हे संविधान जी नमस्कार…

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हे संविधान जी नमस्कार,

इकसठ वर्षों के अनुभव से क्या हो पाये कुछ होशियार?
ऐ संविधान जी नमस्कार…

संप्रभु-समाजवादी-सेकुलर यह लोकतंत्र-जनगण अपना,
क्या पूरा कर पाये अब तक देखा जो गाँधी ने सपना?
बलिदानी अमर शहीदों ने क्या चाहा था बतलाते तुम;  
सबको समान दे आजादी, हो गयी कहाँ वह धारा गुम?
सिद्धांत बघारे बहुत मगर परिपालन में हो बेकरार,
हे संविधान जी नमस्कार…

बाबा साहब ने जुटा दिया दुनियाभर की अच्छी बातें,
दलितों पिछड़ों के लिए दिया धाराओं में भर सौगातें।
मौलिक अधिकारों की झोली लटकाकर चलते आप रहे;
स्तम्भ तीन जो खड़े किए वे अपना कद ही नाप रहे।
स्तर से गिरते जाने की ज्यों होड़ लगी है धुँआधार,
हे संविधान जी नमस्कार…

अब कार्यपालिका चेरी है मंत्री जी की बस सुनती है,
नौकरशाही करबद्ध खड़ी जो हुक्म हुआ वह गुनती है।
माफ़िया निरंकुश ठेका ले अब सारा राज चलाता है;
जिस अफसर ने सिस्टम तोड़ा उसको बेख़ौफ जलाता है।
मिल-जुलकर काम करे, ले-दे, वह अफसर ही है समझदार,
हे संविधान जी नमस्कार…

कानून बनाने वाले अब कानून तोड़ते दिखते हैं,
संसद सदस्य या एम.एल.ए. अपना भविष्य ही लिखते हैं।
जन-गण की बात हवाई है, दकियानूसी, बेमानी है;
यह पाँच वर्ष की कुर्सी तो बस भाग्य भरोसे आनी है।
सरकारी धन है, अवसर है, दोनो हाथों से करें पार,
हे संविधान जी नमस्कार…

क्या न्याय पालिका अडिग खड़ी कर्तव्य वहन कर पाती है?
जज-अंकल घुस आये तो क्या यह इसमें तनिक लजाती है?
क्या जिला कचहरी, तहसीलों में न्याय सुलभ हो पाया है?
क्या मजिस्ट्रेट से, मुंसिफ़ से यह भ्रष्ट तंत्र घबराया है?
अफ़सोस तुम्हारी देहरी पर यह जन-गण-मन है गया हार
हे संविधान जी नमस्कार…

आप सबको गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ…!!!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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क्या अखबार का पाठक चिरकुट है…?

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राष्ट्रीय संगोष्ठी में बहस का मुद्दा बना एक प्रबंध संपादक का बयान

देश की प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रतिनिधि इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में जुटे थे। विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता की शिक्षा देने वाले प्रोफ़ेसर, बड़े अखबारों के संपादक और न्यूज चैनेल्स के एंकर सिर जोड़कर वर्धा विश्वविद्यालय के पत्रकारिता के छात्रों और अकादमिकों को मीडिया की असली दुनिया से परिचित करा रहे थे। मिशनरी पत्रकारिता पर बहस चल रही थी। मीडिया द्वारा मिशन छोड़कर व्यावसायिकता की ओर मुड़ जाने पर चिंता व्यक्त की जा रही थी। मीडिया और राडिया के अंतर्सम्बन्ध खंगाले जा रहे थे। तभी एक प्रतिष्ठित अखबार के प्रबंध संपादक ने यह मंतव्य रखा कि जब एक साबुन की टिकिया के लिए लोग अपना अखबार बदल देते हैं तो उनसे प्रतिबद्धता की उम्मीद क्या की जाय। दो-ढाई रूपये देकर क्या उन्होंने अखबार के मालिक को खरीद लिया है जो उससे मिशन और नैतिकता की अपेक्षा करते हैं?

पाठकों को उक्त प्रकार से चिरकुट बताने से पहले उन्होंने पत्रकारों को भी उनकी औकात बताने की कोशिश की। बोले- आप इस भ्रम में मत रहिएगा कि यह राज-काज आपके भरोसे चल रहा है। आपकी स्थिति उस छिपकली जैसी है जो छत से चिपककर यह भ्रम पाल बैठी है कि इसे उसी ने रोक रखा है; या हाथी की पीठ पर बैठी उस मक्खी की तरह है जो उसे छोड़कर अकेले जंगल में इसलिए नहीं जाने देती कि उसके बिना इसकी (हाथी की) रक्षा नहीं हो सकेगी।

उनके पहले के वक्ताओं ने “मिशनरी पत्रकारिता- संदर्भ और प्रासंगिकता” नामक विषय पर बोलते हुए देश में लगातार बढ़ रहे भ्रष्टाचार, माफ़ियागीरी, घोटालों, इत्यादि के परिप्रेक्ष्य में मीडिया की भूमिका पर अनेक सुंदर व्याख्यान दिए थे और भविष्य के मीडियाकर्मियों को उनकी बढ़ती जिम्मेदारियों का बोध कराने का प्रयास किया था। चहुँओर निराशा के घने बादलों के बीच आशा का एक मात्र सूरज समाज के चौथे स्तंभ को बताया गया था। तब प्रबंध सम्पादक जी ने अपनी बात की शुरुआत एक रोचक कहानी से की थी-

बताने लगे- एक वृद्ध मौलवी लैंप पोस्ट के नीचे सड़क पर बहुत देर से कुछ ढूँढ रहा था।  एक नौजवान को उसकी परेशानी देखी नहीं गयी। सहायता करने की गर्ज़ से पूछा- बाबा क्या खोज रहे हो?

“बेटा, मैं अपनी टोपी सी रहा था, अचानक सुई हाथ से गिर गयी। वही ढूँढ रहा हूँ लेकिन मिल नहीं रही है” मौलवी ने तफ़सील से बताया।

“अच्छा बताइए टोपी कहाँ सिल रहे थे और सूई ठीक कहाँ गिरी? मैं खोजता हूँ।” युवक ने सहानुभूति दिखायी।

“बेटा सुई तो मस्ज़िद में गिरी थी लेकिन वहाँ बहुत अंधेरा है इसलिए यहाँ रोशनी में ढूँढ रहा हूँ।”

हाल में ठहाका लगना तय था ही। तालियाँ थमीं तो उक्त वक्ता ने बताया कि आज यहाँ की चर्चा भी कुछ इसी प्रकार की हो रही है। समस्या की असली जड़ जहाँ है उसे कोई नहीं देखना चाहता। सबका समाधान मीडिया से कराना चाहता है। देश की सरकारें भ्रष्ट है, संसद अपना काम नहीं कर पा रही। न्यायालय भी संदेह से परे नहीं रह गये हैं। उद्योगपति तेजी से अपना पैसा बढ़ा रहे हैं। गुप्त गठबंधन हो रहे हैं। हर आदमी लाभ कमाने के उद्यम में लगा है, लेकिन मीडिया को नैतिकता और मिशन का पाठ पढ़ाया जाता है। जब हम मीडिया में प्रोफ़ेशनलिज़्म की बात करते हैं तो इसे गाली समझा जाता है। आजादी से पहले अखबारों ने एक मिशन के साथ काम किया था- देश को गुलामी से मुक्त कराने का मिशन। लेकिन आज स्थिति वैसी नहीं है। आज यह अन्य प्रोफेशन्स की तरह एक पेशा के रूप में क्यों नहीं पहचाना जाना चाहिए? अख़बार या टीवी चैनेल का जो मालिक करोड़ो रुपये का पूँजी निवेश करता है उसे लाभ कमाने के बारे में क्यों नहीं सोचना चाहिए? मात्र दो रूपये में चालीस पृष्ठ का अखबार आपके दरवाजे पर पहुँचाने का प्रबंध करने वाला अखबार मालिक आपके बारे में कितना सोचे जब आप दो रुपये की साबुन की टिकिया पाने के लिए अपना वर्षों पुराना अखबार बदल देते हैं। आपकी कोई प्रतिबद्धता नहीं है तो अखबार चलाने वालों से आप क्या अपेक्षा रखते हैं?

उन्होंने अखबार पहुँचाने वाले हॉकर के प्रति पाठकों के रूखे व्यवहार का वर्णन भी किया कि कैसे वह विपरीत मौसम में भी सुबह छः बजे घर पर अखबार पहुँचाता है और कभी देर हो जाने पर सुबह की चाय का स्वाद खराब कर देने का दोषी बन जाता है। बिना नागा किए तीस दिन अखबार देने के बाद जब वह पैसा लेने पहुँचता है तो महानुभावों को  ‘आज नहीं कल’ का जवाब देते देर नहीं लगती। “ऐसे लोग जब बिना जाने समझे अखबार के मालिक, अखबार के सम्पादक और अखबार के रिपोर्टर पर आरोप लगाते हैं तो मुझे आपत्ति होती है।”

कोई भी व्यवसाय जब प्रारम्भ किया जाता है तो उसकी प्रगति का लक्ष्य निर्धारित किया जाता है। लाभ कमाना एक सर्वमान्य लक्ष्य है। उसके लिए जरूरी उपाय तलाशे जाते हैं और उन्हें अपनाया जाता है। स्वतंत्रता मिलने के बाद पत्रकारिता भी किसी अन्य  व्यवसाय की तरह कुछ लक्ष्यों की पूर्ति के उद्देश्य से आगे बढ़ी। समय के साथ तालमेल बिठा कर चलने वाले सफल हुए। यह कार्य आज भी एक मिशन बना हुआ है, लेकिन इसका स्वरूप बदल गया है। आज पत्रकारिता ‘स्वांतः सुखाय’ नहीं है।

धारा प्रवाह बोलते हुए उन्होंने एक-दो और चुटकुले और आख्यान सुनाये और बोले- यह अजीब स्थिति है कि प्रायः सभी पत्रकार अपने प्रबंधन को कोसते रहते हैं। उनके अनैतिक कार्यों और शोषक प्रवृत्तियों का रोना रोते हैं। लेकिन वे ही जब स्वयं प्रबंधक अर्थात्‌ मालिक बन जाते हैं तो वे सारी मिशनरी बातें हवा हो जाती हैं और वे सभी बुराइयाँ अपना लेते हैं जिन्हें कोसते इनका समय बीता है। फिर उन्होंने जोड़ा कि इन सारी बातों के बावजूद आज भी जब देशहित का मुद्दा उठता है तो देश की पूरी मीडिया एकजुट होकर आवाज उठाती है। उन्होंने इसके कई उदाहरण भी गिना डाले।

अपने को एक अदना सा पत्रकार बताते हुए उन्होंने ‘छोटे-छोटे प्रयासों का महत्व’ रेखांकित करने के लिए उस गिलहरी की कथा सुनायी जिसने समुद्र पर रामसेतु के निर्माण की प्रक्रिया में योगदान कर्ताओं की सूची में अपना नाम लिखाने के लिए बार-बार तट पर लोटपोट कर शरीर में रेत बटोरने और पुल पर जाकर शरीर झाड़ देने का उद्यम किया था। ताकि भविष्य में इतिहास लिखने वाले यह न लिखें कि जब सारा  बानर समाज पुल बना रहा था तो वहाँ मौजूद एक गिलहरी कुछ नहीं कर रही थी। अस्तु कुछ न कुछ यथा सामर्थ्य करते रहना चाहिए। इसके बाद उन्होंने एक जोरदार वीररस की कविता सुनायी। मैं एक ही पंक्ति नोट कर पाया क्योंकि उन्होंने दुहराया नहीं था। हाल को गुँजाने वाली तालियाँ बजीं और अगले वक्ता बुलाये गये।

यहाँ तक तो सब ठीक-ठाक रहा लेकिन जब प्रश्न-उत्तर का दौर चला तो प्रबंध-संपादक महोदय को उठकर सफाई देनी पड़ी। छात्र श्रोताओं के तीखे प्रहार वाकई बेचैन करने वाले थे। अंततः कुलपति जी को अध्यक्षीय भाषण में इस मसले पर अंतिम बात कहनी पड़ी। वह बहुत ही मार्मिक और सजग करने वाली बात थी। लेकिन उसकी चर्चा अगली कड़ी में। अभी तो आप उस वीररस की कविता का आनंद लेते हुए इस ‘चिरकुटई के आरोप’ का जवाब दीजिए।

गूगल महराज ने उस एक लाइन का ‘जामन’ लेकर पल भर में अपने क्षीर सागर के भंडार से पूरी कविता की दही परोस कर रख दी।

वह लाइन थी-

हम वो कलम नहीं हैं जो बिक जाती हों दरबारों में
हम शब्दों की दीप- शिखा हैं अंधियारे चौबारों में

इस लंबी कविता के मूल कवि हैं डॉ. हरिओम पवार। इसके आगे पीछे की कुछ और लाइनें यहाँ आपके लिए। पूरी कविता यहाँ है।

इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

कोई रूप नहीं बदलेगा सत्ता के सिंहासन का
कोई अर्थ नहीं निकलेगा बार-बार निर्वाचन का
एक बड़ा ख़ूनी परिवर्तन होना बहुत जरुरी है
अब तो भूखे पेटों का बागी होना मजबूरी है

जागो कलम पुरोधा जागो मौसम का मजमून लिखो
चम्बल की बागी बंदूकों को ही अब कानून लिखो
हर मजहब के लम्बे-लम्बे खून सने नाखून लिखो
गलियाँ- गलियाँ बस्ती-बस्ती धुआं-गोलियां खून लिखो

हम वो कलम नहीं हैं जो बिक जाती हों दरबारों में
हम शब्दों की दीप- शिखा हैं अंधियारे चौबारों में
हम वाणी के राजदूत हैं सच पर मरने वाले हैं
डाकू को डाकू कहने की हिम्मत करने वाले हैं

जब तक भोली जनता के अधरों पर डर के ताले हैं
तब तक बनकर पांचजन्य हम हर दिन अलख जगायेंगे
बागी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

अगवानी हर परिवर्तन की भेंट चढ़ी बदनामी की
हमने बूढ़े जे.पी. के आँसू की भी नीलामी की
परिवर्तन की पतवारों से केवल एक निवेदन था
भूखी मानवता को रोटी देने का आवेदन था

अब भी रोज कहर के बादल फटते हैं झोपड़ियों पर
कोई संसद बहस नहीं करती भूखी अंतड़ियों पर
अब भी महलों के पहरे हैं पगडण्डी की साँसों पर
शोकसभाएं कहाँ हुई हैं मजदूरों की लाशों पर

निर्धनता का खेल देखिये कालाहांडी में जाकर
बेच रही है माँ बेटी को भूख प्यास से अकुलाकर
यहाँ बचपना और जवानी गम में रोज बुढ़ाती हैं
माँ , बेटे की लाशों पर आँचल का कफ़न उढाती है

जब तक बंद तिजोरी में मेहनतकश की आजादी है
तब तक हम हर सिंहासन को अपराधी बतलायेंगे
बाग़ी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

 

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

सांप्रदायिकता और तुष्टिकरण के बीच पिसता आम मुसलमान

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वर्धा विश्वविद्यालय में हुई धर्मनिरपेक्षता पर चर्चा

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के १३वें स्थापना दिवस के अवसर पर देश के तीन बड़े बुद्धिजीवियों को आमंत्रित कर जो चर्चा करायी गयी उसका विषय था भारतीय लोकतंत्र में धर्मनिरपेक्षता क भविष्य । पिछली पोस्ट में मैने रमशरण जोशी जी द्वारा रखे गये विचार प्रस्तुत किये थे। अब प्रस्तुत है डॉ.रज़ी अहमद और कुलदीप नैयर द्वारा कही गयी बातें :

डॉ.रज़ी अहमद के स्वर में फूट पड़ा सदी का दर्द

गांधी संग्रहालय पटना के सचिव डॉ. रज़ी अहमद स्वयं को इतिहास का विद्यार्थी बताते हैं। इनकी अबतक चौदह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इन्हें देश-विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों में वार्ता देने के लिए बुलाया जाता रहा है। जब इन्होंने बताया कि वर्धा विश्वविद्यालय के आमंत्रण पर अनेक लोगों ने इनको यहाँ आने से मना किया; मगर ये फिर भी आये तो सभागार में एक अर्थपूर्ण खिलखिलाहट दौड़ गयी। उन्होंने हवाई यात्रा की सुविधा पर भी चुटकी ली। इस बारे में उन्होंने बताया कि एक बार लोहिया जी गांधी जी से मिलने सेवाग्राम के लिए दिल्ली से नागपुर तक हवाई जहाज से आ गये। गांधीजी को पता चला तो उन्होंने टोका- “प्लेन से क्यों आये? दो दिन बाद ही पहुँच जाते तो कोई आसमान नहीं टूट पड़ता”

लेकिन उसके बाद जब इन्होंने गांधी को आधार बनाकर अपनी बात रखनी शुरू की तो वातावरण गंभीर हो उठा।

बोले- मैं सेकुलरिज़्म की बात गांधी के हवाले से करूँगा जिनकी आत्मा आज़ादी के बाद से अबतक कराह रही है। वह बार-बार पूछती है कि देश को हमने कहाँ लाकर खड़ा कर दिया। सेक्यूलरिज़्म की क्या हालत कर दी?

यदि हम आज़ाद भारत के इतिहास पर नज़र डालें तो शुरुआत से ही धर्मनिरपेक्षता का उल्लंघन हमारे हुक्मरानों द्वारा किया जाता रहा है। देश के पहले राष्ट्रपति बाबू राजेंद्र प्रसाद ने नेहरू के मना करने के बावजूद सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन किया था (इसका सिलान्यास शिलान्यास सरदार बल्लभ भाई पटेल ने किया था।) इतना ही नहीं उन्होंने बनारस जाकर १०५ पंडितों के पैर धुले थे। मुसलमानों से उन्हें इतना परहेज़ था कि राष्ट्रपति भवन के सभी मुस्लिम कर्मचारियों को उन्होंने बाहर का रास्ता दिखा दिया। बाद में नेहरू जी ने उन कर्मचारियों को विदेश मंत्रालय व अन्य विभागों में समायोजित कराया।

सत्ता में बैठे लोगों ने हमेशा सेक्युलरिज़्म को रुसवा किया है। वोट की खातिर सांप्रदायिक जहर फैलाया जाता रहा है। मुसलमानों को फुसलाया जाता रहा है। उनके विकास की बात कोई नहीं करता। भावनात्मक शोषण ओता रहा है। यहाँ का आम मुसलमान सांप्रदायिकता(communalism) और तुष्टिकरण(appeasement) के बीच पिसता रहा है। नेहरू के समय में जो इतिहास लिखा गया उसमें हिंदू और मुसलमान को अलग-अलग करके रखा गया। हिंदू पुनर्जागरण अभियानों में भी मुसलमान को अलग रखा गया था। ये हमेशा नदी के दो किनारों की तरह आमने-सामने रहे लेकिन इनमें मेल कभी नहीं हुआ। दयानंद सरस्वती ने भी मुसलमानों को अपने आंदोलन से अलग रखा।

सन्‌ 1857 ई. की क्रांति पर सबसे बेहतरीन किताब वी.डी.सावरकर ने लिखी थी। इसमें हिंदू-मुसलमान के संबंधों को सबसे अच्छे तरीके से निरूपित किया गया था। लेकिन राजनीतिक उद्देश्यों के लिए उस इतिहास की गलत व्याख्या कर दी गयी। इतिहास को तोड़-मरोड़कर अपने निहित स्वार्थों के लिए प्रयोग करने की प्रवृत्ति सत्ता में बैठे लोगों में सदा से रही है। देश के बँटवारे का इल्ज़ाम मुसलमानों पर थोपा गया।

राजाराम मोहन राय ने जो सबसे पहला स्कूल रामपुर में खोला उसका नाम ‘हिंदू स्कूल’ रखा था लेकिन उन्हें भारतीय पुनर्जागरण का अग्रदूत कहा गया; वहीं सर सैयद अहमद ने जब मुस्लिम स्कूल की नींव रखी तो इसे ‘दो देशों के सिद्धांत’ का नाम दे दिया गया। सन्‌ 1916 ई. में बनारस हिंदू वि.वि. की स्थापना करने वाले मालवीय जी को ‘महामना’ की उपाधि दी गयी और शिक्षा का सबसे बड़ा प्रचारक कहा गया, लेकिन 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी स्थापित करने वाले सर सैयद को वह सम्मान नहीं दिया गया; बल्कि उन्हें भारत की एकता का दुश्मन मान लिया गया।

‘मुसलमान पर आज भी अविश्वास की नजर रखी जा रही है। आज़ादी के बाद की तीसरी मुस्लिम पीढ़ी से भी पल-पल देशभक्ति का सबूत मांगा जाता है। आजका मुस्लिम युवक विश्वसनीयता के संकट से गुजर रहा है।’ यह बात कहते हुए रज़ी साहब मानो रो पड़े। आवाज़ में एक कराह निकल रही थी।

महात्मा गांधी ने हिंदुओं और मुसलमानों को अपनी दो आँखें बताया था। उन्होंने कभी इनमें भेद नहीं किया। उनका मानना था कि भारतीय संस्कृति अपने भीतर तमाम दूसरे धर्मों और पंथों के तत्व समाहित करने और उनका स्वागत करने को तैयार है। लेकिन आज़ादी के बाद ऐसी स्थिति देखने में नहीं आयी है। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की दूरदर्शी आँखों ने यह देख लिया था। प्रथम गणतंत्र दिवस (26 जनवरी, 1950) की पूर्व संध्या पर उन्होंने कहा था कि कल से हम विरोधाभासों के युग में प्रवेश करने जा रहे हैं। एक तरफ़ हमारा संविधान लागू होगा जो स्वतंत्रता, समानता, भाईचारा, न्याय और सामाजिक समरसता के सिद्धांतो पर बना हुआ है और दूसरी तरफ़ तमाम वर्गों में बँटा और जाति, धर्म, संप्रदाय, परंपरा आदि से पैदा हुई कुरीतियों से अँटा पड़ा समाज होगा जो इन सिद्धांतों को अपनाने में मुश्किल पैदा करेगा।

आज यदि गांधी जी हमारे गाँवो को देख रहे होंगे तो भ्रमित हो जाते होंगे कि यह सब क्या उनके नाम पर राज करने वालों का किया धरा ही है। विकास के जितने भी मॉडल चलाये जा रहे हैं वे सभी बड़े शहरों और महानगरीय जीवन को लाभ पहुँचा रहे हैं। गाँव की सुध लेने वाला कोई नहीं है। भारतीय संस्कृति, हिंदुस्तानी ज़बान और स्वदेशी पद्धति पर आधारित शिक्षा के प्रति गांधी जी की प्रतिबद्धता की मिसाल किसी और नेता में नहीं मिलती।

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के उद्घाटन के मौके पर तमाम अंग्रेज हुक्काम बुलाये गये थे। गांधी जी वहाँ हिंदी में बोलना चाहते थे लेकिन मालवीय जी ने उनसे अंग्रेजी में भाषण देने को कहा। गांधी जी ने बस इतना कहा- “मैं गंगा के किनारे खड़ा हूँ और मुझे टेम्स का पानी पीने को कहा जा रहा है” इसपर कार्यक्रम का संचालन कर रही एनी बेसेंट ने गांधी जी के हाथ से माइक ले लिया और उन्हें आगे नहीं बोलने दिया गया।

स्वतंत्र भारत के इतिहास में सन्‌ 1967 ई. में जब पहली बार ग़ैर कांग्रेसी सरकारें  बनी थी उसे रज़ी साहब टर्निंग प्वॉइण्ट मानते हैं। क्षेत्रीयता की भावनाओं को उड़ान भरने का पहली बार मौका मिला। इसके बाद मम्दल मंडल आयोग की रिपोर्ट के लागू होने के बाद गरीबों के हित की सभी नीतियाँ बर्बाद हो गयीं। जातियों और उप-जातियों की आपसी लड़ाई ने इस देश का सर्वाधिक अहित किया है। यह देश के लिए सबसे बड़ा खतरा है। आज हमारे देश में नेता तो बहुतेरे हैं लेकिन द्रष्टा (visionary) कोई नहीं है।

आज यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि गांधी के गुजरात को मोदी के गुजरात के नाम से जाना जा रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि प्रगतिशील शक्तियों (वामपंथियों) ने गांधी को नहीं समझा। उन्हें पूँजीवाद का प्रतिनिधि(दलाल) “agent of Capitalism’ कहा गया। गांधी के मूल्यों को अपनाये बिना हमारा कल्याण नहीं हो सकता। आज देश की युवा पीढ़ी को यह बात समझनी होगी।

रज़ी अहमद जब अपनी बात पूरी करके बैठने को हुए तो तालियों के बीच भी एक अजीब किस्म का सन्नाटा हमारे मन-मस्तिष्क पर हथौड़े बरसा रहा था। कुलदीप नैयर ने उनकी पीठ ठोंककर शाबासी दी और तत्काल संचालक द्वारा बुलाये जाने पर माइक संभाल लिया।

kuldip-naiyar-in wardha

कुलदीप नैयर का विश्वास चमत्कृत करता है :

सन्‌ 1923 ई. में 14 अगस्त को सियालकोट (पाकिस्तान) में जन्मे कुलदीप नैयर अपने वामपंथी रुझान के साथ पाकिस्तानी हित की बात करने वाले तथा भारत की पाकिस्तान विरोधी नीतियों की प्रखर आलोचना करने वाले ऐसे प्रतिष्ठित पत्रकार हैं जिन्होंने देश को आज़ाद होते देखा था और विभाजन की विभीषिका को भोगा था। कानून में स्नातक, पत्रकारिता में एम.एस-सी. और दर्शन शास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधियाँ धारण करने वाले कुलदीप नैयर के सिंडिकेट कॉलम दुनिया भर के पचास से अधिक अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं में छपते हैं। पाकिस्तान से दोस्ती बढ़ाने के लिए एक बड़ा भियान छेड़ने वाले कुलदीप नैयर ने जब बोलना शुरू किया तो हाल खचाखच भरा हुआ था लेकिन ‘सुई-टपक’ सन्नाटा भी स्थापित था।

बोले- मुझसे पूछोगे कि भारत में धर्मनिरपेक्षता का भविष्य क्या है तो मैं पूरे विश्वास से कहूँगा कि भविष्य बहुत सुंदर है। सेक्यूलरिज़्म आगे बड़ा मजबूत होगा। इस देश का आम आदमी कम्युनल नहीं है। मैं बताना चाहता हूँ कि मज़हब ‘कौम’ नहीं बनाता। यह देश भी किसी एक धर्म से नहीं बना है। हिंदू और मुसलमान दोनो इसी देश के वासी हैं।

मौलाना अबुल क़लाम आजाद ने कहा था कि ‘मुझे हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी तहज़ीब पर नाज़ है।’ मैं जब 13 सितंबर 1947 को सियालकोट से चला सबकुछ बदल चुका था। दोनो तरफ़ हजारो लोग मारे जा रहे थे। लेकिन जिन्ना बदल चुका था। उसने पाकिस्तान में रहने वाले सभी लोगों को बराबर का पाकिस्तानी माना था। लेकिन उसकी बात नहीं चली। पहले जिन्ना कहा करते थे कि ‘तुम्हारा खाना-पीना-सोना अलग है इसलिए हम दो देश हैं।’ इस बात का असर ज्यादा रहा। अल्लामा इकबाल कहा करते थे कि हमारी तहज़ीब में सबका योगदान है। खु़दा के सामने सभी उसी तरह झुकते हैं। (लेकिन देश फिर भी बँट गया।)

देश के बँटवारे पर हुए सांप्रदायिक दंगे में दस करोड़ हिंदु-मुसलमान मारे गये और बीस करोड़ लोग बेघर हुए। उन बेघरों में एक मैं भी था। मैं 15 सितंबर को दिल्ली पहुँचा और सबसे पहले बिड़ला हाउस गया- गांधी को देखने। गांधी इसलिए सबसे अलग हैं कि उन्होंने हमें ‘खुद्दारी’ दी। शाम की प्रार्थना सभा में जमा पाकिस्तान से विस्थापित होकर आये शरणार्थियों से उन्होंने कहा कि ‘आपका गुस्सा हमें पता है… भारत के हिंदू और मुस्लिम मेरी दो आँखें है।’ लेकिन वह समय पागलपन का था। लेकिन आज हम संभल चुके हैं। सेक्युलर फोर्सेज़ आज अपना काम कर रही हैं। देश की अदालते अपना काम कर रही हैं। हमें अपने पर विश्वास करने की जरूरत है।

बीच–बीच में ये जो घटनाएँ हो जाती है- सांप्रदायिक दंगे, बाबरी मस्ज़िद, गुजरात के दंगे, नरेंद्र मोदी आदि- वे महज एक क्षेपक (aberration) की तरह हैं। इनका कोई स्थायी प्रभाव नहीं पड़ने वाला। इनसे घबराना नहीं चाहिए; बल्कि इनका मुकाबला करना चाहिए। इस देश ने मोदी को कठघरे में खड़ा कर दिया है। सारे देश की मीडिया उसके पीछे पड़ी है। कानून अपना काम कर रहा है।

इस देश के लोकतांत्रिक मूल्यों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाने का काम किया था- इंदिरा गांधी ने। राजनीति से नैतिकता को खत्म करने का गुनाह किया- इंदिरा गांधी ने। उन्होंने ‘मॉरलिटी’ और ‘इम्मॉरलिटी’ के बीच की लाइन मिटा दी। आज हम जो कुछ देख रहे हैं उसकी शुरुआत तभी हुई थी। जयप्रकाश नारायण ने कुछ कोशिश जरूर की लेकिन खराब स्वास्थ्य के कारण वे सफल न हो सके। (आज उनके उत्तराधिकारियों के करतब देखिए…) लेकिन जेपी ने भी एक बड़ी ग़लती कर दी थी। सरकार बनाने के लिए उन्होंने ऐसे लोगों का हाथ थाम लिया जो सेक्यूलर नहीं थे।

हमें आशावादी होना चाहिए। अच्छी बातों को आगे बढ़ाना चाहिए। आज शिक्षा बढ़ रही है। मुस्लिम समुदाय ने अपनी शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया। नेहरू की शिक्षा नीति ठीक नहीं थी। उन्होंने मुस्लिम-शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया। नेहरू ने जुमले उछाले- Who lives if India dies; Who dies if India lives. आज भी देश में सेक्युलर लोगों की संख्या अधिक है। लेकिन रजनीति ने इसके स्वरूप को खराब कर दिया है।

जब 31 अक्तूबर, 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या हो गयी तो अकेले दिल्ली में सरकारी आँकड़ों के मुताबिक ही करीब तीन हजार सिख मारे गये। लेकिन आज तक किसी गुनाहग़ार को फाँसी नहीं हुई। यह हमारी राजनीति का चरित्र है। याद रखिए कि देश किसी भी नेता से बड़ा है। देश के प्रति ग़लतियाँ मत करो। देश का नेता जब ग़लती करता है तो देश को उसका ख़ामियाजा भुगतना पड़ता है। कुछ ऐसा करें कि एक व्यक्ति की ग़लती का ख़ामियाजा देश को न भोगना पड़े। सजग रहें।

आज यह स्थिति क्यों हो गयी है कि किसी मुसलमान को किराये पर मकान नहीं मिलता। क्यों उन्हें एक ही इलाके में समूह बनाकर रहना पड़ता है। परस्पर प्यार और सहभागिता की कमी क्यों हो गयी है? sense of accomodation and tolerance की गूँज फीकी पड़ रही है। इसे बढ़ाइए। गाँवों में स्थिति अभी भी ठीक है। शहरों में महौल मीडिया की वजह से ज्यादा ख़राब हुआ है। ज़्यादातर मीडिया अब पॉलिटिकल लाइन पकड़ कर चल रही है।

भाषा का सवाल भी महत्वपूर्ण है। उर्दू को मुसलमानों की भाषा ठहरा दिया गया। इसे अब राजनीतिक रंग भी दे दिया गया है। मौलाना आज़ाद ने भी कहा था कि ‘देश के विभाजन के बाद उर्दू का मामला कमजोर पड़ गया (Case of Urdu was weakened after partition)।’ एक सुंदर साहित्यिक भाषा (a beauiful literary language) का अंत इस देश में होता जा रहा है। कुलदीप नैयर ने एक प्रसम्ग बताया जब गोविंद बल्लभ पंत की अध्यक्षता में गठित समिति द्वारा हिंदी को देश की प्रथम (राष्ट्रीय) भाषा बनाने और अंग्रेजी को सहयोगी भाषा बनाने का प्रस्ताव तैयार किया गया। जब पंत जी प्रस्ताव का प्रारूप लेकर नेहरू के पास गये तो उन्होंने अंग्रेजी के लिए प्रस्तावित कमतर दर्ज़े को देखकर उन्हें दुत्कार दिया और प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया।

उन्होंने आपसी वैमनस्य की समस्या के समाधान की जिम्मेदारी बहुसंख्यक हिंदुओं के कंधे पर डालते हुए कहा कि यह भारत के हिंदुओं का यह दायित्व है कि वे मुसलमानों के लिए अपने दरवाज़े खोलें। गांधी के इस देश में उनके संदेश को भुलाया नहीं जाना चाहिए। कुलदीप नैयर ने बताया कि एक बार वे काबुल में खान अब्दुल गफ़्फ़ार खाँ ‘सीमांत गांधी’ से मिलने गये। यहाँ के साम्प्रदायिक दंगो की खबरें सुनकर वे हैरत से भरे हुए थे। उन्होंने आश्चर्य से पूछा – गांधी के देश में  (साम्प्रदायिक) दंगा कैसे हो गया? ये वही गफ़्फ़ार खाँ थे जिनके ‘लाल-कुर्ती’ आंदोलन (red-shirts) ने पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत (NWFP) में 1946 का चुनाव जीता था।

नैयर ने जोर देकर कहा कि हम उन लोगों से गद्दारी कर रहे हैं जिन लोगों ने हमें आज़ादी दिलायी। सत्ता की कुर्सी पाने के लिए और निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए हम गलत रास्तों पर चल रहे हैं। हम गांधी जी के उस सिद्धाम्त की बलि चढ़ा रहे हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि हमारा साधन अपवित्र है तो साध्य भी निश्चित रूप से अपवित्र हो जाएगा (If your means are vitiated, your ends are bound to be vitiated.)। आज देखता हूँ कि हर व्यक्ति अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में एक छोटे तानाशाह की तरह काम कर रहा है। हमें याद रकना चाहिए कि यहाँ के मुसलमान और सिख भी यहाँ बहुत दिनों से रह रहे हैं जो मिलजुलकर हिंदुस्तानी तहज़ीब का निर्माण करते हैं।

उन्होंने अपने दिल में छिपे उस सपने की चर्चा की जिसमें दक्षिण एशिया के सभी देश मिलकर यूरोपीय यूनियन की भाँति एक संयुक्त इकाई का निर्माण करेंगे और उन्हें अफ़गानिस्तान से लेकर वर्मा तक बिना वीज़ा के आने-जाने की छूट होगी।

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अतिथियों का स्वागत कुलपति व रजिस्ट्रार द्वारा

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कुलदीप नैयर को सुनने भारी भीड़ उमड़ पड़ी

भारत-पाकिस्तान की वाघा सीमा पर प्रत्येक वर्ष अपने और पाकिस्तान के जन्मदिवस (१४ अगस्त) पर शांति की प्रतीक मोमबत्तियाँ जलाने वाले कुलदीप नैयर जब हजारों लोगों के साथ हिंदुस्तान-पाकिस्तान-ज़िंदाबाद के नारे लगवाते हैं तो उनका आशावाद चरम पर होता है। कदाचित्‌ कड़वे यथार्थ से दूर भी।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

पुछल्ला : आजकल वर्धा विश्वविद्यालय में एक के बाद एक शानदार कार्यक्रम हो रहे हैं। सबमें उपस्थित रहना ही मुश्किल हो गया है। उसपर रिपोर्ट ठेलने की फुरसत तो नहीं ही मिल पा रही है। विदेशों में हिंदी पढ़ाने वाले अनेक शिक्षक आजकल यहाँ अभिविन्यास कार्यक्रम में प्रतिभाग कर रहे हैं। एक उपयोगी रिपोर्ट यहाँ है।

शुक्रवारी की परंपरा से…

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“सृजन और नयी मनुष्यता की समस्याएँ” विषयक वार्ता और विमर्श: श्री प्रकाश मिश्र

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के प्रांगण में यूँ तो नियमित अध्ययन-अध्यापन से इतर विशिष्ट विषयपरक गोष्ठियों, सेमिनारों व साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को निरंतर आयोजित किये जाने की  प्रेरणा वर्तमान कुलपति द्वारा सदैव दी जाती रही है, लेकिन इन सबमें ‘शुक्रवारी’ का आयोजन एक अनूठा प्रयास साबित हो रहा है।

परिसर में बौद्धिक विचार-विमर्श को सुव्यवस्थित रूप देने के लिए ‘शुक्रवारी’ नाम से एक  समिति का गठन किया गया है। इस समिति के संयोजक हैं ख्यातिनाम स्तंभकार व विश्वविद्यालय के  ‘राइटर इन रेजीडेंस’ राजकिशोर। यहाँ के कुछ शिक्षकों को इसमें सह-संयोजक की जिम्मेदारी भी सौंपी गयी है। विश्वविद्यालय परिवार के सभी सदस्य इस साप्ताहिक चर्चा शृंखला में भागीदारी के लिए सादर आमंत्रित होते हैं। शुक्रवारी की बैठक हर शुक्रवार को विश्वविद्यालय के परिसर में किसी उपयुक्त जगह पर होती है जो विशिष्ट वक्ता और वार्ता के विषय के चयन के साथ ही निर्धारित कर ली जाती है। इस अनौपचारिक विमर्श के मंच पर परिसर से बाहर के अनेक अतिथियों ने भी बहुत अच्छी वार्ताएँ दी हैं। वार्ता समाप्त होने के बाद खुले सत्र में उपस्थित विद्यार्थियों और अन्य सदस्यों द्वारा उठाये गये प्रश्नों पर भी वार्ताकार द्वारा उत्तर दिया जाता है और बहुत सजीव बहस उभर कर आती है।

गत दिवस मुझे भी ‘शुक्रवारी’ में भाग लेने का अवसर मिला। इस गोष्ठी में कुलपति जी स्वयं उपस्थित थे। इस बार के वार्ताकार थे प्रतिष्ठित कवि, उपन्यासकार, आलोचक व साहित्यिक पत्रिका ‘उन्नयन’ के संपादक श्रीप्रकाश मिश्र। उनकी वार्ता का विषय था “सृजन और नयी मनुष्यता की समस्याएँ”। उनकी वार्ता सुनने से पहले तो मुझे इस विषय को समझने में ही कठिनाई महसूस हो रही थी लेकिन जब मैं गोष्ठी समाप्त होने के बाद बाहर निकला तो बहुत सी नयी बातों से परिचित हो चुका था; साथ ही श्री मिश्र के विशद अध्ययन, विद्वता व वक्तृता से अभिभूत भी। श्रीप्रकाश मिश्र वर्धा के स्टाफ के साथ

(बायें से दायें) मो.शीस खान (वित्ताधिकारी), शंभु गुप्त (आलोचक), प्रोफ़ेसर के.के.सिंह और श्री प्रकाश मिश्र

अबतक दो कविता संग्रह, दो उपन्यास और तीन आलोचना ग्रंथ प्रकाशित करा चुके श्री मिश्र का तीसरा काव्य संग्रह और दो उपन्यास शीघ्र ही छपकर आने वाले हैं। आप बीस से अधिक वर्षो से साहित्यिक पत्रिका ‘उन्नयन’ का सम्पादन कर रहे हैं जो साहित्यालोचना के क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित स्थान पा चुकी है। आलोचना के लिए प्रतिवर्ष ‘रामविलास शर्मा आलोचना सम्मान’ इसी प्रकाशन द्वारा प्रायोजित किया जाता है। यह सारा सृजन श्रीप्रकाश जी द्वारा केंद्रीय पुलिस संगठन में उच्चपदों पर कार्यरत रहते हुए किया गया है।

अपने उद्‌बोधन में उन्होंने सृजन की अवधारणा को समझाते हुए कहा कि सृजन एक प्रक्रिया है- बनाने की प्रक्रिया- जिसे मनुष्य अपनाता है। उस बनाने की कुछ सामग्री होती है, कुछ उपकरण होते हैं और उसका एक उद्देश्य होता है। उद्देश्य के आधार पर वह कला की श्रेणी में आता है तो सामग्री और उपकरण के आधार पर संगीत, चित्र, मूर्ति, वास्तु, साहित्य -और साहित्य में भी काव्य, नाटक, कथा आदि – कहा जाता है। इसमें संगीत सबसे सूक्ष्म होता है और वास्तु सबसे स्थूल। सृजन मूल्यों की स्थापना करता है जो सौंदर्य के माध्यम से होती है। इसका उद्देश्य वृहत्तर मानवता का कल्याण होता है। साहित्य के माध्यम से यह कार्य अधिक होता है।

सृजन को चिंतन से भिन्न बताते हुए उन्होंने कहा कि चिंतन विवेक की देन होता है जबकि सृजन का आधार अनुभूति होती है। इस अनुभूति के आधार पर संवेदना के माध्यम से वहाँ एक चाहत की दुनिया रची जाती है जिसका संबंध मस्तिष्क से अधिक हृदय से होता है। लेकिन सृजन में अनुभूति के साथ-साथ विवेक और कल्पना की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं होती है।

मूल्यों की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि इनका महत्व इसलिए नहीं होता कि वे जीवन में पूरे के पूरे उतार लिये जाते हैं; बल्कि इसलिए होता है कि एक पूरा समुदाय उन्हें महत्वपूर्ण मानता है, उन्हें जीवन का उद्देश्य मानता है- व्यक्ति के भी और समुदाय के भी- उससे भी बढ़कर इसे वह आचरण का मानदंड मानता है। मूल्य मनुष्य की गरिमा की प्रतिष्ठा करते हैं। सृजनकर्ता का दायित्व उस गरिमा में संवेदनाजन्य आत्मा की प्रतिष्ठा करना होता है जिसका निर्वाह बहुत वेदनापूर्ण होता है। सृजन के हर क्षण उसे इसका निर्वाह करना होता है।

मनुष्यता को अक्सर संकट में घिरा हुआ बताते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान में मनुष्यता पर जो संकट आया हुआ है वह दुनिया के एक-ध्रुवीय हो जाने से उत्पन्न हुआ है। उन्होंने रसेल होवान के उपन्यास ‘रिडले वाकर’, डेविड प्रिन के ‘पोस्टमैन’, कामार्क मेकॉर्थी के ‘द रोड’ का उल्लेख करते हुए बताया कि ज्ञानोदय द्वारा रचित मनुष्य की प्रगति और विकास की सभी योजनाएँ आज इतनी संकट में हैं कि उनका अंत ही आ गया है। सच पूछिए तो मनुष्य की मूलभूत अवधारणा ही संकट में है; और यह संकट वास्तविक है। जिस प्रौद्यौगिकी पर मनुष्य ने भरोसा करना सीखा है वह उसके विरुद्ध हो गयी है।

हमारी दुनिया वास्तविक न रहकर आभासित बन गयी है और आदमी मनुष्य न रहकर ‘साइबोर्ग’ बन गया है। साईबोर्ग यानि- “A human being prosthetically inhanced, or hybridized with electronic or mechanical components which interact with its own biological system.”

जलवायु वैज्ञानिक जेम्स लवलॉक का कहना है कि धरती को खोदकर, जल को सुखाकर, और वातावरण को प्रदू्षित कर हम कुछ इस तरह से जीने लगे हैं कि मनुष्य का जीवन बहुत तेजी से विनाश की ओर बढ़ने लगा है। धरती के किसी अन्य ग्रह से टकराने से पहले ही ओज़ोन की फटती हुई पर्त, समुद्र का बढ़ता हुआ पानी, धरती के पेट से निकलती हुई गैस और फटते हुए ज्वालामुखी मनुष्य जाति को विनष्ट कर देंगे।

जॉन ग्रे कहते हैं कि मनुष्य तमाम प्राणियों में एक प्राणी ही है; और उसे अलग से बचाकर रखने के लिए पृथ्वी के पास कोई कारण नहीं है। यदि मनुष्य के कारन कारण पृथ्वी को खतरा उत्पन्न होगा तो वह मनुष्य का ही अंत कर सकती है। वह नहीं रहेगा तो पृथ्वी बच जाएगी। दूसरे प्राणियों का जीवन चलता रहेगा। इस प्रकार राष्ट्रों की आंतरिक नीतियों के कारण मनुष्य का जीवन खतरे में है।

इस खतरे के प्रति कौन आगाह करेगा, उससे कौन बचाएगा? सृजन ही न…!!!

श्री मिश्र ने विश्व की शक्तियों के ध्रुवीकरण और इस्लामिक और गैर-इस्लामिक खेमों के उभरने तथा विश्व की एकमात्र महाशक्ति द्वारा किसी न किसी बहाने अपने विरोधियों का क्रूर दमन करने की नीति का उल्लेख करते हुए  भयंकर युद्ध की सम्भावना की ओर ध्यान दिलाया। आतंकवाद ही नहीं आणविक युद्ध की भयावहता धरती से आकाश तक घनीभूत होती जा रही है। पश्चिमी प्रचार तंत्र द्वारा यह दिखाया जा रहा है कि सभ्य दुनिया बर्बर दुनिया से लड़ने निकल पड़ी है।

अपने विस्तृत उद्‌बोधन में उन्होंने वर्तमान वैश्विक परिदृश्य के तमाम लक्षणों और दुनिया भर में रचे जा रहे साहित्य में उसकी छाया का उल्लेख करते हुए मनुष्यता की अनेक समस्याओं कि ओर ध्यान दिलाया और उनके समाधान की राह तलाशने की जिम्मेदारी सृजनशील बुद्धिजीवियों के ऊपर डालते हुए मिशेल फूको का उद्धरण दिया जिनके अनुसार पश्चिम का समकालीन सृजन मनुष्यता संबंधी इन तमाम चुनौतियों को स्वीकार करने में सक्षम नहीं दिख रहा है। लेकिन, उन्होंने बताया कि अमेरिकन विचारक ब्राउन ली के मत से सहमत होते हुए कहा कि इतना निराश होने की जरूरत नहीं है। अभी भी एशिया, अफ़्रीका और लातिनी अमेरिका का सृजन संबंधी चिंतन मनुष्य को बचाये रखने में और मनुष्यता संबंधी मूल्यों की प्रगति में कुछ योग दे सकता है।

इस लम्बी वार्ता की सभी बातें इस ब्लॉग पोस्ट में समाहित नहीं की जा सकती। उनका पूर्ण आलेख शीघ्र ही विश्वविद्यालय की साहित्यिक वेब साइट (हिंदीसमय[डॉट]कॉम और त्रैमासिक बहुवचन में प्रकाशित किया जाएगा।

निश्चित रूप से शुक्रवारी की जो परंपरा शुरू की गयी है उससे अनेक मुद्दों पर विचार मंथन की प्रक्रिया तेज होने वाली है। वार्ता के बाद वहाँ उपस्थित विद्यार्थियों ने जिस प्रकार के गम्भीर प्रश्न पूछे और विद्वान वक्ता द्वारा जिस कुशलता से उनका समाधान किया गया वह चमत्कृत करने वाला था। हमारी कोशिश होगी कि शुक्रवारी में होने वाली चर्चा आपसे समय-समय पर विश्वविद्यालय के ब्लॉग के माध्यम से बाँटी जाय।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

Brain-Drain is Better than Brain-in-Drain

24 टिप्पणियाँ

 

मेरी पिछली पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए खुशदीप सहगल जी ने इन शब्दों को उद्धरित किया था। द इकोनॉमिस्ट अखबार में १० सितम्बर २००५ को छपी एक सर्वे रिपोर्ट का शीर्षक था- Higher Education, Wandering Scholars. इस अखबार ने सर्वे रिपोर्ट में भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री स्व. राजीव गान्धी का यह वक्तब्य उद्धरित किया था, ‘‘Better Brain Drain than Brain in the Drain” अर्थात्‌ प्रतिभा का पलायन प्रतिभा की बर्बादी से बेहतर है। इस मुद्दे पर आने वाली प्रतिक्रियाओं को देखने से मुझे ऐसा लगता है कि कुछ विन्दुओं पर अभी और चर्चा की जानी चाहिए।प्रतिभा पलायन या बर्बादी

वैसे तो सबने इस प्रश्न को महत्वपूर्ण और बहस के लायक माना है लेकिन इस क्रम में मैं सबसे पहले आदरणीय प्रवीण पांडेय जी के उठाये मुद्दों पर चर्चा करना चाहूँगा। उनकी टिप्पणी से इस बहस को एक सार्थक राह मिली है, और मुझे अपनी बात स्पष्‍ट करने का एक अवसर भी।

@क्या 17 वर्षीय युवा इतना समझदार होता है कि वह अपना भविष्य निर्धारण केवल अपनी अभिरुचियों के अनुसार कर सके ?

एक सत्रह वर्षीय युवा निश्चित रूप से बहुत परिपक्व (mature) फैसले नहीं ले पाता होगा, लेकिन यहाँ बात उच्च प्रतिभा के धनी ऐसे बच्चों की हो रही है जो सामान्य भीड़ से थोड़े अलग और बेहतर हैं। साथ ही उनके निर्णय का स्वरूप निर्धारित करने में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में हम सभी अर्थात्‌ उनके अभिभावक, शिक्षक, रिश्तेदार, मित्र, पत्र-पत्रिकाएं, मीडिया और शासन के नीति-निर्माता इत्यादि शामिल हैं। मैने तो यह सवाल किया ही था कि इस धाँधली(farce) में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में क्या हम सभी शामिल नहीं हैं? मेरा जवाब हाँ में है।

 
@क्या प्रशासनिक या प्रबन्धन सेवाओं में केवल उन लोगों को ही आना चाहिये जिन्हें इन्जीनियरिंग व चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में कुछ भी ज्ञान नहीं ?

मेरा यह आशय कदापि नहीं था। बल्कि प्रशासनिक या प्रबन्धन सेवाओं में इन्जीनियरिंग एवं चिकित्सा सहित जीवविज्ञान, अर्थशास्त्र, कानून, इतिहास, भूगोल, नागरिक शास्त्र, दर्शन, धर्म, संस्कृति, मनोविज्ञान, समाज, खेल-कूद आदि नाना प्रकार के विषयों का ‘सामान्य ज्ञान’ होना चाहिए। किसी एक विषय की विशेषज्ञता का वहाँ कोई काम नहीं है। यू.पी.एस.सी. द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम इस ओर पर्याप्त संकेत देता है। आयोग द्वारा इस दिशा में निरन्तर परिमार्जन का कार्य भी होता रहता है।

  
@क्या विदेश के कुछ संस्थानों को छोड़कर विशेष शोध का कार्य कहीं होता है?

बिल्कुल नहीं होता। यही तो हमारी पीड़ा है। मैं मानता हूँ कि विकसित और विकासशील देशों के बीच जो मौलिक अन्तर है वह अन्य कारकों के साथ इन उत्कृष्ट शोध संस्थानों द्वारा भी पैदा किया जाता है। भारत में विश्वस्तरीय शोध क्यों नहीं कराये जा सकते? किसने रोका है? केवल हमारी लापरवाही और अनियोजित नीतियाँ ही इसके लिए जिम्मेदार है।

@क्या सारी की सारी तकनीकी सेवायें तीन या चार वर्ष बाद ही प्रबन्धन में प्रवृत्त नहीं हो जाती हैं?

तकनीकी सेवाओं का प्रबन्धन बिल्कुल अलग कौशल की मांग करता है। उसे कोई गैर तकनीकी व्यक्ति नहीं कर सकता। लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा जो प्रबन्धन किया जाता है उसमें किसी एक विषय की विशेषज्ञता जरूरी नहीं होती बल्कि प्रबन्धन के सामान्य सिद्धान्त प्रयुक्त होते हैं। इनका शिक्षण-प्रशिक्षण प्रत्येक नौकरशाह को कराया जाता है। एक विशिष्ट विषय का विशेषज्ञ अपने क्षेत्र में उच्च स्तर पर कुशल प्रबन्धक तो हो सकता है लेकिन सामान्य प्रशासक के रूप में उसकी विषय विशेषज्ञता निष्प्रयोज्य साबित होती है।

@देश की प्रतिभा देश में रहे क्या इस पर हमें सन्तोष नहीं होना चाहिये?

प्रतिभा को देश में रोके रखकर यदि उसका सदुपयोग नहीं करना है तो बेहतर है कि वो बाहर जाकर अनुकूल वातावरण पा ले और अखिल विश्व के लाभार्थ कुछ कर सके। इस सम्बन्ध में राजीव गान्धी की उपरोक्त उक्ति मुझे ठीक लगती है।

@समाज का व्यक्ति पर व व्यक्ति का समाज पर क्या ऋण है, मात्र धन में व्यक्त कर पाना कठिन है।

पूरी तरह सहमत हूँ। बल्कि कठिन नहीं असम्भव मानता हूँ इस अमूल्य ऋण के मूल्यांकन को। किन्तु इसका अर्थ यह भी नहीं है कि इस ऋण को मान्यता ही न दी जाय। पिता द्वारा अपने पुत्र का पालन-पोषण किया जाना एक अमूल्य ऋण है। इसे पुत्र द्वारा धन देकर नहीं चुकाया जा सकता। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पुत्र अपने पिता के प्रति कर्तव्यों को भूल जाय या यह कहकर चलता बने कि पिता ने अपना प्राकृतिक दायित्व पूरा किया था। किसी बालक की परवरिश परिवार के साथ एक खास समाज और देश के अन्तर्गत भी होती है। उसके व्यक्तित्व के निर्माण में इन सबका योगदान होता है। अपनी प्रतिभा के बल पर जब वह आगे बढ़ता है तो उसकी विकास प्रक्रिया में यह सब भी शामिल होते हैं। सक्षम होने पर उसे निश्चित रूप से ऐसे कार्य करने चाहिए जो उसके समाज और देश की उन्नति में कारगर योगदान कर सके।

मेरा आशय तो यह है कि कदाचित्‌ हम अपने देश की सर्वोच्च मेधा को देश और समाज के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्यों की ओर आकर्षित नहीं कर पा रहे हैं। मुझे लगता है कि देश की नौकरशाही में सबसे अधिक बुद्धिमान और मेहनती युवक इसलिए नहीं आकर्षित हो रहे कि वे उस पद पर जाकर देश के लिए सबसे अधिक कॉन्ट्रिब्यूट करने का अवसर पाएंगे बल्कि कुछ दूसरा ही आकर्षण उन्हें वहा खींच कर ले जा रहा है। इसकी और व्याख्या शायद जरूरी नहीं है।

बेचैन आत्मा जी ने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि सवाल सही है लेकिन समाधान क्या हो..?
…इसके लिए उन्हें क्या करना चाहिए..? माता-पिता के क्या कर्तव्य हैं..? इस लेख में इन सब बातों की चर्चा होती तो और भी अच्छा होता।

आज की तारीख़ में इसका समाधान बहुत आसान नहीं है लेकिन यह असम्भव भी नहीं है। भारत की नौकरशाही का जो स्वरूप आज दिखायी देता है उसकी नींव अंग्रेजी शासन काल में पड़ी थी। ब्रिटिश शासकों की प्राथमिकताएं आज की जरूरतों से भिन्न थीं। उन्हें एक गुलाम देश पर राज करते हुए अपनी तिजोरियाँ भरनी थीं। विरोध के प्रत्येक स्वर को दबाना था। भारत का आर्थिक शोषण और ब्रिटिश हितों का पोषण करना था। इसलिए उन्होंने नौकरशाही का एक ऐसा तंत्र खड़ा किया जो कठोरता से फैसले लेता रहे और मानवाधिकारों की परवाह किए बिना प्रचलित अंग्रेजी कानूनो को अमल में लाकर इंग्लैण्ड की राजगद्दी के हितो का अधिकाधिक पोषण करे। सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक मूल्य, मानवाधिकार, नागरिकों के मौलिक अधिकार, लैंगिक समानता, सामाजिक बुराइयों का उन्मूलन, देश की आर्थिक उन्नति, सामाजिक सौहार्द, सबको शिक्षा तथा स्वास्थ्य इत्यादि की बातें उनकी प्राथमिकताओं में नहीं थी। इसलिए उन्होंने ‘माई-बाप सरकार’ की छवि प्रस्तुत करने वाली नौकरशाही विकसित की।

देश के स्‍वतंत्र होने के बाद एक लोकतांत्रिक, संप्रभु गणराज्य की स्थापना हुई। देश में निर्मित संविधान का शासन लागू हुआ। बाद में हमारी उद्देशिका में समाजवादी और पंथनिरपेक्ष जैसे मूल्य भी जोड़े गये। हमारे देश की नौकरशाही की भूमिका बिलकुल बदल गयी। अब प्रशासनिक ढाँचा देश के आर्थिक संसाधनों के शोषण और गरीब व असहाय जनता पर राज करने के लिए नहीं बल्कि देश को उन्नति के पथ पर आगे ले जाने के लिए, और इस हेतु जरूरी अवयवों के कुशल प्रबन्धन और विभिन्न सेवाओं व सुविधाओं को आम जनता की पहुँच तक ले जाने के लिए सुकारक (facilitator) की भूमिका के निर्वाह के लिए तैयार करना चाहिए था।

एक ऐसा तंत्र जहाँ देश के वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशालाओं में विश्वस्तरीय शोध कर सकें, इन्जीनियर उत्कृष्ट परियोजनाओं का निर्माण कर उनका क्रियान्वयन करा सकें, विकास को बढ़ावा देने वाले उद्योग स्थापित करा सकें, चिकित्सा वैज्ञानिक देश और दुनिया में रोज पैदा होती नयी बीमारियों से लड़ने के लिए गहन शोध और अनुसंधान द्वारा नयी चिकित्सा तकनीकों और दवाओं की खोज कर सकें, रक्षा वैज्ञानिक देश के भीतर ही हर प्रकार के बाहरी खतरों से लड़ने के लिए आवश्यक साजो-सामान और आयुध तैयार कर सकें, अर्थ शास्त्री देश के हितों के अनुसार समुचित नीतियाँ बना सकें, कृषि वैज्ञानिक इस कृषि प्रधान देश की जरूरतों के मुताबिक पर्याप्त मात्रा में उन्नत बीज, उर्वरक और रसायन बना सकें तथा नयी कृषि तकनीकों का आविष्कार कर उसके उपयोग को सर्वसुलभ बनाने का रास्ता दिखा सकें। देश में विश्वस्तरीय शिक्षा संस्थान और विश्वविद्यालय संचालित हों जिनमें मेधावी छात्रों को पढ़ाने के लिए उच्च कोटि के शिक्षक उपलब्ध हों।

ऐसी स्थिति तभी आ सकती है जब हम एक इन्जीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक, शिक्षक,  के कार्य को अधिक महत्वपूर्ण और सम्मानित मानते हुए अपने पाल्य को उस दिशा में कैरियर बनाने को प्रेरित कर सकें। व्यक्तिगत स्तर पर अधिकाधिक धनोपार्जन को सफलता की कसौटी मानने वाली मानसिकता से बाहर आकर जीवन की नैतिक गुणवत्ता (moral quality of life) को महत्व देना होगा। यह सब अचानक नहीं होगा। हमें इसकी आदत डालनी होगी। हम जितना भी कर सकते हैं इस सन्देश को फैलाना होगा। हाथ पर हाथ धरे बैठने से अच्छा है कि हम देश में पैदा होने वाली प्रतिभाओं की पहचान कर उनकी मेधा का उचित निवेश कराने की दिशा में जो बन पड़े वह करें। राजनेताओं और वर्तमान नीति-निर्माता नौकरशाहों से उम्मीद करना तार्किक नहीं लगता। अपने हितों का संरक्षण सभी करते हैं। वे भी हर हाल में यही करना चाहेंगे।

आदरणीय अरविन्द मिश्र जी जैसे लोग जब यह कहते हैं कि  “बात आपकी लाख पते की है मगर सुनने वाला कौन है?” तो मैं पूछना चाहता हूँ कि आप स्वयं एक सरकारी महकमें में जो नौकरी कर रहे हैं उसे चलाने के लिए साइंस ब्लॉग खोलना जरूरी तो नहीं था, न ही वैज्ञानिक कहानियाँ लिखना। दुनिया भर के मुद्दों पर बहस करना भी आपकी आजीविका और आय में कोई परिवर्तन करते नहीं दीखते। फिर भी ऐसा करके आप मन में एक सन्तुष्टि का अनुभव करते होंगे। इसका कारण यह है कि वैज्ञानिक विषयों की महत्ता को रेखांकित करना अपने आप में एक साध्य है। कोई तो जरूर सुनेगा… बस आशावादी बने रहिए।

इस चर्चा में उपरोक्त मित्रों के अतिरिक्त  सर्व श्री जय कुमार झा (Honesty Project Democracy), सतीश पंचम, डॉ. दिनेशराय द्विवेदी, सुरेश चिपलूनकर, राजेन्द्र मीणा, संजय शर्मा, एम. वर्मा, रश्मि रविजा, राज भाटिया, हर्षकान्त त्रिपाठी ‘पवन’, गिरिजेश राव, काजल कुमार, मीनाक्षी, व राम त्यागी जी ने अपने सकारात्मक विचार रखे जिससे इस मुद्दे पर एक राय बनती नजर आयी। आप सबको बहुत-बहुत धन्यवाद।

इसके अतिरिक्त समीरलाल जी ‘उड़न तश्तरी’, दीपक मशाल, सुलभ जायसवालमहफ़ूज अली ने भी मुद्दे की गम्भीरता को समझा इसलिए मैं उनका आभारी हूँ।

पुछल्ला: जब देश की सर्वोच्च मेधा नौकरशाही में लगी हुई है तो भी हमारा डेलीवरी सिस्टम इतना खराब क्यों है? इनके होने के बावजूद यदि इसे खराब ही रहना है तो इन विशेषज्ञों को अपने मौलिक कार्य पर वापस क्यों न भेंज दिया जाय?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

परदुःखकातर… :(

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वैशाख की दुपहरी में सूर्य देवता आग बरसा रहे हैं… ऑफ़िस की बिजली बार-बार आ-जा रही है। जनरेटर से कूलर/ए.सी. नहीं चलता…। अपनी बूढ़ी उम्र पाकर खटर-खटर करता पंखा शोर अधिक करता है और हवा कम देता है। मन और शरीर में बेचैनी होती है…। कलेक्ट्रेट परिसर में ही दो ‘मीटिंग्स’ में शामिल होना है। कार्यालय से निकलकर पैदल ही चल पड़ता हूँ। गलियारे में कुछ लोग छाया तलाशते जमा हो गये हैं। बरामदे की सीलिंग में लगे पंखे  से लू जैसी गर्म हवा निकल रही है। लेकिन बाहर की तेज धूप से बचकर यहाँ खड़े लोग अपना पसीना सुखाकर ही सुकून पा रहे हैं। …काले बुरके में ढकी-छुपी एक बूढ़ी औरत फर्श पर ही पसर कर बैठी है। शायद अकेली आयी है। ….बाहर गेट पर लगी चाय की दुकान से पॉलीथिन में चाय लेकर एक महिला चपरासी कलेक्ट्रेट की ओर जा रही है। पसीने से भींगी उसकी पीठ पर पड़ती तीखी धूप से भाप उड़ती जान पड़ रही है…। बाबू लोगों की चाय लाना ही इस विधवा की ड्यूटी है। पति की अकाल मृत्यु के बाद उसे अनुकम्पा की नौकरी मिली है…। उसे देखकर मुझे अपने कमरे का माहौल बेहतर लगने लगता है…।

चुनाव आयोग ने ईवीएम (Electronic Voting Machine) के उचित रखरखाव के लिए कुछ सख़्त आदेश जारी किए हैं। उसी के अनुपालन के लिए डी.एम. साहब ने कमेटी बनाकर बैठक बुलायी है। डबल लॉक स्ट्रोंग रूम सिस्टम (द्वितालक दृढ़कक्ष) में इन मशीनों को रखकर उनकी लॉगबुक बनानी है। एक-एक मशीन का सत्यापन होना है। चार-पाँच बड़े अधिकारी जमा हो गये हैं। आयोग के निर्देश के अनुसार कमेटी के गठन का जो आदेश ए.डी.एम. के हस्ताक्षर से जारी हुआ है वह त्रुटिपूर्ण हो गया है। उस ओर ध्यान दिलाने पर ए.डी.एम. साहब बाबू को बुलाकर जोर से बिगड़ते हैं। “क्या गलत-सलत दस्तख़त करा लेते हो? कुछ भी अक़्ल नहीं है क्या?” …बाबू पलटकर सफाई देता है “साहब आदेश टाइप करके आपके सामने ही तो रखा था। आपने पढ़कर ही साइन किया था…”

“दरअसल कल शाम को बिजली चली गयी थी, उसी समय अन्धेरे में इसने उल्टा-सीधा साइन करा लिया” साहब की कैफ़ियत पर सभी मुस्कराते हैं, भीषण गर्मी और उससे उत्पन्न बिजली संकट की चर्चा होती है, लस्सी मंगायी जाती है, एक बेहतरीन स्वाद का चरपरा नमकीन खाया जाता है और नया आदेश बनाने की सलाह के साथ बैठक समाप्त होती है… सभी सदस्यों को किसी न किसी अगली बैठक में जाने की जल्दी है। मैं भी जिला सैनिक बन्धु की मासिक बैठक में शामिल होने चल देता हूँ।

परिसर में गुजरते हुए उधर देखता हूँ जहाँ एक तरफ़ पेशी पर लाये गये बन्दियों को दिन में ठहराने का लॉक-अप है। जेल की गाड़ी उन्हें यहाँ सुबह ले आती है और सुनवायी के बाद शाम को गिनती करके ले जाती है। गाड़ी से उतरकर लॉक-अप में घुसते, अपनी बारी आने पर लॉक-अप से निकलकर कोर्ट तक जाते फिर लौटते और दुबारा जेल वापसी के लिए गाड़ी में जानवरों की तरह भरे जाते समय उन कैदियों की एक झलक पाने के लिए और उनसे दो शब्द बात कर लेने के लिए सुबह से शाम तक टकटकी लगाये धूप में खड़ी उनकी बूढ़ी माँ, पत्नी, बेटे-बेटियाँ या बुजुर्ग बाप दिनभर अवसर की तलाश करते रहते हैं। बड़ी संख्या में पुलिस वाले उन्हें पास फटकने नहीं देते। हट्ट-हट्ट की दुत्कार के बीच वे जैसे-तैसे अपनी बातों के साथ कुछ खाने पीने के सामान की गठरी अपने स्वजन को थमा ही देते हैं। अधिकांश कैदी गरीब, कमजोर और फटेहाल से हैं। उनके मुलाकाती भी दीन-हीन, लज्जित और म्लानमुख…। यह सब टीवी पर दिखाये जाने वाले हाई-प्रोफाइल कैदियों से बिल्कुल अलग सा है। image

चित्रांकन- सिद्धार्थ ‘सत्यार्थमित्र’

जिस दिन कोई अमीर और मजबूत कैदी आता है उस दिन सुरक्षा और बढ़ा दी जाती है। वे इस ‘कैटिल क्लास’ की गाड़ी में ठूस कर नहीं लाये जाते। …घण्टों से धूप में खड़ी मासूम औरतों और बच्चों को देखकर मुझे गर्मी का एहसास कम होने लगता है। फौजियों की बैठक में समय की पाबन्दी जरूरी है…। मैं तेज कदमों से मीटिंग हॉल में प्रवेश करता हूँ।

एक सेवा निवृत्त कर्नल साहब ने जब से जिला सैनिक कल्याण और पुनर्वास अधिकारी का पद सम्हाला है तबसे यह बैठक माह के प्रत्येक तीसरे शनिवार को नियमित रूप से होने लगी है। जिलाधिकारी द्वारा आहूत इस बैठक में पूरे जिले से सेवानिवृत्त फौजी स्वयं अथवा अपने ब्लॉक प्रतिनिधि के माध्यम से अपनी समस्याओं के निपटारे के लिए यहाँ इकठ्ठा होते हैं। औपचारिक परिचय और उपस्थिति पंजिका पर हस्ताक्षर का काम जल्दी से निपटाकर कार्यवाही शुरू होती है। देश की सेना में जवान, सिपाही, सूबेदार हवलदार आदि पदों पर सेवा कर चुके ये लोग अब ‘सिविलियन’ हो गये हैं और अपनी जिन्दगी को नये सिरे से बसाने की कोशिश में लगे हैं। सरकार ने इन्हें सहारा देने के लिए तमाम इन्तजाम किये हैं, लेकिन इस बैठक को देखने के बाद लगता है कि सेवा निवृत्ति के बाद इन फौजियों के ऊपर मुसीबत का अन्तहीन सिलसिला शुरू हो गया है…।

इनकी जमीन पर अवैध कब्जा, माफ़िया और गुण्डों द्वारा धमकी, शस्त्र लाइसेन्स मिलने या उसके नवीनीकरण में लालफीताशाही, सरकारी दफ़्तरों में धक्के खाने और न पहचाने जाने का संकट इन फौजियों के मुंह से ज्वार की तरह फूट पड़ा। पुलिस और प्रशासन के अधिकारी उन्हें समझाने-बुझाने और जाँच का आश्वासन देकर चुप कराने की कोशिश कर रहे थे।

एक फौजी की बेटी को शरेआम उठा लिया गया था। उसने अपनी बात कहनी शुरू की। वह वास्तव में हकला रहा था कि उसकी पीड़ा उसकी जुबान को लड़खड़ाने पर मजबूर कर रही थी यह मैं अन्त तक नहीं समझ पाया। साहब… मैं सबको जानता हूँ। उन लोगों ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा… पुलिस भी उनको जानती है… दरोगा जी उन लोगों से कहाँ मिलते हैं यह भी जानता हूँ… महीने भर से परेशान हूँ लेकिन मेरी लड़की को मेरे सामने नहीं ला रहे हैं… जब जाता हूँ तो मुझे ही उल्टा समझाने लगते हैं… कहते हैं कि लड़की अठ्ठारह साल की है… अपनी मर्जी से गयी है… मैं कहता हूँ कि एक बार मेरी लड़की को मेरे सामने लाकर दिखा दो तो मैं मान जाऊँगा। लेकिन वे कुछ नहीं कर रहे हैं। डिप्टी एस.पी. साहब मोबाइल पर थानेदार से बात करके दरियाफ़्त करते हैं और बताते हैं कि लड़की ने उस मुस्लिम लड़के के साथ कोर्ट मैरिज कर लिया है… फौजी के चेहरे पर दर्द और घना हो जाता है। साहब, मैं तो बस चाहता हूँ कि एक बार मेरी बच्ची को मेरे सामने ला दो… मैं उसे देख लूंगा तो संतोष कर लूंगा… वह ऐसी नहीं है…. हमारी बच्ची को जबरिया उठाया गया है… मुझे सब मालूम है… वह ऐसा कर ही नहीं सकती… कोई मुझे समझ नहीं रहा है…

पुलिस अधिकारी समझाने की कोशिश करते हैं… देखिए जब आपकी लड़की बालिग हो चुकी है तो वह अपनी मर्जी से जहाँ चाहे वहाँ रह सकती है। हम इसमें कुछ नहीं कर सकते…. नहीं साहब, मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है कि वह ऐसा कैसे कर सकती है… मैं यह नहीं मान सकता… फौजी की आवाज काँप रही है। …असल में आपने अपनी बेटी को तालीम ठीक नहीं दी है। उसने आपको छोड़कर उस लड़के के साथ रहने का निर्णय ले लिया है… इसमें हम क्या कर सकते हैं… ठीक है, तो आपभी मुझे वही समझा रहे हैं जो दरोगा जी समझा रहे थे। हार कर अब मैं अपनी जान दे दूंगा… लेकिन उसके पहले उन दुश्मनों से बदला लेकर रहूंगा… अब मैं खुद ही कुछ करूंगा… मेरी कोई सुनने वाला नहीं है… मेरी बेटी को उन लोगों ने अगवा कर लिया है…। बार-बार यह सब दुहराता है। उसे अपनी सीट पर बैठ जाने का हुक्म होता है। अगला केस बताया जाय…

दूसरा फौजी खड़ा होता है। मेरी बेटी तो सिर्फ़ पन्द्रह साल की है। मैं दो महीने से भटक रहा हूँ। दरोगा जी केवल दौड़ा रहे हैं। मैने नामजद रिपोर्ट लिखवायी है। उन लोगों ने ‘अरेस्ट स्टे’ ले रखा था। मैने हाईकोर्ट से उसे खारिज करवा दिया है… फिर भी पुलिस उन्हें गिरफ़्तार नहीं कर रही है। वे बहुत बड़े माफ़िया हैं। मुझे डर है कि मेरी बेटी को उन लोगों ने कहीं बाहर भेंज दिया है या उसके साथ कोई गलत काम हो रहा है…। वे लोग रोज हाईकोर्ट आ-जा रहे हैं। मैं उन्हें रोज देखता हूँ लेकिन पुलिस को दिखायी नहीं पड़ते। दरोगा जी कह रहे थे कि आई.जी. साहब ने गिरफ़्तार करने से मना किया है…। डिप्टी एस.पी. तुरन्त प्रतिवाद करते हैं। यह सब गलत बात है। आप कप्तान साहब (डी.आई.जी.) से मिलकर अपनी बात कहिए। गिरफ़्तारी तो अब हो जानी चाहिए। लेकिन उनकी बात में विश्वास कम और सान्त्वना अधिक देखकर फौजी विफ़र पड़ते हैं। साहब, थानेदार को तलब कर लिया जाय… मोबाइल पर बात होती है। थानेदार किसी कोर्ट में चल रही बहस में व्यस्त हैं। अभी नहीं आ सकते…। उनसे बात करके बाद में आपको सूचना दे दी जाएगी…। आश्वासन मिलता है।

आगे समोसा, मिठाई, नमकीन की प्लेटें लगायी जा चुकी हैं। फ्रिज का ठण्डा पानी गिलासों में भरकर रखा जा चुका है, जिनकी बाहरी सतह पर छोटी-छोटी बूँदें उभर आयी हैं। सबके सामने कपों में चाय रखी जा रही है। …किसी और की कोई समस्या हो तो बताये। कोषागार से या वित्त सम्बन्धी कोई परेशानी हो तो इन्हें नोट करा दें। यह बात नाश्ता प्रारम्भ होने की भुनभुनाहट में दब जाती है। कोई शिकायत नहीं आती है। कर्नल साहब सबको धन्यवाद देते हैं। बैठक ‘सकुशल’ समाप्त होती है…

मेरा मन ए.सी. की ठण्डी हवा में भी उद्विग्न होकर गर्मी महसूस करने लगता है। सीने पर कुछ बोझ सा महसूस होता है। एक लोक कल्याणकारी राज्य का यह सारा शासन प्रशासन किसकी सेवा में लगा हुआ है…?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

ढाबा संस्कृति और बर्बाद होते बच्चे…

22 टिप्पणियाँ

 

“साहब मुझे यहाँ से छुड़ा दीजिए… ये लोग मुझे बहुत मार रहे हैं…” अचानक कान में ये शब्द पड़े तो मैं अपने मोबाइल के मेसेज पढ़ना छोड़कर उसकी ओर देखने लगा। एक लड़का बिल्कुल मेरे नजदीक आकर मुझसे ही कुछ कहने की कोशिश कर रहा था।

करीब तेरह चौदह साल की उम्र का वह दुबला सा लड़का निश्चित ही किसी गरीब परिवार का लग रहा था…। पहले तो उसका आर्त स्वर मुझे कुछ बनावटी लगा शायद भीख मांगने वाले लड़कों की तरह अभिनय करता हुआ सा…  उसकी सिसकियों के बीच से छन कर आ रही स्पष्ट आवाज और शुद्ध हिन्दी के प्रयोग से लग रहा था कि उसे स्कूल की शिक्षा जरूर मिली होगी। लेकिन इसने मुझसे रुपया-पैसा तो कुछ मांगा ही नहीं… फिर यह यहाँ ढाबे पर क्या कर रहा है…?

थोड़ी देर के लिए मैं उसकी सच्चाई को लेकर थोड़ा असमन्जस में पड़ गया था, लेकिन जब उसे मुझसे बात करता देखकर ‘ढाबे का मालिक’ नुमा एक लड़का तेजी से मेरे पास आकर उसे बोलने से रोकने की कोशिश करने लगा और सफाई की मुद्रा में मुझे कुछ समझाने लगा तो मेरे कान खड़े हो गये। मैने उस लड़के को शान्त कराकर उससे पूरी बात बताने को कहा। इसपर मालिक के लड़के की बेचैनी कुछ बढ़ती सी लगी।

11032010535हुआ ये था कि मैं कोषागार स्ट्रॉंग-रूम से सम्बन्धित एक महत्वपूर्ण कार्य के लिए इलाहाबाद से कानपुर सड़क मार्ग से जा रहा था। मेरे साथ में मेरा स्टाफ़ और दो सशस्त्र वर्दीधारी गार्ड भी थे। करीब दस बजे दिन में उन सबको खाना खिलाने के लिए मैने गाड़ी चौड़गरा के ‘परिहार ढाबा’ पर रुकवा दी थी। मेरे चीफ़ कैशियर ने स्टाफ़ के लिए दाल फ्राई, चना मसाला और तन्दूरी रोटी का ऑर्डर दे दिया था। मुझे स्वयं खाना खाने की इच्छा नहीं थी लेकिन ढाबे पर यदि खीर मिल जाय तो मैं उसका लोभ संवरण नहीं कर पाता। सो यहाँ भी मैने एक प्लेट खीर खाने के बाद ही एक कप चाय पीने की इच्छा जतायी थी।

इस साधारण से ढाबे पर टिपिकल शैली में लकड़ी के लाल, हरे, नीले तख्त लाइन से बिछे हुए थे। उनके किनारे प्लास्टिक की कुर्सियाँ डालकर डाइनिंग हाल का रूप दिया गया था। हाई-वे पर चलने वाली ट्रकों के ड्राइवर और क्लीनर इन्ही तख़्तों पर बैठकर भोजन करते हैं और जरुरत के मुताबिक इसी पर पसरकर आराम भी करते हैं। बाकी प्राइवेट गाड़ियों की सवारियाँ भी यदा-कदा यहाँ रुककर भोजन या नाश्ता करती हैं।

फ्रिज में रखी हुई ठण्डी और स्वादिष्ट खीर मुझे तत्काल मिल गयी। उसे चटपट समाप्त करके मैं चाय की प्रतीक्षा कर ही रहा था कि उस लड़के ने मुझे कोई सरकारी अफ़सर समझकर कदाचित्‌ अपने को संकट से निकालने की उम्मीद में अपनी समस्या बतानी शुरू कर दी। वहीं एक टीवी पर फुल वॉल्यूम में कोई मसाला फिल्म चल रही थी जिसके शोर में बाकी लोगों तक यह बातचीत नहीं जा रही थी। लेकिन ढाबे पर काम करने वाले दूसरे रसोइये और नौकर इस लड़के पर सतर्क निगाह रखे हुए थे इसलिए दो मिनट के भीतर ढाबे के मालिक का लड़का लपका हुआ चला आया…।

लड़का बता रहा था, “मुझे स्टेशन से एक आदमी यहाँ लाकर छोड़ गया है। ये लोग मुझसे जबरदस्ती काम करा रहे हैं और बहुत मार रहे हैं।” उसकी सिंसकियाँ बढ़ती जा रही थीं जो अचानक मालिक के लड़के के आते ही रुक गयीं।

मैने मालिक के लड़के से ही पूछ लिया- “यह क्यों रो रहा है जी…?”11032010533

“कुछ नहीं साहब, यह अभी दो-तीन दिन पहले ही आया है। इससे हम लोग कोई काम नहीं कराते हैं। कहते हैं कि- बस जो खाना हो खाओ, और यहीं पड़े रहो … लेकिन यह बार-बार यहाँ से जाने को कहता है…”

“तो इसके साथ जबरदस्ती क्यों करते हो? जाने क्यों नहीं देते?” मैने तल्ख़ होकर पूछा।

“इसको हम अकेले किसी ट्रक पर बैठकर जानें दें तो पता नहीं कहाँ गायब हो जाएगा। फिर जिस ठेकेदार ने इसे यहाँ दिया है उसको हम क्या जवाब देंगे? …हम इससे कह रहे हैं कि ठेकेदार को आ जाने दो तो छोड़ देंगे, लेकिन मान ही नहीं रहा है…”

मैने लड़के से उस ठेकेदार के बारे में पूछा तो उसे कुछ भी मालूम नहीं था। फिर उसका नाम पूछा तो बोला, “मेरा नाम अजय है- स्कूल का नाम मुकेश और घर का नाम अजय”

उसने बिल्कुल शिशुमन्दिर के लड़कों की तरह जवाब देना शुरू किया। लखनऊ के पास चिनहट में किसी शिक्षा निकेतन नामक स्कूल से दर्जा पाँच का भागा हुआ विद्यार्थी था। बता रहा था कि वह अपने साथ के एक लड़के के साथ घूमने के लिए ट्रेन में बेटिकट बैठ गया। पकड़े जाने पर आगे के किसी स्टेशन पर टीटी द्वारा उतार दिया गया तो वहीं प्लैटफ़ॉर्म पर एक आदमी मिला। उसने इसकी मदद करने के नाम पर इस ढाबे पर लाकर छोड़ दिया।

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इतनी कहानी जानने के बाद मैं चिन्ताग्रस्त हो गया। मैं जिस जरूरी सरकारी काम से निकला था उसके लिए मुझे जल्दी से जल्दी कानपुर पहुँचना जरूरी था। लड़के को उसके हाल पर छोड़ कर जाने में खतरा यह था कि ढाबे का मालिक उसे निश्चित ही और दंडित करता क्योंकि उसने मुझसे उसकी शिकायत कर दी थी। …इससे बढ़कर यह चिन्ता थी कि मेरे ऊपर लड़के ने जो भरोसा किया था और संकट से उबारे जाने की जो गुहार लगायी थी उसका क्या होगा। मैं सोचने लगा- एक जिम्मेदार लोकसेवक होने के नाते मुझे क्या करना चाहिए? वह लड़का मेरे जाते ही घोर संकट में फँस सकता था।

तभी उस ढाबे का मालिक भी आ गया जिसको उसके लड़के ने फोन करके बुला लिया था। सफेद कुर्ता-पाजामा पहने हुए शिवमंगल सिंह परिहार ने अपना परिचय देते हुए बताया कि ऐसे लड़के इधर-उधर से आ जाते हैं साहब, लेकिन हम लोग इनका बड़ा खयाल रखते हैं। गलत हाथों में पड़कर ये खराब हो सकते हैं…। मैने टोककर कहा- “यह लड़का तो बता रहा है कि इसने कल से खाना ही नहीं खाया है, क्या खयाल रखते हैं आप?‘”

इसपर वह झेंपते हुए अपने रसोइये को डाँटने लगा…। मालिक के लड़के ने बीच में आकर कहा “नहीं साहब, इससे पूछिए, रात में खाना दिया गया था कि नहीं…!” लेकिन मेरे पूछने से पहले ही वह बोल उठा  कि मुझे कुछ नहीं मिला है, मुझे बहुत भूख लगी थी” इस बीच मेरे स्टाफ़ के साथ अजय उर्फ़ मुकेश भी खाना खा चुका था।

अजीब स्थिति बन गयी। अब मैं इसे इस हाल में छोड़कर कत्तई नहीं जा सकता था। फतेहपुर के एक विभागीय अधिकारी का नम्बर मेरे पास था। मैने उन्हें फोन मिलाकर पूरी बात बतायी। वहाँ वरिष्ठ कोषाधिकारी के पद पर तैनात श्री विनोद कुमार जी ने इसको गम्भीरता से लिया। जिले के पुलिस विभाग को इत्तला दी गयी। उनके आश्वासन के बाद मैने ढाबे पर मौजूद सभी पक्षों को लक्ष्य करते हुए दनादन कुछ तस्वीरें खींच डाली, ताकि बाद में कोई इस बात से इन्कार न करे। 11032010537

मुझे यह आशंका हो रही थी कि मेरे रवाना होते ही यदि लड़के को मार-पीट कर भगा दिया गया तो जिले की पुलिस या बालश्रम उन्मूलन विभाग वाले आकर ही क्या कर लेंगे। इसकी सम्भावना से बचने के लिए मैने ढाबा मालिक के साथ बच्चे को और अपने चीफ़ कैशियर को खड़ा कराकर फोटो खींच लिया। मैने शिवमंगल सिंह को प्यार से समझा दिया कि जबतक कोई जिम्मेदार सरकारी व्यक्ति यहाँ आकर इस बच्चे को न ले जाया तबतक आप इसे कहीं नहीं जाने देंगे। यदि इस बीच इस लड़के के साथ कोई दुर्व्यवहार हुआ तो आपकी जिम्मेदारी तय मानी जाएगी। सबूत के तौर पर ये तस्वीरें मैं अपने कैमरे में कैद कर लिए जा रहा हूँ।

मैने लड़के को भी समझा दिया कि जबतक कोई सरकारी अधिकारी या थाने से कोई आकर तुम्हें यहाँ से न ले जाय तबतक यहीं रहना। शाम तक वापसी में आकर मैं फिर से समाचार लूंगा। अब निश्चिन्त होकर मैं कानपुर चला गया, लेकिन अगले प्रत्येक आधे घण्टे पर फतेहपुर के वरिष्ठ कोषाधिकारी से उसका हाल-चाल मिलता रहा। कानपुर से वापसी करते हुए मैं ऐसी सामग्री के साथ था कि कहीं रुके बगैर मुझे सीधे इलाहाबाद कोषागार में पहुँचना निर्दिष्ट था। इसलिए मुझे मोबाइल के माध्यम से मिली सूचना पर निर्भर रहना पड़ा।

***

शाम को लौटते हुए रास्ते में जो अन्तिम सूचना मिली उसके अनुसार स्थानीय थाने के थानेदार ने वहाँ जाकर लड़के को अपने साथ थाने में लाकर ठहरा दिया था। शिवमंगल सिंह ने उसे मजदूरी के बचे हुए डेढ़ सौ रूपये देकर प्यार से विदा किया था और पुलिस के अनुसार लड़के को ढाबे वालों से कोई शिकायत नहीं रह गयी थी। लड़के ने जो अपना पता बताया था उस क्षेत्र के सम्बन्धित थाने से सम्पर्क कर इसके गायब होने का सत्यापन कराया जा रहा था। बाल श्रम कानून के प्रयोग की आवश्यकता नहीं महसूस की गयी थी। लड़के ने भी अपने साथ वी.आई.पी. वर्ताव पाकर अपने आँसू पोछ लिए थे और किसी पुलिस हमराही के साथ अपनी घर वापसी की प्रतीक्षा कर रहा था।

मैं वापसी में रास्ते भर सड़क किनारे चल रहे असंख्य ढाबों, रेस्तराओं, होटलों और चाय की दुकानों की ओर देखता हुआ यही सोचता रहा कि इनमें जाने कितने अजय, मुकेश, छोटू, बहादुर, पिन्टू, रामू, बच्चा, आदि किसी न किसी ठेकेदार के हाथों चढ़कर अपना जीवन खराब कर चुके होंगे…।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

 

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