बनाया है। वे जोर से हँसे और बोले- ईश्वर और माया दोनो को गोली मार दो। सारी समस्या खत्म हो जाएगी। दुनिया में सारे झगड़े फ़साद की जड़ यही दोनो हैं।

मैने अपने दर्शनशास्त्र का विद्यार्थी होने का परिचय दिए बिना ही उन्हें टोका- आप ऐसा कर ही नहीं सकते। ईश्वर को गोली नहीं मारी जा सकती क्योंकि ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं है। यह तो सत्य का दूसरा नाम है, और सत्य को समाप्त नहीं किया जा सकता। यह जो माया है वह कुछ और नहीं हमारा अज्ञान(ignorance) है। हम अज्ञान के अन्धकार में भटक रहे है और एक-दूसरे से लड़-भिड़ कर अपना सिर फोड़ रहे हैं। ज्योंही हमें सत्य का ज्ञान होगा, अन्धेरा अपने आप भाग खड़ा होगा। इसलिए हमें बनावटी बातों के बजाय सत्य के निकट पहुँचने की कोशिश करनी चाहिए। जो सत्य के निकट है वह ईश्वर के निकट है। जो ईश्वर के निकट है वह गलत काम नहीं करेगा। लेकिन सत्य का संधान करना इतना आसान भी नहीं है। चर्चा दूसरी ओर मुड़ गयी…।

अचानक रात के एक बजे हमें याद आया कि सुबह पाँच बजे उठना है। हम झटपट चर्चा को विराम देकर उठ लिए और मोबाइल में एलार्म सेट करके बिस्तर पर जा पड़े।

सुबह योजना के मुताबिक साढ़े पाँच बजे तैयार होकर नीचे सड़क पर पहुँचना था, लेकिन हमारी नींद साढे चार बजे ही खुल गयी। दरअसल विनोद जी, जो जल्दी सो गये थे वे जल्दी उठकर खटर-पटर करने लगे। मुझे भी सुबह पहाड़ी पर टहलने की उत्सुकता के मारे अच्छी नींद ही नहीं आयी थी। हम पाँच बजे ही तैयार होकर कमरे से बाहर आ गये। अम्बेडकर जयन्ती का ब्राह्म मूहूर्त वर्धा गेस्ट हाउस से यह तस्वीर गेस्ट हाउस के चबूतरे पर खड़े होकर हमने उसी समय ली थी जब सूर्योदय अभी नहीं हुआ था।

थोड़ी देर में गेस्ट हाउस के एक सूट से विश्व विद्यालय के वित्त अधिकारी मो.शीस खान जी बाहर आये और क्रमशः अपने-अपने आवास से कुलपति विभूति नारायण राय, प्रति-कुलपति नदीम हसनैन, कुलसचिव डॉ. कैलाश जी. खामरे और डीन प्रो. सूरज पालीवाल भी अपनी टहलने की पोशाक में निकल पड़े। हमारी कच्ची तैयारी पर पहली निगाह कुलपति जी की ही पड़ी। हमारे पैरों में हवाई चप्पल देखकर उन्होंने कहा कि स्पोर्ट्स शू नहीं लाये हैं तो ऊपर दिक्कत हो सकती है। हमारे पास चमड़े के जूते और हवाई चप्पल का ही विकल्प था इसलिए हमने इसे ही बेहतर समझा था। जीन्स और टी-शर्ट में ही हमने ट्रैक-सूट  का विकल्प खोजा था। फिर भी हमारे उत्साह में कोई कमी नहीं थी।

मो.शीस खान जी का व्यक्तित्व देखकर हम दंग रह गये। वे साठ साल की उम्र में सरकारी सेवा पूरी करके रेलवे से सेवानिवृत्त हो चुके थे उसके बाद यहाँ वित्त अधिकारी का काम सम्हाला है। लेकिन शरीर से इतने चुस्त-दुरुस्त कि टहलने वालों में सबसे पहले जाग कर सबको मोबाइल पर घण्टी देकर जगाते हैं, टीले की चढ़ाई पर सबसे पहले चढ़ जाते है और रुक-रुककर पीछे छूट गये साथियों को अपने साथ लेते हैं। उन्होंने हाथ मिलाकर मेरे अभिवादन का जवाब दिया। नदीम हसनैन साहब स्थिर गति से अपनी भारी देह को सम्हालते हुए आगे बढ़ते रहे। प्रायः मौन रहते हुए उन्होंने वाकिंग ट्रैक पूरा किया। अपने पीछे से आगे जाते हुए लोगों को निर्विकार देखते हुए। खामरे साहब सबकी प्रतीक्षा छोड़कर जल्दी-जल्दी आगे बढ़ जाते हैं ताकि थकान होने से पहले चढ़ाई पूरी कर लें। ऊपर जाकर कुछ व्यायाम करना भी उनके मीनू में शामिल है।

कुलपति जी और वित्त अधिकारी मो.शीस खान

टहलते हुए हमने कुछ बातें यहाँ के मौसम के बारे में की। मध्य अप्रैल में पारा ४३ डिग्री तक पहुँचने लगा था। पता चला कि मई-जून में यह ५३-५४ तक पहुँच जाता है। यहाँ बरसात का मौसम बड़ा खुशगंवार होता है। ढलान के कारण जल-जमाव नहीं होता। हरियाली बढ़ जाती है और तापमान भी नीचे रहता है।

मैने पूछा कि विश्वविद्यालय की स्थापना १९९७ में हुई बतायी जाती है तो यहाँ के परिसर का विकास कार्य अभी तक अधूरा क्यों है? पेड़-पौधे अभी हाल में रोपे गये लगते हैं। सड़कें भी नई बनी हुई लग रही हैं। भवनों का निर्माण कार्य अभी भी हो रहा है। आखिर इतनी देर क्यों हुई? इसका जवाब मुझे अगले दो दिनों में टुकड़ों में मिला। दरअसल संसद से विश्वविद्यालय का एक्ट पारित होने के बाद दो-तीन साल इस कवायद में बीत गये कि इसकी स्थापना वर्धा के बजाय किसी विकसित स्थान पर क्यों न किया जाय। जब यह अन्तिम रूप से तय हो गया कि इस विश्वविद्यालय की परिकल्पना ही गांधी जी के सेवाग्राम आश्रम में देखे गये सपने को साकार करने के लिए की गयी है और एक्ट में ही वर्धा का स्थल के रूप में निर्धारण किया जा चुका है, जो बदला नहीं जा सकता है तब यहाँ इसके स्थापत्य की जरूरत महसूस की गयी। वर्धा जिला मुख्यालय के आसपास उपयुक्त स्थल के चयन के लिए तत्कालीन अधिकारियों ने हवाई सर्वेक्षण करके इन पाँच निर्जन टीलों का चयन किया और करीब दो सौ एकड़ जमीन अधिग्रहित की गयी। दूसरे कुलपति के कार्यकाल में भी निर्माणकार्यों की गति बहुत धीमी रही। योजना आयोग का अनुदान और वार्षिक बजट लौटाया जाता रहा। वर्धा शहर में कुछ मकान किराये पर लेकर विश्वविद्यालय चलाने की औपचारिकता पूरी की जाती रही।

वर्तमान में विश्वविद्यालय के तीसरे कुलपति के रूप में उत्तर प्रदेश कैडर के पुलिस अधिकारी और साहित्य की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने वाले विभूति नारायण राय को कमान सौंपी गयी। अपने पीछे एक लम्बा प्रशासनिक अनुभव, हिन्दी साहित्य के विशद अध्ययन से उपजी व्यापक दृष्टि और क्षुद्र स्वार्थों और एकपक्षीय आलोचना से ऊपर उठकर नव-निर्माण करने की रचनात्मक ललक लेकर जबसे आप यहाँ आए हैं तबसे इस प्रांगण को विकसित करने व सजाने सवाँरने का काम तेजी से आगे बढ़ा है। केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग की मन्थर गति से असन्तुष्ट होकर इन्होंने उत्तर प्रदेश की एक सरकारी निर्माण एजेन्सी को विश्वविद्यालय परिसर के भवनों का निर्माण कार्य सौंप दिया। रिकॉर्ड समय में यहाँ प्रशासनिक भवन, पुस्तकालय, अनुवाद और निर्वचन केन्द्र, गान्धी और बौद्ध अध्ययन केन्द्र, महिला छात्रावास, गेस्ट हाउस, आवासीय परिसर इत्यादि का निर्माण कार्य पूरा हुआ और अभी आगे भी रात-दिन काम चल रहा है।

दूसरी ओर विश्वविद्यालय में अध्ययन और अध्यापन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य भी सुचारु ढंग से चलाने के लिए जिन अध्यापकों की आवश्यकता थी उन्हें भी नियुक्त किये जाने की प्रक्रिया तेज की गयी। हमारे देश में जिस एक कार्य पर सबसे अधिक अंगुलियाँ उठायी जाती हैं वह है नियुक्ति प्रक्रिया। विश्वविद्यालय भी इसका अपवाद नहीं रहा। मैने जब इस बावत कुलपति जी से सवाल किया तो बोले- देखिए, आलोचना तो होती ही है। लेकिन उससे डरकर यदि हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रह जाँय तो स्थिति सुधरेगी कैसे? मैं अपना काम करने में ज्यादा ध्यान लगाता हूँ। यह करते हुए मेरी चमड़ी थोड़ी मोटी हो गयी है। सबको सफाई देने के चक्कर में अपना समय बर्बाद नहीं कर सकता। अन्ततः तो हमारा काम ही सामने आएगा और समय इसका मूल्यांकन करेगा। मेरी कोशिश है अच्छे लोगों को इस विश्वविद्यालय से जोड़ने की। वे चाहे जिस फील्ड के हों, यदि उनके भीतर कुछ सकारात्मक काम करने की सम्भावना है तो मैं उन्हें जरूर अवसर देना चाहूंगा।

ऊपरी टीले का चक्कर लगाते हुए हम दूसरे सिरे से नीचे आने वाली सड़क  पर टहलते हुए अर्द्धनिर्मित महिला छात्रावास के पास आ गये। इसके आधे हिस्से में छात्राएं आ चुकी हैं। छात्रों का हॉस्टल इस साल बनकर पूरा हो जाएगा। अभी वे शहर में एक किराये के भवन में रहते हैं जहाँ से बस द्वारा विश्वविद्यालय परिसर में आते हैं। हाल ही में बनी कंक्रीट और सीमेण्ट की सड़क के दोनो ओर लगे नीम और पीपल के पौधे लगाये गये थे जो पाँच से दस फीट तक बढ़ चुके थे। चार दीवारी पर वोगनबेलिया की बेलें फैली हुई थी। इस शुष्क मौसम में कोई अन्य फूल पत्ती उगाना बड़ा ही कठिन काम था। पानी की कमी सबसे बड़ी समस्या थी। कुलपति जी ने हाल ही में अधिग्रहित खेल के मैदान की जमीन दिखायी जिसे जोतकर बराबर कर लिया गया था। जंगली पौधों और कटीली घास को समूल नष्ट करने के लिए लगातार निराई और गुड़ाई की जा रही थी ताकि समतल मैदान पर नर्म मुलायम घास लगायी जा सके। मैने वहाँ एक इनडोर स्पोर्ट्स हाल बनवाने की सलाह दी जिसमें बैडमिण्टन, टेबुल टेनिस, जिम्नेजियम, इत्यादि की सुविधा रहे। कुलपति जी ने अगली पंचवर्षीय योजना में इसके सम्मिलित होने की बात बतायी।

प्रो. पालीवाल (सबसे बाएं) के घर में सुबह की चायइस प्रकार टहलते हुए हम अपने अगले ठहराव पर पहुँच गये। आज प्रो. सूरज पालीवाल की बारी थी। जी हाँ, वहाँ यह स्वस्थ परम्परा बनी है कि टहलने के बाद कुलपति जी सहित सभी अधिकारी किसी एक सदस्य के घर पर सुबह की चाय एक साथ लेंगे। पालीवाल जी अपने घर में अकेले रहते हैं।  कदाचित्‌ स्वपाकी हैं, क्यों कि सबको बैठाकर वे स्वयं किचेन में गये और अपने हाथ से ही चाय की ट्रे लेकर आये। वहाँ शुद्ध दूध में बनी गाढ़ी चाय पीकर हमें अपने घर की बिना दूध की ‘नीट चाय’ बहुत याद आयी। सुबह-सुबह टहलने की थकान इस एनर्जी ड्रिंक से जाती रही। साथ ही जो कैलोरी हमने टहलने में खर्च की वह तत्काल जमा हो गयी होगी। इस बीच मेरा ध्यान अपने हवाई चप्पल से रगड़ खाते पाँव की ओर गया। दोनो पट्टियों के नीचे पाँव में सुर्ख लाल निशान बन गये थे। थोड़ी देर में वहाँ छाले उभर आये।

करीब साढ़े सात बजे हम वहाँ से उठे तो कुलपति जी ने बताया कि आज अम्बेडकर जयन्ती के कारण विश्वविद्यालय में छुट्टी है। आपलोग सेवाग्राम देख आइए। हमें तो मन की मुराद मिल गयी। सेवाग्राम अर्थात्‌ वह स्थान जहाँ गांधी जी ने राजनीति से सन्यास लेने के बाद अपना आश्रम स्थापित करते हुए अपने सिद्धान्तों की प्रयोगशाला बनायी थी।

करीब साढ़े ग्यारह बजे तैयार होकर हम कुलपति जी के आवास पर पहुँचे ताकि सेवाग्राम आश्रम जाने के लिए किसी वाहन  का इन्तजाम हो सके। कुलपति जी हमारी मांग सुनकर पशोपेश में पड़ गये। छुट्टी के कारण कोई ड्राइवर आया नहीं था और अब किसी को बुलाने में काफ़ी देर हो जाती। धूप और गर्मी प्रचण्ड थी। यहाँ से सेवाग्राम जाने का कोई सार्वजनिक साधन उपलब्ध नहीं था। तभी वे अन्दर गये और अपनी निजी कार की चाबी ले आये। मुझे थमाते हुए बोले कि आप “वैगन-आर” तो चला लेंगे न? मैने सहर्ष हामी भरी और गाड़ी गैरेज से निकालकर, ए.सी. ऑन किया, विनोद शुक्ला जी को बगल में बैठाया और सेवाग्राम की ओर चल पड़े।

(मैने पिछली कड़ी में वादा किया था कि इस कड़ी में अम्बेडकर जयन्ती के अनूठे अनुभव की बात बताउंगा, लेकिन पोस्ट लम्बी हो चली है और अभी उस बात की चर्चा शुरू भी नहीं हो पायी है। इसलिए क्षमा याचना सहित उसे अगली कड़ी पर टालता हूँ। बस इन्तजार कीजिए अगली कड़ी का… 🙂

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

त्रिवेणी महोत्सव में प्रयाग की धरती पर उतरे सितारे…।

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उन्नीस फरवरी से पच्चीस फरवरी तक लगातार सात दिनों तक इलाहाबाद में गीत, संगीत, नृत्य, कविता और शायरी की स्वर लहरियाँ यमुना नदी के तट पर बने शानदार मंच से बिखरती रहीं और रोज शाम को शहर का सारा ट्रैफिक बोट-क्लब मुक्तांगन की ओर मुड़ जाता रहा। सेवेन वण्डर्स ने जो विशाल मंच तैयार किया था उसकी शोभा देखते ही बनती थी। इस मंच पर जब पहले दिन उद्‌घाटन कार्यक्रम में आगरा से आये सुधीर नारायण ने अपने भजनो के साथ सुमधुर शुरुआत की तभी यह अन्दाज लग गया कि अगले कुछ दिन अभूतपूर्व आनन्द के रस में डूबने का अवसर मिलने वाला है।

उद्‌घाटन कार्यक्रम की औपचारिकता पूरी होने के तत्काल बाद श्रेया घोषाल ने एक रेल के डिब्बे से मंच पर उतरकर सबको रोमांचित कर दिया। दर्शक दीर्घा में शान्ति बनाए रखना पुलिस वालों के लिए असम्भव सा हो गया। एक के बाद एक हिट गानों को सजीव सुनते हुए दर्शक जोश में  खड़े होकर नाचते रहे, जाने कितनी कुर्सियाँ शहीद हुईं मगर जश्न का माहौल थमने का नाम नहीं ले रहा था। भगवान ने इस लोकप्रिय गायिका को जितना सुरीली आवाज दी है उतनी ही सुन्दरता से भी नवाज़ा है।

एक से बढ़कर एक उम्दा कार्यक्रम देखकर देर रात दो-तीन बजे घर लौटना, दिन भर उनींदी आँखों से दफ़्तर का काम निपटाना  और शाम होते ही फिर उसी महोत्सव का रुख कर लेना मेरा रूटीन बन गया… ऐसे में ब्लॉगिंग क्या खाक होती…? पिछली पोस्ट पर प्राप्त टिप्पणियों में लगभग सभी ने मुझसे रिपोर्ट की उम्मीद जतायी थी। मैने इसका मन भी बनाया था। कैमरा भी साथ लेकर जाता रहा, लेकिन सारी तैयारी धरी रह गयी। उस माहौल में तो बस झूम कर नाच उठने का मन करता था। डायरी कलम संभालने और फोटो खींचने की सुध ही नहीं रही। फिर भी आप लोगों को निराश नहीं करना चाहता हूँ। कुछ तस्वीरें जो मैने उतार ली थीं उनको देखकर माहौल का अन्दाज लगाइए। शेष बातें और वीडियो अगली पोस्ट में….

 

DSC02332 मंच की भव्यता देखते ही बनती थी

आइए देखते हैं कुछ यादगार तस्वीरें

 

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       जबर्दस्त आतिशबाजी

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मन्त्री जी ने उद्‍घाटन किया

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लोकनृत्य-राजस्थानी चाकरी

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लोकनृत्य-मणिपुरी

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लोकनृत्य-मथुरा की होली

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लोकनृत्य-कश्मीरी

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       श्रेया घोषाल

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बच्चों के साथ (बीच में वागीशा)

 

malini awasthi 

मालिनी अवस्थी की सज-धज एक भारतीय नारी की पारम्परिक वेश-भूषा में थी तो गायन में लोकरंग का अद्‍भुत पुट था। दर्शकों के बीच में जाकर उनसे सीधा सम्वाद करने की अदा ने सबका मन मोह लिया।

abhijit bhattacharya

अभिजीत दा ने अपने हिट गीतों से सबको मन्त्रमुग्ध तो किया ही उनके साथ आयी नृत्य मण्डली ने सभी नौजवानों को साथ थिरकने पर मजबूर कर दिया। दर्शकों की फ़रमाइश पर इन्होंने किशोर कुमार के सदाबहार गीत भी अलग अन्दाज में सुनाए।

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बच्चों, नौजवानों समेत सभी दर्शक अभिजीत दा से हाथ मिलाने और बात करने के लिए उन तक पहुँचना चाहते थे लेकिन इसका सौभाग्य मिला आयोजन से जुड़े अधिकारियों को, मुख्य अतिथि को और मंच की संचालक उद्‌घोषिका को

 

शान की लुटायी मस्ती बटोरने के लिए जब दर्शक अनियन्त्रित होने लगे तो आई.जी. और डी.आई.जी. खुद ही स्थिति संभालने के लिए खड़े हो गये (देखिए सबसे नीचे वाले बायें चित्र में)। भीड़ ने उनकी एक न सुनी। कार्यक्रम समय से पहले बन्द करना पड़ा। लेकिन तबतक सैकड़ों कुर्सियाँ टूट चुकी थीं जिनपर खड़े होकर नौजवानों ने डान्स किया था।

shaan

बहती हवा सा था वो… (शान)

शान और जूनू

  शान और जूनू


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पुलिस कप्तान हुए हलकान

DSC02496 मन्त्री जी द्वारा शान का सम्मान

तस्वीरें तो और भी ढेर सारी हैं लेकिन इनसे पेट तो भरने वाला है नहीं, इसलिए अब रहने देता हूँ। गिरिजेश भइया की इच्छा थी मालिनी अवस्थी की रिकॉर्डिंग सुनने की। मैने उसे रिकॉर्ड तो कर लिया है लेकिन सोनी के डिजिटल कैमरे में आवाज साफ़ नहीं रिकॉर्ड हो पायी है। सावधानी बरतते हुए मैने एनालॉग कैमरे (Handycam) से भी रिकॉर्ड किया है जो बहुत स्पष्ट और कर्णप्रिय है लेकिन इसको कम्प्यूटर में चढ़ाने के लिए एक कन्वर्टर की जरूरत है। मेरा टीवी ट्यूनर कार्ड अभी ऑडियो इनपुट नहीं ले रहा है। कोई तकनीकी विशेषज्ञ इसमें मदद कर सकता है क्या?

समीर जी मुझे आपकी फरमाइश भी याद है। लेकिन यही हाल कवि सम्मेलन का भी है। कैसेट में रिकॉर्डिंग मौजूद है लेकिन कम्प्यूटर पर कैसे चढाऊँ?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

हमें खेद है कि हम इनकी चर्चा न कर पाये-

उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र के कलाकार, सुगन्धा मिश्रा (लाफ़्टर चैलेन्ज), हिमानी और तोषी, वडाली बन्धु, निज़ामी बन्धु, गुलाम अली, अमजद अली खान, कुँवर बेचैन, राहत इन्दौरी, बसीम बरेलवी, मुनव्वर राना, ताहिर फ़राज, प्रदीप चौबे, पद्‍मश्री रंजना गौहर (ओडिसी), नीरजा श्रीवास्तव(कत्थक), इमरान प्रतापगढ़ी, यश मालवीय, शबा बलरामपुरी और ढेर सारे अन्य कवि, शायर और कलाकार जिन्होंने दर्शकों को बाँधे रखा।

पुण्यदायी व्यवसाय- तीर्थयात्रा कम्पनी…!

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भारत की सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने हेतु आदि शंकराचार्य नें भारत की चार दिशाओं में चार धामों की स्थापना की। उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम , पूरब में जगन्नाथपुरी एवं पश्चिम में द्वारका, हिन्दुओं के चार धाम हैं। आस्थावान हिन्दू इन धामों की यात्रा करना अपना पवित्र कर्तव्य मानते थे। शंकराचार्य से पूर्व पौराणिक काल से बद्रीनाथ, केदारनाथ, जमुनोत्री और गंगोत्री को चार धामों की प्रतिष्ठा प्राप्त है।  कालान्तर में हिन्दुओं के नये तीर्थ आते गये हैं। बद्रीनाथ, द्वारका, रामेश्वरम, जगन्नाथपुरी के चार धामों के अतिरिक्त केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री, ऋषिकेष, हरिद्वार, वैष्णो देवी, वाराणसी, प्रयाग, अयोध्या बैजनाथधाम, तिरुपति, शिरडी, गंगासागर, पशुपतिनाथ (काठमाण्डू) आदि तीर्थस्थल आस्थावान हिन्दुओं द्वारा विशेष श्रद्धा के साथ भ्रमण किये जाते हैं। शक्ति की देवी दुर्गाजी के अनेक रूपों के मन्दिर प्रायः पहाड़ों की चोटियों व दुर्गम स्थानों पर स्थापित है। लेकिन भक्तगण दुर्गम रास्तों की परवाह किए बिना माँ का आशीर्वाद प्राप्त करने निकल पड़ते हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रतिष्ठित भगवान शंकर से संबन्धित द्वादश ज्योतिर्लिंग भी हिन्दू आस्था और भक्ति के अनन्य केन्द्र हैं:

सौराष्ट्रे सोमनाथम्‌ च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्‌

उज्जयिन्याम्‌ महाकालम्‌ ओंकाराममलेश्वरम्‌

केदारम्‌ हिमवत्पृष्ठे डाकिन्याम्‌ भीमशंकरम्‌

वाराणास्यान्तु विश्वेशम् त्र्यम्बकम् गौतमीतटे

बैद्यनाथम्‌ चिताभूमौ नागेशम्‌ दारुकावने

सेतुबन्धेतु रामेश्वरम्‌ द्युश्मेशं च शिवालये

द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्‌

सर्वयाय विनिर्मुक्तः सर्वसिद्धिः फलंलभेत्‌

इन पवित्र तीर्थस्थलों का दर्शन करने और पवित्र नदियों में स्नान करने से समस्त पापों का नाश होने और पुण्य के अर्जन का विश्वास प्रायः सभी हिन्दुओं को तीर्थयात्रा के लिए प्रेरित करता है। मार्ग की तमाम कठिनाइयों का सामना करते हुए प्राचीन काल में चारों धाम की यात्रा हिन्दुओं द्वारा देश की सांस्कृतिक एकता का दर्शन करने के लिये नहीं वरन्‌ अपना परलोक सुधारने के लिये ही की जाती होगी। इसी प्रकार गंगा का दर्शन करने लोग इस भाव से नहीं जाते कि वे सांस्कृतिक दृष्टि से भावविभोर हो जायें वरन्‌ इस भाव से जाते होंगे कि गंगा स्वयं शिव की जटा से निकली हैं और इसमें स्नान करने से उनके पापों का मोचन होगा।

पुराने जमाने में ये तीर्थयात्राएं बहुत कष्टकारी होती थीं। घर से बाहर निकलते ही कष्ट सहयात्री बन जाता था। कच्चे और दुर्गम मार्ग, दुर्लभ और धीमी सवारियाँ, प्रायः पैदल यात्रा की मजबूरी, खान-पान में कठिनाई और ठहरने के स्थानों का अभाव साधारण हैसियत वालों को यात्रा से रोकते थे। बहुत कम हिन्दू चारोधाम की यात्रा कर पाते थे। सुना जाता है कि भविष्य अनिश्चित्‌ जान बहुत से लोग यात्रा पर निकलने से पहले ही मृत्यु के बाद कराये जाने वाले कर्मकाण्ड और अनुष्ठान सम्पन्न कराकर जाते थे। जो भाग्यशाली होते थे और सकुशल यात्रा समाप्त कर लौट आते थे उनके दर्शन को भी पुण्यदायी माना जाता था। उनके पाँव पखारने और सेवा करने वालों की लाइन लग जाती थी।

पाप-पुण्य का विचार हमारे जनमानस में बहुत गहराई तक पैठा हुआ है। अच्छी और संस्कारित शिक्षा से हमारे मन को अच्छे और बुरे का भेद करना आता है। कम से कम हमारी आत्मा तो जानती ही है कि क्या गलत है और क्या सही। लेकिन लाख पढ़े-लिखे होकर भी ऐसे कम ही लोग हैं जो अपने सदाचरण पर टिके रहने को ही सबसे बड़ा पुण्य मानें। बहुतायत तो उन्हीं की है  जो इसके बजाय पहले काम, क्रोध, मद और लोभ के वशीभूत होकर निरन्तर अनैतिक कार्य करते जाते हैं और उसके बाद विश्वास रखते हैं कि पुरोहित द्वारा बताये गये कर्मकाण्डों के आयोजन और पवित्र तीर्थों के दर्शन द्वारा अपने एकाउण्ट से पाप की liability घटा लेंगे और पुण्य का asset बढ़ा लेंगे। इसी बैलेन्स शीट को कृत्रिम रूप से प्रभावशाली बनाने के प्रयास में  नये जमाने के लोग भी अपने पाप धोने के लिए संगम सहित तमाम नदियों व सरोवरों में खास मूहूर्त पर स्नान करने के लिए उमड़े जाते हैं और मन्दिरों में दर्शनार्थियों की भीड़ साल-दर-साल बढ़ती जा रही है।

इस पाप-पुण्य के व्यापार में बहुत से असली व्यापारियों ने व्यावसायिक पूँजी निवेश किया है। अब यात्रा की अनेकानेक सुविधाएं बढ़ती जा रही हैं। अब तो घर से ज्यादा बाहर की यात्रा खुशगवार होती जा रही है। पैकेज टूर ऑपरेटर्स, ट्रैवेल एजेन्सियाँ और सरकारी संस्थान, जैसे- रेलवे और पर्यटन विभाग द्वारा भी यात्रियों की जरूरत के अनुसार सुविधाए उपलब्ध करायी जा रही हैं। अब पुण्य कमाने निकले यात्रियों को सेवा देकर आर्थिक लाभ अर्जित करने वाली एजेन्सियों की भरमार होती जा रही है। मुझे यह सब चर्चा करने का मन इसलिए हुआ है कि हाल ही में मुझे एक ऐसी सुविधा से साक्षात्कार हुआ जो अत्यन्त सस्ते दर पर भारत के अधिकांश महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों की सैर लगातार पैंतीस दिनों तक कराती है। वह भी ऐसे कि यात्री को न तो अपने ठहरने का स्थान बदलना पड़ता और न ही सोने का बिस्तर। अपने सामान की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी नहीं, उसे यहाँ से वहाँ ढोने की फिक्र भी नहीं और खाने-पीने के लिए गर्म व ताजे घरेलू भोजन को मिस करने की मजबूरी भी नहीं है। मुझे तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं लगा।

रेलगाड़ी की चार बोगियों को विशेष रूप से तैयार कराकर  इस बड़ी यात्रा के लिए तीर्थयात्रा कम्पनी को उपलब्ध करा दिया जाता है। तीर्थयात्री को उसकी जो आरक्षित बर्थ यात्रा के प्रारम्भ में मिलती है वही अगले पैंतीस दिनों तक उसका बिस्तर होता है और वही कम्पार्टमेण्ट उसका घर बन जाता है। कम्पार्टमेण्ट की अन्य बर्थों के यात्री उसके परिवार के सदस्य बन जाते हैं और बगल का कम्पार्टमेण्ट उसका पड़ोसी घर हो जाता है। पूरी बोगी एक मुहल्ला और चार-पाँच बोगियाँ मिलकर एक शहर बना देती हैं। एक ऐसा शहर जिसमें देश के अलग-अलग राज्यों से आकर लोग बसे हुए हैं। सच में ‘भारत-दर्शन’ को निकले ये लोग स्वयं भारत का दर्शन कराते हैं। ये चारो डिब्बे अलग-अलग मार्गों पर अलग-अलग ट्रेनों से जुड़ते और टूटते हुए एक साथ देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुँचते रहते हैं।

मुझे यह सब देखने और जानने का सुअवसर तब मिला जब एक ऐसी ही यात्रा मण्डली बसन्त पञ्चमी के दिन इलाहाबाद पहुँची। इस यात्रा दल में मेरे गाँव के आठ लोगों की टोली में मेरे माता-पिता भी शामिल थे। उत्सुकतावश मैं सुबह सोकर उठने के बाद जल्दी-जल्दी तैयार होकर आठ बजे स्टेशन पहुँच गया। इलाहाबाद जंक्शन पर मजार वाली प्लैटफ़ॉर्म के दोनो ओर यात्री दल के दो-दो डिब्बे खड़े थे लेकिन उनमें ताला बन्द था। कम्पनी के स्टिकर से पहचान हुई जिसके कर्मचारियों ने बताया कि यात्रा बनारस से रात में ही यहाँ आ गयी थी। प्रातःकाल सभी यात्री लक्जरी कोच बसों से संगम क्षेत्र की ओर चले गये हैं। गंगा स्नान करके बड़े हनुमान जी, अक्षयबट आदि का दर्शन करके आनन्द भवन जाएंगे। वहाँ से भारद्वाज आश्रम देखने के बाद  बसें उन्हें करीब बारह बजे स्टेशन छोड़ जाएगी। प्लैटफ़ॉर्म पर यात्रियों का भोजन कम्पनी के रसोइए तैयार कर रहे थे।

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मैं फौरन लौटकर घर आया। कार्यालय में बॉस से मिलकर छुट्टी लिया और बच्चों को तैयार कराकर श्रीमती जी के साथ स्टेशन पर पहुँच गया। अपने सास-ससुर की पसन्द का भोजन तैयार करने में श्रीमती जी सुबह से ही व्यस्त रही थीं। चम्पा की मदद से हरे मटर की पूड़ियाँ, गोभी, लौकी, आलू और टमाटर की पकौड़ियाँ और पिताजी की पसन्दीदा खीर अपने हाथों तैयार कर डिब्बे में भर लिया था और झोले में अन्य जरूरी सामान डालकर हम स्टेशन पहुँच गये। ठोड़ी देर बाद यात्रियों का समूह प्लेटफ़ॉर्म पर आने लगा। प्रायः सबकी उम्र पचास के ऊपर थी। सबके चेहरे पर सन्तुष्टि का भाव तैर रहा था। लम्बी यात्रा की थकान जैसा कुछ भी नहीं दिखा। सबके गले में लटका परिचय पत्र जरूर ध्यान आकर्षित कर रहा था।

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एक चादर बिछाकर मैने अपने गाँव की यात्रा मण्डली को बिठाया। श्रीमती जी ने डिब्बा खोलकर अपने घर का पकवान परोसना शुरू किया और मैने इस यात्रा के प्रबन्धक को खोजना। वे निकट ही मिल गये। इतनी बड़ी यात्रा को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित करने वाला व्यक्ति निश्चित ही बहुत जानकार और गुणी होगा यह अनुमान पहले से कर चुका था।

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लाला लक्ष्मीनारायण अग्रवाल को देखकर कोई सहज ही अन्दाज लगा सकता है कि उन्होंने किसी मैनेजमेण्ट स्कूल से इवेन्ट मैनेजमेण्ट का कोई कोर्स नही किया है। न ही उन्होंने उन्होंने कोई प्रोफ़ेशनल डिग्री ही हासिल की होगी। लोहे की एक फोल्डिंग चेयर पर बैठे हुए वे अपने स्टाफ़ को जरूरी हिदायतें दे रहे थे। बीच-बीच में देश के अन्य हिस्सों में चल रही उनकी कम्पनी की अन्य तीर्थयात्रा बोगियों से आने वाले फोन काल्स भी सुनते जा रहे थे। अगली यात्रा की बुकिंग भी करते जा रहे थे, और टूर-पैकेज के बारे में भी बताते जा रहे थे। मल्टी-टास्किंग का बेजोड़ नमूना थे लालाजी।

“लालाजी, कबसे हैं आप इस धन्धे में…?” मैने उनका मोबाइल बन्द होते ही पूछ लिया।

“सरसठ से चल रहा है जी… बयालीस साल हो गये है” उन्होंने सहजता से उत्तर दिया।

मुझे अपनी अल्पज्ञता पर लज्जा आयी। जो काम १९६७ से वर्षानुवर्ष हो रहा है मुझे उसका पता अब जाकर चल पाया है। मैने झेंप छिपाते हुए आश्चर्य से पूछा, “लगातार बयालिस साल से आप यह वार्षिक यात्रा आयोजित कराते है…?”

“नहीं जी, …यह तो साल भर चलता रहता है। …अगला टूर एक हफ्ते बाद रवाना होगा। वह सत्रह दिन का है। साल में चार-पाँच हो जाते हैं”

“कैसे करते हैं आप यह सब?” मैने अपना कौतूहल छिपाते हुए पूछा।

“स्टाफ़ लगा रखा है जी। बाकी तो ऊपर वाला सब कराता है…सारा सामान हम साथ लेकर चलते हैं। लोकल केवल सब्जियाँ खरीदते हैं। हमारा स्टाफ़ अब ट्रेण्ड है। …सब प्रभु का आशीर्वाद है”

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मैने जब यात्रा के रूट और प्रमुख दर्शनीय स्थलों का व्यौरा जानना चाहा तो उन्होंने एक गुलाबी पर्चा थमा दिया। इस पर्चे में यात्रियों की जानकारी के लिए बहुत स्पष्ट और सूक्ष्म तरीके से सभी जरूरी बातें बतायी गयी थीं। नीचे सारणी में यात्रापथ का विवरण दूंगा। (अभी देर रात हो गयी है इसलिए इसे टालता हूँ)

वहीं पर गर्मागरम रोटियाँ सेंकी जा रही थीं। चार लोग मिलकर जिस कुशलता से लकड़ी की आग पर फुलके बना रहे थे उन्हें देखकर मैं लोभसंवरण न कर सका। आप यह वीडियो देखिए:

 

खाने में लहसुन-प्याज का प्रयोग नहीं होता। तेल, मिर्च और मसाला का प्रयोग भी बुजुर्गों की सहूलियत के हिसाब से कम किया जाता है। यात्री की उम्र, पसन्द और डाक्टरी सलाह का ध्यान रखते हुए सुबह की चाय, नाश्ता और दोपहर व शाम के भोजन को तैयार किया जाता था। हमारे गाँव के लोगों ने कहा कि ‘बहूजी’ ने इतना खिला दिया है कि अब कम्पनी का खाना हम नहीं खा सकते। हमें दावत दी गयी। हमने सहर्ष दावत कबूल की और सपरिवार डिब्बे में बैठ गये। डिब्बा क्या था बम्बई की किसी चाल का कमरा लग रहा था। ऊपर बाँधी गयी रस्सियों पर कपड़े झूल रहे थे। ऑलआउट मशीन और मोबाइल चार्जर की व्यवस्था सभी कूपों में थी। दवाइयाँ, चश्मे, और मोबाइल सबके सिरहाने रखे हुए। किसी चोर उचक्के या उठाई गीर के खतरे निश्चिन्त सबकुछ खुला हुआ जैसे घर में रखा हुआ हो। यात्रियों की आपसी बातचीत में घरेलू परिचय का पुट। इलाहाबाद में हम उनलोगों से मिलने वाले हैं यह पूरी बोगी के लोग जानते थे। वे सभी पिछले महीने भर से साथ जो थे।DSC02250

भोजन परोसने के लिए दक्ष कर्मचारी थे। सभी यात्रियों को उनकी बर्थ पर थालियाँ थमा दी गयीं। सादी सब्जी, तीखी-मसालेदार सब्जी, सादा चावल, मीठा चावल, मटर-पनीर स्पेशल (दाल के बदले) आदि बाल्टियों में भर-भरकर एक ओर से आते और जरूरत के हिसाब से थालियों में डालते हुए दूसरी ओर निकलते जाते। दस-पन्द्रह मिनट में ही स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्द्धक भोजन का काम पूरा हो गया।

वहाँ से लौटकर आया तो यही सोचता रहा कि स कम्पनी के बारे में आप सबको बताऊंगा। घर आकर गुलाबी पर्चा खोला तो उसमें सबसे पहले यही बताया गया था कि-

‘हमारी संस्था की सफलता को देखते हुए अन्य बहुत से अनुभवहीन व्यक्तियों ने नाम के आरम्भिक ‘श्री’ के स्थान पर अन्य नाम डिजाइन जोड़कर अपना नाम रख लिया है।और वे मिलते-जुलते नामों से VIP ए.सी. कोच से यात्रा करने के प्रलोभन द्वारा यात्रियों को भ्रमित कर रहे हैं। कृपया उनसे दस वर्ष पुराने यात्रियों की सूची रिकार्ड मांगे व उनके पुराने यात्रियों से सम्पर्क करके सुविधा, व्यवस्था की जानकारी करें तभी आपको वास्तविकता ज्ञात होगी। चूँकि हम यात्रियों को पूरी-पूरी सुविधा प्रधान करते हैं इसलिए हमारा खर्चा अन्य संस्थाओं से ज्यादा है। कृअपया आप हमारे पुराने यात्रियों से सुविधा व्यवस्था की जानकारी प्राप्त कर्रें व सन्तुष्ट होने के बाद हि सीट बुक कराएं।’ 

मुझे महसूस हुआ कि इस क्षेत्र में भी प्रतिस्पर्धा का दखल हो गया है। ग्राहकों (यात्रियों) को इससे लाभ मिलना ही है। धार्मिक आस्था के वशीभूत हिन्दुओं को चारोधाम व द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से अधिकांश की यात्रा एक मुश्त कराने वाली यह योजना इन कम्पनियों को आर्थिक लाभ चाहे जो दे रही हो लेकिन प्रतिवर्ष हजारों लोगों को पुण्य अर्जन में सहयोग और सेवा प्रदान करने वाली कम्पनी के कर्मचारी और प्रबन्धक पुण्य का लाभ जरूर कमा रहे हैं। आप क्या सोचते हैं?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

वीडिओ पता:  http://www.youtube.com/watch?v=4vIE27ViX4o

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