बहुत मिलावटी है जी… पुराण चर्चा

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मेरी पिछली पोस्ट पर मित्रों की जो प्रतिक्रियाएं आईं उनको देखने के बाद मैं दुविधा में पड़ गया। विद्वतजन की बातों को लेकर चर्चा को आगे बढ़ाया जाय या पुराण प्रपंच छोड़कर कुछ दूसरी बात की जाय। कारण यह था कि मैंने पुराणों के बारे में बहुत गहरा अध्ययन नहीं किया है। दो-चार पुस्तकों तक ही सीमित रहा हूँ। मेरा ज्ञान इस बात तक सीमित है कि यद्यपि वेद और पुराण एक ही आदिपुरुष अर्थात्‌ ब्रह्माजी द्वारा मूल रूप से रचित हैं, तथापि इनमें वर्णित ज्ञान, आख्यानों, तथ्यों, शिक्षाओं, नीतियों और घटनाओं आदि में एकरूपता होते हुए भी इनमें कुछ मौलिक भिन्नताएं है:

  • पुराण वेदों का ही विस्तृत और सरल स्वरूप है जो सामान्य गृहस्थ को लक्षित है।
  • वेद अपौरुषेय और अनादि है जिसे ब्रह्माजी ने स्वयं रचा था। किन्तु वेदव्यास जी ने जनमानस के कल्याणार्थ ब्रह्माजी द्वारा मौलिक रूप से रचित पुराण का  पुनर्लेखन और सम्पादन किया और इसके श्लोकों की संख्या सौ करोड़ से घटाकर चार लाख तक सीमित कर दी। अतः पुराण पौरुषेय भी है।
  • वेदों की साधना करने वाले योगी पुरुष ऋषि कहलाये जबकि पुराणों में वर्णित ज्ञान की बातों, मन्त्रों, उपासना विधियों और व्रत आदि का अनुसरण करने वाले योगी मुनि कहलाए।
  • वेदों की अपेक्षा पुराण अधिक परिवर्तनशील और श्रुति परम्परा पर निर्भर होने के कारण लम्बे समय तक स्मृतिमूलक रहे हैं। परिवर्तनशील प्रवृत्ति होने के कारण ही पुराणों में ऐतिहासिक घटनाओं का सटीक चित्रण मिल जाता है।

वेद-पुराण-उपनिषद वैसे तो समग्र वेद-पुराण के एक मात्र रचनाकार वेद-व्यास जी को माना जाता है लेकिन कोई भी इस विशद साहित्य का आकार जानकर यह सहज अनुमान लगा सकता है कि इतना विपुल सृजन किसी एक व्यक्ति के द्वारा अपने एक जीवनकाल में नहीं किया जा सकता।

भाई इष्टदेव जी ने मुझे मेल भेजकर याद दिलाया कि “…व्यास कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक पूरी परम्परा हैं। जिसने भी उस ख़ास परम्परा के तहत कुछ रचा उसे व्यास कहा गया। अभी भी कथा वाचन करने वाले लोगों को व्यास ही कहा जाता है….”

मेरे ख़याल से पुराणों का स्वरूप कुछ-कुछ हमारे ब्लॉगजगत जैसा रहा है। बल्कि एक सामूहिक ब्लॉग जैसा जिसमें अपनी सुविधा और सोच के अनुसार कुछ न कुछ जोड़ने के लिए अनेक लोग लगे हुए है। बहुत सी सामग्री जोड़ी जा रही है, कुछ नयी तो कुछ री-ठेल। बहुत सी वक्त के साथ भुला दी जा रही है। लिखा कुछ जाता है और उसका कुछ दूसरा अर्थ निकालकर बात का बतंगड़ बना दिया जा रहा है। लेकिन इसी के बीच यत्र-तत्र कुछ बेहतरीन सामग्री भी चमक रही है। अनूप जी के अनुसार यहाँ ८० प्रतिशत कूड़ा है और २० प्रतिशत काम लायक माल है। यहाँ सबको स्वतंत्रता है। चाहे जो लिखे, जैसे लिखे। इसपर यदि बेनामी की सुविधा भी हो तो क्या कहने? पुराणों के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ लगता है।

वैदिक ऋषि परम्परा से निकली ज्ञान की गंगा पुराणों की राह पकड़कर जैसे-जैसे आगे बढ़ती गयी उसमें स्वार्थ और लोलुपता का प्रदूषण मिलता गया। धार्मिक अनुष्ठान के नामपर कर्मकाण्ड और पाखण्डपूर्ण आडम्बर बढ़ते गये। पुरोहितों द्वारा यजमान के ऊपर दान-दक्षिणा की नयी-नयी मदें लादी जाने लगीं। धर्म-भीरु जनता को लोक-परलोक का भय दिखाकर उसकी गाढ़ी कमाई उड़ाने की प्रवृत्ति पुरोहितों और पण्डों में बढ़ने लगी। यही वह समय था जब हिन्दू धर्म के प्रति आम जनमानस में पीड़ा का भाव पैदा होने लगा और गौतम बुद्ध व महावीर जैन ने इन कर्म-काण्डों और आडम्बरों के विरुद्ध बौद्ध और जैन धर्म का प्रवर्तन कर दिया। हिन्दू कर्मकाण्डों और नर्क जाने के भय से पीड़ित जनता ने उन्हें हाथो-हाथ लिया। ऐसी विकट परिस्थिति पैदा करने में इन पुराणों का बड़ा दुरुपयोग किया गया था।

तो क्या यह मान लिया जाय कि पुराण अब बेमानी हो चुके हैं? क्या इनसे किनारा करके इन्हें कर्म-काण्डी पुरोहितों के हाथ में छोड़कर अब भी उन्हें मनमानी ठगी करने देना उचित है? अन्धविश्वासों और रूढ़ियों मे पल रही एक बड़ी आबादी आजभी इनपर आस्था रखती है। जिनकी आस्था नहीं है वे भी छिप-छिपाकर सत्यनारायण की कथा करा ही डालते हैं, या जाकर प्रसाद ही ले आते हैं। कदाचित्‌ एक अन्जाना डर उन्हें यह सब करने को प्रेरित करता होगा। कुछ तो सार-तत्व होगा इनमें…!

यहाँ यह भी उल्लेख कर दूँ कि जिन कर्मकाण्डों और आडम्बरों के खिलाफ़ सन्देश देकर ये नये धर्म खड़े हुए, कालान्तर में इनके भीतर भी उसी प्रकार की बुराइयाँ पनपने लगीं। इधर आदि शंकराचार्य (८वीं-९वीं शताब्दि)ने वेदान्त दर्शन की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए यह सन्देश दिया कि सारे वाह्याडम्बर मिथ्या हैं। एक मात्र सत्य ब्रह्म है। प्रत्येक जीवित व्यक्ति के भीतर निवास करने वाली आत्मा ब्रह्म का ही एक रूप है। भौतिक जगत एक माया है जो जीव को जन्म मृत्यु के बन्धन में बाँधे रखती है।

ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव ना परः

हमारे वैदिक ज्ञान भण्डार की मौलिक बातों का पुराणों में सरलीकरण कर दिया गया। कम पढ़े-लिखे गृहस्थ को सामान्य जीवनोपयोगी बातें समझाने के लिए भी धर्म का सहारा लिया गया। यहाँ धर्म का आशय केवल पूजा पद्धति और देवी देवताओं में आस्था पैदा करना नहीं रहा बल्कि मनुष्य के जीवन में जो कुछ भी धारण करने योग्य था वह धर्म से परिभाषित होता था। जो कुछ भी करणीय था उसे धार्मिक पुस्तकों में शामिल कर लिया गया और जो कुछ अकरणीय था उसके भयंकर परिणाम बताकर उन्हें रोकने की कोशिश की गयी। कदाचित्‌ शुभ-अशुभ और स्वर्ग-नर्क की अवधारणा इसी उद्देश्य से गढ़ी गयी होगी। हमारे ऋषि-मुनियों ने इन पुस्तकों को एक प्रकार से मनुष्य की आचार संहिता बना दिया था। लेकिन लालची पंडितों ने इसका रूप ही बिगाड़ दिया।

ऐसी स्थिति में इन आदिकालीन शास्त्रों को पूरा का पूरा खारिज नहीं किया जा सकता। उचित यह होगा कि इनकी समीक्षा इस रूप में की जाय कि इनमें छिपे मूल सन्देशों को अलग पहचाना जा सके और आधुनिक परिवेश में उनकी उपादेयता को चिह्नित किया जा सके। मेरा विश्वास है कि मानवकल्याण के इन सूत्रों को अपना कर और प्रसारित करके हम आजकल की अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान ढूँढ सकते हैं।

तो क्या आप सच्चे मोतियों की खातिर समुद्र-मन्थन करने को तैयार हैं?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

नोट: सत्यनारायण की कथा में ‘कथा के माहात्म्य’ का जिक्र और मूल कथा के लोप का सूत्र मिल गया है। अगले अंक में उसकी चर्चा होगी।

कितनी रक्षा- माँ दुर्गा द्वारा …पुराण चर्चा!

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मारकण्डेय पुराण को शाक्त सम्प्रदाय का पुराण कहा जाता है। इसका प्रमुख कारण है- इसमें भगवती दुर्गा के चरित्र तथा दुर्गासप्तशती का विस्तृत वर्णन। दुर्गासप्तशती के तीनो पौराणिक आख्यानों का वर्णन होने के कारण यह पुराण साधारण जन में अत्यन्त लोकप्रिय है। इसके अन्तर्गत भगवती दुर्गा की उत्पत्ति, उनके द्वारा महिषासुर, मधु, कैटभ, शुम्भ, निशुम्भ, रक्तबीज आदि दैत्यों के वध तथा राजा सुरथ समाधि वैश्य द्वारा भगवती दुर्गा से वरदान प्राप्त करने की कथाएं वर्णित हैं।

शारदीय नवरात्र में माँ दुर्गा की पूजा अपने-अपने ढंग से प्रायः सभी आस्थावान हिन्दू परिवारों में हो रही है। माँ दुर्गा की पूजा में गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित श्रीदुर्गासप्तशती नामक पुस्तक का बड़ा महत्व है। कदाचित् इस पुस्तक के बिना दुर्गापूजा का कोई अनुष्ठान कर पाना सम्भव ही न हो। मूलतः सात सौ श्लोकों और तेरह अध्यायों से युक्त दुर्गासप्तशती मारकण्डेय पुराण से ही ली गयी है।

चित्र यूट्यूब.कॉम से साभार

श्रीदुर्गासप्तशती पुस्तक में अनेक उपयोगी स्तोत्र, देवीसूक्त, रहस्य, और आरतियों का समावेश किया गया है। सप्तशती की पाठविधि भी सरल हिन्दी में मन्त्रों के अनुवाद सहित समझायी गयी है। इसी पाठ-विधि में अन्य तत्वों के साथ ही ‘देवी का कवच’, ‘अर्गलास्तोत्र’, व ‘कीलकमन्त्र’ हिन्दी अनुवाद सहित दिया गया है।

मैं यहाँ देवी के कवच की चर्चा करना चाहता हूँ। यहाँ देवी का उपासक सब प्रकार से अपनी रक्षा की कामना से भगवती दुर्गा के विविध ‘रूपों’ का आह्वाहन करता है; तथा प्रत्येक रुप से अपने अलग-अलग अंग विशेष की रक्षा करने की विनती करता है। इस वर्णन में एक ओर माँ दुर्गा के विविध रूप व नाम तो रोमांचित करते ही हैं, हजारों वर्ष पहले रचे गये इन श्लोकों में शरीर के विभिन्न अंगों को जिस सूक्ष्मता और वैज्ञानिक रीति से क्रमबद्ध करके प्रस्तुत किया गया है, वह भी कम रोचक नहीं है।

‘ए’ से लेकर ‘जेड’ श्रेणी की सुरक्षा व्यवस्था में लगी सरकारी एजेन्सियों और आपातकालीन चिकित्सा सेवा के प्रतिष्ठानों को इसे पढ़कर काफी कुछ सीखने को मिल सकता है। व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक और सामाजिक सुरक्षा के जितने भी आयाम हो सकते हैं, यहाँ उन सबको गिनाते हुए अलग-अलग देवी रूपों को इसकी जिम्मेदारी दी गयी है। लीजिए, इसे आप भी जानिए:

प्रथम भाग: कुछ रक्षक देवीरुप और उनके वाहन
1. चामुण्डा………………… प्रेत
2. वाराही…………………… भैंसा
3. ऐन्द्री……………………… ऐरावत हाथी
4. वैष्णवी…………………… गरुड़
5. माहेश्वरी………………… वृषभ (बैल)
6. कौमारी…………………… मयूर
7. ईश्वरी……………………… वृष
8. ब्राह्मी……………………… हंस

द्वितीय भाग: देवी द्वारा प्रयुक्त अस्त्रशस्त्र
शंख, चक्र, गदा, शक्ति, हल, मूसल, खेटक, तोमर, परशु, पाश, कुन्त, त्रिशूल, शार्ङ्गधनुष इत्यादि

तीसरा भाग: दस दिशाएं और उनकी रक्षक देवियाँ
1. पूर्व (प्राची)………………… ऐन्द्री (इन्द्रशक्ति)
2. आग्नेय……………………… अग्निशक्ति
3. दक्षिण………………………… वाराही
4. नैऋत्य……………………… खड्गधारिणी
5. पश्चिम (प्रतीची)………… वारुणी
6. वायव्य………………………… मृगवाहिनी
7. उत्तर……………………………. कौमारी
8. ईशान…………………………… शूलधारिणी
9. ऊर्ध्व (ऊपर )…………………. ब्रह्माणी
10.अधो भाग (नीचे )………… वैष्णवी

11. दसो दिशाओं से…………….. शववाहना चामुण्डा

चौथा भाग: शरीर के विविध अंग और उनकी रक्षक देवियाँ
1. अग्रभाग—————————– जया
2. पृष्ठ भाग—————————– विजया
3. वाम पार्श्व—————————- अजिता
4. दक्षिण पार्श्व————————- अपराजिता
5. शिखा——————————– उद्योतिनी
6. मस्तक—————————— उमा
7. ललाट——————————– मालाधरी
8. भौंह———————————- यशस्विनी
9. भौंहों का मध्य भाग——————- त्रिनेत्रा
10. नथुने——————————– यमघण्टा
11. नेत्रों का मध्य भाग——————- शङ्खिनी
12. कान———————————-द्वारवासिनी
13. कपोल——————————– कालिका
14. कर्णमूल—————————— शांकरी
15. नासिका—————————— सुगन्धा
16. उपरी ओठ—————————- चर्चिका
17. निचले ओठ————————– अमृतकला
18. जिह्वा——————————— सरस्वती
19. दाँत———————————- कौमारी
20. कंठप्रदेश—————————– चण्डिका
21. गले की घाँटी————————– चित्रघण्टा
22. तालु———————————- महामाया
23. ठोढ़ी (चिबुक)————————- कामाक्षी
24. वाणी———————————- सर्वमङ्गला
25. ग्रीवा (गर्दन)————————– भद्रकाली
26. पृष्ठवंश (मेरुदण्ड)———————- धनुर्धरी
27. बाहरी कंठ-प्रदेश———————– नीलग्रीवा
28. कंठ की नली————————— नलकूबरी
29. कंधे———————————— खड्गिनी
30. भुजाएं——————————— वज्रधारिणी
31. हाथ————————————- दण्डिनी
32. अंगुलियाँ——————————- अम्बिका
33. नाखून———————————- शूलेश्वरी
34. कुक्षि(पेट)——————————- कुलेश्वरी
35. दोनो स्तन—————————— महादेवी
36. मन————————————- शोकविनाशिनी
37. हृदय————————————- ललिता देवी
38. उदर————————————- शूलधारिणी
39. नाभि———————————— कामिनी
40. गुह्यभाग——————————— गुह्येश्वरी
41. लिङ्ग———————————— पूतना, कामिका
42. गुदा————————————– महिषवाहिनी
43. कटि-प्रदेश(कमर)———————— भगवती
44. घुटना———————————— विन्ध्यावासिनी
45. पिण्डलियाँ——————————- महाबला
46. गुल्फ(घुट्ठियाँ)—————————- नारसिंही
47. पादपृष्ठ———————————– तैजसी
48. पैरों की अंगुलियाँ———————— श्रीदेवी
49. तलुए———————————— तलवासिनी
50. नख————————————– दंष्ट्राकराली
51. केश————————————– ऊर्ध्वकेशिनी
52. रोमकूप———————————- कौबेरी
53. त्वचा———————————— वागीश्वरी
54. रक्त,मज्जा,वसा,मांस,हड्डी,मेदा———- पार्वती
55. आँत————————————- कालरात्रि
56. पित्त————————————- मुकुटेश्वरी
57. मूलाधार(पद्मकोश)———————- पद्मावती
58. कफ————————————- चूड़ामणि देवी
59. नख का तेज—————————– ज्वालामुखी
60. शारीरिक संधियाँ———————— अभेद्या
61. वीर्य————————————– ब्रह्माणि
62. छाया————————————- छत्रेश्वरी
63. अहंकार,मन,बुद्धि————————- धर्मधारिणी
64. वायु (प्राण,अपान,व्यान,उदान,समान)—- वज्रहस्ता
65. प्राण————————————– कल्याणशोभना
66. विषय (रस,रूप,गन्ध,शब्द,स्पर्श)———- योगिनी
67. त्रिगुण (सत्व,रज,तम)——————— नारायणी
68. आयु————————————– वाराही
69. धर्म————————————— वैष्णवी
70. यश,कीर्ति,लक्ष्मी,धन,विद्या—————- चक्रिणी
71. गोत्र—————————————- इन्द्राणी

(अंगो से इतर कुछ अन्य महत्वपूर्ण उपादेय)
72. पशु———————————- चण्डिका
73. पुत्र———————————– महालक्ष्मी
74. पत्नी———————————- भैरवी
75. पथ में——————————– सुपथा
76. मार्ग में——————————- क्षेमकरी
77. राजदरबार में————————- महालक्ष्मी
78. सम्पूर्ण भयों से———————– विजया देवी
79. कवच में जो छूट गया हो————– देवी दुर्गा

🙂…आशा करता हूँ कि अब आप किसी देवी प्रतिमा के आगे या किसी मन्दिर में खड़े होंगे तो वहाँ अपनी मांग रखने में कुछ ज्यादा समय लेंगे।
🙂…असुरक्षा भाव में जी रहे माननीय नेतागण इसे भूल जाने की कोशिश करें अन्यथा सरकार की मुसीबत बढ़ सकती है। 🙂…सुरक्षाकर्मियों की मांग मे उछाल आ सकता है।

(सिद्धार्थ)