क्या अखबार का पाठक चिरकुट है…?

12 टिप्पणियाँ

राष्ट्रीय संगोष्ठी में बहस का मुद्दा बना एक प्रबंध संपादक का बयान

देश की प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रतिनिधि इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में जुटे थे। विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता की शिक्षा देने वाले प्रोफ़ेसर, बड़े अखबारों के संपादक और न्यूज चैनेल्स के एंकर सिर जोड़कर वर्धा विश्वविद्यालय के पत्रकारिता के छात्रों और अकादमिकों को मीडिया की असली दुनिया से परिचित करा रहे थे। मिशनरी पत्रकारिता पर बहस चल रही थी। मीडिया द्वारा मिशन छोड़कर व्यावसायिकता की ओर मुड़ जाने पर चिंता व्यक्त की जा रही थी। मीडिया और राडिया के अंतर्सम्बन्ध खंगाले जा रहे थे। तभी एक प्रतिष्ठित अखबार के प्रबंध संपादक ने यह मंतव्य रखा कि जब एक साबुन की टिकिया के लिए लोग अपना अखबार बदल देते हैं तो उनसे प्रतिबद्धता की उम्मीद क्या की जाय। दो-ढाई रूपये देकर क्या उन्होंने अखबार के मालिक को खरीद लिया है जो उससे मिशन और नैतिकता की अपेक्षा करते हैं?

पाठकों को उक्त प्रकार से चिरकुट बताने से पहले उन्होंने पत्रकारों को भी उनकी औकात बताने की कोशिश की। बोले- आप इस भ्रम में मत रहिएगा कि यह राज-काज आपके भरोसे चल रहा है। आपकी स्थिति उस छिपकली जैसी है जो छत से चिपककर यह भ्रम पाल बैठी है कि इसे उसी ने रोक रखा है; या हाथी की पीठ पर बैठी उस मक्खी की तरह है जो उसे छोड़कर अकेले जंगल में इसलिए नहीं जाने देती कि उसके बिना इसकी (हाथी की) रक्षा नहीं हो सकेगी।

उनके पहले के वक्ताओं ने “मिशनरी पत्रकारिता- संदर्भ और प्रासंगिकता” नामक विषय पर बोलते हुए देश में लगातार बढ़ रहे भ्रष्टाचार, माफ़ियागीरी, घोटालों, इत्यादि के परिप्रेक्ष्य में मीडिया की भूमिका पर अनेक सुंदर व्याख्यान दिए थे और भविष्य के मीडियाकर्मियों को उनकी बढ़ती जिम्मेदारियों का बोध कराने का प्रयास किया था। चहुँओर निराशा के घने बादलों के बीच आशा का एक मात्र सूरज समाज के चौथे स्तंभ को बताया गया था। तब प्रबंध सम्पादक जी ने अपनी बात की शुरुआत एक रोचक कहानी से की थी-

बताने लगे- एक वृद्ध मौलवी लैंप पोस्ट के नीचे सड़क पर बहुत देर से कुछ ढूँढ रहा था।  एक नौजवान को उसकी परेशानी देखी नहीं गयी। सहायता करने की गर्ज़ से पूछा- बाबा क्या खोज रहे हो?

“बेटा, मैं अपनी टोपी सी रहा था, अचानक सुई हाथ से गिर गयी। वही ढूँढ रहा हूँ लेकिन मिल नहीं रही है” मौलवी ने तफ़सील से बताया।

“अच्छा बताइए टोपी कहाँ सिल रहे थे और सूई ठीक कहाँ गिरी? मैं खोजता हूँ।” युवक ने सहानुभूति दिखायी।

“बेटा सुई तो मस्ज़िद में गिरी थी लेकिन वहाँ बहुत अंधेरा है इसलिए यहाँ रोशनी में ढूँढ रहा हूँ।”

हाल में ठहाका लगना तय था ही। तालियाँ थमीं तो उक्त वक्ता ने बताया कि आज यहाँ की चर्चा भी कुछ इसी प्रकार की हो रही है। समस्या की असली जड़ जहाँ है उसे कोई नहीं देखना चाहता। सबका समाधान मीडिया से कराना चाहता है। देश की सरकारें भ्रष्ट है, संसद अपना काम नहीं कर पा रही। न्यायालय भी संदेह से परे नहीं रह गये हैं। उद्योगपति तेजी से अपना पैसा बढ़ा रहे हैं। गुप्त गठबंधन हो रहे हैं। हर आदमी लाभ कमाने के उद्यम में लगा है, लेकिन मीडिया को नैतिकता और मिशन का पाठ पढ़ाया जाता है। जब हम मीडिया में प्रोफ़ेशनलिज़्म की बात करते हैं तो इसे गाली समझा जाता है। आजादी से पहले अखबारों ने एक मिशन के साथ काम किया था- देश को गुलामी से मुक्त कराने का मिशन। लेकिन आज स्थिति वैसी नहीं है। आज यह अन्य प्रोफेशन्स की तरह एक पेशा के रूप में क्यों नहीं पहचाना जाना चाहिए? अख़बार या टीवी चैनेल का जो मालिक करोड़ो रुपये का पूँजी निवेश करता है उसे लाभ कमाने के बारे में क्यों नहीं सोचना चाहिए? मात्र दो रूपये में चालीस पृष्ठ का अखबार आपके दरवाजे पर पहुँचाने का प्रबंध करने वाला अखबार मालिक आपके बारे में कितना सोचे जब आप दो रुपये की साबुन की टिकिया पाने के लिए अपना वर्षों पुराना अखबार बदल देते हैं। आपकी कोई प्रतिबद्धता नहीं है तो अखबार चलाने वालों से आप क्या अपेक्षा रखते हैं?

उन्होंने अखबार पहुँचाने वाले हॉकर के प्रति पाठकों के रूखे व्यवहार का वर्णन भी किया कि कैसे वह विपरीत मौसम में भी सुबह छः बजे घर पर अखबार पहुँचाता है और कभी देर हो जाने पर सुबह की चाय का स्वाद खराब कर देने का दोषी बन जाता है। बिना नागा किए तीस दिन अखबार देने के बाद जब वह पैसा लेने पहुँचता है तो महानुभावों को  ‘आज नहीं कल’ का जवाब देते देर नहीं लगती। “ऐसे लोग जब बिना जाने समझे अखबार के मालिक, अखबार के सम्पादक और अखबार के रिपोर्टर पर आरोप लगाते हैं तो मुझे आपत्ति होती है।”

कोई भी व्यवसाय जब प्रारम्भ किया जाता है तो उसकी प्रगति का लक्ष्य निर्धारित किया जाता है। लाभ कमाना एक सर्वमान्य लक्ष्य है। उसके लिए जरूरी उपाय तलाशे जाते हैं और उन्हें अपनाया जाता है। स्वतंत्रता मिलने के बाद पत्रकारिता भी किसी अन्य  व्यवसाय की तरह कुछ लक्ष्यों की पूर्ति के उद्देश्य से आगे बढ़ी। समय के साथ तालमेल बिठा कर चलने वाले सफल हुए। यह कार्य आज भी एक मिशन बना हुआ है, लेकिन इसका स्वरूप बदल गया है। आज पत्रकारिता ‘स्वांतः सुखाय’ नहीं है।

धारा प्रवाह बोलते हुए उन्होंने एक-दो और चुटकुले और आख्यान सुनाये और बोले- यह अजीब स्थिति है कि प्रायः सभी पत्रकार अपने प्रबंधन को कोसते रहते हैं। उनके अनैतिक कार्यों और शोषक प्रवृत्तियों का रोना रोते हैं। लेकिन वे ही जब स्वयं प्रबंधक अर्थात्‌ मालिक बन जाते हैं तो वे सारी मिशनरी बातें हवा हो जाती हैं और वे सभी बुराइयाँ अपना लेते हैं जिन्हें कोसते इनका समय बीता है। फिर उन्होंने जोड़ा कि इन सारी बातों के बावजूद आज भी जब देशहित का मुद्दा उठता है तो देश की पूरी मीडिया एकजुट होकर आवाज उठाती है। उन्होंने इसके कई उदाहरण भी गिना डाले।

अपने को एक अदना सा पत्रकार बताते हुए उन्होंने ‘छोटे-छोटे प्रयासों का महत्व’ रेखांकित करने के लिए उस गिलहरी की कथा सुनायी जिसने समुद्र पर रामसेतु के निर्माण की प्रक्रिया में योगदान कर्ताओं की सूची में अपना नाम लिखाने के लिए बार-बार तट पर लोटपोट कर शरीर में रेत बटोरने और पुल पर जाकर शरीर झाड़ देने का उद्यम किया था। ताकि भविष्य में इतिहास लिखने वाले यह न लिखें कि जब सारा  बानर समाज पुल बना रहा था तो वहाँ मौजूद एक गिलहरी कुछ नहीं कर रही थी। अस्तु कुछ न कुछ यथा सामर्थ्य करते रहना चाहिए। इसके बाद उन्होंने एक जोरदार वीररस की कविता सुनायी। मैं एक ही पंक्ति नोट कर पाया क्योंकि उन्होंने दुहराया नहीं था। हाल को गुँजाने वाली तालियाँ बजीं और अगले वक्ता बुलाये गये।

यहाँ तक तो सब ठीक-ठाक रहा लेकिन जब प्रश्न-उत्तर का दौर चला तो प्रबंध-संपादक महोदय को उठकर सफाई देनी पड़ी। छात्र श्रोताओं के तीखे प्रहार वाकई बेचैन करने वाले थे। अंततः कुलपति जी को अध्यक्षीय भाषण में इस मसले पर अंतिम बात कहनी पड़ी। वह बहुत ही मार्मिक और सजग करने वाली बात थी। लेकिन उसकी चर्चा अगली कड़ी में। अभी तो आप उस वीररस की कविता का आनंद लेते हुए इस ‘चिरकुटई के आरोप’ का जवाब दीजिए।

गूगल महराज ने उस एक लाइन का ‘जामन’ लेकर पल भर में अपने क्षीर सागर के भंडार से पूरी कविता की दही परोस कर रख दी।

वह लाइन थी-

हम वो कलम नहीं हैं जो बिक जाती हों दरबारों में
हम शब्दों की दीप- शिखा हैं अंधियारे चौबारों में

इस लंबी कविता के मूल कवि हैं डॉ. हरिओम पवार। इसके आगे पीछे की कुछ और लाइनें यहाँ आपके लिए। पूरी कविता यहाँ है।

इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

कोई रूप नहीं बदलेगा सत्ता के सिंहासन का
कोई अर्थ नहीं निकलेगा बार-बार निर्वाचन का
एक बड़ा ख़ूनी परिवर्तन होना बहुत जरुरी है
अब तो भूखे पेटों का बागी होना मजबूरी है

जागो कलम पुरोधा जागो मौसम का मजमून लिखो
चम्बल की बागी बंदूकों को ही अब कानून लिखो
हर मजहब के लम्बे-लम्बे खून सने नाखून लिखो
गलियाँ- गलियाँ बस्ती-बस्ती धुआं-गोलियां खून लिखो

हम वो कलम नहीं हैं जो बिक जाती हों दरबारों में
हम शब्दों की दीप- शिखा हैं अंधियारे चौबारों में
हम वाणी के राजदूत हैं सच पर मरने वाले हैं
डाकू को डाकू कहने की हिम्मत करने वाले हैं

जब तक भोली जनता के अधरों पर डर के ताले हैं
तब तक बनकर पांचजन्य हम हर दिन अलख जगायेंगे
बागी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

अगवानी हर परिवर्तन की भेंट चढ़ी बदनामी की
हमने बूढ़े जे.पी. के आँसू की भी नीलामी की
परिवर्तन की पतवारों से केवल एक निवेदन था
भूखी मानवता को रोटी देने का आवेदन था

अब भी रोज कहर के बादल फटते हैं झोपड़ियों पर
कोई संसद बहस नहीं करती भूखी अंतड़ियों पर
अब भी महलों के पहरे हैं पगडण्डी की साँसों पर
शोकसभाएं कहाँ हुई हैं मजदूरों की लाशों पर

निर्धनता का खेल देखिये कालाहांडी में जाकर
बेच रही है माँ बेटी को भूख प्यास से अकुलाकर
यहाँ बचपना और जवानी गम में रोज बुढ़ाती हैं
माँ , बेटे की लाशों पर आँचल का कफ़न उढाती है

जब तक बंद तिजोरी में मेहनतकश की आजादी है
तब तक हम हर सिंहासन को अपराधी बतलायेंगे
बाग़ी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

 

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

हिंदी में लिखा जा रहा साहित्य प्रायः प्रासंगिक नहीं है

15 टिप्पणियाँ

प्रोफेसर गंगा प्रसाद विमल ने ‘शुक्रवारी’ में रखी बेबाक राय…

शुक्रवारी चर्चा आजकल जबर्दस्त फॉर्म में है। माहिर लोग जुटते जा रहे हैं और हम यहाँ बैठे लपक लेते हैं उनके विचार और उद्‌गार। इस विश्वविद्यालय की किसी कक्षा में मैं नहीं गया ; क्योंकि न यहाँ का विद्यार्थी हूँ और न ही शिक्षक हूँ। लेकिन एक से एक आला अध्यापकों को सुनने का मौका मिल रहा है जो देश और विदेश के अलग-अलग विश्वविद्यालयों और दूसरे शिक्षा केंद्रों में लंबे समय तक पढ़ाते रहे हैं। विषय भी देश की नब्ज टटोलने वाले। पिछले दिन अशोक चक्रधर जी आये तो कंप्यूटर और इंटरनेट पर हिंदी की दशा और दिशा पर अपने तीस-चालीस साल के अनुभव बताकर गये। पूरी तरह अपडेटेड लग रहे थे। रिपोर्ट यहाँ है। उसके पहले विनायक सेन को हुई सजा के बहाने नक्सलवादी आंदोलन के हिंसक स्वरूप और मानवाधिकार संबंधी मूल्यों की चर्चा गांधी हिल के मुक्तांगन में हुई। राजकिशोर जी ने अपनी कविता के साथ विनायक सेन का भरपूर समर्थन व्यक्त किया तो कुलपति विभूतिनारायण राय ने स्पष्ट किया कि उनके साथ सहानुभूति रखते हुए भी हम इतना जरूर याद दिलाना चाहेंगे कि आज के जमाने में राजसत्ता को हिंसा के भय से दबाया नहीं जा सकता। किसी हिंसक आंदोलन को समर्थन देना उचित नहीं है। हाँ, मनुष्यता की रक्षा के लिए जरूरी है कि विनायक सेन जैसे लोग जेल से बाहर रहें और स्वतंत्र होकर समाज के दबे-कुचले लोगों के लिए कार्य कर सकें।

इस बार शुक्रवारी के संयोजक राजकिशोर जी ने चर्चा का विषय रखा था- वर्तमान समय में साहित्य की प्रासंगिकता; और बिशिष्ट वक्ता के रूप में बुलाया था प्रो. गंगा प्रसाद विमल को।

प्रो.गंगा प्रसाद विमल जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इसके पहले वे केंद्रीय हिंदी निदेशालय में निदेशक पद पर भी कार्यरत थे। आप एक सुपरिचित कवि और उपन्यासकार के रूप में जाने जाते हैं। विमल जी के एक उपन्यास ‘मृगांतर’ पर हॉलीवुड में एक फिल्म भी बन चुकी है और इसका जर्मन भाषा में अनुवाद भी छप चुका है। चाय की चुस्कियों के बीच आपने हल्के मूड में जो बातें कहीं वो बहुत गम्भीर किस्म की थीं।

shukrawari-charcha2 shukrawari-charcha

बाएँ से:राजकिशोर,ए.अरविंदाक्षन,विमल

shukrawari-charcha1

बोले- साहित्य की प्रासंगिकता सदा से रही है। आज भी बनी हुई है। इसका सबूत यह है कि आज भी साहित्य का डर मौजूद है। समाज का प्रभु वर्ग आज भी साहित्य के प्रभाव के प्रति सतर्क रहता है। एक अमेरिकी लेखक ने उपन्यास लिखा- ‘पैलेस ऑफ़ मिरर्स’। इसमें उन्होंने चार बड़े अमेरिकी व्यावसायिक घरानों की पोल पट्टी खोल कर रख दी थी।  इसपर उनके प्राण संकट में पड़ गये। उन्हें मार डालने के लिए माफ़िया ने सुपारी दे दी। किताब का प्रकाशक बहादुर और जिम्मेदार निकला। लेखक को पाताल में छिपा दिया। उनकी रॉयल्टी पाबंदी से भेज देता है और सुरक्षा जरूरतों को पूरा करता है। लेखक गुमनाम और भूमिगत है, लेकिन उसका रचा साहित्य खलबली मचा रहा है।

सलमान रुश्दी की किताब का नाम भी उन्होंने लिया। बोले- इसके चालीस पृष्ठ पढ़कर मैने छोड़ दिया था। कलात्मक दृष्टि से मुझे यह उपन्यास बहुत घटिया लगा। इसके रूपक भद्दे और बेकार लगे। फिर जब इसकी चर्चा बहुत हो ली तो मैने ‘मनुष्य जाति को इस्लाम का योगदान’ विषयक एम.एन.रॉय की पुस्तक पढ़ने के बाद इसे दुबारा पढ़ा। तब मुझे यह किताब कुछ समझ में आनी शुरू हुई। उन्होंने इस पुस्तक में बहुत बारीकी से मनुष्यता विरोधी विचारण को निरूपित किया है। यह विचारण किसी धर्म की रचना नहीं कर सकता। जिन लोगों ने उसे अपने धर्म का दुश्मन मान लिया वे मूर्ख हैं। वे ऐसे लोग हैं जो सत्य से डरते हैं। सलमान रुश्दी मनुष्यता का दुश्मन नहीं है बल्कि मूर्खों को उससे दुश्मनी है।

ये उदाहरण बताते हैं कि साहित्य कितना बड़ा प्रभाव छोड़ सकता है। लेकिन हिंदी के साहित्य जगत पर दृष्टिपात करें तो निराशा ही हाथ लगती है। यहाँ ऐसी प्रासंगिक रचनाये प्रायः नहीं लिखी जा रही हैं। मनुष्यता के जो सही सवाल हैं उन्हें ठीक से नहीं उठाया जा रहा है। यह साहित्य पढ़कर मन में बेचैनी नहीं उठती। कोई एक्सटेसी महसूस नहीं होती। यहाँ प्रायोजित लेखन अधिक हो रहा है। एक खास समूह और वर्ग में रहकर उसके अनुकूल साहित्य रचा जा रहा है। पुरस्कारों के लिए लिखा जा रहा है। आपकी साहित्यिक प्रतिभा का मूल्यांकन इस या उस गुट की सदस्यता के आधार पर किया जा रहा है।

यहाँ भी शोषक और शोषित का समाजशास्त्र विकसित हो चुका है। जो लोग सबसे अधिक दबे-कुचले वर्ग की बात करते हैं वे ही मौका मिलने पर शोषक वर्ग में शामिल हो जाते हैं। केरल और पश्चिम बंगाल में सबसे पहले वामपंथी सरकारें बनी। बंगाल में तो एक अरसा हो गया। लेकिन विडम्बना देखिए कि आज भी कलकत्ते में हाथगाड़ी पर ‘आदमी को खींचता आदमी’ मिल जाएगा। मार्क्स का नाम जपने वाले वामपंथी सत्ता प्राप्त करने के बाद कांग्रेस की तरह व्यवहार करने लगे और पूँजीपतियों को लाभ पहुँचाने वाली नीतियाँ बनाने लगे। यह दो-मुँहापन यहीं देखने को मिलता है। साहित्य जगत में भी ऐसी ही प्रवृत्तियाँ व्याप्त हैं।

ऐसी निराशाजनक स्थिति हिंदी साहित्य के क्षेत्र में खूब मिलती है। विरोधी खेमे को घेरकर चारो ओर से हमला किया जाता है। लेकिन यूरोप में स्थिति दूसरी है। फ्रांस में द’ गाल के शासनकाल में सार्त्र द्वारा उनका विरोध बड़े आंदोलन का रूप ले रहा था। सार्त्र को जेल में डाल देने की सलाह पर द’ गाल ने कहा कि मैं फ्रांस को गिरफ़्तार नहीं कर सकता। विरोधी विचार का सम्मान करना हिंदी पट्टी ने नहीं सीखा है। यहाँ पार्टी लाइन पर चलकर जो विरोध होता है वह भोथरे किस्म का होता हैं। तलवार की धार कुंद हो चुकी है। गदा जैसा प्रहार हो रहा है। प्राणहीन सा। हिंदी में जो कृतियाँ आ रही हैं वे निष्प्राण सी हैं। मन को उद्वेलित करने वाला कुछ नहीं आ रहा है।

वे पूछते हैं कि क्या स्वतंत्रता के बाद के साठ साल में ऐसी कोई घटना नहीं हुई जिसपर उत्कृष्ट साहित्य रचा जा सके। इंदिरा गांधी द्वारा लगाया गया आपात काल हो या पाकिस्तान के साथ लड़े गये युद्ध हों; या चीन के साथ हुआ संघर्ष। इन घटनाओं ने हिंदी साहित्यकारों को उद्वेलित नहीं किया। इनपर कोई बड़ी कृति सामने नहीं आयी। सुनामी जैसी प्राकृतिक विपदा भी मनुष्यता के पक्ष में साहित्यकारों को खड़ा नहीं कर सकी। क्या कारण है कि बड़ी से बड़ी घटनाएँ हमें विचलित नहीं करती। कड़वे यथार्थ से तालमेल बिठाने में हिंदी साहित्य असफल सा रहा है।

इतनी निराशा भरी बातें कहने के बाद उन्होंने पहलू बदला और बोले कि ऐसा नहीं है कि अच्छी प्रतिभाएँ हमारे बीच नहीं है। मुश्किल बस ये है कि उनका लिखा सामने नहीं आ पाता। आलोचना के जो बड़े मठ हैं वे इसे आने नहीं देते। उनकी देहरी पर माथा टेकने वाला ही पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पाता है। समीक्षा उसी की हो पाती है जो उस परिवार का अंग बनने को तैयार होता है। राजकिशोर जी ने गुटबंदी की बात का समर्थन करते हुए विनोदपूर्वक कहा कि ‘यदि आप हमारे किरायेदार हैं तो आप सच्चे साहित्यकार हैं; यदि आप दूसरे के घर में हैं या अपना स्वतंत्र घर जमाने की कोशिश में हैं तो आपका साहित्य दो कौड़ी का भी नहीं है। एक खास विचारधारा का पोषण यदि आप नहीं करते तो आप अप्रासंगिक हैं।

मीडिया ने भी साहित्य जगत का और हिंदी भाषा का बड़ा नुकसान किया है। शब्द बदल गये हैं, शैली दूषित हो गयी है, वाक्य रचना अंग्रेजी की कार्बन कॉपी जैसी हो गयी है। कृतियों पर अंग्रेजी प्रभाव होता जा रहा है। नकल के आरोप भी खुलकर आ रहे हैं। मौलिकता समाप्त सी होती जा रही है।

आज हम सबका दायित्व है कि हम हिंदी में लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य को सामने लायें। मनुष्यता के मुद्दे उठाने वाली रचनाओं को तलाशें। संकुचित सोच के दायरे से बाहर आकर विराट धरातल पर विचार करें। मैं हद दर्जे का आशावादी भी हूँ। कुछ लोग बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं। लेकिन उनकी संख्या अत्यल्प है। इसे कैसे बढ़ाया जाय इसपर विचार किया जाना चाहिए।

ganga-prasad-vimal

विमल जी की बात समाप्त होने के बाद प्रश्न उत्तर का दौर चला। कई लोगों ने कई कारण गिनाए। मैंने पिछले दिनों श्रीप्रकाश जी की शुक्रवारी वार्ता के हवाले से बताया कि अच्छी रचना तब निकल कर आती है जब कोई बड़ा आंदोलन चल रहा हो। क्रांति का समय हो। शांतिकाल में तो साधारण बैद्धिक जुगाली ही होती रहती है। मुद्दों को तलाशना पड़ता है। इसपर जर्मनी से आये एक हिंदी अध्यापक ने अनेक ताजा मुद्दे गिनाये। दलित और स्त्री संबंधी विमर्श की चर्चा की। प्रायः सबने इसका समर्थन किया। लेकिन इन मुद्दों पर भी अच्छी रचनाओं की दरकार से प्रायः सभी सहमत थे। विदेशी मेहमान ने यह भी बताया कि यूरोप में हिंदी रचनाओं को ‘पश्चिम की नकल’ पर आधारित ही माना जाता है।

विमल जी ने हिंदी साहित्य के पाठकों की भी कमी के प्रति चिंता जाहिर की। बोले कि अब अच्छी रचनाओं के लिए भी पाठक नहीं मिलते। जेब से पैसा खर्च करके हिंदी की किताबें खरीदने और पढ़ने वालों की संख्या बहुत कम है। इसके लिए वे ‘अध्यापक समाज’ को दोषी ठहराते हैं। कह रहे थे कि आजकल के अध्यापक न तो अपना पैसा खर्च करके किताबें खरीदते हैं, न पढ़ते हैं और न ही अपने छात्रों व दूसरे लोगों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। उन्होंने बताया कि यदि उन्हें कोई अच्छी किताब मिल जाती है तो कम से कम सौ लोगों को उसे पढ़ने के लिए बताते हैं।

अन्य के साथ राजकिशोर जी ने अच्छी रचनाओं की कमी होने की बात का प्रतिवाद किया। बोले- मैं आपको हिंदी की कुछ मौलिक कृतियों का नाम बताता हूँ। आप इनके मुकाबले खड़ा हो सकने लायक एक भी अंग्रेजी पुस्तक का नाम बता पाइए तो बोलिएगा…। उन्होंने नाम बताने शुरू किए जिसमें दूसरे लोगों ने भी जोड़ा- श्रीलाल शुक्ल की `राग दरबारी’, रेणु का `मैला आँचल’, रांगेय राघव का `कब तक पुकारूँ’, यशपाल की `दिव्या’, अज्ञेय का `नदी के द्वीप’, अमृतलाल नागर का `बूँद और समुद्र’, भगवतीचरण वर्मा की `चित्रलेखा’, हजारी प्रसाद द्विवेदी की `बाणभट्ट की आत्मकथा’, आदि-आदि। किसी ने चुनौती देते हुए जोड़ा कि निराला की कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ यदि नकल पर आधारित है तो इसका असल अंग्रेजी रूप ही दिखा दीजिए। इसकी पहली पंद्रह पंक्तियों का अनुवाद ही करके कोई दिखा दे। इसके बाद और भी अनेक रचनाओं का नाम लिया जाने लगा।

अंततः मुझे विमल जी से उनके प्रारम्भिक वक्तव्य की पुष्टि करानी पड़ी। उन्होंने माना कि अपनी इस बात को स्वीकार करने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं है कि साहित्य की प्रासंगिकता बनी हुई है लेकिन हिंदी में जो लिखा जा रहा है उसमें अधिकांश प्रासंगिक नहीं है। उन्होंने पहले यह भी बताया था कि वे एक नियमित स्तंभ लिखते रहे हैं जिसका नाम है ‘अप्रासंगिक’।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

शुक्रवारी की परंपरा से…

15 टिप्पणियाँ

“सृजन और नयी मनुष्यता की समस्याएँ” विषयक वार्ता और विमर्श: श्री प्रकाश मिश्र

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के प्रांगण में यूँ तो नियमित अध्ययन-अध्यापन से इतर विशिष्ट विषयपरक गोष्ठियों, सेमिनारों व साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को निरंतर आयोजित किये जाने की  प्रेरणा वर्तमान कुलपति द्वारा सदैव दी जाती रही है, लेकिन इन सबमें ‘शुक्रवारी’ का आयोजन एक अनूठा प्रयास साबित हो रहा है।

परिसर में बौद्धिक विचार-विमर्श को सुव्यवस्थित रूप देने के लिए ‘शुक्रवारी’ नाम से एक  समिति का गठन किया गया है। इस समिति के संयोजक हैं ख्यातिनाम स्तंभकार व विश्वविद्यालय के  ‘राइटर इन रेजीडेंस’ राजकिशोर। यहाँ के कुछ शिक्षकों को इसमें सह-संयोजक की जिम्मेदारी भी सौंपी गयी है। विश्वविद्यालय परिवार के सभी सदस्य इस साप्ताहिक चर्चा शृंखला में भागीदारी के लिए सादर आमंत्रित होते हैं। शुक्रवारी की बैठक हर शुक्रवार को विश्वविद्यालय के परिसर में किसी उपयुक्त जगह पर होती है जो विशिष्ट वक्ता और वार्ता के विषय के चयन के साथ ही निर्धारित कर ली जाती है। इस अनौपचारिक विमर्श के मंच पर परिसर से बाहर के अनेक अतिथियों ने भी बहुत अच्छी वार्ताएँ दी हैं। वार्ता समाप्त होने के बाद खुले सत्र में उपस्थित विद्यार्थियों और अन्य सदस्यों द्वारा उठाये गये प्रश्नों पर भी वार्ताकार द्वारा उत्तर दिया जाता है और बहुत सजीव बहस उभर कर आती है।

गत दिवस मुझे भी ‘शुक्रवारी’ में भाग लेने का अवसर मिला। इस गोष्ठी में कुलपति जी स्वयं उपस्थित थे। इस बार के वार्ताकार थे प्रतिष्ठित कवि, उपन्यासकार, आलोचक व साहित्यिक पत्रिका ‘उन्नयन’ के संपादक श्रीप्रकाश मिश्र। उनकी वार्ता का विषय था “सृजन और नयी मनुष्यता की समस्याएँ”। उनकी वार्ता सुनने से पहले तो मुझे इस विषय को समझने में ही कठिनाई महसूस हो रही थी लेकिन जब मैं गोष्ठी समाप्त होने के बाद बाहर निकला तो बहुत सी नयी बातों से परिचित हो चुका था; साथ ही श्री मिश्र के विशद अध्ययन, विद्वता व वक्तृता से अभिभूत भी। श्रीप्रकाश मिश्र वर्धा के स्टाफ के साथ

(बायें से दायें) मो.शीस खान (वित्ताधिकारी), शंभु गुप्त (आलोचक), प्रोफ़ेसर के.के.सिंह और श्री प्रकाश मिश्र

अबतक दो कविता संग्रह, दो उपन्यास और तीन आलोचना ग्रंथ प्रकाशित करा चुके श्री मिश्र का तीसरा काव्य संग्रह और दो उपन्यास शीघ्र ही छपकर आने वाले हैं। आप बीस से अधिक वर्षो से साहित्यिक पत्रिका ‘उन्नयन’ का सम्पादन कर रहे हैं जो साहित्यालोचना के क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित स्थान पा चुकी है। आलोचना के लिए प्रतिवर्ष ‘रामविलास शर्मा आलोचना सम्मान’ इसी प्रकाशन द्वारा प्रायोजित किया जाता है। यह सारा सृजन श्रीप्रकाश जी द्वारा केंद्रीय पुलिस संगठन में उच्चपदों पर कार्यरत रहते हुए किया गया है।

अपने उद्‌बोधन में उन्होंने सृजन की अवधारणा को समझाते हुए कहा कि सृजन एक प्रक्रिया है- बनाने की प्रक्रिया- जिसे मनुष्य अपनाता है। उस बनाने की कुछ सामग्री होती है, कुछ उपकरण होते हैं और उसका एक उद्देश्य होता है। उद्देश्य के आधार पर वह कला की श्रेणी में आता है तो सामग्री और उपकरण के आधार पर संगीत, चित्र, मूर्ति, वास्तु, साहित्य -और साहित्य में भी काव्य, नाटक, कथा आदि – कहा जाता है। इसमें संगीत सबसे सूक्ष्म होता है और वास्तु सबसे स्थूल। सृजन मूल्यों की स्थापना करता है जो सौंदर्य के माध्यम से होती है। इसका उद्देश्य वृहत्तर मानवता का कल्याण होता है। साहित्य के माध्यम से यह कार्य अधिक होता है।

सृजन को चिंतन से भिन्न बताते हुए उन्होंने कहा कि चिंतन विवेक की देन होता है जबकि सृजन का आधार अनुभूति होती है। इस अनुभूति के आधार पर संवेदना के माध्यम से वहाँ एक चाहत की दुनिया रची जाती है जिसका संबंध मस्तिष्क से अधिक हृदय से होता है। लेकिन सृजन में अनुभूति के साथ-साथ विवेक और कल्पना की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं होती है।

मूल्यों की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि इनका महत्व इसलिए नहीं होता कि वे जीवन में पूरे के पूरे उतार लिये जाते हैं; बल्कि इसलिए होता है कि एक पूरा समुदाय उन्हें महत्वपूर्ण मानता है, उन्हें जीवन का उद्देश्य मानता है- व्यक्ति के भी और समुदाय के भी- उससे भी बढ़कर इसे वह आचरण का मानदंड मानता है। मूल्य मनुष्य की गरिमा की प्रतिष्ठा करते हैं। सृजनकर्ता का दायित्व उस गरिमा में संवेदनाजन्य आत्मा की प्रतिष्ठा करना होता है जिसका निर्वाह बहुत वेदनापूर्ण होता है। सृजन के हर क्षण उसे इसका निर्वाह करना होता है।

मनुष्यता को अक्सर संकट में घिरा हुआ बताते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान में मनुष्यता पर जो संकट आया हुआ है वह दुनिया के एक-ध्रुवीय हो जाने से उत्पन्न हुआ है। उन्होंने रसेल होवान के उपन्यास ‘रिडले वाकर’, डेविड प्रिन के ‘पोस्टमैन’, कामार्क मेकॉर्थी के ‘द रोड’ का उल्लेख करते हुए बताया कि ज्ञानोदय द्वारा रचित मनुष्य की प्रगति और विकास की सभी योजनाएँ आज इतनी संकट में हैं कि उनका अंत ही आ गया है। सच पूछिए तो मनुष्य की मूलभूत अवधारणा ही संकट में है; और यह संकट वास्तविक है। जिस प्रौद्यौगिकी पर मनुष्य ने भरोसा करना सीखा है वह उसके विरुद्ध हो गयी है।

हमारी दुनिया वास्तविक न रहकर आभासित बन गयी है और आदमी मनुष्य न रहकर ‘साइबोर्ग’ बन गया है। साईबोर्ग यानि- “A human being prosthetically inhanced, or hybridized with electronic or mechanical components which interact with its own biological system.”

जलवायु वैज्ञानिक जेम्स लवलॉक का कहना है कि धरती को खोदकर, जल को सुखाकर, और वातावरण को प्रदू्षित कर हम कुछ इस तरह से जीने लगे हैं कि मनुष्य का जीवन बहुत तेजी से विनाश की ओर बढ़ने लगा है। धरती के किसी अन्य ग्रह से टकराने से पहले ही ओज़ोन की फटती हुई पर्त, समुद्र का बढ़ता हुआ पानी, धरती के पेट से निकलती हुई गैस और फटते हुए ज्वालामुखी मनुष्य जाति को विनष्ट कर देंगे।

जॉन ग्रे कहते हैं कि मनुष्य तमाम प्राणियों में एक प्राणी ही है; और उसे अलग से बचाकर रखने के लिए पृथ्वी के पास कोई कारण नहीं है। यदि मनुष्य के कारन कारण पृथ्वी को खतरा उत्पन्न होगा तो वह मनुष्य का ही अंत कर सकती है। वह नहीं रहेगा तो पृथ्वी बच जाएगी। दूसरे प्राणियों का जीवन चलता रहेगा। इस प्रकार राष्ट्रों की आंतरिक नीतियों के कारण मनुष्य का जीवन खतरे में है।

इस खतरे के प्रति कौन आगाह करेगा, उससे कौन बचाएगा? सृजन ही न…!!!

श्री मिश्र ने विश्व की शक्तियों के ध्रुवीकरण और इस्लामिक और गैर-इस्लामिक खेमों के उभरने तथा विश्व की एकमात्र महाशक्ति द्वारा किसी न किसी बहाने अपने विरोधियों का क्रूर दमन करने की नीति का उल्लेख करते हुए  भयंकर युद्ध की सम्भावना की ओर ध्यान दिलाया। आतंकवाद ही नहीं आणविक युद्ध की भयावहता धरती से आकाश तक घनीभूत होती जा रही है। पश्चिमी प्रचार तंत्र द्वारा यह दिखाया जा रहा है कि सभ्य दुनिया बर्बर दुनिया से लड़ने निकल पड़ी है।

अपने विस्तृत उद्‌बोधन में उन्होंने वर्तमान वैश्विक परिदृश्य के तमाम लक्षणों और दुनिया भर में रचे जा रहे साहित्य में उसकी छाया का उल्लेख करते हुए मनुष्यता की अनेक समस्याओं कि ओर ध्यान दिलाया और उनके समाधान की राह तलाशने की जिम्मेदारी सृजनशील बुद्धिजीवियों के ऊपर डालते हुए मिशेल फूको का उद्धरण दिया जिनके अनुसार पश्चिम का समकालीन सृजन मनुष्यता संबंधी इन तमाम चुनौतियों को स्वीकार करने में सक्षम नहीं दिख रहा है। लेकिन, उन्होंने बताया कि अमेरिकन विचारक ब्राउन ली के मत से सहमत होते हुए कहा कि इतना निराश होने की जरूरत नहीं है। अभी भी एशिया, अफ़्रीका और लातिनी अमेरिका का सृजन संबंधी चिंतन मनुष्य को बचाये रखने में और मनुष्यता संबंधी मूल्यों की प्रगति में कुछ योग दे सकता है।

इस लम्बी वार्ता की सभी बातें इस ब्लॉग पोस्ट में समाहित नहीं की जा सकती। उनका पूर्ण आलेख शीघ्र ही विश्वविद्यालय की साहित्यिक वेब साइट (हिंदीसमय[डॉट]कॉम और त्रैमासिक बहुवचन में प्रकाशित किया जाएगा।

निश्चित रूप से शुक्रवारी की जो परंपरा शुरू की गयी है उससे अनेक मुद्दों पर विचार मंथन की प्रक्रिया तेज होने वाली है। वार्ता के बाद वहाँ उपस्थित विद्यार्थियों ने जिस प्रकार के गम्भीर प्रश्न पूछे और विद्वान वक्ता द्वारा जिस कुशलता से उनका समाधान किया गया वह चमत्कृत करने वाला था। हमारी कोशिश होगी कि शुक्रवारी में होने वाली चर्चा आपसे समय-समय पर विश्वविद्यालय के ब्लॉग के माध्यम से बाँटी जाय।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

वर्धा में अम्बेडकर को याद करने का तरीका अनूठा था…

10 टिप्पणियाँ

 

मेरी वर्धा यात्रा की प्रथम, द्वितीय, और तृतीय रिपोर्ट आप यहाँ पढ़ चुके हैं। अब आगे…

विश्वविद्यालय गेस्ट हाउस से जब हम सेवाग्राम आश्रम के लिए निकले तो धूप चढ़ चुकी थी। यद्यपि यह आश्रम घूमने का सबसे अच्छा समय नहीं था, लेकिन हमारे पास कोई दूसरा विकल्प उपलब्ध भी नहीं था। हम वर्धा शहर के बीच से होकर ही गुजरे लेकिन रास्ते में कोई भीड़ भरी ट्रैफ़िक नहीं मिली। निश्चित ही गर्मी का असर सड़कों पर उतर आया था। हमें किसी मोड़, तिराहे या चौराहे पर रुककर सेवाग्राम का रास्ता पूछने के लिए गाड़ी से उतरकर किसी दुकानदार तक जाना पड़ता क्यों कि सड़क पर राहगीर नहीं मिल रहे थे। लेकिन हमें दो स्थानों पर इस कड़ी धूप को धता बताते लोग मिले जो पूरी सज-धज के साथ समूह में इकठ्ठा होकर किसी जश्न की तैयारी में जाते दिखायी दिए।

अम्बेडकर जयन्ती की धूम मैने नजदीक पहुँचकर देखा तो पता चला कि ये लोग बाबा साहब के जन्मदिन की शोभायात्रा निकाल रहे हैं। नीले अबीर का तिलक लगाकर एक दूसरे का अभिवादन करते लोगों में बड़े-बुजुर्ग, मर्द-औरतें, लड़के व लड़कियाँ, सभी मौजूद थे। एक अदम्य उत्साह और उमंग से लबरेज़ ये श्रद्धालु अपने नेता के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए जिस स्वतः स्फूर्त भाव से इस आयोजन में शामिल हो रहे थे उसे देखकर सहज ही अनुमान किया जा सकता था कि डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने किस प्रकार एक बहुत बड़े समाज को अपनी अस्मिता पर गौरव महसूस करने और सिर ऊँचा उठाकर जीने की प्रेरणा दे दी है।

एक पेट्रोल पंप के अहाते में जमा हो रहे समूह को पीछे छोड़कर जब हम सेवाग्राम में बापू के आश्रम के मुख्यद्वार पर पहुँचे तो वहाँ भी एक ऐसा ही जुलूस जश्न के उल्लास में डूबा हुआ मिला। एक खुली हुई गाड़ी पर बाबा साहब अम्बेडकर के आदमकद चित्र को सजाकर झाँकी तैयार की गयी थी जिसके सामने बड़ी संख्या में लड़के और वयस्क पुरुष नाच रहे थे। ढोल-नगाड़े और बैण्ड-बाजे की तेज ध्वनि पर उनके पाँव खुशी-खुशी तारकोल की गर्म सड़क पर भी सहजता से थिरक रहे थे। मैने गेट के किनारे गाड़ी खड़ी की और अपना कैमरा निकाल कर इस शोभा यात्रा की कुछ तस्वीरें लेनी चाही। लेकिन पहले स्नैप के बाद ही कैमरा स्वचालित तरीके से बन्द हो गया। स्क्रीन पर यह संदेश आया कि सीमा से अधिक गर्म हो जाने के कारण कैमरा बन्द हो रहा है। ए.सी. कार के डैश बोर्ड पर शीशे से छन कर आ रही धूप इस सोनी डिजिटल कैमरे की नाजुक कार्यप्रणाली को बन्द करने में सक्षम थी लेकिन अपने नेता के जन्मदिन को यादगार बनाने में जुटे उन लोगों के ऊपर कड़ी धूप का जरा भी असर नहीं दिखा। माथे पर नीली पट्टी बाँधे हुए दर्जनों नौजवान लड़के मोटरसाइकिलों पर फर्राटा भरते किसी बाराती का सा उत्साह लिए समूह में आ जा रहे थे।

जब वह शोभा यात्रा थोड़ी दूर चली गयी तो हम एक और महापुरुष की कर्मस्थली के प्रांगण में चले गये। यह था बापू का सेवाग्राम आश्रम। 

सन्‌ १९३४ मेंबापू यहाँ बैठकर काम करते गांधीजी को उनके प्रिय मित्र और प्रसिद्ध उद्योगपति जमनाबापू का दफ़्तरलाल बजाज ने वर्धा में निवास हेतु आमन्त्रित किया था। वर्धा के करीब शेगाँव (Shegaon) नामक ग्रामीण क्षेत्र में जंगली वनस्पतियों से हरे-भरे इलाके में बापू के रहने के लिए स्थानीय सामग्री के उपयोग से खपरैल की छत वाला जो मकान बना उसे अभी भी ज्यों का त्यों सजोकर रखा गया है।  सबसे पहले हम उसी ‘आदि निवास’ के बरामदे में पहुँचे।  हमने वहाँ उल्लिखित निर्देश के सम्मान में अपने पैर के जूते निकाल दिए। पूरे प्रांगण में पत्थर की छोटी गिट्टियों की परत बिछायी गयी थी जो धूप से गर्म तो हो ही चुकी थी, उनपर नंगे पाँव चलने से इनकी तीखी नोक से चुभन भी खूब हो रही थी। वहाँ कार्यरत एक बुजुर्ग महिला ने बताया कि इस स्थान पर साँप और बिच्छू बहुत निकलते हैं। इन गिट्टियों के बीच उनका चलना कठिन होता है इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से यह गिट्टी डाली गयी है। एक्यूप्रेशर चिकित्सा में विश्वास करने वाले इन गिट्टियों पर नंगे पाँव चलना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद मानते हैं। एक कक्ष में साँप पकड़ने का पिजरा भी रखा हुआ था जिसमें साँपों को पकड़कर दूर जंगल में छोड़ दिया जाता था।

बताते हैं कि बापू के कार्यकाल में निर्मित भवनों जैसे- आदि निवास, बा-कुटी, बापू- कुटी, आखिरी निवास, परचुरे कुटी, महादेव कुटी, किशोर निवास, रुस्तम भवन इत्यादि में से किशोर निवास को छोड़कर किसी भी भवन में पक्की ईंटों व सीमेण्ट का प्रयोग नहीं किया गया था। इस प्रांगण में गांधी जी द्वारा व्यक्तिगत रूप से उपयोग की गयी वस्तुओं को करीने से सजाकर आगन्तुकों के दर्शनार्थ रखा गया है। आश्रम में आकर मेरा कैमरा अबतक ठण्डा हो चुका था इसलिए हमने कुछ यादगार तस्वीरें उतार लीं।

 दवात बापू द्वारा उपयोग की गयी संग्रहित वस्तुएं तीन बन्दर और लकड़ी का करण्डक
बापू का टेलीफोन गांधी जी का सामान

  बापू का चश्मा 

 

बापू कुटी का परिचय देता यह बोर्ड हमारा ध्यान बरबस खींचता है। इसमें सात सामाजिक पातक (social sins) उल्लिखित हैं जो यंग इण्डिया से उद्धरित हैं। समाज को पतन की ओर ले जाने वाले जिन तत्वों की पहचान गांधी जी ने तब की थी वे आज हमारे सामने प्रत्यक्ष उपस्थित हैं और उनका वैसा ही प्रभाव होता भी दिखायी दे रहा है। बापू कुटी का परिचय और सात सामाजिक पातक सिद्धान्तहीन राजनीति, विवेकभ्रष्ट भोग-विलास, बिना श्रम के अर्जित सम्पत्ति, मानवीय मूल्यों से विहीन वैज्ञानिक विकास, अनैतिक बाणिज्य-व्यापार, त्याग और बलिदान से रहित पूजा-पाठ, और चरित्र निर्माण से रहित शिक्षा  जैसे घटक हमारे समाज को आज भी अन्धेरे की ओर ले जा रहे हैं। यदि हमारे देश के नीति नियन्ता राष्ट्रीय स्तर पर इन्हीं विन्दुओं को दृष्टिगत रखकर नीति निर्माण करें और उनके अनुपालन की कार्ययोजना तैयार करें तो बहुत कुछ सुधारा जा सकता है।

प्रांगण में अनेक छायादार और फलदार वृक्ष दिखे जिनका रोपण देश की महान विभूतियों ने किया था और उनकी नाम पट्टिकाएं वृक्षों पर लगी हुई थीं। भारतीय स्वतंत्रता संगाम के अन्तिम दशक में देश का ऐसा कोई भी महत्वपूर्ण व्यक्ति नहीं रहा होगा जो वर्धा के सेवाग्राम आश्रम तक न आया हो। गांधी जी ने अपने जीवन के अन्तिम भाग में अधिकांश समय यहीं बिताया। विभाजन के बाद उपजे साम्प्रदायिक दंगो से लड़ने के लिए बंगाल के नोआखाली के लिए प्रस्थान करने के बाद गांधी जी यहाँ नहीं लौट सके।

इस प्रांगण से बाहर आकर हमने खादी की दुकान से कुछ खरीदारी की। भूख और प्यास ने जब हमें नोटिस थमायी तो हमें बगल के प्राकृतिक आहार केन्द्र की ओर जाना पड़ा। इस रेस्तराँ को देखकर हम झूम उठे। डाइनिंग टेबल के स्थान पर यहाँ चौकोर चौकियाँ रखी हुई थीं जिनके बीच में तिपाये पर ठण्डे पानी से भरे मिट्टी के घड़े रखे हुए थे।प्राकृतिक आहार केन्द्र, सेवाग्राम हमने वहाँ किसी फूल के अर्क से तैयार किया हुआ ठंडा स्वादिष्ट शरबत लिया, कुछ तस्वीरें ली और अपनी गाड़ी की ओर बढ़ चले। गेस्ट हाउस की कैण्टीन में बना भोजन हमारा इन्तजार कर रहा था।

शाम को गेस्ट हाउस के चबूतरे पर आयोजित एक अद्भुत कार्यक्रम में शामिल होने का अवसर मिला। अम्बेडकर जयन्ती के अवसर पर विश्वविद्यालय के संस्कृति विभाग ने इस विशेष कार्यक्रम का  आयोजन किया था। विभाग के विशेष कार्याधिकारी (OSD) राकेश जी ने कार्यक्रम के प्रथम चरण में डॉ. अम्बेडकर की राजनैतिक आर्थिक दृष्टि और आज का समय विषय पर बोलने के लिए नागपुर से आमन्त्रित प्रोफ़ेसर श्रीनिवास खान्देवाले का परिचय दिया। अर्थशास्त्र के प्रतिष्ठित विद्वान प्रोफ़ेसर खान्देवाले ने करीब एक घण्टे के अपने भाषण में डॉ. भीमराव अम्बेडकर के जिस व्यक्तित्व से परिचित कराया उसे इतनी गहराई से हम पहले नहीं जान पाये थे। भारतीय संविधान के निर्माता और दलित समुदाय के मसीहा के रूप में अम्बेडकर की जो छवि हमारे मन में थी उसके दो रूप थे। एक रूप वह था जिसमें वे राजनैतिक रूप से जागरूक हो रहे एक खास सामाजिक जाति वर्ग के प्रेरणापुंज और उपास्य देवता थे जिनकी अन्धभक्ति में डूबे हुए लोग अपने समर्थक समूह से इतर प्रत्येक व्यक्ति को मनुवादी कहकर गाली देने का काम करते रहे हैं।

उनकी छवि का दूसरा रूप वह था जो अरुण शौरी जैसे लेखकों द्वारा ‘फर्जी भगवान’ के रूप में गढ़ा गया था- जिसके प्रति विद्वेष से भरे हुए लोगों द्वारा चौराहे पर लगी उनकी मूर्तियों को तोड़ने, अपमानित करने और एक जाति विशेष के लोगों के लिए अपशब्द प्रयोग करने और उत्पीड़ित करने का जघन्य कार्य किया जाता रहा है।  कदाचित्‌ डॉ. अम्बेडकर को एक खास राजनैतिक उद्देश्य से इस्तेमाल करने की होड़ में लगी पार्टियों ने इस प्रकार की परस्पर विरोधी छवियों का निर्माण कर रखा है। प्रो. खान्देवाले ने अपने वक्तव्य में अम्बेडकर की एक मध्यमार्गी छवि पेश की। उनका कहना था कि अम्बेडकर की दृष्टि सच्चे समाजवाद से ओतप्रोत थी। वे शान्तिपूर्ण ढंग से सामाजिक परिवर्तन लाने के हिमायती थे। उनकी राजनैतिक दृष्टि तो उनके द्वारा तैयार किये गये हमारे संविधान में परिलक्षित होती ही है, साथ में उनकी आर्थिक दृष्टि को भी संविधान के सूक्ष्म अध्ययन से समझा जा सकता है।रजिस्ट्रार, प्रतिकुलपति और कुलपति के साथ प्रो. श्रीनिवास खान्देवाले (सबसे दाएं)

समाज में फैली घोर आर्थिक विषमता को दूर करने के लिए सम्पत्ति का प्रवाह ऊपर से नीचे की ओर होना आवश्यक है लेकिन हो रहा है इसका उल्टा। गरीब मजदूर और किसान अपनी विकट परिस्थिति से हारकर आत्महत्या कर रहे हैं और पूँजीपति वर्ग लगातार अपनी सम्पत्ति बढ़ाता जा रहा है। आई.पी.एल. के अर्थशास्त्र का उदाहरण देकर उन्होंने बताया कि जबतक समाज के पिछ्ड़े तबके को आर्थिक उन्नति के उचित और न्यायपूर्ण अवसर नहीं प्राप्त होंगे तबतक सामाजिक समरसता नहीं पायी जा सकेगी। यही उचित अवसर दिलाने की लड़ाई शान्तिपूर्ण तरीके से लड़ने की राह डॉ.अम्बेडकर ने दिखायी। पारस्परिक विद्वेष को भुलाकर इस लड़ाई में समाज के सभी तबकों से बराबर का सहयोग करने का आह्वान भी प्रो. खान्देवाले ने वहाँ उपस्थित छात्रों, अध्यापकों और वि.वि. के पदाधिकारियों से किया।

कार्यक्रम के अगले चरण में लखनऊ से आयी संगीत मण्डली रवि नागर एण्ड ग्रुप ने कुछ बेहतरीन कविताओं का मोहक संगीतमय पाठ किया। इसमें सबसे पहले डॉ.दिनेश कुमार शुक्ल के कुछ दोहे गाकर सुनाये गये-

भाषा के सोपान से, शब्द लुढकते देख।

पढ़ा लिखा सब पोंछकर, लिखो नया आलेख॥

जीवन को अर्था रहा, गूंगा बहरा मौन।

किसने देखा राम को, रमता जोगी कौन॥

सीली-सीली है हवा, ठण्डी-ठण्डी छाँव।

सन्निपात का ज्वर बढ़ा, झुलस रहा है गाँव॥

यहाँ न सूर्योदय हुआ, यहाँ न फैली धूप।

कालरात्रि फैली रही, जैसे अन्धा कूप॥

काले भूरे खुरदुरे, ले अकाल के रंग।

गगन पटल पर लिख रहा, औघड़ एक अभंग॥

जंगलों में रहने वाले आदिवासी समुदाय के जीवन पर आधारित निर्मला पुतुल की कविता ‘तुम्हारे हाथों बने पत्तल पर भरते हैं पेट हजारो, पर हजारों पत्तल भर नहीं पाते पेट तुम्हारा’  के भावुक प्रस्तुतिकरण ने वातावरण बहुत मार्मिक बना दिया। इसके बाद अदम गोंडवी की प्रसिद्ध रचना चमारों की गली का गायन हुआ। आइए महसूस करिए जिन्दगी के ताप को। मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको॥

इस एक घंटे की संगीतमय प्रस्तुति ने दलित शोषित समाज की जिस कष्टप्रद और शोचनीय परिस्थिति की जिन्दा तस्वीर पेश की उसको और गहनता से महसूस कराया कार्यक्रम के अगले चरण में प्रस्तुत नुक्कड़ नाटक ‘सात हजार छः सौ छियासी’ ने।

clip_image001 clip_image002
clip_image003 clip_image004

प्रोबीर गुहा निर्देशित नुक्कड़ नाटक७६८६

विश्वविद्यालय के फिल्म व थिएटर विभाग के विद्यार्थी कलाकारों द्वारा इसे कोलकाता के नाट्य समूह ‘अल्टरनेटिव लिविंग थिएटर’ के प्रोबीर गुहा के नाट्य निर्देशन में प्रस्तुत किया गया। श्री गुहा वि.वि. के गेस्ट फैकल्टी हैं जो कुछ दिनों के लिए यहाँ आये हुए थे। महाराष्ट्र में कपास किसानों द्वारा बड़ी संख्या में की जा रही आत्महत्या के पीछे जो सामाजिक-आर्थिक कारण हैं उन्हें समझाने का यह बहुत ही प्रभावशाली प्रयास था।  भयंकर गरीबी के बीच नैसर्गिक जिजीविषा से प्रेरित किसान अपनी जमीन पर कपास उगाने में खाद, बीज और कीटनाशक के लिए आने वाली तमाम कठिनाइयों से लड़ता हुआ, पूँजीपतियों, ऋणदाता बैंको, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों, भ्रष्ट नौकरशाहों, विपरीत मौसम और पर्यावरण की तमाम समस्यायों से जूझता हुआ जब अपना तैयार माल बाजार में बेंचने ले जाता है तो वहाँ लालची दलालों के हाथों पड़कर अपना सर्वस्व लुटा देता है। ऐसे में जब यह रिपोर्ट आती है कि विदर्भ क्षेत्र में ७६८६ किसानों ने आत्महत्या कर ली तो मात्र कुछ दिनों के लिए हाहाकार मचता है। उसके बाद स्थिति जस की तस हो जाती है।

चौदह अप्रैल की वह शाम मेरे लिए अभूतपूर्व अनुभवों वाली साबित हुई। एक के बाद एक उम्दा कार्यक्रमों को देखने-सुनने का मौका पाकर मुझे वहाँ कुछ और दिन रुकने का मन हो चला लेकिन ये मुई सरकारी नौकरी इतने भर की छुट्टी भी बड़ी मुश्किल से देती है। हम अगले दिन विश्वविद्यालय के नवनिर्मित प्रशासनिक भवन, पुस्तकालय व विभिन्न विद्यापीठ देखने टीले के ऊपर गये। DSC02667 वित्त अधिकारी मो.शीस खान से मिलने के बाद हम अन्त में कुलपति जी के कार्यालय में गये। आधुनिक सुविधाओं और संचार साधनों  से लैस कार्यालय में कुर्ता पाजाम पहनकर श्री विभूति नारायण राय एक साथ दक्षता, सादगी और कर्मठता का परिचय दे रहे थे। इस शुष्क टीले को हरा-भरा करके उसपर स्थापित अनेक उत्कृष्ट विद्यापीठों में पठन-पाठन व शोध सम्बन्धी गतिविधियों को गति प्रदान करने का जो कार्य आपने शुरू किया है वह किसी भगीरथ प्रयत्न से कम नहीं है।

हमने उनकी मेज पर रखे कम्प्यूटर से अपने रेल टिकट का पी.एन.आर. स्टेटस जाँचा और टिकट कन्फ़र्म होने की खुशी का भाव लिए  उनसे विदा लेकर विनोद जी के साथ सेवाग्राम स्टेशन के लिए चल पड़े।

(समाप्त)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

 

Technorati Tags: ,

वर्धा परिसर का परिक्रमण और चाय पर चर्चा…

11 टिप्पणियाँ

 

MGAHV-logo कुलपति जी के आवास से रात का भोजन लेने के बाद राजकिशोर जी, अब्दुल बिस्मिल्लाह, प्रो.सचिन तिवारी, प्रो. सुवास कुमार के साथ हम गेस्ट हाउस लौट आये। वहाँ खुले आसमान के नीचे चबूतरे पर कुर्सियाँ डाल रखी गयीं थी। दो बुजुर्गवार लोग तो सोने के लिए अपने कमरे में चले गये लेकिन राजकिशोर जी और प्रो. सुवास कुमार के साथ मैं वही पर कुर्सियाँ खींच कर बैठ गया। कारण यह कि वहाँ प्रियंकर जी पहले से मौजूद थे। हम दोनो हिन्दी ब्लॉगजगत के माध्यम से पहले ही एक दूसरे से परिचित थे। हिन्दी चिट्ठाकारी की दुनिया विषयक राष्ट्रीय गोष्ठी में वे इलाहाबाद आये थे तब उनसे भेंट हुई थी। यहाँ दुबारा मिलकर मन में सखा-भाव उमड़ पड़ा और हम भावुक सा महसूस करने लगे।

प्रियंकर जी ने हिन्दीसमय.कॉम के कोर-ग्रुप की बैठक की कुछ और जानकारी दी। इसके तीन सदस्यों के आगरा, लखनऊ और कोलकाता में बसे होने के कारण क्या कुछ कठिनाइयाँ नहीं आतीं? मैने इस आशय का सवाल किया तो उन्होंने बताया कि सभी नेट के माध्यम से जुड़े रहते हैं और एक-दो महीने पर किसी एक के शहर में या वर्धा में बैठक कर अगली रणनीति तय कर ली जाती है। कुलपति जी द्वारा इस महत्वाकांक्षी योजना को नई ऊँचाइयों पर ले जाने के लिए और भी जतन किए जा रहे हैं। नेट पर उत्कृष्ट साहित्य अपलोड करने में कॉपीराइट सम्बन्धी अड़चनों की चर्चा भी हुई। कुछ प्रकाशकों ने तो सहर्ष सहमति दे दी है लेकिन कुछ अन्य प्रकाशक पूरी सामग्री नेट पर निःशुल्क सुलभ कराने में अपनी व्यावसायिक क्षति देख रहे हैं।

अनुवाद एवं निर्वचन विभाग

इसी बीच राजकिशोर जी को अपने करीब बैठा देख मुझे अपने मन में उठे एक सवाल का निराकरण करा लेने की इच्छा हुई। सभ्यता के भविष्य पर बोलते हुए उन्होंने सामुदायिक जीवन (commune life) का महिमा मण्डन किया था। इस पुरानी सभ्यता की ओर लौट जाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा था कि आजका अन्धाधुन्ध मशीनी विकास हमें सामाजिक गैर बराबरी की ओर ले जा रहा है। इससे विश्व समाज में तमाम युद्ध और उन्माद की स्थिति उत्पन्न हो रही है। अमीर लगातार और अमीर होते जा रहे हैं और गरीब भुखमरी का शिकार हो रहे हैं। इसके विपरीत कम्यून में सभी बराबर हुआ करते थे। सभी श्रम करते थे और उत्पादन पर सबका सामूहिक अधिकार था। मनुष्य को शान्ति और सन्तुष्टि तभी मिल सकती है जब वह इस प्रकार के सामुदायिक जीवन को अपना ले।

मैने उनसे पूछा कि आप व्यक्ति की निजी प्रतिभा और उद्यम को कितना महत्व देते हैं। मनुष्य अपने निजी परिश्रम और प्रतिभा के दम पर जो उपलब्धियाँ हासिल करता है उनपर उसका अधिकार होना चाहिए कि नहीं? यदि वह उसका प्रयोग निजीतौर पर करने का अधिकार नहीं पाएगा तो अतिरिक्त प्रयास (extra effort) करने के लिए आवश्यक अभिप्रेरणा (motivation) उसे कहाँ से मिलेगी? फिर मानव सभ्यता के विकास की गाड़ी आगे कैसे बढ़ेगी?

राजकिशोर जी ने कहा कि individual effort तो महत्वपूर्ण है ही लेकिन उसका प्रयोग कम्यून के लिए होना चाहिए। उपलब्धियों का लाभ सबको बराबर मिलना चाहिए। चर्चा में प्रो.सुवास कुमार ने हस्तक्षेप किया, बोले- मुझे लगता है कि सारी समस्या की जड़ ही ‘प्राइवेट प्रॉपर्टी’ है। सम्पत्ति के पीछे भागते लोग सभ्यता भूल जाते हैं। मुझे लगा कि मैं बी.ए. की कक्षा में बैठा मार्क्सवाद का पाठ पढ़ रहा हूँ। दोनो मनीषियों ने मुझे कम्यूनिष्ट विचारधारा के मोटे-मोटे वाक्य सुनाये। इस चर्चा के बीच में ही मेरे साथी विनोद शुक्ला जी उठते हुए याद दिलाया कि बारह बज चुके हैं, सुबह कुलपति जी ने साढ़े पाँच बजे टहलने के लिए तैयार रहने को कहा है। वे सोने चले गये। लेकिन मुझे तो कुछ दूसरा ही आनन्द मिल रहा था। गान्धी हिल्स पर सूर्योदय (१५.४.२०१०)

मैने प्रो. सुवास कुमार की बात को लपकते हुए कहा कि सर, मुझे तो लगता है कि समस्या सिर्फ़ प्राइवेट प्रॉपर्टी में नहीं है। सम्पत्ति चाहे निजी हाथों में रहे या सार्वजनिक नियन्त्रण में उसको लेकर समस्या पैदा होती रहेगी। पूँजीवाद के विरुद्ध जो रूसी क्रान्ति हुई और साम्यवादी सरकार गठित हुई उसने भी क्या किया? सम्पत्ति सरकारी हाथों में गयी और जो लोग सरकार के मालिक थे उनकी दासी बन गयी। एक प्रकार का स्टेट कैपिटलिज्म स्थापित हो गया। किसी निजी पूँजीवादी में जो बुराइयाँ देखी जाती थीं वही सब इन साम्यवादी सरकारों में आ गयीं जो अन्ततः इनके पतन का कारण बनीं। इसलिए आवश्यकता से अधिक सम्पत्ति अपने आप में बुराई की जड़ है।

राजकिशोर जी मुस्करा रहे थे। बोले- यह सम्पत्ति तो माया है और इसे महा ठगिनी कहा गया है। हमने उनका समर्थन किया। वे फिर बोले- इस माया का श्रोत क्या है? सुवास जी बोले- माया तो हमारे मन की बनायी हुई है। फिर राजकिशोर जी ने कहा कि ईश्वर को भी तो हमारे मन ने ही बनाया है। वे जोर से हँसे और बोले- ईश्वर और माया दोनो को गोली मार दो। सारी समस्या खत्म हो जाएगी। दुनिया में सारे झगड़े फ़साद की जड़ यही दोनो हैं।

मैने अपने दर्शनशास्त्र का विद्यार्थी होने का परिचय दिए बिना ही उन्हें टोका- आप ऐसा कर ही नहीं सकते। ईश्वर को गोली नहीं मारी जा सकती क्योंकि ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं है। यह तो सत्य का दूसरा नाम है, और सत्य को समाप्त नहीं किया जा सकता। यह जो माया है वह कुछ और नहीं हमारा अज्ञान(ignorance) है। हम अज्ञान के अन्धकार में भटक रहे है और एक-दूसरे से लड़-भिड़ कर अपना सिर फोड़ रहे हैं। ज्योंही हमें सत्य का ज्ञान होगा, अन्धेरा अपने आप भाग खड़ा होगा। इसलिए हमें बनावटी बातों के बजाय सत्य के निकट पहुँचने की कोशिश करनी चाहिए। जो सत्य के निकट है वह ईश्वर के निकट है। जो ईश्वर के निकट है वह गलत काम नहीं करेगा। लेकिन सत्य का संधान करना इतना आसान भी नहीं है। चर्चा दूसरी ओर मुड़ गयी…।

अचानक रात के एक बजे हमें याद आया कि सुबह पाँच बजे उठना है। हम झटपट चर्चा को विराम देकर उठ लिए और मोबाइल में एलार्म सेट करके बिस्तर पर जा पड़े।

सुबह योजना के मुताबिक साढ़े पाँच बजे तैयार होकर नीचे सड़क पर पहुँचना था, लेकिन हमारी नींद साढे चार बजे ही खुल गयी। दरअसल विनोद जी, जो जल्दी सो गये थे वे जल्दी उठकर खटर-पटर करने लगे। मुझे भी सुबह पहाड़ी पर टहलने की उत्सुकता के मारे अच्छी नींद ही नहीं आयी थी। हम पाँच बजे ही तैयार होकर कमरे से बाहर आ गये। अम्बेडकर जयन्ती का ब्राह्म मूहूर्त वर्धा गेस्ट हाउस से यह तस्वीर गेस्ट हाउस के चबूतरे पर खड़े होकर हमने उसी समय ली थी जब सूर्योदय अभी नहीं हुआ था।

थोड़ी देर में गेस्ट हाउस के एक सूट से विश्व विद्यालय के वित्त अधिकारी मो.शीस खान जी बाहर आये और क्रमशः अपने-अपने आवास से कुलपति विभूति नारायण राय, प्रति-कुलपति नदीम हसनैन, कुलसचिव डॉ. कैलाश जी. खामरे और डीन प्रो. सूरज पालीवाल भी अपनी टहलने की पोशाक में निकल पड़े। हमारी कच्ची तैयारी पर पहली निगाह कुलपति जी की ही पड़ी। हमारे पैरों में हवाई चप्पल देखकर उन्होंने कहा कि स्पोर्ट्स शू नहीं लाये हैं तो ऊपर दिक्कत हो सकती है। हमारे पास चमड़े के जूते और हवाई चप्पल का ही विकल्प था इसलिए हमने इसे ही बेहतर समझा था। जीन्स और टी-शर्ट में ही हमने ट्रैक-सूट  का विकल्प खोजा था। फिर भी हमारे उत्साह में कोई कमी नहीं थी।

मो.शीस खान जी का व्यक्तित्व देखकर हम दंग रह गये। वे साठ साल की उम्र में सरकारी सेवा पूरी करके रेलवे से सेवानिवृत्त हो चुके थे उसके बाद यहाँ वित्त अधिकारी का काम सम्हाला है। लेकिन शरीर से इतने चुस्त-दुरुस्त कि टहलने वालों में सबसे पहले जाग कर सबको मोबाइल पर घण्टी देकर जगाते हैं, टीले की चढ़ाई पर सबसे पहले चढ़ जाते है और रुक-रुककर पीछे छूट गये साथियों को अपने साथ लेते हैं। उन्होंने हाथ मिलाकर मेरे अभिवादन का जवाब दिया। नदीम हसनैन साहब स्थिर गति से अपनी भारी देह को सम्हालते हुए आगे बढ़ते रहे। प्रायः मौन रहते हुए उन्होंने वाकिंग ट्रैक पूरा किया। अपने पीछे से आगे जाते हुए लोगों को निर्विकार देखते हुए। खामरे साहब सबकी प्रतीक्षा छोड़कर जल्दी-जल्दी आगे बढ़ जाते हैं ताकि थकान होने से पहले चढ़ाई पूरी कर लें। ऊपर जाकर कुछ व्यायाम करना भी उनके मीनू में शामिल है।

कुलपति जी और वित्त अधिकारी मो.शीस खान

टहलते हुए हमने कुछ बातें यहाँ के मौसम के बारे में की। मध्य अप्रैल में पारा ४३ डिग्री तक पहुँचने लगा था। पता चला कि मई-जून में यह ५३-५४ तक पहुँच जाता है। यहाँ बरसात का मौसम बड़ा खुशगंवार होता है। ढलान के कारण जल-जमाव नहीं होता। हरियाली बढ़ जाती है और तापमान भी नीचे रहता है।

मैने पूछा कि विश्वविद्यालय की स्थापना १९९७ में हुई बतायी जाती है तो यहाँ के परिसर का विकास कार्य अभी तक अधूरा क्यों है? पेड़-पौधे अभी हाल में रोपे गये लगते हैं। सड़कें भी नई बनी हुई लग रही हैं। भवनों का निर्माण कार्य अभी भी हो रहा है। आखिर इतनी देर क्यों हुई? इसका जवाब मुझे अगले दो दिनों में टुकड़ों में मिला। दरअसल संसद से विश्वविद्यालय का एक्ट पारित होने के बाद दो-तीन साल इस कवायद में बीत गये कि इसकी स्थापना वर्धा के बजाय किसी विकसित स्थान पर क्यों न किया जाय। जब यह अन्तिम रूप से तय हो गया कि इस विश्वविद्यालय की परिकल्पना ही गांधी जी के सेवाग्राम आश्रम में देखे गये सपने को साकार करने के लिए की गयी है और एक्ट में ही वर्धा का स्थल के रूप में निर्धारण किया जा चुका है, जो बदला नहीं जा सकता है तब यहाँ इसके स्थापत्य की जरूरत महसूस की गयी। वर्धा जिला मुख्यालय के आसपास उपयुक्त स्थल के चयन के लिए तत्कालीन अधिकारियों ने हवाई सर्वेक्षण करके इन पाँच निर्जन टीलों का चयन किया और करीब दो सौ एकड़ जमीन अधिग्रहित की गयी। दूसरे कुलपति के कार्यकाल में भी निर्माणकार्यों की गति बहुत धीमी रही। योजना आयोग का अनुदान और वार्षिक बजट लौटाया जाता रहा। वर्धा शहर में कुछ मकान किराये पर लेकर विश्वविद्यालय चलाने की औपचारिकता पूरी की जाती रही।

वर्तमान में विश्वविद्यालय के तीसरे कुलपति के रूप में उत्तर प्रदेश कैडर के पुलिस अधिकारी और साहित्य की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने वाले विभूति नारायण राय को कमान सौंपी गयी। अपने पीछे एक लम्बा प्रशासनिक अनुभव, हिन्दी साहित्य के विशद अध्ययन से उपजी व्यापक दृष्टि और क्षुद्र स्वार्थों और एकपक्षीय आलोचना से ऊपर उठकर नव-निर्माण करने की रचनात्मक ललक लेकर जबसे आप यहाँ आए हैं तबसे इस प्रांगण को विकसित करने व सजाने सवाँरने का काम तेजी से आगे बढ़ा है। केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग की मन्थर गति से असन्तुष्ट होकर इन्होंने उत्तर प्रदेश की एक सरकारी निर्माण एजेन्सी को विश्वविद्यालय परिसर के भवनों का निर्माण कार्य सौंप दिया। रिकॉर्ड समय में यहाँ प्रशासनिक भवन, पुस्तकालय, अनुवाद और निर्वचन केन्द्र, गान्धी और बौद्ध अध्ययन केन्द्र, महिला छात्रावास, गेस्ट हाउस, आवासीय परिसर इत्यादि का निर्माण कार्य पूरा हुआ और अभी आगे भी रात-दिन काम चल रहा है।

दूसरी ओर विश्वविद्यालय में अध्ययन और अध्यापन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य भी सुचारु ढंग से चलाने के लिए जिन अध्यापकों की आवश्यकता थी उन्हें भी नियुक्त किये जाने की प्रक्रिया तेज की गयी। हमारे देश में जिस एक कार्य पर सबसे अधिक अंगुलियाँ उठायी जाती हैं वह है नियुक्ति प्रक्रिया। विश्वविद्यालय भी इसका अपवाद नहीं रहा। मैने जब इस बावत कुलपति जी से सवाल किया तो बोले- देखिए, आलोचना तो होती ही है। लेकिन उससे डरकर यदि हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रह जाँय तो स्थिति सुधरेगी कैसे? मैं अपना काम करने में ज्यादा ध्यान लगाता हूँ। यह करते हुए मेरी चमड़ी थोड़ी मोटी हो गयी है। सबको सफाई देने के चक्कर में अपना समय बर्बाद नहीं कर सकता। अन्ततः तो हमारा काम ही सामने आएगा और समय इसका मूल्यांकन करेगा। मेरी कोशिश है अच्छे लोगों को इस विश्वविद्यालय से जोड़ने की। वे चाहे जिस फील्ड के हों, यदि उनके भीतर कुछ सकारात्मक काम करने की सम्भावना है तो मैं उन्हें जरूर अवसर देना चाहूंगा।

ऊपरी टीले का चक्कर लगाते हुए हम दूसरे सिरे से नीचे आने वाली सड़क  पर टहलते हुए अर्द्धनिर्मित महिला छात्रावास के पास आ गये। इसके आधे हिस्से में छात्राएं आ चुकी हैं। छात्रों का हॉस्टल इस साल बनकर पूरा हो जाएगा। अभी वे शहर में एक किराये के भवन में रहते हैं जहाँ से बस द्वारा विश्वविद्यालय परिसर में आते हैं। हाल ही में बनी कंक्रीट और सीमेण्ट की सड़क के दोनो ओर लगे नीम और पीपल के पौधे लगाये गये थे जो पाँच से दस फीट तक बढ़ चुके थे। चार दीवारी पर वोगनबेलिया की बेलें फैली हुई थी। इस शुष्क मौसम में कोई अन्य फूल पत्ती उगाना बड़ा ही कठिन काम था। पानी की कमी सबसे बड़ी समस्या थी। कुलपति जी ने हाल ही में अधिग्रहित खेल के मैदान की जमीन दिखायी जिसे जोतकर बराबर कर लिया गया था। जंगली पौधों और कटीली घास को समूल नष्ट करने के लिए लगातार निराई और गुड़ाई की जा रही थी ताकि समतल मैदान पर नर्म मुलायम घास लगायी जा सके। मैने वहाँ एक इनडोर स्पोर्ट्स हाल बनवाने की सलाह दी जिसमें बैडमिण्टन, टेबुल टेनिस, जिम्नेजियम, इत्यादि की सुविधा रहे। कुलपति जी ने अगली पंचवर्षीय योजना में इसके सम्मिलित होने की बात बतायी।

प्रो. पालीवाल (सबसे बाएं) के घर में सुबह की चायइस प्रकार टहलते हुए हम अपने अगले ठहराव पर पहुँच गये। आज प्रो. सूरज पालीवाल की बारी थी। जी हाँ, वहाँ यह स्वस्थ परम्परा बनी है कि टहलने के बाद कुलपति जी सहित सभी अधिकारी किसी एक सदस्य के घर पर सुबह की चाय एक साथ लेंगे। पालीवाल जी अपने घर में अकेले रहते हैं।  कदाचित्‌ स्वपाकी हैं, क्यों कि सबको बैठाकर वे स्वयं किचेन में गये और अपने हाथ से ही चाय की ट्रे लेकर आये। वहाँ शुद्ध दूध में बनी गाढ़ी चाय पीकर हमें अपने घर की बिना दूध की ‘नीट चाय’ बहुत याद आयी। सुबह-सुबह टहलने की थकान इस एनर्जी ड्रिंक से जाती रही। साथ ही जो कैलोरी हमने टहलने में खर्च की वह तत्काल जमा हो गयी होगी। इस बीच मेरा ध्यान अपने हवाई चप्पल से रगड़ खाते पाँव की ओर गया। दोनो पट्टियों के नीचे पाँव में सुर्ख लाल निशान बन गये थे। थोड़ी देर में वहाँ छाले उभर आये।

करीब साढ़े सात बजे हम वहाँ से उठे तो कुलपति जी ने बताया कि आज अम्बेडकर जयन्ती के कारण विश्वविद्यालय में छुट्टी है। आपलोग सेवाग्राम देख आइए। हमें तो मन की मुराद मिल गयी। सेवाग्राम अर्थात्‌ वह स्थान जहाँ गांधी जी ने राजनीति से सन्यास लेने के बाद अपना आश्रम स्थापित करते हुए अपने सिद्धान्तों की प्रयोगशाला बनायी थी।

करीब साढ़े ग्यारह बजे तैयार होकर हम कुलपति जी के आवास पर पहुँचे ताकि सेवाग्राम आश्रम जाने के लिए किसी वाहन  का इन्तजाम हो सके। कुलपति जी हमारी मांग सुनकर पशोपेश में पड़ गये। छुट्टी के कारण कोई ड्राइवर आया नहीं था और अब किसी को बुलाने में काफ़ी देर हो जाती। धूप और गर्मी प्रचण्ड थी। यहाँ से सेवाग्राम जाने का कोई सार्वजनिक साधन उपलब्ध नहीं था। तभी वे अन्दर गये और अपनी निजी कार की चाबी ले आये। मुझे थमाते हुए बोले कि आप “वैगन-आर” तो चला लेंगे न? मैने सहर्ष हामी भरी और गाड़ी गैरेज से निकालकर, ए.सी. ऑन किया, विनोद शुक्ला जी को बगल में बैठाया और सेवाग्राम की ओर चल पड़े।

(मैने पिछली कड़ी में वादा किया था कि इस कड़ी में अम्बेडकर जयन्ती के अनूठे अनुभव की बात बताउंगा, लेकिन पोस्ट लम्बी हो चली है और अभी उस बात की चर्चा शुरू भी नहीं हो पायी है। इसलिए क्षमा याचना सहित उसे अगली कड़ी पर टालता हूँ। बस इन्तजार कीजिए अगली कड़ी का… 🙂

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

वर्धा में हमने जो देखा वह अद्‌भुत है…

19 टिप्पणियाँ

 

सेवाग्राम स्टेशन का निकास द्वाररेलगाड़ी के ठण्डे कूपे से निकलकर बैशाख की चिलचिलाती धूप में जब हम सेवाग्राम स्टेशन पर उतरे तो पल भर में माथे पर पसीना आ गया। पत्थरों और कंक्रीट की इमारतों के बीच हरियाली बहुत विरल थी। तराई क्षेत्र का रहने वाला हूँ इसलिए यह इलाका कुछ ज्यादा ही उजाड़ और वीरान लग रहा था। गर्मी के कारण लोग खुले स्थानों पर प्रायः नहीं थे। स्टेशन से बाहर आकर हमें प्रतीक्षा करती गाड़ी मिल गयी जो काफी देर से धूप में खड़ी रहने के कारण भट्ठी जैसी गरम हो चुकी थी। स्टार्ट होने के बाद इसका ए.सी. चालू हुआ तो एक-दो मिनट में राहत मिल गयी।

सेवाग्राम से वर्धा विश्वविद्यालय की दूरी करीब छः किलोमीटर है। रास्ते में इक्का-दुक्का लोग ही दिखे। हमारे इलाहाबाद की तरह सड़क किनारे लगे लाई-चना-चुरमुरा के खोमचे, खीरा-ककड़ी बेचती औरतें, कच्चे आम का पना बेंचते ठेलेवाले या तरबूज-खरबूज के ढेर लगाकर बैठे कुजड़े वहाँ नहीं दिखे। वर्धा शहर को बायपास करती सड़क से होकर जब हम प्रायः निर्जन इलाके की ओर बढ़ चले तो मेरे मन में उत्सुकता का स्थान व्याकुलता ने ले लिया। गर्म हवा की लपटें सड़क पर दूर चमकते तारकोल से यूँ उठती दिख रही थीं जैसे नीचे किसी हवन कुण्ड में आग जल रही हो। आखिरी मोड़ पर जब गाड़ी मुड़ी तो एक ऊँचे से टीले की ढलान पर सफेद पेण्ट से “महात्मा गांधी अन्तर राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय-वर्धा” बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा हुआ दिखायी पड़ा। अपनी मंजिल के प्रथम साक्षात्कार का यह दृश्य अद्‍भुत लगा।

लेकिन यह शुष्क टीला अपनी तरह का अकेला नहीं था। आस-पास चार-पाँच टीले ऐसे ही दिखायी पड़े जो कदाचित्‌ प्रकृति के कृपापात्र नहीं हो पाये थे। प्रायः वनस्पति विहीन और पथरीले भूभाग पर उठे हुए ये नंगे-ठिगने पहाड़ प्रकृति पर मानव की सत्ता स्थापित होने की कहानी कह रहे थे। इनके शीर्षतल पर जाने के लिए चट्टानों को काटकर बनायी गयी सर्पिल सड़क के किनारे करीने से सजाये गये गमले, शिक्षा संकाय के लिए हाल ही में बने भव्य विद्यापीठ, पुस्तकालय व अन्य मानवनिर्मित भवनों को अन्तिम रूप देती मशीनें और मजदूर, बिजली के खम्भे और उनपर दौड़ती केबिल में प्रवाहित होती विद्युत धारा, निर्माणाधीन पानी की टंकी, पंक्तिबद्ध रोपे गये नये पौधे और उन्हें पानी देने के लिए मीलों दूर से लायी हुई पाइपलाइन  यह बता रही थी कि इस निर्जन पहाड़ पर मानव ने मेधा को तराशने का कारखाना बनाने का मन बना लिया है।

http://maps.google.co.in/maps?hl=en&ie=UTF8&ll=20.764782,78.587383&spn=0.006661,0.011362&t=h&z=17&output=embed
View Larger Map गूगल अर्थ की उपग्रह तस्वीर में पंचटीला(वर्धा) की पाँच साल पुरानी स्थिति जो अब बहुत बदल गयी है

भव्य तोरणद्वार से प्रवेश कर हमारी गाड़ी फादर कामिल बुल्के अन्तरराष्ट्रीय छात्रावास की सीढ़ियों के पास जाकर रुकी तो बाहर निकलने पर गर्म पत्थर से आँच निकलती सी महसूस हुई। सीढ़ियाँ चढ़कर हम ऊँचे चबूतरे पर पहुँचे। आधुनिक वास्तुकला का सुन्दर नमूना पेश करता हुआ यह भवन भी हाल ही में तैयार हुआ जान पड़ा क्योंकि गूगल अर्थ पर मैने इस प्रांगण को देखने की जो कोशिश की थी उसमें इसका कोई अता-पता नहीं था। इस छात्रावास को फिलहाल गेस्ट हाउस के रूप में भी प्रयोग किया जा रहा है।

दोपहर के दो बजे होंगे जब हम अपने लिए निर्धारित कमरे में पहुँचे। कूलर की ठण्डी हवा मिलते ही हम बिस्तर पर पसर तो गये, लेकिन लम्बी यात्रा के बाद स्नान किए बिना पड़े रहना रास नहीं आया। वहाँ का बाथरूम तो सुसज्जित था लेकिन छत पर रखी टंकी का पानी अपने क्वथनांक के करीब पहुँच चुका था। हमारे पास ‘स्टीम बाथ’ के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प भी नहीं था इसलिए हमने कम से कम पानी खर्च करने का पाठ तत्काल सीखते हुए उसपर अमल भी कर लिया और सज सवँरकर तैयार हो लिए। हमें बताया गया कि मनीषा जी एक-दो घण्टे के भीतर ही वापस आगरा के लिए निकलने वाली हैं। उनसे मिलना तो हमारे प्रमुख उद्देश्यों में से एक था।

हमने उनका फोन मिलाया तो पता चला कि इस इलाके में बी.एस.एन.एल. की सेवाएं बहुत अच्छी नहीं हैं। दूसरे सिरे पर स्थित व्यक्ति के अतिरिक्त दूसरी तमाम आवाजें आ रही थीं लेकिन मनीषा जी अन्त तक यह नहीं बता सकीं कि वे दस-पन्द्रह मिनट में गेस्ट हाउस पहुँचने वाली हैं। खैर, उनकी एक सहयोगी ने बताया कि वो बस आने ही वाली हैं। वन्दना मिश्रा, मनीषा कुलश्रेष्ठ और...मैं

मनीषा जी, यानि मनीषा कुलश्रेष्ठहिन्दीनेस्ट.कॉम की मालकिन और प्रतिष्ठित लेखिका, कवयित्री और सम्पादक। उनकी सहयोगी यानि वन्दना मिश्रा। लखनऊ में रहकर आपने तमाम पुस्तकों का प्रकाशन किया है। प्रसिद्ध लेखक और पत्रकार स्व. अखिलेश मिश्र जी की पुत्री वन्दना जी उस कोर ग्रुप की सदस्य हैं जो विश्वविद्यालय की साहित्यिक वेबसाइट हिन्दीसमय.कॉम की सामग्री के चयन और प्रकाशन के लिए उत्तरदायी है। इस कोर ग्रुप के तीसरे सदस्य अनहद नाद वाले अपने प्रिय ब्लॉगर आदरणीय प्रियंकर जी हैं जो उस समय कोलकाता से इस समिति की बैठक के लिए आये हुए थे। हिन्दी साहित्य के दस लाख पृष्ठ अन्तर्जाल में एक ही पते पर अपलोड करने की महत्वाकांक्षी योजना को कार्यरूप देने के लिए विश्वविद्यालय द्वारा इन विभूतियों को एक साथ सिर जोड़कर कार्य करने हेतु आमन्त्रित किया गया है। इतने कम समय में यह जालस्थल कितनी दूरी तय कर चुका है उसे आप वहाँ जाकर देख सकते हैं।

मनीषा जी अपनी सद्यःप्रकाशित पुस्तक शिग़ाफ लेकर आयी थीं। मैने उन्हें सत्यार्थमित्र की एक प्रति भेंट की। वन्दना जी का एक कविता संग्रह अनामिका प्रकाशन से छपकर शीघ्र ही आने वाला है। मेरे साथ अनामिका प्रकाशन के मालिक विनोद शुक्ला जी ही थे। उन्होंने वन्दना जी और मनीषा जी के साथ फटाफट मेरा फोटो सेशन करा दिया। पुस्तक प्रकाशन के बाजार से लेकर विश्वविद्यालय की अन्तर्जाल सम्बन्धी प्रकाशन योजना पर विस्तृत चर्चा हुई। कुछ देर में ट्रेन का समय नजदीक आया और हम मनीषा जी को विदा करके गेस्ट हाउस की कैण्टीन की ओर चाय लेने चल दिए।

शुद्ध दूध की गाढ़ी चाय बड़े से कप में लबालब भरी हुई आ गयी। वहाँ पहले से ही एक प्रोफ़ेसर साहब बैठकर चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे। मुझे उनका चेहरा परिचित सा जान पड़ा। मैने दरियाफ़्त की तो पता चला कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय से सेवा निवृत्त अंग्रेजी के प्रो.सचिन तिवारी जी हैं। हम करीब पन्द्रह साल पहले मिले थे जब वे कैम्पस थियेटर चलाते थे और मैं पत्रकारिता का विद्यार्थी हुआ करता था। कैण्टीन में राजकिशोर जी मिलेइसी बीच एक छोटेकद के श्यामवर्ण वाले भयंकर बुद्धिजीवी टाइप दिखने वाले महाशय का पदार्पण हुआ। उन्होंने बैठने से पहले ही कैन्टीन के वेटर से कहा कि मुझे बिना चीनी की चाय देना और दूनी मात्रा में देना। यानि कप के बजाय बड़ी गिलास में भरकर। मुझे मन ही मन उनकी काया के रंग का रहस्य सूझ पड़ा और सहज ही उभर आयी मेरे चेहरे की मुस्कान पर उनकी नजर भी पड़ गयी। मैने झेंप मिटाते हुए उनका परिचय पूछ लिया।

वे तपाक से बोले- “मुझे राजकिशोर कहते हैं… दिल्ली से आया हूँ। आप कहाँ से…?”

मेरे यह बताने पर कि मैं इलाहाबाद से आया हूँ और वहाँ कोषाधिकारी हूँ, उन्होंने सीधा सवाल दाग दिया- “अच्छा, ये बताइए कि ट्रेजरी में भ्रष्टाचार की स्थिति अब कैसी है?”

यदि मैं शुद्ध सरकारी अधिकारी होता तो शायद इसका जवाब देना थोड़ा कठिन होता लेकिन समाज के दूसरे पढ़े-लिखे वर्ग से भी सम्पर्क में होने के कारण मैने इसका कुछ दार्शनिक सा उत्तर दे दिया। मैने यह भी बताया कि कम्प्यूटर और सूचना प्रौद्यौगिकी के प्रयोग से अब मनुष्य के हाथ का बहुत सा काम मशीनों को दे दिया गया है इसलिए भ्रष्टाचार करने के अवसर ट्रेजरी में कम होते गये हैं। फिर भी जहाँ अवसर उपलब्ध है वहाँ प्रयास जारी है। लेकिन इस मानवसुलभ प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के प्रयास भी साथ-साथ जारी हैं।

राजकिशोर जी ने इस चर्चा का उपसंहार यह कहते हुए कर दिया कि अब इस मुद्दे को छोड़िए, इसमें कोई दम नहीं बचा है, महंगाई बहुत बढ़ गयी है। मुझे तबतक यह पता चल चुका था कि आज शाम छः बजे गांधी हिल्स पर राजकिशोर जी ‘सभ्यता के भविष्य’ पर अपने विचार व्यक्त करने वाले हैं। गांधीजी की प्रिय बकरीयह सुखद संयोग ही था कि जिनके लेख हम चोखेर बाली और हिन्दी भारत जैसे जालस्थलों पर तथा अनेक पत्र पत्रिकाओं में पढ़ते आ रहे थे उन्हें सजीव सुनने का अवसर मिलने जा रहा था। वार्ता का समय होने तक हम कैण्टीन में ही बात करते रहे और फिर गाड़ी हमें टीले की चोटी पर ले जाने के लिए आ गयी। 

मुख्य टीले पर जाने के लिए जो घुमावदार सड़क बनी हुई है उससे ऊपर पहुँचने पर सड़क की बायीं ओर विकसित किये जा रहे उद्यान में एक बकरी की सुन्दर अनुकृति स्थापित की गयी है। कदाचित्‌ वहाँ गांधी जी के प्रिय पात्रों और उनके उपयोग की वस्तुओं को जुटाने का प्रयास किया गया है। वहीं थोड़ा आगे बढ़ने पर गांधी जी की आदमकद प्रतिमा उनके तीन प्रिय बन्दरों के साथ स्थापित है। हमारे पास उन सबको देखने का समय उस समय नहीं था। हमने सभास्थल पर पहुँचकर विश्वविद्यालय के कुलपति जी से मुलाकात की। कुशल-क्षेम के बाद हम राजकिशोरजी की वार्ता सुनने के लिए गोलाकार सीढ़ीनुमा चबुतरे पर बैठ गये। अर्द्धवृत्ताकार दर्शकदीर्घा के ठीक सामने खड़े लैम्प-पोस्ट के नीचे वार्ताकार का चबूतरा बना था। खुले आकाश के नीचे टीले की चोटी पर बना यह मुक्त गोष्ठी स्थल महानगरीय सभ्यता की शोरगुल भरी भागमभाग जिन्दगी से बिल्कुल अलग एक सुरम्य वातावरण सृजित कर रहा था। इस स्थान पर बैठकर ‘सभ्यता के भविष्य’ के बारे में चिन्तन करते लोग मुझे बहुत भले लगे।

सभ्यता का भविष्ययद्यपि अपनी वार्ता में राजकिशोर जी ने जिस कम्यून पद्धति की ओर लौटने की बात की और वर्तमान उदारवादी लोककल्याणकारी जनतंत्रात्मक राज्य को पूँजीवादी सत्ता करार देते हुए पूरी तरह नकारने योग्य ठहराने का प्रयास किया उससे मैं सहमत नहीं हो सका लेकिन देश के कुछ बड़े बुद्धिजीवियों द्वारा विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच बैठकर इस प्रकार की चर्चा करना बहुत सुखद और आशाजनक लगा। उस छोटी सी दर्शक दीर्घा में कुलपति विभूति नारायण राय के साथ दिल्ली से पधारे हिन्दी के प्रतिष्ठित हस्ताक्षर प्रो. अब्दुल बिस्मिल्लाह, हैदराबाद के प्रो. सुवास कुमार, और विश्वविद्यालय संकाय के प्रो.सूरज पालीवाल व अन्य अनेक आचार्यगण मौजूद थे। राजकिशोर जी ने अपने विशद अध्ययन और दुनियाभर के अनुभवों को यहाँ बाँटते हुए बहुत सी बाते बतायीं जो जन संचार और पत्रकारिता के विद्यार्थियों का दृष्टिकोण प्रभावित करने वाली थी। एक छात्र द्वारा पूरी वार्ता की वीडियो रिकॉर्डिंग भी की गयी जो उनके लिए प्रायोगिक प्रशिक्षण के तौर पर अपेक्षित था।सभ्यता का भविष्य बताते राजकिशोर जी

शाम को कुलपति जी ने हमें डिनर साथ लेने के लिए आमन्त्रित किया। वहाँ पर एक बार फिर बौद्धिक चर्चा शुरू हो गयी। साहित्य, समाज, राजनीति, कला,और शेरो शायरी से भरी हुई वह चर्चा रिकॉर्ड करने लायक थी लेकिन मैं उसके लिए पहले से तैयारी नहीं कर सका था। इसी बीच मशहूर शायर और गीतकार शहरयार का फोन कई बार आता रहा और वहाँ उन्हें आज के जमाने का सबसे बड़ा शायर बताया जाता रहा। प्रो. अब्दुल बिस्मिल्लाह से प्रो. सचिन तिवारी ने सलमान रुश्दी की किताब शैतानी आयते (satanic verses) के बारे में कुछ सवाल किए। उनके जवाब पर काफ़ी देर तक बहस होती रही। पूरा ब्यौरा यहाँ देना सम्भव नहीं है, लेकिन उस परिचर्चा में शामिल होकर हमें बहुत आनन्द आया। अन्त में यह कड़ी समाप्त करने से पहले अब्दुल बिस्मिल्लाह जी द्वारा सुनाये और समझाए गये एक शेर की चर्चा करना चाहता हूँ।

वर्धा में सूर्योदय (१४ अप्रैल,२०१०)बुझा जो रौजने जिन्ना तो हमने समझा है

कि तेरी मांग सितारों से भर गयी होगी।

चमक उठे जो सलासिल तो हमने जाना है

कि अब सहर तेरे रुख पर बिखर गयी होगी॥

हमारे अनेक सुधी पाठक इस शेर से परिचित होंगे। यदि कोई अपनी टिप्पणी के माध्यम से इसके शायर का नाम बताते हुए इसका सन्दर्भ-प्रसंग बताना चाहे तो मुझे बहुत खुशी होगी। अगली कड़ी में इसकी चर्चा के बाद मैं बताऊंगा कि अगले दिन अम्बेडकर जयन्ती के अवसर पर मुझे वहाँ क्या कुछ चमत्कृत करने वाले अनुभव हुए। अभी इतना ही… प्रतीक्षा कीजिए अगली कड़ी का।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)