त्रिवेणी महोत्सव में प्रयाग की धरती पर उतरे सितारे…।

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उन्नीस फरवरी से पच्चीस फरवरी तक लगातार सात दिनों तक इलाहाबाद में गीत, संगीत, नृत्य, कविता और शायरी की स्वर लहरियाँ यमुना नदी के तट पर बने शानदार मंच से बिखरती रहीं और रोज शाम को शहर का सारा ट्रैफिक बोट-क्लब मुक्तांगन की ओर मुड़ जाता रहा। सेवेन वण्डर्स ने जो विशाल मंच तैयार किया था उसकी शोभा देखते ही बनती थी। इस मंच पर जब पहले दिन उद्‌घाटन कार्यक्रम में आगरा से आये सुधीर नारायण ने अपने भजनो के साथ सुमधुर शुरुआत की तभी यह अन्दाज लग गया कि अगले कुछ दिन अभूतपूर्व आनन्द के रस में डूबने का अवसर मिलने वाला है।

उद्‌घाटन कार्यक्रम की औपचारिकता पूरी होने के तत्काल बाद श्रेया घोषाल ने एक रेल के डिब्बे से मंच पर उतरकर सबको रोमांचित कर दिया। दर्शक दीर्घा में शान्ति बनाए रखना पुलिस वालों के लिए असम्भव सा हो गया। एक के बाद एक हिट गानों को सजीव सुनते हुए दर्शक जोश में  खड़े होकर नाचते रहे, जाने कितनी कुर्सियाँ शहीद हुईं मगर जश्न का माहौल थमने का नाम नहीं ले रहा था। भगवान ने इस लोकप्रिय गायिका को जितना सुरीली आवाज दी है उतनी ही सुन्दरता से भी नवाज़ा है।

एक से बढ़कर एक उम्दा कार्यक्रम देखकर देर रात दो-तीन बजे घर लौटना, दिन भर उनींदी आँखों से दफ़्तर का काम निपटाना  और शाम होते ही फिर उसी महोत्सव का रुख कर लेना मेरा रूटीन बन गया… ऐसे में ब्लॉगिंग क्या खाक होती…? पिछली पोस्ट पर प्राप्त टिप्पणियों में लगभग सभी ने मुझसे रिपोर्ट की उम्मीद जतायी थी। मैने इसका मन भी बनाया था। कैमरा भी साथ लेकर जाता रहा, लेकिन सारी तैयारी धरी रह गयी। उस माहौल में तो बस झूम कर नाच उठने का मन करता था। डायरी कलम संभालने और फोटो खींचने की सुध ही नहीं रही। फिर भी आप लोगों को निराश नहीं करना चाहता हूँ। कुछ तस्वीरें जो मैने उतार ली थीं उनको देखकर माहौल का अन्दाज लगाइए। शेष बातें और वीडियो अगली पोस्ट में….

 

DSC02332 मंच की भव्यता देखते ही बनती थी

आइए देखते हैं कुछ यादगार तस्वीरें

 

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       जबर्दस्त आतिशबाजी

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मन्त्री जी ने उद्‍घाटन किया

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लोकनृत्य-राजस्थानी चाकरी

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लोकनृत्य-मणिपुरी

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लोकनृत्य-मथुरा की होली

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लोकनृत्य-कश्मीरी

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       श्रेया घोषाल

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बच्चों के साथ (बीच में वागीशा)

 

malini awasthi 

मालिनी अवस्थी की सज-धज एक भारतीय नारी की पारम्परिक वेश-भूषा में थी तो गायन में लोकरंग का अद्‍भुत पुट था। दर्शकों के बीच में जाकर उनसे सीधा सम्वाद करने की अदा ने सबका मन मोह लिया।

abhijit bhattacharya

अभिजीत दा ने अपने हिट गीतों से सबको मन्त्रमुग्ध तो किया ही उनके साथ आयी नृत्य मण्डली ने सभी नौजवानों को साथ थिरकने पर मजबूर कर दिया। दर्शकों की फ़रमाइश पर इन्होंने किशोर कुमार के सदाबहार गीत भी अलग अन्दाज में सुनाए।

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बच्चों, नौजवानों समेत सभी दर्शक अभिजीत दा से हाथ मिलाने और बात करने के लिए उन तक पहुँचना चाहते थे लेकिन इसका सौभाग्य मिला आयोजन से जुड़े अधिकारियों को, मुख्य अतिथि को और मंच की संचालक उद्‌घोषिका को

 

शान की लुटायी मस्ती बटोरने के लिए जब दर्शक अनियन्त्रित होने लगे तो आई.जी. और डी.आई.जी. खुद ही स्थिति संभालने के लिए खड़े हो गये (देखिए सबसे नीचे वाले बायें चित्र में)। भीड़ ने उनकी एक न सुनी। कार्यक्रम समय से पहले बन्द करना पड़ा। लेकिन तबतक सैकड़ों कुर्सियाँ टूट चुकी थीं जिनपर खड़े होकर नौजवानों ने डान्स किया था।

shaan

बहती हवा सा था वो… (शान)

शान और जूनू

  शान और जूनू


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पुलिस कप्तान हुए हलकान

DSC02496 मन्त्री जी द्वारा शान का सम्मान

तस्वीरें तो और भी ढेर सारी हैं लेकिन इनसे पेट तो भरने वाला है नहीं, इसलिए अब रहने देता हूँ। गिरिजेश भइया की इच्छा थी मालिनी अवस्थी की रिकॉर्डिंग सुनने की। मैने उसे रिकॉर्ड तो कर लिया है लेकिन सोनी के डिजिटल कैमरे में आवाज साफ़ नहीं रिकॉर्ड हो पायी है। सावधानी बरतते हुए मैने एनालॉग कैमरे (Handycam) से भी रिकॉर्ड किया है जो बहुत स्पष्ट और कर्णप्रिय है लेकिन इसको कम्प्यूटर में चढ़ाने के लिए एक कन्वर्टर की जरूरत है। मेरा टीवी ट्यूनर कार्ड अभी ऑडियो इनपुट नहीं ले रहा है। कोई तकनीकी विशेषज्ञ इसमें मदद कर सकता है क्या?

समीर जी मुझे आपकी फरमाइश भी याद है। लेकिन यही हाल कवि सम्मेलन का भी है। कैसेट में रिकॉर्डिंग मौजूद है लेकिन कम्प्यूटर पर कैसे चढाऊँ?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

हमें खेद है कि हम इनकी चर्चा न कर पाये-

उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र के कलाकार, सुगन्धा मिश्रा (लाफ़्टर चैलेन्ज), हिमानी और तोषी, वडाली बन्धु, निज़ामी बन्धु, गुलाम अली, अमजद अली खान, कुँवर बेचैन, राहत इन्दौरी, बसीम बरेलवी, मुनव्वर राना, ताहिर फ़राज, प्रदीप चौबे, पद्‍मश्री रंजना गौहर (ओडिसी), नीरजा श्रीवास्तव(कत्थक), इमरान प्रतापगढ़ी, यश मालवीय, शबा बलरामपुरी और ढेर सारे अन्य कवि, शायर और कलाकार जिन्होंने दर्शकों को बाँधे रखा।

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क्या लिखूँ…? बताइए न…!

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ब्लॉगरी भी अजीब फितरत है। इसमें लगे रहो तो मुसीबत और न लग पाओ तो और मुसीबत। अभी एक पखवारे तक जो लोग इसमें लगे रहे वे निरापद लेखन की खोज में हलकान होते रहे और मैं इस चिन्ता में दुबला होता रहा कि मैं तो कुछ लिख ही नहीं पा रहा हूँ।

28052009306 बेटे के मुण्डन में गाँव जाना क्या हुआ मैने उसकी व्यस्तता की आड़ में खूब आलस्य का मजा लिया। कार्यक्रम की फोटुएं भी भतीजे की तगड़ी मोबाइल में वहीं छोड़ आया। घर-परिवार वालों ने सलाह दी कि बच्चे को ज्यादा एक्सपोजर दोगे तो नज़र लग जाएगी। बस मेरे आलस्य की बेल इस सलाह की डाल का सहारा पाकर लहलहा उठी। आज ही कुछ तस्वीरें मेरे हाथ लगी हैं लेकिन कौन सी लगाऊँ समझ नहीं पा रहा। …चलिए कोट माई के चरणों में खड़े सत्यार्थ की मुस्कान का आनन्द लीजिए।

इधर सत्यार्थ की मौसी श्रीमती रागिनी शुक्ला जी से भी भेंट हुई। उन्होंने एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की विधवा की करुण सत्यकथा हमें भेंट की। सोचा था पिछली दो कहानियों की कड़ी में उनकी तीसरी कहानी भी यहाँ पोस्ट कर दूंगा। लेकिन यहाँ घर में ही मात खा गया। श्रीमती जी ने अपनी दीदी की कहानी पर पहला हक़ जता दिया और वह भी टूटी-फूटी पर जा लगी।

उधर छ्ठे वेतन आयोग ने बुजुर्गों के साथ थोक भाव से सहानुभूति दिखायी है। अस्सी साल की उम्र पाते ही उन्हें २० प्रतिशत अधिक पेंशन दिए जाने और उसके बाद प्रत्येक पाँच साल पर इतना ही और बढ़ा देने का निर्णय ले लिया गया है। सौ साल पार करते ही वेतन के बराबर पेंशन हो जाएगी। इसमें अपने पति के स्थान पर पारिवारिक पेंशन पाने वाली अनेक बुजुर्ग और अनपढ़ महिलाएं ऐसी हैं जिन्हें स्वयं अपनी उम्र नहीं मालूम, और न ही कोई अभिलेख ऐसे हैं जो ठीक-ठीक उम्र बता सकें। सी.एम.ओ.(Chief Medical Officer) दफ़्तर आयु बताने का काउण्टर खोलकर बैठा है; जहाँ फौरन आयु का प्रमाणपत्र बन जा रहा है। शरीर पर ‘आला’ (Stethoscope) लगा कर और जीभ-मुँह देखकर आयु का निर्धारण कर दिया जा रहा है। सुना था कि किसी खास हड्डी का एक्स-रे लेकर सही आयु बतायी जा सकती है। लेकिन वहाँ शायद इसकी जरूरत नहीं पड़ रही।  विज्ञ पाठक इसपर प्रकाश डाल सकते हैं। डॉक्टर ब्लॉगर्स से विशेष अनुरोध है।

सावित्री देवी हाई स्कूल १९४४ऐसे में सावित्री देवी जैसी पेंशनर से मन प्रसन्न हो गया जिन्होंने १९४४ में हाई स्कूल की परीक्षा पास करके अपना प्रमाणपत्र सजो कर रखा है और आज उसका लाभ ८२ साल की उम्र में पाने जा रही हैं।

गाँव में लगभग सभी बच्चे बोर्ड परीक्षाओं में अच्छे अंको के साथ सफल रहे। वे भी जिन्हें खुद ही अपनी सफलता की आशा नहीं थी। नकल महायज्ञ की घनघोर सफलता ने सारे रिकार्ड पीछे छोड़ दिए। लड़कियाँ एक बार फिर लड़कों से आगे रहीं। इस शीर्षक की वार्षिक पुनरावृत्ति अखबारों में इस बार भी पूरे जोश से हुई। इसमें छिपी विडम्बना पर कुछ कहने की इच्छा थी, लेकिन संयोग से मेरी नज़र एक अज्ञेय ब्लॉगर की पोस्ट पर पड़ गई जहाँ इन साहब ने इस विषय पर काफी कुछ कह दिया है। सो यह प्रोजेक्ट भी जाता रहा।

Image039एक दिन के लिए ससुराल जाना हुआ। आम के बाग में बन्दरों की सेना समायी हुई थी। गाँव भर के लड़के बन्दरों को भगाने के बहाने गुलेल लेकर वहाँ जमा थे। उनकी निगाह बन्दरों द्वारा काटकर या तोड़कर गिराये जा रहे आमों पर अधिक थी। लेकिन जिस नन्हें और लुप्तप्राय जीव ने वहाँ मेरा मन मोहा वह थी वहाँ के पुराने मकान में जहाँ-तहाँ घोसला बनाकर रहने वाली नन्हीं गौरैया। घर के कोने-कोने में निर्भय होकर चहकने वाली और चुहू-चुहू की आवाज से पूरा घर गुंजायमान करने वाली गौरैया का बड़ा सा परिवार मुझे एक दुर्लभ आनन्द दे गया। मोबाइल से कठिनाई पूर्वक खींचे गये फोटू तो अभी भी सुरक्षित हैं लेकिन इस लुप्त होती प्रजाति पर एक खोजी और वैज्ञानिक रिपोर्ट बनाने के सपने ने इसपर भी एक पोस्ट को रोक रखा है। डॉ. अरविन्द जी या तसलीम जी कुछ मदद करें तो अच्छा हो।

लोकसभा चुनावों के परिणामों से मायावती जी को अपने खिसकते जनाधार का अंदेशा हुआ तो उन्होंने सत्ता की पकड़ मजबूत करने के लिए कई बड़े प्रशासनिक फैसले कर डाले। उस समय जब सरकारी अफसर ट्रान्सफर सीजन की तैयारी कर रहे थे और अच्छी पोस्टिंग के लिए अपने मन्त्रीजी को प्रसन्न करने के रास्ते तलाश रहे थे तभी मैडम ने शून्य स्थानान्तरण की नीति घोषित कर दी। कहते हैं कि कितनों के हाथ के तोते उड़ गये। लेकिन मैं स्वयं एक सरकारी मुलाजिम होने के नाते इन सुनी-सुनायी बातों पर चर्चा करने से बचता रहा।

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गाँव पर इस बार सन्ताइन और उनकी हिरमतिया से भेंट हुई। जब हम ‘कोट माई’ के स्थान पर बाबू के बाल चढ़ाने गये तो देखा कि वहीं पंचायत भवन के बरामदे में दोनो माँ-बेटी परित्यक्त और नारकीय जीवन जी रहे है। डिस्कवरी चैनेल पर दिखने वाला सोमालिया का भुखमरी का दृश्य वहाँ साक्षात्‌ उपस्थित था। मेरे कुछ मित्र और रिश्तेदार जिन्होंने हिरमतिया की कहानी पढ़ रखी थी वे भी उन्हें सजीव देककर आहत हो गये। लेकिन यहाँ सच कहूँ तो चाहकर भी मुझे इस दारुण कथा का अग्र भाग लिखने की हिम्मत नहीं हुई।

शशि पाण्डेय उधर इलाहाबाद संसदीय सीट की निर्दल प्रत्याशी शशि पाण्डेय ने सबसे कम वोट पाने के बाद अगले पाँच साल के लिए जो लक्ष्य निर्धारित किया है उसमें सबसे पहला लक्ष्य है- एक दूल्हा तलाशकर उससे शादी रचाना, उसके साथ देश विदेश घूमकर मजे करना और घर-गृहस्थी बस जाने के बाद पुनः जनसेवा के मैदान में कूद जाना। यह सब मुझे तब पता चला जब वो परिणाम घोषित होने के बाद अपने चुनावी खर्च का आखिरी हिसाब जमा करने के सिलसिले में मेरे कार्यालय आयी थीं। कल मुझे फोन करके पूछ रही थीं संसद में महिला आरक्षण बिल के बारे में मेरा क्या नजरिया है। मैने उनका नजरिया पू्छा तो बोलीं कि ‘आइ अपोज इट टूथ एण्ड नेल’ कह रहीं थीं कि इससे तो अगड़े कांग्रेसियों की बहुएं और बेटियाँ ही संसद में भर जाएंगी। …एक बार फिर उनके साहसी कदम की चर्चा करना चाहता था लेकिन उन्हीं के डर से आइडिया ड्रॉप कर दिया। निरापद लिखने का दौर जो चल पड़ा है इन दिनों…। 🙂

अभी एक शादी में शामिल होने के लिए गोरखपुर तक ट्रेन से जाना-आना हुआ। सफर के दौरान लालू जी की चमत्कारी सेवाओं से लेकर उनके निर्णयों को पलटने वाली ममता बनर्जी की खूब गर्मागर्म चर्चा सुनने को मिली। लालूजी के साइड मिडिल बर्थ की खोज पर लानत भेंजने वालों के कष्ट को स्वयं महसूस करने का मौका मिला। लेकिन जो बर्थें अब निकाली जा चुकी हैं उनकी चर्चा बेमानी लगती है। साइड अपर बर्थ को भी ऊपर सरकाकर जो छत से सटा दिया गया था वो अभी वहीं अटकी हुईं हैं और मुसल्सल कष्ट देती जा रही हैं। यह सब लिखकर मैं उस जनादेश का अनादर नहीं करना चाहता जो लालूजी को इतिहास की वस्तु बना चुका है। अब लालू ब्रैण्ड की टी.आर.पी. नीचे हो चली है।

तो मित्रों, ये सभी मुद्दे मेरे मन में पिछले एक पखवारे से उमड़-घुमड़ रहे थे लेकिन एक पूरी पोस्ट के रूप में नहीं आ सके। अभी कल जब मैने एक शत-प्रतिशत निरापद पोस्ट देखा तो मन में हुलास जगा कि एक अदद पोस्ट तो चाहे जैसे निकाली जा सकती है। लेकिन बाद में किसी ने मेरे कान में बताया कि यह निरापद पोस्ट भी हटाये जाने के आसन्न संकट से दो-चार है तो मेरे होश गु़म हो गये।

अब तो यह सोच ही नहीं पा रहा हूँ कि क्या लिखूँ…! आप विषय बताकर मेरी मदद करिए न…! सादर!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

त्रिवेणी महोत्सव सम्पन्न… अब ब्लॉगरी

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Image065 पिछला पूरा सप्ताह ब्लॉगरी से जुदा होकर त्रिवेणी महोत्सव की धूम में खो जाने वाला रहा। रात में दो-ढाई  से चार बजे तक रंगारग कार्यक्रमों का आनन्द उठाने के बाद घर लौटता, सुबह यथासम्भव जल्दी उठकर बैडमिण्टन कोर्ट जाता, लौटकर नहा-धो तैयार होकर ऑफिस जाता, दिनभर ऊँघते हुए काम निपटाना और शाम होते ही फिर यमुना तट पर सजी महफिल में शामिल हो जाता।

शुरुआत गंगापूजन के बाद जोरदार आतिशबाजी से हुई। फिर जसवीर जस्सी ने पंजाबी पॉप की मस्ती लुटायी। ‘दिल लै गयी कुड़ी गुजरात की’ पर दर्शक झूम उठे।

डोना गांगुली का ओडिसी बैले, राजा हसन और सुमेधा की जोड़ी का फिल्मी गायन और भोर में साढ़े तीन बजे तक चलने वाला मुशायरा दूसरे दिन दर्शकों को बाँधे रखा।

तीसरे दिन भरतनाट्यम शैली में ‘रणचण्डी रानी लक्ष्मी बाई की वीरगाथा’ नृत्यनाटिका देखने के बाद दर्शकों ने सोनू निगम की ‘विजुरिया’  पर दिल खोलकर डान्स किया। दो घण्टे की अद्‌भुत प्रस्तुति में सोनू ने अपनी प्रतिभा से सबको चमत्कृत कर दिया।

चौथे दिन इलाहाबाद के स्कूली बच्चों के नाम रहा। स्थानीय बाल कलाकारों ने अपनी कला से मन को मोह लिया। बॉलीवुड की स्पष्ट छाप इन नन्हें कलाकारों पर देखी जा सकती थी।

अलपवयस्का रीम्पा शिवा ने तबलावादन में जो महारत हासिल कर ली है उसे देख-सुन कर सबने दाँतों तले अंगुली दबा ली। पाचवें दिन ही कॉमेडी सर्कस के चैम्पियन वी.आई.पी. (विजय) ने अपने गले से जो इक्यावन फिल्मी अभिनेताओं और राजनेताओं की आवाज निकाली वह अद्वितीय रही। के.शैलेन्द्र ने किशोर कुमार के गीत हूबहू नकल करके सुनाये और काफी तालियाँ बटोरी।

छठे दिन हर्षदीप कौर ने फिल्मी गीतों पर दर्शकों को खूब नचाया। उसके बाद विराट कवि सम्मेलन सुबह चार बजे तक चला। सुनील जोगी, विष्णु सक्सेना, सरदार मन्जीत सिंह, विनीत चौहान और वेदव्रत वाजपेयी आदि जैसे पन्द्रह कवि खूब सराहे गये।

सातवें और आखिरी दिन सुरमयी शाम की शुरुआत भजन संध्या और शाम-ए-ग़ज़ल को मिलाकर सजायी गयी। सुशील बावेजा, प्रीति प्रेरणा और इनके साथ पं. अशोक पाण्डे के तबले से निकली रामधुन पर दर्शक झूम उठे। इसके बाद के अन्तिम कार्यक्रम ने सर्वाधिक भीड़ बटोरी। विशाल और शेखर की हिट संगीतकार जोड़ी  जब अपने साजिन्दों के साथ स्टेज पर उतरी तो दर्शकों में जोश का जैसे तूफान उमड़ पड़ा। छोटे बच्चों से लेकर बड़े बूढ़े तक लगातार तालियाँ बजाते और थिरकते रहे। कुर्सियों के ऊपर खड़े होकर नाचते गाते युवा दर्शक कार्यक्रम का हिस्सा बन गये।

इस साल का त्रिवेणी महोत्सव हमारे मानस पटल पर एक अविस्मरणीय छाप छोड़ गया।

इस बीच ब्लॉगजगत में काफी कुछ बह गया। वैलेण्टाइन डे के आसपास गुलाबी चढ्ढियाँ छायी रहीं। सुरेश चिपलूकर जी और शास्त्री जी ने इस अभियान पर प्रश्नचिह्न खड़े किए तो बात बढ़ते-बढ़ते कहाँ की कहाँ पहुँच गयी। बहुत सी पोस्टें आयीं। मैने जहाँ तक देखा किसी भी पोस्ट में प्रमोद मुथालिक द्वारा मंगलौर में किए जाने वाले हिंसक कुकृत्य का समर्थन नहीं किया गया। और न ही किसी ब्लॉगर ने शराब खाने में जाकर जश्न मनाने को महिमा मण्डित किया। दोनो बातें गलत थीं और दोनो का समर्थन नहीं हुआ। इसके बावजूद पोस्टों की विषय-वस्तु पर गुत्थम-गुत्थी होती रही। केवल बात कहने के ढंग पर एतराज दर्ज होते रहे। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मर्यादा, वर्जना, नैतिकता, संयम, समानता, आदि कि कसौटी पर ‘स्त्री-विमर्श’ होता रहा।

जो चुप रहे उन्हें भी इस पक्ष या उस पक्ष के साथ जोड़ने का प्रयास हुआ। मुझे लगता है कि इस सहज सुलभ माध्यम की प्रकृति ही ऐसी है कि भीतर से कमोवेश एकमत होते हुए भी हमें अनर्गल विवाद की ओर बढ़ जाने का खतरा बना रहता है। कदाचित टीवी चैनेलों की तरह यहाँ भी टी.आर.पी.मेनिया अपने पाँव पसार रहा है। इसीलिए एक-दूसरे पर शंका पर आधारित आरोप-प्रत्यारोप लगते रहते हैं। फिर सफाई देने-लेने का व्यापार चलता रहता है।

क्या ऐसा करके हम ‘बन्दर के हाथ में उस्तरा’ थमाने वाली उक्ति चरितार्थ नहीं कर रहे हैं…?

अन्त में..

विष्णु सक्सेना ने कवि सम्मेलन में अपना सबसे प्रसिद्ध गीत भी सुनाया। यूँ तो उनकी आवाज में सुनने का अलग ही मजा है लेकिन इसके बोल भी बहुत प्यारे हैं। देखिए…

रेत पर नाम लिखने से क्या फायदा
एक आयी लहर कुछ बचेगा नहीं…
तुमने पत्थर का दिल हमको कह तो दिया
पत्थरों पर लिखोगे मिटेगा नहीं…

मैं तो पतझड़ था फिर क्यूँ निमन्त्रण दिया
ऋतु वसन्ती को तन पर लपेटे हुए
आस मन में लिए प्यास मन में लिए
कब शरद आयी पल्लू लपेटे हुए
तुमने फेरी निगाहें अन्धेरा हुआ
ऐसा लगता है सूरज उगेगा नहीं…

मैं तो होली बना लूँगा सच मान लो
तुम दिवाली बनोगी ये आभास दो
मैं तुम्हें सौंप दूंगा तुम्हारी धरा
तुम मुझे मेरे पंखों को आकाश दो
उंगलियों पर दुपट्टा लपेटो न तुम
यूँ करोगे तो दिल चुप रहेगा नहीं…

आँख खोली तो तुम रुक्मिणी सी दिखी
बन्द की आँख तो राधिका सी लगी
जब भी सोचा तुम्हें शान्त एकान्त में
मीराबाई सी एक साधिका तुम लगी
कृष्ण की बाँसुरी पर भरोसा रखो
मन कहीं भी रहे पर डिगेगा नहीं…

विष्णु सक्सेना

संगम से यमुना पुल तक नौका-विहार

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माघ की पूर्णिमा का स्नान सम्पन्न होने के बाद प्रयाग का माघ मेला अपने अवसान पर पहुँच गया है। कल्पवासी भी संगम क्षेत्र का प्रवास पूरा करके अपने घर की राह पकड़ रहे हैं। साइबेरिया से आने वाले प्रवासी पक्षी भी ठंडक समाप्त होने के बाद अपने देश को लौटने वाले हैं।

वसन्त का आगमन हो ही चुका है। इस सुहाने मौसम में संगम क्षेत्र की छटा निराली हो जाती है। हल्की गुनगुनी धूप में खुली नाव में बैठकर यमुना के गहरे हरे पानी पर अठखेलियाँ करते प्रवासी पक्षियों के बीच सैर करना अद्‌भुत आनन्द देने वाला है। गत दिनों सपरिवार इस सुख का लाभ उठाने का अवसर मिला।

आप जानते ही हैं कि इलाहाबाद में यमुना नदी गंगा जी में मिलकर परम पवित्र संगम बनाती है। संगम पर मिलने से ठीक पहले यमुना पर जो आखिरी पुल बना है वह अभी बिलकुल नया (सन्‌ २००४ ई.) है तथा आधुनिक अभियान्त्रिकी का सुन्दर नमूना भी है। दो विशालकाय खम्भों से बँधे तारों ले लटकता हुआ (Cable-stayed bridge) यह ६१० मीटर लम्बा पुल संगम क्षेत्र में आने वाले लोगों के लिए एक अतिरिक्त आकर्षण का केन्द्र बन गया है।

Structure: Allahabad Yamuna River Bridge
Location: Allahabad, Uttar Pradesh, India
Structural Type:
 

Cable-stayed bridge
H-pylon, semi-fan arrangement

Function / usage:
 

Road bridge

eight-lane highway

Next to: Allahabad Yamuna River Bridge (1911)
main span 260 metre
total length 610 metre
girder depth 1.4 metre
deck width 26 metre
deck slab thickness 250 millimetre

मोटर चालित नौका पर बैठकर जब हम संगम से यमुना जी की ओर धारा की विपरीत दिशा में इस पुल की दिशा में बढ़े तो मेरे मोबाइल का कैमरा आदतन सक्रिय हो उठा:

पुल ११ नाव पर से नया पुल ऐसा दिखता है- पीछे पुराना पुल
पुल १४ किनारे के बाँध से दिखती पुल के नीचे जाती नाव
पुल ९ पुल के नीचे से लिए गये चित्र में इन्द्रधनुष …?
पुल १ एक दूसरी नाव से क्रॉसिंग भी हुई
 पुल ५यहाँ यमुना की गहराई की थाह नहीं है
पुल २ किला-घाट : बड़े हनुमान जी पास में ही लेटे हुए हैं
पुल ८अकबर का किला यमुना जी को छूता हुआ खड़ा है 
पुल ४ यमुना जी की सतह पर कलरव करते विदेशी मेहमान
पुल १३ यमुना तट पर वोटक्लब जहाँ ‘त्रिवेणी-महोत्सव’ होगा 
पुल ७पुराना यमुना पुल (निर्माण सन्‌ १९११ई.)

नाव से हम संगम के निकट बने घाट पर उतरे। यमुना का गहरा हरा और साफ पानी गंगाजी के मटमैले किन्तु ‘पवित्र’ जल से मिलता हुआ एक अद्‌भुत कण्ट्रॉस्ट बना रहा था।

पुल ६

बदलता रंग:  संगम पर गंगाजी से मिलती हुई यमुनाजी

कुछ तस्वीरें बाल-गोपाल की इच्छा पर यहाँ देना जरूरी है:

Image051 सारथी पुल १० दादी और बाबा जी
Image063 माँ-बेटा पुल १७
अभी क्यों उतार दिया नाव से?

अनावश्यक सूचना:)

अगले सप्ताह से (१५ से २१ फरवरी तक) त्रिवेणी महोत्सव शुरू हो रहा है। लगातार सात शामें यमुना तट पर गुजरेंगी। उस दौरान अपनी ब्लॉगरी को विराम लगना तय है।:)smile_cry

(सिद्धार्थ)